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Monday, February 29, 2016

साथी--

" दुर्र, दुर्र, कहाँ चला आया फिर से| ये पिल्ला भी ना, एक दिन दो रोटी क्या खिला दिया, पीछे ही पड़ गया", शर्माजी ने अपनी पुरानी छड़ी से दुत्कारा पिल्लै को और कमरे में घुस गए| गाँव का छोटा सा घर जिसमे कभी वो अपनी पत्नी और बच्चे के साथ रहते थे, लेकिन आज उस कमरे में बच्चे और पत्नी की सिर्फ तस्वीर ही थी|
" देखो जाना तो मुझे ही है पहले, तुम तो अकेले भी बिता लोगे| आखिर ये गाँव और इतने साथी हैं तुम्हारे यहाँ, मेरा तो लेदेकर एक तुम हो और दूसरा ये दमा जो साथ नहीं छोड़ता", पत्नी की कही बात याद आने लगी उनको|
धीरे धीरे सब साथी बिछुड़ने लगे, कुछ अपने बच्चों के साथ बाहर चले गए तो कुछ अकेलेपन को नहीं झेल पाये और सदा के लिए चले गए|
" देखो, किसी जानवर को क्यों नहीं पाल लेते हम, निःस्वार्थ भाव से साथ देते हैं| मेरे मायके में तो दो दो कुत्ते थे जो सालों बाद भी जाने पर इस तरह लिपट जाते थे जैसे हमेशा साथ रहे हों", पत्नी की बात फिर जेहन में घूम रही थी| लेकिन पता नहीं क्यों उनको हमेशा से चिढ थी कुत्तों से| अक्सर दुआर पर कुत्ते कहीं भी मल करके चले जाते थे और उसको साफ़ करते समय वो उनकी सात पुश्तों को कोसते थे|
" चाहे जो हो जाय, मैं कुत्ता नहीं रखूँगा| गाँव क्या इंसानों से खाली हो जायेगा कि कुत्ते साथी रहेंगे", और वो हमेशा नकार देते थे पत्नी की बातों को|
कमरे में मन नहीं लगा तो फिर बाहर निकले शर्माजी| उनको आभास हुआ, पिल्ला फिर से पीछे चल रहा था| पिछले एक हफ्ते से, उनके लगातार दुत्कारने के बावजूद, हमेशा उनके आगे पीछे घूम रहा था वो| दुआर पर पड़ी कुर्सी पर बैठ कर वो सोच में डूबे ही थे कि उसी पिल्लै ने उनका पैर चाट लिया| शर्माजी ने चौंक कर देखा, उनको लगा कि पत्नी ने ही उसको भेज दिया है अकेलापन काटने के लिए| उन्होंने प्यार से उसके ऊपर हाथ फेर दिया और अब उनको भी लगने लगा कि उनका एक साथी मिल गया है|   

Monday, February 22, 2016

एक छोटी सी घटना--

" क्या हालत हो गयी हैं अपने देश की, लोग देश के बारे में तो सोचते ही नहीं हैं आजकल ", बहुत आवेश में थी वो सवारी। तीखी धूप में रिक्शा खींचते हुए कमजोर रग्घू को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था, बस पैर पैडल पर थे और मंजिल पर पहुँचाने की जल्दी थी।
" अबे थोड़ा तेज चला, क्या मरी हुई चाल से खींच रहे हो, जल्दी पहुँचना है मुझे। जब चला नहीं सकते तो क्यूँ बैठा लेते हो"।
अपनी बची खुची ताक़त लगा दी रग्घू ने, पसीना बहना थोड़ा और बढ़ गया। अचानक चक्कर सा आया और वो आगे की तरफ झुक गया और रिक्शा एकदम से बायें मुड़ा। जब तक बैठी हुई सवारी कुछ समझती, रिक्शा पलट गया और रग्घू भी एक तरफ गिर पड़ा। थोड़ी चोट सवारी को भी लगी और वो गाली देते हुए सड़क पर आ गयी।
उसने हाथ देकर एक दूसरा रिक्शा रोका और बैठ गया। उसका बड़बड़ाना जारी था " ये सब शराब पीकर चलाते हैं, जान ले लेता अभी "।
दूसरे रिक्शे वाले ने एक नज़र रग्घू पर डाली, थोड़ा दर्द हुआ उसको रग्घू के लिए लेकिन फिर उसका पैर पैडिल पर पड़ा। कुछ लोग रग्घू के आस पास जुट गए थे, लोग उसके नशे में होने के कयास लगा रहे थे। दूसरे रिक्शे वाले के शरीर से भी पसीना बहना शुरू हो गया था और सवारी फिर फोन पर किसी से हँसते हुए बात कर रही थी।

