Translate

Tuesday, December 31, 2019

पहली औलाद-लघुकथा

"हाय डैड, कैसे हैं आप? सब ठीकठाक है ना, मैं कई महीनों से आने की सोच रहा हूँ लेकिन क्या करूँ?, वीडियो काल पर रोहन सुदूर अटलांटा से अपने डैड से बात कर रहा था.
"मैं ठीक हूँ बेटा, तुम लोग कैसे हो. नीनू कैसी है, अगर पास में है तो उससे भी बात करवाना", पिताजी ने अपनी इच्छा प्रकट की.
"नीनू तो अभी नहीं है, वह दीप्ति के साथ सुपरमार्केट गयी है. अच्छा गोपाल कहाँ है, आपकी देखभाल तो ठीक से करता है ना, मैं उसके अकाउंट में बराबर पैसे भेजता रहता हूँ?, रोहन ने पूछा.
पिताजी ने एक लंबी सांस ली और मुस्कुराते हुए बोले "अरे गोपाल तो ग्रेजुएशन कर रहा है, और मेरा खूब ख्याल रखता है. मुझे तो लगता ही नहीं कि वह अपने परिवार का सदस्य नहीं है. अच्छा एक बात कहना चाह रहा था लेकिन समझ नहीं आ रहा था कि कैसे कहूं, कहीं तुम्हें बुरा न लग जाए?
"अरे बोलिये न डैड, वैसे भी सब कुछ तो आपको ही मैनेज करना है".
"मैं सोच रहा था कि गोपाल को अपना नाम दे दूँ. देखो तुम बुरा मत मानना, आखिर सब कुछ तो अब वही संभाल रहा है", पिताजी ने हिचकते हुए कहा.
रोहन ने कुछ पल के चुप्पी साध ली, पिताजी भी थोड़े तनाव में आ गए.
"आपने मेरे मन की बात छीन ली डैड, यह बात मैं चाह कर भी नहीं कह पाता. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप मुझसे बात करना बंद कर देंगे, मैं आपका पहला बेटा ही रहूँगा", रोहन ने एक जोरदार ठहाका लगाया. इधर फोन पकड़े पिताजी के कोर भी भींग गए.

Wednesday, November 13, 2019

जिम्मेदारियाँ--लघुकथा

आज वह सोचकर आया था कि पापा से नई घडी और पैंट शर्ट के लिए कह ही देगा. अब तो स्कूल के बच्चे भी कभी कभी चिढ़ाने लगे थे. लेकिन घर की हालत देखकर उसकी कहने की इच्छा नहीं होती थी. जैसे ही वह पापा के कमरे में पहुंचा, पीछे पीछे उसका चचेरा भाई भी आ गया. अभी वह कुछ कहता तभी उसके चचेरे भाई ने अपनी फरमाईस रख दी "बड़े पापा, मेरी साइकिल बिलकुल खचड़ा हो गयी है, इस महीने नई दिला दीजिये".
पापा ने उसकी तरफ प्यार से देखते हुए कहा "ठीक है, इस बार बोनस मिलना है, जरूर खरीद दूंगा. लेकिन संभाल कर चलाना, गिरना मत".
चचेरा भाई प्रसन्न मन से चला गया, उसको लगा कि पापा से इस समय कहने में कोई दिक्कत नहीं है. उसने पापा की तरफ देखा तभी पापा ने पूछ लिया "सब ठीक है ना रवि, पढ़ाई बढ़िया चल रही है तुम्हारी?
"पढ़ाई बढ़िया चल रही है पापा, बस एक नई घड़ी और पैंट शर्ट चाहिए थी", उसने उत्साहित होकर कहा.
पापा की नजरें जैसे कहीं दूर खो गयीं, फिर वह उसकी तरफ देखते हुए बोले "देखता हूँ, इस बार तो छोटे की साइकिल जरुरी है, तुम्हारे सामने ही तो उसको बोला है. अगर पैसे बचे तो जरूर खरीद दूंगा".
इतना बोलकर पापा बाहर निकल गए, उसके मन में आक्रोश भर गया. वह दौड़ते हुए माँ के पास गया और लगभग चिल्लाते हुए बोला "माँ, पापा छोटे की हर बात मान लेते हैं लेकिन मेरे लिए उनके पास पैसा ही नहीं रहता है. आखिर चाचा छोटे के लिए क्यों नहीं खरीदते हैं".
माँ ने उसको पुचकारते हुए अपने पास बैठाया और समझाने लगी "अरे तेरे चाचा कहाँ कमा पाते हैं, पैसा तो तेरे पापा ही कमाते हैं. लेकिन घर के बड़े होने की जिम्मेदारियां भी बहुत बड़ी होती हैं, तुझे भी बाद में समझ आएगा". 
माँ अपने हिसाब से उसे समझाने की कोशिश कर रही थी लेकिन उसे फिलहाल यह गणित समझ में नहीं आ रहा था.

Monday, October 7, 2019

उसका हक़- लघुकथा

जैसे ही छोटू के रोने की आवाज मालती के कानों में पड़ी, वह उठकर भागी. दूसरे कमरे के उसके बिस्तर पर लेटे छोटू की नींद खुल गयी थी, शायद उसने नैप्पी भी गीला कर दिया था.
"अले ले, जग गया मेरा राजा बेटा, भुक्खू लगी है क्या?, मालती ने उसे उठाकर प्यार करना शुरू किया और उसे लाड़ करती हुई ड्राइंग रूम में आ गयी.
ड्राइंग रूम में एक कोने में वह बैठा हुआ अखबार पढ़ रहा था, मालती और छोटू के मिले जुले स्वर से उसकी तन्द्रा भंग हुई. उसके चेहरे पर भी उनको देखकर मुस्कराहट आ गयी. वह उठकर छोटू को लेने ही जा रहा था कि उसकी निगाह छोटी सी कुर्सी पर बैठे बड़े बेटे रोहन पर पड़ी. रोहन का चेहरा तना हुआ था और वह चाह कर भी कुछ बोल नहीं पा रहा था. लेकिन उसके हाव भाव सब कुछ बयां कर रहे थे.
बचपन से ही मंद बुद्धि और बोल सकने में असमर्थ रोहन का वह दोनों यथासंभव ख्याल रखते और छोटू के जन्म के पहले तो मालती के लिए वही सब कुछ था. लेकिन जब से छोटू पैदा हुआ था, मालती चाहकर भी उसे वह समय नहीं दे पा रही थी जो उसे पहले मिलता था. उसने पिछले कुछ समय से यह महसूस किया था और एकाध बार मालती से कहा भी लेकिन उसने हंसकर टाल दिया.
"तुम्हें बेकार का वहम हो रहा है, देखते नहीं हो कि रोहन भी छोटू के साथ कितना खेलता है", मालती शायद वह नहीं देख पा रही थी जो उसे दिखाई दे रहा था.
उसने एक बार मालती की तरफ देखा, वह अभी भी छोटू को हवा में उछाल रही थी. दूसरी तरफ रोहन के चेहरे पर तनाव बढ़ता जा रहा था, उसने कुछ सोचा और उसके कदम रोहन की तरफ बढ़ गए. 

Thursday, September 26, 2019

समीकरण- लघुकथा

अचानक उसे लगा कि पीछे से किसी ने नाम लेकर पुकारा, उसने साइकिल रोकी और पलट कर देखा. थोड़ा पीछे ही उसके परिचित वकील साहब खड़े थे और उसकी तरफ इशारा कर रहे थे. वह साइकिल धीरे धीरे चलाते हुए वकील साहब के पास पहुंचा और उनको नमस्ते किया.
"क्या बात है मैनेजर साहब, आज साइकिल चला रहे हैं. गाड़ी पंचर हो गयी है या खराब है", वकील साहब ने मुस्कुराते हुए पूछा.
उसे हंसी आ गयी, वह क्या साइकिल सिर्फ तभी चला सकता है जब उसकी गाड़ी खराब हो. फिर उसने हँसते हुए ही कहा "अरे नहीं वकील साहब, गाड़ी ठीक है. बस यूँ ही साइकिल चला रहा था, सेहत के लिए ठीक रहता है".
वकील साहब ने अपना सर हिलाया और कुछ बुदबुदाए जो उसे सुनाई नहीं पड़ा.
"आप भी साइकिल चलाया कीजिये, अब आपकी भी उम्र हो चली है, थोड़ी एक्सरसाइज हो जायेगी", उसने वकील साहब को लक्ष्य करते हुए कहा.
वकील साहब ने इंकार में सर हिलाया, उसे लगा शायद उम्र के चलते वह मना कर रहे हों.
"अरे आपकी इतनी भी उम्र नहीं हुई है कि आप साइकिल नहीं चला सकें, चलाया कीजिये", उसने फिर कहा.
"आप नहीं समझेंगे मैनेजर साहब, मेरे लिए साइकिल चलना संभव नहीं है", वकील साहब ने थोड़ा उदास होते हुए कहा.
उसे लगा कि शायद वकील साहब शर्म के मारे साइकिल नहीं चलाते होंगे, तो उसने फिर पूछ लिया "अरे इसे चलाने में कैसी शर्म, देखिये मैं तो बड़े मजे में चला रहा हूँ". 
वकील साहब ने एक लम्बी सांस ली और कहा 'आप नहीं समझेंगे मैनेजर साहब, मैं चाह कर भी साइकिल नहीं चला सकता. आपकी अपनी एक हैसियत है समाज में, आप साइकिल से घूमेंगे तो लोग आपकी तारीफ़ करेंगे कि देखो इतना बड़ा अधिकारी होकर भी साइकिल से घूम रहा है"
वकील साहब थोड़ी देर के लिए रुके और फिर बोले "लेकिन मेरा पेशा ऐसा है कि अगर मैं साइकिल से घूमने लगा तो लोग कहना शुरू कर देंगे कि देखो इस वकील को, एकदम फटीचर हो गया है, लगता है इसकी प्रैक्टिस बिलकुल नहीं चलती. और इसके चलते शायद मेरे यहाँ आने वाले कुछ क्लाइंट भी कम हो जाएं".
इतना कहकर वकील साहब ने नमस्कार किया और आगे बढ़ गए, वह साइकिल पकड़े समाज के इस समीकरण को सोचता रह गया.

Friday, September 20, 2019

व्यस्तता- लघुकथा

"अब गांव चलें बहुत दिन बिता लिए यहाँ", शोभाराम ने जब पत्नी ललिता से कहा तो जैसे उनके मुंह की बात ही छीन ली.
लेकिन बेटे और बहू से क्या कहेंगे, गांव पर तो कोई रहता नहीं था,पट्टीदारों के अलावा. वैसे वहां पर अपने हिसाब से जीने की आज़ादी थी लेकिन यहाँ भी तो है ही, कोई बंधन नहीं है. उनके दिमाग में कई दिनों से यह सब घूम रहा था.
"अच्छा यह बताओ, आखिर क्या कह कर गांव जाओगे. बेटा तो यही कहकर शहर लाया था कि गांव में अकेले रहते हैं, कौन है जो आपका अकेलापन बाँटने के लिए", ललिता के सवाल पर लाजवाब हो गए शोभाराम.
बात भी सही थी, न तो बहू का वर्ताव ऐसा था जिससे कोई शिकायत की जा सके और न बेटे का. बच्चे भी रोज एकाध बार उनके पास आ ही जाते थे, ये अलग बात थी कि वे अपने फोन में ही कुछ दिखाने आते थे. 
आखिर ललिता ने चुप्पी तोड़ी "लेकिन यह कौन सी बात है कि सब अपने फोन में ही लगे रहते हैं, न तो आपस में बात करते हैं और न हमसे. इससे तो अच्छे गांव में ही थे जहाँ पड़ोसी बातचीत तो करते थे".
शोभाराम ने सहमति में गर्दन हिलायी और कुछ बोलते उसके पहले ही बहू आयी "आपकी चाय ठंडी हो रही है पिताजी", और फोन को देखते हुए बाहर निकल गयी.
शोभाराम ने ललिता को देखा और दोनों धीरे धीरे अपने कमरे से बाहर आ गए. सोफे पर बैठे हुए बेटे के हंसने की आवाज आ रही थी, कोई चुटकुला पढ़ लिया था उसने अपने फोन में.  

