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Friday, July 31, 2015

नींव--

कैमरों के फ़्लैश लगातार चमक रहे थे , पता नहीं कितने लोग ऑटोग्राफ लेने के लिए धक्का मुक्की कर रहे थे | उस जिले से वो पहला व्यक्ति था जिसका चयन टेस्ट टीम में हुआ था | भीड़ में से जगह बनाकर वो स्टेज पर पहुँचा और अपनी निर्धारित कुर्सी पर बैठ गया | मंचासीन अतिथिगण बारी बारी से उसके बारे में और उसको वहां तक पहुंचाने में अपने योगदान के बारे में बोल रहे थे और रह रह कर तालियाँ बज रही थीं |
आखिर में वह बोलने के लिए माइक के पास खड़ा हुआ | मंच पर बैठे और सभा में उपस्थित सबकी निगाह उसकी ओर गड़ी हुई थी | उसने अपने माता पिता से लेकर अपने कोच और सेलेक्टर्स सबका आभार प्रकट किया और फिर उसने एकदम पीछे बैठे बुज़ुर्ग की ओर इशारा किया और उनको मंच पर लाने का आग्रह किया |
" यही हैं मेरे चयन की नींव डालने वाले शख्स जो उस मैदान के ग्राउंड्समैन हैं | पता नहीं कितनी बार मैंने खेल छोड़ने का सोच लिया था लेकिन मेरे साथ हर समय मौजूद और मेरी हर निराशा को आशा में बदलने वाले यही हैं ", ये कहते हुए उसने अपने गले में पड़ा हार उनके गले में पहना दिया और उनके पाँव छू लिए | सभागार में तालियों की आवाज़ देर तक गूंजती रही और उस बुज़ुर्ग के आँखों से बहने वाले आंसू उसका कन्धा भिगोते रहे |  


   

Thursday, July 30, 2015

उचित सजा --

" इस गुनाह की सजा सिर्फ और सिर्फ सजाये मौत हो सकती है , मुल्ज़िम को अगले महीने की २७ तारीख़ को फाँसी दे दी जाये ", और ज़ज़ साहब ने क़लम तोड़ दी | कोर्ट रूम में सन्नाटा था लेकिन वहां उपस्थित लोगों के चेहरे पर संतुष्टि का भाव साफ़ दिखाई पड़ रहा था |
अचानक सरकारी वकील ने कुछ कहने की इज़ाज़त मांगी और कहने लगा " ज़ज़ साहब , आपका फैसला बिलकुल सही है और मैंने भी यही मांग की थी | लेकिन इस मुज़रिम को , जिसने ऐसा जघन्य अपराध किया है , इतनी आसान मौत देना शायद उचित नहीं होगा | मैं इस अदालत से मांग करता हूँ कि मुल्ज़िम को फाँसी दी जाए लेकिन उसकी तारीख़ अनिश्चित रखी जाए और इसे हर दिन मौत का इंतज़ार करने दिया जाए | शायद इससे उन मृतक आत्माओं को कुछ शांति मिलेगी जो इसकी वज़ह से काल कलवित हो गए "|
कोर्ट रूम में आवाज़ें आने लगीं , वहां मौजूद लोग इसका समर्थन कर रहे थे |

Friday, July 24, 2015

दिल ने आराम किया--

मज़हब को समझें इस कोशिश में न कभी आराम किया
जिन हाथों में क़लम थी कभी , उनसे क़त्ले आम किया
फिक्र उन्हें है बनें हमारे , मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे
खिल जाये इक इन्सां भी , ना ऐसा कोई काम किया
आओ खोजें इस दुनियाँ में , मिलती है हर ओर नज़ीर
सजदे में ही मिले रहीम ,जो सुबह से लेकर शाम किया
कितना मुश्किल था पाना इस गम से दिल को छुटकारा
सदियोँ से तरसे थे लेकिन , अब दिल ने आराम किया
उनका भी शुकराना करलें , लाये जो इस दुनियाँ में
घूम घूम कर दुनियाँ में जब , यीशु , अल्ला , राम किया
तुझको पाने की चाहत में , गँवा दिया सब चैनों सुकूँ
रात को रो-रो सुबह किया, या दिन को ज्यों-त्यों शाम किया
दिल को इतने जख्म मिले पर गिला कभी ना किया विनय
खुशियां दे डाली सबको , बस गम को अपने नाम किया !!
 