Tuesday, February 16, 2016

उदास चाँदनी--कहानी

आज एक बार फिर समर ने निराश कर दिया, काफ़ी इंतज़ार किया कनु ने लेकिन वह नहीं आया।उसका फोन भी स्विच ऑफ़ बता रहा था और मैसेज का भी जवाब नहीं आया।अपनी दूसरी कॉफ़ी भी ख़त्म करने के बाद वह उठी और बिल पे करने के बाद बाहर निकल गई।कार स्टार्ट करने के बाद एक बार उसने सोचा कि हॉस्टल चल के देख ले, लेकिन फिर मन नहीं किया।आख़िर क्यों ऐसा कर रहा है समर, शायद उसे अवॉयड ही करने लगा है, फिर उसने अपना सर झटक दिया।नहीं, उसका मन ये मानने को तैयार नहीं था कि वह ऐसा कर सकता है, आख़िर पिछले ७ साल से जान रही है उसको।
ग्रेजुएशन में ऐडमिशन के समय पहली बार मुलाक़ात हुई थी समर से।एक बेहद शर्मीला नौजवान जिसकी ऑंखें बोलती थीं।बहुत लड़के थे उसकी क्लास में और अधिकांश उससे मित्रता करने को आतुर भी रहते थे लेकिन समर ने कभी भी पहल नहीं की।बस एकाध बार की औपचारिक बातचीत थी और क्लास में भी उसको किसी से बोलता नहीं देखा था उसने।इतने दिनों के अनुभव से वह समझ चुकी थी कि वह किसी छोटे-से क़स्बे से आया था और दोनों जगहों का फ़र्क़ अभी भी उसे सामान्य नहीं होने दे रहा था।
"आप किसी से बात नहीं करते, सब ठीक तो है यहाँ", शुरूआत उसी ने की।
"जी, कोई दिक़्क़त नहीं है", शुक्रिया भी नहीं कहा था समर ने।वह समझ गई थी कि इसे सामान्य रिश्ते भी निभाना नहीं आता और फिर उसने समर को रोज़ ही किसी न किसी बहाने टोकना शुरू कर दिया।
"मेरा नाम कनिका है और आपका नाम मुझे पता है।आप चाहें तो मुझसे बात कर सकते हैं इस क्लास में, मैं काटती नहीं हूँ", मुस्कुराते हुए उसने समर की तरफ़ हाथ बढ़ाया।हिचकते हुए उसने भी हाथ बढ़ाया और पहली बार कनु ने उसकी आँखों में झाँक के देखा, कितनी गहराई थी उन आँखों में।
"क्या करने का सोचा है आगे चलकर आपने", ये अगला सवाल था कनु का।शायद वह उसे सामान्य करना चाहती थी और ऐसे में इससे बेहतर सवाल नहीं सूझा उसको।
"जी, पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद कोई नौकरी करूँगा।कुछ साल पढ़ना और जानना है दुनिया के बारे में"।अब उसे लग रहा था कि समर कुछ सामान्य हो रहा है।
"आप मुझे चाहें तो कनु कह सकते हैं, अगर कनिका बहुत भारी लग रहा हो तो", और कसकर ठहाका लगाया उसने।
"जी, मेरा मतलब था कि मैंने कभी किसी लड़की से इस तरह बात नहीं की है कनिकाजी ", झेंप गया था समर।
"ख़ैर कोई बात नहीं, अगर बुरा न मानें तो कैंटीन में चलकर एक कप चाय पी ली जाए", और बिना उसके जवाब का इंतज़ार किए वह आगे बढ़ गई।समर भी हिचकते हुए उसके पीछे-पीछे कैंटीन आ गया और कुछ देर तक चाय के साथ इधर-उधर की बात करते रहे दोनों।
फर्स्ट ईयर का रिज़ल्ट आया, उम्मीद के हिसाब से नंबर नहीं मिले समर को।बहुत निराश था वह, अपनी तरफ़ से बहुत कोशिश की थी उसने लेकिन भाषा का फ़र्क़ आड़े आ रहा था उसके।हाँ, उसके नंबर अच्छे आए थे, लेकिन समर के चलते उसे उतना अच्छा नहीं लगा था।अब समर काफ़ी कुछ खुल गया था, लेकिन अब भी अपने से शायद ही बातचीत की पहल करता।कई बार उसे ग़ुस्सा भी आता, कभी-कभी कई दिन उससे बात नहीं करती लेकिन जब भी उसकी आँखों में देखती, पता नहीं कितने सवाल दिख जाते।फिर वह अपने आपको रोक नहीं पाती और कैंटीन में चाय पर लंबी चौड़ी बहस होती।
कनु के लिए ज़िंदगी बहुत सीधी थी, यहाँ की पढ़ाई के बाद किसी जगह नौकरी।उसपर घर से कोई दबाव नहीं था कि क्या करना है, काफ़ी संपन्न घर की थी और एकलौती भी।लेकिन पापा ने इतना ज़रूर समझाया था कि पहले दुनिया को समझो, अपनी पढ़ाई पूरी करो और फिर सोचना कि नौकरी करना है या किसी के साथ घर बसाकर अलग ज़िंदगी जीना है।और अब समर मिल गया था तो उसे लगता था जैसे ज़िंदगी को समझने के लिए एक साथी भी मिल गया है।
"आजकल कुछ परेशान से दिखते हो, बात क्या है समर", एक शाम उसने पूछ ही लिया।पिछले कई दिनों से कुछ सोच में डूबा दिखता था वह, अपने से तो पहले भी कुछ कहता नहीं था।
"नहीं कुछ ख़ास नहीं है, बस कुछ किताबें पढ़कर मन विचलित हो जाता है।आख़िर ये समाज का निर्माण किसकी सोच की उपज रही होगी जिसमें इनसान ही इनसान को बराबर नहीं समझता।क्या कभी तुमने ये सोचा है कनिका कि अगर मैं किसी नीची जाति का होता तो भी तुम मुझसे इतनी ही नज़दीकी रखती", उसकी ऑंखें कनु के चेहरे पर जमी हुई थीं।
"अरे तुम तो अर्थशास्त्र पढ़ रहे हो, ये सब बातें कहाँ से आईं तुम्हारे दिमाग़ में।और जब पूछ ही लिया है तो बताती हूँ कि मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता तुम्हारे जाति से।अब ये समाज काफ़ी आगे बढ़ चुका है और ये सब चीज़ें अब अपना वज़ूद खो रही हैं"।
"किस सपनों की दुनिया में रहती हो तुम।ये चीज़ें अब और भी ख़तरनाक स्तर पर पहुँच गईं हैं, अख़बार नहीं पढ़ती तुम।अच्छा ये बताओ कि क्या आरक्षण अभी भी लागू होना चाहिए, जबकि समाज इतनी तरक्क़ी कर चुका है"।एक बार फिर उसकी ऑंखें सवाल कर रही थीं।
"देखो जहाँ तक मेरी सोच है, आरक्षण तब तक लागू रहना चाहिए, जब तक ये सारे वंचित उसी धरातल पर आ जाएँ जहाँ हम तुम खड़े हैं।हाँ, जो लोग अब आर्थिक और सामाजिक रूप से आगे निकल चुके हैं उन्हें इससे बाहर कर देना चाहिए"।कनु को उस समय यही ठीक लग रहा था और उसने बिना एक बार भी सोचे जवाब दे-दिया समर को।
"क्या ये नहीं हो सकता कि उनको हमारे संपत्ति में से आधा हिस्सा दे-दिया जाए।आख़िर इस संपत्ति पर उनका भी तो बराबरी का हक़ है"।
"ये क्या बात हुई, आख़िर ये संपत्ति तो हमें विरासत में मिली है।हमारे पुरखों ने बचा के रखी थी हमारे लिए, इसीलिए तो हम इसके मालिक हैं", कनु को थोड़ी हैरानी हुई।
"अच्छा, तो ये संपत्ति हमारे पुरखों के पास कहाँ से आई।उन्होंने इन वंचितों का हिस्सा ही तो मारा होगा, नहीं तो सबके पास बराबर नहीं होती।क्या तुमने कभी ये सोचा था कनिका कि अगर हम उनके जैसे होते और वह हमारे जैसे तो भी तुम ऐसे ही सोचती।उनका अपराध क्या है, यही न कि उन्होंने एक वंचित के यहाँ जन्म लिया और फिर पीढ़ी दर पीढ़ी वह और वंचित होते गए"।
कनु एकटक समर को देखती जा रही थी, हाँ उसने तो इस नज़रिए से कभी सोचा ही नहीं था।उसकी बात में सच्चाई तो थी, ये अलग बात थी कि उसने कभी ध्यान ही नहीं दिया इस तरफ़।
"ख़ैर छोड़ो इन बातों को, मैंने नाहक़ ही परेशान कर दिए तुमको।आज तुम्हारी पसंद की दाल फ्राई और तंदूरी रोटी खाएँगे ढाबे पर", समर उठ खड़ा हुआ।कनु भी चुपचाप उसके साथ हो ली, पर अब उसके दिमाग़ में ये सब उथल-पुथल मचा रहा था।लेकिन ढाबे पर खाते समय उसको लगा ही नहीं कि ये वही समर है जो थोड़ी देर पहले बहुत गंभीर था।
