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Friday, December 11, 2015

नयी कोंपल--

सुबह वो जैसे ही बाहर निकला , पिताजी को बगीचे की घास साफ़ करते देख दंग रह गया | ये क्या हो गया उनको , अच्छे भले तो घर में रहते हैं और किसी काम को करने के लिए कहा भी नहीं जाता उनको , फिर ये अचानक क्या हुआ |
" पापा , क्या कर रहे हैं आप , किसने कहा आपको ये सब करने को | ६० साल तक तो आपने खूब काम किया , अब तो आपके आराम करने के दिन हैं , लाईये दीजिये इसे ", कहते हुए उसने उनके हाथ से खुरपा ले लिया |
" मुझे किसी ने नहीं कहा लेकिन मुझे खुद लग रहा था कि मैं अनुपयोगी होता जा रहा हूँ | बाहर जाने नहीं देते कि कहीं गिर पड़ न जाऊँ, कोई काम करने नहीं देते तुम लोग , और सब्जी तक नहीं लाने देते कि लोग क्या कहेंगे "|
" अगर ऐसी बात है तो आज से ही इस गार्डन की जिम्मेदारी आपकी , आप जो करना चाहें , कीजिये यहाँ "|
बगीचे के फूलों से कम नहीं लग रही थी पापा के चेहरे की मुस्कान , उसे लगा जैसे बगीचे के किनारे वाले बूढ़े पेड़ पर नयी कोंपलें आ गयी हैं |

Thursday, December 10, 2015

ममता की क़ुर्बानी --

उसका दिल बुरी तरह धड़क रहा था , अब समय हो गया था डिलीवरी का। नर्स ने उसे सहारा देकर उठाया और अंदर के कमरे में ले जाने लगी। वैसे ये पहला अवसर नहीं था हस्पताल के इस कमरे में आने का , लेकिन इस बार वज़ह कुछ और थी। खो गयी वो पुराने दिनों में , छोटा सा परिवार था उसका , वो , पति और दो बच्चे , किसी तरह दो वक़्त की रोटी मिल जाती थी। एक दिन वो हस्पताल आई थी तभी उसे पता चला कि किसी को अपना बच्चा पैदा करने के लिए दूसरे की कोख की जरुरत है। घर आते समय पुरे रास्ते उसके मन में ये विचार झंझावात मचाता रहा लेकिन किसी निष्कर्ष पर पहुंचना आसान नहीं था उसके लिए| घर पहुँच कर डरते डरते उसने पति को इस खबर के बारे में बताया और उसकी राय जाननी चाही| ये फैसला बहुत कठिन था , अपने रिश्तेदारों और समाज की चिंता अपनी जगह थी लेकिन उससे मिलने वाला धन बहुत पर्याप्त था उनके परिवार के भविष्य के लिए। पति ने भी कुछ सोच विचार कर हामी भर दी और उसने भी अपने आप को तैयार कर लिया इसके लिए| उसने हस्पताल जाकर अपनी सहमति बता दी और वापस आ गयी| अगले कुछ हफ्ते तमाम क़ानूनी कार्यवाही में बीत गए और फिर इस सर्रोगेसी की शुरुआत हुई। उस दूसरे परिवार की तरफ से शुरू में ही थोड़ा धन दे दिया गया था जिससे उसके खान पान का ध्यान रखा जा सके। इस पैसे से उसके पूरे परिवार का भी खर्च सुचारू रूप से चलने लगा था। जैसे जैसे बच्चा पेट में बढ़ता गया , उसके अंदर मातृत्व पनपने लगा। उसे कोई फ़र्क़ नहीं समझ आता था अपने दो बच्चों के गर्भ में पलने और इस बच्चे के पलने में। कभी कभी तो वो भूल ही जाती थी कि ये बच्चा उसका नहीं है लेकिन जैसे ही फल वगैरह खाती थी , उसे याद आ जाता था। बीच बीच में उस परिवार से कोई न कोई आ जाता था उसे और होने वाले बच्चे को देखने के लिए और तब उसे कुछ बेचैनी सी होने लगती थी। धीरे धीरे समय बीतता गया और आखिरी महीना भी आ गया , अब उसके पेट में होने वाली हलचल उसे बहुत प्यारी लगने लगी थी। उसके पेट में ही पल रहा है बच्चा लेकिन वो उसका नहीं है , इस बात को जज्ब करना जैसे अब उसके लिए मुश्किल होता जा रहा था। जब वो कमज़ोर पड़ती थी तब उसका पति उसे अपने परिवार की खुशियों की दुहाई देकर समझाने की कोशिश करता। वो भी अपने परिवार की सुधरती स्थिति को देखकर अपने को समझाने की पूरी कोशिश करती लेकिन तभी उसके पेट में मचती हलचल उसे विचलित कर देती। कभी उसे अपनी ख़ुशी , अपना मातृत्व भारी पड़ता दिखता तो कभी अपने परिवार की खुशियाँ मातृत्व पर। आज वो समय भी आ गया था जब उसके गर्भ में पलता बच्चा बाहर की दुनियाँ में आने के लिए तैयार था। अंदर प्रसव कक्ष में भी लेटने के बाद उसके दिमाग में यही चल रहा था कि जब ये बच्चा चला जायेगा तो वो कैसे रहेगी , आखिर ९ महीने अपने कोख में ही तो पाला था उसको। वहाँ बाहर उसके होने वाले माता पिता पूरी तैयारी कर के आये थे कि बच्चे के पैदा होने के बाद बचे पैसों का भुगतान करके वो बच्चे को लेकर चले जायेंगे। आधा घंटा बीता और नर्स ने बच्चा उसके पास रख दिया। एकदम से उसकी ममता उमड़ पड़ी और उसने बच्चे को सीने से लगा लिया , अब उसकी बच्चे को लौटाने की इच्छा कमजोर पड़ती जा रही थी। इतने में उसका पति और दोनों बच्चे अंदर आ गए , और उसने गौर से अपने बच्चों के कपड़ों को देखा। कितने अच्छे लग रहे थे दोनों इन कपड़ों में लेकिन कुछ महीनों पहले ये तो सिर्फ सपना ही था उसके लिए। एक बार और उसने अपने नए जन्मे बच्चे को देखा और फिर उसने अपने परिवार की खुशियों के लिए उसने अपनी ममता को क़ुर्बान करने का फैसला कर लिया| इस क़ुर्बानी की गवाही उसके आँख के किनारों से बहे आँसू दे रहे थे|

खबर--

आज गाँव में जबरदस्त गहमा गहमी थी , तमाम नेता और मंत्री आ जा रहे थे | कल रात हुए पुलिस फायरिंग में इस गाँव के एक अल्पसंख्यक की मौत हो गयी थी और उसके घर संवेदना व्यक्त करने और आर्थिक मदद करने लोगों का हुजूम चला आ रहा था | पुलिस अत्याचार के खिलाफ भी जगह जगह मोर्चा निकालने की तैयारी चल रही थी | सभी स्थानीय समाचार पत्रों और न्यूज़ चैनल में इस खबर को प्रमुखता से दिखाया गया था |
इस गाँव से निकलती गाड़ियाँ कुछ ही किलोमीटर दूर के दूसरे गाँव से होकर निकल रही थीं जहाँ का एक अर्ध सैनिक बल का नौजवान भी कुछ हफ़्तों पहले बारूदी सुरंग के विस्फोट में शहीद हो गया था | कल उस शहीद की माँ ने विभाग से मिले धन से अपने गाँव के बच्चों को पढ़ाने के लिए एक विद्यालय की नींव डाली थी | किसी एक समाचार पत्र के एक कोने में ये भी एक छोटी सी खबर थी |

आँच--कहानी

बहुत बेचैनी से घूम रहे थे नेताजी घर में , लगातार फोन लगा रहे थे बाहर रहने वाली बेटी को लेकिन फोन कवरेज क्षेत्र के बाहर बता रहा था| दंगों की आंच उस प्रदेश में भी पहुँच गयी थी और उनकी बेटी जहाँ रहती थी वो क्षेत्र भी लपेट में आ गया था| अचानक फोन बजा , लपक कर देखा उन्होंने की शायद बेटी का हो , लेकिन फोन उनके पार्टी के कार्यकर्ता का था| 
" बधाई हो नेताजी , माहौल बिलकुल अपने पक्ष में बन गया है| दूसरे प्रदेशों में भी दंगे फ़ैल रहे हैं , अब कोई चिंता नहीं है| सरकार तो अपनी ही बनेगी इस बार ", बहुत उत्साहित होकर कार्यकर्ता बोल रहा था लेकिन नेताजी की आवाज़ जैसे बर्फ की तरह ठंडी थी| बिना कुछ कहे जल्दी से उन्होंने फोन काटा और फिर बेटी को फोन लगाने लगे| 
जैसे जैसे बेटी का फोन कवरेज क्षेत्र से बाहर बता रहा था , वैसे वैसे उनका कल का उत्साह खुद उनको ही काटने दौड़ रहा था| हार कर उन्होंने उस क्षेत्र के अपने पार्टी के बहुत करीबी साथी को फोन लगाया और उसको बताया| लगभग गिड़गिड़ाने के अंदाज़ में उन्होंने उससे कहा कि जैसे भी हो वो जाकर वहां से बेटी को सुरक्षित निकाले| सामने से आश्वासन तो मिला लेकिन पता नहीं क्यों उनको उस पर भरोसा करने का मन नहीं किया| आखिर खुद भी तो सबको कितने आश्वासन देते रहते थे लेकिन अमल कितनो पर किया , ये उनको भलीभांति पता था| 
अचानक फोन बजा , बेटी का नंबर था| बेटी कुछ बोले उसके पहले ही वो चिल्लाने लगे " तुम ठीक तो हो बेटी , कहाँ थी तुम्हारा फोन नहीं लग रहा था "|
" स्थिति ठीक नहीं है पापा , मैं निकलने की कोशिश कर रही हूँ यहाँ से| जैसे ही स्टेशन पहुँचूंगी , आपको फोन कर दूंगी "| 
" देखो संभल कर निकलना , अपना ख्याल रखना ", और भी जाने क्या क्या बोल रहे थे कि उधर से हल्ला सुनाई दिया और फिर फोन कट गया| वो वापस फोन लगाने लगे , घंटी बज रही थी लेकिन उधर से कोई जवाब नहीं आ रहा था| वापस उन्होंने अपने करीबी को फोन लगाया और उसे बेटी से हुई बात बताई , उसने फिर से कहा कि स्थिति तो गड़बड़ है लेकिन वो प्रयास कर रहा है|
अब वो फोन को हाँथ में लेकर सोफे पर धंस गए , मन में विचारों का तूफ़ान चल रहा था| उन्होंने सोचा भी नहीं था कि उनकी लगायी आग की आँच खुद उन तक पहुँच जाएगी| पत्नी के नहीं रहने पर बेटी ही उनका सहारा थी , बहुत चाहते थे वो उसको , इसीलिए उसके कहने पर उसे दूसरे प्रदेश भेज दिया था पढ़ाई के लिए| एक बार फिर फोन लगाया , जवाब नहीं मिलने पर बेचैनी में उठे और किनारे के कमरे में बने पूजा घर में चले गए| 
पता नहीं कितनी देर तक बैठे रहे वो उन मूर्तियों के सामने , मन में बस एक ही प्रार्थना कि बेटी सही सलामत घर आ जाये| दंगों में फंसे लोगों का हश्र पता था उनको और अगर लड़की हो तो , सोच कर ही उनका मन काँप उठता था| मन ही मन उन्होंने अपने किये गुनाहों की सजा मांगी उपरवाले से और भविष्य में ऐसी किसी भी घटना का हिस्सा बनने से तौबा कर ली| 
लगभग दो घंटे बीत चुके थे बेटी से बात किये , लगातार फोन लगा रहे थे लेकिन अब उसका फोन स्विच ऑफ बता रहा था| अपने फोन पर आते किसी भी कार्यकर्ता के कॉल को वो ले नहीं रहे थे| बस एक ही प्रार्थना कर रहे थे , बेटी सुरक्षित निकल जाए और घर आ जाये| इस बार घंटी बजी तो उन्होंने देखा , किसी लैंडलाइन से फोन था| डरते डरते उठाया और कुछ कहते उसके पहले ही उधर से बेटी की आवाज़ आई " पापा , मैं अपने दोस्त के घर पहुँच गयी हूँ , मेरा फोन डिस्चार्ज हो गया था इसलिए उसके लैंडलाइन से आपको कॉल किया| अब घबराने की कोई बात नहीं है , जैसे ही माहौल ठीक होगा मैं आ जाउंगी , आप बेफिक्र रहिये "| 
उनकी आँखों से अश्रुधार बह निकले , रुंधे गले से बस इतना ही कह पाये " कोई जल्दी नहीं है आने की , जब मैं बताऊँ तभी निकलना वहां से ", और सोफे पर ढह गए| सामने टी वी पर जगह जगह दंगे भड़कने की खबर आ रही थी| उन्होंने एक बार फिर भगवान को धन्यवाद दिया और जूते पहन कर बाहर निकल आए| अब किसी भी हालत में अपने क्षेत्र की स्थिति को सुधारना था उनको , आखिर अपने किये गुनाहों के लिए इससे बड़ा प्रायश्चित और क्या हो सकता था|