Wednesday, September 11, 2019

उजास- लघुकथा

घर तक पहुँचते पहुँचते वह बिलकुल थक के चूर हो गया था, थकान सिर्फ शारीरिक होती तो और बात थी, वह मानसिक ज्यादा थी. आज भी कुछ लोगों की खुसुर फुसुर उसके कानों में पड़ गयी थी "अरे ये तो सरकारी दामाद हैं, इनको कौन बोल सकता है, जो चाहे करें".  जैसे ही वह सोफे पर बैठा, उसकी नजर सुपुत्र राघव पर पड़ी. उसकी कुहनी पर खून के दाग थे लेकिन वह मजे में खेल रहा था.
"बेटा राघव, यहाँ आओ. यह चोट कैसे लग गयी", उसने जैसे ही कहा, राघव को अपने चोट का ध्यान आया. वह लड़खड़ाते हुए पापा की तरफ आया और उसकी शिकायत शुरू हो गयी "बहुत गन्दा स्कूल है पापा, सब बच्चे मुझे बहुत चिढ़ाते हैं. आज तो मैदान में किसी ने धक्का दे दिया और मैं गिर पड़ा, देखो खून भी निकल आया".
"अच्छा चलो दवा लगा देता हूँ, घाव ठीक हो जायेगा. एक काम करता हूँ, तुम्हारा नाम किसी और स्कूल में लिखवा देता हूँ, ऐसे गंदे बच्चों से तो पीछा छूटेगा", उसने गंभीरता से कहा.
राघव, जो अभी तक शिकायत के ही मूड में था, वह चौंक सा गया. उसने पापा की तरफ गौर से देखा और बोला "नहीं पापा, मुझे स्कूल नहीं बदलना है. मेरे कितने ही दोस्त हैं जो मेरा ध्यान रखते हैं, मैं वहीँ पढूंगा".
वह सोच में पड़ गया, राघव के पैरों में समस्या थी जिसके चलते वह लंगड़ाकर चलता था. इस वजह से बच्चे उसे बहुत चिढ़ाते थे, यह भी उसे मालूम था. लेकिन फिर भी वह अपने कुछ अच्छे दोस्तों के चलते स्कूल छोड़ने के लिए राजी नहीं था. और वह अपने कुछ कलीग्स के मानसिक विकलांगता के चलते इस्तीफा देने तक के बारे में सोच रहा था.
"तो फिर पार्क में चलें, रेस लगाते हैं", उसने राघव को गोद में उठाते हुए कहा. राघव के चेहरे पर खिलखिलाहट फ़ैल गयी, उसने उस खिलखिलाहट को अपने अंदर भी भर लिया.

Monday, September 9, 2019

अब बात कुछ और है- लघुकथा

लगभग १५ मिनट बीत गए थे उस रेस्तरां में बैठे हुए, अभी तक खाना सर्व नहीं हुआ था. कलीग के बच्चे के ट्वेल्थ के रिजल्ट की ख़ुशी में आज दोनों फिर उस रेस्तरां में आये थे. अमूमन इतनी देर में बौखला जाने वाली उसकी कलीग ख़ामोशी से मेनू को उलट पलट कर देख रही थी. उसे थोड़ा अजीब लगा, उसने यूँ ही कहा "कितना समय लेते हैं ये बड़े होटल वाले खाना सर्व करने में, मुझे तो समझ ही नहीं आता. वैसे आज तुम कुछ बोल नहीं रही हो, क्या बात है?
कलीग ने सर उठाकर उसकी तरफ देखा और मुस्कुराते हुए बोली "अरे समय लग जाता है, ये लोग कोई खाना बनाकर नहीं रखते, आर्डर देने पर ही बनाते हैं".
"अच्छा, पहले तो मैं यह दलील देता था तो तुम उखड़ जाती थी कि यह तो इनका काम है तो जल्दी करें, हमारे समय की कीमत नहीं है क्या?
बहरहाल अगले दस मिनट में खाना टेबल पर था और दोनों खाने में लग गए. पनीर कुछ ख़ास नहीं था और दाल तड़का भी जैसे तड़क नहीं था. उसे लगा अब पक्का यह चिल्लायेगी लेकिन वह ख़ामोशी से खाना खाती रही.
उसने फिर कुछ कहना चाहा लेकिन कलीग ने जैसे भांप लिया "अब कोशिश तो कोई भी अच्छा बनाने की ही करता है, वैसे खाना स्वादिष्ट था".
उसे सब कुछ अजीब लग रहा था लेकिन अब चुप रहने में ही उसने भलाई समझी. कलीग ने पैसे देने के लिए अपना बैगनुमा पर्स खोला. उसकी नजर बैग पर पड़ी, अंदर होटल मैनेजमेंट के एक कालेज का ब्रोशर दिखाई दे रहा था.     

Monday, August 26, 2019

मंडप में बैठा वह सोच रहा था, कहाँ उसका कुरूप चेहरा और कहाँ यह बेहद खूबसूरत लड़की. लेकिन अब हो भी क्या सकता था, बात इतना आगे बढ़ चुकी थी 

Thursday, August 22, 2019

तबादला - एक अधूरी कहानी

थोड़ी उत्सुकता तो उसको भी थी क्योंकि वहां का लगभग हर कर्मचारी उसके बारे में बता चुका था, सिर्फ वही नहीं आ रहा था. दो दिन पहले ही उसका तबादला यहाँ हुआ था, नया शहर और एकदम नए लोग. अब कोई भी नयी जगह हो तो शुरुआत में मुश्किल तो होती ही है, अपनी पुरानी जगह भी बहुत शिद्दत से याद आती है. अच्छे लोग, साथी कर्मचारी और पुराना वातावरण तो याद आता ही है, कुछ ऐसे लोग भी, जिन्हें आप सख्त नापसंद करते हों, वह भी ऐसे में यादों के कोने में अपनी उपस्थिति दर्ज करा देते हैं.
लेकिन उसे, मतलब मनोहर लाल वर्मा को नयी जगहों पर जाना और नए लोगों से मिलना बहुत पसंद है. उसकी पत्नी तो कहती भी है "तुम्हें तो टूरिज्म डिपार्टमेंट में होना चाहिए था, कहाँ से इस गलत डिपार्टमेंट में आ गए. जब भी मौका मिले, फटाक से तबादला करा लेना उस विभाग में". अलबत्ता ये बात दोनों ही जानते थे कि उसे इसी विभाग से सेवानिवृत्त होना है. खैर पत्नी की तो अब आदत पड़ गयी है लेकिन उसके तबादले से बच्चे अभी भी चिढ़ जाते हैं. अब ये भी बात नहीं है कि वह तबादला जानबूझ कर करवाता है, लेकिन उसकी कार्यप्रणाली ही ऐसी है कि लोग उसे ज्यादा दिन झेल नहीं पाते. वैसे भी आजकल ईमानदार अधिकारी कौन बर्दास्त कर पाता है, सबको तो ऐसा अधिकारी चाहिए जो खुद भी प्रसन्न रहे और अपने मातहतों को भी प्रसन्न रखे.
इस कार्यालय का पहला दिन तो बस लोगों से मिलते जुलते ही बीत गया. वैसे भी व्यक्ति के ख्याति की गति किसी भी वाहन से तेज होती है, क्योंकि उसकी ख्याति उसके पहुँचने से पहले ही पहुँच जाती है. उसके पोस्टिंग के चलते वहां के कर्मचारियों ने तो अपना सर पीट ही लिया था, लेकिन सबको यह सुकून भी था कि वह किसी भी जगह ज्यादा दिन नहीं टिकता है. मतलब बला चाहे जैसी भी हो, जल्द ही कट जायेगी. वैसे भी दुःख चाहे जितना भी बड़ा हो, अगर यह पता चल जाए कि वह कुछ दिन का ही मेहमान है, तो उसे बर्दास्त करना बहुत आसान हो जाता है. मानव स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि उसे दुःख तो ऐसा चाहिए जिसकी मियाद कम हो और सुख के मामले में वह मियाद को बीच में लाना ही नहीं चाहता, मतलब बेमियादी सुख.
रात में पत्नी ने फोन किया "कैसा लग रहा है, ऑफिस तो ठीक ही होगा, बस लोग दुखी होंगे, है ना?
उसकी हंसी फूट गयी, उसको तो उसकी पत्नी उससे ज्यादा समझती है. उसने इकरार में सर हिलाया तो अगला सवाल आया "हम लोगों को कब तक निकलना है, बच्चों के स्कूल में टी सी के लिए अप्लाई कर दिया है. सामान समेटने तो आओगे या पिछली बार की तरह मुझे ही सब करना पड़ेगा".
कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनके जवाब वक़्त ही देता है. अब पिछली बार उसे कहाँ पता था कि वह सामान बंधवाने भी नहीं जा पायेगा, बमुश्किल दो दिन कि छुट्टी मिली थी और जाकर सामान सहित वापस आ गया था. खैर उसने दिलासा दिया "तुम तैयारी रखो, मैंने पैकर वाले को बोल दिया है. जैसे ही छुट्टी मिलती है, आ जाऊँगा. वैसे यह जगह बहुत दिलचस्प है, इसे आगरा के समकक्ष रख सकती हो". 
आखिरी वाक्य पर पत्नी चौंकी "आगरा के समकक्ष, अरे वह तो औरंगाबाद है जहाँ बीबी का मकबरा है, बिलकुल ताजमहल की रेप्लिका. बुरहानपुर में ऐसा क्या है?
"तुम आना तो खुद ही देख लेना, वैसे जानकारी के लिए बता दूँ कि मुमताज बेगम की मौत यहीं पर हुई थी और उनको यहाँ पर लगभग छह माह तक दफनाया भी गया था. खैर जैसे ही छुट्टी मिलती है, बताता हूँ", और उसने फोन काट दिया.
परसों रविवार है और उस दिन मुमताज बेगम की पुरानी कब्र को देखने वह जरूर जाएगा. भोपाल से बुरहानपुर की दूरी तो बहुत ज्यादा नहीं थी लेकिन सड़क मार्ग थोड़ा गड़बड़ था. वैसे ट्रेनों की संख्या ठीकठाक थी और उससे पहुँचने में समय भी काफी कम लगता था. इसलिए उसने भोपाल से जाते समय ट्रेन ही पसंद किया था. बस एक फ़र्क़ था भोपाल और बुरहानपुर में, जहाँ भोपाल में पेड़ पौधे, हरियाली और अच्छी सड़कें थीं, वहीँ बुरहानपुर में काफी गर्मी थी और इसकी एक वजह जो उसे महसूस हो रही थी, वह थी पेड़ों की कमी. कसबे की सड़कें शाम होते होते पिघल सी जाती थीं और कई बार उसे लगा जैसे उसके जूते सड़क से चिपक कर रह जाएंगे। कूलर की हवा दिन में ऑफिस में तो राहत देती लेकिन शाम को ऑफिस से निकलते ही लू के थपेड़े हालत खराब कर देते थे.
अगले दिन सुबह रोज से कुछ मिनट पहले ही मनोहर अपने कार्यालय में था. कुछ ही देर में लोगों का आना प्रारम्भ हो गया और एक नया चेहरा उसकी नजर में आया. यक़ीनन यह वही होगा, उसने सोचा और अपनी कुर्सी पर बैठे बैठे उसका इंतजार करने लगा.
"मैं अंदर आ जाऊँ सर", उसकी आवाज ने उसे सोच की दुनिया से बाहर निकाल लिया।
"आईये, कैसे हैं आप? उसने मुस्कुराते हुए कहा तो वह भी मुस्कुरा पड़ा.
"मैं शिवचरन, यहाँ पर अकाउंटेंट हूँ. आपके बारे में बहुत सुना है सर", गंभीर आवाज में शिवचरन ने कहा.
"अरे बैठिये शिवचरन जी, मैंने भी आपके बारे में बहुत सुना है. उम्मीद है कि हम दोनों की अच्छी निभेगी, आपके और मेरे विचारों में बहुत साम्य है".
शिवचरन मुस्कुरा दिए, बहुत कम अफसर ऐसे मिले थे जिन्होंने उसे पसंद किया था. दरअसल गलत कार्यों से दूर रहने की प्रवृत्ति के चलते उनको विभाग में अक्सर किनारे कर दिया जाता था. और उनको कुछ लोग तो दबी जबान में बेवकूफ भी कहते थे जो बहती गंगा में हाथ नहीं धोता है. अब ऐसे में अगर अफसर बोले कि हमारी अच्छी निभेगी तो शिवचरण का खुश होना स्वाभाविक था. 