Wednesday, July 22, 2015

कभी कभी शाम
ऐसे हो जाती है
जैसे दिन कभी
हुआ ही नहीं था
सूरज की रौशनी
और उजाले जैसे थे ही नहीं
एक अंतहीन धुंधलका छाया हो जैसे !!

Monday, July 20, 2015

किसान--

हौसला है किसान में
सदियाँ बीत गयीं
पर अब भी लड़ रहा है
प्रकृति से
अक्सर पड़ जाता है
कमज़ोर अपनी लड़ाई में
पर फिर उसी जोश
और उम्मीद से
जुट जाता है अपने उद्यम में
चीर कर धरती का सीना
बोता है बीज , उम्मीदों के , सपनो के
उगाने के लिए फ़सल संतुष्टि की
प्रकृति भी लेती है
उसी का इम्तहान
जो नहीं करता है
कभी भी प्रतिकार
बार बार हारता है वो
पर नहीं छोड़ता हौसला !!  

तहज़ीब--

गुस्से से उबल रहे थे चौहान जी , प्रदेश के कई भागों से दंगे की खबरे आ रहीं थी | उनको लग रहा था कि काश उनको मौका मिले तो वो उन सब को सबक सिखा दें | अचानक उनको याद आया और पूछा " रामलीला की सारी तैयारी हो गयी , रावण का पुतला बन गया कि नहीं ?
" हाँ , पुतला बन के आ गया है | वो पैसे लेने आया है , दे दीजिये "|
" ठीक है , भेज दो उसको अंदर "|
" कितना हुआ रहीम ?
" अरे जितना देना हो , दे दीजिये | इस काम के पैसे का मोल भाव थोड़े ही करना है "|
पैसे देते समय अचानक उनको लगा , कई पुरखों से रहीम का परिवार रावण के पुतले बना रहा है , इसने तो कभी सोचा भी नहीं होगा कि ये काम किसी और मज़हब से जुड़ा है | और यकबयक उनके हाथों ने रहीम की हथेली को कस कर पकड़ लिया |
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गुस्से से उबल रहे थे चौहान जी , प्रदेश के कई भागों से दंगे की खबरे आ रहीं थी | उनको लग रहा था कि काश उनको मौका मिले तो वो उन सब को सबक सिखा दें | अचानक उनको याद आया और पूछा " रामलीला की सारी तैयारी हो गयी , रावण का पुतला बन गया कि नहीं ?
" हाँ , पुतला बन के आ गया है | वो पैसे लेने आया है , दे दीजिये "|
" ठीक है , भेज दो उसको अंदर "|
" कितना हुआ रहीम ?
" अरे जितना देना हो , दे दीजिये | इस काम के पैसे का भी मोल भाव करूँगा "|
रहीम की बात सुनकर उनको कुछ तो हुआ और यकबयक उनके हाथों ने रहीम की हथेली को कस कर पकड़ लिया |

तहज़ीब--

" कितना भी समझाओ , सुनता ही नहीं है ये छोकरा ", चचा भन्नाए हुए थे | छोकरा भी बिलकुल हठी था , बार बार गंगू के घर चला जाता था और वहीँ खेलता और खाता |
चचा पाँचो बख़त के नमाज़ी थे और किसी गैर मज़हबी के यहाँ का पानी पीना भी क़ुबूल नहीं था उनको | लेकिन इस बच्चे का क्या करें , उसकी वालिदा उसे २ साल का छोड़ कर ही अल्लाह को प्यारी हो गयीं और लोगों के बहुत कहने पर भी वो दुबारा निकाह करने को राज़ी नहीं हुए |
यही सब सोचते वो गंगू के घर के सामने पहुंचे और आवाज़ लगाने वाले ही थे कि नज़र सोते हुए बच्चों पर पड़ी | उनका बच्चा उस घर के बच्चों के साथ बड़े सुकून की नींद सो रहा था | गौर से भी देखने पर भी उनको उन बच्चों में कोई फ़र्क़ नज़र नहीं आया |
उन्होंने दरवाज़े पर रखा लोटा उठाया और अपने हलक़ से " गंगा जमुनी " की धारणा को नीचे उतारने लगे |   

