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Friday, December 5, 2014

सपने की मौत--

प्लेटफार्म पर बैठे बैठे पुराना समय चलचित्र की तरह घूम रहा था मनोज के दिमाग में | काश पिता की बात मानी होती तो शायद ये दिन नहीं देखना पड़ता पर नौजवानी में दिल कहाँ दिमाग की सुनता है | उस समय तो जूनून सवार था फिल्मों में हीरो बनने का |
अच्छी शक्लसूरत तो थी ही , साथ में दोस्त भी ऐसे मिले जिन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी उसे चढ़ाने में | " तुम तो पक्का हीरो बनोगे , क्या टैलेंट है तुम्हारे अंदर " और भी जाने क्या क्या | फिर क्या था , माता पिता की बात अनसुनी करते हुए करते हुए एक दिन निकल गया मुंबई के लिए |
लगातार कई महीने धक्के खाए , पास की एक एक पाई जब ख़त्म हो गयी और भूख से पेट की अतड़ियां ऐठने लगीं तो घर वापस जाने के लिए स्टेशन पर आ गया | फिर पिता के कहे शब्द याद आये " कुछ ही दिन में वापस यहीं नज़र आओगे तुम" और उसने प्लेटफार्म पर खड़े यात्री से पूछा " साहब , सामान रखवा दूँ डिब्बे में "|  

Thursday, December 4, 2014

संघर्ष--

कई बार गिना बिल्लू ने , लेकिन कुल ६५ रुपये ही थे उसके पास | बेटे की असमय मौत ने उसे तोड़ दिया था , और एक बार फिर वो वापस प्लेटफार्म पर आ गया था | ढलती उम्र ,पोती के इलाज़ और चार जनों का पेट भरने के लिए पैसे की सख़्त जरुरत थी और बस इतनी सी कमाई , कुछ सोच नहीं पा रहा था वो |
न जाने कितनी देर यूँ ही सर झुकाये बैठा रहा बिल्लू , ट्रेनें गुजरती रहीं पटरियों से और ग़ुम होती रहीं सन्नाटे में |
फिर उसने मन को कड़ा किया और दूसरे प्लेटफार्म की ओर चलने की तैयारी करने लगा | उद्घोषणा जारी थी " यात्रीगण कृपया ध्यान दें , प्लेटफार्म न. ४ पर आने वाली ट्रेन अब प्लेटफार्म न. ६ पर आएगी "|

Wednesday, December 3, 2014

महिला सशक्तिकरण--

" क्या बात है सर , आजकल आप बहुत व्यस्त चल रहे हैं "|
" हाँ , आजकल व्यस्तता बढ़ गयी है , समय नहीं दे पा रहा पूरा , लेकिन फिर भी कुछ कवयित्रियों की रचनाओं पर राय दे ही देता हूँ "|
तभी पीछे से आवाज आई " आजकल ये महिला सशक्तिकरण पर काम कर रहे है "|

Sunday, November 30, 2014

गुनाह--

पुलिस ने उसे गिरफ्तार करके सलाखों के पीछे डाल दिया था | वजह थी किसी ऐसे का क़त्ल जो एक लड़की का अपहरण करके उसे जिस्मफरोशी के दलदल में धकेलने जा रहा था | समाज और मीडिया उस पर थू थू कर रहा था क्योंकि उसका भी जुर्म का इतिहास था | उस लड़की को भी शक़ की निगाह से देखा जा रहा था |
जब अदालत में मामला पहुंचा तो लड़की का बयान था " जज साहब अगर ये आदमी मुजरिम है तो फिर उससे बड़ी मुजरिम मैं हूँ , क्यूंकि मेरी वजह से ही इसने क़त्ल किया | किसी की जान और उसकी इज़्ज़त बचाना गुनाह है इसीलिए ये समाज ऐसा नहीं करता है "| 

अपने--

" पिताजी देखो तो , कितनी बढ़िया गाड़ी ले आया हूँ मैं , आधे दाम में मिल गयी "|
" लेकिन बेटा , अभी तो स्कूटर से काम चल जा रहा था और घर की मरम्मत भी करानी थी , फिर ये कार "?
" क्या पिताजी , आपको तो बस कमियां ही निकालनी होती हैं मुझमे "|
" क्या करूँ , तुम्हारा दुश्मन हूँ न "|

Friday, November 28, 2014

सन्नाटा--

एक बार फिर आवाज आई , लगता था कहीं दूर से आ रही थी | चारो तरफ घटाटोप अँधेरा , उसपर कड़ाके की ठण्ड , हाँथ को हाँथ नहीं सूझ रहा था | हिम्मत करके बिस्तर से उठा और दरवाजे की तरफ बढ़ा | अचानक पैर से ज़मीन पर पड़ा गिलास टकराया और उसके लुढ़कने की आवाज पूरे घर में गूंज गयी | बुरी तरह चौंक गया वो , आजकल हर बात पर जैसे चौंक जाना उसकी आदत में शामिल हो गया था |
उम्र बढ़ने के साथ अब अकेलापन भी बिमारियों में शुमार हो गया है उसके | कभी यही घर कितना भरा रहता था , देर रात तक बच्चों के चिल्लाने की आवाजें , लगता ही नहीं कि कभी सन्नाटा भी था यहाँ | कब बच्चे अपनी दुनियां में खोते और उससे दूर होते चले गए , उसे अहसास ही नहीं हुआ | अब , वो अकेला जिंदगी के अंधेरों से रोशनी का क़तरा ढूँढ रहा था |
कितनी बार वो लड़ पड़ती थी उससे कि मैं जल्दी जाउंगी दुनिया से और तुम बाद में | लेकिन उसने हमेशा यही कहा कि मेरे रहते तुम कैसे जा सकती हो , मैं अकेला नहीं पड़ जाऊंगा | धीरे से बीवी को अपनी आँखों के किनारों को पोंछते देखता था वो , लेकिन अगले ही पल सब भूल जाता था | उसका दिल ये मानने को तैयार ही नहीं था कि कभी ऐसा अकेलापन भी होगा |
कांपते हांथों से उसने दरवाजा खोला , ठण्ड का एक झोंका उसके बदन को चीर गया | बाहर घना अँधेरा था , शायद उसकी जिंदगी से ज्यादा घना | कुत्ता आकर उसके पैरों को छूने लगा | उसने दरवाजे को बंद किया और वापस बिस्तर पर लेट गया , नींद आज फिर उसकी आँखों से कोसों दूर थी | रात फिर सुबह की तरफ ख़रामा ख़रामा बढ़ रही थी |

Tuesday, November 25, 2014

फ़र्क़

" पापा , देखिये कितनी अच्छी ड्रेस लाये हैं हम लोग "|
" अभी पिछले महीने ही तो लिया था तुम लोगों ने , पैसे इस तरह बर्बाद नहीं करते "|
" तुम भी न , उनकी नानी आने वालीं हैं "|

एकलव्य--

' सर , मोहित का सेलेक्शन हो गया सिविल सर्विसेज में , आपको तो फोन किया ही होगा | सब आप के ही गाइडेंस का नतीजा है "|
" एक्सीलेंट , ऐसे ही आगे बढ़ते रहो तुम सब ", कहकर सर ने फोन काट दिया |
अगले दिन के अखबार में उसका साक्षात्कार छपा था , सर का नाम उसमे भी नहीं था |

फिक्र--

" सुनो , वो फ्लैट के लिए जो डिपाजिट भरना था , भर दिया कि नहीं " |
" हाँ , भर दिया है , दाम बहुत बढ़ रहे हैं आजकल फ्लैटों के "|
" चलो , अब दूसरे बेटे के नाम पर भी फ्लैट हो जायेगा "|
" और हाँ पापा की पेंसन के पैसे निकाले , उनकी तबियत का भरोसा नहीं है "|

Saturday, November 15, 2014

बाल दिवस पर--

क्यों हो गए हम इतने बड़े , 
क्यों भूल गए हम वो छोटी छोटी शैतानियाँ ,
क्यों नहीं सुनाता अब कोई परियों की कहानियां ,
आज फिर दिल मचल रहा है ,
कि खेलें आइस पाईस ,
खेलें बम तड़ी , नचाएँ अपने हाथों पर लट्टू ,
काश आ जाएँ वो दिन फिर से वापस ,
बन जाएँ फिर से हम बच्चे ,
खेल खेल में खूब लड़ें ,
क्यों हो गए हम इतने बड़े !!

देहरी--

देहरी को लांघते हुए उसके पैर काँप रहे थे , क्या वो सचमुच ये कदम उठा पायेगी | 
घुंघरुओं की आवाज उसे किसी और दुनिया में ले जाती थी | उसका एक ही सपना था कि वो नृत्य की दुनिया में नाम करे ,पर कितना मुश्किल था अपने रूढ़िवादी परिवार को समझाना | ये बताना कि नृत्य भी एक कला है , एक साधना है , इबादत है | 
उस छोटे से कसबे में गुरु को ढूँढना भी एक दुरूह कार्य था , लेकिन इरादे अटल हों तो सब मुमकिन है | फिर शुरू हुई साधना , घंटों का रियाज़ और मंजिल पाने का अथक प्रयास | 
और आखिरकार वो दिन भी आ गया जब उसने पैरों में घुंघरू बांध कर , पारम्परिक वेश भूषा में अपना पहला कार्यक्रम देने के लिए देहरी को लांघा | उसे गुरु के कहे शब्द " अपने आगे बढ़ाये कदम कभी पीछे मत खींचना " याद थे | बजती हुई तालियों की गड़गड़ाहट ने वापसी में उसके क़दमों को आत्मविश्वास से भर दिया था |

Tuesday, November 11, 2014

ठूँठ--

"अरे वो पेड़ कहा गया , गिर गया क्या ?"
"नहीं चाची , ठूँठ था तो काट दिया लोगों ने "|
बेऔलाद चाची को कुछ चुभा और वो तेजी से आगे बढ़ गयीं |

गहना--

" कबसे कह रही हूँ , बच्चों की फीस भरनी है और आप कान ही नहीं देते हो उसपर" |
" जल्दी ही कुछ इंतज़ाम करता हूँ , तुम चिंता मत करो "| कहने को तो कह दिया उसने लेकिन क्या करे , सब तरफ से कोशिश कर चुका था | इसी उधेड़बुन में वो घर से निकल पड़ा |
रात को वापस आया तो उसका चेहरा चुगली कर रहा था , और पत्नी ने भी कुछ नहीं पूछा |
सुबह जब उसने प्रश्नवाचक निगाह से पत्नी की अंगुली की तरफ देखा , तो पत्नी बोली " शिक्षा से बड़ा गहना और क्या हो सकता है , फिर बन जायेगा ये "|

वापसी----

" कब तक ऐसे बैठे रहेंगे आप , चलिए शाम हो गयी , अब नहीं आएगा वो " , लेकिन उनको सुनाई नहीं दिया कुछ | अब तो ये रोज़ की बात हो गयी थी , सुबह किसी तरह दो कौर मुंह में डाल लेना और फिर बस स्टैंड पर आकर बैठ जाना |
ऐसा क्या कह दिया था उन्होंने उस दिन , बस यही तो कहा था कि अब अपने खाने कमाने का इंतज़ाम करे | आखिर उम्र हो चली थी उनकी , और कौन बाप नहीं चाहता कि उसकी औलाद उसके हाँथ पांव चलने तक अपने काम धंधे से लग जाए |
महीनो बीत गए , लेकिन न तो वो आया , न उसकी कोई खबर | रोज़ का इंतज़ार , आज कुछ पता चले , लेकिन अब उन्हें ये लगने लगा था कि शायद वक़्त उनसे रूठ गया था |
उधर बेटा अलग परेशान था , क्या मुंह लेकर जाए वापस | चल तो दिया था आवेश में आकर , ये सोचकर कि कुछ बनकर ही लौटूंगा और कहूँगा " देख बापू , मैं कमाने खाने लगा हूँ , तू क्या सोचता था कि मैं निठल्ला ही रहूँगा "| लेकिन क्या कर पाया था वो यहाँ |
लेकिन आज की घटना ने उसे विचलित कर दिया | उसके पड़ोस में रहने वाले दम्पति , जिनके बच्चे विदेश में थे , ने ख़ुदकुशी कर ली थी | कहने को तो सब कुछ था , पर नहीं था तो बच्चों का साथ , अपनों का प्यार |
पूरी रात यही सब चलता रहा उसके दिमाग में , क्या करे , कहीं उसके माँ बापू भी ? इसके आगे नहीं सोच पाया वो , कुछ भी छोटा मोटा काम करेगा लेकिन माँ बापू को अकेला नहीं छोड़ेगा | और अगले दिन बस स्टैंड पर उसके बापू ने उसे अपने सीने से लगाया हुआ था | आंसुओं की बहती धार ने उनके बीच सब कुछ साफ़ कर दिया था |