Monday, August 5, 2019

हवस - लघुकथा

पिछले दो घंटे से उसका परिवार इस टाइगर रिज़र्व में घूम रहा था. मौसम भी बेहद शानदार था इसलिए सब खुश थे. अभी तक काफी जानवर दिखाई पड़ गए थे लेकिन शेर से सामना नहीं हुआ था. गाइड लगातार बता रहा था कि वह ऐसी जगह ले चलेगा जहाँ कई शेर देखने को मिलेंगे, पहले बाकी जानवर देख लिए जाएँ. उसने भी सहमति दे दी और उनकी जीप धीरे धीरे जंगल में घूम रही थी.
"अरे यहाँ सिग्नल कमजोर है, आवाज कट रही है. मैंने एक मैसेज किया है, उसे पढ़कर लेक के किनारे वाले फ्लैट की रजिस्ट्री की तैयारी कर लो. मैं परसों तक आ जाऊंगा, मैसेज का जवाब जरूर भेज देना", उसने लगभग चिल्लाते हुए फोन पर बोला. गाइड लगातार उसे शांत रहने का इशारा कर रहा था "सर, यहाँ शोर मत मचाइए, जानवर डिस्टर्ब हो जाते हैं".
एक बार उसके दिल में आया कि वह गाइड को डपट दे, जानवर डिस्टर्ब हो जाते हैं. उसको क्या पता कि उसके इस फ्लैट की रजिस्ट्री कितने दिन से अटकी पड़ी थी, घूमने का मजा किरकिरा हो जाता अगर यह गड़बड़ा जाता. लेकिन उसने पत्नी को अपनी तरफ घूरते पाया तो खामोश रह गया.
"आज रजिस्ट्री का फाइनल हो जाएगा, कितने दिन से फंसा था मामला. आखिरकार सभी बच्चों के नाम एक एक फ्लैट हो गए", उसने खुशी से उछालते हुए पत्नी से कहा. पत्नी ने भी मुस्कुराकर उसका हाथ दबा दिया.
"वो देखिये, दो शेर एक साथ, मैंने कहा था ना", गाइड ने एक तरफ इशारा करते हुए धीरे से कहा.
सब लोग उस तरफ देखने लगे, एक भैंसे के शरीर का कुछ हिस्सा बगल में पड़ा था और शेर आराम से लेटे हुए थे. बेटे ने थोड़ी देर बाद आश्चर्य से पूछा "गाइड अंकल, ये शेर आराम से लेटे हुए हैं, कुछ दूर खड़े हिरन को मार क्यों नहीं रहे?
गाइड ने उसकी तरफ देखते हुए जवाब दिया "बेटे, ये जानवर बस उतना ही खाते हैं जितने से उनकी भूख मिट जाए, उनको ज्यादा की हवस नहीं होती".

Tuesday, July 30, 2019

अपनी पहचान- लघुकथा

बादल तो कई घंटों से छाये हुए थे लेकिन बूंदें बरसने का नाम ही नहीं ले रही थीं. पूरा महीना बीतने को आया, इस बार धान का बेहन तक नहीं पड़ पाया है, राजन खेत के मेड़ पर बैठा यही सब सोच रहा था. घर में जाने पर घरवाली का चिंतित चेहरा देखकर उसको सहन नहीं होता था. दरअसल वह कुछ कहती नहीं थी, बस ख़ामोशी से उसका मुंह देखती. और उसका कुछ नहीं बोलना ही उसे अंदर तक सालता था. पिछले साल तो फिर भी जुलाई के आखिर में बारिश हो गयी थी और उसने धान का बेहन डाल दिया था.
"तुम भी आ जाओ शहर, गांव में कुछ नहीं रक्खा है. कम से कम यहाँ दिन भर की मेहनत के बाद रोटी तो नसीब हो जाती है, रहने के लिए भले नर्क जैसी जगह है", पिछले हफ्ते भी उसके दोस्त हरी ने फोन पर कहा था. उसने मना कर दिया था, यहाँ उसकी पहचान तो है, वहां कौन पहचानेगा. घरवाली से भी जब उसने बात की तो उसने भी हामी नहीं भरी. वह भी एक किसान की बेटी थी और अब तक के जीवन में उसने खेती बाड़ी के अलावा कुछ नहीं देखा था.
"थोड़ी दिक्कत तो है लेकिन चला लेंगे गृहस्ती किसी तरह. मेरे मामा भी शहर रहते हैं, मैं एक बार कुछ दिनों के लिए वहां गयी थी लेकिन उस बदबू और घुटन में मैं जी नहीं पाउंगी", घरवाली ने धीरे से कहा था.
एक ही तो गाय है घर में और दो लोग, चला लेंगे किसी तरह से, सोचते हुए वह उठा. कुछ कदम ही चला होगा कि बरसात शुरू हो गयी और घर तक पहुँचते पहुँचते जम के बारिश हो रही थी. दरवाजे पर एक तरह उसकी गाय तो दूसरी तरफ घरवाली बरसात में भींग रहे थे, मानो पिछले कई महीने के सूखे को शरीर से निकाल फेंकना चाहते हों. उसने धीरे से घरवाली का हाथ पकड़ा और दोनों देर तक उस बरसात में भीगते रहे.

Wednesday, July 17, 2019

बाढ़ का पानी- लघुकथा

सुबह से हो रही मूसलाधार बरसात रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी, अब तो दोपहर होने वाली थी. पिछले कई दिनों से बादल छाते तो थे लेकिन बरसने में कंजूसी कर देते थे, मानो इसरार की कामना रखते हों. मौसम पिछले कुछ दिनों की तुलना में काफी अच्छा हो गया था, उमस ख़त्म हो गयी. उसके इलाके में पानी भरने लगा था और आज वह काम पर भी नहीं जा पाया. दुकान में उसका एक दोस्त भी काम करता था, जिसने उसकी नौकरी लगवाई थी, ने मालिक को उसके न आ पाने का बता दिया था.
कल रात की उमस में जब वह खाना खाकर पड़ोस के रहमान भाई के यहाँ टी वी देखने गया तो उसके जिले से आने वाली खबरों ने उसे दहला दिया था. रात में ही उसने फोन किया, उसका गाँव अभी तक तो बाढ़ के प्रकोप से बचा था. लेकिन बाढ़ का पानी कभी भी उसके गाँव में घुस सकता था. बाबूजी ने उसे आस्वस्त कर दिया कि पूरा गाँव तैयार है और जैसे ही पानी नजदीक पंहुचेगा, वह लोग निकल जाएंगे.
वह भीगता हुआ फिर से रहमान भाई के घर पंहुचा, उसकी थोड़ी देर पहले ही गाँव पर बात हुई थी, लोग गाँव छोड़कर जा रहे थे. पानी अब धीरे धीरे रहमान भाई के घर के पास बहने लगा था और उनके बच्चे उस पानी में उछल कूद मचा रहे थे. उसको देखते ही वह चिल्लाये "अंकल, देखिये बाढ़ का पानी इधर भी आ गया. खूब मजा आ रहा है".
उसके अंदर एक झुरझुरी सी उठी, उसे तीन साल पहले का मंजर याद आ गया. बाढ़ ने उसका घर तो ढहा ही दिया था, घर की इकलौती गाय भी बाढ़ की भेंट चढ़ गयी थी. और फिर उसे अपना गाँव और परिवार छोड़कर महानगर के इस बजबजाते जगह पर रहना पड़ रहा था. पिछले दो साल की कमाई से उसका गाँव का घर किसी तरह बस रहने लायक ही बन पाया था. दरवाजे के सामने ही खड़ा वह बच्चों को खेलते देख रहा था, तभी उसके मुंह से अस्फुट स्वर में आवाज आयी "बाढ़ के पानी में मजा नहीं आता, बिलकुल नहीं आता".