Friday, July 17, 2015

मियाँइन--

उनका कुछ और भी नाम था
पर सब बुलाते थे मियाँइन
हफ्ते में कम से कम दो दिन
आती थीं हमारे गाँव
सर पर उठाये हुए एक टोकरी
जिसमे होती थी
तरह तरह की चूड़ियाँ
बिंदी , आल्ता , टिकुली
और भी जाने क्या क्या
आते ही हम घेर लेते थे उनको
अपने होठों के किनारे से
बहते हुए पान की पीक
को पोंछते हुए वो निकालती थीं
एक एक करके सब सामान
और घर की महिलाएँ
छाँट लेती थीं
अपने हिसाब से सामान
और बदले में मिल जाता था
उनको थोड़ा अनाज़
कभी गेंहूँ , कभी चावल
कभी मौसमी सब्ज़ियाँ
हँस कर ले लेती थीं वो सब कुछ
जब बड़े हुए , तब जाना
कि वो किसी और धर्म की थीं
काश , आज भी वही होता
हमें नहीं पता होता लोगों का धर्म
आज भी आतीं वो मियाँइन
और हम घेर लेते उनको उसी तरह !! 

ईद मनाएं ( कविता )

अगर मनाना ही है
तो मनाओ ईद उनके साथ
जो खांसते रहते हैं
अपने धुंधले से कमरे में
बुनते हुए साड़ियाँ
जिसको पहन कर
बुनती हैं कितने ही सपने
नयी नवेली दुल्हनें
जिन्हें नहीं पता कि
इन्हें बुनने में जले हैं
कितनो के सपने
या मनाओ उनके साथ
जो अभिशप्त हैं
रहने को उन घरों में
अपनी अशिक्षा और
बजबजाती गरीबी के साथ
जिनकी याद आती तो है
हुक्मरानों को हर ५ साल में
लेकिन फिर नहीं पड़ते
उनकी बस्तियों में उनके क़दम
ईद मनाना ही है तो फैलाओ
इनके घर में भी रौशनी
शिक्षा की , बराबरी की
फिर देखो हो जायेगा
कितना खुशगवार ये त्यौहार
तो कुछ ख्वाब संजोएं
इन कमनसीबों के घर
चलो ईद मनाएं इनके साथ !!

पीड़ा--

" क्यों मारा उसको , अब तो कोई रिश्ता नहीं बचा था तुम्हारे बीच ?
" एक रिश्ता तो था ही , नफ़रत का | मेरी बहन को जिन्दा जलाने के बाद किसी और से शादी करने जा रहा था वो "|
" पर उसके लिए तो कोर्ट से मिली सजा उसने भुगत ली थी , फिर क्यों ?
" किसी और बहन का जलना .., वाक्य पूरा नहीं कर पाया वो ! 

हक़--

" किस दुनियाँ में रहते हो भाई , कुछ पता भी है तुमको "|
" हाँ , आजकल थोड़ी व्यस्तता है लिखने पढ़ने की इसलिए बाहर कम ही निकलता हूँ "|
" खैर , अब हमें फैसला करना ही होगा | ऐसे परिवार को हम अपने मोहल्ले में नहीं रहने दे सकते , आखिर हमारे भी बच्चे हैं ?
" लेकिन हुआ क्या है ?
" अरे वही शर्माजी , उन्होंने अपनी बेटी को ससुराल नहीं भेजने का फैसला किया है | हमें तो पहले ही लगता था कि इतनी पढ़ा दी है लड़की कि उसका गुज़ारा किसी संयुक्त परिवार में होना संभव नहीं है "|
" अरे , भूल तो हो ही सकती है परखने में | फिर भूल सुधार में क्या दिक़्क़त है . उनकी लड़की पढ़ी लिखी है , अपने पैरों पर खड़ी है | उसे अपनी ज़िन्दगी दुबारा शुरू करने का पूरा हक़ है "|
" मैं भी भूल गया था कि किस पढ़े लिखे व्यक्ति से बहस करने लगा , तुम तो उनकी ही हिमायत करोगे "| भुनभुनाते हुए वो चले गए और उसको याद आ गया कि कैसे इसकी बेटी ससुराल वालों की प्रताड़ना सह कर पागल हो गयी थी |

