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Friday, December 30, 2016

कर्ज मुक्ति-- लघुकथा

"चलिए राजूभाई, सब सामान ले लिया है", चचा ने बड़ी वाली डेकची उठायी और बाहर निकल गए| राजू ने भी झोले उठाये और पीछे पीछे चल दिया| बाहर खड़ी ऑटो में बैठ कर दोनों मंदिर के बाहर जाकर रुके|
रोज रात को मंदिर के बाहर बैठे भिखारियों और कुछ अन्य भूखे लोगों को भर पेट खाना खिलाना, दोनों का नियम था| जैसे ही दोनों सामान लेकर पहुंचे, लोग कतार में बैठ गए और अपने अपने पत्तल में खाना लेने लगे| खाना देकर दोनों किनारे बैठ गए और लोगों को खाते देखने लगे|
चचा को याद आया, एक समय था जब उनके मोहल्ले में लोगों ने बहुत खरी खोटी सुनाई थी| सबसे ज्यादा दिक्कत उनको मंदिर के बाहर खाना खिलाने को लेकर थी, आखिर गैर मज़हबी होकर मंदिर के बाहर सेवा लोगों के गले नहीं उतरती थी| लेकिन उन्होंने कभी किसी की बात की परवाह नहीं की और इसी क्रम में उनको राजू मिला जिसको एक दिन उन्होंने यहीं खाना खिलाया था|
चचा इसी सोच में डूबे हुए थे कि उनको थोड़ी दूर से एक बुजुर्ग महिला आती दिखीं| चचा लपक कर उठे और एक थाली में जल्दी जल्दी खाना निकाल कर उनकी तरफ बढे| बड़े प्यार से उन्होंने उस महिला को बिठाकर खाना दिया और वहीँ बैठ गए| राजू उनके पास आया और बोला "अरे चचा, माताजी खाना खा लेंगीं, मैं हूँ यहीं, आप चलकर ऑटो में बैठो"|
चचा ने एक बार राजू को देखा और फिर खाना खाती बुजुर्ग महिला को देखा| फिर बहुत संतुष्टि भरी मुस्कराहट चहरे पर लाते हुए बोले "रहने दो राजूभाई, तुमको नहीं पता, इसी बहाने मैं इस मंदिर का कर्ज उतार रहा हूँ| इसी मंदिर के सामने मेरी माँ को किसी ने तब खाना खिलाया था, जब वो बेहद भूखी थीं"|
बुजुर्ग महिला खाना खा रही थीं, चचा उनको बेहद प्यार से देख रहे थे और आज राजू को भी इसका राज पता चल गया था| 

Wednesday, December 21, 2016

बंधन-- लघुकथा

"आखिर क्यों नहीं कर लेती उससे शादी, जब साथ साथ रहती हो तो दिक्कत क्या है", उसने घर से निकलते हुए बेटी को टोका| बेटी ने एक बार उसकी तरफ देखा और फिर आगे जाने लगी|
"अभी तुमको नहीं समझ में आ रहा है, कुछ साल बाद समझोगी| आखिर कुछ तो सोचो भविष्य के लिए", उसने फिर से समझाने की कोशिश की|
अबकी बार बेटी पलटी और वापस कमरे में आ गयी| उसके पास आकर उसने माँ का हाथ अपने हाथ में लिया और प्यार से बोली "तुम्हें क्या दिक्कत है माँ, हम लोग खुश हैं और जब तक सब ठीक है, साथ रहेंगे"|
"लेकिन कोई बंधन तो होना चाहिए साथ रहने के लिए", उसने फिर से कहा|
"कैसा बंधन माँ, तुमने भी तो शादी की थी और सारे बंधनों में तुम्हीं बंधती रही, पापा तो किसी और बंधन में बंध गए| और उस बंधन के कुछ निशान आज भी तुम्हारे बदन पर दिखते हैं, इसके बाद भी तुम यह सब कह रही हो"|
वह थोड़ी देर बेटी को देखती रही, अचानक उसका हाथ अपने चेहरे पर चला गया| एक कटे का दाग था जिसे वह कितनी भी कोशिश के बाद मिटा नहीं पायी थी|
"तुम्हारा बंधन है ना मेरे लिए, कहीं भी रहूंगी, तुम्हारा हाथ तो रहेगा ही मेरे सर पर| अगली बार ज्यादा दिन की छुट्टी लेकर आउंगी तो खूब घूमेंगे हम दोनों", कहती हुई बेटी ने प्यार से उसके ललाट पर एक चुम्बन दिया और निकल गयी|
उसे लग रहा था जैसे आज वह कटे का दाग मिट गया था| 

Saturday, December 17, 2016

असली ख़ुशी--लघुकथा

हर बार की तरह इस बार भी तैयारी हो गयी थी, बच्चों के लिए कापी, पेंसिल, रबर और कुछ अन्य सामान के साथ कुछ मिष्ठान्न भी ले लिए गया था| दोपहर होते होते गांव के स्कूल पहुंचकर उसने जैसे ही सारा सामान निकाल कर रखा, बच्चों की निगाह चमक गयी| कुछ बच्चे तो ख़ुशी से चिल्लाने भी लगे और उठ कर उसके पास आ गए|
"बहुत अच्छा किया आपने जो आ गए, बच्चे तो इंतज़ार ही करते रहते हैं", हेड मास्टर ने मुस्कुराते हुए कहा|
"अरे आना ही था, आखिर आज का दिन स्पेशल जो होता है", कहते हुए उसके चेहरे पर भी चमक आ गयी|
एक बार फिर उसने पूरे स्कूल में देखा, किसी बच्चे ने फुल स्वेटर तो किसी ने हाफ स्वेटर पहना हुआ था| कुछ ही ऐसे थे जो जूते पहने हुए थे और अधिकांश की ड्रेस बहुत गन्दी थी| अचानक उसे अपने द्वारा लायी हुई चीजें अनावश्यक लगने लगीं| इतनी ठण्ड में भी जमीन पर टाट बिछाकर बैठे हुए बच्चों की सारी ऊर्जा तो शायद खुद को ठण्ड से बचाने में ही जाया हो जाती होगी|
अब बच्चों को एक एक कर के सामान बँटना शुरू हुआ, जो भी ले लेता, ख़ुशी से उछलते हुए जाकर टाट पर बैठ जाता| लेकिन अब उसकी ख़ुशी कुछ कम होती जा रही थी| सामान के बाद सब बच्चों को जब मिठाई दी गयी तो उसे कुछ संतुष्टि महसूस हुई| सब सामान देने के बाद उसने एक बार हेड मास्टर से पूछा "अगर आपको लगता है कि इसकी जगह कुछ और दिया जाए बच्चों को तो बता दीजिये, अगली बार से वही करेंगे"|
हेड मास्टर ने थोड़े संकोच से कहा "अब आप जो भी लाते हैं, वह बहुत है, लेकिन अगर इन बच्चों के लिए टेबल और कुर्सी का इंतज़ाम हो जाए तो ठण्ड में इनको आराम हो जायेगा"|
"ठीक है मास्टर जी, करते हैं इंतज़ाम", कहते हुए उसे लगा जैसे उसके मन की बात कह दी हो मास्टरजी ने| चलते समय उसके मन में आया कि अब इस बार जन्मदिन का इंतजार नहीं करके वह पहले ही आएगा और उसके चेहरे पर एक रौशनी फ़ैल गयी|  

Thursday, December 15, 2016

बनारस--अधूरी कहानी

जब से अहमद मियां बनारस शहर से लौट कर आये थे, उनके मन में बहुत सी बातें चल रही थीं. दर असल उनका साड़ी बुनाई का पुस्तैनी काम था तो कभी कभी शहर जाना हो ही जाता था. इसी सिलसिले में जब वह पिछले महीने साड़ी लेकर शहर गए थे तो उनको अपने पुराने अजीज मित्र रोशन के बारे में पता चला जो बनारस में ही रहते थे और वहीं पर किसी सरकारी विभाग में काम करते थे. बचपन का काफी लम्हा साथ साथ गुजरा था और दोनों मित्रों की आर्थिक दशा कमोबेश एक जैसी ही थी, आर्थिक परेशानियां सुरसा के मुंह की तरह बड़ी थीं और किसी तरह से जीवन कट रहा था. अब इसी आर्थिक परिस्थितियों की वजह से अहमद मियां जल्द ही स्कूल छोड़ कर अपने पुस्तैनी धंधे में लग गए. लेकिन रोशन ने किसी तरह संघर्ष करते हुए पढ़ाई जारी रखी और आज उसी का नतीजा था कि वह सरकारी नौकरी में थे.
स्टूल पर बैठे बैठे ही उन्होंने बीड़ी ख़त्म की और उठ कर बाहर वाले अँधेरे कमरे में चले गए. एक छोटा सा कमरा जिसमें चार मशीने लगी हुई थीं और उस कमरे में उनके साथ उनके तीन बेटे भी साड़ी बुनाई में लगे रहते थे. कमरे में घुसते ही उनको खांसी का दौर आया और खांसते खांसते वह दुहरे हो गए. बेटे अपनी अपनी मशीनों पर बैठकर खट खट करते हुए बुनाई कर रहे थे और कमरे में शोर और धुएं का सम्मिलित साम्राज्य था. घर बहुत छोटा था, इस कमरे के अलावा दो और कमरे थे उनके घर में, एक कमरा ठीक था लेकिन दूसरा कमरा तो बस इतना ही बड़ा था जिसमें एक खाट पड़ सके. बड़ी वाली लड़की की शादी तो उन्होंने किसी तरह कर दी थी लेकिन अभी उसके बाद शादी के लिए दो और लड़कियां बची थीं और ये तीनों लड़के भी.
रोशन के घर को देखकर उनको बहुत सुकून मिला, साफ़ सुथरा दो कमरे का घर. लेकिन उसमें रहने वाले सिर्फ चार ही थे, रोशन, उसकी पत्नी विभा और दो बच्चे, बच्चे भी स्कूल जाने वाले और स्वस्थ तंदरुस्त. जबकि उनके बच्चे न तो प्राइमरी स्कूल के बाद मिडिल स्कूल ही गए और न ही शारारिक रूप से उतने स्वस्थ थे. उनके मोहल्ले में सिर्फ उनके ही घर पर ही नहीं, बल्कि अगल बगल के घरों में भी यही हाल था, न तो साफ़ सफाई थी और न ही खुले हवादार घर. छोटे छोटे दड़बे नुमा घर और उसमें रहने वालों की बहुतायत. बातों बातों में ही जब रोशन ने उसके घर के बारे में पूछा तो उसके बच्चों के बारे में जानकार उसे बहुत आश्चर्य हुआ और उसने कहा भी " अरे, इतने बच्चे कैसे पाल सकते हो आज के जमाने में"?
पिछले महीने ही तो अहमद मियां अपनी दूसरी बेटी सकीना का रिश्ता तंय किया था और तीन महीने बाद की शादी पक्की हुई थी. मुश्किल से अभी बालिग हुई थी वह और पढ़ने में भी उसकी बहुत दिलचस्पी थी. लेकिन एक तो बिरादरी में कोई अपनी लड़कियों को पढ़ाता नहीं, दूसरे कुछ ऊंच नीच न हो जाए, इस डर से उन्होंने प्राइमरी के बाद उसे आगे पढ़ने नहीं भेजा. उनको याद आया कि घर में कोई पुराना भी अखबार आता तो वह उसको बहुत चाव से पढ़ने लगती. अभी वह बेटी के बारे में सोच ही रहे थे कि उसकी आवाज़ उनके कानों में पड़ी "अब्बू, चाय पी लीजिये", और चाय रखकर वह जाने के लिए मुड़ी. अहमद मियां ने गौर से उसका चेहरा देखा जो पता नहीं कमरे की धुंधली रौशनी के चलते या खान पान के चलते, पीला लग रहा था. उनको यकबयक रोशन की बेटी का चेहरा याद आ गया, कितना खिला खिला था और कितनी खुश थी. बेटी घर में चली गयी लेकिन अहमद मियां को जैसे कुछ अंदर से सालने लगा था, एक अपराधबोध सा होने लगा था. 
रात में खाट पर लेटे हुए भी उनके दिमाग में बेटियों की ही बातें ही चल रही थीं, काश उनको पढ़ाया होता. फिर सोचते सोचते उन्होंने एक बार फिर बनारस जाने का प्रोग्राम बनाया ताकि कुछ साड़ियों की बिक्री भी कर लेंगे और एक बार फिर रोशन के बच्चों से भी मिल लेंगे. और सुबह जल्दी ही निकल जायेंगे ताकि बनारस में कुछ समय रोशन के साथ बिता पाएं, यही सब सोचते हुए अहमद मियां नींद में खो गए.
साड़ियों की बिक्री करते करते उनको दोपहर हो गयी. उनकी दुकान तंय थी, पिछले कई सालों से उसी दुकान में अपनी साड़ियां बेचते थे अहमद मियां. हां ये जरूर था कि आजकल बनारस आना जाना ज्यादा हो गया था, पहले तो अक्सर घर पर या आस पड़ोस में ही बेच देते थे, जो भी दाम मिल जाए. अपनी समझ से एक बढ़िया साड़ी उन्होंने रख ली थी रोशन के घर पर देने के लिए, दरअसल पिछली बार कुछ भी नहीं ले जा पाए थे. रोशन के घर पहुंचकर उन्होंने घंटी बजायी तो थोड़ी देर बाद उसकी पत्नी विभा ने दरवाजा खोला.
"अरे अहमद भैया, अंदर आ जाईये ना", कहते हुए उसने दरवाजा खोल दिया.
"रोशन भाई नहीं है क्या", अहमद मियां ने पूछा, उनको याद भी नहीं था कि रोशन तो दफ्तर में काम करता है.
"वो शाम को ही आएंगे, ऑफिस गए हैं", विभा ने बताया तो वह झेंप गए.
"अरे हम तो ठहरे गांव के मजदूर आदमी, भूल ही गए थे कि रोशन भाई ऑफिस जाते हैं", अहमद मियां ने सकुचाते हुए कहा और उसकी पत्नी को साड़ी वाला पॉलिथीन पकड़ाते हुए वापस जाने लगे.
"अरे आप आराम से बैठिये और चाय पीजिये, वह आ जायेंगे. ये भी आप का ही घर है, पिछली बार आपके जाने के बाद आपके बारे में बहुत सारी बात हुई थी", विभा के मनुहार को अहमद मियां टाल नहीं पाए और अंदर आकर सोफे पर बैठ गए.
विभा पानी लेकर आयी और उनसे पूछ बैठी "इसमें क्या है अहमद भैया?"
"हमने अपने हाथों से बनायीं है यह साड़ी, देखो ठीक है कि नहीं", कहते हुए उनके चेहरे पर चमक आ गयी.
"आपने खुद बनायी है हमारे लिए, तब तो बहुत ही अच्छी होगी", कहते हुए विभा ने साड़ी बाहर निकाल लिया. साड़ी तो कमाल की सुंदर थी और उसपर हाथ फेरते हुए विभा को जैसे अपनापन सा महसूस हो रहा था.
"सच में बहुत ही सुंदर है यह साड़ी, मैंने ऐसी साड़ी शायद ही कभी पहनी हो. अगर आप बुरा न मानें तो मैं एक बात कहूँ?, विभा ने मुस्कुराते हुए कहा.
"अरे बेझिझक कहो, मैं क्यों बुरा मानूंगा", अहमद मियां ने खुश होते हुए कहा. आज पहली बार किसी ने उनकी बनायी साड़ी की दिल से तारीफ़ की थी.
"अगर आप इसकी कीमत बता दें तो मैं कुछ और ऐसी साड़ियां लेना चाहूंगी", विभा ने उनकी तरफ देखते हुए कहा.
अहमद मियां को आभास तो हो गया था कि विभा को साड़ी बेहद पसंद आयी है, इसलिए इस सवाल पर उनको आश्चर्य नहीं हुआ. लेकिन कीमत के बारे में तो उन्होंने सोचा ही नहीं था, आखिर भाभी के लिए तोहफा था, वह सोच में डूब गए.
विभा ने उनके असमंजस को ताड़ लिया और बोली "देखिये अहमद भैया, आप इतनी मेहनत से बनाते हैं और इसको बनाने में खर्च भी बहुत लगता है. अगर हम बाजार से ऐसी साड़ी लेना चाहें भी तो शायद मुझे इतनी सुंदर साड़ी नहीं मिलेगी और अगर मिल भी गयी तो अनाप सनाप दाम में मिलेगी. इसलिए आप बेहिचक मुझे बता दें कि आप इसे कितने में बेचते हैं और वह कीमत मुझसे ले लें".
"आप मुझे बता दो कि कितनी साड़ियां चाहिए, मैं उनको अगले कुछ हफ्ते में तैयार कर दूंगा और ले आऊंगा. बाकी कीमत की बात मैं आपसे नहीं कर पाउँगा भाभी", अहमद मियां ने हाथ जोड़ते हुए कहा.
विभा समझ गयी कि अमहद मियां उसको कीमत नहीं बता पाएँगे. उसने बात को दूसरे तरफ मोड़ते हुए कहा "आप पिछली बार बता रहे थे कि आप के बेटी की शादी है कुछ महीने बाद. आप जब अगली बार जब भी आईयेगा तो उसे भी साथ लेकर आईयेगा और हो सके तो भाभीजी को भी. अब उनसे मिलने की बड़ी इच्छा हो रही है".
"जरूर लाऊंगा उनको आप के घर, वो सब भी बहुत खुश होंगी", अहमद मियां ने भी मुस्कुराते हुए कहा.
"मैं चाय लाती हूँ", कहकर विभा अंदर चली गयी. अहमद मियां भी टाँग सीधी करने लगे, थोड़ी देर में चाय आयी और वह आराम से चाय पीने लगे. विभा भी कुछ नाश्ते वगैरह के इंतज़ाम में लग गयी.
इस बीच दोनों बच्चे भी बारी बारी से कालेज से आये और अहमद मियां को नमस्कार करके अंदर चले गए. कुछ देर में उन्होंने बिटिया को पुकारा "बिटिया, थोड़ी देर के लिए हमारे पास आओ जरा".
विभा ने बेटी राशि को बोला कि अहमद मियां बुला रहे हैं और वह आकर उनके पास बैठ गयी. बहुत प्यार से उसकी तरफ देखते हुए अहमद मियां ने पूछा "किस क्लास में पढ़ती हो बिटिया?
"अंकल, मैं तो बारहवीं में हूँ, साइंस लिया है".
"अच्छा, तुम्हारा मन तो खूब लगता होगा पढ़ाई में", अहमद मियां ने उसे पुचकारते हुए कहा.
"हाँ अंकल, खूब मन लगता है पढ़ने में और मजा भी आता है. वैसे आपकी बेटी सकीना किस क्लास में पढ़ती है?, उसने पूछा.
अहमद मियां एकदम से बुझ से गए, काश उनकी बेटी भी पढ़ रही होती. अब तो उनको लगने लगा था कि उसको भी पढ़ाना चाहिए था. उन्होंने भरे मन से राशि की तरफ देखा और बोले "वह नहीं पढ़ती है".
राशि को जैसे शॉक लग गया, उसके लिए यह कल्पना करना भी मुश्किल था कि कोई बच्चा पढ़ाई नहीं करता है. उसने अविश्वास से अहमद की तरफ देखा गोया पूछ रही हो कि क्या वो सच कह रहा है. फिर उसने पूछ ही लिया "क्यों नहीं पढ़ती है सकीना, स्कूल तो होंगे ही आपके गांव में?
अहमद मियां को जवाब नहीं सूझ रहा था और यह भी लग रहा था कि आखिर उसे ये सब कैसे बताएं. कुछ देर तक वह सर को झुकाये बैठे रहे मनो वह अपना अपराध कुबूल कर रहे हों. कहीं न कहीं उनके अंदर ये अपराधबोध पैदा तो हो ही चुका था, बस इसका समाधान उन्हें नहीं सूझ रहा था. कुछ तो जवाब देना ही था सोचकर उन्होंने बोलने के लिए सर उठाया तभी विभा ट्रे में नाश्ता लेकर आ गयी. उसने दोनों को गंभीर मुद्रा में देखा तो पूछ बैठी "अरे क्या बात चल रही थी चाचा भतीजी में, कुछ ज्यादा ही गंभीर मसला लगता है?
अहमद मियां ने लम्बी सांस ली और बोल पड़े "दरअसल बिटिया सकीना के पढ़ाई के बारे में पूछ रही थी. अब आपसे क्या छुपाना, हमारे यहाँ गांव में लोग लड़कियों को पढ़ाना नहीं चाहते हैं, इसीलिए हम भी सकीना को पढ़ा नहीं पाए. वैसे वह बहुत होशियार है और पढ़ने की ललक भी है उसमें?
विभा के समझ में नहीं आया कि अब वो क्या बोले, राशि की मनोस्थिति भी वह समझ रही थी. खैर बात को बदलने के लिहाज से वह बोली "अहमद भैया आप नाश्ता कीजिये, अगली बार जब आप सकीना और भाभीजी के साथ आईयेगा तब हम लोग ढेर सारी बातें करेंगे".
अहमद भाई नाश्ते के प्लेट से कुछ लेकर खाने लगे और राशि भी उठकर चली गयी. थोड़ी देर के बाद अहमद भाई ने शुक्रिया कहकर विदा ली और विभा के द्वारा दिए गए मिठाई के डिब्बे को लेकर अपने गांव चल पड़े. पूरे रास्ते उनके मन में बस यही एक बात आती रही कि काश सकीना को आगे पढ़ाया होता, काश अपने लोगों की परवाह नहीं की होती. लेकिन अब तो समय काफी निकल चुका था और सकीना का निकाह भी तंय हो चुका था, इसलिए उनको कोई सूरत नजर नहीं आ रही थी.
उधर अहमद मियां के जाने के बाद विभा और राशि में भी सकीना के पढ़ाई और उनके सद्व्यवहार के बारे में काफी देर तक बात होती रही. दोनों ही यह चाह रहे थे कि काश वे लोग अहमद भाई की कुछ मदद कर पाते, उनकी बेटी सकीना की पढ़ाई के लिए कुछ कर पाते. उधर अहमद मियां अपने गांव पहुंचे, इधर रोशन अपने घर.
"आज अहमद भैया आये थे और देखिये कितनी खूबसूरत साड़ी लाये हैं मेरे लिए", विभा ने आते ही साड़ी रोशन के सामने रख दिया. अब साड़ी तो बढ़िया थी ही इसलिए रोशन भी तारीफ़ किये बिना नहीं रह पाया. 
"कितने की है ये साड़ी, महंगी लगती है", रोशन ने पूछा.
"यही तो दिक्कत है कि उन्होंने कीमत नहीं बताई और मैं भी ज्यादा जोर नहीं दे पायी कि कहीं उनको बुरा न लग जाए", विभा ने लम्बी सांस लेते हुए कहा.
रोशन को भी समझ में आ गया कि कीमत पूछने पर शायद अहमद को कमतरी महसूस होती इसलिए विभा ने जोर नहीं देकर अच्छा ही किया. 
"खैर तोहफा तो काफी अच्छा दिया है उन्होंने, बदले में हमें भी तो कुछ देना चाहिए, कुछ दिया क्या तुमने?
"नहीं, आज तो मैंने नहीं दिया. लेकिन अगली बार उनको बेटी और भाभी के साथ आने के लिए बोला है, उस समय सबके लिए दे देंगे", विभा ने कहा.
"ये भी ठीक किया तुमने, वैसे उसका गांव ज्यादा दूर नहीं है यहाँ से, हमारे गांव से पास में ही है", रोशन ने पानी पीते हुए कहा.
"पापा, आज अहमद अंकल आये थे, उनकी बेटी सकीना पढ़ाई नहीं कर रही है, बड़ा अजीब लगा मुझे", राशि ने रोशन के पास बैठते हुए कहा तो रोशन को भी झटका लगा.
"अच्छा, यह अहमद ने बताया.वैसे उनकी कौम में लड़कियों को ज्यादा पढ़ाना आसान नहीं होता, बहुत सी पाबंदियां हैं उनमें", रोशन ने राशि की तरफ देखते हुए कहा.
थोड़ी देर के लिए वहां सन्नाटा छाया रहा फिर राशि ने ही सन्नाटा तोड़ा "हमें कुछ करना चाहिए पापा, आखिर वो आपके दोस्त हैं".
"ठीक है, कुछ सोचते हैं इसके लिए. एक कप चाय तो पिलाओ विभा".
उधर अहमद मियां जब अपने घर पहुंचे तो खोये खोये से थे. सकीना ने उनके हाथ से मिठाई का डब्बा लिया और पूछा "इस बार आप मिठाई कहाँ से खरीद लाये?
अहमद ने मुस्कुराते हुए कहा "अपने दोस्त रोशन के यहाँ गया था, उसकी बेगम ने खूब बढ़िया नाश्ता भी कराया और तुम्हारे लिए यह मिठाई भी भेजी है. उनकी बच्ची भी बहुत प्यारी है, हमसे खूब बात की उसने". 
सकीना मिठाई का डब्बा लेकर अंदर चली गयी, अहमद ने कपड़े बदले, एक बीड़ी पी और फिर चाय पीने बैठ गए. चाय पीते पीते उन्होंने पत्नी शबनम की तरफ नजर डाली और बोले "आज भाभी ने तुमको और सकीना को बनारस लाने का कई बार इसरार किया, एक बार चलना ही पड़ेगा. अगले हफ्ते जब बनारस जाने का प्रोग्राम बनेगा तो तुम दोनों भी साथ चलना".  
शबनम सोच में डूब गयी, अपने रिश्तेदारियों के अलावा वह आज तक कहीं गयी नहीं थी. शहर जाने के नाम पर वैसे भी थोड़ी घबराहट होनी ही थी, ऊपर से पहली बार मिलने जाना था. 
"आप और सकीना ही हो लीजियेगा, मुझे ठीक नहीं लगता ऐसे जाना", शबनम ने बचने की कोशिश की.
"अरे नहीं, तुम भी चलो, भाभी से मिलकर खुश हो जाओगी. इस बार रविवार को चलेंगे जिससे रोशन भी घर पर ही हो", अहमद भाई ने चाय ख़त्म की और साड़ी की बुनाई वाले कमरे की तरफ बढ़ गए. 
शबनम सारी रात लगभग जागती ही रही, ऐसा मौका पहले कभी नहीं आया था. लेकिन उसके मन में भी बनारस जाने और रोशन भाई और भाभीजी से मिलने की इच्छा जोर मारने लगी थी. खैर रात बस आँखों ही आँखों में बीती और सुबह होते ही उसने फैसला कर लिया कि बनारस चलते हैं. उनको सबसे ज्यादा उत्सुकता सकीना को लेकर थी, उसे कैसा लगेगा, वह खुश तो होगी ना. 
अगले हफ्ते अहमद मियां अपने काम में डूबे रहे, सकीना की शादी की तैयारी और बनारस में साड़ी बेचने की तैयारी, उनके दिन रात बराबर थे. शबनम भी बनारस जाने की तैयारी में लग गयी, अपनी पुरानी साड़ी को धोकर चमकाया और सकीना के लिए भी एक नया सूट ले लिया. वैसे भी सकीना के लिए नए कपड़े ख़रीदे ही जा रहे थे, साड़ी में बस दो महीने ही तो बचे थे. 
अहमद मियां के जाने के अगले दिन शाम को जब रोशन घर आया तो राशि जैसे उसका ही इंतज़ार कर रही थी. उसने अपना बैग सोफे पर रखा और पैर लम्बा कर के बैठ गया, राशि ने एक ग्लास पानी पीने के लिए रख दिया. 
"पापा, आपने कुछ सोचा अहमद अंकल और सकीना के लिए?
रोशन ने पानी के ग्लास से अपना गाला तर किया और सोचने लगा कि क्या जवाब दे. उसने अभी कुछ सोचा नहीं था, वास्तव में उसे समय ही नहीं मिल पाया था कि वह कुछ सोचे. उसका चेहरा देखकर राशि समझ गयी और उसने ही आगे कहा "शायद आपको समय नहीं मिल पाया होगा लेकिन मैंने कुछ सोचा है. एक तो सकीना की पढ़ाई जरुरी है और दूसरे उसकी शादी भी आगे बड़वानी पड़ेगी, अभी उसकी उम्र ही कितनी है. इस बार जब अहमद अंकल सकीना के साथ आएंगे तो हमें उनको इसके लिए किसी भी तरह से राजी करना होगा".
रोशन बस राशि को देखता ही रह गया, कब वह इतनी बड़ी और समझदार हो गयी. इसी बीच विभा भी चाय लेकर आ गयी थी और उसने भी राशि की बात सुन ली थी.
"राशि बिलकुल ठीक कह रही है रोशन, हमें अहमद भाईसाहब को समझाना ही पड़ेगा. और मैंने तो एक और बात भी सोची है, मैंने इसके लिए अहमद भाईसाहब से पूछा भी था लेकिन उन्होंने मना कर दिया था. हम उनसे साड़ी मंगवाकर अपने परिचितों को बेच सकते हैं और उनको अपने काम की वाजिब कीमत भी मिल जायेगी. बाजार में तो बिचौलिए ही सब मुनाफा लूट लेते हैं", विभा ने भी एक सांस में सब बोल दिया.
रोशन दंग रह गया, उसका अपना परिवार इतनी अच्छी सोच रखता है, इसका उसे इल्म भी नहीं था. उसने उठकर बेटी राशि को गले लगाकर चूम लिया और विभा को भी अपनी बाँहों में समेट लिया. 
"अगर तुम लोग इतना सोच रहे हो तो हम बिलकुल ऐसा ही करेंगे, आने दो इसबार अहमद को, उसको सब समझाता हूँ".
दोनों तरफ तैयारियां चल रही थीं, अहमद के घर बनारस आने की और रोशन के घर अहमद मियां को समझाने की. उधर अहमद मियां इन चीजों से बेखबर साड़ियों की बुनाई में जी जान से लगे हुए थे और रोशन की बेगम के लिए भी एक और साड़ी बुनने की तैयारी भी कर रहे थे. इस दरम्यान लगभग 10 दिन बीत गए और अहमद ने बनारस चलने की तैयारी कर ली.
"अरे सकीना, अपनी अम्मा से पूछ तो कि कल बनारस चलने की तैयारी हो गयी है या नहीं. और तुमको भी चलना है इस बार, याद है ना?
सकीना जल्दी से घर के अंदर गयी और उसने अम्मा को अब्बू की बात बता दी. वैसे तो उसे भी मालूम ही था कि जल्दी ही बनारस चलना है, रोशन चाचा के घर. शबनम ने हाँ में सर हिलाया और खाना पकाने में लगी रही. 
अगले दिन सुबह जल्दी ही तीनों एक बैग में साड़ियां और दूसरे बैग में कुछ और सामान रखकर बनारस चल दिए. अहमद ने सोचा कि पहले रोशन के घर चलकर बेगम और सकीना को छोड़ देंगे और फिर साड़ियों को लेकर बाजार निकल जाएंगे. रविवार का दिन था इसलिए रोशन भी घर पर ही था. जैसे ही डोरबेल कि आवाज आयी, राशि ने दरवाजा खोला. सामने अहमद अंकल को देखते ही उसने पापा को आवाज लगायी और अंकल को नमस्ते करके सबको अंदर ले आयी. रोशन ने भाभी को नमस्कार किया और अहमद के गले लग गया. सकीना ने भी नमस्ते किया और इतनी देर में विभा भी आ गयी. सभी लोग वहीं सोफे पर बैठ गए, वैसे शबनम को वहां बैठने में काफी अटपटा सा लग रहा था.
"बेटी सकीना, तुम राशि के साथ उसके कमरे में जाओ और आराम करो. हम सब यहाँ गप्पे मारेंगे", रोशन ने राशि को इशारा किया और दोनों बच्चियां अंदर चली गयीं.
"कितनी खूबसूरत बेटी है आपकी भाभीजी, बिलकुल आप पर गयी है. मेरी तो नजर ही नहीं हट रही थी उससे", विभा ने शबनम के हाथ को अपने हाथ में लेकर कहा तो वह शर्मा गयीं. 
"बिटिया तो आपकी भी बहुत सुंदर है और कितने सलीके वाली भी है. हम तो गांव के हैं और हमारी बेटी भी, आप लोगों से मिलने की बड़ी इच्छा थी".
"मैं चाय बनाकर लाती हूँ और कुछ नाश्ता भी, आप लोग यहीं बैठिये", विभा उठकर किचन की तरफ जाने लगी.
"आपको ऐतराज न हो तो मैं भी चलूँ आपके साथ", शबनम ने कहा तो विभा उनको लेकर किचन में चली गयी.
"और भाई अहमद, कैसे हो आजकल. आज तो तुमने दिल खुश कर दिया, तुमको अंदाजा भी नहीं होगा कि हम लोगों को कितना अच्छा लग रहा है. खैर तुम्हारी साड़ियां कहाँ हैं, विभा बहुत तारीफ़ कर रही थी उनकी".
अहमद मियां भी अंदर से बेहद खुश थे, आखिर उनको भी पुराने दोस्त के घर परिवार सहित आने का मौका मिला था. 
"मुझे भी बेहद ख़ुशी हो रही है रोशन भाई, अब दोनों परिवार भी आपस में मिल गए, इससे अच्छा और क्या हो सकता था. साड़ियां उस बैग में रखी हैं, चाय पीकर मैं उन्हें बाजार लेजाऊंगा और फिर कुछ घंटे बाद वापस आकर गांव निकल जाऊंगा" 
"अच्छा एक काम करो, जब तक चाय नाश्ता आता है, तब तक मुझे उन साड़ियों को देख लेने दो", रोशन ने कहा तो अहमद ने बैग खोलकर ऊपर रख दिया.
"बड़ी खूबसूरत साड़ियां हैं, इनकी तो बहुत अच्छी कीमत मिल जाती होगी बाजार में", रोशन ने कहा तो अहमद ने एक लम्बी सांस भरी.
"अब तुमसे क्या छिपाना रोशन, अच्छी कीमत मिलती तो हमारे भी दिन फिर जाते. आढ़त पर बेचना हमारी मज़बूरी है और जो कीमत वह हमें देते हैं उससे बहुत ज्यादा कीमत में बाजार में बेचते हैं".      
रोशन ने सहमति में सर हिलाया "अच्छा ये बताओ अहमद, अगर तुमको सीधे बेचने को मिल जाए तो अच्छा होगा कि नहीं".
"काश ऐसा होता, बहुत बेहतर हो जाता तब तो", अहमद सोच में डूब गया.
"तो एक काम करो, मुझे इन साड़ियों की सही कीमत बता दो जिसपर तुम इन्हें बेचना चाहते हो, हम कोशिश करेंगे कि इन्हें बिकवा सकें", रोशन ने अहमद को देखते हुए कहा.
अहमद ने कुछ पल सोचा, शायद अनुमान लगा रहा था कि क्या ऐसा हो सकता है. 
"लेकिन तुम कहाँ बेचोगे, तुम तो नौकरी करते हो, कोई दूकान थोड़े चलाते हो", अहमद ने सवाल किया.
"तुम इसकी चिंता छोड़ दो, मैं और विभा अपने सर्किल में इन्हें बेचने की कोशिश करेंगे. वैसे भी जो साड़ी तुम पिछली बार लाये थे, वह बहुत से लोगों को पसंद आ गयी है".
अहमद को भरोसा नहीं हो रहा था लेकिन उसने सोचा कि देख लेने में क्या हर्ज है. 
"ठीक है, मैं साड़ियों की कीमत बता देता हूँ. तुम कोशिश करके देख लो, वर्ना अगले हफ्ते आढ़त में दे दूंगा", अहमद ने एक एक करके साड़ियों की कीमत रोशन को बता दी. 
उधर नाश्ता बन गया था और दोनों महिलायें नाश्ता लेकर आ गयीं. रोशन और अहमद ने अपने अपने प्लेट में नाश्ता लिया और खाने लगे.
"वाह, मजा आ गया भाभीजी, बहुत स्वदिष्ट नाश्ता बनाया है आपने", अहमद ने मुस्कुराते हुए कहा तो रोशन ने भी सर हिलाया.
"दोनों ने मिलकर बनाया है इसीलिए इतना स्वादिष्ट बना है", विभा ने हँसते हुए कहा तो सब मुस्कुरा उठे.
"बच्चे भी खा रहे हैं ना?, रोशन के सवाल पर विभा ने हामी में सर हिलाया.
नाश्ते के बाद चाय पीते हुए रोशन ने कहा "अहमद, एक चीज कहना चाहता था, लेकिन तुम इसमें बुरा मत मानना".
"अरे मैं भला क्यों बुरा मानने लगा, तुम तो मेरे भले के लिए ही कहोगे", अहमद ने जवाब दिया और रोशन की तरफ देखने लगा.
"नहीं ये तुम्हारी अपनी जाती जिंदगी का सवाल है इसलिए मैंने बोला. अच्छा सकीना की शादी इतनी जल्दी करना जरुरी है क्या, अभी उसकी उम्र ही क्या है. थोड़ा और बड़ी हो जाने दो फिर सोचना", रोशन के सवाल पर थोड़ी देर के लिए सन्नाटा छा गया. शबनम ने अहमद की तरफ देखा कि वह क्या जवाब देगा, अहमद सोच में पड़ गया. थोड़ी देर बाद अहमद ने हलके स्वर में जवाब दिया "देखो रोशन, तुम्हारी और मेरी परिस्थिति और हैसियत में ज़मीन आसमान का अंतर है. तुम शहर में रहते हो और अपनी बच्ची को जितना चाहे पढ़ा सकते हो. लेकिन हमारे यहाँ तो बच्चियों को पढ़ाना कहाँ आसान है, उन्हें तो बस प्राइमरी तक पढ़ाकर शादी कर दी जाती है. अब सकीना पढ़ाई भी तो नहीं कर रही है तो शादी करने के अलावा और कोई रास्ता भी नहीं है हमारे पास".  
एक एक बात सही थी अहमद के हिसाब से लेकिन रोशन के लिए ये सब उचित नहीं था. वह अपनी जगह से उठा और अहमद के बगल में जाकर बैठ गया. कुछ देर तक वह अहमद के हाथ को अपने हाथ से सहलाता रहा फिर शबनम भाभी की तरफ मुखातिब होकर बोला "आखिर सकीना पढ़ क्यों नहीं सकती, तुम ही तो कहते थे कि उसकी पढ़ाई में बहुत रूचि है. और अगर बात स्कूल की है या माहौल की है तो तुम उसे हमारे यहाँ रखकर पढ़ा सकते हो. यक़ीन मानो, इसमें शायद सबसे ज्यादा ख़ुशी विभा और राशि को ही होगी".  