Wednesday, October 22, 2014

सर्वव्यापी--

" त्योहारों के मौसम में इनकी बिक्री बहुत बढ़ गयी है " , मुस्कुराते दुकानदारों की बातचीत सुनते हुए उसने देखा , फुटपाथ पर बिछे हुए तमाम देवी देवताओं के चित्र इसकी गवाही दे रहे थे |
" भगवान हर जगह होते हैं , उन्हें खोजने की जरुरत नहीं " , मंदिर में सुना ये प्रवचन उसे याद आ गया |    

उजियारा --

चारो ओर पटाखों का शोर गूंज रहा था , पूरा गाँव रौशनी से चमक रहा था | लेकिन रघु के कदम तो जैसे जम गए थे , उठते ही नहीं थे | क्या सोच कर चला था , लेकिन अब क्या मुंह लेकर घर जाए |
घर में मेहरारू और बिटिया उसकी राह देख रहे होंगे | दीवाली का मौका , पास में कुछ पैसे होते तो वो भी कुछ पटाखे और नए कपड़े ले लेता उनके लिए | लेकिन महाजन ने भी मना कर दिया | घर से थोड़ा पहले एक पेड़ के नीचे बैठ गया वो , हिम्मत जवाब दे गयी उसकी |
" बापू , यहाँ काहे बैठे हो , घर चलो , हम लोग कब से तुम्हरी राह देख रहे हैं ", बिटिया की आवाज सुन वो चौंक उठा |
" माफ़ कर दे बिटिया , कुछ ला नहीं पाये तुम्हरे लिए ", उसका गला भर्रा गया |
" घर तो चलो बापू " और उसका हाँथ खींच कर बिटिया उसे ले गयी |
" माँ , माँ , बापू आ गए ", बिटिया ने हुलस कर माँ को आवाज लगायी |
" अरे तुम्हीं से हम लोगन का होली दीवाली है , कुछ ला नहीं पाये तो का हुआ , तुम तो हो ना , फिर मन जाई दीवाली " |
मेहरारू समझा रही थी , घर के बाहर और अंदर कुछ दिए झिलमिला रहे थे और उजियारा धीरे धीरे उसके मन के अंधियारे को मिटा रहा था |

Sunday, October 19, 2014

फ़र्ज़--

डॉक्टर के पेशानी पर ठण्ड में भी पसीने की बुँदे चुहचुहाँ रहीं थी | सामने पड़ा हुआ शख्स कोई मामूली शख्स नहीं था | एक तरफ इंसानियत और पेशे का फ़र्ज़ तो दूसरी तरफ देश और समाज का |
मरीज़ का चेहरा देखते ही वो उसे पहचान गए थे | एक बार उनका हाथ अपने सेल फोन पर गया लेकिन फिर उसे वापस रख दिया | क्या करें , इसी उधेड़बुन में ऑपरेशन टेबल पर पहुँच गए | 
करीब एक घंटे बाद बाहर निकले तो उनके जेहन में अपने पेशे में बताई गयी पहली सीख घूम रही थी " डॉक्टर का पहला फ़र्ज़ होता है जान बचाना " |

Saturday, October 18, 2014

दिए--

किसी के आस के दिए ,
किसी के एहसास के दिए ,
सोचा था इस बार जलाएंगे ,
लेकिन वक़्त की तल्खी ने ,
बुझा दिए , सारे ज़ज्बात के दिए ,
काश कि हम सचमुच जला पाते ,
रौशनी सब ओर फैला पाते ,
किसी भी तूफ़ान में बुझे नहीं ,
ऐसे दिए हम ला पाते ,
लेकिन कभी जरूर जलाएंगे हम ,
खुशियों और उम्मीदों की सौगात के दिए !!

प्रगति--

हर साल की तरह इस साल भी दिवाली पर बूढी अम्मा दिए लेकर सड़क के किनारे बैठ गयी | 
पर इस साल उनका एक भी दिया नही बिका | 
वो मायूस होकर बोली " अगले साल से हम दिया नाही बेचब , अब जमाना बदल गइल हौ , लोगन के पास इतना समय नाही हौ ई दिया के जलावे खातिर "
अंजू सिंह..

जीवन--

कई सालों से वो बूढी औरत फुटपाथ पर दिए बेच रही थी |
आज पूछ ही लिया " दिए कब तक बेचती रहोगी दादी " |
" जब तक लौ बची है बेटा " |

Thursday, October 16, 2014

नमस्कार " नया लेखन - नए दस्तखत "के मित्रो--

नमस्कार " नया लेखन - नए दस्तखत "के मित्रो | जैसा कि आपको बताया जा चूका हैं इस मंच के पटल पर प्रत्येक सप्ताह एक तस्वीर दी जायेगी और उस तस्वीर को देखकर सभी एक लघु कथा लिखेंगे . यह एक सामान्य सी प्रतियोगिता होगी जिसमें सभी सदस्य भाग ले सकते हैं सिवाय एडमिन/ जज और फोटो प्रस्तुत करने वाले सदस्य के ,
इस प्रतियोगिता के नियम इस प्रकार होंगे
1 सिर्फ एक लघु कथा ही पोस्ट की जानी चाहिए
2.दिए गयी समय सीमा से पहले या पश्चात पोस्ट की गयी लघु कथा मान्य नही होगी 
3 . बेस्ट लघु कथा का चयन एडमिन /मनोनीत जज और फोटो देने वाला सदस्य करेगा और अंतिम निर्णय ही मान्य होगा
4.जो विजेता घोषित होगा उसको अगले सप्ताह फोटो पोस्ट करने का अधिकार प्रदान किया जाएगा
5. जब ब्लॉग बनाया जायेगा तो पुरुस्कृत लघु कथाओं को सर्वश्रेष्ठ लघु कथा के नाम से पोस्ट किया जाएगा
6 . आपकी लघु कथा का मूल भाव आप से पहले पोस्ट लघु कथाओं के समान नही होना चाहिए
7 . समय- आज रात 8 बजे से शनिवार रात 11 बजे तक लघु कथा पोस्ट की जा सकती हैं
8. इस प्रतियोगिता का उद्देश्य मनोरंजन के साथ साथ लेखन सीखने को प्रेरित करना हैं एक चित्र पर सबके विभिन्न भाव एक उत्सुकता जगाते हैं इसे सकारात्मक रूप से ग्रहण कीजिये
9. आलोचना नही समालोचना कीजिये सिर्फ लाइक नही करिए उचित मार्गदर्शन की दरकार सबको रहती हैं दूसरों के सुझावों को सकारात्मक रूप से ले नकारात्मकता से नही
१०. पुराने मित्र गणों से आग्रह हैं की लघु कथा लिखते रहे नए कहानीकारों से आग्रह हैं की आपकी लघु कथाओं का इस ग्रुप को इंतज़ार हैं आपकी लघु कथाएं आपकी सोच की परिपक्वता को दर्शाती हैं .
११ .लघु कथा के साथ चित्र पोस्ट करे तो अच्छा होगा .परन्तु लघु कथा के उपर ' प्रतियोगिता के लिय " लिखना अनिवार्य हैं .देखा गया हैं सब लघु कथा पोस्ट कर देते हैं परन्तु प्रतियोगिता के लिय लिखना भूल जाते हैं कृपया ध्यान दे इस तरफ भी ...
इस बार चित्र दिया हैं अर्चना तिवारी जी ने और जज होंगे श्री योगराज प्रभाकर जी , विवेक झा जी ,    जी एवम विनय कुमार..

Wednesday, October 15, 2014

संवेदना--

दीवाली एक ऐसा त्यौहार है जिसका जिक्र आते ही बच्चे तो बच्चे , बड़े भी उतने ही उत्साहित हो जाते हैं | घरों की सफाई , रंग रोगन , नए कपड़े , मिठाईयां और रौशनी , सब कुछ तो जुड़ा है इसके साथ | महीनों पहले से तैयारी शुरू हो जाती है और सब तरफ उत्सव का माहौल नज़र आता है | इस घर में भी कुछ ऐसा ही माहौल था , सबसे ज्यादा खुश था मोनू , उम्र सिर्फ ९ साल लेकिन उत्साह में किसी से कम नहीं |
आख़िरकार दीवाली का दिन भी आ गया | मोनू नए कपड़े पहन कर बहुत खुश था , पूरा दिन सजावट करने में लगा रहा और शाम को घूमने जाने का प्रोग्राम भी पहले से तंय था | शाम होते होते घर जगमगाने लगा , चारो तरफ झालर , दिए और मोमबत्ती की रौशनी झिलमिला रही थी | मोनू अब बाहर जाने के लिए मचलने लगा और आखिर सब लोग तैयार हो गए शहर की सजावट और रौशनी देखने के लिए |
सब लोग कार में सवार हुए और चल पड़े रोशनियों से आँख मिचौली खेलने | मोनू बहुत प्रसन्न था , इतनी सारी रौशनी देख रहा था और उसकी ख़ुशी में सभी शरीक थे | कुछ देर घूमने के बाद एक दुकान पर कार रुकी और सब लोग उतरे | मिठाई और चाट की दुकान थी और सारे अपनी पसंद के हिसाब से ले कर खाने लगे | मोनू ने भी चाट लिया और खाने लगा | अचानक उसकी निगाह दूर के एक लड़के पर पड़ी जो नीचे गिरे दोनों में से खाने के लिए कुछ ढूँढ रहा था | मोनू के हाँथ रुक गए , अब वो खा नहीं पा रहा था | उसकी निगाहें आश्चर्य से उस लड़के को ही देख रहीं थी , वो समझ नहीं पा रहा था कि ये बच्चा आखिर नीचे गिरे हुए में से क्यों खा रहा है | संभवतः आज तक उसने कभी ऐसा दृस्य नहीं देखा था | थोड़ी देर बाद सब लोग वापस कार में सवार हो गए और पूरा शहर घूम कर वापस घर पहुंचे | लेकिन अब मोनू के चेहरे से वो ख़ुशी काफूर हो चुकी थी |
घर पहुँच कर मोनू गुमसुम था , लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया | सबको लगा कि शायद थका है इसलिए ऐसा लग रहा है | लेकिन जब वो देर तक गुमसुम रहा तो श्याम को लगा कि जरूर कोई बात है | श्याम ने जब पूछा तो पहले तो उसने जवाब नहीं दिया , लेकिन बार बार पूछने पर भरी आँखों से बोल पड़ा " वो बच्चा नीचे का गिरा हुआ क्यों खा रहा था , क्या उसके घर पर कोई नहीं था जो उसे खिला पिला सके , उसे घुमा सके , नए कपड़े दिला सके " | उसके सवाल ने श्याम को हतप्रभ कर दिया , इतनी कम उम्र में इतनी गंभीर सोच | देखा तो उसने भी था उस बच्चे को , लेकिन उसे क्यों नहीं चुभा ये , वो ख्याल उसके मन में क्यों नहीं आया | वो सोचने लगा कि हम लोग इन सब चीजों के प्रति संवेदनहीन हो गए हैं , अब कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता हमें |
खैर , श्याम ने उसे समझा बुझा कर शांत किया , लेकिन उसका मन अशांत था | आज मोनू ने उसकी आँखें खोल दी थी , जो वो महसूस कर रहा था , अब कुछ कुछ वो भी महसूस कर रहा था |
अगले दिन रविवार था , श्याम ने मन ही मन निश्चय कर लिया था कि वो फिर उसे लेकर उसी दुकान पर जायेगा | शाम को उसने मोनू से कहा कि चलो घूम कर आते है तो वो तैयार हो गया | जैसे ही वो लोग उसी दुकान पर पहुंचे , मोनू की निगाह उस बच्चे को ढूंढने लगीं | श्याम ने भी निगाह दौड़ाई और थोड़ी दूर पर वो बच्चा दिख ही गया |
श्याम कार की तरफ बढ़ा और उसने नए कपड़े का पैकेट और मिठाई का डब्बा निकाला और मोनू को पकड़ा दिया | मोनू ने एक बार उसकी तरफ देखा और फिर वो दौड़ कर उस बच्चे के पास पहुँच गया | मोनू ने जब उसे डब्बे पकड़ाए तो एकबारगी वो बच्चा भी हैरान रह गया | उसे तो लोगों के दुत्कार की ही आदत थी , उसे भी कोई कुछ दे सकता है , ये उसकी कल्पना से परे था | कुछ देर तक तो वो डब्बे को हाथ में लेकर खड़ा रहा और फिर उसकी आँखें ख़ुशी से चमकने लगीं | उसने एक बार मोनू की ओर देखा और डब्बे लेकर अपने घर की ओर दौड़ पड़ा | मोनू उसी तरफ टकटकी लगाये देखता रहा , जब तक वो आँखों से ओझल नहीं हो गया |
पर अब मोनू के चेहरे पर जो ख़ुशी नज़र आ रही थी , वो शायद श्याम को कभी नहीं दिखी थी | लेकिन अब श्याम को यक़ीन हो गया था कि आगे चलकर मोनू कम से कम एक बेहतर और संवेदनशील इंसान तो जरूर बनेगा |