कुण्डलियाँ छंद--

सावन आया देख के , उठा जो मन में वेग 
चारो सखियाँ मिल गयीं , लगी लगाने पेंग
लगी लगाने पेंग , छुईं जब पेंड़ की डारी
चलने लगी समीर तभी कस के मतवारी 
हर्षित हुआ किसान देख के मौसम प्यारा 
लगने लगा नवीन उन्हें ये जग अब सारा 

Thursday, July 16, 2015

भीख ( लघुकथा )

" इतने पैसे नहीं हैं मेरे पास , सोच समझ कर माँगा और खर्च किया करो ", पति की आवाज़ उसके मन को मथ रही थी | काश उसने भी नौकरी की होती तो आज पार्टी के लिए पैसे मांगने की नौबत तो नहीं आती | यही सब सोचती किचन की ओर बढ़ी थी कि अचानक उसके कदम ठिठक गए | दरवाजे से उसकी नज़र पड़ गयी थी कामवाली पर जो नीचे रखे प्लेट्स में से निकाल कर पूरी वगैरह अपने पल्लू में बांध रही थी |
फिर उसने एक प्लेट में ढेर सारा खाने का सामान रखा और थोड़ी दूर से आवाज़ लगायी " बाई , ये प्लेट भी धुलने में रख देना "|
उसे बाई को सीधे खाना देना पता नहीं क्यों ठीक नहीं लगा |

जरुरी नहीं कि--

जरुरी नहीं कि हम दोषी हों
मिल जाती है सजा
अक्सर निरपराध को भी
हो जाती हैं दुर्घटनाएं
बिना हमारी गलती के भी
जरुरी नहीं कि लोग
हमसे खुश ही हों
बिना वज़ह भी हो जाती हैं
गलतफहमियां
और बिगड़ जाते हैं रिश्ते
जरुरी नहीं कि जो हम सोचें
वो सही ही हो
क्यूंकि हर चीज़ का
होता है एक दूसरा भी पहलू
जो नहीं देख पाते हम
जरुरी नहीं कि हम जन्म लें
एक ऐसे वातावरण में
जो हो जीने के लिए आदर्श
पर ये बहुत जरुरी है कि
बनायें हम अपने आस पास
ऐसा वातावरण जो हो
औरों के जीने के लिए आदर्श
हाँ , ये जरुरी है
ये बहुत जरुरी है !!

Wednesday, July 15, 2015

प्यार का दरिया-

प्यार का दरिया , सागर में न मिला सके
चाहा बहुत हमने , पर तुम्हे न भुला सके
ख़लिश बहुत है इश्क़ में , अब हमने जाना
दर्द का पहाड़ है , और पत्थर न हिला सके
वो होठों की जुम्बिश , वो नज़रों के तीर
भरा रहा ज़ाम , हम उन्हें न पिला सके
बाँट लें अब मिलकर , एक दूसरे के ग़म
खुशियाँ बहुत थीं पर उन्हें न दिला सके !!
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प्यार का दरिया , सागर में मिला न सके
आज़माइसें भी कीं , तुझे भुला न सके
ख़लिश इश्क़ में इब्तदा ए जानम
नस्तर दर्द का निज़ात , दिला न सके
वो होठों की ज़ुम्बिश , वो नज़रों के तीर
नज़र दिल का नज़्म , पिला न सके
चलो बाँट लें गम , अब एक दूजे का
हसींन पल ख़ुशियों का , दिला न सके !!

उदास--

जब भी होता है उदास
करता है कुछ ज्यादा ही प्रयास  
मुस्कुराने की , उसे छुपाने की
पर , पकड़ लिया जाता है !  
शायद जब भी कोई
करता है असामान्य प्रयास  
दिखने की सामान्य
तो पकड़ लिया जाता है !!

Tuesday, July 14, 2015

आया न जायेगा--

रस्ते सभी हैं बंद , आया न जायेगा
ये गीत रुखसती के , गाया न जायेगा
जब देश में रोटी को , हैं तरसते इंसान
ऐसे में शाही भोज , खाया न जायेगा
दिखते हैं हर दिशा में , बस खुदगर्ज़ लोग
सच कहने वाला अब तो , पाया न जायेगा
इतना भी दिल लगाना , है कितना बेसबब
फिर छोड़ कर तुमको भी , जाया न जायेगा
थोड़ा समय निकालो , कर लो हमारी फिक्र
फ़ासले घटाकर पास , लाया न जायेगा !!