उचित फैसला--

पूरे मोहल्ले में खुसुर फुसुर हो रही थी , जितनी मुँह , उतनी बातें । आज तीसरा दिन था और बेटी घर नहीं लौटी थी , किस किस को समझाते । घर में वो तो बुरी तरह तड़प रही थी लेकिन उसके पिता का अभी भी गुस्सा ठंढा नहीं हुआ था । बस एक ही रट लगाये हुए थे कि बेटी ने उनकी इज़्ज़त का ख्याल नहीं रखा और उनके मना करने पर भी अँकुर के साथ चली गयी । 
अचानक फोन की घंटी बजी और उसने दौड़ कर उठाया , उधर से बेटी की ही आवाज़ थी । " माँ , मैं ठीक हूँ और यहाँ वर्किंग वूमेन हॉस्टल में रह रही हूँ । मेरी कोई इच्छा नहीं थी कि मैं पापा के विरुद्ध जाकर शादी करूँ , लेकिन मैं अँकुर के बगैर भी नहीं रह सकती थी । इसलिए मैंने यहाँ पर एक जॉब ढूँढ ली है और फिलहाल यहीं रहूँगी । अँकुर भी अपने घर चला गया है और वो मेरे फैसले से सहमत है । अब वक़्त के साथ शायद पापा बदल जाएँ या हम अपने को बदल लें, बस हम परिस्थितियाँ ठीक होने का इंतज़ार करेंगे "।
कुछ देर तक तो वो फोन हाँथ में लिए खड़ी रही , फिर उसे बेटी की समझदारी पर फक़्र होने लगा । उसके जेहन में बेटी की जिंदगी में खुशियों के दीप जगमगाने की उम्मीद पुख्ता हो गयी ।

ईमान--

" इस बार पटाखे कम लाये थे आप, बहुत थोड़े से बचे हैं कल के लिए", बेटे ने शिकायती लहज़े में कहा और पटाखे वहीँ छोड़ कर घर के अंदर चला गया| रात बहुत होने से दीवाली की रौनक कम होने लगी थी और मोहल्ले के बाकी लोग भी अब घरों में जाने लगे थे| उसने एक बार सोचा कि बचे हुए पटाखे अंदर रख दे, फिर ये सोचकर कि बरामदे में ही तो हैं, वहीँ छोड़ दिया| थोड़ी देर में सब सोने की तैयारी में लग गए|
अचानक उसे किसी के बरामदे में चलने की आवाज़ आई| धीरे से उसने पर्दा हटाया और बरामदे की धुँधली रौशनी में देखने की कोशिश करने लगा| थोड़ी देर में ही उसने उस बच्चे को पहचान लिया जो मोहल्ले के किनारे बने एक झोपड़े में अपनी माँ के साथ रहता था| वो कभी एक पटाखा उठाता, तो कभी दूसरा और फिर उनको रखकर तीसरा| शायद वो सोच नहीं पा रहा था कि कौन सा पटाखा ले और उसकी इस उधेड़बुन को वो अंदर से देख रहा था| लेकिन थोड़ी देर बाद ही वो लड़का बिना पटाखे लिए धीरे से चला गया|
कुछ देर सोच कर वो बाहर निकला और उसने सारे पटाखे इकठ्ठा किये| घर में रखी मिठाईयों को भी उसने निकाला और पटाखों के साथ रख दिया| सबेरे सबेरे ही ये सारी चीजें उस बच्चे के घर पर दे देगा ताकि आज तो उस बच्चे का ईमान बच गया, आगे कहीं टूट न जाए और फिर उसको किसी और घर के बरामदे में नहीं घुसना पड़े|

अर्थ का अनर्थ --

अर्थ का अनर्थ कैसे हो सकता है , इसका एहसास मुझे भी हुआ है जिंदगी में । बात १९९३ की है , मैं उस समय करही , जो कि मध्य प्रदेश के खरगोन जिले में एक गाँव है , में नौकरी कर रहा था । निमाड़ का क्षेत्र था और महाराष्ट्र के नज़दीक होने के चलते निमाड़ी के साथ साथ मराठी भी काफी प्रचलित थी उस तरफ । एक दिन मैं शाखा में रोजमर्रा के काम में लगा हुआ था तभी एक ग्राहक मेरे पास आया । उसका चेहरा थोड़ा उतरा हुआ था , जबकि सामान्यतया वो खुशमिज़ाज इंसान था । मैंने यूँ ही उत्सुकता वस पूछ लिया कि क्या हुआ ? उसने थोड़े उदास लहज़े में कहा ," मेरे पिताजी शांत हो गए "।
मुझे लगा कि शायद मैंने गलत सुन लिया इसलिए मैंने उससे कहा " आपके पिताजी शांत हो गए ?, तो उसने हाँ में सर हिला दिया । थोड़ी देर बाद वो तो चला गया लेकिन मैं उधेड़बुन में डूबा रहा । मैं सोच रहा था कि क्यों और कैसे शांत हो गए होंगे उसके पिताजी । मेरे शब्दकोश में शांत होने का मतलब था खामोश हो जाना , और कोई यूँ अचानक खामोश कैसे हो सकता है ।
इतने में शाखा का दफ्तरी मेरे पास आया और उसने कहा " अभी जो आदमी आया था आपके पास , उसके घर चलना है हमको "। मेरे कारण पूछने पर उसने भी वही बताया " उसके पिताजी शांत हो गए हैं न , इसीलिए जाना जरुरी है "। अब मुझसे रहा नहीं गया और मैं पूछ बैठा " अरे अगर उसके पिताजी शांत हो गए हैं तो हम लोग जाकर क्या करेंगे ?
उसने बड़े आश्चर्य से मुझे देखा और बोला " अरे ऐसे में तो जाते ही हैं सब लोग , इसलिए हमें भी जाना चाहिए "।
मैंने अब अपनी शंका व्यक्त कर ही दी उससे " अरे भाई , अगर उसके पिताजी चुप हो गए हैं तो हम लोग जाकर वहाँ क्या करेंगे "।
अब दफ्तरी को बात समझ में आई और उसने बड़ी गंभीरता से मुझे समझाया " अरे जनाब , शांत हो जाने का मतलब होता है गुजर जाना "। अब बात मेरी भी समझ में आई और मैं काफी देर तक हँसता रहा अपनी सोच पर । लेकिन मुझे अपने शब्दकोश के लिए एक नया शब्द मिल गया ।

तोहफ़े --

" देखो श्यामू , ये सब गिफ्ट जिनके नाम लिखे हैं , उनके घर पर पहुँचा देना । तुम तो सबको जानते ही हो , और हाँ , एक बात का विशेष ख्याल रहे , कोई गड़बड़ नहीं होनी चाहिए ", साहब ने गिफ्ट्स और लिस्ट दोनों उसे पकड़ाया और केबिन में चले गए । कई लोग उनका इंतज़ार कर रहे थे , सबके हाथ में कोई ना कोई गिफ्ट था जो उनकी हैसियत और पड़ने वाले काम के हिसाब से था । 
श्यामू ने एक नज़र तोहफ़ों पर डाली और रिक्शे पर डालकर चल दिया । इतने शानदार गिफ्ट्स , काश वो भी एक ले सकता , उसने एक ठंडी साँस ली । चलते चलते वो सोचने लगा कि ये नए साहब अच्छे हैं , कम से कम उसे इस लायक तो समझते हैं , पुराने वाले तो तोहफ़ों के पास भी नहीं फटकने देते थे । काफी देर हो गयी थी बांटते हुए और उसका घर भी पास आ गया था तो उसने सोचा कि बाकी तोहफ़े कल बाँट देगा और घर आ गया ।
उसके बेटे ने गिफ्ट देखते ही उसे खोल दिया , उसे लगा कि शायद अपने लिए ही है । अभी वो उसे पूरा देख भी पाता कि एक जोरदार थप्पड़ खाकर वो नीचे गिर गया । रोते हुए वो तो वहाँ से भाग ही गया , लेकिन श्यामू भी तोहफ़े को वापस पैक करते हुए अपनी बेबसी पर रो पड़ा । दूसरी तरफ साहब के घर में उनकी पत्नी और बच्चों ने कई गिफ्ट बेकार कहकर फेंक दिया था ।

तृप्ति--

धरा बहुत उदास थी , आकाश से उसकी उदासी देखी नहीं गयी | उसने धरा से उदासी का कारण पूछा तो धरा ने अपने प्यासे और दरार भरे शरीर की ओर इशारा कर दिया और फिर से मायूस हो गयी |
" इसमें तुम्हारा क्या दोष है , अब अगर इंसान इतना भी नहीं समझता तो तुम क्या कर सकती हो "| 
" मुझे दुःख इस बात का नहीं है कि इंसान प्रगति की आड़ में अपने लिए अन्धकार ला रहा है , दुःख तो होता है मासूम बच्चों को देखकर | कैसे बैठा पाएंगे वो सामंजस्य आने वाली विषम परिस्थिति से ?" 
तभी आकाश की नज़र एक नन्हे से बच्चे पर पड़ी जो धरा में बने दरारों में मिटटी भरने की कोशिश कर रहा था | वो मुस्कुराया और धरा पर पानी बरसाने लगा | धीरे धीरे धरा को तृप्ति की अनुभूति होने लगी |

संकल्प--

पूरी रात सो नहीं पायी थी वो, बहुत कठिन मोड़ पर ला खड़ा किया था ज़िन्दगी ने। बहुत सी जिम्मेदारियाँ थीं जिनका निर्वाह करना बाक़ी था और अपने संस्कार भी थे जिनसे दूर होना एक तरह से उसकी आत्मा की मौत थी। एक बार फिर मैसेज का टोन बजा फोन में और वो वर्तमान में आ गयी। हिम्मत नहीं पड़ रही थी फोन देखने की, उसे पता था कि मैसेज या तो बहन का होगा या बॉस का और दोनों ही स्थितियों के लिए वो निर्णय नहीं कर पायी थी।
कई दिनों से वो दोनों को टाल रही थी, जब भी बहन का मैसेज आता तो कमज़ोर पड़ने लगती थी। घर के एकलौते कमाऊ सदस्य होने के चलते उसकी पढ़ाई लिखाई की जिम्मेदारी उसको उठाना अपना कर्तव्य लगता लेकिन कहाँ से करे इंतज़ाम। बड़ी मुश्किल से थोड़े पैसे बचते थे जिसे वो बिला नागा घर भेज देती थी, लेकिन घर वालों को, या तो उसकी हालत का इल्म ही नहीं था, या वो यक़ीन नहीं करना चाहते थे। बॉस उसे व्यवहारिक बनने की सलाह देता और साथ ही साथ उसकी समस्याओं के हल का आश्वासन भी।
आख़िरकार उसने फोन उठाया, मैसेज बहन का ही था और दो दिन में ही पैसे भेजने के लिए लिखा था। वो फिर से कमज़ोर पड़ने लगी और उसे लगने लगा कि अब दोनों को ही हाँ बोलने के सिवा कोई चारा नहीं बचा था। अचानक उसकी नज़र सिरहाने रखी पिता के तस्वीर पर पड़ी और उसे उनके आखिरी समय में लिया गया संकल्प याद आ गया कि जिम्मेदारियाँ जरूर उठाना लेकिन अपने संस्कारों और इच्छाओं की कीमत पर नहीं।
उसने अपना पहला संकल्प पूरा करते हुए दोनों को हाँ का जवाब भेज दिया और फोन रखते हुए उसने पिता की तस्वीर उल्टी कर दी।

बदलाव --

घर की तरफ जाते हुए दिमाग भन्नाया हुआ था उसका, आज तो सीमा पार हो गयी। सहने की भी कोई सीमा होती है, अब और नहीं सहेगा और जैसे भी हो, बदला जरूर लेगा इस अपमान का। सोचते सोचते उसने मोबाइल निकाला और अपने उस दोस्त को फोन लगाया जिससे सामान्य हालात में वो बात भी नहीं करता।
" कुछ जरुरी काम है , तुम्हारी मदद चाहिए , कल बात करूँगा", कहकर उसने फोन जेब में रखा और कल की योजना उसके दिमाग में चलने लगी।
इसी उधेड़ बुन में कब घर पहुँच गया, पता ही नहीं चला उसको। घर में घुसते ही उसकाकुत्ता दौड़ कर आया और उसके हाथ को चाटते हुए उसके ऊपर चढ़ने लगा। बहुत बार उसने उसको हटाया लेकिन वो उसके आस पास ही घूमता रहा। आखिरकार वो सोफे पर बैठा और कुत्ता उसके गोद में चढ़कर उसके मुँह को चाटने का प्रयास करने लगा।
कुछ मिनटों में ही उसका गुस्सा काफ़ूर हो चुका था, अब उसका मन प्रसन्न था और उसके दिमाग में प्यार उमड़ रहा था। उसे अंदर से कुछ ग्लानि महसूस होने लगी और उसने फोन उठाया और अपने दोस्त को कल के काम को रद्द होने का मैसेज भेज दिया।
अब उसे बहुत हल्का महसूस ह रहा था, कुत्ता अभी भी उसके गोद में खेल रहा था।