Monday, July 1, 2019

एक पत्र परमात्मा के नाम

डिअर भगवान, अल्लाह या जीसस
आज बहुत सोचने विचारने के बाद मैं यह पत्र आप सब को लिख रहा हूँ. दरअसल मैं बहुत उलझन में पड़ गया हूँ कि आखिरकार आप सब एक हैं या अलग अलग हैं. क्यूंकि एक धर्म का कोई भी इंसान दूसरे धर्म के परमात्मा को मानने को तैयार ही नहीं होता, सब यही कहते हैं कि उनका वाला ही सही है. अब ऐसे में मेरा बचपन में पढ़ा हुआ वह पाठ कि ऊपर वाला सिर्फ एक ही है, गड़बड़ा जाता है. खैर इसके बावजूद मैं फिलहाल अपने धर्म के परमपिता को ही मान कर आगे बढ़ता हूँ.
अब आप सोच रहे होंगे कि मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ और एक चिट्ठी में भला क्यूँ लिख रहा हूँ. दरअसल मैंने जब भी इस सन्दर्भ में किसी से बात करने की कोशिश की तो उसने इसका संतोषजनक जवाब नहीं दिया. सब लोग बस एक ही बात कहकर निकल जाते हैं कि उनका वाला परमपिता ही इस दुनिया का भला करता है और बाकी सब धर्मों में बस यूँ ही लिखा गया है. खैर मुझे इससे भी बहुत दिक्कत नहीं होती लेकिन जब दुनिया में चारो तरफ तकलीफ और परेशानियों में जूझते लोगों को देखता हूँ तो मेरा मन होता है कि मैं आपसे मिलकर पूछूं कि आखिरकार ऐसा क्यूँ है.
इस पत्र लिखने के पीछे एक और वजह है, और वह है मेरा एक दोस्त जो इन सब चीजों, मतलब भगवान, अल्लाह या जीसस की उपस्थिति को ही बेबुनियाद मानता है. वह इन सब चीजों को पाखंड मानता है और कहता है अगर तुम्हारे भगवान या अल्लाह या जीसस हैं और यह सब घटित होते हुए देख रहे हैं तो फिर उनके रहने या न रहने से क्या फ़र्क़ पड़ता है. अब कुछ दिन ही पहले मुजफ्फरपुर में घटित हुए घटना, जिसमें २०० से ज्यादा बच्चे कालकलवित हो गए, के बारे में उसने मुझसे पूछा कि क्या यह तुम्हारे परमात्मा के रहते उचित था. साथ ही साथ जब उसने मुझसे पूछा कि क्या इसमें से एक भी बच्चा किसी धनी, समर्थ या ताक़तवर परिवार का था तो मुझे कुछ जवाब देते नहीं सूझा. उसने कहा कि अगर कोई तुम्हारा परमपिता है तो वह सिर्फ समर्थ या ताक़तवर (जिन्हें मैं चोर, भ्रष्ट या लुटेरा कहता हूँ), के लिए ही है.
उसने मुझसे पूछा कि बचपन से हम तुम पढ़ते आये हैं कि बुरे काम का अंजाम बुरा होता है, गलत तरीके से कमाया गया धन काम नहीं आता या हमेशा सच्चाई की राह पर चलना चाहिए. लेकिन आज तुम यह बताओ कि क्या वास्तव में बुरे काम का अंजाम बुरा होता है. देश के जितने भी नेता या ब्यूरोक्रेट हैं, उनमें से लगभग ९५ प्रतिशत चोर, भ्रष्ट और पैसे के लिए किसी की जान भी ले लेने वाले हैं. लेकिन तकलीफ में कौन है, कौन दवा की कमी से मरता है, कौन इनका विरोध करके बच पाता है, कौन है जो सही तरीके से पैसे कमाकर इतना बड़ा इंसान बनता है कि वह अपनी आने वाली कई पुश्तों के लिए भी धन संपत्ति बना जाए. वह मुझसे पूछता है कि किन्हीं दस नेताओं के नाम गिना दो जो सत्ता सुख लिए हुए हैं और कम उम्र में मौत के मुंह में चले जाते हैं. देश का शायद ही कोई नेता या अफसर ८० साल की उम्र जीने से पहले मरता है. और इसी देश में मजदूर और गरीब हैं जो अपनी युवावस्था में ही बुजुर्ग दिखते हैं और रिटायरमेंट की उम्र के बहुत पहले ही किसी न किसी रोग या महामारी के चपेट में आकर गुजर जाते हैं. किसी भी सरकारी या अर्धसरकारी विभाग में बड़े अफसरों की माली हालत देख लो, उनके बच्चों को देख लो, सब एकदम व्यवस्थित जिंदगी जी रहे हैं. अगर बुरे तरीके से कमाए हुए पैसों से बरक्कत नहीं होती या इनके बच्चे खराब निकलते तो शायद उन कहावतों में कोई अर्थ होता. अक्सर आई ए एस अफसर का लड़का आई ए एस ही बनता है और पिता ने जो लूट की होती हैं उससे वह कई गुना लूट मचाता है. कहीं कोई दिक्कत नहीं, सब मजे में जीवन गुजारते हैं और एक दिन बेहद धूम धड़ाके के साथ दुनिया को अलविदा कह जाते हैं. इक्का दुक्का लोग भ्रष्टाचार में पकडे जाते हैं और उनमें से भी अधिकांश बरी हो जाते हैं. एकाधा नेता या अफसर जेल की सलाखों के पीछे जाता है लेकिन एकाधा तो अपवाद होते हैं, नियम तो अधिकांश लोगों से होता है.
वह फिर कहता है कि अब मुझे तो इस जन्म में किसी बुरे को उसके कर्म का फल खाते नहीं देखा. जो जितना बुरा होता है वह उतनी ही बढ़िया जिंदगी बसर करता है. इनके गलत काम का विरोध करने वाले अलबत्ता बेमौत मारे जाते हैं. हाँ यह जरूर है कि जो व्यक्ति ईमानदारी की राह पर चलता है उसे वह सारी तकलीफें झेलनी पड़ती हैं, जो शायद बुरे या भ्रष्ट इंसान को झेलने चाहिए (यही तो हमने पढ़ा है और कितना गलत पढ़ा है). परमपिता को गरीबों, असहायों की रक्षा करनी चाहिए लेकिन वह इसके उलट ही कर रहा है और कमोबेश सारे पापी, भ्रष्ट और कुकर्मी सुरक्षित रहते हैं (कुछेक अपवाद हैं लेकिन वह अपवाद ही हैं).
खैर मेरे दोस्त की कुछ बातों को मैं आप तक पहुँचाने का प्रयत्न कर रहा हूँ, सवाल तो उसके बहुत सारे हैं लेकिन न तो इतना समय है कि पूछ सकूँ और न इसका कोई मतलब है. अगर संभव हो तो इन्हीं बातों का जवाब एक खत द्वारा भिजवा देना, शायद उसके साथ साथ मैं भी कुछ समझ सकूँ.
इसी धरती का एक इंसान 

Wednesday, June 12, 2019

जिंदगी की तपिश- लघुकथा

ऑफिस से बाहर निकलते ही उसका सर चकरा गया, गजब की लू चल रही थी. अब तपिश चाहे जितनी भी हो, काम के लिए तो बाहर निकलना ही पड़ता है. फोन में समय देखा तो दोपहर के ३.३० बज रहे थे. इस शहर में वह कम ही आना चाहता है, दरअसल मुंबई जैसे शहर में नौकरी करने के बाद ऐसे छोटे शहरों और कस्बों में उसे कुछ खास फ़र्क़ नजर नहीं आता.
सुबह आते समय तो ठीक था, लेकिन अभी उसे जाने के नाम पर ही बुखार चढ़ने लगा. स्टेशन से इस ऑफिस की दूरी बमुश्किल ३० मिनट की ही थी. लेकिन न तो यहाँ कैब थी और न ही किसी ऑटो के दर्शन हो रहे थे. अब इस धूप में वापस स्टेशन रिक्शे से जाना पड़ेगा, ट्रेन का टाइम भी हो रहा था. बाहर एक रिक्शा खड़ा था लेकिन रिक्शावाला नदारद था. उसने अहाते से ही "रिक्शा, रिक्शा" आवाज लगायी लेकिन कोई दिखाई नहीं दिया. मजबूरन उसे बाहर निकलना पड़ा, लू का थपेड़ा उसके चेहरे को जला गया. जैसे ही वह रिक्शे के पास पहुंचा, एक बुजुर्ग गमछे से चेहरा पोंछते वहां पहुंचा.
"कहाँ जाना है बाबूजी?
उसने एक बार उस बुजुर्ग को देखा और उसकी हिम्मत जवाब जवाब देने लगी. एक तो इतनी भयानक गर्मी, ऊपर से यह बुजुर्ग, कैसे खींचेगा रिक्शा. उसने अगल बगल देखा, दूर एक हटठा   कट्ठा रिक्शा वाला नजर आ रहा था. बुजुर्ग रिक्शावाला भी समझ गया, उसने रिक्शे की छतरी खोलते हुए कहा "बाबूजी, बैठ जाइये, इस रिक्शे से पूरा परिवार खींचता हूँ".
वह धीरे से रिक्शे पर बैठ गया और बोला "स्टेशन ले लो". लू की तपिश अब उसे कम लग रही थी.

Monday, June 10, 2019

माहौल का फ़र्क़- लघुकथा

"अरे महमूद भाई, कहाँ हो. आज सोसाइटी की मीटिंग में नहीं जाना क्या", रजनीश ने घर में कदम रखते हुए आवाज लगायी.
"आ रहे हैं भाई साहब, आजकल पता नहीं क्या हो गया है, ऑफिस से आने के बाद खामोश से रहते हैं", भाभीजान ने पानी का ग्लास रखते हुए कहा.
"कुछ परेशानी होगी ऑफिस की, मैं पूछता हूँ उससे. वैसे भी आजकल काम बहुत बढ़ गया है और तनाव भी", रजनीश ने सोफे पर बैठते हुए कहा और पानी का ग्लास उठा लिया.
"चाचू, मेरी चॉकलेट कहाँ है", कहते हुए छोटी आयी और रजनीश की गोद में चढ़ने लगी. रजनीश ने जेब से चॉकलेट निकाली और छोटी को पकड़ा कर उसे गोद से तुरंत उतार दिया.
"और मेरी किस्सी", छोटी मचली.
अमूमन ऐसे में छोटी को कस कर गोद में भर लेने वाला और उसे कई किस्सी देने वाला रजनीश आज रुक गया. छोटी चॉकलेट लेकर चली गयी, उसने ध्यान नहीं दिया लेकिन भाभीजान की नज़रों ने यह ताड़ लिया.
वह कुछ कहना चाह रही थीं लेकिन रजनीश ने उनके आगे हाथ जोड़ लिए. आज सुबह एक बच्ची के साथ हुए हादसे ने उसे बुरी तरह दहला दिया था.
--------------------------------------------------------------------
"अरे महमूद भाई, कहाँ हो. आज सोसाइटी की मीटिंग में नहीं जाना क्या", रजनीश ने घर में कदम रखते हुए आवाज लगायी.
"आ रहे हैं भाई साहब, आजकल पता नहीं क्या हो गया है, ऑफिस से आने के बाद खामोश से रहते हैं", भाभीजान ने पानी का ग्लास रखते हुए कहा.
"कुछ परेशानी होगी ऑफिस की, मैं पूछता हूँ उससे. वैसे भी आजकल काम बहुत बढ़ गया है और तनाव भी", रजनीश ने सोफे पर बैठते हुए कहा और पानी का ग्लास उठा लिया.
"चाचू, मेरी चॉकलेट कहाँ है", कहते हुए छोटी आयी और रजनीश की गोद में चढ़ने लगी. रजनीश ने जेब से चॉकलेट निकाली और छोटी को पकड़ा कर उसे गोद से तुरंत उतार दिया.
"और मेरी किस्सी", छोटी मचली.
अमूमन ऐसे में छोटी को कस कर गोद में भर लेने वाला और उसे कई किस्सी देने वाला रजनीश आज रुक गया. छोटी चॉकलेट लेकर चली गयी, उसने ध्यान नहीं दिया लेकिन भाभीजान की नज़रों ने यह ताड़ लिया. वह कुछ कहना चाह रही थीं लेकिन रजनीश ने उनके आगे हाथ जोड़ लिए.
"आज से अपने अलावा किसी को भी छोटी को हाथ मत लगाने दीजियेगा, मुझे भी. इस माहौल में अब तो अपने आप से भी भरोसा उठ गया है भाभीजान", रजनीश की आवाज कांप रही थी.