Tuesday, October 14, 2014

रक्तदान शिविर --

बात काफी वर्ष पहले की है , तब मैं मुग़लसराय में था | काफी भीड़भाड़ वाली शाखा थी और काम भी बहुत हुआ करता था | लेकिन इन सब के बावजूद हम लोग कुछ न कुछ कार्यक्रम करते ही रहते थे | शायद हमारी उस इलाके की इकलौती बैंक शाखा थी जो सामाजिक कार्यक्रमों में भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती थी |
हमारे बैंक की स्थापना के सौ वर्ष पूर्ण हो रहे थे और इस उपलक्ष्य में समस्त आंचलिक कार्यालयों को निर्देश दिए गए थे कि इस पूरे वर्ष कोई न कोई सामाजिक कार्यक्रम करने हैं | हमारा आंचलिक कार्यालय बनारस था और बनारस और आसपास के सभी शाखा प्रबंधकों को वर्ष भर चलने वाले कार्यक्रमों के बारे में निर्णय करने के लिए आंचलिक कार्यालय बुलाया गया | उस मीटिंग में ये निर्णय लिया गया कि इस १०० वर्ष के कार्यक्रमों की शुरुआत रक्तदान शिविर के आयोजन से की जाये | बनारस शहर में स्थित सबसे बड़े सरकारी अस्पताल के सामने स्थित शाखा को ये निर्देश दिया गया कि वो इस आयोजन को करे | बाक़ी भी तमाम आयोजनों की रुपरेखा बना ली गयी और हर २ महीने पर मीटिंग करते रहने की बात तंय हुई |
अगले दिन जब मैं शाखा में गया तो कहीं न कहीं मेरे मन में ये बात चल रही थी कि हमें भी रक्तदान शिविर का आयोजन अपनी शाखा में करना चाहिए | फिर शाम को मैंने समस्त स्टाफ की बैठक की और अपना विचार सबके सामने रखा | उम्मीद के विपरीत समस्त स्टाफ ने एक स्वर में कहा कि हम लोग जरूर करेंगे और फिर उसी समय ये शिविर कब और कैसे करना है के बारे में निर्णय ले लिया गया | अगले दिन हम लोगों ने जगह का चुनाव करना प्रारम्भ किया और एक मैरिज हाल , जहाँ जगह पर्याप्त थी, को बुक कर दिया गया | शाम को फिर एक बैठक हुई और उस बैठक के दौरान ही हमारे शाखा के एक प्रतिष्ठित ग्राहक शखा में आये | उन्होंने पूछ लिया कि किस चीज की बैठक है तो हम लोगों ने रक्तदान शिविर के आयोजन के बारे में उनको बताया | ये सुनते ही उन्होंने कहा कि अगर आप लोग ऐसा करने का सोच रहे हैं तो हमारी भागीदारी जरूर रहेगी |
अगले दिन एक और सुखद आश्चर्य सामने था , उनके साथ करीब ६ और प्रतिष्ठित ग्राहक आये और उन्होंने कहा कि आप पूरे कार्यक्रम का विवरण दीजिये | अब उन सब लोगों ने एक एक चीज की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली , किसी ने मैरिज हॉल का किराया वहां किया , किसी ने कहा कि उस दिन का खान पान हमारी ओर से रहेगा , किसी ने गाड़ियों की जिम्मेदारी ली तो किसी ने टेंट के सारे सामान का खर्च वहन करने का जिम्मा लिया | कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में मैंने पद्मश्री मोहम्मद शाहिद से बात की और वो सहर्ष तैयार हो गए | इतना ही नहीं उन्होंने हॉकी के दो और ओलम्पिक खिलाडियों को भी बोल दिया आने के लिए |
हमने अपने आंचलिक कार्यालय को ये बात बताई नहीं थी कि हम लोग भी ये कार्यक्रम करने जा रहे हैं और पूरी तैयारी चलती रही | लोगों का उत्साह देखते बन रहा था , कई लोगों ने आकर शिकायत भी की , कि उन्हें नहीं शामिल किया गया | खैर सब कुछ बिलकुल ठीक तरीके से चल रहा था कि एक दिन आंचलिक कार्यालय से तत्काल मीटिंग के लिए फोन आया | मीटिंग में पहुँचने पर पता चला कि जिस शाखा को रक्तदान शिविर का आयोजन करना था वो उसे कर पाने में असमर्थता व्यक्त कर रही थी | सब चिंतित थे कि अब क्या होगा क्योंकि सिफ १० दिन ही बचे थे | अब मैंने अपने शाखा के कार्यक्रम के बारे में बता देना ही उचित समझा | अब सबका चेहरा खिल गया था , तुरंत पूछा गया कि कितना खर्च होगा और कितने रुपयों की जरुरत है | जब मैंने ये बताया कि हम लोग बहुत ही कम खर्च कर रहें हैं क्योंकि सारा खर्च तो शाखा के ग्राहक ही उठा रहे हैं तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा |
अब तक सारे क्षेत्र में इस कार्यक्रम का भरपूर प्रचार हो चुका था , हर आदमी इससे किसी न किसी रूप में जुड़ना चाहता था | रक्त लेने के लिए जो संस्था आने वाली थी उसने हमसे पूछा कि कितने यूनिट रक्त मिल सकेगा | हम लोगों ने बताया कि कम से कम १०० यूनिट तो मिलेगा ही लेकिन उनको शायद अपने पूर्व अनुभवों के चलते इसपर भरोसा नहीं हुआ |
खैर कार्यक्रम का दिन आ गया , एक टीम बनारस जाकर मुख्य अतिथि और उनके साथियों को लेकर आई | सभी अतिथियों के लिए शाल और नटराज की मूर्ति भेंट स्वरुप मंगाई गयी थी | नियत समय पर कार्यक्रम शुरू हुआ और कार्यक्रम स्थल खचाखच भरा हुआ था | सबसे पहले मैंने ही रक्तदान की इच्छा जाहिर की थी लेकिन उससे पहले ही तमाम लोगों में होड़ लग गयी थी रक्त देने के लिए | जब तक मैं पहुंचु , लगभग ५० लोग रक्त दे चुके थे और मेरे बाद भी काफी लम्बी कतार थी | रक्त लेने वाली संस्था ने सिर्फ ६० यूनिट के लिए ही व्यवस्था की थी जिसके चलते तमाम लोग रक्त देने से वंचित रह गए | आंचलिक कार्यालय से आये हुए लोग दंग थे कि ऐसा आयोजन भी हो सकता है | मुख्य अतिथि भी भावुक हो गए और बोले कि मैं कई कार्यक्रमों में जाता हूँ लेकिन ऐसा कार्यक्रम मैंने आज तक नहीं देखा था जहाँ हर आदमी दिल से जुड़ा हो | मीडिया के लोग भी थे और अगले दिन तमाम समाचार पत्रों में इस कार्यक्रम की खबर प्रमुखता से छपी थी | मैंने जब स्थानीय लोगों को धन्यवाद देना चाहा तो उन्होंने ये कह कर मेरा मुह बंद करा दिया कि आप लोग अगर बैंकर होकर समाज के लिए इतना सोच सकते हैं तो क्या ये हमारी जिम्मेदारी नहीं बनती कि हम लोग इसमें बढ़ चढ़ कर हिस्सा लें | एक ऐसे वर्ष की शुरुआत हो चुकी थी जिस वर्ष में हम लोगों ने न सिर्फ तमाम सामाजिक कार्यक्रम किये , बल्कि आतंकवाद के खिलाफ एक सर्व धर्म की गोष्ठी भी आयोजित की, जिसके बारे में विस्तार से फिर कभी | 

Monday, October 13, 2014

होनी--

अभी हांथों की मेहँदी भी नहीं सूखी थी और ये हादसा |
" भगवान को यही मंजूर था " , लोग दिलासा दे रहे थे |
" लेकिन जिस भगवान को ये मंजूर था वो भगवान हमें मंजूर नहीं "|  
ये चेहरे भी क्या क्या सितम ढाते हैं ,
खुद को तो दिखते नहीं , औरों को क्यूँ भाते हैं !! 
चलते रहे सफ़र में , कभी सोचा ही नहीं ,
पहुचेंगे गर मुक़ाम पे तो हासिल क्या होगा !!

ख़ुशी--

जन्मदिन मनाकर सब होटल से बाहर निकले | बच्चा बहुत खुश था , नए नए कपडे , ढेरों तोहफे और खूब सारी मस्ती | सब बाहर खड़ी गाड़ियों में बैठने लगे तभी बच्चे की नज़र गयी कोने में खड़े एक और बच्चे पर | तन पर नाम मात्र के कपड़े और नज़रें उस पर |
अचानक बच्चा मुड़ा और कोने वाले बच्चे की ओर बढ़ा | पास पहुँच कर उसने अपने हाथ में लिए तोहफे को उसको पकड़ा दिया और वापस आने लगा |
अब बच्चा पहले से कहीं ज्यादा खुश था |

Saturday, October 11, 2014

नया लेखन - नए दस्तखत के मित्रों

नया लेखन - नए दस्तखत के मित्रों , इंतज़ार की घड़ियाँ समाप्त हुयी | इस सप्ताह पिछले बार के विजेता अर्चना तिवारी जी ने चित्र दिया था | इस बार का चित्र एक अलग थीम पर था , आधुनिकता और विकास का प्रतीक एक मॉल का चित्र था | बड़ी प्यारी प्यारी कहानियां आयीं इस बार | मज़ा आ गया , एक ही चित्र पर इतने लोगों की अलग अलग कल्पनायें , बड़ा शानदार अनुभव रहा | सबको बधाईयां और धन्यवाद सहभागिता के लिए | उम्मीद करतें हैं की आगे भी इसी तरह से सहभागी बनते रहेंगे आप सब | नए लोगों का दस्तक देना और उनका लेखन वाक़ई काबिलेतारीफ है |
इस बार भी विजेता कहानी का चयन बहुत कठिन रहा , क्योंकि अधिकांश कहानियां बहुत उम्दा थीं लेकिन इस बार जिस कहानी को अर्चना तिवारी जी , योगराज प्रभाकर जी और विनय कुमार ने सबसे अच्छा पाया वो कहानी  जी की है | बहुत बेहतरीन कहानी लिखी हैं इन्होने | एक परिवार के माध्यम से इन्होने न सिर्फ गांव के हाट / बाजार और आधुनिक मॉल की बहुत अच्छी तुलना की और इस अंधाधुंध उपभोक्तावाद और चमक दमक पर एक प्रश्नचिन्ह भी लगा दिया | बहुत बहुत बधाई संध्या तिवारी जी | इस सप्ताह कुछ और कहानियां भी बहुत ही उम्दा थीं ।
और अब अगले सप्ताह कहानी का चित्र संध्या तिवारी जी प्रस्तुत करेंगी .
शुक्रिया अर्चना तिवारी जी , योगराज प्रभाकर जी और नीलिमा शर्माजी..
संध्या तिवारी जी की कहानी --

Thursday, October 9, 2014

विकास--

रमुआ सब तरफ चकर पकर देख रहा था , खूब बिजली बत्ती चमक रही थी , उसकी आँख चौंधिया जा रही थी | 
" बाबू , बड़ा सुन्दर जगह है ई तो , एतना नीक नीक दुकान है , केतना साफ़ हौ इ जगह , हमरा गांव कब अइसन होइ "|
" बचवा , ई माल के चमक क कीमत त केहु के चुकावे के पड़ी न " |

हवाएँ--

हम तो समझे थे ,
हवाएँ खामोश नहीं होतीं ,
लेकिन इन सन्नाटों को देखकर ,
अब महसूस होने लगा है कि ,
वक़्त बेवक़्त चलने वालीं हवाएँ ,
कभी कभी ख़ामोशी की शक्ल में ,
आने वाले तूफान की आहट दे देती हैं !!

Wednesday, October 8, 2014

कुत्ता--

" फिर मत आना घर पर , जब देखो तब चले आते हैं " |
अब क्या करे , दफ्तर में तो साहब से बात कर ही नहीं सकते , कैसे करे बच्चे का इलाज़ ?
गेट से बाहर निकला तो नज़र पड़ी , वहाँ तख्ती लटक रही थी " कुत्तों से सावधान " | 

कुत्ते--

" दुर , दुर , भाग यहाँ से ", और उसने खींच कर एक डंडा मारा कुत्ते को |
कुत्ता कांय कांय करता भागा और दूर खड़े अपने गिरोह के बाकी कुत्तों में शामिल हो गया |
उसकी इस हरक़त पे पता नहीं क्या सोच रहे थे वो सारे कुत्ते ??
प्रवचन बढ़िया था , काफी लोग इकट्ठा हुए थे | समस्त जीवों से प्यार करने की बातें हुई और लोगों ने खूब सराहा |
समापन के बाद भोजन का भी अच्छा प्रबंध था | खूब छक कर भोजन किया सबने और बर्बाद भी उतना ही किया |
पकवानों की गंध से खिंचे हुए तमाम कुत्ते भी आस पास मंडराने लगे |
लेकिन जब कुत्तों का ये खलल नाकाबिले बर्दास्त हो गया तो उसने खींच कर एक डंडा मारा कुत्ते को |
कुत्ता भागा और दूर खड़े बाकी कुत्तों में शामिल हो गया | बाक़ी कुत्ते सोच में पड़ गए थे !!