जिजीविषा--

" अरे , उस ग्रह का तो चित्र ही कुछ अलग रंग का दिख रहा है अब, पहले तो बिलकुल भूरा भूरा दिखता था सब ", एक प्राणी ने चिल्लाकर कहा।
" हाँ, अब तो इसका रंग हरा हो गया है, कैसे ये चमत्कार हो गया " दूसरा प्राणी भी आश्चर्यचकित था उस ग्रह को देखते हुए।
इस ग्रह के सभी प्राणी भागते हुए अपने गुरु के द्वार पर पहुंचे और घबराये हुए शब्दों में उन्होंने सारा हाल सुना डाला।
" अब क्या होगा गुरुदेव, अब हमारा उस ग्रह पर बसने का स्वप्न कैसे पूरा होगा, अब तो लगता है वहाँ जीवन के लक्षण फिर पनप रहे हैं "।
" दरअसल उस ग्रह का जो मानव नामका दोपाया प्राणी है, वो हमारे समझ के बाहर है। हमें लगा था कि वो अपना विनाश करके ही मानेगा लेकिन उसी में से कुछ लोगों की जिजीविषा ने वापस हरियाली पैदा कर दी। अब हमें कुछ और सहस्त्र वर्ष इंतज़ार करना होगा वहाँ बसने के लिए ", गुरूजी ने गम्भीरता से कहा|
इस ग्रह के प्राणी हैरान परेशान अपने अपने कार्य में लग गए और गुरूजी वापस कुछ नयी तरकीब सोचने में व्यस्त हो गए।

मानवता--

ख़बर जंगल की आग की तरह फ़ैल गयी और कुछ ही देर में लोगों की भीड़ जुट गयी। कुछ घटनाओँ के चलते कुछ दिनों से माहौल तनावपूर्ण चल रहा था। लोग क़यास लगा रहे थे, कोई इस धर्म का बताता, कोई उस धर्म का। सड़क के किनारे बेहोश पड़े उस आदमी के बदन से खून बहकर सूख चला था लेकिन किसी को इसकी परवाह नहीं थी कि उसे उठाकर हस्पताल पहुँचाये।
" ये हमारे मज़हब पर हो रहे हमले का ताज़ा उदाहरण है, हम चुप नहीं बैठेंगे ", एक नेतानुमा सज्जन ने माहौल का रुख भाँप कर तीर चलाया।
" नहीं, ये उस धर्म के लोगों का काम है और उन्होंने अपनी आदत के अनुसार ये कायराना हरक़त की है", दूसरे सज्जन की आवाज़ थोड़ी और तेज थी।
थोड़ी देर में ही आवाज़ें शोर में और फिर ललकार में बदल गयीं। उस घायल को होश आ गया था लेकिन उसकी पानी पिलाने की विनती को सुनने वाला किसी भी मज़हब का इंसान वहाँ नहीं था।

बदलते रिश्ते--

हर मिनट पर उसके विचार बदल रहे थे, कभी बेहद प्यार आता तो कभी नफरत सी होने लगती। था तो वो उसके शरीर का हिस्सा ही और अपने ही बच्चे से वो नफ़रत कैसे कर सकती थी। इन सबसे बेखबर बच्चा बगल में लेटा हुआ था, अभी कुछ ही घंटे तो हुए थे उसे इस दुनियाँ में आये हुए।
उसे वो काला दिन बार बार याद आने लगा जब उसकी अस्मत लूटी गयी थी। जब तक वो इस सदमे से बाहर निकलती, उसके गर्भ में ये बच्चा आ चुका था। सभी लोगों की राय इसे ख़त्म कर देने की थी लेकिन उसे लगा कि इसमें उस अजन्मे की क्या गलती है। उसके इस विचार का उसके सबसे अच्छे दोस्त ने जो अब उसका मंगेतर था, समर्थन किया था। बहुत वाह वाह हुई थी उसके दोस्त के फैसले की उस समय और कुछ दिन तक तो वो बराबर उसको हौसला देता रहा कि तुम्हारी या इस बच्चे की क्या गलती है इसमें, उसे इस दुनिया में आना ही चाहिए| वक़्त बीतता गया और उसे अब ये एहसास होने लगा था कि उसका मंगेतर अब बच्चे के जिक्र पर अक्सर खामोश रह जाया करता था| एकाध बार उसने पूछा भी लेकिन उसने बात टाल दिया, लेकिन फ़र्क़ साफ़ साफ़ दिख रहा था| वो भी समझ रही थी कि शुरू की वाह वाह अब अपना वज़न खो चुकी है और अब उसके मंगेतर को ये बच्चा बोझ लगने लगा है| अब उसे कोई एक रास्ता चुनना था, लेकिन दोनों ही रास्ते बेहद कठिन थे| और एक दिन उसे पता चल गया कि उसका मंगेतर किसी और लड़की के साथ घूम रहा है| शायद उसके नसीब में अकेली माँ बनना ही लिखा था|
अचानक बच्चे के रोने से उसका ध्यान टूटा और उसको उठाकर उसने अपने सीने से लगा लिया। जैसे जैसे बच्चे के गले से दूध की धार नीचे उतरने लगी, उसका ममत्व भी उसके नफ़रत पर भारी पड़ने लगा। अब उसने इस बच्चे के लिए अपनी जिंदगी अकेले जीने का फैसला ले लिए था|

स्टोरी-


खबर बहुत भयानक थी, लोग भूख के चलते कुछ भी खाने या कुछ नहीं खाने को मजबूर थे। चैनल प्रबन्धक ने उसे तुरंत वहाँ जाकर कुछ सनसनीखेज ख़बर लाने को कहा और उसके साथ कैमरा मैन और कुछ सहयोगी भी जाने को तैयार हो गए। सबने खाने पीने के लिए काफी सामान रख लिया था, वज़ह साफ़ थी कि पता नहीं वहां खाने को कुछ मिलेगा भी या नहीं। 
जैसे जैसे उनकी कार उस गाँव के नज़दीक पहुँच रही थी, वैसे वैसे उनको सिर्फ सूनी, धूल उड़ाती सड़कें, सूखे खेत और कहीं कहीं कुछ कमज़ोर पशु नज़र आ रहे थे। गाँव पहुंचकर उन्होंने घर घर जाकर लोगों से भूख और सूखे के बारे में पूछना शुरू किया। जितना उसने सोचा था उससे कहीं बहुत ज्यादा भयावह स्थिति थी वहाँ की, गाँव में सिर्फ महिलाएं और बच्चे ही बचे थे। अधिकांश मर्द गाँव छोड़कर रोज़गार की तलाश में बाहर चले गए थे। गर्मी बहुत थी और वो बार बार लायी हुई मिनरल वाटर की बोतल खाली कर रही थी। लगभग तीन घंटे में उसने काफी लोगों से बातचीत की और एक बढ़िया स्टोरी तैयार थी। उसने फोन निकाला और हँसते हुए बॉस को भूख के सजीव चित्रण की स्टोरी के बारे में बताया। अब उन सब को भी भूख लग चुकी थी और उन्होंने एक पेड़ के नीचे चटाई बिछायी और खाने का सामान निकालकर बैठ गए। 
अभी उसने खाने के लिए पहला कौर उठाया ही था कि उसकी नज़र थोड़ी दूर खड़े कुछ बच्चों पर पड़ी। उनका मुँह खुला हुआ था और लग रहा था जैसे वो सब उसके साथ साथ खाना खाने वाले थे। उसने एक कौर मुँह में डाला और देखा कि बच्चे भी उसके साथ मुँह चला रहे थे, मानो वो सब भी दूर से ही खाने का स्वाद लेने का प्रयास कर रहे थे। जिंदगी में पहली बार उसे खाना इतना मुश्किल लग रहा था, ऐसा लग रहा था जैसे वो उन बच्चों का निवाला छीन कर खा रही हो। एक बार और उसने उन बच्चों की तरफ देखा और फिर उसने अपना सारा खाने का सामान उठाया और बच्चों की तरफ चल दी। 
बच्चों को पास बैठाकर उसने उन्हें खिलाना शुरू कर दिया| बच्चे इतनी प्रसन्नता से खाना खा रहे थे कि उसकी आत्मा भी तृप्त हो गयी। ये देखकर उसके बाकी साथी भी अब अपना खाना लेकर बच्चों की तरफ आ गए। एक तरफ बच्चे भर पेट खाना खा रहे थे , दूसरी तरफ ये सब उनके कैमरे में दर्ज हो रहा था। अब ये स्टोरी उसे पूरे समाज को दिखानी थी और बताना था कि ऐसे क्षेत्र में सिर्फ स्टोरी बनाने के लिए नहीं , बल्कि उन्हें मदद पहुँचाने के लिए जाने की जरुरत है। आज उसे पहली बार अपने प्रोफेशन पर गर्व हो रहा था और साथ ही साथ उसकी पूरी टीम को ज्यादा खाना और पैसा साथ नहीं लाने का अफ़सोस हो रहा था।

Thursday, November 12, 2015

छुटकारा--

दीवाली आ रही थी और रधिया फिर चिंतित थी | वज़ह थी जुआ जो कहने के लिए तो सिर्फ एक सगुन था लेकिन उसके घर का तो सत्यानास हो जाता था | सुमेरवा दीवाली के तीन दिन पहिले से ही गायब हो जाता था जुआ के चक्कर में | दिन दिन भर खाने पीने की सुध भी नहीं रहती थी उसको | पहले तो बड़ी मुश्किल से खोज कर लाती थी उसको , लेकिन थोड़ी ही देर में फिर गायब हो जाता था | घर का सारा काम , सफाई और बच्चों की फ़रमाईश , सब उसके अकेले के सर पर आ जाता था | पिछली बार तो भरी महफ़िल में उसने उसका ताश ही फाड़ दिया था , बहुत हंगामा मचा था वहाँ | घर आके सुमेरवा ने खूब पीटा था उसको लेकिन इस साल फिर वही हाल | हाँ , इस बार सारे जुआरियों ने काफी सुरक्षित जगह ढूँढ ली थी जहाँ जल्दी कोई और न पहुँच सके |
ये जुआरी भी पता नहीं कैसे बिना खाए पिए लगे रहते हैं इसमें | एक एक रुपये का हिसाब रखते हैं खेल में और मज़ाल की कोई बेईमानी कर जाए | पत्ते देखने का ढंग तो बिलकुल निराला , इस तरह से देखते हैं कि कभी कभी आश्चर्य होता कि वो देख भी पाते हैं या नहीं | एक पट्टी तो खुली रहती है , दूसरी को बिलकुल ज़रा सा खोलना , इतना कि बस ये पता चले कि उसका रंग क्या है | फिर थोड़ा और खोलना जिससे पता चले कि ये है क्या , साथ में ये भी कि कोई और किसी भी हालत में देखने न पाये | अगर खुदा न खास्ता दो पत्ते बढ़िया निकल गए तो तीसरा इतनी देर में देखते हैं , मानो देर लगाने से तीसरा पत्ता बाकी दोनों के जैसा ही हो जाएगा | मजे की बात ये कि वैसे चाहे जितना पैसा उड़ा दें लेकिन जुए में जीता हुआ एक भी रुपया कोई ले ले . ऐसा हो ही नहीं सकता | जितने खेलने वाले , उतने ही देखने वाले भी और कई अपनी बारी का इंतज़ार करते हुए कि कब कोई उठे और वो कब्ज़ा जमायें उसकी गद्दी पर | नींद , थकान सब गायब , बस एक ही धुन कि कैसे जीतें इसमें | ये सारे जुआरी साल के ३६० दिनों में एक आम इंसान की तरह ही वर्ताव करते हैं लेकिन इन तीन चार दिनों में एक अजीब सा बदलाव आ जाता है इनमें और ये सुपरमैन जैसे हो जाते हैं | 
आज फिर रात होते ही धीरे से निकल गया वो , रधिया को बाद में पता चला | सुबह कुछ पता नहीं था उसका , रधिया घर की सफाई में लग गयी | बच्चे भी पटाखे और मिठाईयों के लिए जिद करने लगे और वो उनको कल के लिए बहला रही थी | पैसे तो सारे सुमेरवा ले के चला गया था और उसको ढूँढना आसान नहीं था | चिंता में पड़ी थी कि कैसे करे दीवाली पर सारे इंतज़ाम , इतने में पड़ोस की रज्जो आ गयी | दोनों के दुःख साझा ही थे , दोनों घरों से मर्द गायब और सारा जिम्मा उनके सर | साथ बैठकर वो दोनों सोचने लगीं कि कैसे मनाई जाए दीवाली और कैसे मिले इस तकलीफ से छुटकारा | सोचते सोचते दोनों एक विचार पर पहुंची , इस बार किसी भी तरह से पता लगाया जाये इनके अड्डे का और उसे हमेशा के लिए ख़त्म किया जाए |
रज्जो ने जिम्मा लिया अड्डे का पता लगाने का और फिर उन्होंने तंय किया कि दोनों कुछ और औरतों को भी साथ लेंगी और फिर उस अड्डे पर छापेमारी करेंगी | शाम होते होते अड्डे का पता चल गया , क्योंकि कुछ मर्द जल्दी वापस आ जाते थे ताकि खा पीकर फिर जा सकें | अधिकांश महिलाएं इसके लिए सहमत हो गयीं और उन्होंने आपस में गुफ्तगू करके फैसला किया कि आज रात में ही सब वहाँ इकट्ठे चलेंगी और अपना ताश भी लेकर जाएँगी | अगर उन्होंने बंद नहीं किया तो वो सब भी वहीँ महफ़िल जमाएंगी और जब तक जुआ बंद नहीं होगा , वो सब भी जुआ खेलती रहेंगी |
रात में जब बच्चे सो गए तो रधिया और रज्जो के साथ महिला मण्डली निकल गयी अड्डे की ओर | गाँव से बाहर एक झोपडी में सब जुटे थे जुए में और खूब हो हल्ला मच रहा था | जितने लोग खेलने वाले , उतने ही देखने वाले भी थे और जो जीता उसके चेहरे पर वो विजयी मुस्कान खिल जाती थी , मानों उसे राज पाट मिल गया हो | अचानक महिलाओं को देखकर उनके चेहरे फक्क पड़ गए , लगभग सबके घर की महिलाएं आई हुई थीं | उनमे से कुछ लोगों ने तो अपनी बीबियों पर चिल्लाना शुरू कर दिया कि शायद वो सब चली जाएँ लेकिन कोई भी टस से मस नहीं हुई | अब एक ही चारा बचा था उनके सामने कि वो सब जुआ बंद करें और घर वापस चलें | जलती निगाहों से घूरते हुए सारे पुरुष उठे और घर की ओर चल पड़े | अब रधिया के कदम बड़े सुकून के साथ अपने घर की ओर चल पड़े , उसे पता था कि इस बार दिवाली पर उसे सब कुछ अकेले ही नहीं करना पड़ेगा और बच्चों के लिए पटाखे , मिठाई का इंतज़ाम भी हो जायेगा |   