Sunday, June 9, 2019

अलग अलग कारण- लघुकथा

सुबह का अखबार जैसे खून से सना हुआ था, इतनी वीभत्स खबर छपी थी जिसकी कल्पना करके ही दिमाग सुन्न हो जा रहा था. सामने चाय की प्याली रखी हुई थी लेकिन उसे पीने की इच्छा मर चुकी थी. उसने अपना सर पकड़ा और बिस्तर पर ही निढाल हो गयी.
"क्या हो गया है इस समाज को, अब और कितना नीचे गिरेंगे हम लोग?, उसके मुंह से बुदबुदाहट की शक्ल में आवाज निकली. 
कुछ देर बाद कामवाली बाई आयी और उसने देखा कि चाय वैसे ही रखी है तो उसने टोका "मैडम, तबियत ठीक नहीं है क्या? मैं दूसरी चाय बना लाती हूँ और कोई दवा भी ला दूँ क्या?
उसने सर से हाथ हटाया और बाई को देखने लगी. कम उम्र की बाई सुबह सबसे पहले उसके घर ही आती थी और लगभग दोपहर में जाती थी. वापस शाम को आकर फिर रात में ही जाती थी, इसलिए वह उसे उसकी मेहनत से ज्यादा ही पैसा दे देती थी. 
"नहीं मैं ठीक हूँ, तू अभी चाय रहने दे, मन नहीं है", उसने उठते हुए कहा.
बाई ने चाय की ट्रे उठायी और जाते जाते बोली "मैडम, आज शाम को नहीं आउंगी, बिटिया का जन्मदिन है".
उसके चेहरे पर मुस्कराहट फ़ैल गयी, बहुत प्यारी बेटी थी बाई की. कभी कभी बाई उसको ले आती थी तो उसके साथ खेलकर उसे काफी अच्छा लगता था. घरपर वह अकेली ही रहती थी, बच्चे विदेश में थे और पति बहुत पहले ही साथ छोड़ गए थे.
"अच्छा यह बता, आज कहाँ लेकर जायेगी उसे", उसने बाई से पूछा.
बाई के चेहरे पर भी मुस्कराहट आ गयी "कहीं नहीं मैडम, उसे पार्क ले जाउंगी और फिर कुछ बाहर ही खिला दूंगी. ज्यादा रात में डर सा लगता है उस तरफ, इसलिए जल्दी ही घर लौट आउंगी".
उसका दिमाग फिर से उस खबर की तरफ चला गया, वह बच्ची भी तो इसकी बेटी की ही उम्र की थी. 
"तू एक काम कर, आज बेटी को लेकर यहीं आ जा, उसका जन्मदिन हम साथ साथ मनाएंगे. वैसे भी तू अकेली है आजकल, यहीं रुक जाना", उसने कहा तो बाई थोड़ा चौंकी, पहले वह कभी मैडम के यहाँ रात में बेटी के साथ नहीं रुकी थी.
"एक और बात, आगे से तू अपनी बेटी को दिन में यहीं छोड़कर जाया कर, मेरे साथ रहेगी तो मेरा भी मन लगा रहेगा", उसने बाई से कहा. बाई अंदर से बहुत खुश हुई और वह भी, बस दोनों के कारण अलग अलग थे.

Friday, May 31, 2019

अनाम रिश्ता- लघुकथा

भयानक गर्मी लगता था सब कुछ जला डालेगी और ऊपर से लू, दिन में बाहर निकलना लगभग असंभव सा हो गया था. हरी बाबू अपने कमरे में बैठे कूलर की हवा खा रहे थे और बीच बीच में खिड़की के परदे को हटाकर बाहर भी झांक ले रहे थे. पिछले महीने ही रिटायर हुए थे और पहले जहाँ बाबू थे वहां दिन भर लोगों से घिरे रहते थे. इसलिए उनका इस तरह खाली बैठना बेहद कष्टप्रद था, लेकिन कोई उपाय भी नहीं था. बेटे ने सख्त ताकीद कर रखी थी कि दोपहर में बाहर नहीं निकलना है, सुबह शाम चाहे जहाँ भी जाएँ. अब इसके पीछे बेटे की मंशा चाहे जो भी हो लेकिन उनको उसका मना करना अच्छा ही लगता था.
अंदर के कमरे में बहू आराम कर रही थी, अब धीरे धीरे उनकी आदत पड़ गयी थी कि दोपहर में बहू से वह कोई फरमाईश नहीं करें. अव्वल तो वह उठती नहीं थी और अगर उठ भी गयी तो जिस तरह से उनकी फरमाईश किसी न किसी बहाने से टाल देती थी कि उनको समझ में आ गया था. प्यास महसूस हुई तो वह उठे और ख़ामोशी से किचन में जाकर पानी ले आये. पानी टेबल पर रखकर उन्होंने एक बार फिर पर्दा हटाकर बाहर देखा, सड़क पर कर्फ्यू जैसा हाल था. हरी बाबू पर्दा वापस खींचते तभी उनको एक अधेड़ साइकिल से उनके घर की तरफ ही आता दिखाई दिया. उस पूरे इलाके में एक उनके घर के सामने ही मरियल सा गुलमोहर का पेड़ था. गाहे बगाहे कोई धूप का मारा उसके छाँव तले थोड़ा सुस्ताता और फिर आगे बढ़ जाता. छाँव बस इतनी ही होती थी कि कुछ पल के लिए राहत मिले, फिर लू के थपेड़े जता देते थे कि आगे बढ़ना चाहिए.
उस अधेड़ ने साइकिल खड़ी की और अपना गमछा उतार कर उससे चेहरे के बहते पसीने को पोंछने लगा. हरी बाबू की अनुभवी निगाहों ने उसकी वेश भूषा और मूछ दाढ़ी से अंदाजा लगा लिया कि वह एक मुस्लिम है. उनको अचानक याद आया कि रमजान चल रहा है और शायद यह व्यक्ति रोजे से होगा. अपनी नौकरी के दौरान अक्सर वह रमजान के महीने में अपने मुस्लिम साथियों का ध्यान रखते थे और यथासंभव उनके सामने भोजन या जल नहीं ग्रहण करते थे. उस अधेड़ ने गमछे से चेहरा पोंछने के बाद चारो तरफ निगाह दौड़ाई, शायद वह कोई बेहतर जगह तलाश रहा था.
हरी बाबू सोच में पड़ गए, एक तरफ तो उनका मन कहता कि वह उस व्यक्ति को कम से कम एक ग्लास पानी पिला दें. फिर रोजे का ख्याल आता तो मन मना करने लगता. वैसे उनके कुछ साथी रोजा नहीं भी रखते थे इसलिए उनकी इच्छा हुई कि वह आगे बढ़कर उस अधेड़ से पूछ ही लें. उन्होंने दरवाजा खोला, लपट पूरी भयावहता से उनके चेहरे और शरीर के खुले हिस्से से टकराई और वह लड़खड़ा गए. फिर हिम्मत करके वह आगे बढ़े और उस अधेड़ की तरफ मुखातिब हुए "इतनी गर्मी में कहाँ निकल पड़े, लू लग गयी तो लेने के देने पड़ जाएंगे. अगर ऐतराज न हो तो थोड़ा पानी पी लो".
अधेड़ ने उनकी तरफ देखा और पपड़ियाये होठों पर हाथ फेरा "रोजे से हूँ भाईजान, कुछ जरुरी काम से जाना था इसलिए निकल पड़ा. अब इतने दिन निकल गए तो कुछ दिनों के लिए रोजा क्यूँ तोडूं".
हरी बाबू ने उसका चेहरा देखा, दया सी आ गयी उनको. "अच्छा ठीक है पानी मत पीना लेकिन थोड़ी देर आराम कर लो. फिर निकल जाना, अंदर आ जाओ".
अधेड़ ने एक बार फिर उनको देखा, उन्होंने नज़रों से आश्वस्त किया तो अधेड़ उनके पीछे पीछे कमरे में आ गया. कमरे में कूलर की हवा के चलते बहुत राहत थी, उन्होंने अधेड़ को सोफे पर बैठाया और धीरे से पानी का भरा ग्लास उठाकर किचन में ले जाकर रख दिया. ग्लास रखते समय उनको प्यास की पुनः अनुभूति हुई लेकिन उन्होंने पानी नहीं पीना ही उचित समझा.  

Monday, May 20, 2019

ग़लतफ़हमी-लघुकथा

"याद पिया की आए" ठुमरी लैपटॉप में मद्दम स्वर में बज रही थी, बाहर बरसती हुई बूंदों का शोर मन में हलचल मचाना चाह रही थी. उसने अपनी चाय की प्याली उठायी और होठों से लगा लिया. चाय कुछ ठंडी हो गई थी लेकिन उसे इसका एहसास नहीं था. उसे तो अधखुली आँखों से खिड़की के बाहर टपकती बारिश की बूंदें दिख रही थी और उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली साहब की जादुई आवाज सुनाई दे रही थी.
अक्सर ऐसे मौकों पर, जब वह नितांत अकेले ही रहना चाहता है, फ़ोन को साइलेंट मोड में कर देता है. लेकिन आज न जाने कैसे वह भूल गया था और फोन का रिंग टोन "तेरे आने की जब खबर महके" बजी तो उसे लगा कि काश यह फोन बिलकुल खामोश ही रहता. एक बार पूरी रिंगटोन बज गयी, ठुमरी और ग़ज़ल आपस में मिक्स हो गए. वह चुपचाप अधलेटा ही पड़ा था लेकिन रिंगटोन दुबारा बजने लगी. अब उसे लगा जैसे जगजीत सिंह साहब उससे कह रहे हों कि थोड़ा सा समय हमें भी दे दो. पिछले तीन साल से उसने यह रिंगटोन बदला नहीं था, वजह सिर्फ इतनी थी कि वह जब पहली बार श्वेता से मिलने गया था तो उसके कमरे में यही ग़ज़ल बज रही थी. उसने अपनी तरफ से इस ग़ज़ल और उस वक़्त को मिलाकर बहुत कुछ मतलब निकाला, लेकिन समय के साथ उसे लग गया कि इस ग़ज़ल का उस समय बजना महज एक संयोग था, और कुछ नहीं. एकाध बार उसने कुछ खुलने की कोशिश की तो श्वेता ने ध्यान नहीं देने जैसा वर्ताव किया. कल हिम्मत करके उसने कह दिया था कि हम क्या आगे के बारे में कुछ सोच सकते हैं तो श्वेता ने तुरंत टोक दिया "हम अच्छे दोस्त हैं, उससे ज्यादा कुछ नहीं. कोई ग़लतफ़हमी मत पालना".
उसने उठकर फोन देखा, श्वेता का ही फोन था. अमूमन श्वेता का नाम देखकर उछल पड़ने वाला उसका दिल आज कुछ सामान्य सा था. कुछ पल वह फोन को हाथ में लेकर देखता रहा, फोन बंद हो गया, उसने वापस उसे मेज पर रख दिया. उधर लैपटॉप में "बैरी कोयलिया कुक सुनाए" चल रहा था, बाहर बारिश थोड़ी तेज हो गयी थी. वह वापस सोफे पर अधलेटा सा पड़ गया, फोन में मैसेज का टोन बजा.
ग़लतफ़हमी न हो तो चीजें कितनी अनरोमांटिक हो जाती हैं, उसे महसूस हो गया था. बाद में मैसेज का जवाब दे देगा सोचते हुए उसने आंख मूंद ली, बारिश अब भी उसी रफ़्तार से हो रही थी. 

Saturday, May 4, 2019

जिम्मेदारी-लघुकथा

यह तीसरी बार था जब वह व्यक्ति चिल्ला रहा था और उठ कर भागने का प्रयास कर रहा था "मुझे कुछ नहीं हुआ है, मुझे जाने दो". खून का बहना अभी तक रुका नहीं था और उसके चेहरे से लेकर कपड़ों तक फ़ैल गया था. दो कम्पाउंडरों ने उसे पकड़ कर वापस लिटा दिया और डॉक्टर फिर से उसके सर पर दवा लगाकर पट्टी बांधने की तैयारी कर रहा था.
बमुश्किल आधे घंटे पहले ही उसने सड़क के दूसरी तरफ इस एक्सीडेंट को होते हुए देखा था और रात के सन्नाटे में वह अपनी गाड़ी मोड़कर वापस आया. वहां मौजूद लोगों की मदद से उसने उसे इस हस्पताल में भर्ती कराया और डॉक्टर ने तुरंत प्राथमिक उपचार की तैयारी शुरू कर दी. इस दरम्यान उसकी हरकतों से पता चल गया था कि घायल व्यक्ति काफी नशे में था और इसीलिए दुर्घटना भी हुई थी.
डॉक्टर ने उसके माथे से खून साफकर जैसे ही दवा लगाने की कोशिश की, वह व्यक्ति फिर से उठ बैठा. अब जैसे ही उसने वापस बड़बड़ाना शुरू किया, डॉक्टर बुरी तरह झल्ला गया और उसने गुस्से में बोला "जाने दो इस पियक्कड़ को, इतने नशे में है कि कुछ समझ में ही नहीं आ रहा है इसको".
इतना बोलकर डॉक्टर जैसे ही रुका, उसने धीरे से कहा "लेकिन डॉक्टर, हम तो नशे में नहीं हैं, इसकी जान बचाना जरुरी है".
कुछ पल बाद वह भी दोनों कम्पाउंडरों के साथ घायल को पकड़े हुए था और डॉक्टर ख़ामोशी से पट्टी लगा रहा था.