   




Sunday, December 11, 2016

समझ--लघुकथा

"पापा, आज चलेंगे ना बाजार, यूनिफार्म का कोट लेना है, टीचर डांटती है", सुबह सुबह जैसे ही बिटिया ने हाथ पकड़कर कहा, वह चौंक गया| उसने बेटी को प्यार से देखा, उसके चेहरे पर मासूमियत जैसे भरी पड़ी थी| उसे कल शाम की बात याद आ गयी, पत्नी की फरमाईश से तंग आकर उसने उसे बुरी तरह झाड़ दिया था और वह रोती हुई अपने पिता के घर चली गयी थी| अभी वह परेशान ही था कि बेटी ने भी आकर अपने कोट के लिए कहा और फिर उसको भी उसने वैसे ही डांट दिया था| उसने सोच लिया था कि इस बार महीनों पत्नी से न तो बात करेगा और न ही लेने जायेगा| वैसे भी स्कूल बंद होने जा रहा था, बस बेटी को किसी तरह माँ के साथ नहीं रहने के लिए समझा देगा|
पैसे की तंगी तो चल ही रही थी, ऊपर से ये फरमाईशें| ऐसे में झल्लाहट आ जाती थी उसे और फिर वह अपना आपा खो देता था| लेकिन बेटी के प्यार भरे मनुहार ने उसे जैसे सब कुछ समझा दिया|
"चलो बेटा, तुम्हारा कोट भी ले लेंगे और मम्मी को भी लेते आएंगे", कहते हुए उसने बेटी को गोद में उठाया और घर से निकल गया|   

Thursday, December 8, 2016

तारीख--लघुकथा

अदालत में बैठे बैठे उनकी आंख लग गयी, अभी तक जज साहब नहीं आये थे और लगता था कि आज भी नहीं आएंगे| लगभग साल होने को आये थे लेकिन मामला पहली सुनवाई के बाद आगे नहीं बढ़ पाया था| पता नहीं और कितने महीने या साल लग जायेंगे इसमें, उनको खुद को समझ में नहीं आ रहा था|
शादी के कुछ ही हफ्ते बाद पत्नी ने शिकायत करना शुरू कर दिया और एक दिन वह अपना सूटकेस लेकर निकल गयी| शाम को जब उन्होंने फोन किया तो उसने साफ़ साफ़ कह दिया कि वह उनके साथ नहीं रह सकती| उन्होंने समझाने की बहुत कोशिश की, उसके घर भी गए लेकिन न तो पत्नी ने उनसे सीधे मुंह बात की और न ही उसके परिवार वालों ने| उलटे कुछ दिन बाद ही उनके पास तलाक का कागज़ आ गया और साथ में धमकी भी कि अगर ज्यादा कुछ बोला तो दहेज़ उत्पीडन का मामला भी लगा देंगे| इस बीच उनको पता चल गया था कि पत्नी का अफेयर किसी और के साथ था| लेकिन उसने किस दबाव में उनसे शादी कर ली, उनको पता भी नहीं था| उन्होंने इस बाबत भी एकाध बार पूछा लेकिन जवाब नहीं मिला उनको|
उन्होंने एक बार अंगड़ाई ली और अगल बगल देखा| बगल में कोई अखबार छोड़ के चला गया था, जो कि आश्चर्यजनक था| आजकल तो लोग अखबार भी पढ़ने के बाद लेकर चले जाते हैं कि घर पर रहेगा तो रद्दी में बिक ही जायेगा| खैर उन्होंने अनमने मन से अखबार उठाया और उसपर नजर दौड़ाने लगे| एक खबर पर उनकी नजर टिक गयी, खबर ट्रिपल तलाक़ के बारे में थी और लिखा था कि इसका बंद होना बहुत जरुरी है| पढ़ते हुए वह सोच में डूब गए, कुछ समय पहले तक तो उनका भी यही मानना था कि इसे बंद होना चाहिए| लेकिन आज वह खुद तंय नहीं कर पा रहे थे कि अगर दोनों तलाक़ के लिए तैयार हों तो क्या ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए|
तभी कमरे में शोर बढ़ गया और उनकी तन्द्रा भंग हुई| सामने देखने पर पता चला कि आज भी जज साहब नहीं आएंगे और लोग अगली तारीख लगवाने के लिए लग गए थे| उन्होंने भी विचारों को झटका दिया और अगली तारीख लगवाने के लिए बढ़ गए|   

Monday, December 5, 2016

दुनियादारी- लघुकथा

"आज फिर तेरा मुँह सूखा सूखा लग रहा है, लगता है आज भी कुछ नहीं खाया तूने", माँ ने उसको देखते ही टोका|
"बहुत भूख लगी है माँ, कुछ खिला पहले", उसने बात को टालने की गर्ज से कहा|
"ठीक है तू हाथ मुँह धो ले, कुछ गर्मागर्म बनाती हूँ तेरे लिए", माँ तुरंत रसोई की तरफ लपकी और फिर उसका बोलना चालू हो गया "पता नहीं कब अकल आएगी इस छोरे को"|
जल्दी से गरम पकोड़े उसके सामने रखते हुए वह बोली "चाय भी बना रही हूँ, तू आराम से खा| वैसे आज तूने पैसों का क्या किया, टिफ़िन तो तू ले ही नहीं जाता"|
"बहुत अच्छे बनाती है तू पकोड़े, इतना बढ़िया कहीं नहीं मिलता", उसने जल्दी जल्दी खाते हुए कहा|
"ठीक है, इतना मस्का मत लगा, और लाती हूँ", एक बार उसके सर पर प्यार से हाथ फेरते हुए माँ फिर से किचेन में घुस गयी|
"ले, चाय भी पी, और बता आज पैसे कहाँ गए", माँ उसके सामने बैठ गयी|
"माँ, आज रग्घू के पास पैसे नहीं थे, उसने बोला कि सुबह से कुछ खाया नहीं है तो मैं क्या करता", उसने चाय पीते हुए कहा|
उनकी बात सुन रहे पिताजी ने अपने हाथ का अखबार नीचे रखा और उसको घूरते हुए कहा "कब समझेगा तू, जिसे देखो वही बेवकूफ बना के चल जाता है| अरे इस तरह से रहेगा तो दुनिया लूट लेगी तुझको"|
माँ ने एक बार कड़ी निगाहों से पिताजी को देखा और उठ कर उसका सर सहलाने लगी "कोई जरुरत नहीं है तुझे दुनियादारी सीखने की, तू जिंदगी भर बस ऐसे ही रहना"|
उसने एक बार निगाह उठाकर माँ की तरफ देखा और मुस्कुरा उठा| पिता ने एक लंबी सांस छोड़ी फिर से अखबार उठा लिया, उनको भी पता था कि वह कभी नहीं समझेगा|   

Tuesday, November 29, 2016

परवरिश--लघुकथा

सुरजू बुरी तरह निराश हो गए थे, उनको लगा जैसे उनके जीवन भर की कमाई जैसे एक पल में लुट गयी हो| अपने खानदान के सबसे बड़े होने के चलते उन्होंने कभी ये नहीं सोचा कि उनकी अपनी पत्नी या अपने बच्चे कौन हैं, सबको एक बराबर देखते रहे| बल्कि हमेशा भाईयों के बच्चों को ही ज्यादा लाड़ किया और कभी परवाह नहीं की कि उनके अपने बच्चे बुरा मान सकते हैं| कई बार उन्होंने अपनी पत्नी को भी डांट दिया था कि यह पूरा परिवार ही उन सबका है|
आज उनका बड़ा भतीजा अपनी नौकरी से लौट कर आया तो सबसे ज्यादा ख़ुशी उनको ही थी| जब तक वह घर नहीं आया था, सुरजू बार बार समय देख रहे थे कि अब तक आया क्यों नहीं| गांव में कुछ ही बसें चलती थीं और एक बस निकल गयी तो दूसरी के लिए घंटों इंतज़ार करना पड़ता था| भतीजे ने जैसे ही घर में कदम रखा, उन्होंने लपक कर उसको गले लगा लिया और उससे सवाल करना शुरू कर दिया| लेकिन उसने उनकी एकाध बात का जवाब दिया और जल्दी से अपनी माँ के कमरे में घुस गया| थोड़ा अजीब तो लगा सुरजू को, लेकिन फिर उन्होंने भतीजे का माँ के लिए प्रेम समझ कर ध्यान नहीं दिया|
कुछ ही देर में भाई भी आ गया और उसके आते ही भतीजा लपक कर उसके पास आया और एक बढ़िया सा कुर्ता निकाल कर देते हुए बोला "पापा, मेरी पहली तनख्वाह में से ये आपके लिए लाया हूँ| पहन कर देखिये जरा"| भाई ने एक बार कुर्ते को देखा और फिर उसका ध्यान सुरजू की तरफ गया| तब तक भतीजे को भी समझ में आ गया कि उसने गलती कर दी| हड़बड़ाहट में उसने कहा "आपके लिए भी लाया हूँ बड़े पापा", और कमरे की तरफ भागा| सुरजू ने मुस्कुराने की कोशिश की और बाहर निकल गए|
कहाँ गलती कर दी उन्होंने, इसी उधेड़बुन में डूबे सुरजू दालान में बैठे हुए थे कि सामने कुछ आहट हुई| उन्होंने देखा कि भाई, भतीजा और उसकी माँ सब खड़े हैं और उनके पीछे उनकी पत्नी भी हैं| भाई ने कुर्ता उनके ऊपर रखा और भतीजा उनके पैर के पास बैठ गया| किसी ने कुछ भी नहीं कहा लेकिन उनको अपनी परवरिश पर नाज हो आया|

Wednesday, November 23, 2016

चाँद का मिलना--व्यंग्य

ठहाकों की आवाज़ से कमरा गूंज रहा था, आज बहुत सालों बाद रीमा का सहपाठी रोहन उससे मिलने आया था| पिछले दो घंटे से पिछले १५ सालों की बातें दोनों एक दूसरे को बता रहे थे और साथ पढ़े बाकी दोस्तों के बारे में भी एक दूसरे को बताते जा रहे थे| रीमा ने रमेश को भी बता दिया था कि ऑफिस से जल्दी आ जाना और उसने हामी भर दी थी|
अचानक बात का सिलसिला कॉलेज के जमाने के शौक के बारे में चल निकला| रोहन ने एक गहरी सांस ली और अपने सर पर हाथ फेरते हुए बोला "यार, तुम्हारी एक आदत मुझे अब भी नहीं भूलती| कितना चिढ़ती थी तुम उस लड़के से जिसके सर पर बाल बहुत कम थे और उसको टकलू बोलने का कोई मौका नहीं छोड़ती थी| उस समय मैं तो बच जाता था क्योंकि मेरे सर पर बालों की बढ़िया फसल लहलहाती थी| लेकिन अब तो स्थिति तुम देख ही रही हो कि काफी ख़राब हो गयी है"|
रीमा ने अब ध्यान दिया, वाकई उसके सर के बाल काफी झड़ गए थे| उसके चेहरे पर एक मुस्कराहट आ गयी लेकिन उसने बात बदलने के लिए कहा "खैर ये बताओ, अपने परिवार से कब मिलवाओगे"|
"बहुत जल्द मिलवाऊंगा, अगली बार साथ ही लेकर आऊंगा| लेकिन तुम एक बात का ध्यान रखना, उसके सामने मुझे टकला मत बुलाना वर्ना वो बहुत बुरा मान जाएगी", रोहन ने कस कर ठहाका लगाया|
रीमा ने भी भरसक उसके ठहाके में उसका साथ देने की कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हो पायी| तब तक रोहन ने एक बार फिर उससे कहा "अच्छा ये बता, अगर तेरी शादी किसी टकले से तंय हुई होती तो तुम तो मंडप से ही उठ कर भाग गयी होती| खैर जरा अपने महाशय की एक फोटो तो दिखा मुझको, देखूं तो सही कितने बाल हैं सर पर"|
"मैं चाय लेकर आती हूँ", कहकर रीमा उठी और किचन में घुस गयी| रोहन भी वहीँ पड़ी मैगज़ीन लेकर पलटने लगा तभी दरवाजे की घंटी बजी और थोड़ी देर में रमेश ने आकर रोहन से हाथ मिलाया और दोनों आमने सामने बैठ गए|
रीमा जैसे ही चाय लेकर अंदर आयी, उसी समय रोहन की नज़र रमेश के सर पर पड़ी| एकदम सफाचट सर चाँद की तरह चमक रहा था और रीमा की नज़र जैसे ही रोहन से मिली, वह झेंप गयी|
"अरे आप भी मेरी तरह टकले हो गए", कहकर रोहन ने एक जोर का ठहाका लगाया और रमेश भी उसमें शामिल हो गया| झेंप मिटाकर रीमा भी अब मुस्कुराने लगी| 

Tuesday, November 22, 2016

नोट बंदी--अधूरी कहानी

सुखिया ने अपनी धोती को एक बार और कस के कमर में खोंसा और हंसुआ लेकर खेत की ओर चल दी| उसके साथ साथ उसके टोला की और भी कई महिलाएं खेत की तरफ जा रही थीं| धान तैयार था और कटाई जोरो से चल रही थी और रोज ही जल्दी घर से निकल कर खेतों में काम करने जाना आजकल दिनचर्या बन गयी थी| एक बार धान के रोपाई के समय इसी तरह से काम रहता था और अब धान के कटाई के समय| बुधिया ने आज अपना हंसिया तेज कर लिया था और सूरज की किरणों से वह चमक रहा था|
"आज तो बहुत जल्दी जल्दी काट लेगी बुधिया, एकदम चमचमाता हंसिया है तुम्हरा", सुखिया ने उसे छेड़ते हुए कहा|
"सो तो है लेकिन कहीं कउनो अउर भी आ गया तो उहो कट जायेगा आज", बुधिया ने भी चिकोटी ली|
जल्दी जल्दी कदम बढ़ाते हुए टोली जैसे ही गांव के बीच से निकल रही थी कि उनकी नज़र एक गाड़ी पर पड़ी| कुछ लोग जो देख कर ही शहरी लग रहे थे उस गाड़ी के अगल बगल खड़े थे और लग रहा था जैसे कोई बैठकी होने वाली हो| सुखिया के कदम उसको देखकर रुक गए, साथ साथ बाकी टोली भी ठिठक गयी| उनमें से एक आदमी के हाथ में माइक था औऱ पीछे एक कैमरा वाला भी था साथ में|
"इ सब तो टी वी में देखा है, कुछो पूछत हैं सबसे इ लोग", टोली में से किसी ने कहा|
"हाँ रे, देखा तो है इन लोगों को, लगत है आज इँहा भी कुछ पुछीहें इ लोग", अब सुखिया को भी याद आ गया| उनके टोला में भी कुछ लोगों के घर टी वी था औऱ कभी कभी उ देखने चली जाती थी|
उधर टी वी का एंकर वहां खड़े ठाकुर से कुछ पूछ रहा था औऱ कैमरा वाला सब तरफ कैमरा घुमा रहा था| टोली कौतुहल में कड़ी थी औऱ देख रही थी तभी किसी ने कहा "अरे छोड़ इ सब तमाशा, धान काटे में देर हो जाई, जल्दी चला सब लोग"|
लेकिन किसी के भी कदम आगे नहीं बढे, जीवन में पहली बार ऐसा सामने देखने को मिल रहा था| इतने में एंकर की नजर टोली पर पड़ी तो उसे लगा कि इनसे बात करने पर ज्यादा बढ़िया खबर बनेगी| उसने कैमरा वाले को इशारा किया औऱ दोनों इस टोली की तरफ बढ़े|
माइक वाले को अपनी तरफ आते देखकर टोली के लोग पीछे हटने लगे, कुछ तो खेतों की तरफ भागीं| उनको भागते देखकर एंकर ने उनको पुकारा "अरे रुकिए आप लोग, आप लोगों से भी कुछ पूछना है हमको"|
सुखिया खड़ी थी औऱ उसको देखकर बुधिया औऱ कुछ औऱ औरतें भी खड़ी हो गयीं| नजदीक पहुंचकर एंकर ने उनको समझाया कि वह कुछ सवाल उनसे पूछेगा औऱ अगर संभव हो तो जवाब दीजिये| सुखिया औऱ बुधिया ने सर हामीं में हिलाया तो एंकर उनकी तरफ बढ़ा| टोली की बाकी औरतें उनके पीछे सहमी सी खड़ी हो गयीं|
जैसे ही एंकर ने माइक बुधिया की तरफ बढ़ाया, उसने सबसे पहले अपना पल्लू ठीक किया औऱ माथे पर आये पसीने को पोंछ लिया| फिर उसे ध्यान आया कि उसका हंसिया तो हाथ में ही है तो वह उसको नीचे रखने लगी|
"अरे आप हंसिया हाथ में ही लिए रहिये, कोई दिक्कत नहीं है", एंकर के कहने पर बुधिया ने हंसिया वापस पकड़ लिया|
"खड़ी बोली में पूछे तो समझ जाएंगी ना आप| जवाब चाहे भोजपुरी में दे दीजियेगा", एंकर ने पूछा तो बुधिया ने सर हिला दिया| इतनी खड़ी बोली तो उसे समझ में आती थी, हाँ बोलने में जरूर दिक्कत थी| इस घबराहट में भी उसे एक चीज बहुत अच्छी लगी कि जिंदगी में पहली बार किसी ने उससे आप कहकर बात किया|

Monday, November 21, 2016

कुशल क्षेम--लघुकथा

आज ही वह घर आया था और उसने सोच रखा था कि इस बार पिताजी को टोक देगा कि बार बार फोन मत किया करें| अब तो साथ के बच्चे भी उसे चिढाने लगे थे कि पता नहीं वह कब बड़ा होगा| बाकी बच्चे तो अपने पिता का कई बार फोन ही उठाते ही नहीं थे और बाद में एक छोटा सा मैसेज कर देते थे कि लाइब्रेरी में था|
नहा धोकर उसने फोन उठाया और जाकर पिता के सामने बैठ गया, पिताजी उस समय अखबार देख रहे थे| उसको आता देखकर उन्होंने अखबार रखा और उसको भरपूर निगाहों से देखने लगे| उसने बात शुरू करते हुए कहा "इस बार ठण्ड कुछ जल्दी ही शुरू हो गयी पिताजी?
पिताजी ने एक बार बाहर नजर डाली और हाँ में सर हिलाते हुए पूछा "स्वेटर वगैरह तो हैं ना काम भर के तुम्हारे पास, कुछ लेना हो तो शाम को चल के ले लेना"|
"मेरे पास काफी हैं, आप चिंता मत कीजिये, वहीं ले लिये थे मैंने| आप तो अपना ध्यान रखते हैं ना?, उसने फोन को हाथ में से रख दिया|
"खाना पीना ठीक से खाया कर और किसी भी चीज की जरुरत हुआ करे तो मुझे बता दिया कर| तेरी माँ होती तो सब कुछ वही देख लेती", पिताजी ने उसको प्यार से देखते हुए कहा|
अब बोल ही देता हूँ, सोचते हुए उसने कहा "पिताजी, आप बार बार फोन मत किया कीजिये, ठीक नहीं लगता है| मुझे कोई जरुरत होगी तो मैं आपको बोल दूंगा"| लेकिन दोस्त हंसी उड़ाते हैं, ये कह नहीं पाया|
पिताजी को जैसे झटका लगा और उन्होंने उसको देखते हुए धीरे से कहा "लेकिन मुझे जो जरुरत होती है तुम्हारे कुशल क्षेम की, उसके लिए क्या करूँ?, और वहां से चल दिए|
वह उठ कर पिताजी के पीछे पीछे उनके कमरे में गया| पिताजी ने अपने छोटे से संदूक में से एक पोस्टकार्ड निकाला और उसकी तरफ बढ़ाते हुए बोले "आज सुविधा है तो मैं फोन कर लेता हूँ, पहले तो सिर्फ यही साधन था"|
उसने गौर से एक बार उस पुराने पोस्ट कार्ड को देखा और फिर पिताजी को, फिर धीरे से पिताजी का हाथ पकड़ लिया| 