लत--

दीवाली आ रही थी और रधिया फिर चिंतित थी | वज़ह थी जुआ जो कहने के लिए तो सिर्फ एक सगुन था लेकिन उसके घर का तो सत्यानास हो जाता था | सुमेरवा दीवाली के तीन दिन पहिले से ही गायब हो जाता था जुआ के चक्कर में | दिन दिन भर खाने पीने की सुध भी नहीं रहती थी उसको | पहले तो बड़ी मुश्किल से खोज कर लाती थी उसको , लेकिन थोड़ी ही देर में फिर गायब हो जाता था | घर का सारा काम , सफाई और बच्चों की फ़रमाईश , सब उसके अकेले के सर पर आ जाता था | पिछली बार तो भरी महफ़िल में उसने उसका ताश ही फाड़ दिया था , बहुत हंगामा मचा था वहाँ | घर आके सुमेरवा ने खूब पीटा था उसको लेकिन इस साल फिर वही हाल | हाँ , इस बार सारे जुआरियों ने काफी सुरक्षित जगह ढूँढ ली थी जहाँ जल्दी कोई और न पहुँच सके | 
ये जुआरी भी पता नहीं कैसे बिना खाए पिए लगे रहते हैं इसमें | एक एक रुपये का हिसाब रखते हैं खेल में और मज़ाल की कोई बेईमानी कर जाए | पत्ते देखने का ढंग तो बिलकुल निराला , इस तरह से देखते हैं कि कभी कभी आश्चर्य होता कि वो देख भी पाते हैं या नहीं | एक पट्टी तो खुली रहती है , दूसरी को बिलकुल ज़रा सा खोलना , इतना कि बस ये पता चले कि उसका रंग क्या है | फिर थोड़ा और खोलना जिससे पता चले कि ये है क्या , साथ में ये भी कि कोई और किसी भी हालत में देखने न पाये | अगर खुदा न खास्ता दो पत्ते बढ़िया निकल गए तो तीसरा इतनी देर में और इतनी चोरी से देखते हैं , गोया देर लगाने से तीसरा पत्ता बाकी दोनों के जैसा ही हो जाएगा | मजे की बात ये कि वैसे चाहे जितना पैसा उड़ा दें लेकिन जुए में जीता हुआ एक भी रुपया कोई ले ले . ऐसा हो ही नहीं सकता | जितने खेलने वाले , उतने ही देखने वाले भी और कई अपनी बारी का इंतज़ार करते हुए कि कब कोई उठे और वो कब्ज़ा जमायें उसकी गद्दी पर | नींद , थकान सब गायब , बस एक ही धुन कि कैसे जीतें इसमें | ये सारे जुआरी साल के ३६० दिनों में एक आम इंसान की तरह ही वर्ताव करते हैं लेकिन इन तीन चार दिनों में एक अजीब सा बदलाव आ जाता है इनमें और ये सुपरमैन जैसे हो जाते हैं | 
रधिया इन्ही विचारों में डूब उतरा रही थी कि उसकी पड़ोसन रज्जो आ गयी | रज्जो और उसका सुख तो साझा था ही , दुःख भी साझा था | उसका पति भी जुए के चक्कर में गायब था और वो भी इसी उधेड़बुन में थी कि कैसे किया जाए त्यौहार का इंतज़ाम | जब कुछ समाधान नहीं सुझा तो उन्होंने तंय किया कि किसी भी तरह से जुए की जगह का पता लगाया जाए और एक बार फिर पत्तों को फाड़ा जाये | मुसीबत तो ऐसे भी है और वैसे भी , लेकिन कुछ तो करना होगा बच्चों के लिए | शाम होते होते जुआ के अड्डे का पता चल गया और दोनों ने वहां चलने का निर्णय कर लिया | बच्चों को भी साथ लेकर दोनों चल पड़ी कि शायद बच्चों के चलते वो लोग मान जाएँ | 
अड्डे पर जैसे ही वो दोनों पहुंचीं , सुमेरवा और रज्जो का आदमी दंग रह गए | बच्चों के चलते दोनों मज़बूरी में कुछ ज्यादा नहीं बोल पाये और बेमन से उठ कर चल दिए | रास्ते भर उन्होंने अपने परिवार को दिलासा दिया कि अब वो लोग नहीं खेलने जायेंगे और त्यौहार के लिए कुछ पैसे कमाने की जुगत करेंगे | रधिया के कदम तो जैसे जमीन पर ही नहीं पड़ रहे थे , इतनी आसानी से हो जायेगा सब , ये उसकी सोच से परे था | घर आकर खा पीकर दोनों सो गए |
सुबह मुंह अँधेरे ही रधिया की नींद खुली , सुमेरवा गायब था | पहले तो उसने सोचा कि दिशा मैदान गया होगा लेकिन थोड़ी ही देर में उसे यक़ीन हो गया कि फिर से सुमेरवा जुए के अड्डे पर पहुँच गया | वो दुःख और निराशा में अपने सर पर हाँथ रखकर बैठ गयी और उसकी आँखों से आंसू बह निकले | 

Sunday, November 8, 2015

बदहाली--

" दिवाली का स्वरुप बदल गया है अब , जहाँ देखो बिजली की झालरें और पटाखे । मिटटी के दिए तो अब कोई जलाना ही नहीं चाहता ", शर्माजी ने एक ठंडी साँस लेते हुए कहा और बाज़ार चल दिए । वो भी उनके साथ चल दिया , रास्ते में भी कुटीर उद्योगों के बेहतरी के बारे में ही बातें करते रहे दोनों और शर्माजी की चिंता ने उसे भी गहरे तक प्रभावित कर दिया था । 
" अरे कैसे दे रहे हो दिए ", अचानक उस बालक को दिए बेचते देखकर उसने पूछा और फिर जरुरत से कुछ ज्यादा ही दिए ले लिए उसने । अभी तक उसके जेहन में शर्माजी से हुई बातचीत ताज़ा थी । दिए लेकर वो मुड़ा तो शर्माजी नहीं थे वहां पर , वो सड़क के उस पार की दुकान से झालरें खरीद रहे थे । 
अब उसे कुटीर उद्योगों की बदहाली की वज़ह पता चल गयी थी ।

Friday, November 6, 2015

मंज़िल --

बदलेगी सूरत , जरा बदल के तो देखो
मंज़िल है क़रीब , साथ चल के तो देखो
क्या हुआ इस क़ौम को , कुछ खबर नहीं
जिन्दा है उम्मीद , पहल कर के तो देखो
कितने हैं मुआमले , और हर कोई मसरूफ़
मुश्किल नहीं है मगर , हल कर के तो देखो
बदलेगी सूरत , जरा बदल के तो देखो
मंज़िल है क़रीब , साथ चल के तो देखो !!

मोहब्बत--

बिगड़े हैं हालात अगरचे , फिर भी मुस्कुराते हैं
एक मोहब्बत का दीपक , आओ हम जलाते हैं
बना के हमको मोहरें , चाल चल रहे दूजे
वक़्त ने ली अब करवट , अदाकार बन जाते हैं
नफ़रत , हिंसा , ईर्ष्या , दिखतें हैं हर ओर
भाईचारा और प्यार का , इक बाजार बनाते हैं
बिगड़े हैं हालात अगरचे , फिर भी मुस्कुराते हैं
एक मोहब्बत का दीपक , आओ हम जलाते हैं !!

मुझ जैसा--

कहा था जो कभी , क्यूँ खो रहा है तू
अब देख मुझ जैसा ही , हो रहा है तू
दिखाता है अपने चेहरे पर खुशियाँ
पता है पर अन्दर से , रो रहा है तू
निकला था तनहा , तलाशने मंज़िल
अब जहाँ की भीड़ में , खो रहा है तू
कहा था जो कभी , क्यूँ खो रहा है तू
अब देख मुझ जैसा ही , हो रहा है तू !!

फ़िक्र--

फ़िक्र नहीं अगर ,जहाँ में खो जायेंगे
यादों में आपकी , हौले से सो जायेंगे
चाहा बहुत कि बदलूँ , वक़्त के साथ
अब यक़ीं हुआ है , आप से हो जायेंगे
छल फरेब भरा है , जहाँ नज़र डालिये
हम ज़मीं पे प्यार के , बीज बो जायेंगे
फ़िक्र नहीं अगर ,जहाँ में खो जायेंगे
यादों में आपकी , हौले से सो जायेंगे !!

सुकून--

बाखुदा सुकून तो , पाया होता
उनको गर न आजमाया होता
समझता रवायतें , ज़माने की
किसी अदीब ने समझाया होता
कहाँ सुलझे हैं , इश्क़ के मसले
जानते तो वक़्त न जाया होता
ताउम्र दिल का क्यूँ यक़ीन किया
वर्ना , धोखा तो न खाया होता
बाखुदा सुकून तो , पाया होता
उनको गर न आजमाया होता !!

नफरत--

गोया चेहरे पर नफरत , हजार रखिए,
जनाब दिल में पर , थोड़ा सा प्यार रखिए
मिल ही जाता है , तख्तो ताज़ जहाँ में
मुक़द्दर पर अपने , जरा ऐतबार रखिये
आसाँ नहीं है बहुत , दूरी बना के रखना
कभी अपनों के बीच , मत दीवार रखिये
करिए क्यूँ दुश्मनी , निभाइये बस दोस्ती
आस्तीन में कभी , मत तलवार रखिये
गोया चेहरे पर नफरत , हजार रखिए,
जनाब दिल में पर , थोड़ा प्यार रखिए !!

ठोकरें--

मिली ठोकरें बहुत , पर शिक़ायत नहीं की
दूर होते गए सब , पर शिक़ायत नहीं की
लगाये थे जिंदगी में , दरख़्त बहुत से
तरसे छाँव को बहुत , पर शिक़ायत नहीं की
जिससे भी मिले हम , बस खोल दिया दिल
रिसते हैं सभी जख़्म , पर शिक़ायत नहीं की
अहज़ान के गहरे अब्र , छाये थे उम्र भर
किया सिर्फ़ हमने अत्फ़ , पर शिक़ायत नहीं की
मिली ठोकरें बहुत , पर शिक़ायत नहीं की
दूर होते गए सब , पर शिक़ायत नहीं की !!