Tuesday, October 7, 2014

मौसम--

तुम तो जुदा हो गए थे ,
मौसमों की तरह ,
मैं ही भूल नहीं पाया तुम्हे ,
सावन , पतझड़ की तरह ,
लेकिन फिर से नईं कोंपलें निकल रहीं हैं ,
मन का कोना फिर हरा सा हो रहा है ,
काश सूरज न डूबे फिर कभी ,
काश चांदनी रहे हमेशा कायम ,
अब शायद सह न पाऊँ फिर से ,
बदलते हुए मौसमों की दस्तक़ !!

Monday, October 6, 2014

बर्तन--

" बड़ी अच्छी खुशबू आ रही है चच्चा , क्या पक रहा है " |
" कुछ नहीं , गोश्त पक रहा है | आज बकरीद है न , कोई दे गया था " |
 दलान में किनारे अलग रखे हुए कुछ बर्तन आज मुस्कुरा रहे थे |

कुर्बानी--

"क्या बात है, आपने कुर्बानी क्यों नहीं दी इस बार ? " 
"दरअसल क़ुरआन मजीद फिर से पढ़ ली थी मैंने |"

Friday, October 3, 2014

प्रार्थना--

आज की प्रार्थना में शामिल सभी वर्ग के बच्चों के लबों पर एक ही प्रार्थना थी " हमें सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने की शक्ति देना बापू " | 
बापू के चेहरे पर असीम शांति झलकने लगी | उन्हें यक़ीन हो गया था कि ये बच्चे ही उनके सपनों का भारत बनाएंगे और अब समाज की बागडोर सही हाथों में है |

Thursday, October 2, 2014

झाड़ू--

" अम्बे है मेरी माँ , दुर्गे है मेरी माँ " गुनगुनाते हुए बटोही गली में झाड़ू लगा रहा था | अचानक सामने से एक भीड़ आई और वो किनारे हट गया |
" अरे मिल गया रे झाड़ू " चिल्लाते हुए लोगों का हुजूम , जिसमे कुछ खद्दरधारी भी थे , बटोही की ओर बढ़ा | जब तक वो कुछ समझे , झाड़ू छीन लिया गया था और फिर भीड़ ने बारी बारी से झाड़ू लगाते हुए फोटो खिंचाई | इसी छीना छपटी में बेचारे बटोही का झाड़ू भी टूट गया |
" सर , मेरी फोटो देखी आपने , आजके सांध्यकालीन अखबार में छपी है " , बताते हुए नेताजी बहुत प्रसन्न थे | उधर बटोही नगर निगम में झाड़ू टूट जाने की वजह से झाड़ खा रहा था और गांधीजी की प्रतिमा खामोश थी |

Wednesday, October 1, 2014

ऊँट की सवारी--

ऊँट को राजस्थान का जहाज कहा जाता है लेकिन हमारी यादें इससे किसी और रूप में जुड़ी हुई हैं | गर्मियों की छुट्टियाँ तो हर साल गाँव में ही बीतती थीं | बिजली तो थी ही नहीं सड़कों का भी बुरा हाल था | अव्वल तो सड़कें थी हीं नहीं और थीं भी तो कच्ची और टूटी फूटी | यातायात के साधन बहुत सीमित थे , इक्का दुक्का बसें चलती थीं | अधिकतर हम लोग पैदल , साइकिल या बैलगाड़ी की सवारी करते थे | एक और वाहन हुआ करता था जिसे सगड़ी कहते थे | ये एक तीन पहिया वाहन होता था जिस पर बड़े बुजुर्ग सवारी करते थे |
हमारे घरों में दुधारू पशु खूब होते थे और उनको चराने ले जाना अपने आप में बड़ा रोमांचक अनुभव हुआ करता था | पता नहीं कितने लोगों ने भैंस की सवारी की है , लेकिन बहुत मजा आता था | खेतों में चरी और बरसीम उगाई जाती थी ताकि पशुओं को हरा चारा मिल सके | लेकिन एक और बहुत आवश्यक चीज होती थी पशुओं के लिए " खली " , जो उनको खिलाई जाती थी ताकि वे खूब दूध दें | ये खली अक्सर शहर से आती थी और इसको लाने का वाहन था ऊँट | लगभग हर हफ्ते ऊँट हमारे घर आया करता था और जितने देर वो रहता था , हमारी उत्सुकता बनी रहती थी | हम लोग उसी के चारो ओर घूमते रहते थे क्योंकि उसका उठना और बैठना जितना दिलचस्प होता था उतना ही मजेदार होता था उसको चलते देखना |
कई बार इच्छा होती की हम भी ऊँटवान की तरह उसकी सवारी करें लेकिन  हिम्मत नहीं पड़ती थी | आखिरकार हिम्मत जुटाकर एक बार उसपर सवारी करने की इच्छा जताई | ऊँटवान ने कहा की ठीक है चलो घुमा देतें हैं | उसने ऊँट के ऊपर बैठा दिया और कहा कि कस कर पकड़ लो क्योंकि ऊँट बहुत हिलता है | खैर खूब कस कर पकड़ कर बैठे थे हम , ऊँट ने पहले एक पैर उठाया , हमें लगा की अब गिरे , तब गिरे , फिर उसने दूसरा पैर भी उठाया तो लगा की पीछे की तरफ लुढ़के , फिर उसने बाकी दोनों पैर भी उठाये और खड़ा हो गया | बस इतने में ही हालत ख़राब हो गयी थी और जब उसने चलना शुरू किया तो लगा कि पूरी दुनिया घूम रही है | थोड़ी देर बाद हम उतर गए लेकिन सर घूमता रहा | उसके बाद आगे भी वो ऊँटवाला आता रहा और हम लोग उसको देख कर रोमांचित होते रहे | 

बापू को याद करते हुए--

इस देश में गांधीजी से जुड़े सभी स्थलों को देखने की इच्छा है और कभी किताबों में पढ़ा हुआ " फीनिक्स आश्रम " , जिसको महात्मा गांधी ने १९०४ में स्थापित किया था , को भी देखने की तमन्ना थी | यह आश्रम सन १९८५ के दंगो में क्षतिग्रस्त हो गया था और इसका नाम बम्बई रख दिया था | बाद में २७ फरवरी २००० में इसे पुनः चालू किया गया | फीनिक्स सेट्लमेंट ट्रस्ट ने भारत सरकार कि मदद से यहाँ गांधीजी के घर को पुनः स्थापित किया और यहाँ क्लीनिक एवम एड्स सेंटर इत्यादि शुरू किया |
सके पहले भी दो बार डरबन गया लेकिन वहां नहीं जा पाया था , इसलिए इस बार सोच रखा था कि वहां जाएंगे | शाम को करीब ४ बजे फुर्सत मिलने के बाद मैंने ड्राइवर से कहा कि फीनिक्स चलना है , तो वो मुझे आश्चर्य से देखने लगा | मैंने पूछा कि क्या हुआ तो वो बोला कि शाम के समय , वो भी शुक्रवार को ( जब यहाँ वीकेंड शुरू हो जाता है ) , वहां जाना खतरनाक है | मुझे लगा वो शायद बहाना बना रहा है तो मैंने वहां के कुछ भारतीय लोगों से पूछा , तो उनका भी यही जवाब था |
कहीं कुछ चुभा कि गांधीजी , जो अहिंसा के पुजारी थे , के आश्रम में शाम के समय जाना खतरनाक है यहाँ | समय कम था क्योंकि वापसी का टिकट लिया हुआ था सो वापस आना पड़ा | लेकिन शीघ्र ही जाकर देखना है कि क्यों लोग उस जगह पर शाम को जाने में कतराते हैं | क्यों अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले बापू के आश्रम का क्षेत्र भी हिंसा से अछूता नहीं है ?

Tuesday, September 30, 2014

बालों की देखभाल--

बचपन का समय बहुत प्यारा था , सबका होता है , सिर्फ उन बच्चों को छोड़कर जो दुकानो एवम अन्य जगहों पर काम करते हैं | पता नहीं क्यों , लेकिन शुरू से ही बालों में तेल लगाने की आदत पड़ गयी ( जो आज भी बदस्तूर जारी है ) | शायद पहले माँ , आजी इत्यादि रोज ही तेल चुपड़ देतीं थीं तो धीरे धीरे वो कब दिनचर्या में शामिल हो गया पता नहीं चला | शुरू में तो सिर्फ कड़ुआ तेल ( सरसों का तेल ) ही होता था लगाने के लिए लेकिन जैसे जैसे बड़े होते गए , कड़ुआ तेल पीछे छूट गया | 
फिर समय आया आमला तेल का , डाबर आमला | नहाने के बाद पहला काम होता था बालों में तेल लगाना | फिर उसके बाद किसी और चीज की जरुरत महसूस नहीं होती थी , न तो कोई क्रीम , न कुछ और | श्रृंगार के नाम पर सिर्फ और सिर्फ बालों में तेल | फिर हॉस्टल में आये , देखा की अव्वल तो कोई तेल लगाता ही नहीं और अगर लगाता है तो केओ कार्पिन | अब समाज में रहना था तो उसी हिसाब से बदलना पड़ा अपने तेल को भी | कुछ सीजन में पैराशूट नारियल तेल भी लगाते थे और बाकि समय केओ कार्पिन | फिर प्रचार देख कर महसूस हुआ कि तेल लगाने से बालों में चिपचिपाहट भी होती है तो खोज शुरू हुई ऐसे तेल की जो चिपचिपाहट रहित हो |
एक मित्र थे जो सौंदर्य प्रसाधनो के जानकार थे | उन्होंने राय दी कि आजकल तमाम लाइट तेल आ रहे हैं , उनका प्रयोग करो | खैर अब तेलों में भी लाइट तेल की खोज शुरू हुई और उसका इस्तेमाल प्रारम्भ हो गया | उसी समय उनकी सलाह पर कैंथरैडिन तेल मिला जो सचमुच बहुत लाइट था और बिलकुल पता नहीं चलता था |
कॉलेज ख़त्म हुआ और नौकरी की शुरुआत हुई | तमाम नयी चीजों , जैसे शेविंग क्रीम लगाना , डेओ लगाना और परफ्यूम इत्यादि का प्रयोग शुरू हो गया , लेकिन सर पे तेल लगाने की आदत बदस्तूर जारी रही | कहीं भी बाहर जाना होता तो मंजन ब्रश के अलावा अगर किसी और चीज की बेशाख्ता जरुरत महसूस होती तो वो बालों के तेल की ही | शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि नहाने के बाद तेल का प्रयोग नहीं किया हो बालों में |
अभी भी वो आदत बरक़रार है , बस तेल अब बदल कर आलमंड का हो गया है | लेकिन एक बात का अफ़सोस रहता है कि काश अपने सर की खेती थोड़ी कमजोर होती तो शायद धन के मामले में इतना कमजोर नहीं रहते ( सुना है , पढ़ा है और देखा भी है की पैसा उनके पास ही बहुतायत में रहता है जिनके सर पर बाल कम होते हैं ) |

Sunday, September 28, 2014

बच्चे--

" कहाँ से ले आई ये गन्दी गुड़िया ", मम्मी ने उसे बाहर फेंक दिया |
" मुझे वही चाहिए " , मुन्नी चिल्लाने लगी |
" इतने सारे सुन्दर खिलौने हैं तो तुम्हारे पास , जिद नहीं करते "|
माली की लड़की अपनी गुड़िया लेकर भाग गयी , मुन्नी रोते रोते सो गयी |
अगले दिन माली की लड़की नए खिलौने से खेल रही थी और मुन्नी पुरानी गुड़िया से |
" ये बच्चे न ", दोनों माताएं सोच रहीं थी |

ऑंखें --

पूरी रात लगा रहा वो माँ की मूर्ति को पूरा करने में | अब सिर्फ रंग भरना बाकी था | थकान हावी हो रही थी लेकिन सुबह से पहले हर हाल में इसे पूर्ण करना था |
सुबह उसकी पत्नी ने उसे झगझोर कर जगाया " ये क्या किया तुमने , ऑंखें यूँ ही छोड़ दी , क्या माँ की ऑंखें नहीं खुलेंगी " |
उसने उनींदे ही जवाब दिया " आजकल सचमुच खुलती हैं क्या माँ की ऑंखें " , और वापस सो गया |