Thursday, November 17, 2016

ममता की डोर--लघुकथा

"अरे जल्दी घर आओ. माँजी वापस आ गयी हैं| मैंने पूछा भी लेकिन कुछ कहा नहीं उन्होंने", पत्नी का फोन सुनते ही उसका माथा ठनका|
"ठीक है, तुम देखो, मैं जल्दी आता हूँ", कहकर उसने फोन रख दिया| उसको भी समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक माँ घर क्यों आ गयी| अभी तीन महीने पहले ही तो उनको वृद्धाश्रम में छोड़ कर आया था|
इसी उधेड़बुन में डूबा हुआ वह जल्दी जल्दी घर पहुंचा| पत्नी भी अंदर कुछ परेशान खड़ी थी, एक तो वैसे ही नोट बंदी के चलते हालत पतली थी, उसपर माँ भी आ गयी|
"माँ, सब ठीक तो है वहाँ", और क्या पूछे, उसे समझ में नहीं आया|
माँ ने उसकी तरफ देखा और अपनी कमर में खोंसा हुआ अपना बटुआ निकाला| बटुआ उसको पकड़ाती हुई वह बोली "इसमें पचास का एक पैकेट है जो तू मुझे दे कर आया था, अभी पता चला तो मैं देने आ गयी| चल मुझे वापस छोड़ आ, वहाँ पर सब इन्तजार कर रहे होंगे"|
माँ चलने के लिए खड़ी हो गयी, वह कुर्सी से खड़ा नहीं हो पाया| 

Monday, November 14, 2016

खरा सिक्का--लघुकथा

बस में बैठे राम सरन सोच रहे थे कि कितना गलत समझ था उन्होंने रग्घू के बारे में| बगल में रग्घू की माँ भी बैठी थी, थकी हुई लेकिन संतुष्ट, लेकिन उनकी हिम्मत नहीं पड़ रही थी कि उससे आंख मिला सकें| रग्घू पानी का बोतल लेकर आया और राम सरन को पकड़ा कर बगल में बैठ गया| बस ने एक झटका लिया और चल पड़ी, राम सरन की यादों को भी झटका लगा और वह पुरानी बातों में खो गए|
रग्घू उनका छोटा बेटा था और बड़े बेटे की तरह पढ़ने में तेज नहीं था| हर बार जब दोनों बेटे परीक्षाफल लेकर आते तो उस दिन रग्घू की पिटाई निश्चित होती| माँ ने कितनी ही बार कहा कि रग्घू को समझ कम है लेकिन जरुरी तो नहीं कि हर बच्चा पढ़ने में ही आगे निकले, लेकिन उनको तो लगता था कि अगर पढ़ नहीं सकता तो किसी भी काम लायक नहीं होगा|
फिर रग्घू ने जब अपना छोटा सा कारोबार करना चाहा था तो उनको लगा था जैसे वह खानदान की इज़्ज़त डुबो देगा| कहाँ बड़ा बेटा इतने उच्च पद पर और कहाँ रग्घू, लेकिन माँ ने पहली बार खुल कर रग्घू का पक्ष लेते हुए उनसे बहस की थी|
कल जब रग्घू ने माँ से फिर पूछा था कि क्यों नहीं आ जाते हमारे घर, तो माँ के सब्र का बांध टूट गया|
"कब तक बड़े बेटे के बुलावे का इंतजार करोगे, अगर तुमको नहीं चलना है तो मैं अकेले ही चली जाउंगी रग्घू के यहाँ", माँ ने कह तो दिया था लेकिन उनको भी पता था कि इस उमर में वह उनको अकेला छोड़कर नहीं जाएगी|
"ठीक है बोल दो उसको, चलते हैं उसके यहाँ ही"|
खरे सिक्के को पहचानने में उनसे कितनी भूल हो गयी थी, सोचते हुए उन्होंने बस की सीट पर सर टिकाया और आंख मूंद लीं|

अपने हिस्से की क़ुर्बानी--लघुकथा

"अरे अम्मा, पगला गयी हो क्या, अपना काम कैसे चलेगा, पता नहीं कितना दिन ये चलेगा", छोटका ने माँ को एक बार फिर से चिल्लाकर कहा|
"अपना काम तो चल ही जायेगा, लेकिन पड़ोस के तय्यब मियां का क्या होगा| तीन दिन से दिहाड़ी नहीं किया है उन्होंने, उनके बच्चों की भूख अब नहीं देखी जाती", अम्मा ने चिंतित स्वर में कहा|
"अपने घर में ही कहाँ बहुत है और पैसे भी तो ज्यादा नहीं हैं| मैं तुमको नहीं ले जाने दूँगा", छोटका अम्मा के सामने आकर खड़ा हो गया|
"अरे बेशर्म, एक टाइम का खाना अगर छोड़ दिया भी तो मर नहीं जायेंगे हम लोग| लेकिन मेरे रहते किसी के घर में फांके पड़े, मुझसे देखा नहीं जायेगा", अम्मा ने उसका हाथ झिड़क दिया|
"आखिर एक फौजी का खून है मुझमें, और आहुति सिर्फ सीमा पर खड़े लोग ही नहीं देते| थोड़ी बहुत क़ुर्बानी तो हमको भी देनी पड़ेगी अपने मुल्क और अपने लोगों के लिए", कहते हुए अम्मा निकल गयीं|
छोटका ने एक बार घर में अपनी बीबी की तरफ देखा और उसकी नजर में भी हिकारत के भाव देखकर बाहर निकल गया|
थोड़ी देर बाद वह एक बैंक के सामने लाइन में खड़े लोगों को पानी पिला रहा था|

Thursday, November 10, 2016

मास्टर स्ट्रोक --व्यंग्य

मौसम तो कमोबेश वही था लेकिन घर का माहौल कुछ बदला बदला सा लग रहा था| ऑफिस से घर आने में लगभग एक घंटा लग जाता था इसलिए इस एक घंटे में देश दुनियां में क्या हुआ, इसका पता शर्माजी को घर पहुँचने पर ही लगता था| लेकिन घर पहुँचते ही टी वी खोलने का मतलब शेर के मुंह में हाथ डालना होता था| शर्माजी का घर पहुँचने का समय वैसे ही कुछ ऐसा था कि श्रीमतीजी का दिमाग चढ़ा ही रहता था और उसपर कहीं गलती से पहुँचते ही टी वी खोल दिया तो फिर पता नहीं क्या क्या सुनना पड़ जाता था| उस दिन भी ऐसा ही कुछ हुआ, घर पहुँचते पहुँचते लगभग रात के साढ़े आठ बज गए थे| और आशा के विपरीत, उस दिन श्रीमतीजी घर के बाहर ही खड़ी मिल गयीं| थोड़ा अजीब तो लगा लेकिन ज्यादा ध्यान न देते हुए शर्माजी घर के अंदर जाने लगे|
"लाईये बैग दे दीजिये, कितना थक जाते हैं आप आजकल", कहते हुए जब श्रीमतीजी ने बैग लगभग जबरदस्ती हाथ से ले लिया तो शर्माजी को झटका लगा| कहाँ तो ये सुनने को मिलता था कि इतनी देर तक क्या करते रहते हो, कहाँ घूमते हो, बगल में वर्माजी को देखो, शाम को ही घर आ जाते हैं और एक तुम हो| और पानी के लिए भी अक्सर खुद ही किचन में जाना पड़ता था| और आज अचानक इतनी चिंता उनके थकान की, शर्माजी अचकचा गए|
अब जो सबसे पहली चीज उनके दिमाग में आयी वो यह थी कि लगता है उनकी सास आने वाली हैं| क्योंकि उन नाचीज की इतनी इज्जत तो तभी होती थी जब उनके ससुराल पक्ष का कोई आने वाला हो| खैर अब तो आ ही रही हैं तो क्या किया जा सकता है, सोचते हुए शर्माजी सोफे पर बैठ गए| अभी झुक कर जूते के तस्में खोल ही रहे थे कि श्रीमतीजी पानी का ग्लास लेकर हाजिर थीं| शर्माजीने अपने लगभग फट चुके जूते निकाले जो काफी बेगैरत से हो गए थे, एकदम उन्हीं की तरह| पिछले तीन महीने से सोच रहे थे कि नए ले लें लेकिन एक तो जूते बहुत महंगे हो गए थे और दूसरे महीने के खर्च के बाद शायद ही उनके पास कुछ बचता था| एकाध बार दबी जबान में उन्होंने श्रीमतीजी से कहा भी कि एक जोड़ी नए जूते ले लें लेकिन प्रचंड महंगाई का रोना रोते हुए श्रीमतीजी ने उनको मौका ही नहीं दिया|
जैसे ही उन्होंने पानी पीना शुरू किया, श्रीमतीजी ने झुक कर जूते उठाये और उसे रखने ले जाने लगीं| आखिर ये आज क्या हो रहा है घर में, सोचकर शर्माजी एकदम से बौखला गए और उसी चक्कर में पानी उनके नाक में चढ़ गया| खांसते हुए उन्होंने श्रीमतीजी की तरफ अचरज से देखा कि ये क्या कर रही हो| वैसे तो शर्माजी खुद ही अपने जूते रैक पर रखकर ही कमरे में प्रवेश करते थे, लेकिन अगर कभी थकान के चलते या गलती से भी जूते रैक पर नहीं रखे तो घंटों भाषण सुनने को मिल जाता था| श्रीमतीजी उनकी खांसी सुनकर हाथ में जूते पकडे हुए ही पलटी और उनको समझाने लगीं "आराम से पानी पीजिये, इतनी भी क्या जल्दी है| और हाँ, ये जूते बहुत पुराने हो गए हैं, इस रविवार को चलकर नए ले लेते हैं आपके लिए"|
अब शर्माजी को पूरा भरोसा हो गया कि न सिर्फ उनकी सास, बल्कि कुछ और लोग भी आ रहे हैं ससुराल से| और लगता है इस बार कुछ हफ्ते यहीं रहकर जायेंगे| उन्होंने अपनी उखड़ी सांस ठीक की और श्रीमतीजी को हैरत से देखते हुए पूछा "कौन कौन आ रहा है ससुराल से"|
"अरे कोई भी नहीं आ रहा, आप भी हमेशा गलत ही सोचते हैं| अच्छा ये बताईये कि आपने आज की खबर सुनी की नहीं"|
शर्माजी ने सर हिलाया, वैसे उनको आभास तो हो गया था आते समय कि कुछ हुआ है| जैसे ही बस से उतर कर पैदल घर की तरफ चले, लोगों को झुण्ड में बात करते देखा था उन्होंने| अब कहने को तो उनके पास भी एक स्मार्ट फोन था जिसमें उनका फेस बुक और व्हाट्सअप भी चलता था, लेकिन इतना पैसा कहाँ रहता था कि मोबाइल डाटा भरवा सकें| इसलिए उनका स्मार्टफोन या तो ऑफिस, या घर जहाँ भी वाई फाई था, वहीँ चलता था| बाकी समय तो सिर्फ दिखाने के लिए स्मार्टफोन था, हाँ फोन जरूर आते रहते थे, खुद तो कभी कभी ही करते थे|
"क्या हुआ आज, मुझे तो खबर ही नहीं", कह ही रहे थे कि उनके फोन ने वाई फाई के सिग्नल को पकड़ा और फिर दना दन मैसेज आने शुरू हो गए| इतने में श्रीमतीजी ने भी टी वी चालू कर दिया और शर्माजी की नजर आज के ब्रेकिंग न्यूज़ पर पड़ी| एक बार तो उनको विश्वास ही नहीं हुआ कि ऐसा भी हो सकता है, भला इतनी प्यारी और कीमती चीज भी कभी बेकार या बंद हो सकती हैं| उनको तो बस महीने के शुरुआत में ही एकाध दिन इनके दर्शन होते थे, उसके बाद तो ये भी श्रीमतीजी की मुस्कराहट जैसे हो जाते थे, भूले भटके कभी दिख गए तो दिख गए, नहीं तो फिर अगले महीने ही|
अब जैसे जैसे वो समाचार देखते जा रहे थे, उनको अपनी माली हालत पर दुःख कम, प्रसन्नता ज्यादा हो रही थी| उनकी जेब में तो एक भी पांच सौ या हजार का नोट नहीं था, इसलिए चिंता की कोई बात नज़र नहीं आ रही थी उनको, लेकिन अपने ऑफिस के कई कर्मचारियों का ख्याल उनके मन में तुरंत आया| जब भी कैंटीन में कुछ खाने पीने जाते थे, उनके सहकर्मियों के पर्स से लगभग बाहर गिरते हुए पांच सौ और हजार के नोटों को देखकर उनको लगता जैसे ये नोट उनको चिढाने के लिए ही रखते हैं| लेकिन अब वह सोच रहे थे कि और रखो ये नोट पर्स में और हमारे जैसों को हीन भावना का शिकार बनाओ| उनको अब समाचार देखने में मजा आने लगा|
श्रीमतीजी कब बगल में चाय का प्याला लेकर बैठ गयीं, उनको पता ही नहीं चला| खैर जब चाय उनके सामने आयी तो उन्होंने हाथ में पकड़ा और समाचार देखते हुए सुड़ुक सुड़ुक कर पीना शुरू कर दिया| किसी और दिन अगर वह चाय को इस तरह सुड़ुक के पी रहे होते तो उनकी तगड़ी क्लास लग गयी होती, लेकिन आज न तो उनको होश था समाचार के आगे और न ही श्रीमतीजी को उनके सुड़कने की परवाह|
थोड़ी देर बाद ही शर्माजी ने विजयी भाव से श्रीमतीजी को देखा और हँसते हुए बोले "बहुत अच्छा किया सरकार ने, मजा आ गया| अब अपने पास तो कोई नोट है नहीं तो क्या चिंता"| लेकिन श्रीमतीजी का चेहरा गंभीर बना रहा तो उनको याद आया कि अभी तक तो उनको वजह पता ही नहीं चली आज के इस व्यवहार परिवर्तन की|
"क्या हुआ, कुछ बताती क्यों नहीं, क्या बात है", उन्होंने श्रीमतीजी को गौर से देखते हुए कहा|
"अच्छा ये बताओ, क्या सच में ये वाले नोट बेकार हो गए हैं, अब इनसे कुछ भी नहीं ख़रीदा जा सकता", श्रीमतीजी के चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ़ दिख रही थी|
"नहीं, बेकार क्यों होंगे, उनको बदला तो जा ही सकता है| खैर तुमको क्या चिंता, कौन सा हम लोगों के पास ये नोट पड़े हुए हैं", शर्माजी ने प्यार से समझाया|
"लेकिन जिसका बैंक में खाता भी न हो तो उनका क्या होगा", श्रीमतीजी ने उनकी बात को अनसुना करते हुए फिर से पूछा|
"अब तुम्हारे पास न तो ऐसे नोट हैं और न ही बैंक खाता, तो फिर ऐसे सवाल क्यों पूछ रही हो", शर्माजी ने एक बार फिर समझाया|
श्रीमतीजी ने इस बार बहुत मायूसी से शर्माजी को देखा और धीरे से बोलीं "मेरे पास भी कुछ नोट रखे हैं"|
शर्माजी को तो जैसे बिजली का झटका लगा, अभी इसी महीने कई बार पैसे के लिए उनकी जम के तू तू मैं मैं हो चुकी थी श्रीमतीजी से| लगभग रोज शाम को ऑफिस से लौटने के बाद एक बार उनको श्रीमतीजी से सुनने को मिल ही जाता था कि जहर खाने के लिए भी पैसे नहीं बचे हैं, पता नहीं कब आपकी तनख्वाह बढ़ेगी| अगर गलती से भी उन्होंने कभी कुछ पैसे मांग लिए तो तूफ़ान आ जाता था| ऐसे में आज यह सुनकर कि श्रीमतीजी ने भी कुछ नोट बचा के रखे हैं, उनको बहुत हैरत हुई|
"अरे बचा के रखे थे तो मांगने पर इतनी खरी खोटी क्यों सुनाती थी| दे दिया होता तो आज ये नौबत तो नहीं आती", शर्माजी ने थोड़ा गुस्सा दिखाया|
"तुमको क्या, पूरा घर तो मुझे ही देखना होता है, तुम तो कुछ रुपल्ली पकड़ा कर चल देते हो", श्रीमतीजी के आवाज में पुराना अंदाज आया ही था कि उनको लगा ये वक़्त गुस्से का नहीं है तो संभल गयीं|
"अब घर परिवार के लिए ही तो बचाती हूँ, कौन सा अपने मायके भेजने के लिए बचत की थी", श्रीमतीजी का लहजा अब नरम पड़ गया था|
"कोई बात नहीं, मैं अपने खाते में जमा करा दूंगा| जो दो चार हों, दे देना मुझे", शर्माजी को भी थोड़ी प्रसन्नता होने लगी कि इसी बहाने ही सही, कुछ तो उनके खाते में भी जमा हो जाएंगे|
"लाती हूँ अभी", कहते हुए श्रीमतीजी बेड रूम में घुस गयीं| शर्माजी भी खबरों में डूब गए, एंकर लगातार कहता जा रहा था कि काले धन पर जबरदस्त प्रहार किया है सरकार ने|
इतने में श्रीमतीजी ने उनके सामने अपने झोला उलट दिया, शर्माजी की ऑंखें फटी की फटी रह गयी| कुछ हजार के और पांच सौ के इतने नोट तो उन्होंने अपनी जिंदगी में भी एक साथ नहीं देखे थे| तभी टी वी पर उनको एंकर की आवाज़ सुनाई पड़ी "सरकार के इस मास्टर स्ट्रोक से सारा काला धन बाहर निकल जायेगा", श्रीमतीजी कुछ हैरान और कुछ परेशान उनके सामने खड़ी थीं और वो सोच में पड़ गए कि अब इस धन को वह क्या कहें!

Saturday, November 5, 2016

आस्था और तरक्की--लघुकथा

आज जिलाधिकारी गरिमा बहुत प्रसन्न थीं,जो काम लोगों को समझा बुझा के और प्रशासन से सख्ती करवाकर वो नहीं करवा पायी थीं, उसको इस आस्था ने बड़ी ही आसानी से करवा दिया| और उससे भी बड़ी बात ये थी कि उन्होंने रजत को भी गलत साबित किया था|
दोनों ही एक ही बैच के आई ए इस थे और इस समय अलग अलग जिलों के जिलाधिकारी| जिस समय गरिमा की पोस्टिंग इस जिले में हुई थी, जिला पानी की समस्या से बुरी तरह जूझ रहा था| अंधाधुंध जल दोहन के चलते जलस्तर काफी नीचे चला गया था और गांवों में तालाब लगभगग मृतप्राय थे| कहने को तो एक महकमा था भूमि संरक्षण का लेकिन गांव वालों के असहयोग और भ्रष्टाचार के चलते योजनाएं लागू नहीं हो पा रही थीं| ऐसे में उनको लगा कि अगर जल संरक्षण को किसी त्यौहार या आस्था से जोड़ दिया जाये तो बात बन सकती है| फिर उन्होंने खुद गांव गांव घूमकर लोगों को समझाया और शुरू हुआ सिलसिला तालाब खुदाई का| साथ में उन्होंने ये बात भी हर गांव में कही थी कि जिस गांव के पोखर में सबसे ज्यादा पानी होगा, उसमें वह खुद गांववालों के साथ पूजा करेंगी| और जब यह बात उसने रजत से कही तो उसने इस बात का मखौल उड़ाया कि लोगों को इस तरीके से भी समझाया जा सकता है| रजत को तो बस एक ही तरीका समझ में आता था और वो था डंडे से समझाना और इस बात पर दोनों में घोर असहमति थी|  
पिछले दो सालों की मेहनत उसको आज फलीभूत होती दिख रही थी इस तालाब के पास आकर| गांव के लोगों के साथ उन्होंने भी पानी में एक बार डुबकी लगायी और एक अंजुल पानी सूर्य को अर्पित कर दिया| तालाब से बाहर निकलकर उसने वहां उपस्थित जन समुदाय के साथ एक सेल्फी ली और उसे एक स्माइली के साथ रजत को भेज दिया| आज पूरे जिले के हर गांव में आज ये पूजा पानी से लबालब भरे तालाबों में हो रही थी और उसके मन में भी सावन घुमड़ रहा था|  

Monday, October 31, 2016

निरपराध-- लघुकथा

शाम गहरा रही थी, हर तरफ पटाखों का शोर सुनाई दे रहा था| शर्माजी बहुत पेशोपेश में थे, दिल कहता था कि उनको श्याम के घर जाना चाहिए लेकिन आज सुबह से घर में चलती बहस का नतीजा इसके खिलाफ था| गलती तो उसने भयानक की थी लेकिन अब उसकी सजा तो वह भुगत ही रहा था| सबसे ज्यादा विरोध तो पत्नी ही कर रही थी जिसके बहुत से छोटे मोटे काम श्याम की पत्नी कर दिया करती थी|
पिछले कई साल से जानते थे श्याम को शर्माजी, मोहल्ले के आखिर में ही वह रहता था| किसी तरह एक कमरे का आधा अधूरा घर बनवा लिया था उसने और अपनी बीबी और छोटी बच्ची के साथ रहता था| पहले तो किसी और की गाड़ी चलाता था लेकिन कुछ पैसे जमा हो गए तो एक पुरानी गाड़ी खरीद कर खुद ही चलाने लगा| वह खुद तो बहुत कम ही दिखता था लेकिन उसकी पत्नी और बच्ची उसके घर आते रहते थे| कभी कुछ ज्यादा शिकायत भी नहीं सुनाई पड़ी थी उसके बारे में लेकिन उस रात नशे की हालात में श्याम ने जघन्य अपराध कर डाला|
शर्माजी बेचैनी में घर के अंदर गए, पत्नी फोन पर अपनी विधवा सहेली से बात कर रही थी "अरे बच्चों को क्यों रोकती हो त्यौहार मनाने से, उनकी क्या गलती है| मैं आ रही हूँ तुम्हारे घर और बच्चों को यहाँ ले आऊँगी, तुम मना मत करना"|
फोन रखकर जैसे ही पत्नी उनकी तरफ मुड़ी, उन्होंने गहरी नज़र से देखा| उनकी नज़र में भी वही सवाल था, इसमें बच्चों की क्या गलती है, फिर मुझे क्यों रोक रही थी तुम|
पत्नी को बात समझ आ गयी और उसने मिठाई और पटाखे का एक डिब्बा लाकर उनके हाथ में देते हुए कहा "चलो जल्दी से श्याम के घर देते हुए निकल जाएंगे, आखिर बच्चों की क्या गलती है इसमें"|

शुतुरमुर्ग--लघुकथा

सारे पैकेट संभाल कर उन्होंने कार में रखा और घर की तरफ चल पड़े| कल से बैंक बंद था, दीवाली की छुट्टी थी और रिश्तेदारों के साथ साथ पड़ोसियों को भी देने लायक मिठाईयाँ और तोहफे मिल गए थे| प्रसन्न मन से घर पहुंचकर उन्होंने सारे पैकेट निकाले और श्रीमतीजी को पकड़ाकर कपडे बदलने चले गए|
टी वी के सामने कुर्सी पर आराम से लेटे तो जॉग्राफीक चैनल पर शुतुरमुर्ग के बारे में चल रहे प्रोग्राम को देखने लगे| बैंक के माहौल को देखकर आजकल उनका मन कभी कभी कचोटने लगता, फिर वो अपने आप को तसल्ली देते कि वह इसमें कहाँ शामिल हैं|
"आखिर उसी ऑफिस में तो काम कर रहे हो तो शामिल कैसे नहीं हो", मन में एक आवाज़ आयी|
"मेरा विभाग अलग है, अब ऋण विभाग वाले और प्रबंधक जो भी करें, मैंने तो कभी कुछ नहीं माँगा", उन्होंने मन को समझाया|
"मतलब आँख के सामने सब कुछ हो रहा है, छोटे छोटे दुकानदारों तक को पैसे देने पड़ते है ऋण लेने के लिए| और तुमको लगता है कि तुम्हारा कोई रोल नहीं है इसमें", मन ने फिर से समझाया|
"देखो, न तो मैं किसी भी कागज पर हस्ताक्षर करता हूँ और न ही किसी भी ऋण लेने वाले से कोई ताल्लुक रखता हूँ| अब मुझे इन चीजों के लिए क्यों दोष दे रहे हो", उन्होंने एक बार फिर मन को समझाया|
"हाँ, ताल्लुक तो सिर्फ उनके द्वारा दिए गए उपहारों से रखते हो| संस्था के प्रति भी कोई जिम्मेदारी होती है या वह भी बाकी लोग ही देखेंगे", मन ने इस बार कस के फटकारा|
"लीजिये चाय पीजिये, इस बार की काजू कतली तो बेहतरीन है, बाजार से तो खरीदने की हिम्मत नहीं थी इस बार", पत्नी ने चाय के साथ मिठाई रखते हुए कहा|
उनकी निगाह टी वी पर पड़ी, उन्होंने देखा कि शुतुरमुर्ग को शेर ने मार डाला|
"ये मिठाई ले जाओ यहाँ से", एकदम से उन्होंने पत्नी से कहा| पत्नी ने उनको अजीब सी नजर से देखा और मिठाई लेकर चली गयी|
उन्होंने अब शुतुरमुर्ग बने रहने का फैसला बदल दिया था|  

Saturday, October 29, 2016

अपने लोग--लघुकथा

  सुरसत्ती देवी बहुत परेशान थी, रहा भी नहीं जा रहा था और कुछ करने की हिम्मत भी नहीं पड़ रही थी| वैसे तो अब धीरे धीरे पिछले कुछ महीनों में उन्होंने अपने आप को कुछ कुछ यहाँ के माहौल के हिसाब से ढाल लिया था, लेकिन फिर भी इस कूड़े को देखकर उनको बहुत खराब लग रहा था|
जब से बेटा इस नए मोहल्ले में उनको लेकर आया है, हमेशा समझाता रहा है कि पुरानी बातें भूल जाओ| शुरू में तो अपने ही घर के सोफे पर बैठने में उनको हिचक लगती थी, और अगर कोई घर पर आ गया तो समझ में ही नहीं आता था कि क्या करें| आखिर जिस तरह से जिंदगी के शुरूआती साल गुजारे थे, उससे उबरने में समय तो लगता ही है| पति की मौत के बाद सफाई कर्मचारी की नौकरी करते हुए किस तरह से उन्होंने बेटे को पढ़ाया था, ये उनको ही पता था| जब बेटे को बड़ी नौकरी मिली तो उसने साफ़ कह दिया कि अब ये नौकरी बंद और मेरे साथ शहर चलकर रहो| कहाँ छोटे से झोपड़े में रहने वाली और कहाँ ये शहर का घर, बार बार उनको लगता कि वापस अपने पुरानी जगह चली जाएँ|
कल की दिवाली में खूब जम के धूम धड़ाका हुआ था और सुबह जब उनकी आंख खुली तो बाहर सड़क पर चारो तरफ बस कूड़ा ही कूड़ा दिख रहा था| शायद आज सफाई वाली, जिसके लिए बहुत कुछ बेटे से छुपा कर उन्होंने रखा हुआ था, नहीं आयी थी| आज के दिन उनको अपना पुराना समय याद आ गया, पूरे इलाके को कायदे से साफ़ करती थीं और खूब बख्शीश भी मिलती थी| लेकिन आज यहाँ इतनी गन्दगी, उनसे देखा नहीं जा रहा था, लेकिन अगर साफ़ करते बेटे ने देख लिया तो बहुत नाराज होगा, इसका भी डर था|
तभी उनको दूर से सफाई वाली आती दिखी और उन्होंने तीन चाल बड़े पॉलिथीन में जो कुछ रखा हुआ था, उसे उठाया और जल्दी जल्दी बाहर निकल गयीं| उसे सब सामान देकर एक बार अपने घर की ओर देखा| बेटा अभी भी सो रहा है जानकर उन्होंने सफाई वाली को कस कर गले लगाया और उसे आश्चर्यचकित छोड़ कर वापस मुड़ गयीं| 

Monday, October 24, 2016

नयी रोशनी--लघुकथा

"क्या हुआ, इतना उदास क्यों हो आज", कमरे के एक कोने में पत्नी को चुपचाप बैठे देखकर उन्होंने पूछा|
"बेटी की बहुत याद आ रही है, दिवाली नज़दीक है ना| कितनी रौनक रहती थी घर में उसके रहने से, अब तो समय ही नहीं कटता है", पत्नी ने उनकी तरफ देखते हुए उदासी से कहा|
"हाँ, वो तो है, बेटियों से ही रौनक होती है", उन्होंने कुछ और कहना चाहा लेकिन चुप रह गए|
"वैसे उसने कल ही फोन किया था, कह रही थी कि बहुत खुश है वहाँ, उसे तो लगता ही नहीं कि वह उस घर की बहू है", पत्नी के चेहरे पर चमक आ गयी|
"फ़र्क़ तो है ही, बहू, बहू होती है और बेटी, बेटी", उनके मुंह से निकल गया|
"काश हमारी बहू भी ऐसी होती", पत्नी ने एक आह भरी|
"हमेशा कहती रहती हो कि बेटियाँ हमेशा माँ बाप का ध्यान रखती हैं| बहू को भी बेटी बनाकर देखो, शायद कभी दिक्कत नहीं आये", कहकर वह बाहर निकल गए|
पत्नी को सब समझ में आ गया लेकिन उनके सामने कुछ कह नहीं पायी|
थोड़ी देर बाद ही पत्नी बहू को फोन पर कह रही थी "इस दिवाली पर हमारी बेटी बनकर घर आ जाओ बहू"|