आबाद--

हैं बहुत आबाद , लेकिन खाक़ होते जायेंगे
खुश रहेंगे हम , यक़ीनन लोग रोते जायेंगे
क्या कहें दस्तूर अज़ब है , ज़माने का
जितना चाहे आप जोड़ो , लोग खोते जायेंगे
लाख चाहें वो सुकूँ , अज़ाब पाएंगे यहाँ
राह में अहज़ान के जो बीज बोते जायेंगे
बेख़याली में भी जिनको भूल ना पाये कभी
अश्क़ से वो आज दामन को भिगोते जायेंगे
हैं बहुत आबाद , लेकिन खाक़ होते जायेंगे
खुश रहेंगे हम , यक़ीनन लोग रोते जायेंगे !!

जिंदगी--

हुआ दर्द , फिर भी भुलाते रहे 
युहीं जिंदगी , हम बिताते रहे 
भर आई थीं आँखें , हमारी मगर 
ये सरगम उन्हें हम , सुनाते रहे 
नहीं रक्खी अपनों ने रिश्तों की लाज 
हम उनको ही दिल से , निभाते रहे
पलट के भी देखा नहीं उम्र भर
बड़े प्यार से हम , बुलाते रहे
थे हम बेतक़ल्लुफ़ जहाँ जाम से
वहीँ वो नज़र से , पिलाते रहे
वो दावे कि थामेंगे दामन कभी
ये ऐतबार अश्कों में , गिराते रहे
हुआ दर्द , फिर भी भुलाते रहे
युहीं जिंदगी , हम बिताते रहे !!

सलीक़ा--

वो जो ग़म में , मुस्कुराते हैं 
जीने का सलीक़ा , सिखाते हैं
ख़ामोश झेलते हैं , हरेक तूफां 
कश्तियाँ फिर भी पार लगाते हैं
लाते हैं मुस्कानें जो चेहरों पे 
ज़िन्दगी में सुकूं , वही पाते हैं
लाख़ बेदर्द है जहाँ , फ़िर भी
इश्क़ के फ़ूल , खिलखिलाते हैं
वो जो ग़म में , मुस्कुराते हैं
जीने का सलीक़ा , सिखाते हैं !!

इंसान--

अगर दुनियाँ में बस इंसान होता
घरों में गीता ,और क़ुरआन होता
भुला देते वो गर , नफ़रत दिलों से
उनका जीना भी कुछ आसान होता
अगर वो मान लेते दोस्त हमको
यक़ीनन बस यही एहसान होता
अगर दुनियाँ में बस इंसान होता
घरों में गीता ,और क़ुरआन होता !!

बेटी--

माँ की ही गोद का एहसास दिलाती है
बेटी मुझे आजकल कुछ ऐसे सुलाती है
कल तक हम समझे , कि है वो छोटी
आज कहकर बेटा, मुझको खिलाती है
वज़ह थी जीने की , जब थी वो बच्ची
आज अपने प्यार से हमको जिलाती है
थी पहचान उसकी , कभी नाम से मेरे
दुनियां हमें उसके ही नाम से बुलाती है
माँ की ही गोद का एहसास दिलाती है
बेटी मुझे आजकल कुछ ऐसे सुलाती है !!

कूड़ा--

बजबजाते कूड़े का ढेर 
साफ़ करने के बाद 
पीठ टिकाता है वो
ओर सोचता है 
हो गया सब कुछ साफ़ 
पर ,क्या हो पायेगा साफ़
सदियों पुराना कूड़ा
जो भरा है
इंसान के मन में
क्या मान सकेगा
इंसान सब को बराबर
जरुरत तो है
मन को साफ़ करने की
कभी तो ऐसा होगा
फिर जरुरत नहीं रहेगी
उसकी इस समाज में !!

बोझ-

" अाप को क्या लगा कि मैं अाप को छोड़ दूँगा । अाप के गुनाहों का हिसाब अब अदालत में होगा, गिरफ्तार करो इनको "।
सुनते ही चेहरे पर हवाईयाँ छाने लगीं, अब तो बचना मुश्किल है | आखिर में बचने के लिए आखिरी हथियार भी इस्तेमाल कर दिया " तुम भूल रहे हो कि हम दोनों हम मज़हब हैं और ये काम हम ख़ुदा के लिए ही कर रहे हैं | क्या जवाब दोगे ख़ुदा को "।
" अाप जैसे लोगों की वजह से ही हमें दोहरी कीमत चुकानी पड़ रही है समाज में , पूरी कौम ही शक के घेरे में रहती है "।
गाड़ी स्टार्ट हुई अौर वो बढ़ गया अपने अाफिस की तरफ । एक सुकून था उसके चेहरे पर , मन का कुछ बोझ हल्का हो गया था ।

क़ुर्बानी--

पिछली दो रातों से अक़ील भाई की नींद गायब थी , त्यौहार सर पे था और वो फैसला नहीं कर पा रहे थे | इसी त्यौहार के दिन चार साल पहले उनके घर, तमाम मन्नतों के बाद बेटा पैदा हुआ था | चार बेटियों के बाद हुआ था इसलिए वो घरभर में सबको जान से प्यारा था | उसकी हर किलकारी पर सब लोग क़ुर्बान हो जाते थे और घर उसकी शैतानियों से गुलज़ार रहता था | 
पिछले साल इसी त्यौहार के आस पास उनकी बकरी ने भी एक बकरा जना था और वो भी उनके बेटे के साथ साथ बड़ा हो रहा था | दोनों इतना घुल मिल गए थे कि कभी कभी तो दोनों एक साथ ही सो भी जाते थे | पूरे घर में दोनों की धमाचौकड़ी मची रहती थी और ऐसा लगता था जैसे दोनों एक दूसरे की हर बात समझ जाते हों | वो बकरा भी मानों घर का ही सदस्य हो गया था |
जब तीन दिन पहले बातों बातों में ही उनके चचाजान ने जब कहा कि त्यौहार आ रहा है और इस बार क़ुर्बानी के लिए बकरा तो घर में ही मौजूद है तो पहली बार अक़ील भाई को झटका लगा | हर साल तो क़ुर्बानी देने के लिए बकरा ले आते थे और फिर जम के दावत मनाई जाती थी | सभी दोस्त और रिश्तेदारों को निमंत्रण भेज देते थे और लोग भी खाने के बाद तारीफ करते हुए जाते थे | लेकिन इस बार जैसे ही क़ुर्बानी की बात आई , उनको सदमा सा लगा | अपने इस बकरे को कैसे जिबह किया जायेगा , सोच कर ही उनका कलेजा मुँह को आ रहा था | कभी अगर उनके बेटे को खरोंच भी आ जाती तो उनकी आँखों में आंसू आ जाते थे और अब तो वो बकरा भी उनको अपने बेटे के समान लगने लगा था |
क़ुरआन मज़ीद को एक बार फिर से याद किया उन्होंने और सोच में पड़ गए | क़ुरबानी तो किसी अज़ीज़ की ही करनी चाहिए और यह प्राणी तो बीते साल में बेटे जैसा ही हो गया था उनके लिए , फिर क्या करें | लेकिन क्या वो अपने बेटे जैसे अज़ीज़ प्राणी की क़ुर्बानी दे सकते हैं | बहुत सोचा उन्होंने , फिर हिम्मत ने जवाब दे दिया | मन ही मन उन्होंने अपने गुनाहों की माफ़ी मांगी और क़ुर्बानी नहीं करने का इरादा करके ऑंखें बंद कर ली |

मंज़िल-

" में , में " की आवाज़ से उसका ध्यान सड़क पर गया । एक ठेले पर कई सारे बकरे , बकरियाँ लद कर जा रहे थे । उन्हें शायद आभास भी नहीं होगा , या शायद हो भी कि उनकी मंज़िल कहाँ है । 
ये देखकर उसके दिमाग में बड़े भाई के शब्द गूंजने लगे " पिताजी के बाद मैं ही हूँ , तुम्हारा भला सोचना मेरा काम है । पढ़ाई तक तो ठीक है लेकिन शादी तो उसी घर में होगी जहाँ मैंने सोचा है "। 
उसे भी अपनी मंज़िल का आभास नहीं था ।

व्यवसाय--

" इतना ज्यादा टर्नओवर है लेकिन मुनाफा तो बिलकुल भी नहीं होता आपको , कैसे चलाते हैं ये व्यवसाय आप "| कुटिल मुस्कराहट चेहरे पर बिखेरते हुए टैक्स इंस्पेक्टर ने कहा |
" आपको तो पता ही है कितना मुश्किल हो गया है व्यवसाय करना | लेबर , ट्रांसपोर्ट , बिजली , वेतन इत्यादि के बाद बचता ही कितना है , फिर ऊपर से टैक्स की दर भी कितना ज्यादा है ", जवाबी मुस्कराहट देते हुए उसने कहा | 
" ठीक है , फिर अपने रजिस्टर इत्यादि दिखा दीजिये हमें "| 
" पिछले साहब ने इतने लिए थे ", एक चिट पर कुछ लिख कर दिखाते हुए उसने कहा |
" आप को पता है न कि हम आपको रिश्वत देने के जुर्म में गिरफ्तार करवा सकते हैं | रजिस्टर मंगवाईए अपने ", इंस्पेक्टर की आवाज़ थोड़ी कड़क हो गयी|
" ठीक है , इस बार बढ़ा कर इतना कर देते हैं | चलिए थोड़ा नाश्ता हो जाए ", कनपटी पर चू आये पसीने को पोंछते हुए उन्होंने कहा |
" हम लोग भी समझते हैं , कितना मुश्किल है ईमानदारी से व्यवसाय करना | लेकिन अपने पेपर्स ठीक रखा कीजिये ", इंस्पेक्टर ने उनको समझाया और लिफ़ाफ़ा जेब में रख कर निकल गया |

प्रायश्चित--

पंडितजी आ गए थे, पूजा की तैयारी भी लगभग हो चुकी थी| विभिन्न तरह के पकवान सजा के रखे हुए थे और इन्ही से भोग लगना था पित्तरों को| सारा कार्यक्रम उन दोनों को ही करना था, बेटे ने आने से साफ़ इंकार कर दिया था| सास और ससुर की तस्वीर पर माला चढ़ा कर रत्ना ने पीछे देखा, रवि का पता नहीं था| उसने उनको पूरे घर में ढूँढ लिया, कहीं दिखाई नहीं पड़े| पंडितजी भी आवाज़ लगा रहे थे पूजा के लिए| 
अचानक उसे पीछे नौकरों के कमरे से रवि की आवाज़ आती सुनाई दी| उत्सुकता और झुँझलाहट दोनों हावी हो चुके थे उसपर, वो लपक कर उसी ओर बढ़ी| जैसे ही उसने अंदर प्रवेश किया, उसके कदम एकदम से जड़ हो गए| रवि बड़े प्रेम से नौकर के बूढ़े पिता को आग्रह करके घर में बने सारे पकवान खिला रहे थे| 
धीरे से उसने भी अपने हाँथ से एक मिठाई बुज़ुर्ग को खिला दी| उसके आँख से भी आंसू टपक गए, बहते हुए आंसू उनके पुराने कृत्यों का प्रायश्चित कर रहे थे|

समझ--

सुबह अखबार पढ़कर उसका खून खौल उठा | ये विधर्मी हमारे धर्म का सत्यनाश करने पर तुले हुए हैं , इनको सबक सिखाना जरुरी है | जिसे हम लोग माँ समान मानते हैं उसी की हत्या करना , अब बर्दाश्त नहीं किया जा सकता | लगातार इन्ही विचारों का मंथन चल रहा था उसके दिमाग में | 
" बेटा, मेरी आँख से बहुत कम दिखने लगा है आजकल , किसी डॉक्टर को दिखा लेते ", माँ की आवाज़ ने उसको जैसे ज़मीन पर ला पटका | पिछले कई हफ्ते से वो अपनी आँख के लिए कह रही थी और वो टालता जा रहा था | अचानक उसे अपने ऊपर शर्मिंदगी महसूस होने लगी कि ये क्या सोचने लगा है वो | 
" माँ , चलो तुमको आँख के डॉक्टर को दिखा देता हूँ | और आते समय एक बढ़िया सी साड़ी भी खरीद लेना अपने लिए ", कहते हुए वो उठ खड़ा हुआ | माँ ने उसकी ऑंखें खोल दी थीं , उसे इंसान और जानवर में फ़र्क़ समझ आ गया |