चाहत के बादल--

याद उन्हें जबसे , हम आने लगे
गुँचों में फूल , मुस्कुराने लगे
खोजीं थी खुशियां , हमने दर बदर
दिल में जो झाँका , उन्हें पाने लगे
रूठ गए थे , कभी अपने हमसे
मिला अब सुकूँ , जब वो आने लगे
कल तक तो था , मौसम ग़मज़दा
चाहत के बादल , अब छाने लगे
ठुकराया था जिनको , अपनों ने कभी
दुश्मनों को भी , अब भाने लगे !! 

Monday, July 13, 2015

सद्गति--

आज रमेश के कदम मानों उसका साथ ही नहीं दे रहे थे , इस तरह फँस जायेगा वो , उसने सोचा भी नहीं था । अचानक बच्चे ने हाँथ खींचा तो उसकी तन्द्रा भंग हुई और वो बेमन से उसके सवालों का जवाब देने लगा । 
कुछ ही महीने पहले उसके सहकर्मी की मौत हुई थी और वो उसके घर आने लगा था । शुरू में तो सहानुभूति हुई लेकिन बाद में उसकी सुन्दर पत्नी से बातचीत में आनन्द आने लगा उसको । बढ़िया समय बीत जाता था उसका और लोगों की निगाह में इज़्ज़त भी बढ़ गयी थी । लेकिन आज जब उसके घर के बाहर पहुंचा था तभी उसके कानों में पड़ी इस आवाज़ ने " लड़का अच्छा है और हमारी बहू को पसंद भी करता है , क्यों न उससे शादी की बात चलायें ", उसके होश उड़ा दिए । 
अब वही बच्चा , जिसके साथ कभी बात करना और घूमना बहुत अच्छा लगता था , अब उसे बोझ लगने लगा था ।

अपनी अपनी ख़ुशी--

आसमान काले काले बादलों से भर गया था | जग्गू के प्रसन्नता का पारावार नहीं था , उसकी नज़र में अपने छोटे से खेत के टुकड़े में धान की फसल पैदा होती दिख रही थी | इस बार अगर धान की पैदावार ठीक हो गयी तो पत्नी के लिए नयी साड़ी वो लेकर रहेगा | भागता हुआ घर आया और उसने पत्नी को ख़ुशी से अंक में भर लिया | 
पत्नी , जो थोड़ी ही देर पहले बादलों को देखकर अपना छप्पर देख रही थी कि अगर ज्यादा बारिश हो गयी तो ये फिर टपकने लगेगा | उसे घर में रखे अनाज़ को सुरक्षित रखने की चिंता तो थी पर अब शायद नया छप्पर लग जाये , सोचकर वो भी जग्गू की ख़ुशी में शामिल हो गयी |

Friday, July 10, 2015

समझ के तराज़ू से--

आओ खुद को तौलें , समझ के तराज़ू से
समझें हौले हौले , समझ के तराज़ू से
कैसे बदले जीवन , दुनियां के मज़लूमों का
कोई रस्ता खोलें , समझ के तराज़ू से
बाहर से कुछ और , अंदर से कुछ और
मीठा सब है बोलें , समझ के तराज़ू से
कब सीखेगा इंसा , नफ़रत दूर भगाना
प्यार के रस्ते खोलें , समझ के तराज़ू से
नारी ही नारी की , क्यों होती है दुश्मन
भेद यही हम खोलें , समझ के तराज़ू से
बच्चे सबको अपने , होते कितने प्यारे
जनक़ भी गर खुश होलें , समझ के तराज़ू से
धर्म जाति और भेद भाव को आओ करलें दूर
स्वर्ग के अंकुर बोलें , समझ के तराज़ू से !!

