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Tuesday, February 28, 2017

परिवर्तन--लघुकथा

"कब से चल रहा है ये सब इस घर में", कर्नल साहब गुस्से से आग बबूला हुए जा रहे थे|
सामने बैठे बेटे के चेहरे पर हवाईयां उड़ने लगीं, वह कुछ कहने का साहस जुटा पाने में अपने आप को असमर्थ महसूस कर रहा था|
"बोलते क्यों नहीं, अब सांप सूंघ गया तुमको| कभी सोचा नहीं कि ऐसा करके अपने खानदान की प्रतिष्ठा को गर्त में ढकेल दोगे ", कर्नल साहब की ऑंखें अलमारी की तरफ बढ़ गयीं जहाँ पर रखे हुए तमाम मैडल उनके गौरवशाली अतीत को दर्शा रहे थे|
"पापा, जाने दीजिये, आखिर उसने गलत क्या किया है", बेटी ने हिम्मत दिखाई और पापा के सामने आ खड़ी हुई|
"तुम चुप रहो, तुमने तो अपने पिता की इज़्ज़त रखी है, किसी की भी परवाह न करके तुमने एयर फ़ोर्स में जाने का फैसला लिया| और एक ये हैं कि ?, कर्नल साहब फिर से गुस्से में उफन पड़े|
"वही तो मैं भी कह रही हूँ पिताजी, आखिर जब मैंने सबकी सोच के खिलाफ अपना करियर चुना तो आपको फ़क़्र हुआ था, तो आज इसको क्यों नहीं चुनने देते", बेटी ने उनको पीछे से पकड़ लिया|
कर्नल साहब कुछ नम्र हुए, बेटी का हाथ सहलाते हुए बोले "लेकिन बेटे, लोग क्या कहेंगे कि कर्नल का बेटा और ये कर रहा है"|
"पापा, लोगों की सोच पर अपने फैसले मत कीजिये, जैसे आपने मुझे अपना फील्ड चुनने दिया, उसी तरह इसको भी अपना करियर बनाने दीजिये", कह कर उसने पापा को एक बार फिर से प्यार से देखा|
"भाई कल से तुम अपने कत्थक गुरु को घर पर ही बुला लो और खूब जम कर प्रैक्टिस करो, पापा का नाम तुमको भी तो ऊँचा करना है", कहते हुए बेटी ने भाई को अपनी तरफ बुलाया|
कर्नल साहब के खुले बाँहों में दोनों बच्चे समां गए, किनारे खड़ी उनकी पत्नी की आँखों से ख़ुशी के कुछ बूंद टपक गए| 

Sunday, February 26, 2017

सपनों की चाभी--लघुकथा

"अरे कल कहाँ रह गया था तू, आजकल बहुत नागा करने लगा है", जलती निगाह से देखते हुए सोहन ने उसको घुड़का|
"कुछ जरुरी काम आ गया था मालिक, आगे ध्यान रखूँगा", कहकर उसने खरहरा उठाया और दरवाजा साफ़ करने लगा|
"अच्छा तेरे परीक्षा का क्या हुआ, कुछ निकला उसका", व्यंग से सोहन ने उसे टोका|
"अभी नहीं निकला है मालिक", कहकर वह वापस काम में लग गया|
"इन लोगों को भी कलक्टर बनने का सपना दिखता है आजकल, पता नहीं इ सब काम कौन करेगा", सोहन बड़बड़ाते हुए खलिहान की तरफ निकल गया|
उसने एक मिनट के लिए खरहरा रोका और जेब में पड़े हुए साक्षात्कार के पत्र को एक बार फिर से टटोला| उसे स्पर्श करते ही अपने संघर्ष उसको याद आ गए| एक जंग लगी चाभी मिटटी से झांकती नजर आयी तो उसने उसे उठा लिया| ऐसी ही चाभी तो अभी उसके जेब में भी है जिससे वह अपने पुरखों के बंद सपनों को खोल सकेगा, सोचते हुए उसके हाथ अब जल्दी जल्दी चल रहे थे|

खबर--लघुकथा

बीस साल बाद आज जोखन लौटा था गाँव, कितनी बार घरवालों ने बुलाया, कितने प्रयोजन पड़े, लेकिन जोखन ने कभी भी गाँव की तरफ जाने का नाम नहीं लिया था| कितनी बार लोगों ने पूछा, लेकिन कभी उसने वजह नहीं बताया| आज गाँव में आकर उसे सब कुछ बदला बदला लग रहा था, कुछ भी पहचाना नहीं लग रहा था| पिताजी से हाल चाल करके वह गाँव में घूमने निकला और कुछ ही देर में गाँव के बाहर खेतों में खड़ा था| खेत भी अब खेत कम, प्लाट ज्यादा लग रहे थे| खेतों को पार करता हुआ वह बगल के गाँव के रास्ते पर चल पड़ा| कभी पगडण्डी जैसा रास्ता अब कंक्रीट का बन गया था लेकिन उसपर से गुजरने वाले कदम अब कम हो गए थे|
बगल के गाँव में पहुँच कर उसने उस घर की तरफ कदम बढ़ाया जहाँ बीस साल पहले वह आखिरी बार आया था| उस आखिरी बात के बाद कि "हमारा साथ संभव नहीं है, अपनी अलग जिंदगी बसा लो| हाँ मेरी दुआएं हमेशा साथ रहेंगी और तुम जितना आगे बढ़ोगे, मैं भी उतना ही खुश रहूंगी", जोखन ने कभी पलट कर नहीं देखा| इस बात का पता उन दोनों ने आज तक किसी किसी को भी नहीं लगने दिया था|
इस बीच उसे खबर मिलती रही कि रंजू की शादी हो गयी और वह किसी और गाँव में चली गयी| वह भी अपनी जिंदगी में व्यस्त होता गया और अपनी हर तरक्की उसे यह सुकून जरूर देती रही कि रंजू को भी ख़ुशी मिल रही होगी| लेकिन पिछले हफ्ते जो खबर उसे मिली उसने उसके होश उड़ा दिए|
अब तो बस मन में एक इच्छा थी कि एक बार पता चल जाए कि जो खबर उसने सुनी थी वह सच है कि नहीं| बड़ी जद्दोजहद के बाद उसने गाँव आकर एक बार रंजू के घर जाकर पता लगाने का फैसला लिया था| घर में तो वह किसी से पूछ नहीं सकता था इसलिए मन ही मन वह मनाता आया था कि खबर गलत ही हो| आखिर उसकी बात गलत कैसे हो सकती थी, उसकी तरक्की से तो रंजू की खुशियाँ बढ़नी थी| बस दो ही घर बाद उसकी गली आने वाली थी और जोखन का दिल बुरी तरह धड़क रहा था कि किसी आवाज ने उसको रोका "अरे जोखन, कैसे हो और कब आये, बहुत साल हो गया था तुमको देखे"|
उसने पलट कर देखा, रंजू के पिताजी थे| क्या कहे, क्या पूछे, उसके दिमाग ने जैसे काम करना बंद कर दिया| बस किसी तरह इतना कह कर कि "आज ही आया था चाचा, ठीक हूँ", पलट कर अपने गाँव की तरफ चल पड़ा| पीछे से आती आवाज उसे जैसे सुनाई ही नहीं पड़ रही थी और उस खबर के बारे में पूछने की हिम्मत जोखन गँवा चुका था|