Sunday, September 21, 2014

एक अनोखी यात्रा --

२००७ में बॉम्बे पोस्टिंग हुई थी | बॉम्बे में पहुँच कर सारे लोग व्यवस्थित हों गए कुछ दिन में और जिंदगी वहां के हिसाब से ढल गयी | लगभग ६ महीने बीत गए थे और फिर बनारस जाने का कार्यक्रम बना | अकेले ही जाना था , पहली यात्रा थी बनारस की , इसलिए बहुत उत्साहित था | आने जाने का टिकट नेट से करा लिया था | आखिर जाने का दिन आ ही गया | ट्रैन थी रात के १२ बज कर १० मिनट पर , इसलिए घर से रात को १० बजे निकले और ११ बजे वी टी स्टेशन पर पहुंचे | प्लेटफार्म पर पहुँच कर इंतज़ार करना था तो सोचा की क्यों न चार्ट में अपना नाम देख लिया जाये | चार्ट को एक बार देखा , दुबारा देखा लेकिन नाम नदारद | अब चिंता होने लगी , बार बार टिकट देखा , सब ठीक था | मेरी बर्थ कन्फर्म थी लेकिन चार्ट में से नाम क्यों गायब था |खैर ट्रैन २ घंटे लेट थी तो टी टी को खोजना शुरू किया | कुछ देर बाद एक दिखा तो उससे पूछा , उसने टिकट देखा और बताया कि ये तो कल का टिकट था | दरअसल रात के १२.१० के चलते गड़बड़ हों गयी थी , अब तो पसीना छूटने लगा | उस दिन दशहरा था इसलिए भीड़ भाड़ कम थी | रात के २ बज चुके थे और ट्रैन एक घंटे में जाने वाली थी | वापस लौटने के लिए भी सोचा लेकिन वापसी की लोकल ट्रैन भी ४ बजे ही मिलती |
काफी देर मैं इसी उधेड़बुन में रहा कि बनारस जाऊँ या वापस लौटूं | फिर हिम्मत जुटा कर सोचा कि बनारस ही चलते हैं | टिकट भी नहीं था और रिजर्वेशन भी नहीं , फिर टिकट काउंटर से जाकर एक सामान्य टिकट लिया | वापस प्लेटफार्म पर आकर टी टी को पूछना शुरू किया कि किसी भी क्लास में बर्थ मिल जाये लेकिन सभी ने मना कर दिया | अब तो एक ही रास्ता था कि किसी सामान्य डिब्बे में घुसा जाये और आगे की यात्रा की जाये | एक सामान्य डिब्बे में घुसा , नीचे की बर्थ पर जगह थी | मैंने हिम्मत जुटाई और बैठ गया |
थोड़ी देर में ट्रैन चल दी और उम्मीद के विपरीत बिलकुल भी भीड़ नहीं आई डिब्बे में | काफी सामान भी था मेरे पास और पैसे भी इसलिए घबराया हुआ था | लेकिन सुबह होते होते ये आभास हों गया कि ज्यादा दिक्कत नहीं होने वाली है | धीरे धीरे डब्बा भर गया था लेकिन शायद मेरे अटैची और कपडे के चलते लोगों ने मुझे काफी जगह दे रखी थी | कोई भी नीचे जाता तो पूछ लेता कि कुछ लाना है क्या | इस तरह दिन बीत गया , फिर रात भी सोते जागते बीत गयी | अगले दिन करीब ३ घंटे देर से ट्रैन बनारस पहुंची और मैं उतर के घर पहुंचा | शरीर का तो बुरा हाल था , हड्डियां चरमरा गयीं थीं बैठे बैठे , लेकिन घर पहुँचने के उत्साह ने इन सब बातों को दरकिनार कर दिया था | मैं सचमुच सही सलामत बम्बई से बनारस सामान्य डिब्बे में सफर करके पहुँच गया | लेकिन मेरी हिम्मत नहीं पड़ी कि मैं घर पर या बॉम्बे में बताऊँ कि मैं सामान्य डिब्बे में सफर करके आया हूँ | वापस आने के महीनो बाद मैंने ये बात सबको बताई और फिर ये कसम भी खायी कि अब से रिजर्वेशन करते समय कई बार चेक करूँगा , खासकर अगर ट्रैन का समय अर्धरात्रि के आस पास हो | आज ये सोचता हूँ तो लगता है कि कैसे हिम्मत जुटा ली थी मैंने..

संकल्प--

माली बड़े जतन से पौधों को सींच रहा था और उसके चेहरे पर एक सुकून की रेखा खिंची हुई थी | इंसान होकर पौधों से इतना लगाव , शायद पेशागत , शायद जीवन का स्पंदन महसूस करने की शक्ति या कुछ और |
छोटा भी वहीँ खेल रहा था , उसकी माँ के चेहरे पर भी वही सुकून दिख रहा था | घर की याद आ गयी , कितने महीने हो गए हैं अपने गांव गए | शायद माँ बाप ने भी ऐसे ही सींचा होगा बचपन में हमें |
अचानक माली ने एक सूखा पौधा उखाड़ा | मन में कहीं चुभा कुछ , छोटा वैसे ही खेल रहा था और उसकी माँ वैसे ही खोयी हुई थी उसमें | लेकिन अब गांव जाने का संकल्प पक्का हो गया था |

Saturday, September 20, 2014

मदद--

एक वाकया याद आता है मुग़लसराय का जो कोयले और रेलवे यार्ड के लिए मशहूर है और वहां रेल का डी आर एम ऑफिस भी है | रेलवे के बहुत सारे कर्मचारियों के वेतन का खाता हमारी शाखा में था और महीने के करीब १० दिन बहुत भीड़ भाड़ रहती थी | कभी कभी तो पूरा दिन ही सिर्फ वेतन के भुगतान में निकल जाता था लेकिन लोग संतुष्ट थे |
एक उच्चाधिकारी के पिताजी का अकस्मात् निधन हो गया था और उनको तुरंत अपने घर जाना था | वे लखनऊ में थे और उनको ट्रेन से घर जाना था लेकिन ट्रेन में कोई सीट उपलब्ध नहीं थी | रात के करीब १० बजे ये सूचना मिली की वो बनारस कार से आ रहे हैं और मुग़लसराय से उनको सुबह ८ बजे ट्रेन पकड़नी थी | इतनी रात को कोई सूरत नज़र नहीं आ रही थी रिजर्वेशन दिलाने की , लेकिन फिर भी एक टी सी से बात हुई सुबह सुबह और अपने उच्चाधिकारी को लेकर मैं सुबह करीब ७ बजे प्लेटफार्म पहुँच गया | वहां पर उस टी सी से मुलाक़ात हुई , उसने हमें अपने ऑफिस में बैठा दिया और बोला कि मैं पूरी कोशिश करता हूँ कि एक सीट मिल जाये | कोई और रास्ता नहीं था इसलिए हम लोग बैठ गए | थोड़ी देर बाद किसी ने नमस्ते किया और पूछा कि यहाँ क्यों बैठे हैं | वो भी टी सी था , जैसे ही उसे पता चला , वो भी लग गया सीट के इंतज़ाम में | अगले आधे घंटे में करीब १० टी सी आये और कमोबेश सभी ने वही सवाल पूछा और सब सीट के लिए लग गए | पता नहीं कितने लोगों ने चाय वगैरह के लिए भी पूछा , लेकिन उस समय तो एकलौती चिंता सीट की थी |
थोड़ी देर बाद एक टी सी आया जिसे उसी ट्रेन से जाना था | उसने मुझसे पूछा कि आपको एक ही सीट चाहिए न | मैंने हाँ में उत्तर दिया तो उसने फिर कहा कि करीब दस लोग मुझसे कह चुके हैं कि हर हालत में एक सीट चाहिए तो मैंने सोचा कि देख लूँ कौन है जिसके लिए इतने लोग सिफारिश कर रहे हैं | आप इत्मीनान रखिये , आपको सीट मिल जाएगी , अब और किसी से मत कहियेगा | मैंने झेंपते हुए कहा कि लोग मुझसे पूछ रहे हैं इसलिए बताना पड़ रहा है |
ट्रैन आई और सारे टी सी आ गए लिवाने | उनको सीट पे बैठाकर जब मैं वापस आ रहा था तो उन्होंने पूछा " तुम इनके लिए क्या करते हो जो आज सारे मदद के लिए खड़े थे | मैंने कहा कि बस इतनी कोशिश करता हूँ कि जो भी हमारी शाखा में आये वो संतुष्ट होकर लौटे " |
उस दिन मुझे विश्वास हो गया कि दूसरों के लिए की गयी मदद हमारे पास किसी न किसी रूप में वापस आ ही जाती है |

Sunday, September 14, 2014

नींद--

एक और वाकया याद आता है बी एच यू का | दरअसल नींद की शुरू से ही बीमारी रही है मुझे | बहुत धनी था मैं इसमें और शायद पढ़ाई के दिनों में तो कुछ ज्यादा ही प्यारी हो जाती थी ये | ग्रेजुएशन में सेमेस्टर में दो परीक्षाएं होती थीं और और अधिकांशतयाः पढ़ाई परीक्षा की रात में ही होती थी | मैं पूरी रात जग के पढ़ता था और दिन में सो लेता था , क्योंकि कोई और विकल्प नहीं था | तमाम लड़के इस बात को जानते थे और मेरे कमरे में लगभग रोज़ १५ से २० लोग अपना जगाने का समय लिखा जाते थे | मैं , जैसे जैसे समय मिलता , लोगों को जगा देता था | कुछ लड़के तो यहाँ तक कहते कि जब तक मैं उठ के बाहर निकल कर मुंह धो के न आ जाऊँ , तब तक मत जाना | एक बार एक हादसा हो गया था , मैंने एक लड़के को जगाया , वो उठा और बोला ठीक है जाओ और मैं चला आया | सुबह सुबह वो मुझे गलियां देने लगा कि तुमने मुझे जगाया नहीं | मैंने सफाई दी कि तुम्हे जगाया तो था और तुम बोले कि ठीक है अब जाओ , तो वो अपना सर धुनने लगा कि मैं तो वापस सो गया था |
खैर , मेरा रूम पार्टनर मेरे रात भर जागने से परेशान रहता था , लेकिन क्या करे | लेकिन उसे कही न कहीं ये भरोसा भी होने लगा था कि मैं बहुत कम सोता हूँ | ऐसे ही एक दिन बातों बातों में उसने मुझसे शर्त लगायी कि देखतें हैं कौन ज्यादा सोता है | मैंने उसे कहा भी कि तुम मेरा मुक़ाबला नहीं कर पाओगे लेकिन वो निश्चिंत था कि वो ही जीतेगा | खैर , शनिवार को परीक्षा ख़त्म हो रही थी और उसी रात को हमारा मुक़ाबला होना था | अपनी आदतानुसार मैं शुक्रवार रात भर जगा रहा , सुबह परीक्षा दी और दिन में सोने का कार्यक्रम मुल्तवी कर दिया | उधर मेरा प्रतिद्वंदी रात में फिल्म देखने चला गया और मैं १० बजे खाना खा के सो गया | जाड़े का समय था और मेरी आदत थी रज़ाई से मुंह ढँक कर सोने की | करीब रात के साढ़े बारह बजे वो वापस आया और दरवाजा खटखटाने लगा | करीब १० मिनट बाद भी जब कोई आहट नहीं हुई तो वो मेरा नाम लेके जोर जोर से चिल्लाने लगा और दरवाजा पीटने लगा | धीरे धीरे उस तल के बहुत सारे लड़के जग गए और अपने कमरों से निकल कर मेरे कमरे के सामने आ गए | जब लोगों ने पीटने और चिल्लाने में अपनी सारी ताक़त लगा ली तो उनके सामने एक ही विकल्प बचा था कि दरवाज़ा तोड़ दिया जाए | तभी एक लड़के ने कहा कि ऊपर का रोशनदान खुला है , उससे पानी गिराते हैं और फिर लोगों ने मेज लगाकर रोशनदान से पानी गिराना शुरू किया | पानी जब रज़ाई से छनकर मुंह पर आया तो ठण्ड से आँख खुल गयी | मैंने जैसे ही रज़ाई हटाई , वैसे ही दरवाजे पर ज़ोर से दस्तक हुई और लोगों कि चिल्लाने की आवाज़ भी आई | मैंने हड़बड़ाकर दरवाजा खोला और दरवाज़ा खुलते ही एक साथ कई लड़के अंदर आ गए | गालियों की बौछार शुरू थी और मैं हक्का बक्का देख रहा था | कुछ देर में सब चले गए और मेरे पार्टनर ने मुझसे पूछा " तुम सच में सोये थे , हम तो डर गए थे कि कहीं कुछ और तो नहीं हो गया था " | उसके बाद उसने कहा कि प्रभु , अपने चरण दिखाओ , तुमसे सोने में जीतना तो दूर , प्रतिस्पर्धा भी नहीं कर सकता मैं | अगले दिन सुबह मेस में नाश्ते के समय तमाम उंगलियां मेरी तरफ दिखाई जा रहीं थी कि वही लड़का है जो कल सो गया था |
लेकिन हक़ीक़त यही थी कि मैं सचमुच सो गया था |