Thursday, October 20, 2016

सर्जिकल अटैक--व्यंग्य

चिरौंजीलाल बड़े पेशोपेश में थे, एक बार तो उनको लगा कि उनकी लुगाई ने बात बस यूँ ही कह दी, शायद बिना ज्यादा कुछ सोचे ही| लेकिन जब उन्होंने गौर से सोचा तो चेहरे पर चिंता की लकीरें दौड़ गईं कि भला मजाक में भी कोई ऐसा कहता है|
हफ़्तों क्या महीनों से ही घर में चर्चा चल रही थी और उनको बार बार याद दिलाया जा रहा था| वह एक कान से सुनते और दूसरे से निकाल देते, आखिर शादी के १५ वर्षों में इतना तो उन्होंने सीख ही लिया था| जब उनको लगता कि लुगाई समझ रही है कि वह अनसुना कर रहे हैं तो हाँ हूँ भी कह देते| लेकिन पिछले कुछ दिनों से घूम फिर के वही बात बार बार सामने आती और चिरौंजीलाल मंजे हुए राजनेता की तरह आश्वासन दे डालते| बीच बीच में उनको ये भी सुनने को मिलता कि शर्माजी ने अपनी पत्नी को ये देने का वादा किया है और वर्माजी ने ये| कभी कभी तो उनको सच में लगता कि खरीद ही लें, बेचारी लुगाई ने आजतक कुछ माँगा भी नहीं है उनसे, जो भी दे दिया, ख़ुशी ख़ुशी ले लेती है| इसी चक्कर में एकाध बार वह दूकान भी गए लेकिन दाम देखकर ऐसा झटका लगता जैसे बिजली का तार छू गया हो| फिर बेख़ौफ़ महंगाई और अपनी डरी हुई तनख्वाह भी याद आती तो मन से यह विचार कपूर की तरह काफूर हो जाता|
कभी कभी तो उनको ये भी लगता कि नाहक ही घर में केबल लगवा लिया, सारे फसाद की जड़ तो यही है| पहले कहाँ ये सब लफड़ा था, बस ज्यादा से ज्यादा मंदिर चले गए और कुछ चाट वगैरह खा के आ गए| लेकिन ये केबल वाले तो जब देखो तब कुछ न कुछ ऐसा दिखाते ही रहते हैं| और इन भोली भाली महिलाओं का क्या कसूर, वो बिचारी झांसे में आ जाती हैं| लेकिन अगर केबल कटवा दिया तो उनको भी समाचार के चैनल कहाँ देखने को मिलेंगे| अब ऑफिस में चर्चा होती ही रहती है कि ज़ी न्यूज़ ने ये दिखाया, स्टार न्यूज़ ने ये दिखाया, तो खुद भी तो देखना पड़ेगा उस चर्चा में शामिल होने के लिए| भला आजकल कौन दूर दर्शन के समाचारों के बारे में बात करके पिछड़ा महसूस करना चाहता है| और देर रात के कुछ कार्यक्रम, जिसको देखने के बाद उनको लगता कि काश किसी और देश में जन्म लिया होता तो सिर्फ टी वी पर ही नहीं, साक्षात् ऐसे देवियों के दर्शन मिलते|
खैर हामी तो उन्होंने भर दी थी और लगातार बढ़ते दबाव के चलते कुछ पैसों का भी इंतज़ाम कर लिया था| लेकिन आज उन्होंने एक और चांस लिया ये सोचकर कि शायद लुगाई भूल जाये तो बच जायेंगे| हाँ एक सुंदर सी साड़ी जरूर ले ली थी उन्होंने और लगभग आस्वश्त हो चले थे कि ये चाल कारगर रहेगी| शाम को जल्दी से घर पहुंचे और खुश होने का अभिनय करते हुए उन्होंने लुगाई को साड़ी पकड़ा दी| लुगाई के चेहरे पर एक बार तो चमक आयी, फिर वो पैकेट उलट पलट कर देखने लगी| चिरौंजीलाल समझ गए कि लगता है लुगाई भूली नहीं है तो उन्होंने आखिरी पासा फेंका "इस साड़ी में तुम गज़ब की सुंदर लगोगी, जरा जल्दी से पहन के तो दिखाओ"|
लुगाई ने एक बार उनकी तरफ निराशा भरी निगाहों से देखा और बोली "हाँ, वो तो ठीक है लेकिन आपके वादे का क्या हुआ"|
अब चिरौंजीलाल समझ गए थे कि चाहे वो कुछ भी कर लें, ये बला टलने वाली नहीं है| उन्होंने एक बार और प्रयास किया समझाने का और बोले "क्या बताऊँ, बहुत भीड़ थी दूकान में| मैं गया था लेकिन हिम्मत नहीं पड़ी, किसी और दिन पक्का ले आऊंगा"|
लुगाई अब एकदम उदास हो गयी और बुझे हुए स्वर में बोली "अब शर्माईन को क्या दिखाउंगी, मैंने तो कह भी दिया था कि इस बार एक चेन मुझे भी मिल रही है| उसका जला चेहरा देखती तो दिल में ठण्ड पड़ जाती, मुझे कितनी बार जलाया है उसने"|
चिरौंजीलाल भी दुखी हो गए, उनको लगने लगा कि ले ही आना चाहिए था, लेकिन अब दुबारा कौन जाए लेने के लिए| इन्ही सब विचारों में खोये हुए थे कि उनके कान में ये शब्द पड़े "ठीक है, अब अगले साल से मैं करवा चौथ का व्रत नहीं करुँगी"|
चिरौंजीलाल तो जैसे आसमान से गिरे, इतना तो उनको भी पता था कि ये व्रत उन्हीं की लंबी उम्र के लिए किया गया है| अब अगले साल से लुगाई व्रत नहीं करेगी तो कहीं उनकी लंबी उम्र पर कोई संकट तो नहीं आएगा, थोड़ी घबराहट छा गयी उनके मन में| क्या करें, क्या नहीं सोचते हुए उनके कदम अपने आप ही घर से बाहर निकल पड़े| पीछे से आती लुगाई की आवाज़ अब उनको सुनाई नहीं दे रही थी|  

Tuesday, October 18, 2016

देखा देखी--लघुकथा

पूरा दिन धूप में गुजर गया रग्घू का, लेकिन आज ठीक ठाक दिहाड़ी मिल गई थी उसको| आजकल मौसम कुछ बदल सा गया है, इस समय तो ठण्ड शुरू हो जाती थी और काम करने में दिक्कत नहीं होती थी, रग्घू सोचते हुए घर की तरफ चला| ठेला चलाना वैसे तो काफी श्रमसाध्य होता है, लेकिन जब घर पर पत्नी और बच्चे इंतज़ार में हों तो कोई और रास्ता भी नहीं बचता| मंडी के पास से गुजरते हुए उसकी नज़र किनारे बैठे एक बुढ़िया पर पड़ी जो केले बेच रही थी| केले पिलपिले और काले हो गए थे लेकिन काफी सस्ते मिले तो उसने एक दर्जन खरीद लिए|
रास्ते में ठेका भी पड़ता था और उसे देखते ही उसके कदम अपने आप ही बढ़ जाते| आज उसने एक अद्धा लिया और जल्दी जल्दी ख़त्म करके घर चल पड़ा| रोज उसकी बीबी पीने के लिए किचकिच करती लेकिन उसकी आदत अब जरुरत बन चुकी थी| अपनी कोठरी के सामने पहुँचते पहुँचते रात हो चुकी थी और आज दरवाजा खुला ही हुआ था|
घर में घुसते ही बेटी दौड़ के आयी और केले को पाकर खुश हो गई| उसने अपना धूल भरा कुरता निकाला और खाट पर बैठ गया| इतने में पत्नी आयी और उसने मुस्कुराते हुए उसको पानी का ग्लास पकड़ाया| पानी लेते समय उसकी नज़र पत्नी पर पड़ी, आज कुछ अलग और अच्छी लग रही थी| उसे कुछ समझ नहीं आया तो उसने पूछ लिया "आज बहुत सज धज के हो, क्या बात है?
"अरे आज मेमसाब लोग बरती थीं, कौनो करवा चौथ है, मरद के लंबी उमर के लिए होत है| त हम भी रख लिए तुम्हरी उमर के लिए, आज चाँद देखकर खाना खाएंगे", पत्नी ने बहुत उल्लास से कहा|
"हूँ, अब हमको खाना कब मिलेगा", थकान उसके ऊपर भारी हो रही थी|
"अबहीं लाते हैं तुम्हरे लिए खाना", कहते हुए पत्नी खाना लेने चली गई|
थोड़ी देर बाद रग्घू बिस्तर पर पड़ा खर्राटे भर रहा था, बेटी भी केले खाकर सो गई थी लेकिन पत्नी बार बार बाहर आसमान देख रही थी| आखिर उसने अपने मरद के लंबी उमर के लिए व्रत जो रखा हुआ था|   

Thursday, October 13, 2016

समझदारी--लघुकथा

'मेरे लिए क्या लायी, मेरे लिए क्या है", बच्चे हल्ला मचा रहे थे| बड़े भी कुछ कह तो नहीं रहे थे लेकिन उनकी भी नज़रें उसी की तरफ टिकी हुई थीं| नौकरी शुरू करने के दो महीने बाद श्रुति अपने कस्बे वाले घर लौटी थी और इस बीच घर के अधिकतर सदस्यों ने उससे कुछ न कुछ लाने की फरमाईस कर दी थी| अपनी सीमित तनख़्वाह में भी उसने सबके लिए कुछ न कुछ ले लिया था| एक किनारे बैठी उसकी दादी उसे बेहद प्यार भरी नज़रों से देख रही थी और इंतज़ार कर रही थीं कि कब सब लोग हटें तो वह अपनी पोती को लाड करें| श्रुति उनकी सबसे ज्यादा लाडली थी और माँ से ज्यादा उन्हीं के पास रहती|
श्रुति ने अपना बैग खोला और एक एक करके सब सामान निकलना शुरू किया| जिसका सामान होता उसे पकड़ाती और फिर वह ख़ुशी ख़ुशी उछलता हुआ निकल जाता| धीरे धीरे सब निकल गए और कमरे में सिर्फ उसकी माँ और दादी ही बचे| माँ को उसने एक सुंदर सा पर्स दिया और आकर दादी के गोद में लेट गयी| माँ को खटका कि इसने सबके लिए कुछ न कुछ लिया लेकिन अपनी दादी के लिए कुछ नहीं| लेकिन उनको दादी के सामने ये पूछना ठीक नहीं लगा और उन्होंने बाद में कुछ दिलाने के लिए सोच लिया| दादी ने उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा "बहुत दुबली हो गयी है मेरी बच्ची, लगता है कुछ खाने को नहीं मिलता था वहाँ"| फिर उन्होंने माँ को सहेजते हुए कहा "इस बार जब जायेगी तो घी का बड़ा वाला डब्बा इसको दे देना, कम से कम दाल में घी डाल के तो खा लेगी"|
श्रुति ने भी उनका हाथ पकड़ लिया और हँसते हुए बोली "इस बार तुम मेरे साथ ही क्यों नहीं चलती दादी, फिर तुमको मेरी चिंता भी नहीं रहेगी और मुझे भी गर्मागर्म खाना मिलेगा"|
"कैसे चलूंगी रे तेरे साथ, इस उम्र में तो ठीक से चल फिर भी नहीं पाती मैं", दादी ने प्यार से उसका गाल सहलाया|
पापा भी उसे ढूंढते हुए अंदर आये और श्रुति ने उनको लाया हुआ कुर्ता पहना दिया| उनके खिले हुए चेहरे को देखकर उसका और दादी का भी चेहरा एकदम खिल गया| फिर श्रुति ने अपना पर्स उठाया और उसमें से रुपये का एक पैकेट निकाला और पापा को पकड़ते हुए बोली "पापा, आप दादी के लिए बाथरूम में एक कमोड लगवा दीजिये, उनको बहुत दिक्कत होती है"|
माँ और पापा एकदम अवाक रह गए और दादी की आँखों में आंसू आ गए| अब उन्होंने ध्यान दिया, श्रुति ने वही कपड़े पहने हुए थे जो उसने नौकरी पर जाने के पहले लिए थे| माँ ने उसे अपने सीने से कस के लगा लिया और पापा को यक़ीन हो गया "उनकी छोटी सी बेटी अब बड़ी और समझदार हो गयी है"|   

Wednesday, October 12, 2016

जकड़न--लघुकथा

रग्घू के यहाँ तेरहवीं का भोज खाने के बाद गांव के कुछ बुजुर्ग वहीँ दरवाजे पर बने कउड़ा पर हाथ सेंकने बैठ गए| जाड़े का दिन था और ठंढ भी कुछ ज्यादा थी| कुछ लोग खाने के बारे में बात करने लगे, किसी को अच्छा लगा था तो किसी को साधारण| जोखू चच्चा को हमेशा से ये ब्रम्ह भोज खराब लगता था और उन्होंने कई बार इसके विरोध में बोला भी था लेकिन किसी ने उसपर ध्यान नहीँ दिया| रग्घू की माली हालात अच्छी नहीँ थी, उसपर पिता की बिमारी ने उसे और कंगाल कर दिया था| अब ये भोज का खर्च, आज जोखू चच्चा ने सोच लिया कि बात उठायी जाए|
"आप लोग क्या कहते हैं, रग्घू के ऊपर इस भोज का बोझ गलत नहीँ हो गया", उन्होंने बात को शुरू करते हुए कहा|
"हाँ, भार तो कुछ ज्यादा हो गया बेचारे पर", कुछ लोगों की आवाज़ थी|
"लेकिन फिर भी उसने इंतज़ाम ठीक ही किया था, उसके पिता की आत्मा को शांति मिली होगी", किसी और की आवाज़ थी|
"लेकिन क्या ये जरुरी है कि ब्रम्ह भोज हो, क्या इसे बंद नहीँ किया जा सकता", जोखू चच्चा ने जोर देकर कहा|
वहां सन्नाटा छा गया, लोग ये मानने के लिए तैयार ही नहीँ थे कि इसे बंद किया जाना चाहिए|
"लेकिन ये तो सदियों से होता आया है, और पुरखों की आत्मा की शांति के लिए जरुरी भी है", किसी ने कहा तो उसके समर्थन में कई आवाज़ें उठ गयीं|
"मेरे विचार से ये बंद ही होना चाहिए, कितना अनावश्यक बोझ पड़ जाता है लोगों पर", जोखू चच्चा ने हार नहीँ मानी| एकबार फिर सन्नाटा छा गया|
तभी नंदू ने थोड़े तेज स्वर में कहा "देखिये ये हमारे रीत रिवाज हैं, जिनको ख़त्म नहीँ किया जा सकता| वैसे जोखू चच्चा की माँ का आखिरी समय आ गया है, इसीलिए ये इतना छटपटा रहे हैं", और उठ कर चल दिया|
कई और लोग भी जोखू चच्चा को सकते की हालात में छोड़कर चल दिए| कउड़ा भी कुछ मद्धम पड़ गया था और रग्घू के दरवाजे पर कुत्ते फेंके हुए पत्तल के बचे हुए खाने के लिए आपस में लड़ रहे थे|


Tuesday, October 11, 2016

दक्षिण अफ्रीका- एक अलग सा देश

1. भारतीय उपमहाद्वीप के किसी व्यक्ति को, जो कभी विदेश नहीं गया हो ( नेपाल को छोड़कर, वैसे भी नेपाल यात्रा को भारतीय कहाँ विदेश यात्रा कहते हैं), के लिए सात समंदर पर जाना, वो भी घूमने के लिए नहीं बल्कि नौकरी करने के लिए, काफी रोमांचक होता है| और वो देश अगर दक्षिण अफ्रीका हो, जिसका नाम सुनते ही जेहन में अश्वेत अफ्रिकी लोग और  गरीबी इत्यादि ही पहले आता है, तो क्या कहना| और उसमें भी अगर जोहानसबर्ग जाना हो और गलती से आपने नेट में सर्च किया तो हालत और ख़राब हो जाती है (यह शहर नेट में दुनियां के सबसे अपराधग्रस्त शहरों में से एक दिखता है)| किसी भी आदमी से बात कीजिये, वो आपको बहुत डरायेगा, और ऐसे में आपकी मानसिक स्थिति बहुत सुखद नहीं रह जाती|
कई बार जोहानसबर्ग में काम कर रहे सहकर्मियों से बात हुई, हर बार बस एक ही जवाब होता था "ये जगह बहुत सुरक्षित नहीं है, आवागमन के साधन नहीं हैं और आप को अपनी कार में ही हर जगह जाना होता है| कार का शीशा हमेशा बंद रखना है और हर चौराहे पर बेहद सतर्क रहना पड़ता है"| कई बार मन में आता था कि कहीं गलत जगह तो नहीं जा रहा हूँ (हालाकि बाद में ये विचार गलत ही साबित हुआ)|  
इन्हीं तमाम विचारों के झंझावात को झेलते हुए जब जोहानसबर्ग हवाई अड्डे पर उतरा तो मन में काफी चिंता थी| मुम्बई से जहाज रात के दो बजे निकला और सुबह सात बजे  जोहानसबर्ग पहुँच गया| साढ़े तीन घंटे के समय के फ़र्क़ को जोड़कर यात्रा लगभग नौ घंटे की थी और शायद ही पूरी यात्रा में कभी नींद आयी हो| बनारस के अगस्त के काफी गर्म मौसम से निकलकर जोहानसबर्ग के ठंढे मौसम में आते ही एकदम से अच्छा लगा और महसूस हुआ कि शायद वो गर्मी यहाँ नहीं मिलेगी अगले कई सालों तक| हवाई अड्डा, जो काफी साफ़ सुथरा  था, जो कि हिंदुस्तान में भी है,  को चारो तरफ से निहारते हुए हम लोग आगे बढे| सिक्योरिटी चेक को पार करने के बाद सामान लेकर बाहर आने पर पहला झटका लगा| ड्राइवर, जो कि ६ फ़ीट से ज्यादा लंबा और विशालकाय अश्वेत था, ने सामान को हाथ तक नहीं लगाया| हां, इंतज़ार कर  रहे बाकी सहकर्मियों ने ही मदद की और हम कार में सवार होकर होटल की तरफ चल पड़े| ये बाद में पता चला कि यहाँ अपने मुल्क़ की तरह स्थिति नहीं है जहाँ आपका ड्राइवर आपका कुली भी होता है|   

2. होटल के रास्ते में सड़कें भी बिलकुल चमकती हुई और ट्रैफिक भी एकदम संयत, बहुत अच्छा लग रहा था देखकर| लेकिन एक आश्चर्य और भी हुआ, इतनी गाड़ियां थीं, कभी कभी रास्ता जाम भी था, लेकिन किसी ने न तो ओवरटेक करने की कोशिश की और न ही किसी ने हॉर्न ही बजाया| ऐसा लग रहा था जैसे किसी को कोई भी जल्दी नहीं है| आने वाले दिनों में ये बात पता चली कि यहाँ के लोग ट्रैफिक नियमों का पागलपन की हद तक पालन करते हैं और हॉर्न बजाना तो बहुत बड़ी असभ्यता मानी जाती है| लेकिन अगर किसी ने हॉर्न बजाया है तो इसका मतलब यहाँ पर दो ही होता है, या तो सामने वाला कोई गलती कर रहा है, जैसे कि वो बिना अपनी बारी के निकल रहा है, और या तो आगे सिग्नल हरा हो गया है लेकिन वो शायद अपने फोन में व्यस्त है और आगे नहीं बढ़ रहा है|
ट्रैफिक नियमों के पालन का आलम तो ये है यहाँ पर कि लाल बत्ती तो शायद ही कोई पार करता हो, यहाँ तक कि रात में भी (हालाँकि रात में ये सलाह भी दी जाती है कि अगर बहुत सुनसान क्षेत्र हो तो लाल बत्ती की परवाह मत करिये, क्योंकि अपनी सुरक्षा सबसे जरुरी है)| और अगर खुदा न ख़ास्ता ट्रैफिक की बत्ती ख़राब है तो हर चौराहे पर लोग बेहद अनुसाशित तरीके से एक के बाद एक निकलते हैं (चौराहे पर चारो तरफ से एक एक कार जाएगी बारी बारी से और एक चक्र पूरा होने पर फिर से वही चक्र चलेगा)| इसमें तभी गड़बड़ होती है जब कोई एशियाई मूल का व्यक्ति अपनी बारी के बिना ही निकलने का प्रयास करेगा और उस स्थिति में दूसरा व्यक्ति हॉर्न बजाकर उसको उसकी गलती का एहसास कराएगा| लोग सड़क पर एक दूसरे की भावनाओं का खूब आदर करते हैं और कोई भी व्यक्ति अगर अपनी लेन बदलने के लिए इंडिकेटर दे रहा है तो पीछे वाला अमूमन रुक कर उसे आगे जाने का मौका दे देता है| मुझे कई महीने लगे इन सब आदतों को सिखने में लेकिन अब लगता है कि बिना चिल्ल पों के सड़क पर चलना कितना सुकूनदायी है| पिछले तीन वर्षों में मैंने भी सड़क पर शायद ४ या ५ बार ही हॉर्न बजाया होगा|  
खैर कुछ देर बाद होटल पहुंचे जहाँ पर भी सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम थे| बाहरी दीवारों पर ऊपर बिजली के तारों की लड़ी थी और गेट भी बंद था जिसे इंटरकॉम पर फोन करने पर खोला गया| अंदर रिसेप्शन पर एक और आश्चर्य मेरा इंतज़ार कर रहा था जिसके बारे में भी मैंने कभी सोचा नहीं था|

3. दरअसल होटल का मेन गेट बंद था और कोई भी वहां नहीं था| इण्टरकॉम पर जब हमारे ड्राइवर ने फोन किया तो उसने सबसे पहले पूछा "आप कैसे हैं(How are you), उधर से कुछ पूछा गया तो ड्राइवर ने कहा "मैं ठीक हूँ (I am fine)| फिर ड्राइवर ने रूम बुकिंग के बारे में बताया तो गेट खुला और हम लोग अंदर गए|
अंदर रिसेप्शन पर बैठी महिला ने भी पहले पूछा "आप कैसे हैं, ड्राइवर ने कहा "मैं ठीक हूँ| फिर ड्राइवर ने पूछा "आप कैसे हैं, तो रिसेप्शन वाली महिला ने कहा "मैं ठीक हूँ| इसके बाद कमरे की औपचारिकता पूरी हुई और हम लोग अपने कमरे की तरफ बढे| कमरे के पास एक और सज्जन थे जिन्होंने देखते ही पूछा "आप कैसे हैं, और ड्राइवर ने जवाब देकर वही प्रश्न उससे पूछा और फिर कमरा खुला और हम लोग अंदर गए| कमरे में बैठने के बाद मुझे यही लगा की अपना ड्राइवर यहाँ हमेशा आता होगा इसलिए इसे सभी पहचानते हैं और हाल चाल पूछ रहे हैं| 
दोपहर का भोजन अपने एक सहकर्मी के घर था और वहां से हिंदुस्तानी खाना खाकर हम लोग बगल के एक शॉपिंग माल में आये| वहां पर हमारे सहकर्मी ने कुछ ख़रीदा और जब बिल के भुगतान के लिए गया तो एक बार फिर वही सिलसिला शुरू हुआ| पहले सहकर्मी ने पूछा "आप कैसे हैं, उसने जवाब दिया, फिर उसने पूछा और सहकर्मी ने जवाब दिया| इसके बाद ही बिल का भुगतान हुआ और हम लोग वापस निकले| 
अगले कुछ दिनों में ये चीज स्पष्ट हुई कि इस देश का यह सामान्य शिष्टाचार है कि जब भी आप किसी से मिलते हैं, चाहे वो व्यक्ति जो भी हो, (वो आपका ड्राइवर हो सकता है, स्वीपर हो सकता है, दूकान वाला हो सकता है या आपका कोई परिचित), आपको सबसे पहले उसकी कुशल क्षेम पूछनी है, फिर वो आपका पूछेगा और इसके बाद ही कोई और बात होगी| इस बात को भी सीखने में मुझे महीनों लग गए क्योंकि अपने हिंदुस्तान में तो आप परिचितों से हाल चाल मुश्किल से पूछते हैं, बाकियों के लिए क्या कहें|
यहाँ तक कि आप अगर फोन करते हैं, चाहे किसी को भी, या किसी का भी फोन आता है तो आपको पहले उसकी कुशल क्षेम पूछनी है, फिर अपनी बतानी है और उसके बाद ही आप काम की बात कर सकते हैं| अगर आपने सीधे काम की बात कर दी तो आप घोर असभ्य माने जाएंगे और लोग इसका बहुत बुरा मान जाते हैं| अगर किसी भी व्यक्ति से आपकी नज़रें मिली तो आपको सामान्यतया मुस्कुराना चाहिए, नहीं तो ये भी असभ्यता मानी जाती है यहाँ पर| अगर गलती से आपने किसी का हाल चाल नहीं पूछा तो लोग आपको टोक भी सकते हैं कि आपने उनकी कुशल क्षेम नहीं पूछी| यहाँ तक कि अगर आपको किसी से कोई रास्ता या कुछ और भी पूछना है तो पहले आप कुशल क्षेम पूछेंगे, फिर अपना बताएँगे और उसके बाद ही आप रास्ता या कुछ और पूछ सकते हैं| सबसे मजेदार तो तब होता है जब आपको रास्ते में ट्रैफिक पुलिस वाला रोकता है आपके लाइसेंस को चेक करने के लिए और तब भी पहले आप उसकी कुशल क्षेम पूछते हैं, फिर वो पूछता है और फिर आपका लाइसेंस मांगता है|  
अब आप खुद ही अंदाज़ा लगा सकते हैं कि कहाँ के लोग ज्यादा सभ्य होते हैं|   

4. होटल से निकालकर बाहर जाने पर एक चीज तो कॉमन थी कि ट्रैफिक सिग्नल लाल होने पर रुक जाना लेकिन शुरुवात में काफी दिक्कत हुई सिग्नल के नाम को लेकर| पहले या दूसरे दिन ही ड्राइवर ने कहा कि अगले रोबोट से दाएँ मुड़कर जाना है तो मैं चौंका कि शायद यहाँ हर चौराहे पर रोबोट लगे हुए हैं| फिर मैंने कई दिन ध्यान दिया, मुझे किसी भी सिग्नल पर रोबोट नहीं दिखा| आखिरकार कुछ दिन बाद मैंने अपनी झिझक तोड़ते हुए मैंने उससे पूछ ही लिया कि मुझे तो रोबोट कहीं नहीं दिखता तो वह मुस्कुराया| फिर मुझे पता चला कि यहाँ ट्रैफिक सिग्नल को ही रोबोट बोलते हैं|
अगली उलझन एक और बात को लेकर हुई, चूँकि यहाँ आपको अपनी कार रखनी ही है तो मैंने भी तुरंत एक कार खरीदी और फिर पेट्रोल पम्प कहाँ कहाँ हैं ये पता लगाना चाहा| इस शहर में लगभग हर आधे किमी पर कोई न कोई पम्प मिल ही जायेगा, बशर्ते आपको ये पता हो कि उसे यहाँ गैराज कहा जाता है| (अपने देश में और यहाँ में नाम में क्या क्या फ़र्क़ है, धीरे धीरे पता चला| जैसे यहाँ दवा की दूकान को मेडिकल स्टोर न कह कर फार्मेसी कहते हैं|)
सबसे बड़ी शुरूआती दिक्कत हुई जगह के बारे में पता लगाने में| फ़र्ज़ कीजिये कि आपको बनारस में कहीं जाना है तो आपको सिर्फ ये पता होना चाहिए कि आपको किस एरिया में जाना है, उसके बाद तो आप पानवाले से, किसी भी दूकान वाले से या सड़क पर जाते किसी भी व्यक्ति से आप पता पूछकर जा सकते हैं| लेकिन यहाँ तो आपको सिर्फ और सिर्फ एक ही जगह से रास्ता पता चल सकता है और वो है गैराज (मतलब पेट्रोल पम्प)| बाकी कहीं न तो आप पूछ सकते हैं और न कोई आपको बताएगा| और अगर गलती से किसी ने बताया भी तो ये तंय है कि आपको समझ में नहीं आएगा (मुझे तो आज तक नहीं समझ आता)|
यहाँ अगर आपको कार चलानी है तो आपको सिर्फ और सिर्फ जी पी एस का ही सहारा होता है, उसी के जरिये आप पूरे देश में घूम सकते हैं| अब मैंने तो हिंदुस्तान में कभी भी इसका इस्तेमाल नहीं किया था तो खासी दिक्कत हुई लेकिन जब से फोन का गूगल मैप प्रयोग करने लगा, तब से बहुत राहत है| 
एक और बात यहाँ पर दिखी कि अगर आपको किसी ने आगे जाने दिया तो आपको उसको धन्यवाद जरूर कहना है| और उसके दो तरीके हैं, या तो आप अपनी कार में से ही अपना हाथ उठाकर उसे धन्यवाद दें, या फिर अपनी पार्किंग लाइट को जला बुझा कर| अगर आपने ऐसा नहीं किया तो फिर आप घोर असभ्य समझे जायेंगे (शुरू में तो लोगों ने पक्का मुझे असभ्य ही समझा होगा)|