Thursday, July 9, 2015

एहसास--

अचानक उसकी नज़र सड़क पर धीमी बत्तियों में खड़ी एक लड़की पर पड़ी | हाड़ कंपा देने वाली ढंड में भी , जब वो सूट पहने अपने कार में ब्लोअर चला के बैठा था , लड़की अत्यंत अल्प वस्त्रों में खड़ी थी | फिर समझ में आ गया उसे , ये कॉलगर्ल होगी |
उसने कार उसके पास रोकी , लड़की की आँखों में चमक आ गयी | आगे का दरवाज़ा खोलकर उसने अंदर आने को बोला और उसके बैठते ही बोला " देखो , मैं तुम्हे पैसे दे दूंगा , मुझे अपना ग्राहक मत समझना | इस तरह खड़ी थी , क्या तुम्हें ठण्ड नहीं लगती "|
लड़की ने एक बार उसकी ओर देखा और पैसे लेकर पर्स में रखती हुई बोली " लगती तो है लेकिन जब घर में सो रहे बच्चे के बारे में सोचती हूँ तो बर्दास्त कर लेती हूँ | हाँ , अगर आप जैसे लोग हों दुनियाँ में तो हमें ऐसे खड़े होने की जरुरत नहीं पड़े "|
फिर गाड़ी रुकवाकर वो चली गयी , अब उसे भी लग रहा था कि ब्लोअर बंद कर देना चाहिए |

Wednesday, July 8, 2015

चाह उसको तौलने की--

हर तरफ जो फैलता बाजार है
बस सिमटता आजकल घर बार है
दिख रही रुमानियत चेहरे पे उनके
लोग कहते उनकी आँखें चार है
उसको समझाने की कोशिश छोड़िये 
किस तरह से देखिये लाचार है
बेवज़ह ही हमसे गुस्सा हो गए
फ़िर मनाना क्यूँ उन्हें हर बार है
चाह उसको तौलने की है गलत
आदमी वो सच बड़ा खुद्दार है
उतरा है दरिया में जब भी वो विनय
देखा हमने उसकी कश्ती पार है !!
  
बहुत मुश्किल था लेकिन , जुबाँ सह गयी है
बचते बचते भी फिर क्यूँ , नज़र बह गयी है
कशिश थी गज़ब , उस नज़र में तुम्हारी
कह सकी जो जुबाँ ना , ये वो कह गयी है
चल पड़े थे सफर में , नहीं था ठिकाना
कि जाना कहाँ , मंज़िलें रह गयी हैं !!

Tuesday, July 7, 2015

वफ़ाओं का मेरी--

वफ़ाओं का मेरी सिला दीजिये                                  
हूँ बेहोश मुझको जिला दीजिये
हुआ हूँ मैं गुम इस ज़माने में लेकिन
मुझी को मुझी से मिला दीजिये
कुचलते रहे हैं सदा हर कली को                    
किसी फूल को अब खिला दीजिये
मिला इस ज़माने में हर कोई खारा
ज़रा अब अमिय भी पिला दीजिये
सज़ा तो बहुत मिल गयी है मुझे अब
वो ख़्वाबों की मंज़िल दिला दीजिये !!

Monday, July 6, 2015

अंकुरण--

" अरे ,रे , ये क्या कर दिया तूने | काट दिया उस पौधे को भी घाँस के साथ "| शर्माजी एकदम से चिल्ला पड़े उस छोटी लड़की पर जिसने उनसे उनकी लॉन में से घाँस काटने के लिए पूछा था |
पेपर को किनारे रखते हुए वो उठे और लगभग धक्का देते हुए उसे लॉन से बाहर निकाल दिया | " पता नहीं फिर ये अंकुरित होगा या नहीं , कितने प्यार से लगाया था "|
छोटी लड़की उदास बाहर निकल गयी | पेपर उड़ कर घाँस पर आ गिरा , उसमे हेडलाइंस चमक रही थीं " इस साल फिर एक लड़की ने टॉप किया सिविल सर्विसेज में "| 

बेटियाँ ( कविता )

बेटियाँ कभी उदास नहीं होतीं
वो तो हैं सृष्टि की अद्भुत कल्पना
वो तो रहती हैं पिता की दुआओं में
तभी तो खिल जाती है
एक स्नेहिल मुस्कान
देखकर उनको हर मन में
वो तो दूर करती हैं उदासी
दोनों ही घरों की
उनसे ही तो बनते हैं
कितने सारे इन्द्रधनुष
इस धरा पर और उस अम्बर पे
बेटियाँ हर लेती हैं
पीड़ा हमारे मन की
और देती हैं हमें एक
अलौकिक आनंद की अनुभूति
वही तो होतीं हैं
जब माँ नहीं होतीं  
बेटियाँ कभी उदास नहीं होतीं !!