धीरे-धीरे दूसरा साल भी पूरा होने को आया, काफ़ी बदलाव देख रही थी कनु समर में।लेकिन उसके साथ वह वैसे ही रहने की कोशिश करता जैसे पहले था।हाँ आरक्षण वाली बात पर वह काफ़ी सहमत थी अब समर से लेकिन उसके विचार में हो रहे बदलाव से कनु को थोड़ा डर भी लगने लगा था।एक शाम फिर चाय पीते हुए समर कुछ सोच रहा था तभी कनु ने टोक दिया "अब किस चिंता में गुम हो, मुझसे भी साझा करने में तुमको दिक़्क़त होती है"।
"ऐसा नहीं है कनिका, दरअसल मुझे लगता है तुम परेशान होगी इसलिए तुमसे ये सब बातें नहीं करता।ख़ैर एक बात बताओ, तुम तो ईश्वर में विश्वास करती हो।क्या तुमको भी लगता है कि हमारा भगवान, मुस्लिमो के अल्लाह या ईसाईयों के जीसस से अलग है"?
एक बार तो कुछ नहीं सूझा कनु को, हाँ वह भगवान को मानती तो थी लेकिन कभी उसने इस तरह से नहीं सोचा था।दूसरे सम्प्रदायों को कभी भी उसने हेयदृष्टि से नहीं देखा लेकिन सबको अलग ही समझती आ रही थी।
"मुझे लगता है कि भगवान, अल्लाह या जीसस सब एक ही हैं, सबसे बड़ी शक्ति।लेकिन इनसानों ने उनको अलग-अलग नाम दे-दिया है", कनु अपने जवाब से काफ़ी संतुष्ट थी।
"ठीक है मान लिया, लेकिन क्या ऐसे भगवान या जीसस हो सकते हैं जिनको इनसान ही बाँट दे।अगर वह सर्वशक्तिमान हैं, जैसा कि तुम मानती भी हो, तो क्या वह इनसानों के हिसाब से अलग-अलग हो सकते हैं।तुमको नहीं लगता कि ये सिर्फ़ मानसिक ग़ुलामी के लिए मनुष्य द्वारा ही बनाए गए हैं जिससे वह लोगों को अपने हिसाब से चला सके"।
कनु ख़ामोश रह गई, एकदम से कुछ बोलते नहीं बना।इस नज़रिए से तो उसने कभी नहीं सोचा था।उसने समर की ओर देखा, लेकिन वह फिर ख़यालों में डूब गया था।वह उससे सहमत होते हुए भी असहमत थी, उसका मन ये सब मानने के लिए अभी तैयार नहीं था।
"अच्छा एक काम करते हैं, आज झील के किनारे चलकर बैठते हैं और फिर वहाँ से आसमान देखेंगे।शायद ऊपर वाला दिख जाए और इस बात का कोई हल बता जाए ", ज़ोरदार ठहाका लगाया समर ने।कनु को हक्का-बक्का छोड़ वह उठ गया और आगे चल दिया।
महीने गुज़रते रहे, समर ज़्यादा ख़ामोश होता गया।कोई टीस थी उसके दिल में जो उसे परेशान करती रहती थी, जिसे वह कनु को भी नहीं बताना चाहता था।जब कनु ज़्यादा छेड़ती या नाराज़ होने का ढोंग करती, तब वह कुछ विचार उससे साझा कर लेता।अब कनु थोड़ा घबराने लगी थी उसके अंदर चल रहे मानसिक झंझावात से।
"आख़िर तुम क्या करना चाहते हो समर, समाज सुधार में अगर इतनी ही दिलचस्पी है तो फिर अर्थशास्त्र क्यों पढ़ रहे हो।पहले ख़ुद को व्यवस्थित कर लो, फिर समाज की भी चिंता करना।सिर्फ़ सोचने से कुछ नहीं होता, प्रयास करना होता है इसके लिए"।
समर ख़ामोशी-से उसे सुनता रहा फिर बोला " दरअसल मुझे ख़ुद ही पता नहीं कि मैं अर्थशास्त्र क्यों पढ़ रहा हूँ।शायद एक अदद नौकरी के लिए शुरू में मुझे ये सही लगा था तो पढ़ने लगा, लेकिन तुम ही बताओ कनु, क्या हम अपने मन में चल रहे विचारों से आँख मूँद सकते हैं।इनसान और शुतुरमुर्ग में कुछ तो फ़र्क़ होना चाहिए, आख़िर हम जो पढ़ते हैं और उससे जो समझ विकसित होती है, उसका कोई उपयोग तो हो।मुझे तो ये लगता है कि हमें पढ़ने के बाद और संवेदनशील बनना चाहिए"।
"बिल्कुल सही कहा समर, हमें संवेदनशील तो बनना ही चाहिए।लेकिन तुम तो संवेदनहीन होते जा रहे हो", मुस्कुराते हुए छेड़ा उसने।
समर भी थोड़ा झेंप गया, वह इशारा समझ गया था।उसने धीरे-से कनु का हाथ अपने हाथ में लेकर दबा दिया, बहुत कुछ अनकहा भी कनु को समझ में आ गया।
ग्रेजुएशन पूरा होने के बाद दोनों ने वही पी जी में ऐडमिशन ले-लिया। अब समर के कुछ लेख भी स्थानीय अख़बारों और पत्रिकाओं में छपने लगे थे।उन दोनों की बहस बदस्तूर जारी थी लेकिन समर दिन पर दिन बेचैन होता जा रहा था।ऐसा लगता जैसे वह बहुत कुछ करना चाहता हो, लेकिन कर नहीं पा रहा हो।
एक शाम ऐसे ही कनु ने उसको टोक दिया "समर, पढ़ने और समझने के बाद ये बेचैनी ज़रूरी है, नहीं तो हम कुछ भी नहीं कर सकते।लेकिन कुछ और भी है ज़िंदगी में जिसके लिए तुमको सोचना चाहिए।कहीं स्थिरता मिलेगी तो बाक़ी चीज़ों के बारे में बेहतर सोच सकते हो और कुछ कर भी सकते हो।मैं तुम्हारे हर सोच में साथ हूँ, लेकिन अपने बारे में भी सोचना ज़रूरी है"।
समर ने उसकी आँखों में देखा और मुस्कुरा दिया।एक बार फिर उसके हाथ को अपने हाथ में लेकर जैसे तसल्ली देने की कोशिश की और बोला "तुम्हारी चिंता भी जायज़ है, मेरे चलते तुम भी अनावश्यक परेशान रहती हो।देखो कनु, मैंने कभी भी नहीं सोचा कि मेरी इस यात्रा में तुम बराबर की भागीदार बनोगी, हाँ ये ज़रूर था कि तुमसे एक संबल मिलता रहेगा सफ़र के लिए।मेरी तरफ़ से तुम बिल्कुल आज़ाद हो और कभी भी मेरे चलते अपने फ़ैसलों को कमज़ोर मत पड़ने देना"।
स्तब्ध रह गई थी कनु, इस तरह सोचता है समर।हाँ उसने कभी कहा नहीं और कभी समर से पूछा भी नहीं, लेकिन क्या कहने से ही सारी भावनाएँ प्रकट होती हैं।क्या कुछ चीज़ें बिना कहे समझी नहीं जाती हैं, कुछ टूट सा गया उसके अंदर।
"समर मैंने भी वही किया जो मुझे ठीक लगा आज तक।किसी बंधन में नहीं बंधें हैं हम तुम, लेकिन तुम्हारे इस सफ़र की हमसफ़र बनकर मुझे अच्छा लगता है।थोड़ी चिंता भी होती है तुम्हारी, जब तुम समाज के बनाए क़ायदे को मानने से इनकार करते हो लेकिन सिर्फ़ इतने से ही तुमसे अलग अपना वजूद मैं सोच भी नहीं सकती।चलो आज एक फ़ैसला करते हैं, मैं एक नौकरी की तलाश करती हूँ पी जी के बाद और तुम वही करो जो तुम्हें अच्छा लगे।इस तरह एक स्थिरता भी मिल जाएगी और तुम्हें भी मेरी फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं होगी।हाँ इसमें अगर तुम्हारा पुरुष होने का अहम् आड़े आता हो तो अभी बता दो, बाद में शायद इसकी गुन्जाईस नहीं रहेगी"।
कुछ देर तक सोचता रहा समर और फिर एक लंबी साँस लेकर बोला "मेरे बारे में भी तुमने ही फ़ैसला कर लिया, ख़ैर अच्छा ही किया।अब मेरे मन से अपराधबोध तो निकल जाएगा और तुम्हारा संबल भी मिलता रहेगा।लेकिन ये इतना आसान नहीं है जितना तुमको लगता है, और ज़िंदगी बहुत कठोर होती है।कभी तुम्हारे मन में भी आ सकता है कि आख़िर कितने दिन तक समर को ऐसे ही सम्भालूंगी।लेकिन ये ज़रूर होगा कि उस समय तुम्हारा ये फ़ैसला तुमको अपराधबोध की ओर धकेल देगा"।
"मुझे अपने फ़ैसले पर पूरा यक़ीन है और ऐसी स्थिति कभी नहीं आएगी", कनु ने उसके बालों में उँगलियाँ फिराते हुए समझाया।फिर दोनों मुस्कुरा दिए और शाम धीरे-धीरे रात में बदल गई।