Thursday, May 2, 2019

मृगतृष्णा-लघुकथा

"देखो आज का अखबार, एक लड़के ने जिसे कोई भी सहूलियत हासिल नहीं थी, राज्य सेवा परीक्षा उत्तीर्ण कर ली. जिसे करना होता है ना, वह लैंप पोस्ट की रौशनी में भी पढ़ लेता है", पिताजी आज फिर उबल रहे थे. इस बार भी राकेश असफल हो गया, वह खुद बहुत उदास था.
"लक्ष्य तो निर्धारित करते नहीं ठीक से, बस साधनों का रोना रोते रहोगे. मुझे लगता था कि मेरे रिटायर होने से पहले मैं भी सुनूंगा कि एक बाबू का लड़का बड़ा अधिकारी बन गया. लेकिन जनाब को तो कोई मतलब ही नहीं है इन सब से", अभी तक उनका बड़बड़ाना जारी था.
पहले भी वह कई बार ऐसे भाषणों को सुन चुका था और वह नजरअंदाज करके रह जाता था. लेकिन इस बार तो आखिरी मौका था और उसने अपनी तरफ से काफी प्रयत्न भी किया था.
"पिताजी, आप जो उदाहरण गिनाते हैं, वह अपवाद में आते हैं, हर लड़का वैसा नहीं हो सकता. कोई भी रेस अगर बराबरी से हो तो ही हार जीत के मायने होते हैं. और यह आप भी जानते हो कि उस एक को छोड़कर, जिसका जिक्र अख़बार में हुआ है, बाकी अधिकांश लड़के या तो ऐसी जगहों से हैं जहाँ उनको तैयारी की तमाम अत्याधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं. या फिर वह किसी न किसी कोटे में आते हैं".
उसने एक सांस छोड़ी और पिताजी की तरफ देखा, वह भौचक्के से उसको देखे जा रहे थे. आजतक उसने कभी भी उनको पलटकर जवाब नहीं दिया था.
"पिताजी, जितना दुःख आपको है, उससे रत्ती भर भी कम दुःख मुझे नहीं है. लेकिन यह जो सिस्टम बना है, वह अपने आप में ही ठीक नहीं है. लाखों मेघावी लड़के कुछ सौ सीटों के लिए हर साल जूझते हैं, तो असफलता का प्रतिशत हमेशा बहुत ज्यादा ही होगा ना? मैं अब अपनी वकालत शुरू करूँगा और वहां एक बेहतर वकील बनने की पूरी कोशिश करूँगा", राकेश ने बात ख़त्म की और बाहर निकल गया.
पिताजी को आज यक़ीन होने लगा कि एक बाबू का बेटा भले एक सरकारी अफसर नहीं बन पाए, लेकिन एक संवेदनशील इंसान जरूर बन गया है. 
शाम से रामवती उदास और गुमसुम बैठी थी, आज अपनी बेबसी पर उसे जोर जोर से रोना आ रहा था लेकिन वह रोये भी तो किसके आगे. पति मनोहर काम कम करता था, झगड़ा ज्यादा, इसलिए उसे कहीं भी टिक कर काम करने को नहीं मिलता था. वह उसके स्वभाव को जानती थी और चाह कर भी बदल नहीं सकती थी. शुरुआत में उसने कोशिश की थी लेकिन बदले में उसे ही अक्सर लात घूंसों का सामना करना पड़ता. बेटा बड़ा था और बाप के ही नक़्शेक़दम पर चल रहा था. १० वीं तक पढ़कर अब दोस्तों के साथ आवारागर्दी करता और देर रात घर आता. बिटिया पढ़ने में अच्छी थी और स्कूल में भी सब मास्टर उसको पसंद करते. अब रामवती की एकलौती इच्छा बिटिया को किसी तरह पढ़ाकर कुछ अच्छा बनाने की रह गयी थी.
आज जब बिटिया स्कूल से लौटी, उसने बताया कि स्कूल का साइंस का प्रोजेक्ट है जिसे करने के लिए सामान खरीदना है. अब सामान खरीदने के लिए पैसे कहाँ से आएंगे, उसे समझ नहीं आ रहा था. इसके पहले भी वह कुछेक बार कुछ पैसा अपने छोटे से किराने की दुकान से बचाने का प्रयास कर चुकी थी लेकिन बचता नहीं था. बस घर किसी तरह चल रहा था और रात को खाने के लिए रोटी मिल जाती थी. उसने उन तमाम लोगों के बारे में सोचना शुरू किया जो उसकी दुकान से सौदा लेते थे. लेकिन उन सबकी हालत एक सी ही थी, किसी से मदद मिलने की उम्मीद नहीं थी. 

Monday, April 29, 2019

स्पष्ट समाधान-लघुकथा

घबराई हुई सी वह जल्दी जल्दी घर के अंदर घुसी और सोफे पर पसर गयी. बाहर तापमान जैसे सारे कीर्तिमान तोड़ डालना चाह रहा था, लू की लपटें सबको जला रही थीं. लेकिन उसकी समस्या लू नहीं थी बल्कि रोज कॉलेज जाना और आना थी. नुक्कड़ के कोने वाली दूकान पर बैठे रहने वाले मनचले उसकी हिम्मत पस्त कर देते थे लेकिन पढ़ाई करने के लिए रोज जाना भी जरुरी था.
कुछ देर बाद उसने उठ कर पानी का गिलास लिया और गट गट करके पूरा पानी पी गयी. मम्मी या पापा से कहते उसे डर लगता था, वह लोग पहले भी उसे कॉलेज जाने के लिए मना कर चुके थे. अगर इस बात की भनक भी उनको लग गयी तो कल से ही उसका बाहर निकलना बंद हो जायेगा.
दरवाजे की घंटी बजी, उसने उठकर खोला तो सामने मुन्नी खड़ी थी. लगभग उसी की हमउम्र मुन्नी उसके यहाँ घर के काम करने आती थी और उससे पढ़ाई लिखाई के बारे में भी अक्सर बात करती रहती थी. मुन्नी ने उसे बताया था कि अगर उसे भी मौका मिला होता तो वह भी जरूर पढ़ने जाती.
"क्या दीदी, आज बहुत उदास दिख रही हो", मुन्नी ने उसको देखते ही पूछा.
उसने कोई जवाब नहीं दिया और सोफे पर अधलेटी पड़ गयी, दिमाग में उन्हीं मनचलों की सूरत घूम रही थी. मुन्नी ने पहले झाड़ू लगाया और फिर पोछा लगाने लगी, वह उसको देख रही थी. अचानक उसके दिमाग में आया कि मुन्नी भी तो उसी रास्ते से आती है, वह मनचले तो उसे भी छेड़ते होंगे. लेकिन कभी उसने उसे परेशान नहीं देखा.
"अच्छा मुन्नी एक बात बता, तुझे वह नुक्कड़ पर के मनचले छेड़ते नहीं हैं क्या?, उसने मुन्नी से पूछा.
मुन्नी के हाथ पोछा लगाते लगाते रुक गए, उसने उसको गौर से देखा हुए बोली "अब समझी, इसीलिए इतना उदास हो दीदी. देखो वह तो कमीने लोग हैं, मुझे भी छेड़ने का प्रयास किया था उन्होंने. लेकिन मैंने अपना चप्पल निकाला और उनको दिखाकर समझा दिया, अब कभी दिक्कत नहीं होती है. आप भी यही करो दीदी, आप डरोगे तो लोग जीने नहीं देंगे".
मुन्नी वापस अपने काम में लग गयी, उसे एक रास्ता स्पष्ट नजर आ रहा था. 

Thursday, April 25, 2019

पुरानी पहचान-लघुकथा

"अरे, उस भलेमानस के पास जाना है, चलिए मैं ले चलता हूँ", सामने वाले व्यक्ति ने जब उससे यह कहा तो उसे एकबारगी भरोसा ही नहीं हुआ. अव्वल तो लोग आजकल किसी का पता जानते ही नहीं, अगर जानते भी हैं तो एहसान की तरह बताते हैं. और राकेश के बारे में उसकी राय तो भलेमानस की बिलकुल ही नहीं थी.
चंद साल ही तो हुए हैं जब राकेश उसकी टोली का सबसे खतरनाक सदस्य हुआ करता था. किसी को भी मारना पीटना हो, धमकाना हो या वसूली करनी हो तो राकेश सबसे आगे रहता था. और इसी वजह से उसे एक प्राइवेट फाइनेंस कंपनी में नौकरी भी मिल गई थी, वसूली करने की. उसी नौकरी के सिलसिले में उसे दूसरे शहर जाना पड़ गया और फिर पिछले दो सालों से तो वह राकेश से मिला भी नहीं था. हाँ फोन पर बात जरूर होती थी लेकिन काफी कम और बातचीत में उसे वह मस्ती नजर नहीं आती थी जो पहले थी.
इन्हीं विचारों में गुम वह उस सज्जन के साथ चलता हुआ राकेश के घर पहुंचा. घंटी बजाने पर गोद में बच्चा लिए एक महिला बाहर आयी और उसे प्रश्नवाचक निगाह से देखने लगी.
"राकेशजी कहाँ हैं, यह उनसे मिलने आये हैं", वह अभी कुछ कहे तभी साथ आये सज्जन ने पूछा. महिला उनको पहचानती थी, दोनों को अंदर ले आयी. इतने में राकेश कमरे में आया और उसे देखकर लपककर गले लग गया.
"अरे बताया भी नहीं कि तुम आ रहे हो, नहीं तो मैं खुद स्टेशन लेने आ जाता. अच्छा समझा, तुम मुझे सरप्राइज देना चाहते थे", राकेश भावुक हो चला था, साथ आये सज्जन बाहर निकल गए.
वह क्या बताता, सरप्राइज तो उसे मिला था. वह अभी कुछ पूछता उसके पहले ही राकेश ने कहा "छमा करना दोस्त, शादी में नहीं बुला सका. इनके मंगेतर ने हमारी कंपनी से लोन लिया था और वसूली के लिए हमारे एक साथी ने इतना धमका दिया कि उन्होंने आत्महत्या कर ली. इनके बच्चे को नाम देने और अपने पुराने पापों का प्रायश्चित करने के लिए शादी कर ली और पुराने सभी काम बंद कर दिए".
उसने राकेश का हाथ पकड़ लिया, अब उसकी पुरानी पहचान ख़तम होने लगी थी. 