5. शुरूआती दौर में जब भी कार किसी सिग्नल पर रूकती, कुछ स्थानीय लोग, जिन्हें आप भिखारी भी कह सकते हैं, अपने हाथ में काली वाली बड़ी पॉलीथिन लेकर खड़े दिख जाते| मुझे ठीक से समझ नहीं आता था कि आखिर इस तरह से क्यूँ खड़े रहते हैं ये लोग| धीरे धीरे समझ आया कि यहाँ पर लोग गाड़ी चलाते समय भी नाश्ता करते रहते हैं, जूस इत्यादि भी पीते है और जब चौराहों पर रुकते हैं तो इन लोगों की बड़ी पॉलिथीन में कचरा डाल देते हैं| साथ ही साथ इन लोगों को कुछ खाने के लिए या कुछ पैसे भी दे देते हैं| अब इसका सबसे बड़ा फायदा ये है कि सड़क पर कचरा नहीं फैलता (आप कल्पना कीजिये बनारस में कोई अगर कार में कुछ खाता है तो क्या करता है, मौका मिलते ही कचरा बड़े आराम से सड़क पर फेंक देता है)|
कुछ समय बीतने पर ये पता चला कि यहाँ सड़कों पर भीख मांगने वालों के तीन प्रकार हैं| इनमे अधिकतर तो ये काली पॉलिथीन लिए युवक होते हैं जो रुकी हुई हर कार के पास जाते हैं और बिना ज्यादा हुज्जत के आगे बढ़ जाते हैं| दूसरा प्रकार उनका है जो कोई तख्ती हाथ में लेकर भीख मांगते हैं और वो भी ज्यादा तंग नहीं करते| चुपचाप खड़े रहकर अपनी तख्तियां दिखाते हुए हर कार के पास जाते हैं और जो मिल जाये उसमें संतुष्ट| अब इनकी तख्तियां कभी कभी इतनी दिलचस्प होती हैं कि पढ़ कर हँसते हँसते हालत खराब हो जाती है (एक तख्ती पर लिखा था कि मेरी बिल्ली ने पडोसी का मुर्गा खा लिया और अरेस्ट हो गयी, उसके बेल के लिए पैसे चाहिए| एक तख्ती पर लिखा था कि मेरी बीबी का अपहरण निंजा ने कार लिया है और मुझे कुंगफू सीखने के लिए पैसे चाहिए)| अक्सर उन तख्तियों पर एक ही बात लिखी दिखती है, हमें इस क्षेत्र को अपराध मुक्त बनाना है (इस शहर को ऐसे ही सबसे ज्यादा अपराधग्रस्त क्षेत्रों में नहीं गिना जाता, यहाँ वास्तव में अपराध बहुत होते हैं)| एक तीसरा प्रकार उनका है जो विकलांग होते हैं और या तो अकेले या किसी के साथ भीख मांगते हैं| इनके अलावा कुछ बदमाश भी होते हैं जो आपको तंग भी करते हैं और इतना गिड़गिड़ाते हैं कि आप का दिल पसीज जाए| कुछ महिलाएं भी हैं जो अपने बच्चे को लेकर भीख मांगती हैं, लेकिन बच्चे उनके ही होते हैं ये पता चल जाता है हम लोगों को|
इधर हाल के समय में एक नयी जमात पैदा हुई है यहाँ, जो भिखारी तो नहीं हैं, बस आपकी कार का विंडस्क्रीन साफ़ करते हैं और बदले में जो मिल जाए उसे ले लेते हैं| सबसे अच्छी बात यहाँ ये है कि आप किसी को भी कुछ भी खाने के लिए दीजिये, चाहे वो भिखारी हो, या आपका गेट कीपर या आपके घर काम करने वाली बाई, ये लोग बेहद खुश होते हैं और ताली बजाकर आपका शुक्रिया करते हैं| सच में दिल खुश हो जाता है इनको कुछ खाने के लिए देकर, थोड़े से खाने के बदले इतनी दुआएं जो मिल जाती हैं| 
लेकिन एक चीज पूरे देश में कामन है, सभी मांगने वाले अश्वेत ही होते हैं, शायद ही कोई श्वेत व्यक्ति भीख मांगते दिखा हो| वजह भी पूरी तरह से आर्थिक है, अश्वेत तबका ही यहाँ आर्थिक रूप से कमजोर है|  

6. एक हफ्ता तो हम लोगों ने होटल में ही बिताया और उसके बाद अपने घर में गए| उस दौरान रोज होटल से ही अपने कार्यालय जाना हुआ| पहले दिन जब मैं अपने कार्यालय पहुँचा तो चकित रह गया, वैसे पता तो था कि अपना बैंक शहर के सबसे बड़े और भव्य शॉपिंग माल में है| सैंडटन के शॉपिंग माल में स्थित अपने कार्यालय को देखकर लगा जैसे किस दुनिया में आ गए| कहाँ हिंदुस्तान में स्थित अपनी शाखाएं, जहाँ भीड़ भाड़, शोरगुल, गन्दगी और दिन भर आते लोगों का सामना करना पड़ता था, वहीँ यहाँ पर आदमी का पता नहीं| एकदम चमचमाता हुआ ऑफिस, कुल पांच कर्मचारी और निहायत ही शांत माहौल| शायद पूरे हफ्ते में एक या दो आदमी आते हैं और हफ्ता भी सिर्फ साढ़े चार दिन का| 
दरअसल यहाँ पर हफ्ते में कार्य करने के सिर्फ ५ दिन हैं और शुक्रवार को दोपहर दो बजे के बाद आदमी वीकेंड के मूड में आ जाता है| यहाँ पर आदमी अपनी जिंदगी को भरपूर जीता है, अपने हिंदुस्तान की तुलना में कई गुना ज्यादा| शुक्रवार शाम को अधिकांश लोग किसी न किसी जगह निकल जाते हैं और फिर रविवार शाम को ही लौटते हैं| पूरे दो दिन जम के पार्टी, शराब और घूमना, फिर वापस सोमवार से काम| लोग समय के बेहद पाबंद होते हैं खासकर श्वेत आबादी, बाकी मूल अफ़्रीकी लोग तो थोड़ा बहुत देर सबेर भी कर लेते हैं| 
पहले हफ्ते में ही एक और बेहद दिलचस्प बात पता चली, एक डिनर का न्यौता आया| जब मैंने समय देखा तो उसमें शाम के साढ़े छह बजे लिखा हुआ था| मुझे लगा कि गलती से लिख दिया होगा, शाम को सात बजे तो हम लोग चाय पीते हैं हिंदुस्तान में और डिनर तो रात नौ के बाद ही होता है| लेकिन जब मैंने पूछा तो लोगों ने बताया कि यहाँ डिनर का समय साढ़े छह बजे से शुरू हो जाता है और लगभग आठ बजे तक समाप्त| डेढ़ घण्टा भी इसलिए, क्योंकि लोग पहले ड्रिंक करते हैं और फिर खाना खाते हैं| अब पहली डिनर पार्टी में तो ऐसा लगा जैसे हम लंच देर से करने जा रहे हैं| लोग यहाँ जल्दी सो जाते हैं और सुबह बहुत जल्दी, लगभग चार बजे उठ जाते हैं| सुबह उठकर सबसे जरुरी काम होता है जिम जाना और अगर सुबह नहीं जा सकते तो शाम को तो जरूर जाते हैं| शारीरिक फिटनेस पर बहुत ध्यान देते हैं यहाँ के निवासी और इसी वजह से ज्यादा उम्र तक जिन्दा रहते हैं| यहाँ आप अस्सी साल से भी ज्यादा के लोगों को आप आराम से कर चलाते और काम करते देख सकते हैं|  
अब कहाँ हम लोग रात को एक बजे तक सोने वाले और सुबह सात बजे उठने वाले, और कहाँ ये देश| कई महीने लग गए इनके समय के साथ समय मिलाने में|   

7. एक सप्ताह बाद हम लोग अपने फ्लैट में रहने आ गए, एक बड़ी सोसाइटी में स्थित ये फ्लैट काफी बड़ा और सम्पूर्ण सुविधा युक्त था| यहाँ पर किराये के मकान दो तरह से मिलते है, या तो पूरी तरह से सुविधायुक्त (बिस्तर, सोफे से लेकर घर की हर चीज मकान मालिक द्वारा दी जाती है) या सिर्फ फ्लैट जिसमें आप अपना सामान खरीदकर रखें| मेरी इच्छा थी कि फ्लैट ऐसी जगह हो जहाँ हिंदुस्तानी लोग कम मिलें और स्थानीय लोग ही ज्यादा मिलें, जिससे यहाँ के लोगों के रहन सहन और जीवन शैली के बारे में पता चल सके| और फ्लैट बिलकुल ऐसी ही जगह था जहाँ हमारे अलावा एक भी हिंदुस्तानी परिवार नहीं था| दो तीन कई पीढ़ी पुराने भारतीय परिवार थे लेकिन अब वो भी यहां के हो गए थे| इस वजह से मुझे इन लोगों को नज़दीक से जानने का मौका मिला|
चूँकि सुरक्षा के काफी कड़े इंतज़ाम होते है यहाँ तो हमारी बिल्डिंग भी ऑटोमैटिक गेट से युक्त है, जहाँ तीन चार गार्ड हमेशा मौजूद रहते है| कोई भी व्यक्ति बिना इज़ाज़त अंदर नहीं जा सकता और हमारे पास रिमोट दिया गया जिससे हम गेट खोल सकें| शुरुआत में तो वैसे भी सब कुछ अजीब ही लगा लेकिन कुछ दिनों बाद मैंने एक ख़ास चीज महसूस किया कि हमारी बिल्डिंग बेहद शांत है, कोई आवाज़ नहीं, हालांकि लगभग 75 फ्लैट होंगे| और अब तो तीन साल से ज्यादा हो गए रहते हुए लेकिन किसी भी शोर शराबे के लिए कान तरस जाते है| आपको अपनी पार्किंग में भी कार ठीक से लगानी है, कहीं आपने पडोसी के पार्किंग में अतिक्रमण कर दिया तो आपके पास नोटिस आ जाएगी और कई बार ऐसा हुआ तो शायद जुर्माना भी|  
यहाँ की आबादी में दो बिलकुल अलग वर्ग है, एक श्वेत वर्ग जो बेहद शांत रहता है और किसी भी तरह का शोरगुल घर में पसंद नहीं करता है| इस बात का अंदाज तो था लेकिन बहुत जल्द ही पता भी लग गया| दरअसल हमारे एक मित्र अपने बच्चों के साथ मेरे घर आये और बच्चे तो उछल कूद करते ही है| लगभग दो घंटे बाद मेरे फ्लैट की घंटी बजी, मैं बाहर निकला तो देखा कि सामने एक बुजुर्ग खड़े है, जो मेरे नीचे वाले फ्लैट में रहते है| उन्होंने पहले तो आने के लिए माफ़ी मांगी और फिर कहा कि क्या ये शोर बंद हो सकता है, ये मुझे मार डाल रहा है| मैंने भी उनसे छमा मांगी और बच्चों को किसी तरह समझाया कि ज्यादा उछलें मत| आगे भी दो तीन बार ऐसा हुआ तो मैं काफी सतर्क हो गया और बच्चों के आने पर उनको समझाता ही रहता हूँ|
और दूसरा यहाँ की अश्वेत आबादी, जो कुछ ज्यादा ही शोरगुल पसंद है| शुरू शुरू में हम लोग जब भी किसी मॉल में जाते थे तो अक्सर दुकानों में काम करने वाले अश्वेत लोग संगीत पर थिरकते दिख जाते| बस इनको बहाना चाहिए नाचने और चिल्लाने का, कोई भी संगीत बज जाए फिर ये रुक नहीं सकते| आप इनकी बस्ती में चले जाईये, आपको लगेगा ही नहीं कि आप किसी बेहद शांत देश में रहते है| 
लेकिन अगर दोनों तरह के लोग एक ही जगह रह रहे हों, जैसे हमारी बिल्डिंग में ही, तो एकदम शांत रहते है| धीरे धीरे इस विरोधाभास में हम लोगों ने भी जीना सीख लिया और यहाँ की आबो हवा में ढल गए| 

8. इस देश में बहुत से विरोधाभास देखने को मिलते हैं और धीरे धीरे मुझे पता चलता गया| अब अगर आपको हिंदुस्तान में मोबाइल का सिमकार्ड लेना हो तो आजकल काफी मशक्कत करनी पड़ती है, लेकिन यहाँ पर तो ऐसे मिलते हैं जैसे आप दूकान से आलू, प्याज़ ले रहे हों (आलू प्याज़ से याद आया, यहाँ ये दोनों सब्जियां भी बहुत अच्छे से पैक करके पांच या सात किलो के पैकेट में मिलती हैं)| इस देश में आने के बाद मैंने सोचा फोन करने के लिए सिम लेना पड़ेगा और उसके लिए फोटो, एड्रेस प्रूफ और आई डी प्रूफ लगेगा| लेकिन मुझे मेरे सहकर्मी ने यूँ ही एक सिम पकड़ा दिया| मुझे लगा उसने अपने नाम से लिया होगा मेरे लिए, तो उसने बताया कि आपको जितने प्रीपेड सिम चाहिये, मिल जायेंगे| हाँ पोस्टपेड के लिए जरूर आपको कागजात देने पड़ते हैं| ये भी उस देश में जहाँ ऑनलाइन फ्राड बहुत होते हैं और मेल हैक होना तो कॉमन है|
दूसरा आश्चर्य तब हुआ जब अपने पूर्ववर्ती को एयरपोर्ट छोड़ने जाना था| इस देश में जहाँ इतना ज्यादा क्राइम है, वहाँ क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि आप अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर किसी को पहुंचाने सिक्योरिटी चेक तक जा सकते हैं| एक हिंदुस्तान के हवाई अड्डे हैं जहाँ अगर आपको किसी शहर के लिए भी फ्लाइट पकड़ना हो तो लगता है कि किसी युद्ध स्थल में आ गए हैं| 
खैर जब मैंने अपनी कार अपने पूर्ववर्ती से खरीदी तो उसका ट्रांसफर कराना था| अब मुझे लगा कि ये भी कोई बहुत बड़ा काम होगा यहाँ, लेकिन दो तीन घंटे में ही कुछ भुगतान करके गाड़ी मेरे नाम ट्रांसफर हो गयी| वो भी तब, जब गाड़ी बेचने वाला देश छोड़ के जा चुका था| लेकिन उसी दिन मुझे यहाँ पर भ्रष्टाचार से पहली बार साबका पड़ा| गाड़ी ट्रांसफर होने के बाद एक फिटनेस चाहिये होता है जिससे कि ये सिद्ध हो कि आप इस गाड़ी को यहाँ चला सकते हैं| उस टेस्ट में अधिकारियों ने फेल कर दिया, जबकि कार एकदम फिट और नयी थी| तब मेरे वाहन चालक ने बताया कि मैं करवा देता हूँ और कुछ पैसे देकर कार फिट हो गयी| 
यहाँ पर पुलिस में दो तरह के अधिकारी होते हैं, श्वेत और अश्वेत| लोगों ने शुरू में ही बता दिया था कि अगर कभी भी रास्ते में पुलिस ने कार रोकी और आपने अपना लाइसेंस या पासपोर्ट नहीं रखा है तो दो रास्ते हैं| अगर पुलिस वाला अश्वेत है तो आप उसे मामूली सी रकम देकर भी छूट सकते हैं, लेकिन अगर पुलिस अफसर श्वेत है तो किसी भी हाल में उसे रिश्वत देने की चेष्टा मत कीजिये, वर्ना वो आपको गिरफ्तार भी कर सकता है| 
अगर आप किसी नियम का उल्लंघन करते है तो आपके पते पर टिकेट (यहाँ फाइन को टिकेट कहते हैं, मुझे कुछ महीने लगे समझने में) आ जायेगा| सड़को पर कैमरे लगे हैं जो आपको निर्धारित गति से तेज जाने या लाल बत्ती पर रोबोट (ट्रैफिक सिग्नल) पार करने पर आपके पते पर टिकेट भेज देते हैं| मुझे भी तेज गति से कार चलाने के लिए एक बार टिकेट का भुगतान करना पड़ा है|   

9. हिंदुस्तान से आये हुए किसी शख्स के लिए ये विश्वास करना कि किसी देश में वीकेंड (शुक्रवार शाम से रविवार देर रात तक) किसी को फोन करना या किसी से कार्य सम्बंधित बात करना न सिर्फ अभद्रता मानी जाती है, बल्कि सामने वाला व्यक्ति आपसे खफा भी हो सकता है| इस देश में वीकेंड मतलब सिर्फ मौज मस्ती, घूमना फिरना, फोन दूसरों के लिए बंद और रिलैक्स करना| यहाँ तक कि कोई प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाला डॉक्टर भी नहीं मिलेगा वीकेंड में, सिर्फ हस्पताल में कुछ इमरजेंसी सेवाएं चालू रहती हैं| और एक अपना देश है जहाँ काम के घंटे रात को ११ बजे भी ख़त्म नहीं होते और शनिवार और रविवार से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता|
अपनी खुद की कार होना तो हिंदुस्तान में भी गर्व की बात होती है और स्टेटस सिंबल होता है, तो यहाँ पर भी कार लेकर बहुत अच्छा महसूस हुआ| लेकिन कुछ दिन बाद देखा कि यहाँ तो हर व्यक्ति के पास कार है लेकिन मोटरसाइकिल बहुत कम लोगों के पास ही है| यहाँ वीकेंड्स में तो बाइकर्स की गैंग निकलती है और उनकी बाइक्स ऐसी कि देख कर ऑंखें खुली की खुली रह जाएँ| या तो हर्ले डेविडसन या बी एम् डब्ल्यू की बाइक और वो भी इतनी भव्य कि क्या कहा जाए| खैर बाद में पता चला कि यहाँ बाइक रखना स्टेटस सिंबल होता है क्योंकि एक बाइक की कीमत में आप यहाँ कई कारें खरीद सकते हैं| हाँ अपने देश वाली बाइक्स भी दिखती है, लेकिन सिर्फ पिज़्ज़ा डिलीवरी वालों के पास| यहाँ तक कि एक वेस्पा स्कूटर की कीमत यहाँ एक अच्छी कार की कीमत के बराबर है| 
साइकिल सवार भी यहाँ इस तरह से चलते हैं कि लगे जैसे कोई बाइक से जा रहा हो| हेलमेट लगाकर और कुछ ऐसी ड्रेस पहनकर जो दूर से ही दिख जाए और अगर रात में साइकिल सवार जा रहा हैं तो उसके हेलमेट में लाइट भी होगी| साइकिलिंग भी यहाँ एक व्यायाम का हिस्सा हैं और अक्सर वीकेंड्स में लोग लंबी लंबी दूरी तक साइकिल से जाते हैं| यहाँ तक कि रात में कुछ लोग दौड़ने भी निकलते हैं तो लाइट लगी हुई हेलमेट लगाकर| मतलब हर चीज को एक सलीके से और स्टाइल में, लेकिन अगर आप बाहर के एरिया में निकल जायेंगे तो आपको गरीबी भी दिख जाती हैं| 
हाईवे पर सड़क के किनारे बाएं तरफ एक हिस्सा रहता हैं जो कि इमरजेंसी लेन कहलाता हैं| ये मुख्य रूप से एम्बुलेन्स, पुलिस या किसी और इमरजेंसी के लिए ही होता हैं और सामान्य तौर से कोई अन्य व्यक्ति इसका इस्तेमाल नहीं करता हैं| हाँ अगर किसी की फ्लाइट छूट रही हो तो वो भी इसका इस्तेमाल कार सकता हैं, बशर्ते वह जुर्माना भुगतने के लिए तैयार हो|
कुल मिलाकर लोग यहाँ जीवन को बहुत व्यवस्थित तरीके से और पूरी जिंदादिली से जीते हैं और यहाँ से वापस जाने पर सालों लग जाते हैं इन चीजों को भुलाने में|

10. फर्ज कीजिये कि आप कहीं खाने के लिए गए हैं, जैसे किसी रेस्तरां इत्यादि में, तो आप तो ये उम्मीद तो करेंगे ही कि खाने के मेज पर पानी भी मिले| लेकिन इस देश में ये एक बड़ा फ़र्क़ नज़र आया, यहाँ खाने के साथ आपको सॉफ्ट ड्रिंक जैसे कोक, मिरिंडा इत्यादि तो मिलेगा, यहाँ तक कि आपको हार्ड ड्रिंक भी जैसे बियर, व्हिस्की इत्यादि भी मिलेगा लेकिन अगर आपने पानी माँगा तो बेयरा आपको थोड़े आश्चर्य से देखेगा| और अगर आपने पानी माँगा तो आपको बताना पड़ेगा कि आपको मिनरल वाटर चाहिए या टैप वाटर (नल का पानी)|
अब आप सोचिये कि आपको हिंदुस्तान में कहीं खाने के लिए बुलाया जाए और पानी नल से निकाल कर दे दिया जाए तो आप कैसा महसूस करेंगे| शायद आप पीने से ही मना कर दें (वास्तव में हिंदुस्तान में नल का पानी पीना कल्पना से बाहर है), लेकिन इस देश में जब हम लोग आये तो घर में देखा कि न तो फ़िल्टर लगा है और न ही मिनरल वाटर की कोई बोतल रखी है| अब पीने का पानी कहाँ है पूछा तो मेरे पूर्ववर्ती ने बताया कि यहाँ पर पीने के लिए नल का ही पानी इस्तेमाल करते हैं| दरअसल इस देश का पानी विश्व के सबसे शुद्ध पानी वाले देशों में शुमार किया जाता है और इसीलिए जो पानी बाथरूम में इस्तेमाल होता है वही किचन में भी और वही पीने के लिए भी| हमें कई महीने लग गए आपने आप को मानसिक रूप से तैयार करने में कि नल का पानी भी इतना शुद्ध और साफ़ हो सकता है|
यहाँ पर लोग बाहर पानी पीने के बदले कोक पीना ज्यादा पसंद करते हैं, खासकर अश्वेत आबादी| और इसीलिए यहाँ की अश्वेत आबादी मोटापे से जूझ रही है| दरअसल कोक और पेप्सी कंपनियों ने यहाँ के लोगों को अपने पेय का गुलाम बना दिया है| आप यहाँ मजदुर तबके को देखिये, उनके हाथ में पानी की बोतल के बदले कोक की बड़ी वाली बोतल दिखेगी| तकलीफ तो तब होती है जब दो से तीन साल के बच्चों को भी कोक पीते देखता हूँ, कितना नुक्सान करता होगा ये उनको| खाने का भी यहाँ अलग ही सिस्टम है, घर पर खाना शायद ही बनता है, लोग नाश्ता से लेकर भोजन तक अधिकतर बाहर ही करते हैं| हमारे यहाँ जितने भी लोग काम करते हैं, उनको हमने आजतक कभी टिफ़िन लेकर आते नहीं देखा, ये अलग बात है कि हम लोग तो रोज ही लेकर जाते हैं| अधिकतर लोग बर्गर, पिज़्ज़ा और इसीतरह की चीजें खाकर दिन बिताते हैं और रोटी या चावल तो सिर्फ किसी हिंदुस्तानी आदमी के साथ ही खाते हैं| 
अधिकतर लोग यहाँ पर मुख्य तौर पर मांसाहारी हैं और शाकाहारियों की संख्या बहुत कम है| हाँ यहाँ के फल बहुत अच्छे होते हैं और सब्जियां भी कमोबेश सभी मिल जाती हैं|

11. बच्चों की पढ़ाई लिखाई के लिए यहाँ बेहद सुकूनदायी माहौल है, पढ़ाई पर कम जोर लेकिन व्यक्तित्व विकास पर ज्यादा| अपने देश के बच्चों को देखिये, उनके वजन से ज्यादा उनके बस्ते का वजन होता है लेकिन यहाँ पर स्थिति काफी अलग और बेहतर है| यहाँ पर शैक्षणिक वर्ष यानी कक्षाएं जनवरी से प्रारम्भ होती हैं और नवम्बर में आखिरी परीक्षा ख़त्म| यानी पूरा दिसंबर बच्चों की छुट्टी, इसके अलावा भी साल में कई बार लंबी लंबी छुट्टियां होती रहती हैं और बच्चों पर पढ़ाई का तनाव अमूमन नहीं दिखता है| शायद इसीलिए यहाँ शिक्षित लोगों का प्रतिशत भी काफी ज्यादा है, लगभग ९२ प्रतिशत|
अमेरिकन इंटरनेशनल स्कूल नाम का एक स्कूल यहाँ ऐसा है जिसका शैक्षणिक वर्ष भारत के हिसाब से है, लेकिन वहां पर एडमिसन के लिए लंबी लाइन होती है| और अगर इसके फीस को आप सुनेंगे तो होश फाख्ता हो जायेंगे, बहुत ही ज्यादा है| एक साल की फीस लगभग ३० लाख रूपये होती है और उसके अलावा तमाम खर्चे और, मतलब अगर आप वहां पढ़ाने का सोच रहे हैं तो फिर हिंदुस्तान की प्रॉपर्टी को बेचना पड़ेगा| वैसे सामान्य प्राइवेट स्कूल की फीस भी लगभग ४ से पांच लाख रूपये सालाना होती है|
स्कूलों में पढ़ाई का माध्यम तो इंग्लिश ही ही है लेकिन उसके अलावा आप यहाँ की स्थानीय भाषा, जैसे अफ्रीकान, जुलू इत्यादि भी सीख सकते हैं| सरकारी स्कूल भी हैं जहाँ पर फीस बहुत कम है लेकिन प्राइवेट स्कूल तो भयानक फीस लेते हैं| हिंदी की पढ़ाई भी कुछ स्कूलों में होती है और इससे यहाँ के अप्रवासी भारतीयों को बहुत राहत मिलती है| बच्चों को कैलकुलेटर शुरू में ही पकड़ा दिया जाता है और प्राइवेट स्कूलों में तो आई पैड में ही पढ़ाई होती है| मतलब लिखने, जोड़ने, घटाने इत्यादि का झंझट ख़त्म|
वैसे एक खास बात है कि यहाँ के स्कूलों में हिंदुस्तान से आये बच्चे बड़े अच्छे नज़रों से देखे जाते हैं| और प्रिंसिपल तथा शिक्षक भी उनसे बहुत प्रभावित रहते हैं, वजह है अनुशासन और संस्कार| भारतीय बच्चे माँ बाप की बात मानते हैं तो शिक्षकों की बात भी मानते हैं, जबकि यहाँ के बच्चे तो स्कूल में अनुशासन का नाम भी शायद ही जानते हों| मैं भी जब भी अपने बेटे के स्कूल जाता था, प्रिंसिपल बहुत तारीफ़ करता था कि भारतीय बच्चे अगर हों तो कोई दिक्कत ही न हो| स्कूलों में धूम्रपान बहुत सामान्य सी बात है और किसी शिक्षक को ये अधिकार नहीं है कि वो किसी बच्चे को दंड दे सके| अगर किसी बच्चे को धूम्रपान करते या
किसी अन्य गलत काम में पकड़ा गया तो उसे कम्युनिटी सर्विस की सजा दी जाती है, जैसे स्कूल में झाड़ू लगाना या सफाई करना आदि| बच्चे किसी भी शिक्षक या प्रिंसिपल को भी उसके नाम से ही बुलाते हैं, बस नाम के पहले मिस्टर का मिस लगा देते हैं| 
खेलकूद भी यहाँ शिक्षा का अभिन्न अंग है और बच्चे खूब खेलते भी हैं| कुल मिलाकर पढ़ाई यहाँ हिंदुस्तान की तरह नहीं है जहाँ बच्चों को बचपन में ही गधो की तरह बस्ते ढोने से लेकर रट्टू तोता तक बना दिया जाता है|