गौ सेवक--

बहुत मनोरम था सब कुछ उस गौशाले में । एक से बढ़कर एक नस्ल की गायें थीं वहाँ पर और उनके रहने और खाने का सुन्दर स्थल । पुरे जिले में कोई ऐसी गौशाला नहीं थी और उसके मालिक की बहुत प्रतिष्ठा थी । जिसे देखो वही उनके धर्मपरायणता के गुणगान करता रहता था । 
आज वो भी देखने चला आया था इसे । उसे भी विश्वास होने लगा था लोगों की बातों पर कि इसके मालिक जैसा गौसेवक और धर्मात्मा शायद ही कोई और होगा इस जिले में । जगह जगह हरा चारा रखा हुआ था , बहुत से लोग उसे काटने में व्यस्त थे | गायों के रहने के स्थान से थोड़ी दूरी पर खेत भी थे जहाँ पर फसलें लहलहा रही थीं | पूछने पर पता चला कि ये ऑर्गनिक फसल है जिसे गाय के गोबर और उनके मूत्र के इस्तेमाल से उगाया जाता है और इनकी बहुत माँग है आजकल | पूरे गौशाले का चक्कर लगाने में उसे काफी समय लग गया और फिर वो उनके कमरे में पहुंचा । लेकिन पूरा गौशाला देखने के बाद उसके दिमाग में एक बात खटक रही थी , उसे बड़ी मुश्किल से एकाध ही , मरियल सा बछवा दिखा और बूढ़ी गायें तो बिलकुल नहीं थीं । अधिकांश बछिया ही थीं वहां पर और वो सोच में पड़ गया था कि ऐसा कैसे हो सकता है कि यहाँ की गायें सिर्फ बछिया ही जनती हों और गायें बूढ़ी होने के बाद कहाँ चली जाती हैं ।
" नमस्कार , आप बहुत ही बड़े पुण्यात्मा हैं , गऊ माता की सेवा में तन मन धन से समर्पित हैं आप । आप जैसे लोगों से ही तो अपना धर्म सुरक्षित है वर्ना तो आजकल तो लोग सिर्फ अपना आर्थिक लाभ ही देखते हैं "।
" नमस्कार , बस आप सब लोगों का आशीर्वाद है । वैसे भी गऊ माता की सेवा में ही स्वर्ग है ", मुस्कुराते हुए उन्होंने बैठने के लिए कहा ।
" अच्छा , एक बात पूछना चाह रहा था । आपकी गौशाला में मुझे न तो बछवा नहीं दिखे , नहीं कोई बूढ़ी गाय , ऐसा कैसे संभव है "।
सवाल सुनकर तो एक बार वो चौंके , फिर उनके चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कराहट फ़ैल गयी । " दरअसल आपका सोचना सही है , यहाँ सिर्फ बछिया ही नहीं पैदा होती हैं , बछवा भी पैदा होते हैं । लेकिन उनका कोई उपयोग तो है नहीं तो कौन उनको पाले और उनपर खर्च करे । बस उनको हम लोग खाना पीना नहीं देते हैं और वो कुछ ही दिन बाद काल कलवित हो जाते हैं | और बूढ़ी गायों को तो हम लोगों को दान दे देते हैं जिससे उनको भी गौ पालन का सुख मिल जाए "|
ये सब बताते हुए उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी और उसे लग रहा था जैसे उसके सामने दूध का नहीं बल्कि खून का ग्लास रखा हो ।

नव जीवन--

आज इतिहास फिर अपने को दुहरा रहा था| जैसे ही बहू ने घबराते हुए बताया कि उसका बेटा नज़मा से शादी करना चाहता है, उनकी आँखों में २५ साल पहले का दृश्य घूम गया|
उस सुबह को भूलना उनके लिए आज भी संभव नहीं था जब उनका बेटा शहर से अपने साथ एक विजातीय लड़की को लेकर आया था| बहुत स्पष्ट शब्दों में उसने कहा था " बाबूजी , मुझे पता है कि ये शादी आप स्वीकार नहीं करेंगे, इसलिए हमने कोर्ट में शादी कर ली है और आपका आशीर्वाद लेने आये हैं "|
अंगारे बरसाती आँखों से उन्होंने उसकी तरफ देखा था और घर छोड़ देने का हुक्म सुना दिया था| दोनों वापस चले गए और इस सदमे से उनकी पत्नी ने बिस्तर पकड़ लिया|
कुछ ही सालों में उन्होंने अपनी पत्नी और बेटे दोनों को खो दिया और फिर बहू को पोते की वज़ह से अपने गाँव ले आये| समय के साथ अपने अंदर होते बदलाव को वो महसूस तो कर रहे थे लेकिन मन खुल कर मानने को तैयार नहीं था| आज की घटना ने उन्हें एक बार फिर आत्ममंथन पर मज़बूर कर दिया था| बेटे के बाद पोते को भी खोना, आगे नहीं सोच पाये|
" बहू, शादी की तैयारी शुरू कर दो, आखिर अपने घर में बहुत सालों बाद ऐसा अवसर आ रहा है "|
बहू ने उनकी तरफ आश्चर्य से देखा, वो अपना चेहरा दूसरी तरफ कर चुके थे|

आवाजें--

" इस लड़की को आप नहीं रख सकते कॉलेज में , हमारे बच्चों पर बुरा असर पड़ेगा ", अभिभावकों की भीड़ इकठ्ठा हो गयी थी कॉलेज के गेट पर और आवाज़ें बढ़ने लगी थीं । पिछले महीने ही कुछ दरिंदों ने उसकी अस्मत लूट ली थी और उस समय पूरा कॉलेज प्रशासन उसको निकालने के पक्ष में था लेकिन प्रिंसिपल अडिग थे अपने फैसले पर । 
" अगर यही हादसा आपके बच्ची के साथ हुआ होता तो भी आपलोग यही कहते । इस हादसे में उसका क्या कसूर था , यही न कि वो अपनी रक्षा खुद करने में असमर्थ थी । आप लोग देखना चाहेंगे कि वो क्या कर रही है यहाँ ", कहकर वो खेल के मैदान की तरफ चल पड़े । 
मैदान का दृश्य देखकर सबकी ऑंखें फटी रह गयी । वही लड़की जो कभी खुद की रक्षा नहीं कर पायी थी , आज बाकी लड़कियों को आत्मरक्षा का पाठ पढ़ा रही थी । एक बार फिर से आवाजें शुरू हो गयी थीं , लोगों की तालियों की ।

मज़बूत रिश्ते--

" आज हमारे घर आपकी दावत है भाईजान, शाम को इन्तज़ार करूँगा आपका ", इतना कहकर उसने फोन रख दिया और पत्नी से शाम की दावत के बारे में बात करके ऑफिस जाने की तैयारी करने लगा। आज वो पत्नी की उस शंका को गलत साबित करना चाहता था कि भाईजान उसके यहाँ खाना नहीं खाएँगे। धर्म अलग है तो क्या, उसने तो कितनी ही बार खाया है उनके यहाँ।
थोड़ी देर में फोन की घण्टी बजी, उधर से भाईजान थे।
" दर असल आज आपकी भाभी ने पहले से ही कहीं का कार्यक्रम बना रखा था, इसलिए आज तो नहीं आ पाएंगे, किसी और दिन जरूर आएंगे "।
" मैंने कहा था ना कि वो नहीं आएंगे, अब तो भरोसा हो गया मेरी बात का ", पत्नी का चेहरा उसका यक़ीन पुख्ता करता लग रहा था। वो सोच में पड़ गया, अब उसका भी भरोसा डगमगाने लगा था। भारी मन से वो ऑफिस जाने के लिए तैयार होने लगा।
एक बार फिर घण्टी बजी, इस बार भाभी थीं " हम लोग जरूर आएंगे शाम को, अभी आपके भाईजान ने मुझे बताया तो मैंने शाम का कार्यक्रम रद्द कर दिया। आप के यहाँ आने से जरुरी कोई भी कार्यक्रम नहीं है"।
उसने एक बार फिर पत्नी की तरफ़ देखा, पत्नी को रिश्तों की मज़बूती पर यक़ीन हो गया था।

जिन्दगी की शतरंज--

जिन्दगी की शतरंज--
सुबह तड़के उठकर वो घर से निकल गया , पत्नी और बच्ची सोये हुए थे। शहर में फैले तनाव की वज़ह से कल उसे कोई काम नहीं मिल पाया था और कल रात में जो बचा खुचा खाने का सामान था वो ख़त्म हो गया था। जल्दी जल्दी कदम बढ़ाते हुए वो आज सबसे पहले पहुँच जाना चाहता था ताकि आज तो काम मिल जाए और रात को परिवार को खाना खिला पाये। चुनावी पोस्टरों से अटी पड़ी सड़कें और गलियाँ उन जैसों के विकास की ही बात कर रही थी।
अब उजाला फ़ैल गया था और वो मज़दूर मंडी में सबसे पहले पहुँच गया था। अब इंतज़ार था तो ठेकेदारों का जो आकर ले जाएँ काम पर। ठेकेदार तो आये लेकिन वो कर्म के नहीं, धर्म के थे और कुछ ही देर में पुलिस की गाड़ियाँ सायरन बजाते घूमने लगीं। दंगे फ़ैल गए और कर्फ्यू का आदेश जारी हो गया था। घबराहट में वो भागा और गोलियों से बचते बचाते अपने घर सामने पहुँचा।
सामने जलते हुए अपने घर को देखकर वो गश खाकर गिर पड़ा। जिन्दगी की शतरंज ने शह और मात दोनों दे दी थी।

गिरगिट--

" अरे देखो तो , वो बुढ़िया के बाल बेचने वाला गिरा पड़ा है । चलकर पूछ लेते है कि क्या हुआ है "। 
" बिना बात के पचड़े में क्यूँ फँसना , कहीं मर वर गया होगा तो मुसीबत में फँस जायेंगे ", पत्नी को झिड़कते हुए राजू ने बाइक आगे बढ़ा दी ।। 
अपने ही मोहल्ले का लड़का था वो , जब भी घर की तरफ से निकलता था , बच्चे को यूँ ही पकड़ा देता था एक पैकेट । पैसे मिले या न मिले , हँसते हुए आगे बढ़ जाता । जब भी पैसे नहीं देने होते , अपने ही घर का बना देता था उसे राजू । वो भी उसे बहुत मानती थी और कभी कभी खाने पीने को कुछ दे देती थी । आज उसको यूँ छोड़ के आगे चल देना उसे दिल में कचोट रहा था । 
अचानक राजू ने बाइक रोकी और उसकी निगाह सड़क के किनारे वाले पेड़ पर बैठे गिरगिट पर चली गयी । उसे अपने पति के पीठ का रंग भी बदलता महसूस हो रहा था ।

हल--

सबके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ़ साफ़ दिख रही थी , चुनाव एकदम सर पर थे और कोई ठोस मुद्दा नहीं मिल रहा था उन लोगों को । कई प्रस्ताव दिए वहाँ मौजूद लोगों ने लेकिन सब सिरे से खारिज़ कर दिया रज्जब मियाँ ने । 
" काश , थोड़ा माहौल बिगाड़ पाते हम लोग तो हमारे पक्ष में लहर होती लेकिन अपने ही मोहल्ले के चचाजान सारा खेल ख़राब कर दे रहे हैं । अब उनको कौन समझाए की आज भाई चारा का समय नहीं रहा ", रज़्ज़ब मियाँ खौल रहे थे । 
" तो फिर क्या किया जाये , उनको समझाना तो नामुमकिन सी बात है । कुछ और सोचना होगा हमें "।
" समझा नहीं सकते तो क्या , खामोश तो कर सकते हैं न । और उनके शरीर को उन लोगों के इलाके में डाल देना , एक तीर से दो शिकार हो जायेंगे "।
अचानक वहाँ मौज़ूद लोगों के चेहरे तनावमुक्त नज़र आने लगे ।

पछतावा--

राज रोज ख़बरें आ रही थीं , फलाँ , फलाँ ने फलाँ पुरस्कार लौटाया और उसके बाद अखबार और टी वी पर उनकी फोटो और गर्मागर्म चर्चा | उनमें से कई लोगों का तो उन्होंने नाम भी नहीं सुना था , अब पता चला उनको कि इनको भी फलाँ पुरस्कार मिला था | चच्चा सोच रहे थे कि काश हमें भी मिला होता तो आज हम भी ! 
अचानक उनको याद आया और जल्दी जल्दी अलमारी खंगालने लगे कि इतने में चाची आ गयीं | 
" क्या ढूँढ रहे हो अलमारी में आज , कुछ हेरा गया है का ?
" अरे तुम नहीं समझोगी , एक ठो सर्टिफिकेट था पहले का , वही ढूँढ रहे थे | पता नहीं कहाँ चला गया "|
" अबहीं कुछ दिन पहिले ही कुछ रद्दी कबाड़ी को बेचा था इसमें से निकाल कर , कहीं उसी में तो नहीं चला गया ?
" रहोगी गँवार की गँवार ही , बिना पूछे काहें बेच दिया कबाड़ी को ", और चच्चा बिगड़ते हुए कबाड़ी के दुकान की ओर भागे |
" अरे सजीवन , हमरे घर से कुछ कबाड़ी लाये थे का ? चच्चा के सवाल पर सजीवन ने सर उठाया और थोड़ा सोच कर हाँ में सर हिला दिया |
" कहाँ रक्खे हो उसको , एक ठो बहुत जरुरी सर्टिफिकेट था उसमें | जरा खोज देते तो बहुत मेहरबानी होती ", चच्चा गिड़गिड़ाने लगे |
" देखो चच्चा , इहाँ जो कुछ आता है उ सब कहीं भी फेंका जाता है और फिर ट्रक में लाद कर बाहर भेज दिया जाता है | अब कहाँ ढूँढ पाएंगे उसको , वैसे था क्या उसमें चच्चा ?
चच्चा बिना जवाब दिए वापस चल दिए | कैसे बताते कि बाकी लोगों की तरह उनके मन में भी उस सर्टिफिकेट को वापस करके मशहूर होने की चाहत हिलोरें मार रही थी जो कभी उनको कविता पाठ के लिए मिला था |

Wednesday, September 30, 2015

गाँव के मंजर--

हमसे ये गाँव के मंजर नहीं देखे जाते
हो रहे खेत जो बंजर , नहीं देखे जाते
सुना था हुक्मरानों को , करेंगे गाँव की सेवा
छुपा था बातों में खंजर , नहीं देखे जाते
सिकुड़ती जा रही नदियाँ , नहीं हैं पानी के सोते
है बहता खूब समंदर , नहीं देखे जाते
जो होती थी कभी गुलज़ार , हमारे गांव की बस्ती
वहीँ उजड़े हुए अब घर , नहीं देखे जाते
हमसे ये गाँव के मंजर नहीं देखे जाते
हो रहे खेत जो बंजर , नहीं देखे जाते !!