दुआ--

कलम रुक गयी उसकी , क्या लिखे और क्यूँ लिखे | पहले ही तो कितना कुछ लिखा जा चुका है इस पर कि ईश्वर , अल्लाह , गॉड सब एक है , सारे धर्म तो एक ही शिक्षा देते हैं | सब लोग तो आपसी भाईचारा , प्रेम , सद्भाव वगैरह के बारे में ही लिखते हैं , फिर ऐसा क्यूँ होता है | क्यूँ एक छोटी सी चिंगारी इतनी ताक़तवर हो जाती है कि इंसान की समझ जल के राख हो जाती है |
अगर लिखने से ही सब कुछ ठीक हो जाता तो सब ठीक ही रहता न | नहीं , अब नहीं लिखना उसे | इंसान तरक्की कर रहा है , शिक्षित हो रहा है , लेकिन सारी शिक्षा क्यूँ धरी की धरी रह जाती है | और कितना बटेगा इंसान , किस किस आधार पर , कब तक ?
नहीं , अब वो और लिखेगा नहीं , वो कोशिश करेगा कि लोग जो लिखा है उसे पढ़ें और समझें | वो लोगों को बताएगा कि धर्म इंसान की बेहतरी के लिए हैं , बर्बादी के लिए नहीं | ये धरती प्रेम से जन्नत बन सकती है , नफरत से नहीं |
और जिस दिन लोग ये समझने लगेंगे , उस दिन वो लिखेगा , सबकी खुशहाली और सलामती की दुआ | 

Saturday, September 13, 2014

सिंचाई--

ठंडी अब भयानक हो गयी थी , दिसंबर का अंत आ रहा था | ऐसा लगता था कि ठंडी हवाएँ हड्डियों में घुस जाएँगी | चच्चा दु ठो सिवटर पहिने थे , कान में मफलर कसके बान्हे थे , लेकिन कउड़ा पर से जइसहीं उठते थे , ठंडी लगने लगती थी | गेहूं और मटर की फसल बढ़ रही थी | अमूमन दिन में आने वाली बिजली जैसे जैसे ठण्ड बढ़ती थी , रात की पाली वाली हो जाती थी | आज भी रात की पाली थी बिजली की और पानी बराना था खेत में | 
खाना खा के उ कउड़ा पर बैठे , अबहीं त ८ बज रहा था | बिजली ९ बजे आने वाली थी और चच्चा गोजी और फरसा कउड़ा के पास रख लिए थे | उस मौसम में उनका एक्के साथी था , उनका झबरा कुक्कुर | चच्चा कहीं भी जाएँ , झबरा साथ साथ लग जाता | कउड़ा के पास गुड़मुड़िया के लेटा था झबरा | थोड़ी देर बाद चच्चा उठे , कान में जनेऊ लपेटे और पिसाब करके दुआरे से चल पड़े | झबरा पीछे पीछे था | बिजली का टाइम हो रहा था और चच्चा जल्दी जल्दी टुब्बेल की ओर लपक रहे थे | 
टुब्बेल पर पहुँचते पहुँचते बत्ती आ गयी , चच्चा ने ललकारा " टुब्बेल चलावा महतो , बत्ती आ गयी " | महतो रजाई से मुँह निकाले और बत्ती देख के कांपते हुए उठ बैठे | " बहुत जाड़ा पड़त बा चच्चा ए बार , पाला भी खूब पड़ी " कहते हुए महतो ने टुब्बेल चला दिया | टुब्बेल के गरम पानी से भाप निकल रहा था , चच्चा ने नारी का मेड़ लगाया और पानी के साथ साथ चल पड़े खेत की ओर | चारो तरफ सन्नाटा , धुप्प अन्हियार और चच्चा और झबरा | खेत पर पहुँच कर फरसा से मेड़ ठीक किये और पानी खेत में आने लगा | ठंडी में यही मुश्किल की जइसहीं काम बंद करो , ठंडी लगना चालू | खैर अगल बगल से कुछ पतई बटोरे और जेब से माचिस निकाल के जरा दिए | आग से तनिक राहत मिला | उसके बुझते ही फिर खेत में घुसे , पानी का अंदाज़ लगाया की कहाँ तक पहुँच गया है और बाहर आ गए | 
अचानक चच्चा टुब्बेल की तरफ देखे तो बत्ती गायब | मुश्किल से आधा खेत हो पायी , चच्चा अंदाज़ लगाये और भुनभुनाते हुए घर की ओर चल पड़े | काल फिर आये के पड़ी , ए ठंडी में , यही सोचते चच्चा दुआर पर पहुंचे और रज़ाई में घुस गए | झबरा भी कउड़ा से सट कर लेट गया था | रात अपने हिसाब से बीत रही थी |

Friday, September 12, 2014

कसम--

तीसरी कसम के हिरामन की तरह मैंने भी कई कसमें खायी हैं जीवन में , उन्ही में से एक कसम के बारे में आज बताता हूँ | बी एच यू की बात है , उस समय फ़िल्में देखने का शौक था लेकिन यथासंभव कला या सामानांतर फ़िल्में ही देखना पसंद करता था | गोविन्द निहलानी , श्याम बेनेगल , महेश भट्ट , इत्यादि की फ़िल्में अगर लगी हों तो कोशिश करता था कि देखी जाएँ | बहुत कम लोग साथ देते थे लेकिन फिर भी चला ही जाता था देखने |
ऐसे ही एक बार महेश भट्ट की " कब्ज़ा " फिल्म लगी | उस समय फ़िल्में शुक्रवार को बदल जाती थीं तो गुरूवार को मन बनाया और साइकिल से निकल गया | पहुँचने में थोड़ी देर हो गयी तो जल्दी से टिकट लेके बालकनी में चला गया | उम्मीद के मुताबिक़ ही बहुत कम लोग थे और मैं आराम से एक सीट पर बैठ गया | अभी फिल्म शुरू नहीं हुई थी तो मैंने एक निगाह पूरे हाल में दौड़ाई | लेकिन चारो तरफ अधेड़ महिलाएं , जो कि ग्रामीण परिवेश की लग रहीं थीं , ही नज़र आ रहीं थीं | थोड़ा अजीब लगा कि इन लोगों को कब से महेश भट्ट की फिल्म समझ में आने लगी लेकिन मैंने ध्यान नहीं दिया |
थोड़ी देर बाद फिल्म शुरू हुई , परदे पर नाम लिखा आया " श्रीकृष्ण लीला " | मुझे लगा कि शायद कल से ये लगने वाली है तो उसका प्रचार दिखा रहें हैं ( उस समय ये प्रचलन में था )| धीरे धीरे १५ मिनट बीते , फिर ३० मिनट , श्रीकृष्ण का जन्म भी हो गया , और जब लगभग ४० मिनट बीत गए तो मुझे खटका हुआ | मैंने धीरे से थोड़ी दूर पर बैठे एक सज्जन से पूछा कि कौन सी फिल्म चल रही है | उन्होंने मुझे घूर कर देखा , शायद सोचा हो कि देखने में तो ये पढ़ा लिखा ही लग रहा है , और बड़ी बेरुखी से जवाब दिया " अरे भाई , श्रीकृष्ण लीला चल रही है" , और फिर फिल्म देखने में तल्लीन हो गए |
मैं तुरंत हाल से बाहर निकला और साइकिल स्टैंड से साइकिल लेकर भाग खड़ा हुआ | मुझे सोच सोच कर हंसी आ रही थी , अपनी बेवकूफी पर भी और ये सोच कर भी कि मेरे जैसा नास्तिक आदमी ये फिल्म देख रहा था | फिर मैंने कसम खायी कि आज के बाद फिर कभी बिना टिकट खिड़की पर दरियाफ़्त किये फिल्म नहीं देखूंगा |

अख़बार--

साहब बहुत चिंतित थे , वजह थी कल की विजिट | कल एक कंपनी के सर्वोच्च अधिकारी मिलने आ रहे थे |
अब इतने बड़े अधिकारी आ रहे हैं तो खर्च भी होगा | निहायत कंजूस थे , खर्च के नाम पर प्राण सूख जाते थे | खैर अगले दिन वो उच्चाधिकारी आये और किसी तरह न्यूनतम खर्च में निपटा दिया उनको | लेकिन जाते जाते एक गड़बड़ हो गयी , उस दिन का अख़बार वो लेते गए | 
करीब दो घंटे बाद उसने अपने अधीनस्थ को बुलाया और कहा " उस कंपनी के मैनेजर को बोल दो कि आज का अख़बार खरीद कर दे दे " | अधीनस्थ ने अपने पैसे से अख़बार ख़रीदा और साहब को दे दिया , अपनी कंपनी की इज़्ज़त भी बची और साहब का तनाव भी निकल गया |

राष्ट्र भाषा--

नए फैशन के परिधान पहने तमाम लोग मुस्कुरा रहे थे | वजह थी वो , जो अपने पारम्परिक वेशभूषा में थी | 
एक बच्चे ने अपनी माँ से पूछा " मैंने इसे कहीं सुना या पढ़ा है मॉम " |
" हाँ बेटू , ये अपनी राष्ट्र भाषा है " , मॉम ने भी मुस्कुराते हुए जवाब दिया |

Monday, September 8, 2014

नशा--

उसे अभी भी भरोसा नहीं हो रहा था , उसके सामने बैठी औरत वही थी , जिसे उसने फिल्मों में देखा हुआ था | एक समय था जब उसने हिट फिल्मे दी थीं , लेकिन आज उस पांच सितारा होटल की रेड में ये भी गिरफ्तार हुई थी | पुलिस स्टेशन लाकर उसने उसे बैठने के लिए कहा और पूछा " तुम्हारे इस पेशे में आने की वजह "?
थोड़ा रुक कर उसने जवाब दिया " सफलता से बड़ा कोई और नशा नहीं होता और जब ये नशा उतरता है तो इंसान सही और गलत में फ़र्क़ करना भूल जाता है | लोग अनदेखा करने लगें , बर्दाश्त नहीं होता | कहाँ आगे पीछे घूमती भीड़ और कहाँ अकेलापन , फिर इंसान दूसरे नशों में डूबने लगता है | और जिस जीवनशैली की आदत पड़ चुकी होती है उसे पूरा करने के लिए वो किसी भी हद तक चला जाता है" | 
किसी भी पश्चात्ताप के निशान नहीं थे उसके चेहरे पर |

Sunday, September 7, 2014

दक्षिण अफ्रीका डायरी - ४

यहाँ आने के बाद श्री नेल्सन मंडेला से नहीं मिल पाने का मलाल ताउम्र रहेगा | दरअसल जब मैं यहाँ आया तो वो गंभीर रूप से बीमार थे और हस्पताल में थे | फिर दिसंबर में उनकी मृत्यु हो गयी और मैं उनसे मिलने से वंचित रह गया |
यहाँ पर एक जगह है " फोर्ड्सबर्ग " जो मिनी एशिया जैसा है | यहाँ अपने जरुरत की हर चीज मिल जाती है और यहाँ जाकर महसूस हो जाता है कि हम हिंदुस्तान में हैं | उस एरिया में ट्रैफिक रूल्स कम चलते हैं , अव्यवस्था चारो ओर दिख जाती है और बहुतेरे हिंदुस्तानी या पाकिस्तानी दूकानदार हैं | खास कर सैलून सारे पाकिस्तानी लोगों के हैं और तमाम भारतीय रेस्टोरेंट भी हैं यहाँ | एक और जगह है " लिनेसिआ" जहाँ अधिकांश हिंदुस्तानी लोग रहते हैं और वहां बहुत से मंदिर भी हैं |
अपने त्यौहार जैसे दशहरा , दीवाली इत्यादि मनाने के लिए एक जगह निश्चित है यहाँ " मार्लबोरो " | वहां पर एक मंदिर और कम्युनिटी सेंटर है जहाँ सारे कार्यक्रम होते हैं | महात्मा गांधी की एक प्रतिमा जोहन्नेस्बर्ग टाउन में भी है जहाँ २ अक्टूबर को माल्यार्पण होता है |
दिसंबर में इंडियन क्रिकेट टीम दक्षिण अफ्रीका में आई | जोहानसबर्ग में एक टेस्ट मैच , वन डे मैच और एक वन डे मैच सेंचूरियन ( जोहानसबर्ग से काफी नज़दीक ) में था | टीम उसी माल में रुकी थी जिसमे हमारा बैंक है और इस वज़ह से टीम के लगभग सभी खिलाड़िओं से मिलने का मौका आसानी से मिल गया | हिन्दुस्तान में कभी ये सोच भी नहीं सकते की इन लोगों से आप मिल कर बातचीत भी कर सकते हैं | अंशिका भी दिसंबर में यहाँ एक महीने के लिए आ गयी और फिर मैच देखने से लेकर घूमना फिरना खूब हुआ | क्रमशः