Tuesday, April 9, 2019

संस्कार- लघुकथा

"हम तो आज भी पल्लू सरक जाए तो तुरंत ठीक कर लेते हैं. लेकिन ये आजकल की बहुरिया, मजाल है कि पल्लू सर पर टिके", रुक्मणि को नई बहू का कपड़ा पहनना बिलकुल नहीं भा रहा था और वह रवि के सामने भी कहने से नहीं चूकीं.
रवि ने पलटकर उनकी तरफ देखा और मुस्कुरा दिए. वह भी नई बहू को पिछले दो दिन से बमुश्किल साड़ी सँभालते देख रहे थे.
"अब हर आदमी तुम्हारी तरह तो नहीं बन सकता ना राजेश की अम्मा, तुमको पता तो है कि बहू शहर में नौकरी करती है और इसके नीचे कई लोग काम भी करते हैं", रवि ने बात सँभालने की कोशिश की.
"तो, इसका मतलब यह तो नहीं है कि वह हमारी इज्जत भी नहीं करेगी", रुक्मणि आज चुप नहीं होने वाली थी.
"दो दिन से वह हम लोगों का ख्याल रखने की पूरी कोशिश कर रही है. राजेश भी नहीं है वर्ना उसकी थोड़ी मदद कर देता. और जहाँ तक सवाल है इज्जत का, वह उसकी निगाहों में देखने की कोशिश करो".
"आप ही देखो उसकी निगाहें, मैं तो गंवार ठहरी, मुझे क्या पता ये सब", रुक्मणि उठकर जाने लगी.
"मुझे पता है कि असली वजह राजेश का प्रेम विवाह है और तुम्हें दहेज़ नहीं मिलने का गुस्सा है. लेकिन इसमें इस बेचारी लड़की का क्या कसूर", रवि ने रुक्मणि का हाथ पकड़कर बैठा लिया. उनको एहसास हो गया था कि बहू के कानों में ये बात चली गयी है.
अभी रुक्मणि फिर कुछ कहती कि बहू ट्रे में चाय लेकर आ गयी. चाय रखने में पल्लू सर से वापस सरक गया और रुक्मणि की भौहें फिर तन गयीं.
"मांजी, मुझे आज आपसे पल्लू ठीक रखना सीखना है. मेरी माँ रही होती तो उसने मुझे जरूर सिखाया होता. अब तो आप ही हमारी माँ हैं, मुझे बताईये प्लीज", बहू वहीँ सामने बैठ गयी.
रुक्मणि तो जैसे स्तब्ध रह गयी, ये क्या सुन रही है वह. रवि भी बहू की इस बात से एकदम खिल उठे.
"तू तो ऐसे ही इतनी अच्छी लगती है, अरे माँ के सामने बेटी कहीं पल्लू लेती है", कहकर रुक्मणि ने बहू को गले से लगा लिया. मन में बसा सारा गुबार आंसुओं के रास्ते बह निकला. ट्रे में रखी रुक्मणि की चाय उसी तरह पड़ी थी लेकिन रवि के प्याले की चाय कुछ नमकीन हो गयी.

Tuesday, April 2, 2019

वह निगाहें- लघुकथा

"अरे पागल हो गए हो क्या, उस ऑटो को क्यों जाने दिया. इतना टेंशन हैं चारोतरफ और हम लोग यहाँ फंसे हुए हैं जहाँ तीन दिन पहले ही दंगे हुए थे", राजेश एकदम बौखला गया.
"चिंता मत करो, अब स्थिति कुछ ठीक हैं, दूसरा आ जायेगा", उसने इत्मीनान से कहा और सामने सड़क पर देखने लगा.
तभी एक दूसरा ऑटो आता दिखाई पड़ा, ऑटो ड्राइवर को देखकर ही राजेश को समझ आ गया कि यह गैर मज़हबी है और वह थोड़ा पीछे हो गया.
"आ जाओ, चलना नहीं हैं क्या", कहते हुए वह राजेश का हाथ खींचते हुए ऑटो में बैठ गया.
कुछ समय बाद दोनों मुख्य सड़क पर थे जहाँ स्थिति कमोबेश सामान्य थी. एक आती हुई बस में सवार होने के बाद राजेश ने उससे पूछा "तुम्हें हो क्या गया था, एक तो जगह गड़बड़ थी और दूसरे अपने वाले ऑटो को छोड़कर उस ऑटो में बैठ गए. आगे से ऐसा रिस्क लेना हो तो मुझे मत लपेटना, जान सूख गयी थी मेरी".
उसने राजेश के कंधे को सहलाया और बोला "मुझे आज भी २५ साल पहले के एक ऑटो ड्राइवर का चेहरा नहीं भूलता जिसके ऑटो में मैंने बैठने से मना कर दिया था. उस समय इंदिरा गाँधी की हत्या हुई थी और वह ऑटो ड्राइवर एक बूढ़ा सरदार था. मुझे आज भी उसकी निगाहें उसके मजहब के ऊपर किये गए शक के लिए अंदर से कचोटती हैं".
बस में लग रहे शुरूआती झटके अब शांत हो गए थे, वह आँख मूँद कर चुपचाप सीट पर सर टिकाकर लेट गया. 

Tuesday, March 19, 2019

एक और कसम-व्यंग्य

दोस्त क्यूँ होते हैं, इस सवाल का जवाब जिंदगी के अलग अलग समय में अलग अलग हो सकता है. लेकिन एक जवाब तो कामन है कि जो आपके लिए हमेशा खड़ा रहे, आपकी हर मुसीबत में काम आए, वही असली दोस्त होता है. बहरहाल अधिकांश दोस्त ऐसे होते भी हैं, बस कुछेक अपवाद को छोड़कर.
कुछ लोगों का यह भी मानना है कि अगर सियापा ही न करें तो दोस्त कैसे, ये अलग बात है कि आप माने या न माने. अमूमन ऐसे दोस्त तो जिंदगी के शुरूआती दिनों में ही मिलते हैं जब आपके ऊपर किसी किस्म के सियापे का कोई असर नहीं पड़े. और मुझे तो बिलकुल नहीं लगता था कि ऐसे दोस्त एक समय के बाद मिलते भी हैं, मतलब तब, जब आप जीवन के पचास बसंत पार कर चुके हों. लेकिन अब मानना पड़ रहा है और उसकी वाजिब वजह भी है.
शादी के पच्चीस साल बीतने के बाद अगर घरवाली कुछ दिनों के लिए बाहर गई हो तो यह समय आपके लिए सबसे उम्दा होता है. आप चाहें तो इससे इत्तेफ़ाक़ नहीं भी रख सकते हैं लेकिन आपका जमीर भी यह जानता है कि आप गलत हैं. अब ऐसे में तो यह लाज़मी है कि आप चाहे जितना भी खुश हों, रोज सुबह शाम वीडियो काल पर बात करते समय आपको थोड़ा दुखी दिखने का अभिनय करना ही पड़ता है. बचपन में गलती करने के बाद आपका मासूम दिखने का सफल अभिनय यहाँ खूब काम आता है, जब आपकी माँ को दुनिया के सब लड़के बदमाश दिखते थे, एक आपके सिवा.
यह सब ठीक ठाक ही चल रहा था, रोज हम दिन भर अपने को शाबाशी देते रहते कि कल रात को कितनी बढ़िया एक्टिंग की थी. लेकिन जब आपकी शामत आनी होती है तो आ ही जाती है, या यूँ कह लीजिये कि उपरवाले से भी आपका सुख ज्यादा दिनों तक देखा नहीं जाता. बस हुआ यूँ कि हमारे एक पुराने दोस्त हमसे मिलने आफिस आए और जब हम लोग खुश होकर ठहाके लगा रहे थे तो उन्होंने हमारी हंसती हुई तस्वीर खैंच ली. दरअसल वह अपने पत्नी के साथ थे इसलिए जाहिराना तौर पर वह उतने खुश नहीं थे जितना मैं था. यह सब इतने चुपचाप हुआ कि मुझे भनक तक नहीं लगी कि उन्होंने मेरी हंसती हुई तस्वीर किसी और प्रयोजन के लिए खैंच ली थी. यहाँ तक तो ठीक था लेकिन कुछ ही घंटों में उनके द्वारा निहायत ही बेरहमी से वह तस्वीर इस कैप्सन के साथ कि "कितना खुश है अकेले में" घरवाली को भेज दी गई. तस्वीर भेजने के पहले या बाद में भी उन्होंने मुझे इसके बारे में बताना भी गंवारा नहीं समझा. शाम होते होते हमने अपने अभिनय की तयारी कर ली थी और मैं अभी वीडियो काल करूँ उसके पहले ही उधर से फोन आ गया. अपने बॉस के फोन आने से भी संभवतः इतनी घबराहट नहीं होती है जितनी घरवाली के अचानक आये फोन से. मैंने यथासंभव अपनी घबराहट को दबाते हुए बेहद मुलायम शब्दों में इतना ही कहा था "कैसी हैं बेगम, आपको बहुत मिस कर रहा हूँ", कि उन्होंने वह फोटो भेजी और कहा "अभी एक आपकी दुःख भरी फोटो भेजी है, आपके दोस्त ने आज भेजी थी. अब मैं सोच रही हूँ कि आपको और ज्यादा मिस करने का मौका नहीं दूँ", और फोन काट दिया. मैंने घबराते हुए फोन में फोटो देखा, कम्बख्त वही फोटो थी जिसमें मेरी खुशियां मेरे चेहरे पर समां नहीं रही थी".
अब इस वाकये का परिणाम यह हुआ है कि अब उधर से तत्काल का टिकट लेकर बेगम की तुरंत वापसी की खबर आ गई है. बस आज से एक नयी कसम खायी है कि दोस्त चाहे कितना भी अच्छा हो, उससे संभल कर ही रहना है. 

Wednesday, February 27, 2019

समाधान-- लघुकथा

"अब जब उस कायर देश ने जंग की शुरुआत कर ही दी है तो हमें भी पीछे नहीं हटना है. हम ईंट का जवाब पत्थर से देंगें", सभागार में माहौल गर्म था, वहां उपस्थित हर आदमी उत्तेजित था.
"जंग अगर अपरिहार्य हो तो होनी ही चाहिए, लेकिन अगर सिर्फ छुद्र तात्कालिक फायदे के लिए जबरदस्ती कराया जा रहा हो तो इसका विरोध किया जाना चाहिए", वहां मौजूद एक वक्ता ने अपनी बात पूरी गंभीरता से रखी.
अभी उस व्यक्ति ने बात ख़त्म भी नहीं की थी कि सभागार में चारो तरफ से शोर उठाने लगा. वहां मौजूद हर शख्स की निगाह में वह व्यक्ति देशद्रोही जैसा लग रहा था. कुछ अति उत्साही लोगों ने उसे गाली देना भी शुरू कर दिया और बाकी लोगों ने उन्हें रोकने की जहमत भी नहीं उठायी.
खैर एक शख्स उस व्यक्ति के समर्थन में आगे आया और उसने लोगों को रोका. चूँकि वह शख्स काफी प्रभावशाली था इसलिए लोग उसकी बात मानने को मजबूर हुए और खामोश हो गए. लेकिन उनकी निगाहें अभी भी उसके लिए नफरत और आग ही बरसा रही थी.
"अच्छा आप अपनी बात को स्पष्ट कीजिये कि आपका मतलब क्या था?, उस शख्स ने पूछा.
उस वक्ता ने आँखों ही आँखों में उस शख्स को धन्यवाद दिया और फिर उसने अपनी बात रखी "मुझे जो लगता है वह मैं कह रहा हूँ. हो सकता है कि आप लोग उससे असहमत हों लेकिन कृपया इसे समझने का प्रयास करें. युद्ध अगर आवश्यक हो तो लड़ना ही है लेकिन अगर युद्ध कराया जा रहा हो तो इसका विरोध किया जाना चाहिए. मुझे नहीं पता कि आप लोगों में से कितनों के घर से लोग फ़ौज में हैं, लेकिन मेरे कुछ रिश्तेदार जरूर हैं. सैनिक लड़ने के लिए ही हैं और वह शहीद भी होंगे, लेकिन उनकी बलि चढ़ाई जाए, यह गलत है. बाकी एक बात और, युद्ध समस्या का समाधान नहीं है, उसके लिए बातचीत ही होनी चाहिए".
अपनी बात रखकर वह व्यक्ति सभागार से निकल गया, पीछे सभागार में मौजूद लोगों का शोर बढ़ता ही जा रहा था.    

