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Thursday, November 30, 2017

नयी मम्मी--लघुकथा

लक्ष्मी हतप्रभ खड़ी थी, उसे अपनी आँखों पर भरोसा नहीं हो रहा था| आज तीसरा दिन था और अधिकांश रिश्तेदार जा चुके थे| उसके कमरे में आयी उस लड़की से उसने ऐसे ही पूछ लिया था"तुम किसकी लड़की हो?
पहले तो वह लड़की चुप रही और लक्ष्मी को अजीब सी निगाहों से देखती रही लेकिन जब दुबारा उसने पूछा तो उस लड़की ने जवाब में सवाल कर दिया "तुम हमारी नयी मम्मी हो ना?
इस बात के लिए वह बिलकुल तैयार नहीं थी, उसे इतना तो पता था कि उसके पति की यह दूसरी शादी है| लेकिन उसे यह नहीं बताया गया था कि उसके एक बेटी भी है| अभी वह इन्हीं सवालों से जूझ रही थी कि उस बच्ची ने फिर से एक सवाल किया "तुम हमें मारोगी नहीं ना, हम बिलकुल परेशान नहीं करेंगे? रानी की नयी मम्मी उसे बहुत मारती है"|
उसके सवाल ने उसे एक झटका सा दे दिया, उसे अपना घर याद आ गया| उसकी मम्मी की मौत के बाद आयी नयी मम्मी ने उसको हर कदम पर जलील किया था और यह शादी भी उसी की वजह से हुई थी| अब उसकी आँखों के सामने उसके पति की तस्वीर, जिस पर उसे बेहद क्रोध आया था, धुंधलाने लगी और उस बच्ची के चेहरे में उसे अपना अक्स नजर आने लगा|
बच्ची ने जब देखा कि उसे कोई जवाब नहीं मिल रहा है तो वह चुपचाप बाहर की तरफ जाने लगी| लक्ष्मी झटके से उठी और दौड़ कर उसने उस बच्ची को अपने सीने से लगा लिया और उसे चूमते हुए बोली "तुम मुझे मम्मी ही कहना बेटी, नयी मम्मी नहीं"|  

Tuesday, November 28, 2017

समय-- लघुकथा

सब कुछ जैसे एक फिल्म की तरह उनके जेहन में घूम रहा था, आखिर ऐसा क्यूँ हो गया| शायद उनकी परवरिश में ही कोई खोट रह गयी हो, बुझे मन से अपने आप को बस यही समझा पाए मोहसिन| एक बार फिर उन्होंने अखबार के पन्ने पर गौर से देखा, लेकिन वहां रज्जब का ही नाम लिखा हुआ था| रशीदा तो जैसे काठ हो गयी थी, लोगों की नज़रों का सामना करने की उसकी हिम्मत नहीं बची थी| 
बहुत लाड़ से पाला था उन दोनों ने रज्जब को, यहाँ तक कि यूनिवर्सिटी में भी भेजा| उसकी बातें वैसे तो बहुत अच्छी लगती थीं उनको लेकिन कभी कभी थोड़ा डर भी लगता था| खासकर जब वह अपने ही धर्म के गुरुओं की बातों की धज्जियाँ उड़ाने लगता था| कई बार उन्होंने उसे समझाया भी कि अपने विचार तो ठीक हैं लेकिन इस तरह उनको व्यक्त करना लोगों को शायद नागवार गुजरेगा|
"देखिये अब्बू, मैं उनमे से नहीं हूँ जो इनके जाहिलपन को बर्दास्त करूँ| हमें सीख देते हैं कि मजहब की तालीम लो और उसे आगे बढ़ाओ, लेकिन खुद इनके बच्चे बाहर देशों में पढ़ते हैं और इसके लिए कोई इनको नहीं पूछता"|
"ठीक है, तू मत सुन इनकी बात और जो ठीक लगता है वैसी तालीम ले| हमने तो तुम्हें कभी मना नहीं किया इसके लिए, फिर क्यूँ बेकार में इनकी नज़र में चढ़ता है", मोहसिन ने उसको समझाया|
"दरअसल ये लोग चाहते ही नहीं हैं कि अपनी कौम पढ़े लिखे, इसलिए बस मज़हब और डर की बात करते रहते हैं लोगों से| इनका एक ही जवाब है अब्बू, अपने आप को शिक्षित करना और इनके फैलाये भ्रम के जाल को तोड़ना", रज्जब अपनी दलील रखता| मोहसिन को कभी कभी थोड़ी घबराहट भी होती लेकिन फिर वह रज्जब के आत्मविश्वास से वह अपने आप को तसल्ली दे देते| 
रज्जब फिर भी वही करता जो उन धर्म के ठेकेदारों को बुरा लगता| युनिवर्सिटी से लौटने के बाद तो जैसे वह उनके पीछे ही पड़ गया था| अपने मोहल्ले के लोगों को उसने धीरे धीरे समझाना शुरू किया और लोगों को पढ़ने के लिए प्रेरित करता रहा| मोहसिन रोज खुदा से उसकी सलामती के लिए दुआ करते और साथ साथ उसे भी समझाते रहते| 
सुबह की खबर ने तो उनको जैसे तोड़ के रख दिया, रज्जब को धार्मिक उन्माद फैलाने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया था|