कभी-कभी कनु को लगता कि समर किसी और दिशा में जा रहा है और उस दिशा में वह कोई मंज़िल नहीं देख पा रही है।लेकिन उसे अपने ऊपर यक़ीन था कि वह उसे सँभाल लेगी।यदा-कदा समर उसके फोन का या मेसेज का जवाब नहीं देता तो उसे थोड़ी चिंता होती लेकिन फिर जैसे ही उससे मुलाक़ात होती, उसकी चिंता काफ़ूर हो जाती।एक बार समर ने यूँ ही हँसते हुए कहा कि मेरा वज़न बढ़ रहा है या नहीं, मुझे नहीं पता लेकिन तुम मेरी चिंता में दुबली होती जा रही हो, और कनु को लगा जैसे उसकी चोरी पकड़ ली हो समर ने।
एक दिन शाम को उसके एक दोस्त का फोन आया कि समर पुलिस स्टेशन में है तो वह एकदम परेशान हो गई।समर का फोन बंद था और किसी और से उसकी ख़बर मिलना संभव नहीं था।किसी तरह भागते हुए वह पुलिस स्टेशन पहुँची, समर को किनारे बेंच पर कुछ औए छात्रों के साथ बिठाया गया था।पुलिस इन्स्पेक्टर ने जब बताया कि ये लोग बिना अनुमति धरने पर बैठे थे, थोड़ी देर में इनको रिहा कर दिया जाएगा, तो उसकी जान में जान आई।वहाँ से वापस लौटते समय समर ख़ामोश था पर उसके चेहरे पर कई भाव आ जा रहे थे।
"मेरे साथ रहने पर तुम्हें कहाँ-कहाँ आना पड़ेगा कनु, सोच लो अब भी", फींकी हँसी हँसते हुए बोला समर।
"मुझे कोई दिक़्क़त नहीं होती है लेकिन तुमको क्या ज़रूरत थी धरने पर बैठने की।पूरे कॉलेज से सिर्फ़ तुम्ही कुछ लोग हो जिनको समाज की पड़ी है, पहले ख़ुद को तो देख लिया करो", बोल तो दिया कनु ने लेकिन जवाब भी उसे मालूम था।
समर कुछ देर ख़ामोश था, फिर वह बोला "क्या जब तक ख़ुद पर नहीं बीतेगी, तब तक हम कुछ नहीं करेंगे।उन ग़रीब बच्चों की छात्रवृत्ति का कुछ पता नहीं है और कॉलेज प्रशासन कुछ बताता नहीं।किन हालात में ये बच्चे यहाँ पढ़ते हैं, तुम्हें इसका अहसास भी नहीं होगा।क्या तुम्हें नहीं लगता कि हमारा ये उच्वर्गीय समाज नहीं चाहता कि ये बच्चे भी उन जगहों पर पहुंचें जहाँ पर उनका सदियों से कब्ज़ा रहा है"।
कभी-कभी तो कनु को लगता कि अगर वह भी किसी पिछड़े तबक़े से होती तो समर उसे ज़्यादा समझता।लेकिन इसमें उसका क्या क़ुसूर था कि वह समाज के ऊँचे दर्जे से थी।एक दिन उसने समर से ये पूछ लिया "अच्छा समर ये बताओ कि इसमें मेरी क्या ग़लती है कि मैं ऊँचे तबक़े से हूँ।अच्छा होता कि मैं भी किसी निचले तबक़े से होती, तुम ज़्यादा ध्यान देते मुझपर"।
समर ने उसकी आँखों में झाँककर देखा और बेहद गंभीर लहजे में बोला "कनु, ये जो तुम अपने आपको निचले तबक़े में होने की बात कह रही हो, वह तुम्हें कहने में बहुत आसान लग रही है, लेकिन अगर तुमने इस परिस्थिति को भोगा होता तो भूलकर भी इसका नाम नहीं लेती।मैं तो सिर्फ़ पढ़कर और इनसे मिलकर इनकी स्थिति को जानने की कोशिश कर रहा हूँ और मुझे रातों को नींद नहीं आती कभी-कभी।दरअसल सदियों से उपेक्षित इस वर्ग को मुख्य धारा से मिलाने की ज़िम्मेदारी हमारी सबसे ज़्यादा है, क्योंकि हमने ही तो इनके हिस्से के संशाधनों का अनधिकार दोहन किया है"।
सन्न रह गई कनु, इस नज़रिए से तो सोचा ही नहीं था कभी उसने।लेकिन अब उसे समर को खोने का डर कुछ ज़्यादा लगने लगा था।फिर भी वह अपनी तरफ़ से बेफ़िक्र दिखने की पूरी कोशिश करती।
समय ऐसे ही गुज़रता रहा और इस बीच दो घटनाएँ घटित हुईं, समर ने शायद जानबूझकर एक साल पीछे होने का निर्णय ले-लिया और उसने एक कंपनी में नौकरी कर ली।सौभाग्य से कंपनी का ऑफ़िस उसी शहर में था और वह नियमित रूप से समर से मिलती रहती थी।घर से अब कभी-कभी शादी की बात भी छिड़ जाती थी जिसे वह "अभी तो कुछ साल नौकरी करूँगी" कहकर टाल जाती थी।तनख्वाह का काफ़ी हिस्सा वह समर पर ख़र्च कर देती थी लेकिन इस तरह कि उसे महसूस न हो।समर की सामाजिक और राजनितिक गतिविधियाँ बढ़ती जा रही थीं और अब उसके पास कनु के लिए समय कम होता जा रहा था।
एक दिन कनु ने टोक दिया "समर तुम अपनी इच्छा से जो करना चाहते हो, वह करो।लेकिन मुझे इसके चलते कम-से-कम अवॉयड मत करो।मुझे तुम्हारी परवाह रहती है और इसको तुम मेरी कमज़ोरी मत समझो"।
समर ने कोई जवाब नहीं दिया लेकिन उसकी ख़ामोशी ने कनु को झकझोर दिया।कहीं सच में तो ये मुझे अवॉयड नहीं करने लगा है, कनु के ज़हन में बार-बार यही बात आती।लेकिन उसका बार-बार समर को फोन करना और उससे मिलना जारी रहा।कई बार वह उसके फोन को रिसीव नहीं करता और फिर उसके बाद उसके मेसेजेस का भी जवाब नहीं देता, तो कनु की चिंता बढ़ जाती।लेकिन मिलने पर समर सामान्य ही रहता और फोन या मैसेज का जवाब क्यों नहीं दिया पूछने पर "भूल गया था" का उत्तर दे देता।
एक दिन बात ही बात में समर ने कह दिया "देखो कनु, अब मुझे लगता है कि मैं तुम्हारे राह में बाधा बन रहा हूँ।मेरा भविष्य मुझे ख़ुद को नहीं पता तो मैं तुमको क्या भरोसा दे सकता हूँ।इसलिए बेहतर है तुम अपने लिए किसी अच्छे जीवनसाथी को ढूँढ़ लो, हाँ मेरी तरफ़ से किसी मदद की ज़रूरत हो तो बताना, पैसे के अलावा तुम्हारी मदद तो मैं कर ही सकता हूँ।मैंने ये कभी नहीं सोचा कि तुम जो मुझपर अपना समय और धन व्यय करती हो उसका मुझे प्रतिफल देना चाहिए, ये तुम्हारा अधिकार था और ये अधिकार हमेशा तुम्हारे पास रहेगा"।
कुछ बोल नहीं पाई कनु तुरंत, उसकी आँखों में आँसू आ गए।समर ने कैसे उसे अपनी राह का रोड़ा समझ लिया, ये बात उसको कचोट रही थी।समर द्वारा दिए गए अधिकार से उसे काफ़ी सुकून मिला था।उसे ये अधिकार हमेशा के लिए चाहिए था और कोई भी उसको छीन नहीं सकता था।उसने समर के हाथ को अपने हाथ में देर तक पकड़ रखा था उस दिन।
"मैंने कभी भी तुम्हारी स्वतंत्रता छीनने की कोशिश नहीं की है समर और न हीं कभी तुमपर बोझ बनने की।हाँ तुम्हें जिसदिन ये लगे कि मैं तुमपे बोझ बन गई हूँ, एक बार बता ज़रूर देना", समर के कंधे को उसने धीरे-से दबाया और उठ खड़ी हुई।
समर ने फोन करना अब लगभग बंद ही कर दिया था लेकिन कनु अभी भी उसे उसी तरह फोन करती रहती।वह ज़बरदस्ती उसकी जेब में पैसे डाल देती और हफ़्ते में एक बार काफ़ी शॉप में काफ़ी पीते हुए उनकी बहस ज़रूर चलती।रिश्ते को जिस शिद्दत से वह महसूस कर रही थी, समर शायद उस तरह नहीं सोचता था या जानबूझकर नहीं दिखाना चाहता था।
आज जब फिर समर नहीं आया तो उसे अहसास होने लगा कि समर को उसके हिस्से की स्वतंत्रता देने का वक़्त आ गया है।ख़ुद के लिए कुछ सोच पाना कनु के लिए संभव नहीं था, अभी कुछ साल इसीतरह गुज़ारेगी।हाँ, समर का ख़याल उसको रखना है, शायद हमेशा हमेशा के लिए क्योंकि ये रिश्ता उसने ही शुरू किया था।उसने फोन उठाया और समर को एक और मैसेज कर दिया "मैंने तुम्हारा बहुत इंतज़ार किया, जब भी वक़्त मिले फोन कर लेना।और हाँ, शनिवार शाम को मैं फिर आऊँगी यहाँ, अगर संभव हो तो आ जाना", और बिल चुकाकर वह थके क़दमों से निकल गई।
काफ़ी शॉप से उसका अपना कमरा आज बहुत दूर लग रहा था|।सड़क पर वैसी ही चहल-पहल थी, बस चाँदनी कुछ उदास लग रही थी, बिल्कुल उसकी तरह।