12. यहाँ की पढ़ाई के बारे में कुछ दिलचस्प चीजें और भी हैं| आप फर्ज कीजिये कि आप हिंदुस्तान में किसी को कहते हैं कि आप के बच्चे ने मेट्रिक या हाई स्कूल पास कर लिया है तो वो क्या सोचेगा| उसे तो यही समझ में आएगा कि बच्चे ने दसवीं पास कर ली है और अब वह ११ वीं में पढ़ेगा| लेकिन इस देश में, कई अन्य यूरोपीय देशों की तरह (दरअसल यह देश सिर्फ कहने के लिए अफ्रीका है, अधिकतर मामलों में यह देश यूरोप का ही हिस्सा लगता है), बच्चों का मेट्रिक या हाई स्कूल पास करना एक बहुत बड़ी उपलब्धि होती है| अब वो किस लिए तो बताते हैं- यहाँ पर मेट्रिक या हाई स्कूल मतलब हिंदुस्तान का १२ वीं होता है| और उसे पास करने के उपलक्ष्य में बच्चे बहुत बड़ी बड़ी पार्टी करते हैं जिसे ग्रेजुएसन पार्टी कहते हैं (हिंदुस्तान में ग्रेजुएसन पार्टी का मतलब आप जानते ही हैं, ग्रैजुएट होना)|
बच्चों के साथ साथ उनके माता पिता के लिए भी ग्राजुएसन पार्टी बहुत महत्वपूर्ण होती है| एक आम हिंदुस्तानी के लिए बच्चों की इस पार्टी की कल्पना भी करना बहुत मुश्किल है, इसमें लड़के लड़कियां देर रात तक शराब पीते हैं और नृत्य इत्यादि भी करते हैं| इसके लिए पूरे साल तैयारी की जाती है और अलग से ड्रेस भी सिलाया जाता है| इसके बाद यहाँ पर बहुत से बच्चे किसी नौकरी में लग जाते हैं, बशर्ते उनकी उम्र हो और कुछ बच्चे ही आगे पढ़ाई करने की सोचते हैं|
मेट्रिक के बाद की पढ़ाई यूनिवर्सिटी की पढ़ाई कहलाती है और बच्चे इंजीनिरिंग, मेडिकल या किसी और विषय में दाखिला लेते हैं| जोहानसबर्ग, प्रिटोरिया और केप टाउन में कुछ अच्छी यूनिवर्सिटीज हैं जिनका स्तर काफी अच्छा माना जाता है|
जो लोग भारत में बेरोजगारी से त्रस्त हैं उन्हें यहाँ के आंकड़े भी चौका देंगे| सरकारी तौर पर इस देश में लगभग 27 प्रतिशत बेरोजगारी है लेकिन अगर गैर सरकारी आंकड़ों पर गौर किया जाये तो लगभग ४० प्रतिशत लोग यहाँ बेरोजगार हैं और सरकार उनके लिए भत्ता देने का फैसला कर चुकी है|
पिछले तीन महीने से यहाँ पर छात्रों फीस बढ़ाने के खिलाफ द्वारा हिंसक हड़ताल की जा रही है और कई यूनिवर्सिटीज महीनों से बंद हैं| छात्रों की मांग है कि शिक्षा को फ्री किया जाए और बढ़ी हुई फीस तुरंत वापस ली जाए| पिछले वर्ष भी इसी तरह उन्होंने हड़ताल करके फीस को बढ़ने नहीं दिया था और उनका सोचना है कि आगे भी इसी तरह का प्रोटेस्ट किया जाएगा|
खैर अब शिक्षा फ्री होगी या नहीं, ये तो नहीं पता, लेकिन अब राजनीति इसमें भी घुस चुकी है और शायद इस तरह की हड़तालें आगे भी देखने को मिलती रहेंगी यहाँ पर|

13. लोगों ने तो शुरू में ही बता दिया था कि यहाँ पर यातायात के साधन सीमित हैं| और यही वजह है कि यहाँ हर व्यक्ति के पास कार दिखती है| लेकिन अगर किसी को दक्षिण अफ्रीका का इतिहास और महात्मा गांधीजी के बारे में पता हो तो उसके लिए थोड़े आश्चर्य की बात होगी| अब अगर यहाँ ट्रेन नहीं चल रही होती, तो शायद पीटर मेरिट्सबर्ग की घटना नहीं होती जिसमें गांधीजी को ट्रेन के फर्स्ट क्लास डब्बे से धक्के देकर बाहर फेंक दिया गया था| और इसी घटना ने मोहनलाल को महात्मा बनाने में शायद सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अदा की
और सम्पूर्ण विश्व को एक ऐसा व्यक्ति दिया जिसके बारे में आगे की पीढियां शायद विश्वास भी नहीं कर पाएंगी|
खैर, यहाँ ट्रेन तो चलती है लेकिन उनके तीन विभिन्न प्रकार हैं| पहली ट्रेन, मेट्रो रेल, जो देश के विभिन्न भागों में तो चलती है लेकिन इस ट्रेन में सिर्फ अश्वेत और गरीब आबादी ही सफर करती है| यह बिलकुल हमारे देश की पैसेंजर ट्रेन जैसी है लेकिन हमने न तो खुद आजतक इसमें सफर किया है और न हीं कभी किसी और पर्यटक या स्वेत व्यक्ति को करते देखा है| दूसरी ट्रेन है हाउ ट्रेन जो अपने देश की मेट्रो ट्रेन जैसी है, पूरी तरह वातानुकूलित और बहुत तेज गति से चलने वाली| यह ट्रेन बहुत कम जगहों पर उपलब्ध है और एयरपोर्ट को शहर के कई हिस्सों से जोड़ती है| इसका किराया काफी ज्यादा होता है और आमजन इसमें सफर नहीं करते हैं| तीसरी ट्रेन है ब्लू ट्रेन, यह दुनियां के दस सबसे महंगे ट्रेन में से एक है और यह मुख्य रूप से पर्यटन के लिए है| इसका किराया बेहद महंगा है और इसमें सफर करने की हिम्मत हम जैसों में नहीं है| अब आप इसी से अंदाजा लगा सकते हैं कि आप को जोबर्ग से केपटाऊन जाना हो तो हवाई जहाज में आप लगभग १००० ज़ार(५००० रूपये) में जा सकते हैं, लेकिन अगर आप को ब्लू ट्रेन से जाना है तो लगभग इसका १० से पंद्रह गुना ज्यादा खर्च करना होगा|
एक और खूबी है यहाँ, आप को टैक्सी के तौर पर मर्सिडीज और बी एम् डब्ल्यू हर तरफ दिख जाएँगी और आप इनमे सफर करके अपने आप को महाराजा जैसी फीलिंग दे सकते हैं| दरअसल इस देश में ये कारें बनती हैं और इनपर छूट भी होती है जिसके चलते हर कोई इसे ले सकता है (अपने देश में तो बी एम् डब्ल्यू का मर्सिडीज वाला करोड़पति ही माना जाता है)|
यहाँ आम जनता के लिए टैक्सी चलती है जिसमें हम लोगों के लिए बैठना नामुमकिन है| देखने में इतनी ख़राब नहीं होती लेकिन सुरक्षा कि दृष्टि से लोग मना करते हैं| लेकिन रोड पर आप इनको चलता देखेंगे तो आपको हिंदुस्तान के टेम्पो वाले याद आ जायेंगे| टैक्सी वाले किसी भी ट्रैफिक नियम का पालन नहीं करते हैं और उनसे अपने कार का या अपने आप का बचाव करना आपकी अपनी जिम्मेदारी होती है| जोबर्ग में तो सामान्य टैक्सी ही दिखती है लेकिन अगर आप डरबन चले जाईये तो आपको इक से बढ़कर एक रंगबिरंगी टैक्सी दिखाई पड़ेगी| वहां पर अधिकतर टैक्सियां अफ़्रीकी भारतीय लोग ही चलाते हैं और आप को लगेगा
कि आप दक्षिण भारत के किसी हिस्से में आ गए हैं| बसें भी यहाँ चलती हैं जो कि यहाँ के आमजन के लिए ही हैं, हमारे जैसे आप्रवासियों के लिए नहीं| हाँ टूरिस्ट बसों में आप आराम से सफर कर सकते हैं|

14. यहाँ पर गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन का नियम भी कुछ अलग है, मतलब गाड़ी का नंबर कुछ भी हो सकता है| शुरू में तो नहीं पता था लेकिन अलग ढंग से लिखे नंबर जिज्ञासा जरूर उत्पन्न करते थे| इसी बीच कुछ ऐसे नंबर दिखे जिसमें किसी का नाम लिखा था तो किसी के धर्म के बारे में लिखा था तो लगा कि यहाँ आप कुछ भी नंबर लिखवा सकते हैं| दरअसल यहाँ पर तो नंबर सामान्यतयः हिन्दुस्तान के उलट ही लिखे जाते हैं, जैसे वहां पर पहले राज्य को लिखा जाता है (UP651234), लेकिन यहाँ पर राज्य को अंत में लिखा जाता है (WSR481GP)(GP मतलब हाउटेन्ग प्रोविंस)| कहीं कहीं इसके अपवाद भी हैं|
लेकिन यहाँ सबसे बड़ी सुविधा यह है कि आप कुछ अलग भुगतान करके अपना नंबर कुछ भी लिखवा सकते हैं| उदहारण के तौर पर अगर आप बजरंग बली के तगड़े भक्त हैं तो अपना नंबर कुछ ऐसा लिखवा सकते हैं (HANUMAN GP)| अब मैंने तो यहाँ पर एक से एक नंबर प्लेट देखी है, जैसे श्रीराम, अली जैसे धार्मिक नंबर प्लेट, या किसी का नाम जैसे शीला, बद्री आदि भी| लोग अपने बिज़नस के हिसाब से भी नंबर लिखवा लेते हैं और मुझे तो खैर बहुत अच्छा लगता है इनको देखकर| काश हिंदुस्तान में भी ये सुविधा चालू हो जाए तो मजा आ जाए| 
एक चीज और है, यहाँ गाड़ियों का बीमा काफी महंगा है और अधिकतर यह मासिक भुगतान पर होता है| मतलब हर महीने आपके खाते से बीमा की रकम कट जायेगी| शुरुआत में तो बहुत तगड़ा झटका लगा जब देखा कि जो रकम हम हिंदुस्तान में पूरे साल में देते हैं, वह यहाँ दो महीने में ही देना पड़ रहा है| और बीमा के लिए बस फोन पर बात कीजिये और अपना ईमेल दीजिये, आपकी गाड़ी का बीमा हो जायेगा| ये अलग बात है कि हमारे जैसे शुद्ध बनारसी आदमी के लिए फोन पर यहाँ की अंग्रेजी समझना कितना कठिन था, बता नहीं सकते|
यहाँ एक और दिक्कत से हमारा साबका पड़ा, हिन्दुतान में तो हम लोग शून्य को जीरो या शून्य ही कहते हैं (अंग्रेजी या हिंदी में), लेकिन यहाँ पर जीरो को ओ कहते हैं (O)| अब आप ही बताईये, कोई आपको अपना नंबर बता रहा है और उसमें पड़ने वाले जीरो को ओ कह रहा है तो आपको दिक्कत होगी या नहीं (खैर हम तो अब भी ओ नहीं कह पाते हैं, जीरो ही कहते हैं)| और यहाँ पर मोबाइल के नंबर ९ डिजिट के होते हैं, बस आपको पहले एक ओ मतलब जीरो लगाना पड़ता है|
यहाँ पर फोन आपको महीने के किश्त पर, यानि कॉन्ट्रेक्ट पर मिल जाता है (अब तो भारत में भी मिल रहा है)| आप किसी भी नेटवर्क कंपनी के पास जाईये, वो आपको महीने के कॉन्ट्रैक्ट पर, जो कि अमूमन दो साल के लिए होता है, फोन दे देगा| इसीलिए शुरू में मुझे हर व्यक्ति के हाथ में आई फोन देखकर झटका लगा था, बाद में समझ आया कि जो मर्जी वो फोन आप ले सकते हैं यहाँ| 
वैसे तो यह देश पूरी तरह से किश्तों पर जीने वाला देश है लेकिन लोग यहाँ जिंदगी को भरपूर जीते हैं|

15. कुछ और अजीब चीजें भी यहाँ देखने को मिलती रहती हैं, बशर्ते आप आँखें खोल के निकलें| लोग यहाँ धूम्रपान बहुत करते हैं लेकिन बिलकुल अनुशासन में| हर माल या फैक्ट्री, कार्यालय में धूम्रपान की जगह नियत है और लोग उसी जगह पर जाकर सिगरेट पीते हैं| खासकर पार्किंग में तो अक्सर लोग सिगरेट पीते नजर आ जाते हैं और कार चलाते हुए भी खूब सिगरेट पीते हैं| किसी भी रोबोट (ट्रैफिक सिग्नल) पर आप रुकते हैं तो अपने चारो तरफ देख लीजिये, बहुत से लोग धूम्रपान करते दिख जायेंगे| लेकिन एक अजीब बात जो मुझे देखने को मिली वो ये थी कि पुरुषों के तुलना में यहाँ महिलाएं ज्यादा धूम्रपान करती दिखती हैं| हुक्का भी खूब फैशन में है और जगह जगह हुक्का बार हैं जिनमें कहीं कहीं तो पूरी रात युवक युवतियां आपको हुक्का पीते नज़र आ जायेंगे|
सबसे ज्यादा मजा तो तब आता है जब आपको किसी ट्रैफिक सिग्नल पर कोई महिला कार चालक अपनी भौहें बनाती दिख जाती है| कार में मेकअप करना तो सामान्य बात है यहाँ और कभी कभी तो भीड़ में धीरे धीरे कार चलाते हुए महिलाएं पूरा मेकअप कर डालती हैं| खैर मेरी नजर में तो बहुत साधना की जरुरत होती होगी इसके लिए|
शुक्रवार को दोपहर बाद अगर आप माल या किसी शॉपिंग सेंटर में जाएंगे तो आपको बहुत चहल पहल नजर आएगी| लोग वीकेंड के लिए खाने पीने का सामान और बाकी जरुरत की चीजें खरीद लेते हैं और फिर अगले दो दिन तक मस्ती करते हैं| लोगों से अगर आप शुक्रवार शाम को बात कीजिये तो कमोबेश एक ही बात सुनने को मिलती है "बहुत थक गए हैं, बहुत लंबा हफ्ता था"| अब इनको कौन समझाए कि एक बार हिंदुस्तान जाकर काम करिये तो समझ आये कि थकान और काम क्या होता है|
महीने में अमूमन २५ या २६ तारीख को यहाँ पे डे (तनख्वाह का दिन) होता है और उस हफ्ते तो चहल पहल देखने लायक होती है| अधिकतर लोगों की तनख्वाह अगले १० दिन में ख़त्म हो जाती है और फिर लोग अगली तनख्वाह का इंतज़ार करते हैं| जिंदगी को सिर्फ आज में जीने वालों की यहाँ बहुतायत है और बचत क्या होती है, इनको पता भी नहीं होता| अब चूँकि हर चीज ही यहाँ किश्तों में मिल जाती है तो लोग बहुत चिंता करते भी नहीं हैं| यहाँ पर हर बड़े स्टोर का अपना एक कार्ड होता है (क्रेडिट कार्ड जैसा) और उससे लोग सामान को किश्तों में खरीद लेते हैं| यहाँ तक कि एक चप्पल भी आपको किश्त में खरीदने की सुविधा मिलती है और जब तक उसका भुगतान पूरा हुआ तब तक वह टूट भी जाती है|
और एक हम लोग हैं कि तनख्वाह मिलने के बाद सबसे पहले बचत के बारे में ही सोचते हैं|

16. यहाँ पर सबसे ज्यादा जो चीज हम हिंदुस्तानियों को खलती है, वह है सड़क के किनारे चाय पकोड़े की दुकान का नहीं होना| डरबन और केपटाऊन, जो इस देश के अन्य महत्वपूर्ण शहर हैं, वहां तो फिर भी सड़क के किनारे दुकानें मिल जाती हैं, लेकिन जोहानसबर्ग में तो आपको कुछ भी खरीदना है तो आपको शॉपिंग माल में ही जाना होगा| सुरक्षा की वजह से यहाँ सड़क पर आपको दुकानें नहीं मिलती हैं, इक्का दुक्का कहीं कहीं दिखती भी हैं तो वह सिर्फ स्थानीय अश्वेत लोगों के लिए ही होती हैं| 
लेकिन इसी शहर का एक हिस्सा है फोर्ड्सबर्ग, जो कि एक तरह से मिनी एशिया है| इस जगह हर तरह की भारतीय चीज जैसे सरसो का तेल, पोहा, जलेबी इत्यादि मिल जाती है| आपको बेहतरीन इडली डोसा खाने को मिल जाएगा और तमाम तरह के भारतीय पकवान भी मिलेंगे| इस एरिया में हिंदुस्तानी, पाकिस्तानी और बांग्लादेशी दुकानदार हैं और उनका अपना ग्राहक बेस है| अधिकतर बाल काटने की दुकानें पाकिस्तानियों की हैं तो मीट और मछली की दुकान बांग्लादेशियों की| और इस इलाके में आने के बाद आप खुद को हिंदुस्तान के ही किसी हिस्से में महसूस करते हैं| दरअसल यहाँ गन्दगी का साम्राज्य है और ट्रैफिक नियम का भी उतनी कड़ाई से पालन नहीं होता है| आपको पूजा पाठ की सारी सामग्री भी यहाँ मिल जाएगी और होली में रंग तथा दीवाली में पटाखे और दिए भी यहाँ पर मिल जाते हैं| कुछ चाय और पान की दुकान भी यहाँ हैं और बांग्लादेश से इम्पोर्टेड रोहू और कतला मछली भी यहाँ मिल जाती है जो बेहतरीन क्वालिटी की होती है| उतनी बढ़िया क्वालिटी की रोहू तो मैंने शायद ही कभी हिंदुस्तान में खायी होगी| एक खास दुकान है यहाँ पर, एक मीट की दुकान है जिसमें सभी सेल्स काउंटर पर सिर्फ मुस्लिम महिलाएं काम करती हैं| एक और खासियत है यहाँ की, यहाँ मटन का मतलब लैम्ब (भेड़) होता है| दरअसल यहाँ पर लोग लैम्ब ही खाते हैं, बकरे का मीट बहुत कम खाया जाता है| लेकिन फोर्ड्सबर्ग में आपको बकरे का मीट भी मिल जाता है| दिक्कत सिर्फ होटल्स में होती है जहाँ आपको बकरे का गोश्त नहीं मिलता है|   
शुरुआत में एक बार दिलचस्प वाकया हुआ| फोर्ड्सबर्ग में एक सब्जी की दुकान, जो अमूमन फुटपाथ पर लगती है, से सब्जी खरीदकर चलते समय हमने थैंक्यू कहा तो उसने जवाब में शुक्रिया बोला| इस देश का स्थानीय सब्जी बेचने वाला हिंदी बोल रहा था, ये मेरे लिए बेहद अजीब बात थी| फिर तो उससे खूब बात हुई हिंदी में और उसने बताया कि हिंदुस्तानी ग्राहकों से ही उसने हिंदी सीखी है| अब तो बस उसकी की दुकान से सब्जी लेता हूँ, उससे बात करके काफी अच्छा लगता है| कुछ और दुकानदार भी हिंदी के कुछ शब्द जानते हैं और हम लोगों को देखकर अक्सर बोलते भी हैं|   
इस शहर के कुछ और हिस्से भी ऐसे हैं जहाँ हिंदुस्तान के लोग बहुतायत में रहते हैं और वहां पर खूब सारे मंदिर और मस्जिद भी हैं, उसके बारे में अगली चिट्ठी में| 

17. कुछ और बहुत दिलचस्प चीजें यहाँ देखने को मिलती हैं| दर असल इस देश में औपचारिकता की पराकाष्ठा दिखती है| लोग तो यहाँ पर इस तरह से क्षमा मांगते हैं जैसे हम लोग साँस लेते हैं| अब उदाहरण के तौर पर फर्ज कीजिये कि आप किसी शॉपिंग माल या कहीं भी पैदल जा रहे हैं और आपके सामने कोई व्यक्ति आ जाता है| अब ऐसे में हम हिंदुस्तानी अमूमन थोड़ा सा हट के या रगड़ते हुए निकल जायेंगे, लेकिन यहाँ पर ऐसा नहीं होता है| ऐसी स्थिति में 100 में से 95 लोग रुक जायेंगे और आपसे तुरंत सॉरी बोलेंगे, तब रास्ता बदलेंगे| और अगर दोनों तरफ यहाँ के लोग हैं तो स्थिति और दिलचस्प होती है, उनमें अधिक विनम्र होने की जैसे होड़ लग जाती है|
सबसे हास्यास्पद स्थिति तो तब होती है जब आप टॉयलेट में हों, अपना काम निपटा रहे हों और आपके बगल वाली स्थान पर आकर कोई स्थानीय व्यक्ति खड़ा हो जाए| अब ऐसे में अगर आपकी निगाह उस व्यक्ति से टकरा गयी तो मान के चलिए कि उस अवस्था में भी आपको अपना हालचाल बताना पड़ सकता है| हमारे ऑफिस के सामने एक चार्टर्ड अकाउंटेंट का ऑफिस था और उसका मालिक एक बेहद बुजुर्ग व्यक्ति था| अब आमने सामने ऑफिस होने कि वजह से लिफ्ट में भी मुलाक़ात हो जाती थी और हम एक दूसरे को पहचान गए थे| खैर जब ऑफिस के सामने, लिफ्ट में या शॉपिंग माल में (हम लोगों का ऑफिस एक शॉपिंग माल में ही है) मुलाक़ात होती थी तब तो ठीक था एक दूसरे की कुशल क्षेम पूछना| लेकिन सबसे खतरनाक तो तब लगा जब एक दिन टॉयलेट में हम लोग अगल बगल खड़े थे और जैसे ही उनसे नजर मिली, शुरू हो गए “आप कैसे हैं”| अब शर्मा शर्मी में हमने भी कह दिया ठीक हूँ, लेकिन अब अगर उनका हाल चाल नहीं पूछता तो असभ्य हो जाता| इसलिए बहुत हिचकते हुए उनका हाल चाल भी पूछना ही पड़ गया| अब आप कल्पना कर सकते हैं कि अपनी क्या हालत थी लेकिन उनके लिए तो ये सामान्य शिष्टाचार था| इसके बाद दो तीन बार और ऐसा ही संयोग हुआ तो टॉयलेट जाने में भी हिचक होने लगी कि कहीं फिर न टकरा जाएँ| (अब वो ऑफिस शिफ्ट हो गया है तो काफी राहत है)
टॉयलेट से याद आया, यहाँ पर सफाई का काम अश्वेत महिलाएं ही करती हैं और टॉयलेट चाहे महिलाओं का हो या पुरुषों का, उसे महिलाएं ही साफ़ करती हैं| सफाई करने के समय संकेत के तौर पर वो टॉयलेट के बाहर एक पानी का बर्तन जैसा रख देती हैं ताकि उसे देखकर कोई अंदर न आये| अब शुरू शुरू में तो यह पता नहीं था इसलिए सीधे घुस जाया करते थे | धड़धड़ाते हुए टॉयलेट में घुसे और सामने महिला कर्मचारी खड़ी थी| अब काटो तो खून नहीं, न आगे बढ़ते बनता था और न वापस भागने कि हिम्मत| खैर अब तो आदत भी पड़ गयी है और संकेत का भी पता चल गया है तो शर्मिंदगी से बच जाते हैं|
एक और बेहद अजीब बात है इस देश में कि यहाँ अधिकतम खुदरा मूल्य का कोई कांसेप्ट ही नहीं है| मतलब एक ही चीज आपको एक दूकान में एक मूल्य में और उसी के बगल वाली दूकान में उससे कई गुना ज्यादा दाम में मिलेगी| दर असल अधिकतर चीजें यहाँ आयात की जाती हैं और जिस दुकान की जो मर्जी, वह कीमत लेता है| एक बार एक साधारण सा रजिस्टर हम लोगों ने ख़रीदा जो काफी महंगा लगा (लगभग 650 रुपये का था)| कुछ ही दिन बाद वही रजिस्टर उसी के ठीक बगल वाली स्टोर में मिला जिसकी कीमत लगभग 60  रुपये थी, मतलब दस गुने का फ़र्क़| अब आप की मर्जी है कि आप ये सब पता लगाते रहें, वर्ना तो लुटना तंय है|
एक और बहुत अजीब बात देखने को मिली यहाँ पर, यहाँ पर जुड़वाँ बच्चे बहुत देखने को मिलते हैं| मैंने अपने जीवन में जितने नहीं देखे थे, यहाँ शायद एक साल में ही देख लिए| जुड़वाँ बच्चों की गाड़ी भी खूब देखने को मिलती है यहाँ और कभी कभी तो तीन बच्चे भी दिख जाते हैं| एक और फ़र्क़ है यहाँ, हिंदुस्तान में तो महिलाएं बच्चों को कमर पर टाँग के घूम लेती हैं लेकिन यहाँ पर दो अलग अलग वर्ग दो अलग अलग तरीके से बच्चों को ढोते हैं| जो अमीर (मुख्यतयाः श्वेत आबादी) हैं वह महिलायें या तो बच्चों को बच्चा गाड़ी में घुमाती हैं या अपने पीछे एक आरामदायक बैग जैसे सामान में टाँग कर घूमती हैं| लेकिन तो गरीब आबादी है उसे ये बच्चा गाड़ी लेना महंगा पड़ता है तो ये महिलायें बच्चों को अपनी पीठ पर तौलिये के सहारे बांध लेती हैं और घूमती हैं| बच्चे भी बड़े आराम से बिना कोई शोर किये तौलिये से बंधे हुए घूमते रहते हैं|
वैसे एक बात तो है कि यहाँ के बच्चे अमूमन बहुत खामोश रहते हैं, बच्चों का रोना चिल्लाना बहुत दुर्लभ दृश्य है यहाँ|

18. अगर आपको कोई अंतरराष्ट्रीय किकेट मैच हिंदुस्तान में देखना हो तो ऐसा लगता है जैसे आप किसी जेल में जा रहे हों और कुल मिलाकर अनुभव कुछ बहुत अच्छा नहीं होता| कई घंटे तक लाइन लगाकर आप स्टेडियम में पहुँचते हैं और आपको बहुत कम चीजें अंदर ले जाने की इजाजत होती है| फिर वापस निकलने में पुनः घंटों लगते हैं और फिर पार्किंग में से अपनी गाड़ी लेकर निकालते समय तक आप एक तरह से तौबा कर लेते हैं|
लेकिन यहाँ पर किसी अंतरराष्ट्रीय मैच को देखना इतना सुखद अनुभव होता है कि आप चाहेंगे कि बार बार ऐसे मैच हों और आपको इन्हें देखने का मौका मिले| अब चूँकि मेरा घर यहाँ के सबसे मशहूर और महत्वपूर्ण स्टेडियम वांडरर्स के ठीक सामने है तो मैं तो सभी मैचों का आनंद लेता रहता हूँ| यहाँ मैच देखने का मतलब सिर्फ मैच देखना नहीं होता है, बल्कि परिवार के साथ या दोस्तों के साथ भरपूर पिकनिक मनाना होता है| आप यहाँ अपने साथ ड्रिंक, खाने पीने का सामान, छोटा टेंट जिसके नीचे आप आराम से चद्दर बिछाकर सोते हुए मैच देख सकते हैं|
एक मैच तो मैदान के अंदर चल रहा होता है लेकिन इस यहाँ पर घांस के एरिया में बच्चे बहुत से क्रिकेट और फुटबॉल मैच साथ साथ खेल रहे होते हैं| यहाँ के स्टेडियम में कई तरह के स्टैंड हैं और उनमें सबसे प्यारा स्टैंड होता है घांस वाला एरिया| यह पूरी तरह से पिकनिक के लिए होता है और बच्चे खूब मस्ती करते है| पूरे स्टेडियम में कम से कम एक बैंड तो होता ही है जो लगातार बजता रहता है और लोग बियर पीते हुए नृत्य करते रहते हैं| लोगों की वेशभूषा भी देखने लायक होती है और कुल मिलाकर माहौल गजब का होता है|
मैंने कभी पढ़ा था कि विदेशों में मैच के दरम्यान कुछ स्ट्रीकर्स (निर्वस्त्र लोग) घुस जाते हैं और खूब शोर शराबा होता है| लेकिन जब मैं पहला ही अंतरराष्ट्रीय मैच जो दक्षिण अफ्रीका और पकिस्तान के बीच हुआ था, देखने गया तो इसका प्रत्यक्ष अनुभव हुआ| टी २० मैच था और पहली पारी ख़त्म होने के बाद बारिश शुरू हो गयी| अब मैच तो बंद था और लोग छाते लगाकर बारिश ख़त्म होने का इंतज़ार कर रहे थे| मैं भी छाता लगाए बैठा था तभी अचानक से शोर हुआ और नजर मैदान में गयी जहाँ एक व्यक्ति दौड़ रहा था और उसके पीछे पीछे सुरक्षा कर्मी दौड़ रहे थे| गौर से देखने पर पता चला कि वह एक स्ट्रीकर था और पूरा स्टेडियम खूब शोर कर रहा था| खैर तीन चार बार गिरने पड़ने के बाद सुरक्षा कर्मी उसे किसी तरह पकड़कर बाहर ले गए और शोर थमा| लेकिन दस मिनट बाद ही फिर से एक स्ट्रीकर घुसा और फिर वही शोर शराबा और उसे पकड़ने के लिए सुरक्षा कर्मियों की दौड़ भाग| खैर जब तक बारिश नहीं बंद हुई, ये मनोरंजन चलता रहा और फिर मैच शुरू हुआ|
मैच के समय पार्किंग के लिए भी यहाँ गजब की व्यवस्था होती है| बहुत सारे स्थानीय लोग लोगों की गाड़ी पार्किंग कराने के लिए लगे रहते हैं| सड़क के दोनों ओर और कभी कभी सड़क के बीच में भी गाड़ियां खड़ा कराई जाती हैं| काफी दूर से ही पार्किंग कराने वाले आपको क्रिकेट के शॉट का इशारा करके पूछते हैं कि क्या आप मैच देखना चाहते हैं| अगर आपकी गाड़ी धीरे हुई तो वो समझ जाते हैं और फिर आपकी गाड़ी के साथ कभी कभी तो आधे किलोमीटर तक की दौड़ लगाते हैं, जब तक कि आप की गाड़ी पार्क न करा दें|
एक और बात है यहाँ कि अगर मैच वन डे या टेस्ट मैच है तो लंच ब्रेक या टी ब्रेक में मैदान को दर्शकों के लिए खोल दिया जाता है| अब आधे घंटे तक दर्शक मैदान पर क्रिकेट खेलते रहते हैं, या फोटो लेते रहते हैं| उसके बाद सब लोग बाहर निकल जाते हैं और वापस मैच स्टार्ट| 
कुल मिलाकर अगर मैच देखने का स्वर्गिक आनंद लेना है तो यहाँ आकर लीजिये और साथ साथ पिकनिक फ्री मनाईये|  