Wednesday, September 23, 2015

हौसलों के गुब्बारे--

उस दिन बादल तो सुबह से ही घुमड़ रहे थे लेकिन बरसात शायद न हो सोचते हुए रग्घू निकल पड़ा था अपने रंगीन गुब्बारों और भेल के साथ | गुब्बारे क्या थे , वो तो रंगबिरंगे सपने बेचता था | वो सपने जो वो अपने बच्चों के लिए भी देखता था और जो बाक़ी बच्चे भी उसके गुब्बारे देखकर देखते थे | 
अचानक भगदड़ मच गयी समुद्र तट पर , भयानक ज्वार के चपेट में आकर कोई डूब रहा था और लोग चिल्ला रहे थे । रग्घू ने एक पल भी नहीं लगाया और गुब्बारों को हवा में छोड़ कूद गया उसे बचाने के लिए । पर लहरें तेज़ निकलीं और रग्घू भी उसके साथ समां गया समंदर में । 
अब लोगों को कभी कभी , भयानक ज्वार के समय , दूर समंदर के किनारे हांथों में गुब्बारे और दिल में हौसला लेकर खड़ा रग्घू दिख जाता है ।

आज़ादी की कीमत--

सिग्नल पर रुकते ही एक बच्चा झंडे लेकर आ गया | जल्दी से उसने कार का शीशा चढ़ाया और सर दूसरी तरफ घुमा लिया , लेकिन बच्चे ने शीशे पर दस्तक दी और उम्मीद भरी निगाहों से देखने लगा | 
पिज़्ज़ा खाती हुई बेटी ने कहा " पापा , ले लो न झण्डा , स्कूल में ले जाउंगी "| 
उसने बच्चे को आने का इशारा किया और २ झण्डा लेकर ५ का सिक्का उछाल दिया बच्चे की तरफ | बच्चा कुछ कहे उसके पहले ही सिग्नल हरा हो गया और उसने तुरंत कार आगे बढ़ा ली | उसने साइड मिरर में देखा, बच्चा सड़क के किनारे से सिक्का उठा रहा था और कार में ऍफ़ एम पर गाना बज रहा था " मेरे देश की धरती "|

अलग पीढ़ी--

कड़क इस्त्री किया हुआ धवल कुर्ता पैजामा , सफ़ेद एडिडास का जूता और आँखों पर रेबैन का काला चश्मा लगाकर परफ्यूम छिड़कते हुए वो बाहर निकल रहा था । आज फिर किसी चुनावी सभा में भाषण देना था उसको । 
कमरे में खटिया पर धोती और बंडी में लेटे पिताजी ने उसे जाते देखा और अपने स्वतंत्रता संग्राम के दिनों की याद में डूब गए , जब गाँधीजी के आह्वान पर उन्होंने सिर्फ धोती कुर्ता में सादगी से जीवन बिताने का फ़ैसला कर लिया था ।

सहमति--

" अगर उसने मेरी बात नहीं मानी तो मैं आगे से उससे बात नहीं करुँगी | हमारा लड़का ही ऐसा काम करेगा, विधर्मी से शादी "? 
" क्यूँ , अब क्या हो गया | बचपन में तो बस उसका मुँह खुलने की देरी होती थी और तुम हर इच्छा पूरी कर देती थी "| 
" वो तो उसकी ख़ुशी के लिए कर देती थी , लेकिन क्या उसे हमारी ख़ुशी की परवाह नहीं रही | आज तक हमारे खानदान में ऐसा नहीं हुआ ", कहते कहते उसकी आँखों से आंसू टपक पड़े |
" वही तो मैं भी कह रहा हूँ , उसकी ख़ुशी के लिए ही अब भी कर दो | वैसे भी वो हमारा ध्यान रखने में कोई कमी नहीं रखता है "|
उन्होंने धीरे से उनका हाँथ अपने हाँथ में पकड़ लिया और उनके आंसू पोंछ दिए | सहमति मिल चुकी थी |

नाग--

" अरे कहाँ जा रहे हो फूल माला लेकर ?
" चाचा के यहाँ | आज उनकी पूजा करना जरुरी है "|
चाचा ने तो धोखे से उनका सब कुछ हड़प लिया था और वो सड़क पर आ गए थे , फिर उनकी पूजा | अचानक उसे याद आया , आज नागपंचमी है |

ढहती दीवारें--

" आज मुझे ये मानने में कोई गुरेज नहीं है कि तुम मुझसे बेहतर लिखती हो ", कंधे पर पत्नी का हाथ महसूस करते ही उनके मुँह से ये बेसाख्ता निकल गया | 
" पुरुष होने का अहंकार मुझे आजतक ये मानने से रोकता रहा था , लेकिन सच्चाई यही है तनू ", और पलट कर देखा उन्होंने उसकी तरफ | 
हांथ में पत्नी की पुरष्कृत पुस्तक और उनके चेहरे की हँसी बता रही थी कि वो बांध टूट चुका था | तनू भी उनकी हँसी में शामिल हो गयी , आज उसे अपने जीवन का सबसे कीमती पुरस्कार मिल गया था |

यक़ीन--

" लड़की होकर बाहर काम करेगी , यही दिन देखने बाक़ी थे ", दादी की ये आवाज़ जब से कानों में पड़ी थी तब से परेशान थी सकीना | अब्बू के इंतकाल के बाद घर की माली हालत जर्जर हो चुकी थी और उस सदमे में अम्मी का सिलाई का काम भी ठप हो चला था | वो तो अब्बू ने दादी के तमाम विरोध के बाद भी उसको पढ़ाया था जिससे वो आत्मनिर्भर हो सके |
" बाहर की दुनियाँ बहुत खराब है और तू लड़की है ", दादी का विरोध जारी था | 
" दादी , बाहर की चुनौतियों से जूझने की शक्ति अब्बू ने दी है मुझे , बस मुझ पर यक़ीन रखो "| 
दादी ने सकीना की आँखों में देखा , उसमे उन्हें अपने मरहूम बेटे का अक्स दिखाई दिया | उनके हाथों की सख़्त पकड़ ढीली पड़ने लगी , सकीना ने मुस्कुराते हुए उनके माथे को चूम लिया |

रस्म-

" भाभी , बहुत अच्छी साड़ी है ये | आप लोग कितना ध्यान रखते हैं मेरा ", छोटी बहन ने दोनों हाथों से साड़ी लेते हुए कहा तो अम्मा के सामने पिछले साल का दृश्य घूम गया |
" ऐसी साड़ी तो मेरे यहाँ कामवाली भी नहीं पहनती , रखिये अपने पास | राखी बाँधने आई हूँ तो रस्म अदायगी करने लगी आप ", और साड़ी को छुआ तक नहीं बड़ी बहन ने | बड़ी मुश्किल से भैया ने उनको २५०० देकर मनाया था |
छोटी ने आकर अम्मा का पैर छुआ और धीरे से ५०० निकाल कर उनके हाँथ में रख दिया | काश बाबूजी होते , सोचते हुए अम्मा की आँख भर गयी | लेकिन उनको अपनी छोटी बेटी गरीब घर में होते हुए भी बहुत अमीर लग रही थी |

फ़ौज़ी--

मारिया के साथ सभी बच्चों के हाँथ भी प्रार्थना में जुड़े थे | वो सब हस्पताल में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे अपने धर्म पिता के लिए दुआ कर रहे थे | 
उसने मारिया को बाढ़ प्रभावित क्षेत्र से बचाया था और फिर वो उसकी जीवन रेखा बन गयी थी | फिर मारिया ने भी उसी धर्म को अपनाया , अनाथ और बेघर बच्चों को आश्रय देने का | उसके अनाथालय में पलने वाले बच्चों को मारिया और उसके धर्म पिता ने कभी भी माँ बाप की कमी नहीं महसूस होने दी थी | 
फोन की घंटी बजने पर मारिया वर्तमान में लौटी , अपनी जिंदगी के तमाम ज़ंग जीतने वाला उसका धर्म पिता आज जीवन की ज़ंग भी जीत गया था |

मन का अँधेरा -

" कुछ मदद कर दूँ " सामने उस बैसाखी सँभालते युवक को देखते ही निकल गया उसके मुँह से|
" मैं रख लूंगा सब सामान, शुक्रिया ", उसने दृढ़ता से जवाब दिया|
फिर उसे लगा की शायद ज्यादा ही रुखा जवाब हो गया तो नरमी से बोला " मुझे कोई दिक्कत नहीं होती है, बिलकुल आराम से सब कुछ कर लेता हूँ| शायद आपको लगा होगा कि मैं ये सब कैसे कर पाउँगा "|
" जी हाँ , मुझे यही लगा था, दरअसल आदत सी पड़ गयी है ऐसे लोगों को मदद की याचना करते हुए देख कर "|
" जब तन के बदले मन में अँधेरा हो तो ऐसा ही होता है| बहरहाल ऐसे लोगों की वज़ह से कभी किसी जरूरतमंद की मदद करने से पीछे मत हटियेगा "|
बैसाखी संभाले एक खुशनुमा रौशनी बिखेरता वो आगे बढ़ गया|

हिंदुस्तान की खोज़--

" बहुत बहुत बधाई इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए , क्या गज़ब का चित्र खींचा आपने और श्वेत श्याम में तो अद्भुत लग रहा है | ऊपर से ये बेहतरीन शीर्षक " हिंदुस्तान की खोज़ "| 
" एक महानगर में रहने वाले के लिए ऐसे चित्रों की कल्पना करना भी दुरूह है और आपने तो इसे जीवंत ही कर दिया ", किसी और ने हाँथ पकड़कर कहा | 
" शुक्रिया आप सब का , बस कोशिश की थी गाँवों की हक़ीक़त सामने लाने की ", मुस्कुराते हुए उन्होंने सबको धन्यवाद दिया |
मन ही मन वो अपने बेटे को धन्यवाद दे रहे थे जिसने उनसे अपने गाँव चलने की ज़िद की थी और वहां पर उन्होंने पिताजी की अखबार पढ़ती तस्वीर खींच ली थी |

रिश्ता--

" सोच रहा हूँ बेटे के यहाँ हो लूँ , तुम भी चलोगी ना ", जवाब जानते हुए भी उन्होंने पूछा |
" तुम ही चले जाओ , मेरा मन नहीं है ", मन ही मन पोते को देखने की जबरदस्त इच्छा के बावजूद उसने मना कर दिया | 
" ठीक है , तब मैं ही चला जाता हूँ ", कह तो दिया उन्होंने लेकिन पिछली बार का दृश्य आँखों के सामने घूम गया |
" आगे से ये लोग आएंगे तो सर्वेंट क्वार्टर में ही ठहराना , कोई सलीका नहीं हैं इनको , पूरा कार्पेट बर्बाद कर दिया ", बहू की आवाज़ आई और घर में सन्नाटा छा गया | 
रात में काफी देर से बेटा आया और उसने खाट पर पैताने बैठ कर इतना ही कहा " पिताजी , मैंने कहा था ना कि इतने ऊँचे घर में रिश्ता मत जोड़ो "|