अंतहीन इंतज़ार--लघुकथा

" मौसम ऐसे ही साथ देता रहे तो कार्यक्रम सकुशल निपट जायेगा", आसमान की ओर देखते हुए एक कार्यकर्ता ने कहा। आज भी मौसम बिलकुल साफ़ था, दूर दूर तक बादलों का नामोनिशान नहीं था। पिछले एक महीने से छिटपुट बारिश को छोड़कर कभी भी ठीक बारिश नहीं हुई थी। बरसात का मौसम था और पूरे प्रदेश में कहीं भी बारिश नहीं हो रही थी। गाँवों में किसान फसल की बुवाई भी नहीं कर पाये थे, सारे खेत परती पड़े हुए थे। शहरों में भी गर्मी बढ़ गयी थी लेकिन फिर भी लोग खुश थे, क्योंकि कीचड़ से बचे हुए थे।
लेकिन धीरे धीरे किसानों के धैर्य का बाँध टूटने लगा और अब उनके आत्महत्या की ख़बरें भी छन छन कर सरकारी कार्यालयों में पहुँचने लगी। जब मामला मीडिया में तूल पकड़ने लगा और विपक्ष को भी एक बड़ा मुद्दा मिल गया तो सरकार चेती। कृषि मंत्री ने अपने गुरु से सलाह मांगी जो उसे हर समस्या का हल दिया करते थे। गुरु ने उनको इन्द्र देव को प्रसन्न करने के लिए एक बड़ा यज्ञ करने की सलाह दी और फिर जोर शोर से यज्ञ की तैयारी होने लगी।
आज उसी सामूहिक यज्ञ का कार्यक्रम एक बड़े से खुले मैदान में था। किसानों के दर्द को दूर करने के कार्यक्रम में बारिश का विघ्न न पड़े, इसकी कामना अब किसान भी करने लगे थे। दरअसल वो तो अपनी जिंदगी के लिए भी चमत्कारों के भरोसे ही रहने के आदी हो चुके थे। मीडिया भी इस गुनाह में बराबर का भागीदार बन गयी थी और वो भी इसे प्रचारित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही थी। दिन बीतता गया, बारिश नहीं हुई, यज्ञ निर्विघ्न संपन्न हो गया। जिन पैसों से किसानों के लिए सिचाई के साधन उपलब्ध कराये जा सकते थे वो इस यज्ञ रूपी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया और किसान एक बार फिर भगवान भरोसे अपने खेतों में बारिश की बूंदों का अंतहीन इन्तज़ार करने के लिए मज़बूर हो गया।