Friday, September 5, 2014

रिश्ता--

पता नहीं कौन सा रिश्ता था उनके बीच , जब भी वो जाता , ऑंखें बहने लगती |
दोस्त थे दोनों , उम्र में थोड़ा अंतर था , फिर समय के साथ दोस्ती का रिश्ता भाईयों सा हो गया |
दोनों दो शहरों में रहते थे लेकिन महीने दो महीने में एक दूसरे से मिलते जरूर थे |
इस बार जब छोटा जाने लगा तो उसने बड़े के पैर छुए | अब तो ये रिश्ता पिता पुत्र जैसा हो गया था , शायद बढ़ती उम्र का असर था | और जब वो बस में बैठ कर हाँथ हिला रहा था तो बड़ा अपनी ऑंखें पोंछ रहा था | 

नेकी--

" नेकी करो और भूल जाओ " इस कहावत को मानने वाले बड़े सुखी रहते हैं और उनको जिंदगी में कभी कभी बड़े सुखद आश्चर्य मिलते हैं | शायद २००१ की बात है , मैं आजमगढ़ में नियुक्त था | नयी शाखा थी और काफी सारे परिचित लोग भी थे उस शहर में | एक रिश्तेदार के ससुराल में शादी तंय हो गयी थी और उनको तिलक के लिए पैसे देने थे लड़के वालों को | पैसा एफ डी के रूप में मऊ के बैंक आफ इंडिया में रखा हुआ था और वो दो नामों से था | एक नाम जिसका था वो उस वक़्त किसी और शहर में था और उसके आने का समय निश्चित नहीं था | पैसा तुरंत चाहिए था लेकिन बैंक वालों ने बिना दोनों के हस्ताक्षर किये पैसे देने से इंकार कर दिया ( नियमतः वो सही थे ) |
वो रिश्तेदार तुरंत मेरे पास आये की किसी भी तरह से मुझे पैसा दिलवा दीजिये नहीं तो शादी में दिक्कत आ सकती है | उन्होंने भरोसा दिलाया कि जैसे ही दूसरे व्यक्ति आएंगे , उनके हस्ताक्षर करवा देंगे | मैंने मऊ शाखा में बात की , और उन्होंने मेरे लिखित आश्वासन पर पैसा दे दिया | बात आई गयी हो गयी , शादी भी हो गयी और मैं इन सब बातों को भूल गया |
लगभग तीन वर्ष पश्चात जब मेरी नियुक्ति मुगलसराय में थी , मेरे एक परिचित जो पुलिस विभाग में बड़ी पोस्ट पर थे ( जिनकी मदद से कुछ बिज़नेस लाने का प्रयास कर रहा था ) से मैं मिलने गया था | उनके ऑफिस में बैठ कर हम चाय पी रहे थे तभी एक नौजवान पुलिस अफसर आया और किनारे बैठ गया | मेरा परिचय हुआ और फिर मैं चाय पीने में मशगूल हो गया | वो नौजवान अफसर मुझे लगातार देखे जा रहा था , जो मुझे भी महसूस हो रहा था | आखिरकार उससे नहीं रहा गया तो वो मुझसे पूछने लगा की आप यहाँ से पहले कहाँ थे | मैंने बताया तो फिर पूछा कि उसके पहले कहाँ थे आप तो मैंने बताया कि आजमगढ़ | ये सुनते ही उन्होंने कहा कि आप ने मुझे नहीं पहचाना | मेरे इंकार करने पर उन्होंने बताया कि मेरी बहन कि शादी थी और आपके चलते ही वो पैसा समय पर मिल गया था | सचमुच मैंने उस अफसर को नहीं पहचाना लेकिन याद आ गया |
वो दिन , और आज का दिन , हम लोग बेहद अच्छे दोस्त हैं | आज उनके जन्मदिन पर अचानक ये सब याद आ गया | जन्मदिन मुबारक प्रिय मित्र |

शिक्षक दिवस पर--

वैसे तो मैं कभी भी ऐसा छात्र नहीं रहा जिसपर गुरुजन गर्व कर सकें , लेकिन कई शिक्षकों ने बहुत प्रभावित किया | कुछ बहुत अच्छी तो कुछ कड़वी यादें हैं छात्र जीवन की , लेकिन आज एक गुरु के बारें में बताऊंगा जिन्होंने प्रभावित किया |
बी एच यू की बात है | हॉस्टल में रहने के कारण देर तक जगना और फिर देर तक सोना | सुबह की प्रैक्टिकल की क्लास अक्सर छूट जाती थी | एक विषय था प्लांट पैथोलॉजी का जिसके प्रैक्टिकल में भी गायब रहता था | मिड सेम की परीक्षा हुई , नंबर उन्होंने अपने प्रैक्टिकल क्लास में ही दिखाया | मैं गया नहीं इसलिए नंबर पता नहीं चला | अब अगले प्रैक्टिकल में जाना मज़बूरी बन गया था | खैर मैं पहुंचा और उनसे अपने नंबर के बारे में पूछा | बड़ी हिकारत भरी नज़र से देखते हुए उन्होंने कॉपी निकाली , लेकिन नंबर देखते ही उनका चेहरा बदल गया | दरअसल मेरे सबसे ज्यादा नंबर थे | अब उन्होंने मेरी तारीफ़ करनी शुरू कर दी कि बहुत सटीक जवाब दिए हैं तुमने , एकदम संक्षिप्त | मेरी आदत रही है कम से कम में लिखने की और मेरी जान में जान आई | लेकिन अब तो फंस गए थे क्योंकि आगे से हर प्रैक्टिकल में जाना मज़बूरी बन गया |
खैर एंड सेम की परीक्षा आई | मैं अपनी आदत के अनुसार मैं फ़टाफ़ट उत्तर लिख कर बाहर निकल गया | चूँकि समय बचा हुआ था इसलिए क्लास के बाहर लॉन में बैठा हुआ था तभी एक लड़का आया और बोला कि मेरा तो प्रश्न छूट गया | मैंने पूछा कि क्यों तो वो बोला कि अरे पेपर के पीछे भी प्रश्न थे जो मैं देख ही नहीं पाया | अब मेरे प्राण सुख गए क्योंकि मैंने भी पीछे नहीं देखा था और मेरे भी वो प्रश्न छूट गए | मैं भाग कर वापस क्लास में गया लेकिन अब लिखने की इज़ाज़त नहीं थी | तब तक टीचर भी आ गए थे और मुझे देखते ही उनके मुंह से निकला " अरे तुम्हारा भी प्रश्न छूट गया " | मैंने बुझे मन से हामी भर दी | अब मुझसे ज्यादा वो परेशान दिखने लगे और बगल में खड़े टीचर से मेरे बारे में बताने लगे | थोड़ी देर बाद उन्होंने सांत्वना दी कि कोई बात नहीं , प्रैक्टिकल में मेहनत करना , सब ठीक हो जाएगा |
खैर प्रैक्टिकल कैसा हुआ , मैं नहीं कह सकता लेकिन उन्होंने मुझे ग्रेड जरूर दे दिया | उसके बाद भी जब तक मैं वहां था , मैं उनसे मिलता रहा और उनके प्रति मेरे मन में आज भी श्रद्धा है क्यूंकि उन्होंने अपने विश्वास को गलत साबित नहीं होने दिया | वो शिक्षक थे श्री डी सी पंत |

शिक्षक दिवस पर -

एक और शिक्षक के बारे में बताना चाहूंगा | इंटरमीडिएट में जिस कॉलेज में मेरा एडमिशन हुआ था वो शायद पढ़ाई के मामले में बनारस के सबसे कमजोर कॉलेजों में गिना जाता था | टीचर्स कम थे , साइंस लैब ख़राब हालत में था और इंग्लिश की पढ़ाई के बारे में सोचना भी कठिन था वहां | लेकिन उस समय इंग्लिश पढ़ने में पता नहीं क्यों दिलचस्पी बढ़ गयी थी , शायद अभाव में ही जरुरत तीव्रता से महसूस होती है | खैर जुम्मा जुम्मा हम दो लोग थे क्लास में जिन्हें सचमुच इच्छा थी कि अपनी इंग्लिश में सुधार किया जाए | इंग्लिश के शिक्षक बड़े तगड़े डीलडौल वाले थे , सारे बच्चे उनको बाघे ( लायन ) बुलाते थे | खैर हम लोगों ने हिम्मत जुटा कर उनसे कहा कि हमें इंग्लिश सुधारनी है , आप हमारा मार्गदर्शन करें | पहले तो उन्हें लगा कि ये लड़के कहीं मजाक तो नहीं कर रहे हैं लेकिन हमारी हालत देख कर उन्हें भरोसा हुआ कि सच में ये सीखना चाहते हैं |
खैर , उन्होंने शुरू में हम लोगों को कुछ ट्रांसलेशन वगैरह दिया और जब देखा कि वास्तव में ये दोनों मेहनत कर रहे हैं तो उन्होंने हमें इज़ाज़त दे दी कि हम लोग खाली घंटों में उनके पास आ सकते हैं | फिर ये लगभग रोज़ का नियम बन गया | कभी ग्रामर , कभी कविता और कभी गद्य , बारी बारी से हम लोगों को जो भी वो बता सकते थे , सब बताया | बाद में तो उनका उत्साह हम लोगों से भी ज्यादा बढ़ गया था और सप्ताह का शायद ही कोई दिन था जब हम लोग कुछ न सीखतें हों |
आज जो कुछ भी टूटी फूटी अंग्रेजी आती है , उसमे उनका सबसे बड़ा योगदान है | और आज ये भी महसूस होता है कि किसी अध्यापक के लिए शायद इससे बड़ी ख़ुशी कि बात और कोई नहीं होती कि कोई बच्चा सच में उनके पास सीखने के लिए आये | उस गुरु का नाम था श्री छविनाथ सिंह | आज शिक्षक दिवस पर उनको सादर नमन |

कमाई--

चार पांच किक के बाद किसी तरह स्कूटर स्टार्ट हुई मास्साहब की | पसीना पोंछते हुए जैसे ही बैठने को हुए कि एक गाड़ी आकर रुकी | गाड़ी से उतरकर उस नौजवान ने मास्साहब के पैर छुए और एक पैकेट उनकी और बढ़ाया |
वो अभी सोच ही रहे थे कि नौजवान बोला " सर , आपकी शिक्षा का ही सुपरिणाम है कि आज मैं कुछ बन पाया हूँ , आज के दिन इंकार मत करिये " | मास्साहब ने पलट कर एक नज़र दरवाजे पर खड़ी अपनी पत्नी की तरफ देखा और विनम्रता से पैकेट लौटाते हुए बोले " तुम्हारे आदर से बड़ी भेंट कुछ और नहीं हो सकती , जीवन में और तरक्की करो " |
पत्नी को अपने कहे शब्द " क्या कमाया है आपने आजतक " का उत्तर मिल गया था |

Sunday, August 31, 2014

दक्षिण अफ्रीका डायरी - भाग ३

मैंने अपने बिल्डिंग के पड़ोसियों एवम अन्य कई लोगों का जिक्र किया लेकिन अपने मकान मालिक का जिक्र किये बिना बात अधूरी रहेगी | डॉ क्लोटनिक , जो कि सामान्य बीमारियों के डॉ हैं और यहाँ पर रहने वाले सारे बैंकर्स के भी डॉ हैं | नौजवान , खुशमिजाज और हमेशा मदद के लिए तैयार | यहाँ पर रह रहे अन्य प्रवासियों की किस्मत शायद उतनी अच्छी नहीं है , लेकिन मुझे अब झिझक होने लगी है उनसे कुछ कहने में | हमेशा एक ही बात कहते हैं " मैं चाहता हूँ कि आप और आपके परिवार को यहाँ कोई दिक्कत नहीं हो " | अगर मैंने भूल से भी कह दिया कि कोई चीज पुरानी हो रही है घर में , तो अगले ही सप्ताह कई नई चीजें लेकर हाजिर | बीच बीच में फोन करके कुशलछेम पूछते रहना और महीने दो महीने में एक बार मिल लेना उनकी आदत में शुमार है | घर पर काम करने वाली बाई " क्रिस्टीना ", जिसे हम मज़ाक में कैटरीना कहते हैं , एक ६३ वर्षीय महिला है जो बहुत खुशमिजाज और कर्मठ है | बहुत मेहनत और सफाई से अपना कार्य करके शाम को अपने घर वापस | हिंदुस्तानी चावल उसे बहुत पसंद है और लगभग हर सब्ज़ी को चखने के बाद एक ही वाक्य बोलती है " बहुत तीखा है "|
घर के ठीक सामने ही वांडरर्स स्टेडियम है जहाँ पर अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैच खेले जाते हैं | पाकिस्तान की क्रिकेट टीम का मैच था इसी स्टेडियम में और पहली बार किसी अंतर्राष्ट्रीय मैच को इतने आराम से देखने का मौका मिला | यहाँ पर लोग सिर्फ मैच देखने नहीं आते हैं बल्कि पूरा पिकनिक मनाने आते हैं , ढोल ढमाके के साथ , बियर पीते हुए | मैच के बीच में जो आधे समय का अंतराल होता है उसमे सभी दर्शकों को मैदान में जाने की अनुमति होती है | हम लोग भी इस दरम्यान मैदान में घूम लिए |
अचानक बैंक के एक कार्य से डरबन जाने का कार्यक्रम बन गया | यहाँ कि सस्ती विमान सेवा जिसका नाम " मैंगो एयरलाइन्स " है , से डरबन गए | समुद्र तट पर स्थित एक होटल में हम लोग रुके | समुद्र तट बहुत स्वच्छ था और आस पास का इलाका बहुत सुन्दर | दिन में बैंक का कार्य निपटाया और शाम को होटल आने पर पता चला कि हिंदुस्तान से कई टेलीविज़न सितारे भी उसी होटल में ठहरे हुए हैं | फिर अगले दिन उन सारे सितारों से मुलाक़ात हुई | हिंदुस्तान में ऐसे लोगों से मिलना बहुत दुरूह होता है लेकिन यहाँ बड़े आराम से मिलते हैं ये लोग | डरबन में काफी हिंदुस्तानी लोग रहते हैं और उन लोगों ने कई मंदिर इत्यादि भी बना रखे हैं | डरबन स्थित शिव मंदिर , पक्षी पार्क , और चर्च देखा और रात्रि में समीप स्थित मल्टीप्लेक्स में बुलेट राजा फिल्म देखी क्योंकि इस फिल्म की शूटिंग लखनऊ में मेरी पदस्थापना के दरम्यान ही हुई थी |
तीसरे दिन पुनः उसी मैंगो एयरलाइन्स से जोहानसबर्ग वापसी हुई | क्रमशः ...