19. आजकल हिंदुस्तान में चल रहे नोट बंदी (५०० और १००० के नोट बंद होने की घटना) के साथ साथ यहाँ की करेंसी और बैंकिंग के बारे में भी जानना दिलचस्प रहेगा| इस देश में अनेक वर्ग की मुद्रा उपलब्ध है जिसमें सिक्कों से लेकर नोट तक हैं| हमको सबसे पहली दिक्कत तो यह हुई कि यहाँ आने से पहले तक हमें पता था कि यहाँ की मुद्रा ज़ार है| लेकिन यहाँ आने पर पता चला कि इसे रैंड भी कहते हैं और लिखते समय R100, R 200 लिखते हैं|
यहाँ पर सबसे छोटा सिक्का  सेण्ट का है फिर १० सेण्ट का है और उसके बाद २० सेण्ट और ५० सेण्ट का| फिर १ ज़ार, २० ज़ार और ५ ज़ार के सिक्के भी हैं| ये सारे सिक्के आज भी बखूबी चलते हैं और हर दूकान में आपको फुटकर के तौर पर मिल जाते हैं|
सबसे छोटा नोट यहाँ १० ज़ार का है और उसके बाद २० ज़ार, ५० ज़ार, १०० ज़ार और २०० ज़ार का है| २०० ज़ार से बड़ी कोई मुद्रा यहाँ नहीं है और इससे काम चल जाता है| एक अपना हिंदुस्तान है जहाँ २००० रुपये का नोट भी लोगों को छोटा लग रहा है|
अपने देश की तरह लाख और करोड़ यहाँ नहीं चलता है, इस देश में लाख को सौ हजार (HUNDRED THOUSAND) और उसके बाद मिलियन और बिलियन होता है (मिलियन मतलब १० लाख)|
आप अगर हिंदुस्तान में किसी भी बैंक में खाता खोलते हैं तो आपको अपने बचत खाते में रखे हुए धन पर ब्याज भी मिलता है जो अलग अलग बैंक अलग अलग दर पर देते हैं| लेकिन यहाँ पर आप ने अपना खाता खोला तो ब्याज मिलना तो दूर, हर महीने एक निश्चित रकम देने के लिए तैयार हो जाईये| उसके बाद अगर आपने एक निश्चित संख्या से ज्यादा बार अगर रकम निकाली तो भी आपको कुछ शुल्क का भुगतान करना पड़ेगा| और नगद तो आप जब भी जमा करेंगे, आपको शुल्क लगेगा ही| हां अगर आपने फिक्स्ड डिपाजिट में पैसा रखा है तो आपको जरूर ब्याज मिलता है, लेकिन उसमें भी एक शर्त है कि समय से पहले आप पैसा निकाल नहीं सकते| अगर आपने समय पूर्व पैसा निकाला तो आपको ब्याज तो कुछ भी नहीं मिलेगा और कुछ पेनाल्टी अलग से लगेगी (मतलब अगर आपने १००० ज़ार फिक्स्ड डिपाजिट में जमा किये हैं और आप उसे समय पूर्व निकाल रहे हैं तो आपको शायद ९५० ज़ार ही मिलेंगे)|
एक और महत्वपूर्ण बात, यहाँ का रिज़र्व बैंक सरकारी नहीं है, बल्कि प्राइवेट है| पूरी दुनिया में कुल ७ देश ही हैं जहाँ रिज़र्व बैंक प्राइवेट है और यह देश उनमें से एक है (अमेरिका और स्विट्ज़रलैंड भी है इस लिस्ट में)| यहाँ पर बैंकिंग इंडस्ट्री में एकाधिकार का ये हाल है कि ५ बड़े बैंक हैं यहाँ पर जो पूरे दक्षिण अफ्रीका के बैंकिंग का ९५ प्रतिशत हिस्सा अपने पास रखे हुए हैं| बाक़ी बचे ५ प्रतिशत के लिए तमाम बैंक काम करते हैं|  
महंगाई की दर भी पिछले तीन सालों में काफी बढ़ी है और बढ़ती बेरोजगारी के चलते यहाँ के आर्थिक आर्थिक हालात काफी ख़राब हो चुके हैं| लोग वर्तमान सरकार से भी काफी खफा हैं और अगले चुनाव में सत्तारूढ़ अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस को बदलने की बात भी जोरो शोरों से उठ रही है|    
20. पुलिस एक ऐसा शब्द है जिससे वैसे तो व्यक्ति को सुरक्षा का आभास होना चाहिए लेकिन होता संभवतः इसका उल्टा ही है| हिंदुस्तान में शायद ही कोई शरीफ इंसान ऐसा होगा जिसे अगर ये कहा जाए कि किसी काम के लिए पुलिस के पास चले जाओ तो वह जाना चाहेगा (हाँ, सत्तारूढ़ दाल के नेता, अपराघी और दलाल जरूर बेधड़क पुलिस के पास चले जाते हैं)| लेकिन इस देश में स्थिति काफी उलट है और लोगों को पुलिस के पास जाने में कम से कम भय तो नहीं ही लगता है|
यहाँ की पुलिस फोर्स दक्षिण अफ्रीकन पुलिस सर्विस (SAPS) है| और इसके अलावा यहाँ पर कुछ म्युनिसिपल क्षेत्रों में म्युनिसिपल पुलिस यूनिट भी है (जोहानसबर्ग, डरबन और केप टाउन में), जिनके पास कम पावर होते हैं| मुख्य रूप से इनका कार्य ट्रैफिक व्यवस्था को चलाना और म्युनिसिपल क्षेत्रों में उनके कानून का पालन कराना होता है|
यहाँ पर पुलिस के अधिकारियों के रैंक हिंदुस्तान के सेना की तरह होते हैं| सबसे बड़ा अधिकारी जनरल होता है और उसके बाद लेफ्टिनेंट जनरल, मेजर जनरल, ब्रिगेडियर, कर्नल इत्यादि होते हैं| हाँ सबसे निचले स्तर के कर्मचारी को कांस्टेबल जरूर कहते हैं| कुल पुलिस बल की संख्या लगभग २ लाख के आस पास है जो दुनिया के बाकी देशों की तुलना में बहुत कम है (हिंदुस्तान में तो लगभग २० लाख पुलिस कर्मी होंगे जो विश्व में सर्वाधिक है, चीन से भी ज्यादा)|
लेकिन यहाँ पर आपको हर चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस या हर मोड़ पर सामान्य पुलिस नहीं दिखती है| अक्सर वीकेंड के पहले शाम को वाहनों की सघन तलाशी होती है और लोग पूरी शांति से इसमें सहयोग करते हैं| सबसे आश्चर्यजनक दृश्य तो तब देखने को मिलता है जब किसी चौराहे की लाइट खराब हो जाती है और वहां पर पुलिस के जवान ट्रैफिक कण्ट्रोल करने आते हैं| न तो इनके पास कोई सीटी होती है जिसे जोर से बजा सकें और न ही कोई शोर शराबा होता है| इसमें बहुत सी महिला पुलिस की सदस्य होती हैं और अगर वो स्थानीय अश्वेत महिला है तो कभी कभी आपको ट्रैफिक नियंत्रण करते करते नृत्य करते भी दिख जाती है| लगता ही नहीं है कि ट्रैफिक नियंत्रण में इनको कोई तनाव होता है| दरअसल यहाँ भीड़ भाड़ नहीं है तो इसके चलते शायद तनाव भी नहीं होता है पुलिस को|
अगर आपकी गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया है तो आपको नजदीकी पुलिस स्टेशन जाकर एक रिपोर्ट लिखानी होती है जिससे बीमा कंपनी आपको क्लेम का भुगतान कर सके| अब अगर यह रिपोर्ट आपको हिंदुस्तान में लिखवानी हो तो आपके माथे पर पसीना आ जायेगा, लेकिन यहाँ तो पता ही नहीं चलता| मैं खुद गया था रिपोर्ट लिखाने, पहले तो एक काउंटर पर बैठे पुलिस कर्मी से कुशल क्षेम हुआ और फिर उसने बताया कि फलां पुलिस अधिकारी के पास चले जाईये, काम हो जायेगा| अगले १० मिनट में रिपोर्ट लिख कर मिल भी गयी| ये अलग बात है कि यह शहर दुनिया के सबसे ज्यादा अपराधग्रस्त शहरों में से एक है|
यहाँ पर पुलिस के सामानांतर एक और व्यवस्था चलती है जो प्राइवेट सुरक्षा एजेंसीज के द्वारा चलायी जाती है| इस देश में तमाम निजी एजेंसियां हैं जो अलग अलग क्षेत्रों में काम करती हैं| हर बिल्डिंग और हर घर कहीं न कहीं इनके द्वारा सुरक्षित रहता है और उनकी गाड़ियां दिन रात भाग दौड़ करती रहती हैं| दर असल ये एजेंसियां बड़े बड़े नेताओं द्वारा संचालित होती हैं और शायद इसी वजह से यह उद्योग फल फूल रहा है| अब अगर देश में अपराध घट गए तो इनका धंधा ही बंद हो जायेगा, यहाँ पर अपराधों के नहीं घटने की शायद ये भी एक वजह हो सकती है|
एक और बात जो बहुत सुकूनदायीं लगती है कि यहाँ शायद ही कभी सड़क पर नेताओं के चलते सड़क जाम लगता है| न तो कोई पुलिस के हूटर्स और न ही कोई लाल, नीली बत्तियां जलाती हुई गाड़ियां दिखती हैं| सिर्फ कभी कभी जब देश के राष्ट्रपति निकलते हैं तो थोड़ी दूर तक ट्रैफिक रोक दिया जाता है|    
पुलिस का सामान्य व्यवहार भी बहुत दोस्ताना होता है, आप किसी भी पुलिस वाले से बिना किसी भय के कुछ भी पूछ सकते हैं| पुलिस में भ्रष्टाचार तो यहाँ भी खूब है लेकिन शायद ही कभी सामना करना पड़ा है, हाँ एक बार जरूर २० ज़ार कोक के नाम पर देना पड़ा था (एक पुलिस वाले ने मांग ही लिया था कि कम से कम कोक तो पिलाइये)|

21. किसी भी देश को जानने के क्रम में सबसे पहली चीज जो आप अमूमन जानना चाहते हैं, वह होती है कि उसकी राजधानी क्या है | अब जब इस देश के बारे में आपको पता चलेगा कि यहाँ कोई एक राजधानी नहीं है तो आपको बेहद आश्चर्य होगा| दरअसल इस देश की तीन राजधानियां हैं और वह अलग अलग वजहों से हैं|
1. यहाँ पर प्रीटोरिया में कार्यपालिका की राजधानी है क्योंकि देश के राष्ट्रपति यहीं रहते हैं (सीट ऑफ़ प्रेसिडेंट)|
2. केपटाउन में विधायी राजधानी है (सीट ऑफ़ पार्लियामेंट)|
3. ब्लोमफोंटेन में न्यायिक राजधानी है (सीट ऑफ़ सुप्रीमकोर्ट)|
इस देश में कुछ और चीजें हैंजो काफी अलग हैं| यहाँ पर  अफ्रीका महाद्वीप में सबसे ज्यादा श्वेत आबादी है और हिंदुस्तान के बाहर सब से ज्यादा हिंदुस्तानी भी यहीं रहते हैं| इस देश में कुल 9 प्रोविंस हैं जिसमें सबसे ज्यादा आबादी वाला प्रोविंस हॉटेंग है जिसकी राजधानी जोहानसबर्ग है| लेकिन सबसे ज्यादा भारतीय डरबन में रहते हैं जो क्वाज़ुलूनटाल प्रोविंस में आता है|
सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा यहाँ ज़ुलू है और उसके अलावा भी यहाँ 10 और ऑफिसियल भाषाएँ हैं, जिनमे अंग्रेजी और अफ्रीकान्स मुख्य हैं|
अब कहाँ उत्तरप्रदेश जैसा हिंदुस्तान का एक प्रदेश जिसकी आबादी लगभग 22 करोड़ होगी और कहाँ यह पूरा देश जिसकी आबादी लगभग 5.5 करोड़ होगी| मतलब एक उत्तरप्रदेश में 4 दक्षिणअफ्रीका आ जायेगा, इसीलिए यहाँ पर भीड़ भाड़ नहीं देखने को मिलती है| अगर आप जोहानसबर्ग से केपटाउन सड़क के द्वारा जाते है (लगभग 1600किमी दूर), तो आपको कभीकभी 200 किमी तक कुछ भी नहीं दिखेगा, सिर्फ आपकी गाड़ी, हरा भरा वातावरण और शानदार सड़क| (ये 1600 किमी की दूरी भी लोग औसतन 12 घंटे में तंय कर लेते हैं, आप इसी से यहाँ की सड़क का अंदाज लगा सकते हैं)|
यहाँ के तीन सबसे महत्वपूर्ण शहर हैं-
1 . जोहानसबर्ग -जो हमारे मुम्बई की तरह आर्थिक गतिविधियों की राजधानी कहा जा सकता है|
2. डरबन -जो कि महात्मा गाँधी की वजह से बहुत मशहूर है और जहाँ हिंदुस्तान  के बाहर सबसे ज्यादा हिंदुस्तानी रहते हैं|
3. केपटाउन-जो कि विश्व में घूमने फिरने के लिए दूसरा सबसे खूबसूरत और सुकूनदायक शहर है (पहले नंबर पर तो फ़्रांस का एक शहर आता है)|
इसके अलावा पोर्टएलिज़ाबेथ और पोलोकवाने भी काफी मशहूर हैं और काफी लोग यहाँ भी घूमने फिरने आते हैं| लेकिन एक बेहद आश्चर्यजनक बात यह भी है कि एक तरफ जोहानसबर्ग है जो अपराध के मामले में बहुत कुख्यात है तो दूसरी तरफ केपटाउन है जो बेहद सुरक्षित शहर है| डरबन में भी ज्यादा दिक्कतें नहीं हैं, कुल मिलकर जातीय विविधताओं, भाषायी भिन्नताओं और हर रंग और नस्ल के लोगों का एक बेहतरीन देश है दक्षिणअफ्रीका|

22. हमारे हिंदुस्तान में बालों को लेकर कई चीजें प्रचलित हैं, जैसे बालों को लेकर कई गाने बने हैं "ये रेशमी जुल्फें", या "न झटको जुल्फ से पानी", आदि| पता नहीं कितनी कवितायेँ भी लिखी गयी हैं प्रेयसी के बालों के बारे में कल्पना करते हुए| कितने ही तरह के तेल, साबुन औऱ शैम्पू भी सिर्फ घने काले लंबे बालों के लिए मिलते हैं अपने देश में| अगर किसी के बाल झड़ने लगे तो वह न जाने कौन कौन से उपाय करता है, जैसे अंडे लगाना, रेड़ी का तेल लगाना आदि आदि| साथ ही साथ एक औऱ चीज प्रचलित है अपने देश में कि पैसा उन्ही के पास होता है जिनके सर पर बाल कम होते हैं, मतलब गंजापन औऱ अमीरी साथ साथ आती है (अब हमारे सर से बाल आज तक कम नहीं हुए औऱ इसीलिए जेब खाली ही रहती है)|
लेकिन क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि कोई ऐसा देश भी है जहाँ के अश्वेत निवासियों के सर पर अमूमन या तो बाल होते ही नहीं हैं, औऱ अगर होते भी हैं तो बेहद कम औऱ छोटे घुंघराले बाल| वैसे क्रिकेट में दिलचस्पी होने के चलते अक्सर वेस्ट इंडीज के खिलाडियों के सर के विचित्र तरह के बालों को देखकर बहुत उत्सुकता होती थी कि इतने अजब गजब बाल क्यों होते हैं इनके| लेकिन जब यहाँ पर आया तो इस रहस्य का खुलासा हुआ औऱ मैं एकदम से आश्चर्यचकित रह गया|
दर असल शुरू शुरू में बहुत से स्थानीय अश्वेत लोगों से मुलाकात हुई तो पुरुष तो अक्सर टकले ही मिलते थे| लेकिन स्त्रियों के बाल अजीब तरीके के थे, हर स्त्री का अलग हेयर स्टाइल| धीरे धीरे पता चला कि यहाँ की सारी स्त्रियां नकली बाल (विग) लगाती हैं, उनके सर पर बाल तो होते ही नहीं| कभी कभी तो यहाँ औरतें भी एकदम सफाचट सर लिए घूमते नजर आ जाती हैं औऱ उनको देखकर आप को झटका लग सकता है| औऱ सिर्फ इसी देश में नहीं, बल्कि पूरे अफ्रीका में अमूमन लोगों के सर पर बाल नहीं होते हैं|
हमारे एक परिचित ने एक दिलचस्प वाकया सुनाया| यहाँ पर घरों में काम करने के लिए महिलाएं आसानी से मिल जाती है औऱ लोग हफ्ते में एक दिन से लेकर हफ्ते में पांच दिन तक उनसे काम करवाते हैं (शनिवार औऱ रविवार को तो वह भी काम नहीं करती)| उनके यहाँ काम करने वाली सुबह आयी, काम किया औऱ चली गयी| शाम को फिर वह काम करने के लिए आयी औऱ जब उसने घंटी बजायी तो मेरे परिचित चौंक गए कि ये कौन आ गया| उन्होंने दरवाजा बंद कर दिया तो फिर से घंटी बजी औऱ उस महिला ने उनसे कहा कि वही उनके यहाँ काम करती है| दर असल हुआ यह था कि सुबह जब वो आयी थी तो उसके बाल एकदम छोटे थे, लेकिन शाम को उसने बहुत बड़े बालों का विग लगा लिया था जिसके चलते वह उसको पहचान नहीं पाए|
खैर यहाँ महिलाएं अपनी आमदनी का एक हिस्सा विग पर भी खर्च करती हैं औऱ ये विग या तो उनके सर पर गोंद से चिपका दिए जाते हैं, या सर पर सिल दिए जाते हैं| अब सिलने में दर्द भी तो होता है लेकिन इनके पास कोई औऱ रास्ता भी नहीं होता उसे बर्दास्त करने के सिवा| यहाँ बाल खूब बिकते हैं औऱ सभी सलून अपने यहाँ से कटे हुए बालों को बेच देते हैं| लेकिन इसका सकारात्मक पहलू ये भी मान सकते हैं कि हर महीने आपके बाल अलग अलग स्टाइल के होंगे औऱ अगर आपने सर टकला ही रखा तो आपको उधार देने वाले भी शायद ही आपको पहचान पाएं|
लेकिन एक बात औऱ है यहाँ कि इसी वजह से बहुत से श्वेत पुरुष भी अपना सर टकला ही रखते हैं| पता नहीं अश्वेत लोगों के समर्थन में या एक फैशन सा बन गया है यहाँ टकला रहना|
शायद एक नारी के लिए इससे बड़ी दुर्भाग्य की औऱ कोई बात नहीं हो सकती कि उसके सर पर बाल नहीं हो, लेकिन प्रकृति ने न जाने क्यों ये सजा दे रखी है यहाँ के अश्वेत निवासियों को|

23. आज हिंदुस्तान में बहुत सारी समस्याएं सिर्फ वहां की जनसँख्या की वजह से हैं| लगभग १३० करोड़ की जनसँख्या को सँभालते सँभालते संसाधनों का अकाल पड़ जाता है, सरकार भो पस्त रहती है कि कैसे सबको रोटी, कपडा और मकान मिले| शादियां भी एकाध धर्मों को छोड़कर सिर्फ एक ही होती हैं और सरकार और विभिन्न समाजसेवी संसथान दिन रात लगे हुए हैं कि कैसे जनसँख्या नियंत्रण किया जाए| कुछ साल पहले तक तो बच्चे दो ही अच्छे का नारा था लेकिन अब तो "एक ही बच्चा, सबसे अच्छा" माना जा रहा है|
लेकिन इस देश में मैंने कभी भी किसी को भी, चाहे वह सरकार हो या समाजसेवी संस्थान हों, जनसँख्या नियंत्रण के बारे में कोई बात करते नहीं देखा| यहाँ तो लोग आराम से कम से कम तीन, और अगर कहीं जुड़वाँ बच्चे हो गए तो चार या पांच बच्चे भी पैदा करते हैं| दरअसल इस देश की कुल जनसँख्या भी हमारे एक छोटे से प्रदेश जितनी ही है और न तो जगह की कमी है और न ही संसाधनों की|
एक और खास बात नज़र आयी यहाँ कि यहाँ के दंपत्ति शादी के बाद तुरंत ही बच्चे पैदा कर लेते हैं (वैसे शादी करने से पहले कई साल ये लोग ऐसे ही साथ रह चुके होते हैं, और कभी कभी तो शादी में इनके बच्चे भी सरीक होते हैं)| और एक बच्चे के तुरंत बाद दूसरा और तीसरा बच्चा भी पैदा कर लेते हैं| फिर उसके बाद पूरी जिंदगी चैन से रहते हैं, बच्चों के बीच हमारे देश की तरह अंतर यहाँ देखने को नहीं मिलता है|
शादियों के मामले में भी यहाँ पूरी आज़ादी है, अक्सर यहाँ सिंगल पेरेंट्स मिल जाते हैं| शादी के दो चार साल बाद ही बहुत से लोग अलग भी हो जाते हैं और फिर किसी और से शादी कर लेते हैं| मतलब ऐसे पति पत्नी, जिन्होंने साथ साथ जिंदगी गुजारी हो, बहुत कम ही मिलते हैं| यहाँ के कुछ जातियों में कई शादियां करने की भी इजाजत है और लोग चार चार शादियां भी करते हैं| सबसे दुखद पहलू ये होता है कि महिला को पता होता है कि उसका पति कुछ साल बाद ही दूसरी या तीसरी शादी भी कर लेगा, लेकिन वह कुछ नहीं कर पाती है|  
शादी भी यहाँ काफी सादगी से संपन्न हो जाती है| किसी पार्क या पब्लिक प्लेस पर लोग इकठ्ठा होते हैं और एक पादरी की देख रेख में एकाध घंटे में ही शादी संपन्न हो जाती है| लड़के के सभी भाई एक ड्रेस में और लड़की की बहनें एक अलग ड्रेस में आपको दिख जाते हैं और शादी में नाच गाना होता रहता है (बस बैंड बाजा नहीं दिखा हमको)| फिर एक लंच और शादी संपन्न, बहुत कम भीड़ भाड़ और चहल पहल| हाँ, कुछ शादियां चर्च में भी होती हैं और बहुत से जातियों में इसे सबसे जरुरी भी समझ जाता है
तलाक बहुत सामान्य सी चीज है यहाँ पर और तलाक के बाद बच्चे किसी एक के पास रहते हैं और दूसरा भी उनसे मिलने आराम से आता रहता है| मेरी बिल्डिंग में ही एक पति पत्नी में शादी के बहुत साल बाद तलाक हुआ और उसके बाद पति के साथ उसकी नयी गर्ल्फ़्रेंड रहने लगी| बीच बीच में बच्चों की माँ भी आती रहती है और बच्चे भी बीच बीच में अपनी माँ के घर जाकर रहते हैं| कहीं कोई कडुवाहट नहीं, न ही कोई झगड़ा झंझट|
अब चूँकि महिलाएं आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं तो ज्यादा बंधन में रहना पसंद नहीं करती हैं, लेकिन कहीं न कहीं परिवार जैसी संस्था तो प्रभावित होती ही है|

24.  अगर किसी हिंदुस्तानी को कहा जाये कि आप को नौकरी में हर हफ्ते दो छुट्टियां मिलेंगी और त्यौहारों पर अलग से छुट्टी मिलेगी, तो शायद ख़ुशी के मारे उसका दम ही निकल जाए| हफ्ते क्या महीने में भी त्यौहारों के अलावा अगर दो छुट्टी मिल जाए कर्मचारियों को (खासकर बैंक वालों को) तो वह काफी प्रसन्न हो जायेंगे| लेकिन अगर उनको ये कह दिया जाए कि साल के ११ महीने हर हफ्ते दो छुट्टियां, त्यौहारों पर अलग से छुट्टी, कोई त्यौहार अगर शनिवार को पड़ गया तो उसके लिए सोमवार को भी अलग से छुट्टी तो मिलेगी ही, साथ ही साथ साल में पूरे एक महीने की छुट्टी अलग से मिलेगी तो शायद आदमी पागल ही हो जायेगा|
अब यहाँ आने से पहले तो हम लोग महीने में अगर दो दिन भी छुट्टी मिल जाती थी तो खुश हो लेते थे, लेकिन जब इस देश में आये तो पता चला कि यहाँ काम कम और छुट्टियां ज्यादा हैं| हर हफ्ते दो छुट्टियां, त्यौहारों पर अलग से छुट्टी और फिर जब दिसम्बर आया तो पता चला कि यहाँ दिसम्बर महीने में कोई काम ही नहीं होता| वजह ये कि यहाँ हर कंपनी में लगभग एक महीने की छुट्टी रहती है जो दिसम्बर के दूसरे हफ्ते से लेकर जनवरी के पहले हफ्ते तक चलती है| उसके बाद भी लोगों को आने में कुछ और दिन लग ही जाते हैं| सबसे मजे की बात ये है कि नवम्बर एन्ड से ही लोग अगले महीने की छुट्टी की तयारी में लग जाते हैं और फिर काम भी सुस्त पड़ जाता है| 
इस देश में सबसे बड़ा त्यौहार क्रिसमस का होता है और लोग पूरे साल इसके लिए दिन गिनते रहते हैं| 
क्रिसमस की खरीददारी ब्लैक फ्राइडे से ही शुरू हो जाती है जो नवम्बर के आखिरी हफ्ते में पड़ता है| जैसे हिंदुस्तान में दिवाली पर बोनस या बख्शीश दिया जाता है, वैसे ही यहाँ पर दिसम्बर में कर्मचारियों को बोनस मिलता है और काम करने वालों को बख्शीश इस महीने में देना जरुरी होता है| लगभग हर कंपनी में क्रिसमस पार्टी होती है और लोग उसके बाद छुट्टियों की तैयारी में लग जाते हैं| हर शॉपिंग मॉल के बाहर और अंदर बड़े
बड़े क्रिसमस ट्री दीखते हैं और बच्चों को उपहार देते हुए जगह जगह संता भी नजर आते हैं|
एक और चीज यहाँ अजीब है, आप कल्पना कीजिये हिंदुस्तान में किसी भी त्यौहार में (होली को छोड़कर) बाज़ारों की क्या हालात रहती है| दुकाने और रेस्टुरेंट इत्यादि देर रात तक खुले रहते हैं और सड़कों पर खूब चहल पहल रहती है| अब चूँकि यहाँ दशहरा या दीवाली तो पब्लिकली मनाई नहीं जाती है (हिंदुस्तानी लोग ही आपस में मना लेते हैं), तो बाजार में कोई भीड़ भाड़ दिखने की उम्मीद भी नहीं थी| लेकिन क्रिसमस के अवसर पर मुझे लगा कि बाजार में खूब भीड़ भाड़ होगी और रेस्टुरेंट भी देर तक खुले रहेंगे| अब क्रिसमस वाले दिन
हम लोग शाम को मॉल में गए कि कुछ खरीदी भी कर लेंगे और रात को खाना भी खाकर आएंगे, लेकिन माल पहुंचे तो पता चला कि अधिकांश दुकानें बंद हैं और रेस्टुरेंट भी बंद है| लोग भी छुट्टी या सामान्य दिन के लिहाज से भी बहुत कम नज़र आ रहे थे| उस समय पता चला कि यहाँ पर त्यौहार में दुकानें देर तक खुलना तो दूर, अधिकतर बंद ही रहती हैं (फिर घर आकर ही खाना, खाना पड़ा)|
जोहानसबर्ग शहर दिसम्बर में लगभग बंद सा रहता है, सड़कों पर एक चौथाई गाड़ियां ही नजर आती हैं और अधिकतर लोग छुट्टियां मनाने या तो केप टाउन, या डरबन निकल जाते हैं| इस महीने की छुट्टी मनाने के लिए काफी पहले से ही बुकिंग्स कर ली जाती हैं| दिसम्बर के महीने में इस शहर में अपराध काफी बढ़ जाते हैं क्योंकि सबको क्रिसमस मनाना होता है और उसके लिए पैसे चाहिए| और इस महीने में घरों में चोरियां भी खूब होती हैं, क्योंकि सारे लोग तो बाहर गए होते हैं|