उजालों की राह--

" ज़िद मत करो, वहाँ की सुकूनभरी दुनियाँ हमारा इन्तज़ार कर रही है। बहुत सहा है हमने और बहुत मेहनत की है इसे पाने के लिए, और जब सब कुछ मिल रहा है तो ऐसी बचकानी जिद्द मत करो", उसने समझाते हुए कहा।
" हाँ, बहुत सहा है हमने इसीलिए बाक़ी अपनों को यही सब सहने के लिए छोड़ जाएँ यहाँ। अपने लिए ही सिर्फ कुछ हासिल कर लेना सब कुछ नहीं होता, जितना पाया है हमने उससे कई गुना लौटाने की जिम्मेदारी भी तो हमारी ही है", सपना ने उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा।
वो भी सोच में पड़ गया, एक तरफ सारी सहूलियतें और दूसरी तरफ इन टूटे अधखुले दरवाजे वाला उसका गाँव और उसके अपने लोग।
" वो सामने वाले घर को देख रहे हो, कुछ रोशनी वहाँ भी आनी चाहिए थी। लेकिन उस घर का नौजवान भी शायद तुम्हारी तरह ही सोचता था और छोड़ गया सारे अँधेरे यहीं पर अपने अधूरे उजाले की तलाश में। खुद की रौशनी से दूसरों को प्रकाश देने वाले ही सूरज कहलाते हैं"।
वो एकटक सपना की ओर देख रहा था, उसकी सोच का दरवाज़ा भी धीरे धीरे खुलने लगा था।

अपने अपने सपने--

बनारसी गईया चरा के लौटे और उनको चरनी पर बाँध के पीठ सीधा करने के लिए झोलंगी खटिया पर लेट गए. उस क्षेत्र में जैसे बाकी गाओं थे, वैसे ही उनका गाँव था. अब गाँव का नाम भले ही "सिकंदरपुर" था लेकिंन इतिहास के सिकंदर और पोरस से इसका कोई सम्बन्ध नहीं था. अब गाँव में लोगों के नाम भी तो ऐसे होते हैं जिनका वास्तविकता से दूर दूर तक कोई भी सम्बन्ध नहीं होता. मिसाल के लिए उनके सगे पट्टीदार थे "दरोगा", जिनका कद भी पांच फुट नहीं था और ऊपर से दमा के मरीज, जरा सा तेज चलें तो हांफने लगते थे. आस पास के गाँव भी कुछ ऐसे ही नाम के थे और शायद ही किसी गाँव से जुड़ी कोई कहानी हो. बहरहाल उनकी गाय बिलकुल सीधी थी और उसको चराने में कोई भी मशक्कत नहीं करनी पड़ती थी. सिवान में ले जाकर उसे छोड़ देते थे और कहीं पेड़ के निचे आराम से सुस्ताने लगते थे. कोई गाँव का आदमी उधर से निकल जाए तो फिर बतकही का दौर ऐसा चलता था कि समय का पता ही नहीं चलता था. गाँव में उनके सम्बन्ध ठीक ठाक थे और लोगों को उनकी जाती और सामर्थ्य के हिसाब से बनारसी इज्जत भी देते थे. 
मौसम का कुछ ठिकाना नहीं था, इस बार पानी महीनों से बरस नहीं रहा तो घाँस भी कम हो गयी है सिवान में, चारो ओर टहाटह गर्मी पड़ रही है. खटिया पर लेते लेते गमछी से माथे का पसीना पोंछते हुए बनारसी मेहरारू को आवाज़ दिए "अरे तनी एक लोटा पानी त पिलाओ रघुआ की महतारी, बहुत गरम है आज". फिर वह दरवाज़े पर नज़र दौड़ाये तो साइकिल नहीं दिखी, मतलब रघुआ कहीं निकला है. उनका माथा गरम हो गया, ई लड़का का पेअर तो घर में टिकता ही नहीं है, जब देखो तब हवा पर सवार रहता है.
"कहवां गायब हौ तोहार नवाब, अब ओके खेत बारी से कउनो मतलब नाहीं हौ, कम से कम गईया के ही चरा दिहल करत", पानी लेते हुए बनारसी मेहरारू से बोले. ऐसे समय अक्सर रघुआ की महतारी चुप ही रहती है, पता है कि न तो ई मानेंगे और न रघुआ.
"अरे ऊ बजारे गयल हौ, कुछ किताब ख़रीदे खातिर. अब ओकर मन पढ़ाई में लगल हौ, त पढ़ लेवे द ओकरा के", लोटा लेकर वापस जाते समय उनकी मेहरारू धीरे से बोली.
अब खुद तो पढ़े लिखे नहीं थे तो का ही कहते अपने मेहरारू से. मन एक तरफ शंकित होता तो दूसरी तरफ मान भी लेता कि रघुआ पढ़ने में मन लगाता है. उनके हिसाब से पढ़ने का मतलब था कि रघुआ किताब खोलकर बैठा रहे और कुछ बोल बोलकर पढता रहे. ख़ैर पानी पीकर थोड़ा ताज़ा हुआ मन तो बनारसी ने वहीं रखा चारा काट कर भूषा में मिलाकर नाँद में डाल दिया. फिर सब गायों को नाद पर बाँध कर झउआ उठाया और गोबर फेंकने चल दिए. गाय के चलते देसी खाद और ऊपरी का इंतज़ाम तो हो ही जा रहा है.
उधर रघुआ बगल के गाँव के सिवान में एक जगह पेड़ों की ओट में साइकिल खड़ा करके इंतज़ार कर रहा था. कॉलेज में पढ़ने के चलते उसे पता था कि आज वैलेंटाइन डे था और उसको भी कुछ देना था अपनी सरोज को. टी वी और अख़बार में एक हफ्ता पहले से ही इस नवके त्यौहार का खूब धूम धाम था और ऐसा लगता था जैसे यह त्यौहार नहीं होता तो लोग भला प्रेम कैसे करते. अब देने के लिए कुछ समझ में नहीं आया तो एक नए डिज़ाइन का अँगूठी खरीद लिया था उसने. अंगूठी सोने की तो नहीं थी लेकिन किताबों के लिए मिले पैसे होम हो गए उसमे. पेड़ के नीचे खड़े खड़े वह चारो तरफ देख रहा था वो कि कोई और तो नहीं देख रहा है. भले कितना भी बहादुर बने कोई लेकिन प्रेम मोहब्बत में डर तो लगा ही रहता था लोगों का, सबसे ज्यादा अपने परिवार का ही. दूर कुछ आहट हुई और उसने पलट के देखा, सरोज दुपट्टा ओढ़े उसकी तरफ आ रही थी. रघुआ को दिल वाले दुल्हनिया का गाना याद आ गया, लगा जैसे काजोल उसकी तरफ मुस्कुराते हुए आ रही है. जैसे ही वो करीब आई, उसने मुस्कुराते हुए कहा "तुम्हारे लिए कुछ गिफ्ट लाये हैं सरोज, आज के दिन का शगुन है". फिर उसने जेब से अंगूठी निकलकर सरोज को दिया और मुस्कुरा दिया.
"अरे ई का ले आये, लगता है एक तीर से दो निशाना साध रहे हो तुम", और लजाकर अँगूठी सरोज ने अपनी उंगली में डाल लिया. रघुआ तो माने सातवें आसमान पर पहुँच गया, अब तो मामला बिलकुल सेट हो गया है, वह मन ही मन सोचने लगा.
"का सोचने लगे, बहुत सुन्दर अंगूठी है, तुम्हारी पसंद बढ़िया है", एक बार चारो तरफ नज़र दौड़ाया सरोज ने और फिर एक बार हाथ हिलाकर चल पड़ी.
"तुमको ऐसे ही थोड़े न पसंद किया हैं हम", रघु मुस्कुरा कर बोला.
सरोज आगे बढ़ी तो रघु ने धीरे से पूछा "अब कब मिलोगी सरोज".
जवाब में सरोज मुस्कुराकर चली गयी, रघु उसको दूर तक जाते देखता रहा. फिर चारो तरफ देखकर रघुआ ने साइकिल उठाया और घर चल पड़ा. शाम ढल चुकी थी, अधिकांश लोगों के घर लालटेन और कुछ घरों में बल्ब जल गए थे. गाँव में बिजली आ चुकी थी और सड़क भी ठीक ठाक बन गयी थी. 
घर पर साइकिल खड़ा करके वो दलान में घुसा और तभी बनारसी ने टोक दिया "कहाँ इतनी देर तक घूमत रहे, पढ़ाई लिखाई तो मन लगाकर कर करत हो न आजकल". रघुआ कभी भी बनारसी से खुलकर बात नहीं करता था, बस हाँ हूँ करके निकल जाता था. आदतन आज भी हूँ कहकर वो घर में घुस गया, कपड़े निकाले और मुँह हाथ धोने लगा. मतारी ने खाने का पूछा तो थोड़ी देर बाद खाऊंगा बोलकर वह अपने खटिया पर बैठ गया. 
किताब में रखी सरोज की फोटो देखकर वो उसके सपनों में खो गया था. उसकी मतारी भी चूल्हे के पास से उसे देखते हुए उसके उज्जवल भविष्य के सपने में खोई थी और दुआरे बनारसी अपने झोलंगी खटिया पर लेटे लेटे अपने खेती और गईया के सपनों में खोया था.