नया क़दम--

" तुम्हारी लिखी सारी चिट्ठियाँ ले आया हूँ , बहुत चाह के भी उन्हें जला नहीं पाया । सोचा डाकिये का वेश ही बना के चलूँ , पुराने दिन याद आ जायेंगे ", और वो मुड़ कर वापस चलने लगा । 
" रुको , मुझे भी कुछ लौटाना है तुम्हे । अब तो अकेली जिन्दगी में यही सहारा था लेकिन जब तुम सब लौटा रहे हो तो मुझे भी इन्हें रखने का हक़ नहीं है ", और वो भी अंदर से एक पैकेट ले आई । 
पैकेट ले कर वो वापस मुड़ा , लेकिन क़दमों ने साथ नहीं दिया । 
" क्या अब हम साथ जिंदगी जी सकते हैं ", और सहमति में सर हिलते ही उसने नयी ज़िन्दगी की तरफ क़दम बढ़ा दिया ।

पहचान--

पहचान का द्वन्द--
" बधाई हो, समाजसेवा के इन राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए| आप जैसे विरले लोग ही हैं जो तवायफ़ों के बेसहारा बच्चों की देखभाल में अपना जीवन लगाये हुए हैं "|
"जी, शुक्रिया, हम लोग तो बस इस बच्चों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के कार्य में लगे हुए हैं "|
शायद अब उनके अतीत का जिक्र लोग छोड़ दे, यही सोचते हुए वो लोगों से बधाई स्वीकार कर रहे थे कि एक आवाज़ उनके कान में पड़ी " अरे अगर तवायफ़ का बेटा ही ऐसे बच्चों का ख्याल नहीं रखेगा तो और कौन रखेगा "|
एकबारगी तो उनके मन में एक टीस सी उठी, लेकिन फिर उन्हें अपनी पहचान का द्वन्द ख़त्म होता दिखने लगा|

अन्जाना भय--

रोज की ही तरह आज भी ऑफिस से निकलने में उसे देर हो गयी थी । तीन साधन बदलकर वो अपने कॉलोनी के बाहर उतर कर जल्दी जल्दी घर की तरफ चल दी । काफी अँधेरा हो गया था और अचानक बिजली भी गुल हो गयी । 
न जाने क्यूँ उसे सुबह का अखबार याद आ गया । पहले पन्नें पर खबर थी कि एक छोटी बच्ची की अस्मत कुछ दरिन्दों ने लूटी । अब कॉलोनी के रास्ते के दोनों ओर खड़े पेंड़ उसे एकदम से डरावने लगने लगे । अचानक किसी के पैरों की आहट से वो बुरी तरह घबरा गयी और उसके मुँह से चीख़ निकल गयी । 
" क्या हुआ , इतनी घबराई हुई क्यूँ हो , कुछ हुआ क्या ?, आवाज़ उसके पति की थी । 
वो एकदम से उससे लिपट गयी , पति को कुछ समझ नहीं आया । अभी तो उसका डर निकल गया लेकिन कल फिर रात होगी , अँधेरा होगा और वो अन्जाना भय फिर घेर लेगा ।

हौसला--

अचानक हुई बरसात ने सब कुछ अस्त व्यस्त कर दिया , टपकती हुई छत और बुझता हुआ चूल्हा , सब जैसे उसकी स्थिति का मज़ाक उड़ा रहे थे । महीने का आखिरी हफ्ता , ख़ाली जेब और बच्चों की बक़ाया फ़ीस , क्या करे । 
हर स्थिति में खुश रहना कहीं पढ़ा था उसने और अचानक बाहर नज़र पड़ी तो उसे यक़ीन भी हो गया । उस बरसात के पानी में नाव चलाते उसके बच्चे उसे हर स्थिति से लड़ने का हौसला दे रहे थे ।

शहीद के सपने --

" साहब, तीन महीने हो गए, अभी तक़ कुछ पता नहीं चला, अब तो फाँकों की नौबत आ गयी है "।
" समय तो लगता ही है, पेपर बड़े साहब के पास गया है "।
" पिछली बार बड़े साहब ने कहा था कि आपको आने की जरुरत नहीं है, आपके पति देश के लिए शहीद हुए थे "।
" तो आपको सरकार पेंशन तो देगी ही न, लेकिन थोड़ा हम लोगों का भी ध्यान ?"
" ध्यान तो रखना ही है ", उसने जलती नज़र से बाबू को देखा और वापस चल दी। बाबू की हँसी उसका बहुत देर तक पीछा करती रही।
हाँ, घर आते समय उसने बेटे के लिए सेना की नौकरी का फार्म ले लिया था।

बोझ-

" अाप को क्या लगा कि मैं अाप को छोड़ दूँगा । अाप के गुनाहों का हिसाब अब अदालत में होगा, गिरफ्तार करो इनको "।
सुनते ही चेहरे पर हवाईयाँ छाने लगीं, अब तो बचना मुश्किल है | 
आखिर में बचने के लिए आखिरी हथियार भी इस्तेमाल कर दिया " तुम भूल रहे हो कि हम दोनों हम मज़हब हैं और ये काम हम ख़ुदा के लिए ही कर रहे हैं | क्या जवाब दोगे ख़ुदा को "।
" अाप जैसे लोगों की वजह से ही हमें दोहरी कीमत चुकानी पड़ रही है समाज में , पूरी कौम ही शक के घेरे में रहती है "।
गाड़ी स्टार्ट हुई अौर वो बढ़ गया अपने अाफिस की तरफ । एक सुकून था उसके चेहरे पर , मन का कुछ बोझ हल्का हो गया था ।

सीकड़--

" का रे खदेरुआ , जलसा बीत गयल | अब अपने में रह अउर गाय गोरु सब के चारा पानी दे ", दद्दा की कर्कश आवाज़ सुन कर वो वर्तमान में आ गया | ज़मीन पर पड़े चरी के गट्ठर को उठाकर कांटा मारने वाली मशीन पर रखा ओर कांटा मारने लगा |
कल का दृश्य रह रह कर उसके दिमाग में चल रहा था | इस बार सीट रिज़र्व घोषित हो गयी थी ओर पुराने सरपंच दद्दा ने उसको खड़ा कर दिया था | विजयी घोषित होने पर यही दद्दा ओर बाक़ी सब उसको माला पहना कर चुनाव कार्यालय से गाँव तक लाये थे |
मवेशियों को चारा देने के बाद उसने झउवा उठाया ओर गोबर इकठ्ठा करने लगा | उसकी मेहरारू गोबर पाथने के लिए बैठी हुई थी | तभी एक गाय ने सीकड़ छुड़ा लिया ओर बाहर दौड़ी | उसने दौड़ कर उसको पकड़ा ओर वापस खूंटे से बाँधने लगा |
गाय को बांधकर जैसे ही वो खड़ा हुआ , उसका हाँथ अपने गर्दन पर चला गया | इस सीकड़ को छुड़ाने की कोशिश भी कर पायेगा कभी , सोचते हुए उसने गोबर उठाया ओर आगे बढ़ गया |

Tuesday, August 11, 2015

आज़ादी का अर्थ--

" जब तक सभी पिछड़े लोगों , महिलाओं और मज़लूमों को बराबरी का अधिकार नहीं मिल जाता , तब तक आज़ादी का कोई मतलब नहीं है ", प्रिंसिपल झण्डा फहराने के बाद भाषण दे रहे थे |
मिताली के दिमाग में सब कुछ गड्ड मड्ड हो रहा था , स्कूल में तनख्वाह के ५००० पर हस्ताक्षर करना और १००० लेना , घर पर अपने पुरुष दोस्तों को बुलाने पर पति का संकुचित और शंकालु व्यवहार और घर जाते हुए सड़क के किनारे बढ़ती झुग्गियां और ट्रैफिक सिग्नल पर भीख मांगते हुए बच्चों की बढ़ती संख्या | आज़ादी का आना अभी बाक़ी है शायद , सोचते हुए उसने लड्डू का एक टुकड़ा मुँह में डाला | लड्डू कुछ कड़वा प्रतीत हो रहा था उसे |  

Thursday, August 6, 2015

आईना--

विदाई समारोह में सारा कार्यालय इकठ्ठा था, शर्माजी ३२ साल की सेवा पूर्ण करके सेवानिवृत्त हो रहे थे| अपने पुरे कार्यकाल में उन्होंने अपनी ईमानदारी और सदाशयता बरक़रार रखी थी|
समारोह में उन्होंने सबसे पहले खुद बोलने की अनुमति मांगी और बोलना प्रारम्भ किया " मुझे पता है कि आज के दिन आप लोग मेरे बारे में बहुत अच्छा बोलेंगे क्योंकि यही रिवाज़ है| लेकिन ये मेरी दिली इच्छा है कि आप अगर मेरे बारे में कहें तो वही कहें जो मेरे लिए आपके दिल में हमेशा से रहा है| इस कार्यालय में, एक चायवाले को छोड़कर, जिसके पूरे पैसे मैंने हमेशा चुकता किया, शायद ही किसी ने मुझे समझदार समझा| मुझे कत्तई बुरा नहीं लगेगा अगर आप मेरे बारे में सच कहेंगे, लेकिन कृपया आज के दिन झूठ मत कहियेगा "|
एक सन्नाटा पसर गया था, ऐसे आईने की उम्मीद किसी को नहीं थी| 

Tuesday, August 4, 2015

छतिपूर्ति--

" हमें ऐसे कर्तव्यनिष्ठ कर्मचारी कहाँ मिलेंगे , इनका जाना हमारी कम्पनी के लिए अपूरणीय छति है | काश ऐसे कुछ लोग हों तो हमारी कम्पनी हमेशा अग्रणी रहे ", सेवानिवृत्ति के दिन मालिक के ये उद्बोधन उनकी हिम्मत बढ़ा रहे थे |
लेकिन उनके सेवानिवृत्ति फंड्स में से कटौती करके छति पूर्ति का प्रयास किया जा रहा था |    

Monday, August 3, 2015

सम्मान ( लघुकथा )

घर के अंदर भी हालत ख़राब थी दुर्गन्ध से, बाहर निकलते समय तो सब नाक पर रुमाल रख कर ही निकल रहे थे| बारिश हुई थी और बाहर की नाली ओवरफ्लो हो गयी थी, उसमे बहता हुआ पुरे कॉलोनी का कचड़ा, पॉलिथीन और मल मूत्र सब बाहर आ रहा था|
" पापा, साफ़ कराईये न, जीना दूभर हो गया है और कल दोस्तों को घर भी बुलाया है ", बेटे ने थोड़ा तेज आवाज़ में कहा और नाक ढँकते हुए निकल गया| शर्माजी ने एक बार सोचा कि खुद ही साफ़ करलें, लेकिन जैसे ही बाहर निकले, हिम्मत जवाब दे गयी|
फिर याद आई मलिन बस्ती के लड़कों की जो सफाई करते थे| उनको बुलाया और हिम्मत जुटाकर खड़े रहे जब तक नाली साफ़ नहीं हो गयी| सब साफ़ करके दोनों लड़के आये और कुछ कहते उसके पहले ही शर्माजी ने ५०० का नोट निकालकर पकड़ा दिया और अपने हाँथ जोड़ दिए|
लड़को के मुह में " २०० दे दीजिये साहब " अँटका ही रह गया और वो अचंभित शर्माजी को देखने लगे| घर के अंदर से देख रही उनकी पत्नी के हाँथ भी, पता नहीं किसके सम्मान में जुड़ गए|

Friday, July 31, 2015

नींव--

कैमरों के फ़्लैश लगातार चमक रहे थे , पता नहीं कितने लोग ऑटोग्राफ लेने के लिए धक्का मुक्की कर रहे थे | उस जिले से वो पहला व्यक्ति था जिसका चयन टेस्ट टीम में हुआ था | भीड़ में से जगह बनाकर वो स्टेज पर पहुँचा और अपनी निर्धारित कुर्सी पर बैठ गया | मंचासीन अतिथिगण बारी बारी से उसके बारे में और उसको वहां तक पहुंचाने में अपने योगदान के बारे में बोल रहे थे और रह रह कर तालियाँ बज रही थीं |
आखिर में वह बोलने के लिए माइक के पास खड़ा हुआ | मंच पर बैठे और सभा में उपस्थित सबकी निगाह उसकी ओर गड़ी हुई थी | उसने अपने माता पिता से लेकर अपने कोच और सेलेक्टर्स सबका आभार प्रकट किया और फिर उसने एकदम पीछे बैठे बुज़ुर्ग की ओर इशारा किया और उनको मंच पर लाने का आग्रह किया |
" यही हैं मेरे चयन की नींव डालने वाले शख्स जो उस मैदान के ग्राउंड्समैन हैं | पता नहीं कितनी बार मैंने खेल छोड़ने का सोच लिया था लेकिन मेरे साथ हर समय मौजूद और मेरी हर निराशा को आशा में बदलने वाले यही हैं ", ये कहते हुए उसने अपने गले में पड़ा हार उनके गले में पहना दिया और उनके पाँव छू लिए | सभागार में तालियों की आवाज़ देर तक गूंजती रही और उस बुज़ुर्ग के आँखों से बहने वाले आंसू उसका कन्धा भिगोते रहे |