25. हिंदुस्तान में तो हम लोगों ने कई तरह की इन्सुरेन्स पालिसी के बारे में सुना था और कई तरह के पार्लर भी देखे, सुने थे| लेकिन इस देश में आने के बाद एक ऐसे पार्लर के बारे में पता चला कि अपने तो होश ही उड़ गए| सबसे पहले तो यहाँ आकर ये पता चला कि आपको मेडिकल इन्सुरेन्स रखना ही है| आप किसी भी क्लिनिक में चले जाओ या कहीं पर भी हस्पताल में जाईये, सबसे पहले आपसे यही पूछा जायेगा कि किस कंपनी का मेडिकल इन्सुरेन्स है आपके पास| अगर आपके पास नहीं है तो फिर आपको पहले पैसा जमा करना होगा, तभी वो आपको भर्ती करेंगे| दूसरा खटका तब लगा जब देखा कि इन्सुरेन्स कंपनी वाले एक और पालिसी भी बेचते हैं यहाँ पर जिसको "फ्यूनरल पालिसी" कहते हैं| मतलब आपके किरिया करम के लिए ये पालिसी होती है| अब हिंदुस्तान जैसा माहौल तो है नहीं यहाँ कि घंटे भर में सैकड़ो लोग इकठ्ठा हो जाते हैं किसी के मरनी में| यहाँ तो एकल परिवार और बचत लोग करते नहीं तो अंतिम संस्कार का खर्च कहाँ से आये, इसके लिए ये पालिसी भी खूब चलती है यहाँ पर (हमको भी हर हफ्ते एक मैसेज आ जाता है इस पालिसी का)|
दूसरा यह कि आप को अगर कहा जाए कि आप पार्लर जाना पसंद करेंगे तो आपका जवाब अमूमन हाँ ही होगा| क्योंकि आप तो यही सोचेंगे कि पार्लर मतलब खूबसूरत बनने की जगह| लेकिन अगर आपको बताया जाये कि आपको फ्यूनरल पार्लर जाना है तो आपकी हालात क्या होगी| डर असल यहाँ पर फ्यूनरल पार्लर भी खूब हैं जहाँ मृत व्यक्ति को रखा भी जाता है और वहां पर अंतिम संस्कार से सम्बंधित सारी सामग्री, जैसे कफ़न, गाड़ियां, दफ़नाने के उपकरण इत्यादि भी मिलते हैं| 
एक और अजीब बात है यहाँ पर, खासकर निम्न आय वर्ग के लोगों में, कि मृत्यु के बाद मृत शरीर को कई दिनों तक (कई बार तो महीनों तक) रखा जाता है| इसकी दो वजहें हैं, एक तो ये कि सारे रिश्तेदार इकट्ठे हो जाते हैं और दूसरी वजह आर्थिक है| अगर मृत व्यक्ति की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है तो वह घूम घूम कर लोगों से पैसे इकठ्ठा करता है और जब जरुरत भर के पैसे इकठ्ठा हो जाते हैं, तब अंतिम संस्कार किया जाता है| 
खैर इस देश में जीवन के साथ साथ अंतिम संस्कार का भी अलग ही हिसाब है|  

26. इस देश में अनेक विरोधाभास देखने को मिलते हैं| जहाँ एक तरफ हर व्यक्ति से, चाहे आप उसे जानते हों या न जानते हों, आपको सामने पड़ने पर हाल चाल पूछना ही है| वहीँ दूसरी तरफ लोग अपने अपने घरों में सिमटे भी रहते हैं और पड़ोसियों से भी शायद ही कोई ताल्लुक रखते हैं| इसमें फ़र्क़ थोड़ा दिखता है श्वेत और अश्वेत लोगों में, श्वेत लोग एकदम अपने आप में सीमित रहते हैं तो अश्वेत लोग मौज मस्ती वाले होते हैं और थोड़े ज्यादा खुले होते हैं| 
अब जिस सोसाइटी में हम रहते हैं, वहाँ पर अनुभव थोड़ा अलग है| मेरे ठीक पड़ोस में रहने वाली महिला लगभग ७० साल की हैं और अकेले रहती हैं| आज भी उनके सजने सँवरने में कोई कमी नहीं है और दूर से देखकर तो आप अंदाज भी नहीं लगा सकते उनकी उम्र का| खूब बातचीत करने वाली और आज भी अकेले अपनी कार लेकर पूरे शहर में घूमती रहती हैं| अपने कई पुरुष मित्रों के बारे में बेहिचक बात करती है और अपने पति को भी उसी तरफ याद करती हैं| दो बच्चे हैं, बेटी इंग्लैंड में है तो बेटा इज़राईल में| साल में एक बार बेटा यहाँ आता है और एक बार वह बेटी के पास इंग्लैंड जाती हैं|  
एक परिवार और है जिसके दोनों बच्चे उसी स्कूल में पढ़ते हैं, जिसमें मेरा बेटा| अब चूँकि यहाँ अधिकतर स्कूलों में ट्रांसपोर्ट की सुविधा नहीं होती तो मेरे लिए बहुत कठिन था रोज सुबह स्कूल बेटे को छोड़ना और फिर शाम को लेना| लेकिन पहले ही दिन उन्होंने बेटे को खुद ही स्कूल छोड़ा और ले आये| मुझे थोड़ी राहत मिली, फिर मैंने उनसे कहा कि एक दिन आप ले जाईये, एक दिन मैं ले जाऊंगा, तो उन्होंने साफ़ मना कर दिया| कहने लगे कि मैं तो वैसे भी रोज स्कूल जाता ही हूँ तो आपके बेटे को भी ले जाऊंगा| खैर जब मैंने कई बार कहा तो उन्होंने मुझे दो दिन स्कूल ले जाने की इज़ाज़त दी| लेकिन उन दो दिनों में से भी एक दिन वही ले जाते थे, यहाँ तक कि अगर उनके बच्चों को नहीं भी जाना है तो भी मुझसे नहीं कहते थे| किसी अनजान देश में कोई ऐसा आदमी मिलना बहुत बड़े भाग्य की ही बात है|
मेरे मकान मालिक एक डॉक्टर हैं और बेहद सज्जन पुरुष| हमसे बस एक ही बात हमेशा कहते हैं "मैं चाहता हूँ कि आपको कोई दिक्कत नहीं हो"| शुरू में ही जब मैं उनके घर में रहने गया तो उन्होंने कहा कि पूरे घर का कालीन, सिर्फ इत्यादि नया लगवा देता हूँ| अब चूँकि सारा सामान लगभग नया ही था तो मैंने मना कर दिया| फिर मैंने कुछ सामान के लिए कहा, तो होता ये थे कि अगर मैंने दो चीज के लिए कहा तो वह छह चीज ले आते थे| अगर कोई भी चीज थोड़ी भी गड़बड़ हुई तो तुरंत नया लगवा देते| धीरे धीरे ये स्थिति हो गयी है कि अब मैं किसी भी चीज के लिए कहता ही नहीं हूँ| एक और ख़ास बात है कि घर में अगर कुछ भी गड़बड़ हुई और मैंने उनको बताया, तो खुद ही लग जाते हैं उसे ठीक करने के लिए| कोई संकोच नहीं और कोई फ़र्क़ भी नहीं कि टॉयलेट में कुछ ख़राब है और उसे ठीक करना है|  
कुल मिलाकर यह एक अजब गजब देश है और यहाँ पर जिंदादिली खूब दिखती है|    

27. हर देश की अपनी कुछ खास चीजें होती हैं, जैसे वहां का क्लाइमेट, वहां का खाने पीने का ढंग इत्यादि| दक्षिण अफ्रीका वैसे तो मूलतः मांसाहारी देश है लेकिन यहाँ पर शाकाहार के लिए भी चीजें खूब पायी जाती है, मिसाल के लिए फल| खैर जब शुरुवात में मैं यहाँ आया था तो मैंने कई लोगों से सुना कि इस वीकेंड पर ब्राई पार्टी रखते हैं, तो मुझे लगा कि कुछ तो खास होगा इसमें| फिर जब पहली बार एक ब्राई पार्टी में गया तो लगा कि वास्तव में यह कुछ खास है| 
इस देश में ब्राई खूब होती है और साल में एक दिन यहाँ नेशनल ब्राई डे के रूप में २४ सितम्बर को मनाया जाता है (इसी दिन नेशनल हेरिटेज डे भी मनाया जाता है)| अब ब्राई के बारे में तो ये भी कहते हैं कि अगर आपको ब्राई के बारे में नहीं पता तो आपको अफ्रीका में रहने का हक़ ही नहीं है| दर असल ब्राई का मतलब होता है भुना हुआ गोस्त, और यहाँ पर ब्राई के लिए अलग से स्टैंड, कोयला, लकड़ी और उसके लिए अलग से कटा हुआ मीट भी मिलता है| शाकाहारी लोग इसमें भुट्टा और स्वीट पोटैटो भी भून लेते हैं और उनका भी ब्राई हो जाता है|
यहाँ पर अक्सर वीकेंड्स में, और खास तौर पर सर्दियों में तो जरूर ब्राई पार्टी होती है| ब्राई स्टैंड में कोयला और लकड़ी रखकर आग लगाते हैं और थोड़ी देर में जब आग तैयार हो जाती है तो उसपर मसाले में लिपटे हुए मीट को भूना जाता है| इसके लिए भी जानकारी होनी चाहिए, वर्ना मीट जल भी सकता है| खैर ब्राई स्टैंड के चारो तरह लोग शराब लेकर बैठ जाते हैं और धीरे धीरे मीट खाते रहते हैं| यह अमूमन सिर्फ मीट की ही पार्टी होती है और इसमें और कुछ भी (जैसे रोटी, चावल) नहीं खाते हैं| 
सबसे मजे की बात यह है कि यहाँ पर आपको हर बड़े स्टोर में ब्राई के लिए बढ़िया से पैकेट में गोल गोल कोयला, लकड़ी और अलग से इसके लिए पैक किया हुआ मीट मिलता है| साथ में मसाला भी मिलता है, बस आप मीट को मसाले में लपेटिये और ब्राई करके चाव से खाइये| आप किसी भी पार्क में चले जाईये, आपको वीकेंड्स में तमाम ब्राई पार्टियां चलती मिल जाएँगी|
दर असल ब्राई पार्टी यहाँ सामाजिक त्यौहार जैसा होता है जिसमें ढेरों लोग इकठ्ठा होते हैं और खूब खाते पीते हैं| किसी भी बड़े फंक्सन में या जन्मदिन इत्यादि की पार्टी में यह होता ही है| बस यह समझ लीजिये कि अपने हिंदुस्तान में जैसे बट्टी, दाल और चोखा की पार्टी होती है, वैसे ही यहाँ ब्राई की पार्टी होती है|

28. जब बात खाने की हो, तो दक्षिण अफीका आपका बहुत पसंदीदा स्थल हो सकता है| न सिर्फ मांसाहार, बल्कि शाकाहार के भी बहुत से विकल्प यहाँ मौजूद हैं| मीट, पोल्ट्री प्रोडक्ट्स, सी फ़ूड तो यहाँ खूब मिलते ही हैं, साथ ही साथ फल, अनाज और सब्जियां भी यहाँ एकदम फ्रेश और पौस्टिक होती हैं| 
अगर अनाज की बात करें तो यहाँ का सबसे ज्यादा पैदा होने वाला अनाज गेंहू ही है लेकिन सबसे बड़ी मात्रा में मक्का पैदा होता है| मक्के का आटा यहाँ खूब बिकता है और लोगों के मुख्य आहार का एक अहम् हिस्सा होता है| रोटियां तो लोग यहाँ बहुत कम ही खाते हैं लेकिन ब्रेड के लिए गेहूं का प्रयोग होता है| चावल भी यहाँ उगाया जाता है और लोग खाते भी हैं लेकिन उतना नहीं, जितना हमारे हिंदुस्तान में|
अब अगर गन्ने का जिक्र न हो तो हिंदुस्तान और अफ्रीका का सम्बन्ध अधूरा रह जायेगा| यहाँ गन्ने की पैदावार भी खूब होती है और इसी गन्ने के खेतों में काम करने के लिए हिंदुस्तान से लोगों को लाया गया था| उस समय तो उनको यहाँ पर कुली कहते थे, लेकिन आज ये लोग सम्मान की जिंदगी गुजार रहे हैं| 
यहाँ पर एक ख़ास चीज मिलती है "बिलटोंग" और जिसको बनाने की जगह जगह पर फैक्ट्री भी है| इसे लोग नास्ते में या किसी भी समय खाने में इस्तेमाल कर लेते हैं| दर असल यह मीट को सुखाकर और उसमें मसाले लपेटकर बनाया जाता है (जैसे हिंदुस्तान में अचार बनाया जाता है)| पुरे दक्षिण अफ्रीका में कहीं भी चले जाईये, आपको बिलटोंग हर जगह मिल जाता है और खूब चाव से खाया जाता है| मीट किसी भी चीज का हो सकता है, जैसे बीफ, लैम्ब, पोर्क, हिरन, ऑस्ट्रिच इत्यादि| 
मीट में सबसे ज्यादा यहाँ बीफ ही मिलता है और उसके बाद लैम्ब, पोर्क, हिरन, ऑस्ट्रिच इत्यादि भी खूब मिलता है| हिंदुस्तान से आने वालों के लिए एक चीज यहाँ गौर करने वाली है, अगर आपने कहीं पर चीज़ बर्गर आर्डर किया है तो ध्यान रखिये, यहाँ पर चीज़ मतलब बीफ भी होता है| हमारे एक परिचित जिस दिन यहाँ आये, दोपहर में खाने के लिए मैक डोनाल्ड में चले गए और चीज़ बर्गर आर्डर कर दिया ये सोच कर कि पता नहीं यहाँ नॉन वेग बर्गर में क्या हो| लेकिन जैसे ही उन्होंने उसे खाना शुरू किया, उनका ध्यान पैकेट पर गया और उनको वहां बीफ लिखा हुआ दिख गया| अब उनको दिन भर उल्टियां आती रहीं, आगे से उन्होंने कान पकड़ा कि चीज़ यहाँ पर कभी नहीं खाएंगे| 
फलों में सेब, केला, स्ट्रॉबेरी, अंगूर इत्यादि खूब मिलते हैं और अंगूरों की तो बहार है यहाँ| इस देश में वाइन फैक्ट्रीज और वाइन यार्ड्स भी खूब हैं और यह शराब के बड़े निर्माताओं में से एक है| 

29. खाने पीने की चीजों में एक और बेहद मशहूर चीज है यहाँ पर जो हिंदुस्तानियों से सीधे जुडी हुई है| "बनी चाउ" नाम की एक ऐसी डिश है जिसके ओरिजिन में हिंदुस्तानियों का नाम आता है| यह मुख्य रूप से ब्रेड के बड़े लोफ के ऊपरी हिस्से को निकाल कर और उसमें तरह तरह की सब्जियों या मीट को भर कर बनायीं जाती है, और बाद में ब्रेड के निकाले हुए हिस्से से उसे ढँक दिया जाता है| मतलब एक तरह से सब्जियों और मीट से भरा हुआ ब्रेड, जिसे आप हाथ में पकड़कर खा सकते हैं और आपको किसी भी प्लेट या चम्मच वगैरह की जरुरत नहीं है|
अब इस मशहूर डिश की उत्पत्ति के लिए भी कई कहानियां प्रचलित हैं| सबसे पहले हिंदुस्तानी लोगों को नटाल (डरबन) के इलाके के गन्ने के खेतों में काम करने के लिए ले आया गया था| अब हिंदुस्तानी लोग तो रोटी सब्जी खाने वाले लोग हुआ करते थे लेकिन यहाँ पर तो रोटी मिलती नहीं थी| अब रोटी का विकल्प हो गया ब्रेड का बड़ा टुकड़ा लेकिन सब्जी कहाँ रखें, क्योंकि इन लोगों को टिफ़िन ले जाने की इजाजत नहीं होती थी| अब जुगाड़ में तो हिंदुस्तानियों का सांई पूरे विश्व में नहीं होता तो यहाँ भी उन्होंने इसका जुगाड़ धुंध निकाला| और ऐसे में यही विकल्प समझ में आया लोगों को और उन्होंने ब्रेड के बीच में सब्जी भरकर ले जाना शुरू किया| 
अब इसका नाम बनी चाउ क्यों पड़ा, इसके पीछे भी कई किस्से हैं| इसमें सबसे प्रचलित किस्सा यह है कि गुजरात के किसी बनिए ने इसे अपने भोजनालय में सबसे पहले बनाया तो इसका नाम बनी चाउ पड़ गया| पहले तो इसमें सिर्फ सब्जियां ही होती थीं लेकिन बाद में मीट भी भरा जाने लगा| आज से सैकड़ों साल पहले डरबन से शुरू हुआ यह फ़ास्ट फ़ूड आज न सिर्फ डरबन में, बल्कि पूरे दक्षिण अफ्रीका में बड़े चाव से खाया जाता है|
डरबन में तो हर साल सितंबर महीने में बनी चाउ बैरोमीटर नाम से एक प्रतियोगिता भी होती है जिसमें भाग लेने और जिसका आनंद उठाने दूर दूर से लोग आते हैं और इसके विजेता को पुरस्कृत भी किया जाता है| 
अगर आप कभी भी दक्षिण अफ्रीका आएं, तो बनी चाउ को चाव से खाना मत भूलियेगा| 

30. दक्षिण अफ्रीका खाने पीने में तो बेहतरीन जगह है ही, यहाँ पर शिष्टाचार भी बहुत अलग है| हर किसी से हाल चाल पूछना तो यहाँ पर सामान्य है ही, लेकिन हम हिंदुस्तानियों के लिए सबसे अजीब चीज है यहाँ के लोगों का बिंदास व्यवहार| अब आप कल्पना कीजिये कि हिंदुस्तान में कोई लड़की किसी पुरुष को देखे और मुस्कुरा दे तो क्या होगा| शायद वह पुरुष उससे शादी तक की कल्पना कर डालेगा| और अगर कोई लड़की किसी पुरुष को कहीं भी रोक कर कहे कि आप के बाल बड़े प्यारे हैं, तो फिर उस पुरुष की मानसिक स्थिति की आप कल्पना कर सकते हैं| उसको तो शायद यही लगे कि अब तो अपना रास्ता एकदम साफ़ है|
यूरोपीय देशों की तरह यह देश भी बहुत बिंदास है, किसी भी जगह पर एक दूसरे को हग करना, किस करना या दुनिया से बेखबर एक दूसरे में डूबे रहना यहाँ आम बात है (हम लोगों के लिए थोड़ा मुश्किल होता है इसे हजम करना)| किसी को किसी भी संबोधन से पुकारना यहाँ आम बात है, आप किसी भी स्टोर में चले जाईये, रेस्टुरेंट में चले जाईये, आप को कुछ ऐसे संबोधन सुनने को मिल जायेंगे, जिसकी हम हिंदुस्तानी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं|
अब कोई हिंदुस्तानी पुरुष किसी स्टोर में जाए और वहां की कोई महिला कर्मचारी उससे कहे "हाउ आर यू माय लव" या "हाउ आर यू माय डार्लिंग", तो उसकी क्या हालत होगी आप सोच सकते हैं| लेकिन यहाँ तो ये सब सामान्य बोलचाल में शुमार है, और किसी को इस बोलचाल में कुछ अजीब भी नहीं लगता| आप अमूमन किसी भी महिला को कह सकते हैं कि आप बहुत सुंदर हैं और किसी के साथ भी फोटो लेने के लिए कह सकते हैं, खासकर अश्वेत आबादी के साथ तो यह बिलकुल सामान्य है| सामान्यतया कोई इन सब से इनकार भी नहीं करता| 
एक और खास बात है यहाँ (जो अब हिंदुस्तानी महानगरों में भी आम हो चला है) कि लोग एक दूसरे से मिलने पर हाथ तो मिलाते ही हैं, लेकिन एक दूसरे से गले लगना ज्यादा पसंद करते हैं| और बहुत बार तो एक दूसरे को गले लगाकर एक दूसरे के गाल पर चुम्बन भी करते हैं| अब आप सोचिये कि ये सब आम हिंदुस्तानी सोचे भी तो मुश्किल आएगी|
और यहाँ की अश्वेत आबादी हाथ भी थोड़ा अलग तरीके से मिलाती है, हम लोग तो सिर्फ एक दूसरे का हाथ पकड़कर हिलाते हैं लेकिन ये लोग आपका हाथ दो तरह से पकड़ते हैं, पहले अपने पंजे से आपके पंजे को और फिर अपने हाथ के अंगूठे से आप के हाथ के अंगूठे को और फिर वापस पंजे को पकड़ते हैं| यह इनके आपसे आत्मीय होने का प्रतीक होता है| 
खैर हर जगह के अलग अलग तरीके हैं और लोग जितना जल्दी इससे अभ्यस्त हो जाएँ, उतना बेहतर होता है|

31.कुछ और चीजें जो यहाँ आप को आश्चर्य में डाल देती हैं, उनमे से एक है यहाँ पर टिसू पेपर का उपयोग| यहाँ पर लोग हिंदुस्तानियों की तरह रुमाल नहीं इस्तेमाल करते, बस टिसू पेपर ही इस्तेमाल करते हैं| चाहे खाने के समय हो या खाने के बाद हो, हर जगह सिर्फ टिसू पेपर| वैसे तो यह लोग साफ़ सफाई के लिए बहुत सजग रहते हैं लेकिन अगर आप इनसे साथ खाने बैठ गए तो शुरू शुरू में तो आपको बहुत दिक्कत होगी| अगर खाना जरा भी तीखा है तो इनकी नाक बहनी शुरू हो जाती है और खाने के मेज पर बैठे बैठे ही ये लोग टिसू से नाक साफ़ करते हैं और फिर उस टिसू को जेब में रखकर पुनः खाना शुरूं कर देते हैं| अब आप सोचिये कि आपके ठीक सामने बैठा हुआ व्यक्ति खूब जोर से नाक साफ़ करता है और फिर टिसू जेब में रखकर वापस आप के साथ खाना शुरू कर देता है तो ऐसे में आपको खाना हजम होगा| और अगर खुदा न खास्ता उसको जुकाम हुआ है तो पूरे भोजन के दौरान वह बार बार नाक साफ़ करेगा और खाता रहेगा, भले आपका खाना खराब हो जाये| और खाने के बाद खूब सारा टिसू लेकर हाथ साफ़ करेगा और चल देगा, रुमाल का झंझट ही नहीं| बाकि टॉयलेट में तो यह लोग सिर्फ टिसू पेपर ही इस्तेमाल करते हैं, यह तो सबको पता है|
एक और चीज जो हमें आज ही पता चली वह यह है कि यहाँ का नियम है कि जो व्यक्ति किसी भी जगह जाता है, उसे पहले हाल चाल पूछना है| आप फर्ज कीजिये कि आप हिंदुस्तान में किसी ऑफिस में जाते हैं या किसी और जगह भी जाते हैं तो रिसेप्सन पर बैठा आदमी आपको पहले ग्रीट करेगा, फिर भले आप उसे नमस्कार कीजिये और काम की बात कीजिये| लेकिन यहाँ अगर आप कहीं भी जाते हैं तो रिसेप्सन पर बैठे आदमी को पहले आपको पूछना है कि आप कैसे हैं, फिर वह आपसे पूछेगा और आपकी मदद करेगा| हमारे परिचित के साथ एक मजेदार वाक़या हुआ था एक बार, उनको किसी ऑफिस में पहुँचने में देर हो रही थी तो उन्होंने गेट पर खड़े गार्ड से कहा कि मुझे देर हो रही है, क्या आप गेट खोल सकते हैं| लेकिन वह गार्ड खड़ा रहा उसने गेट नहीं खोला तो उनको गुस्सा आया और उन्होंने पूछा कि तुम गेट क्यों नहीं खोल रहे तो उसने बताया "आपने मुझसे हाल चाल नहीं पूछा, तो कैसे खोल दूँ"| फिर उन्होंने क्षमा मांगी और उससे पूछा कि आप कैसे हैं, तब जाकर गार्ड ने गेट खोला| मतलब यहाँ आप कैसे हैं नहीं पूछना उनका अपमान करना माना जाता है|
यहाँ के भारतीय, जो कई पुश्तों से यहीं रह रहे हैं, उन्होंने अपने आप को यहाँ के हिसाब से ढाल लिया है| उनमे से अधिकांस को तो यह भी नहीं पता कि उनके दादा परदादा कहाँ से आये थे और बहुत से तो अपने आप को अब दक्षिण अफ्रीकन ही मानते हैं| उनके नाम और सरनेम तो अभी भी काफी मिलते जुलते हैं लेकिन नाम की स्पेलिंग में काफी फ़र्क़ आ गया है| मिसाल के तौर पर एक परिचित हैं जिनका नाम वी गरीब है लेकिन गरीब की स्पेलिंग (Garrib) है| इसी तरह एक और हैं जिनका सरनेम शिवनाथ है लेकिन स्पेलिंग (Sewnath) है| ऊषा की स्पेलिंग (Oosha) होती है, चित्रा की स्पेलिंग (Citra) होती है और विद्या की स्पेलिंग (Vidhiya), ऐसे ही तमाम नाम हैं जिनकी स्पेलिंग पढ़कर आप चौंक जायेंगे लेकिन यह फ़र्क़ यहाँ के हिसाब से हो गया है|
ऐसे ही और कई अजब गजब चीजें हैं यहाँ पर, जिनका जिक्र आगे चलकर होता रहेगा|

32. यहाँ के लोगों के शौक भी अजीब अजीब हैं, मसलन बर्ड वाचिंग, फिशिंग, साइकिल चलाना या बोटिंग करना| अब हिंदुस्तान में तो मैंने शायद ही कहीं देखा हो कि लोग सैकड़ो किलोमीटर दूर सिर्फ इसलिए जाते हैं कि वहां पर चिड़िया देखने की कोई जगह है| लेकिन इस देश में आप को बहुत से ऐसे स्पॉट मिलेंगे जहाँ बर्ड वाचिंग करने के लिए लोग दूर दूर से आते हैं| एकदम ख़ामोशी से बैठ कर घंटों लोग चिड़िया देखते हैं और अपना दिन बिताते हैं| ऐसे ही साइकिल चलाने के लिए घर से कई सौ किलोमीटर दूर अपनी बड़ी सी कार में साइकिल बांध कर लोग वीकेंड में निकल जाते हैं और वहां पर साइकिल चलाते हैं| और एक अपना हिंदुस्तान है जहाँ हर जगह लोग साइकिलिंग करते मिल जायेंगे|
मछली पकड़ना यहाँ के सबसे पसंदीदा टाइम पास में से एक है| पूरा पूरा दिन लोग तालाब, डैम या नदी के किनारे बैठे रहते हैं, कुछ तो प्लास्टिक के पाजामे पहन कर आधा पानी में खड़े रहकर घंटों मछली पकड़ने के लिए खड़े रहते हैं| सबसे आश्चर्य तो मुझे तब हुआ जब एक डैम के किनारे मैंने कुछ लोगों को मछली पकड़ते देखा| कुछ देर बाद उनमे से एक के कांटें में एक बड़ी सी मछली आयी तो मुझे लगा कि चलो उसका भोजन का प्रबंध हो गया| लेकिन तभी मैंने देखा कि उसका एक दोस्त एक वजन करने वाली मशीन लेकर उसके पास गया और दोनों ने मछली का वजन किया| उसके बाद मछली के मुंह में कुछ डालकर उन्होंने वापस पानी में फेंक दिया| मैंने पास जाकर आश्चर्य से पूछा कि आपने मछली को वापस पानी में क्यों डाल दिया, कुछ गड़बड़ थी क्या मछली में तो उन्होंने जवाब दिया कि अरे हम लोग तो सिर्फ मछली पकड़कर देखते हैं कि उसका वजन कितना है और किसने सबसे बड़ी मछली पकड़ी, उसको खाने के लिए थोड़े न पकड़ते हैं| खैर मैंने हिम्मत करके एक बात और पूछ ली कि आप को क्या मिलता है इससे तो उन्होंने बताया कि बहुत अच्छा टाइम पास होता है इसमें| जब मैंने यह पूछा कि आप के कांटे से मछली को घाव भी तो हो जाता है तो उन्होंने बताया कि हम लोग उसके मुंह में कुछ दवा जैसा डाल देते हैं जिससे उसे नुकसान नहीं होता| अब आप ही सोचिये कि पूरा दिन सिर्फ मछली पकड़कर यह देखना कि किसने सबसे बड़ी पकड़ी अपने देश में सनकीपन ही तो कहा जायेगा|
जानवरो के प्रति भी यहाँ बहुत प्रेम है लोगों के मन में (ये अलग बात है कि यहाँ पर हर जानवर को लोग खा भी जाते हैं)| लेकिन साथ ही साथ हर सोसाइटी में यह भी लिखा होता है कि आप यहाँ पर जानवर रख सकते हैं या नहीं| कुत्ते तो खैर हर जगह खुशनसीब होते हैं तो यहाँ भी हैं, उनके घूमने के लिए अलग से पार्क बने हैं जहाँ पर आपको सैकड़ो नस्ल के कुत्ते टहलते हुए दिख जायेंगे| लेकिन कुत्तों को आप हर पार्क या पब्लिक प्लेस में नहीं ले जा सकते| यहाँ बिल्लियां बहुत भाग्यशाली समझी जाती हैं और बहुत से दुकानों में आपको बिल्लियां मिल जाएँगी| लोग कुत्तों के साथ इनको भी पालते हैं और इनकी जिंदगी शायद इंसानों से भी ज्यादा बेहतर होती है|
शिकार के शौक़ीन भी यहाँ खूब हैं और उसके लिए भी लोग छुट्टियों में निकल जाते हैं|  

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