अच्छे दाग--

" नहीं डॉक्टर, मुझे ये दाग़ नहीं मिटवाने। कुछ गलतियाँ भूलनी नहीं चाहिए और खास कर ऐसी गलतियाँ", अपने चेहरे को आइने में देख कर एक बार तो वो खुद सिहर गयी थी लेकिन फिर उसने अपने आप को मजबूत किया। क्या किसी पर भरोसा करना गलती थी, शायद नहीं। लेकिन कुछ तो उसने भी गलती की ही थी।
रोज वो उसी स्टॉप से कॉलेज के लिए बस पकड़ती थी और वो उसको शायद कई महीनों से देखता था। खूबसूरत थी ही और उसकी तारीफ सुनकर समझ नहीं पायी और उसे अपना दोस्त समझ कर उससे सब कुछ साझा करने लगी। वो भी उसे हर चीज में प्रोत्साहित करता और उसे लगता कि एक सच्चा हमदर्द मिल गया है। एक दिन बातों बातों में ही उसने अपने प्यार का इज़हार कर दिया। उसने उसको समझाने की कोशिश की, अपने सपने के बारे में याद दिलाया जो उनका साझा सपना हुआ करता था। लेकिन अब उसका असली रंग सामने आने लगा और वो उसको इग्नोर करने लगी।
उसे याद आया उसका मैसेज " तुम अगर मेरी नहीं हुई तो मैं किसी और की होने लायक नहीं छोड़ूंगा "। उसे कुछ दिन डर तो लगा लेकिन फिर वो अपने सपने को पूरा करने में सब भूलती गयी। उसे देखकर भी अनदेखा करती और अपने काम में डूबती गयी। और फिर दो दिन पहले की घटना, बाइक बगल से गुजरी और जब तक कुछ समझती, उसका चेहरा एक तरफ से जलने लगा था।
एक बार फिर उसने अपना चेहरा आईने में देखा, अब वो दाग उसे कम डरावना लग रहा था। हाँ वो उसे अपने सपने को हर हाल में पूरा करने की हिम्मत जरूर दे रहा था। सामने टी वी पर विज्ञापन आ रहा था " दाग अच्छे हैं "।

Monday, February 8, 2016

मन का रोग--

आखिर ये बात उनके दिमाग में आ क्यूँ रही है, हमेशा तो उन्होंने इन चीजों का विरोध ही किया है| अपने कार्यालय में कितना कुछ किया है उन्होंने इस भेदभाव को मिटाने के लिए और अब तो लगभग हर कर्मचारी एक साथ ही बैठकर लंच करता है| किसी के भी जाति और मजहब से उनको तो कोई भी फ़र्क़ नहीं पड़ता था तो फिर आज ये उलझन क्यूँ?
दोपहर में लंच के बाद जब ऑफिस का जमादार उनके पास आया और उनसे एक प्रार्थना की तो उनको थोड़ा अजीब लगा| हामी तो तुरंत भर दी उन्होंने लेकिन उसके जाने के बाद सोच में पड़ गए| इस बारे में तो कभी सोचा ही नहीं था उन्होंने कि कभी अपने कार्यालय के जमादार के यहाँ भी खाना खाने जाना पड़ेगा| शायद उसको तो उन्होंने मनुष्य की गिनती में ही नहीं रखा था, या ये उनके पालन पोषण का असर था| बचपन से ही जो संस्कार डाले गए थे वो कहीं न कहीं अचेतन में अब भी पड़े हुए थे और आज अपना रंग दिखा रहे थे|
घर पर सोफे पर लेटे हुए ये सब उनके दिमाग में चल रहा था कि उनकी नज़र सामने चल रहे टी वी कार्यक्रम पर पड़ी| कुष्ठ रोगियों के बारे में कार्यक्रम था उसमे और एक डॉक्टर का ये कहना कि ये रोग शरीर से ज्यादा आत्मा को गला देता है, उनके मस्तिष्क को झिंझोड़ गया| उन्होंने भी तो अपना शरीर इस भेदभाव से मुक्त कर लिया है लेकिन आत्मा शायद आज भी इस रोग से गल रही है|
उन्होंने अपनी आत्मा को भी इस रोग से मुक्त करने का निर्णय ले लिया और जमादार के घर की ओर चल पड़े|