Saturday, August 30, 2014

खुश खबरी--

" बेटा , अब दूसरे विवाह की तैयारी करो , इससे तो कुछ होना नहीं है " |
" लेकिन माँ , दूसरे में भी क्या भरोसा , थोड़ा और सबर करो " , और बात आई गयी हो गयी |
कुछ महीनों बाद खुश खबरी थी , माँ बहुत प्रसन्न हुई |
और बेटे का दोस्त जो कुछ दिनों पहले आया था , अचानक वापस चला गया |

वक़्त--

इंसानों की आवाज अब यहाँ नहीं आती थी | भयानक सन्नाटा फ़ैल गया था , कहीं कोई हलचल नहीं |
कभी ये जगह बहुत आबाद थी | चारो तरफ फैली हरियाली , उनके बीच ढेर सारे मकान और हर तरफ जीवन के निशान | यहाँ रहने वाले अपने जीवन से संतुष्ट और उन्हें मिलता था प्रकृति का भरपूर सानिध्य |
अचानक सीमा पार से गतिविधियाँ बढ़ गयीं , चिड़ियों के चहचहाने की जगह गोलियों की तड़तड़ाहट ने ले ली | जीवन के संगीत पर मौत का रुदन भारी पड़ गया | देखते ही देखते पूरा इलाका श्मशान में तब्दील हो गया | अब उजड़े हुए मकान , गुजरे हुए वक़्त की तरह बेजान पड़े थे , इस आशा में कि शायद फिर कभी हरियाली और जीवन का साथ हो यहाँ |

दक्षिण अफ्रीका डायरी- भाग २ --

२३ अगस्त २०१३ को रात २ बजे जहाज ने मुंबई हवाईअड्डे को अलविदा कहा और हमारी दक्षिण अफ्रीका यात्रा प्राम्भ हो गयी | उस पूरी यात्रा में , नए देश में जाने का रोमांच , घबराहट या उत्सुकता जो भी कह लें , नींद आँखों से कोसों दूर थी | सुबह ७.३० पर जोहानसबर्ग हवाईअड्डे पर उतर कर कुछ अलग सा महसूस हुआ | गर्म देश से आने के बाद एकदम ठन्डे क्षेत्र में पहुँच गए थे | हमारी शाखा के एक अधिकारी मौजूद थे ले जाने के लिए | होटल पहुंचे और कमरे में बैठने पर थोड़ी राहत मिली | फिर थोड़ा बाहर घूमे , अपने शाखा के लोगों के साथ भोजन और फिर शहर को देखा |
सोमवार को अपनी शाखा में पहला दिन था , भारत की शाखाओं से काफी अलग | खूबसूरत ऑफिस , जो यहाँ के सबसे बेहतरीन माल में स्थित है और पूर्ण शांति | धीरे धीरे यहाँ के वातावरण से अभ्यस्त होने लगे हम लोग | सबसे बड़ी समस्या जो पहले नज़र आई वो थी आवागमन की | आवागमन के सामान्य साधन जैसे बस , टैक्सी इत्यादि थे तो लेकिन उनको इस्तेमाल करने की मनाही थी | सुरक्षा की दृष्टि से भी और घर से ऑफिस के बीच सीधा साधन भी सुलभ नहीं था | खैर कार ले ली , और धीरे धीरे यहाँ के यातायात नियमों से वाकिफ़ होने लगे | पहली चीज जो नज़र आई वो थी लोगों में ट्रैफिक नियमों के प्रति जबरदस्त अनुशासन | लाल बत्ती कोई पार नहीं करता चाहे दिन हो या रात हो | हर दो गाड़ियों के बीच में दूरी बनाकर चलना और सबसे आश्चर्यजनक बात थी , हॉर्न का बिलकुल ही प्रयोग नहीं | मैं पहले से ही ध्वनि प्रदुषण के लिए सजग रहा हूँ इसलिए मुझे कोई दिक्कत नहीं आई लेकिन अब तो लगभग भूल ही गया हूँ हॉर्न के बारे में | शानदार सड़कें और प्रदूषणमुक्त वातावरण , बीमार आदमी भी चंगा हो जाये यहाँ आकर |
दूरभाष पर बात करना भी शुरुआत में दुरूह कार्य था , क्योंकि सबसे पहले तो कुशलछेम पूछिये , फिर अपनी बताईये और उसके बाद उस क्लिष्ट अंग्रेजी को समझिए | महीनो लग गए किसी से खुल कर बात करने में , सम्प्रेषण की दिक्कत तो खैर आज तक है लेकिन अब कम से कम समझ और समझा लेते हैं लोगों को |
स्कूल में विशू के प्रवेश को लेकर भाग दौड़ शुरू हुई | लखनऊ में रहते हुए ही मैंने यहाँ के एक स्कूल में प्रवेश के लिए आवेदन कर दिया था लेकिन उन्होंने प्रतिक्षासूची में डाल रखा था | फिर दूसरे स्कूलों का चक्कर शुरू हुआ और अंत में ईडन कॉलेज में विशू को प्रवेश मिल गया | इतना ध्यान रखने वाला प्राचार्य मैंने नहीं देखा | किस चीज में सुधार की जरुरत है , इसका निर्णय पहले हफ़्ते में ही कर दिया उन्होंने और विशू को तमाम कार्य जैसे अंग्रेजी पुस्तकें पढ़ना , निबंध लिखना इत्यादि शुरू करा दिया | धीरे धीरे विशू ने अपने आप को स्कूल के माहौल में ढाल लिया |
एक महीना बीतते बीतते थोड़ा बहुत देखना शुरू कर दिया था इस देश को | सबसे पहले नेल्सन मंडेला स्क्वायर में लगी हुए उनकी विशालकाय प्रतिमा देखी | फिर अगल बगल के पार्क इत्यादि देखा | अब यहाँ के सड़कों पर जी पी एस लगाकर चलने की आदत पड़ने लगी थी और हम लोग अपने से कुछ जगहों पर जाने लगे थे | क्रमशः ...

Thursday, August 28, 2014

--आज़म खान की भैंसों की बातचीत--

" बाहर कितनी गर्मी थी न , और गन्दगी भी बहुत थी " | 
" लेकिन बड़ा सुकून है यहाँ " , मुस्कुराते हुए एक ने कहा | 
" हाँ , वो तो है , लेकिन कुछ दिन पहले तो अपनी भी हालत ख़राब थी " , दूसरी ने कहा | 
" किस्मत इसी को कहते हैं न " और सभी हँस पड़ीं |
थोड़ी देर बाद कुछ आदमी आये और इज़्ज़त से सबको बाहर ले गए | पानी के फव्वारे में सब स्नान करने लगीं |
एक तरफ खाने पीने के लिए तरह तरह के खाद्य पदार्थ थे , इत्र की खुशबु फैली हुई थी | खाने पीने के बाद सब आराम फरमाने लगीं |
सारे आदमी निगरानी में लगे हुए थे कि इन्हे कोई दिक्कत न होने पाये |
--आज़म खान की भैंसों की बातचीत--

दक्षिण अफ्रीका डायरी--

कल दक्षिण अफ्रीका प्रवास का एक वर्ष पूर्ण हुआ | कैसे बीत गया , पता ही नहीं चला | शायद अच्छे दिन ऐसे ही उड़ जाते हैं और पीछे मुड़ कर देखने नहीं देते | पिछले वर्ष जब आया था तो भयभीत था , सभी परिचितों ने और बैंक के भी लोगों ने काफी डरा दिया था कि बहुत खतरनाक जगह है , एकदम सुरक्षित नहीं है और सामाजिक जीवन तो ख़त्म ही हो जाने वाला है | लेकिन इस एक वर्ष ने इन सभी धारणाओं को न केवल निर्मूल साबित कर दिया , अपितु ये भी दिखा दिया कि यह देश बहुत जीवंत , सुरक्षित और खूबसूरत है |
कहीं भी निकल जाइए , सब तरफ हरियाली ही हरियाली | जोहानसबर्ग तो शायद दुनिया के प्रथम तीन सबसे हरे भरे शहरों में शुमार होता है | सामाजिक जीवन भी बेहतरीन है , हर हफ्ते शनिवार और रविवार को लोग जम के मौज मनाते हैं | इन दो दिनों में कही दूर निकल जाना और पिकनिक या पार्टी करना इनकी दिनचर्या में शामिल है |
थोड़ी असुरक्षा है यहाँ , लेकिन वो विश्व के किस भाग में नहीं है | बस थोड़ा सतर्क रहने कि जरुरत होती है यहाँ , देर रात्रि विचरण यहाँ थोड़ा असुरक्षित है , लेकिन नाईट लाइफ भी बढ़िया है यहाँ | सड़के शानदार , विद्युत व्यवस्था बहुत उम्दा और चारो ओर साफ और सुन्दर | लोग काफी सुसंस्कृत और मददगार | यहाँ से डरबन तक सब देख लिया , गाँधीजी का टॉलस्टॉय फार्म , पीटरमेरिटबर्ग स्टेशन जहाँ उनको ट्रेन के डब्बे से निकला गया था , और नेल्सन मंडेला का घर एवम कार्यस्थल | अब केपटाउन देखना है , यहाँ का सबसे खूबसूरत शहर |
अब थोड़ा अपने निवास स्थान के बारे में , जिस सोसाइटी में हम रहते हैं वहां कोई भी हिंदुस्तानी परिवार नहीं है | इससे यहाँ के लोगों के रहन सहन एवम संस्कृति के बारे में काफी जानने को मिला | एक पड़ोसी महिला है जो बुजुर्ग हैं और घर के बुजुर्ग की तरह ध्यान रखती हैं , इतना ध्यान की कभी कभी उकताहट भी होने लगती है , लेकिन फिर भी अच्छा लगता है | विशू जिस स्कूल में पढ़ते हैं , वहां कोई स्कूल बस नहीं जाती | यहीं एक और पड़ोसी हैं जिनके दो बच्चे हैं जो उसी स्कूल में पढ़ते हैं | शुरुआत में तो वो ही स्कूल ले जाते थे और ले भी आते थे लेकिन मेरे बहुत कहने सुनने के बाद हफ्ते में दो दिन मुझे इज़ाज़त दी कि मैं बच्चों को स्कूल छोड़ूँ | ले आने के लिए अधिकांशतया वो ही ले आते हैं | दिल जीत लिया है उन्होंने हमारा , कभी कभी तो उनके बच्चे नहीं भी जा रहे होते हैं तो भी विशू को अकेले ही ले जाते हैं | बहुत ही बेहतरीन इंसान , बिरले ही मिलते हैं ऐसे लोग |
यहाँ की एक प्रथा हैं कि आप किसी से भी मुखातिब होते हैं तो वो आपकी कुशलछेम जरूर पूछता है और आपसे भी उम्मीद की जाती हैं कि आप भी पूछें | शुरुवात में दिक्कत हुई लेकिन अब आदत पड़ गयी हैं , कोई भी हो , गार्ड , ड्राइवर , स्वीपर या ग्राहक , सबका कुशलछेम पूछना ही हैं | बिलकुल शांति पसंद लोग, लेकिन उतने ही संगीत और नृत्य प्रेमी |
कुल मिलाकर बड़ा सुखद अनुभव हैं यहाँ का और जो लोग भी अफ्रीका देखना चाहते हों वो यहाँ जरूर आएं | कुछ और बातें फिर कभी , लेकिन अपना देश तो शिद्दत से याद आता है |