जिंदगी--

जिंदगी , उदास पीले पत्तों सी
बाक़ी है लेकिन थोड़ा हरापन
जरुरत है तो सिर्फ चुनने की
इन सूखते पत्तों से
आशाओं का मुस्कुराता
प्यारा सा जीवन गीत
फिर खिलखिला उठेगी
जिंदगी की अप्रतिम हरीतिमा
हार जायेगा ये उदास पीलापन !!

Sunday, July 5, 2015

अधूरी प्रेम कहानी--

" सॉरी , मैंने देखा नहीं आपको , उठा देता हूँ मैं किताबें ", और वो झुक कर किताबें उठाने लगा ।
" पता नहीं कहाँ से ये अंधे आ जाते हैं , रहने दो । फ़िल्में मैं भी देखती हूँ , बहुत पुरानी चाल है ये "। उसने किताबें उठाई और एक हिक़ारत की नज़र उसपर डालती हुई  चली गयी ।
अचानक उसकी निगाह वहाँ गिरे हुए लाइब्रेरी कार्ड पर पड़ी । एक बार तो उसने सोचा कि जा कर उसे वापस कर दे, फिर उसे फिल्मों का ख्याल आ गया ।
अब वो लाइब्रेरी कार्ड डस्टबिन की शोभा बढ़ा रहा था । एक प्रेम का अँकुर फूटते फूटते रह गया ।

ख़्याल--

जाने किन किन का ख़्याल आता है
बस एक तेरा ही ख़्याल , नहीं आता
कोशिश कभी की थी , ना भूलूँ तुम्हें
पर याद रखूँ अब , सवाल नहीं आता
जिंदगी सुना था , एक अजीब खेल है
अब तक़ चलना , वो चाल नहीं आता
गुनगुना फिर तो लें ,ये जीवन संगीत
कमबख़्त याद अब वो ताल नहीं आता
मिलना ,बिछुड़ना हैं जीवन के हिस्से
लेकिन गुज़रा हुआ , साल नहीं आता !!



Friday, July 3, 2015

स्टोरी--

" सर , मैं हस्पताल पहुँच गया हूँ , कवर करता हूँ एक्सीडेंट की स्टोरी "|
" अच्छा तो आपने देखा उनको , सामने देखकर कैसा लगा ? रिपोर्टर की आवाज़ ने उसके दर्द में इज़ाफ़ा कर दिया |
" अरे इतने बड़े स्टार से मुलाक़ात तो हो गयी , लोग तो तरसते हैं दूर से भी एक झलक पाने के लिए , कुछ बताईये ", और भी कुछ कह रहा था वो लेकिन दर्द और क्रोध के उबाल में उसने पत्रकार का माइक छीन कर फेंक दिया |
" स्टार , स्टार लगा रखा है , मेरी टूटी हड्डियाँ तुम्हे नहीं दिखती , दफा हो यहाँ से "| 

Wednesday, July 1, 2015

अपने अपने दर्द --

" आजकल इंडस्ट्री लगाना और उसे चलाना आसान नहीं रहा " कहते हुए उनके चेहरे का दर्द टपक गया |
" क्यों , क्या हो गया ऐसा ", आश्चर्य से पूछा उसने |
" अरे ये मनरेगा जो आ गया , अब जिसको अपने गाँव , घर में ही काम मिल जा रहा है , वो क्यों आएगा दूर काम करने "|
" और रही सही कसर ये शॉपिंग माल वाले पूरी कर दे रहे हैं | बढ़िया ए सी में काम मिल जा रहा है उनको "|
उसे अपना गाँव याद आ गया जहाँ ग्राम प्रधान और अधिकारी मिल कर मनरेगा का आधा से ज्यादा पैसा फ़र्ज़ी नाम से हड़प जाते हैं |
मज़दूर को भी दर्द होता है , वो सोच में डूब गया |