Sunday, February 7, 2016

रामराज्य--

" सर, आज तो कुछ भी नहीं है ऐसा जिसे ब्रेकिंग न्यूज़ में चला सकें। कल वाली ही दोहरा दी जाए"।
" कल वाली, अरे वो तो न्यूज़ भी नहीं रही अब। खोजो, आज कहीं तो कुछ हुआ होगा"।
" सुबह से शाम हो गयी सर, कुछ भी नहीं मिला"।
" कोई तो मर्डर हुआ होगा, कोई रेप, डकैती, आत्महत्या, अपहरण, कुछ भी"।
" सर, कोई वारदात नहीं हुई है आज। यहाँ तक कि किसी नेता या अभिनेता ने कोई विवादित बयान भी नहीं दिया है"।
आख़िरकार ख़बर मिल ही गयी, सत्ता पक्ष के नेता ने एक बयान दिया कि हमारा शहर अब शांति के मार्ग पर चल रहा है, रामराज्य की स्थापना हो रही है। और विपक्ष के नेता ने इसे साम्प्रदायिक बयान बताते हुए कहा कि ये सरकार अल्पसंख्यकों के हित की रक्षा करने में असमर्थ है।
ब्रेकिंग न्यूज़ चल रही थी, शहर का वातावरण तनावपूर्ण होने लगा था।

अपने हिस्से की ख़ुशी--

" हेलो, हेलो ", उधर से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। उसने थोड़ी देर तक फोन हाथ में पकडे रखा और रख दिया। वापस जा कर सोफे पर बैठ गयी और उसकी आँख से कुछ बूँद टपक गए। शर्माजी ने अंदर घुसते ही समझ लिया था कि आज फिर उसकी बात नहीं हो पायी है। उन्होंने उसके कंधे को धीरे से दबाया और उसकी तरफ़ देख कर धीरे से मुस्कुरा दिए।
" चलो आज पार्क में घूम आते हैं, कितना प्यारा मौसम है", कहते हुए उन्होंने जूते पहनने शुरू कर दिए। वो अभी भी शून्य में देखती चुपचाप बैठी थी जैसे कुछ सुना ही न हो।
" अरे चलो भी, घूमने के बाद बाहर ही कुछ खा के लौटेंगे", कहते हुए शर्माजी ने उसको उठाना चाहा।
" आखिर मेरा कुसूर क्या है, क्यों नहीं मुझसे बात करता वो"।
" होता है ऐसा, बच्चे बड़े हो जाते हैं तो उनको थोड़ी आज़ादी चाहिए होती है। और शादी के बाद तो और जरुरी होता है उनको उनका स्पेस देना, इसीलिए हमेशा समझाता था तुमको कि बहू के सामने ज्यादा बेटे की दिनचर्या में दख़ल मत दो। खैर छोड़ो इसको और चलो घूम आते हैं"।
" मुझे अब कुछ अच्छा नहीं लगता है, अकेले समय बिताना तो जैसे सजा हो गयी है। क्या गलती की थी मैंने की अब मुझसे बात भी नहीं करता वो"।
" आज एक महीना होने को आ गया और तुम अभी भी उबर नहीं पा रही हो। दुःख मुझे भी होता है लेकिन जीना तो पड़ता ही है ना"।
" मुझे नहीं जाना बाहर, मुझे सच में कुछ अच्छा नहीं लगता अब", कहते हुए वो एक बार फिर सुबकने लगी।
थोड़ी देर तक तो चुप्पी छायी रही और दोनों खामोश थे। फिर शर्माजी ने उसका सर उठाया और पूछा " अच्छा ये बताओ कि अब मेरी गलती क्या है"।
उसने शर्माजी के चेहरे को अब गौर से देखा, शायद उम्र के बीसेक वर्ष ज्यादा दिख रहे थे उसपर। उसे एक झटका सा लगा, वो तो आँसू बहा के दिल हल्का कर लेती है लेकिन शर्माजी तो वो भी नहीं कर पाते। अब उसके मन का दुःख पछतावे में बदलने लगा, आखिर शर्माजी का ध्यान तो उसे ही रखना है। वो धीरे से उठी और कपड़े बदलने कमरे में चली गयी। आज उसे शर्माजी की पसन्द की पीली साड़ी पहननी थी, बाहर जो घूमने जाना था।
    

Wednesday, February 3, 2016

ख़याली आज़ादी

"हद है ये तो, दुकान खोल ली है, तमाम ग्राहकों से बात करना है पर शरीर पर बुर्का पड़ा हुआ है| पता नहीं कब मिलेगी इनको आज़ादी इन सब से", बोलते हुए वो बिल का भुगतान करने के लिए काउंटर पर खड़ी महिला के पास जाने लगा| साथ चल रही पत्नी, जो किसी कार्यालय में काम करती थी, की निगाह अचानक एक अच्छे ड्रेस पर गयी और वो लपक कर उसे उठा लायी|
"ये क्या उठा लायी, कुछ भी पूछने की जरुरत नहीं, बस ले लिया जो मन आया| रखो इसको वहीँ पर, जहाँ से लायी थी", बोलते हुए वो सामान काउंटर पर रख कर बिल का इंतज़ार करने लगा|
पत्नी के चेहरे पर कई रंग आये और गए| उसने ड्रेस को वापस रखकर लौटते हुए एक बुर्का उठा लिया, अपने अदृश्य बुर्क़े से तो वो बेहतर लग रहा था उसको|

Monday, February 1, 2016

जीवन--

एक और धमाका कर चुका था वो और फिर से अपने खोल में छुप जाने के लिए निकल गया। इस बार भी कई जाने गयी थीं और काफी तबाही भी हुई थी, और उसे अगले आदेश तक छुप कर रहना था। क्यूँ कर रहा था वो ऐसा, किसलिए बेगुनाह इन्सानों का क़त्ल कर रहा था, उसे याद नहीं था। बस इतना पता था कि अपने धर्म के लिए उसे ये सब करना है।
उसका भी एक गाँव था, थोड़े खेत थे और वो अपने पिता के साथ संतुष्ट जीवन बिता रहा था। फिर माहौल बिगड़ने लगा और एक दिन उसके पिता की मौत की खबर उसे मिली। कुछ लोग घर आये और उसको बताया कि आतंकवादी होने के संदेह में उसके पिता को मार दिया गया है। फिर उन लोगों की आवाजाही बढ़ गयी और उसे पता भी नहीं चला कब वो उनके साथ इन वारदातों में शामिल हो गया।
अचानक उसकी नज़र दो बच्चों पर पड़ी जो बरसात में भी पेड़ों को पानी दे रहे थे। वो एकदम से ठिठक कर रुक गया, ये क्या कर रहा है वो। एकतरफ ये बच्चे हैं जो पेड़ों को भी जीवन दे रहे हैं, और दूसरी तरफ वो ?
अब वो भी बच्चों की तरफ बढ़ा और पानी देने मे हाथ बटाने लगा।