Thursday, February 21, 2019

पुतलों का दर्द- कहानी

हमेशा तेज़ क़दमों से चलकर दुकान पहुँचने वाला अंकुर आज धीमी चाल से चल रहा था, लेकिन इसको महसूस करने वाला एक उसके सिवा और कोई नहीं था. दरअसल अंकुर जिस दुकान में काम करता था वह एक कपड़े की दुकान थी, या और साफ़ शब्दों में कहें तो रेडीमेड कपड़ों की दुकान. और आजकल की दुकानों की तरह उसमें न सिर्फ़ कुछ लोग, जिसमें आदमी और औरत दोनों थे, काम करते थे, बल्कि कुछ बेजान चीज़ें भी साथ-साथ थे. बेजान से आप समझ ही गए होंगे कि मैं पुतलों की बात कर रहा हूँ. वही पुतले जिन्हें नए और अच्छे डिज़ाइन के कपड़े पहनकर दुकान के बाहर और अंदर दोनों जगह खड़ा कर दिया जाता है. बड़ी ख़ामोशी-से ये पुतले दुकान में आने-जाने वालों को और इसमें काम करने वालों को देखते रहते हैं. पता नहीं आपके दिमाग़ में कभी आया होगा या नहीं लेकिन अंकुर के दिमाग़ में हमेशा यह आता है कि ये पुतले भी सब कुछ समझते हैं. बस बोलते कुछ नहीं, शायद इनसानों को बिना रुके लगातार बोलते (अधिकतर झूठ) देखकर ही ये इतने थक जाते हैं कि ख़ामोश ही रहते हैं.
हाँ तो अंकुर आज धीमी चाल से दुकान की तरफ़ जा रहा था और यह एक बार पहले भी हुआ था. वैसे तो उसे दुकान पर सबसे पहले पहुँचकर पूरी दुकान को ठीक-ठाक करने में बहुत संतुष्टि मिलती थी. बचपन से ही अक्सर वह अपने कपड़े भी साफ़-सुथरा करके तहाकर रख देता था और यह उसके परिवार में अचम्भे जैसी बात थी. घर का लड़के से चीज़ों को बिगाड़ने या ख़राब करने की तो उम्मीद रहती है लेकिन अगर कोई लड़का सँभाल करे तो अजीब-सा लगता है. साधारण-सा परिवार था और पिताजी भी किसी दुकान में ही काम करते थे. उनका सपना था कि अंकुर आगे चलकर एक छोटी-सी दुकान खोले जिसका मालिक वह ख़ुद हो. लेकिन यह सपना वह अपने दिल में ही लिए भगवान को प्यारे हो गए और सपना हक़ीक़त में आज तक बदल नहीं पाया.
आज जब अंकुर दुकान पर पहुँचा तो दुकान खुल चुकी थी और कुछ पुतले खड़े भी हो गए थे. दुकान मालिक को अंकुर का देर से आना खटका, अमूमन उसने कभी देर नहीं किया था. अगर तबीयत वग़ैरा ख़राब होने के चलते देर होने वाली होती तो अंकुर पहले ही बता देता था. लेकिन आज उसका फोन भी नहीं आया और वह देर से भी पहुँचा. ख़ैर दुकान मालिक ने बस यूँ ही पूछ लिया "आज क्या हो गया अंकुर, तू देर से आने वाला था तो फोन क्यों नहीं किया?. अंकुर ने बस सर हिला दिया और पुतलों को कपड़े पहनाने के काम में लग गया. पुतलों में जीवन भले न हो लेकिन वे भी इनसानों कि तरह पुरुष, स्त्री और बच्चों में बटें होते हैं और अंकुर रोज़ उनको यथोचित सम्मान देते हुए कपड़े पहनाता. पुरुषों और बच्चों के पुतले तो ठीक थे, उनको कपड़े पहनाकर उनकी जगह खड़े करने में उसे न तो कोई ख़ास दिक़्क़त होती और न कोई अतिरिक्त उत्साह उसके चेहरे पर दिखाई पड़ता. लेकिन जब महिला के पुतले को कपड़े पहनाना हो या उसका शृंगार करना हो तो अंकुर के चेहरे में एक अलग तरह का उत्साह और प्यार नज़र आता था. दुकान में काम करने वाली महिला कर्मचारी कभी-कभी उसे छेड़ती भी थीं लेकिन बस ऊपर ऊपर से ही, असल में उनके मन में भी अंकुर के लिए बहुत इज़्ज़त थी.
हर आम घर की तरह ही अंकुर का भी घर था. घर इसलिए क्योंकि वहाँ एक परिवार रहता था, अभावों से जूझता हुआ लेकिन साथ-साथ. घर में अंकुर को सबसे ज़्यादा उसकी माँ ही अच्छी लगती थी, पिताजी से वह हमेशा ही ख़ौफ़ खाता था. तमाम कम कमाने वाले और ज़्यादा ज़िम्मेदारी वाले पुरुषों की तरह उसके पिताजी भी थे. और अगर घर की आवश्यकता पूरी न हो पा रही हो तो अमूमन पुरुष नशे के आग़ोश में चला जाता है और उसके पिताजी भी इसके अपवाद नहीं थे. माँ हमेशा ख़ामोश रहकर, पिता की गाली-गलौज सहकर भी उसकी और उसकी दो बहनों की परवरिश ठीक-ठाक करती रहती और शायद ही कभी उसके मुँह से अंकुर ने अपशब्द सुना हो. बहनें भी माँ की ही तरह थीं, अंकुर से बड़ी और उसपर प्यार लुटाने वाली. इस तरह धीरे-धीरे अंकुर के मन में औरतों के प्रति एक कोमल भाव उत्पन्न हो गया और समय के साथ-साथ वह बढ़ता रहा. यही वजह थी कि माँ और बहनों के मना करने के बाद भी वह घर के अपने सारे काम ख़ुद ही करता और हर काम में माँ जैसी सुघड़ता लाने की कोशिश भी करता. नशे ने असमय ही पिता को काल कलवित कर दिया और अंकुर अपनी पढ़ाई छोड़कर दुकान में लग गया. लेकिन उसने पिताजी वाली दुकान जल्द ही छोड़ दी क्योंकि वहाँ पिता की कड़वी विरासत रोज़ उसका पीछा करती और उसे बढ़िया काम करने के बाद भी पिता के अतीत की वजह से वह सम्मान या जगह नहीं मिल पाती थी जिसकी वह उम्मीद करता था. सचमुच लोग तो चले जाते हैं लेकिन उनकी यादें, उनके कर्म काफ़ी समय तक पीछे रह जाते हैं, और कुछ मामलों में ख़ुशियाँ तो कुछ मामलों में तकलीफ़ देते रहते हैं.
बहनों की शादी किसी तरह से माँ ने निपटा दी और अब घर में बस अंकुर और उसकी माँ रह गई थीं. माँ की उम्र होने लगी और फिर बहनों और रिश्तेदारों के दबाव में उसकी शादी की बात भी चलने लगी. बहनों ने उसको लड़की देखने को कहा, उनके हिसाब से तो यही सही था. लेकिन अंकुर तो किसी और ही मिट्टी का बना था, उसने घर में दो-टूक बता दिया कि लड़की माँ ही देखेगी और वह माँ की ही तरह की होनी चाहिए. अब आजकल के समय में भी अगर लड़का ऐसी बात कहे तो उसकी माँ के लिए इससे बेहतर बात और क्या हो सकती थी. माँ ने बिल्कुल अपनी ही तरह की बहू ढूँढ़ी और अंकुर की शादी सरोज से हो गई. सरोज का मायका अंकुर से भी ग़रीब था और यही वजह थी कि उसे यहाँ आकर हमेशा अच्छा ही लगा. सरोज बेहद सरल स्वभाव की घरेलू महिला थी और वह अपनी सास का बेहद ख़याल रखती थी. अब घर में दो महिलाएँ हो गई थीं और दोनों के मुँह में ज़ुबान नहीं थी. अंकुर को इससे ज़्यादा और कुछ नहीं चाहिए था और वह शादी के बाद और मन लगाकर काम करने लगा. दुकान मालिक उसपर आँख मूँदकर भरोसा करता और अंकुर की मेहनत की बदौलत दुकान बहुत अच्छी चलने लगी.
आज अंकुर को पुतलों को कपड़े पहनाने में वह उत्साह या प्यार नहीं महसूस हो रहा था जो अमूमन उसे होता था. ऐसा इसके पहले एक बार तब हुआ था जब उसकी माँ का देहांत हुआ था. माँ की मौत का सदमा उसे बहुत दिनों तक सालता रहा और दुकान मालिक ने उस दरम्यान अंकुर को कुछ नहीं बोला था. दुकान मालिक ही क्या, वहाँ काम करने वाले सभी कर्मचारी अंकुर के स्वभाव से भली-भाँति परिचित थे और सब यह जानते थे कि अंकुर अपने माँ से कितना लगाव रखता है. समय ही हर रोग के लिए मलहम का काम करता है, बहरहाल धीरे-धीरे अंकुर भी उस सदमें से उबरा और उसका जीवन और दुकान का काम, दोनों पटरी पर आ गए.
समय बीतता गया, शादी के दो साल बाद अंकुर एक बेटी का बाप बना, शायद प्रकृति उसके ऊपर मेहरबान थी. पहले माँ, दो बहने, पत्नी और अब एक प्यारी-सी बेटी. जीवन में उसे और क्या चाहिए था. अब वह और सरोज रोज़ रात में अपनी बेटी के भविष्य के बारे में देर तक बात करते. बड़े प्यार से उन्होंने बेटी का नाम मुन्नी रखा था और जैसे-जैसे मुन्नी बड़ी होने लगी, घर में बस मुन्नी का ही नाम गूंजता रहता. अब वह दुकान में औरतों के पुतलों को इस तरह सजाता, मानो वे पुतले न होकर उसकी मुन्नी ही हों. दिनभर में कई कई बार वह उन पुतलों के पास जाता, उनके कपड़े ठीक करता और फिर उनके सर पर प्यार से हाथ फेर देता. दुकान की महिला कर्मचारियों के लिए हमेशा से यह एक अजूबा ही था कि कोई पुरुष महिलाओं के पुतले को भी इतने प्यार से रखता है और उनकी सँभाल करता है.
एक रात वह दुकान से जब घर पहुँचा तो सरोज बिस्तर पर लेटी हुई थी. वैसे तो पिछले कई दिन से उसे बुख़ार था और वह उसके लिए दवा भी ले गया था लेकिन उस दिन सरोज की हालत ज़्यादा ख़राब लग रही थी. मुन्नी ने भी घर पहुँचते ही अंकुर से सरोज को किसी अच्छे डॉक्टर से दिखाने के लिए कहा तो वह और भी चिंतित हो गया. अगली सुबह क़स्बे की सबसे अच्छी डॉक्टर के पास वह सरोज को लेकर गया, डॉक्टर ने दवा दी और कुछ टेस्ट कराने को कहा. टेस्ट का नतीजा अगले दिन आया तो वह उसे लेकर डॉक्टर के पास गया और डॉक्टर ने उन्हें देखते समय अपना चेहरा गंभीर बना लिया.
"देखो अंकुर, तुम्हारी बीबी को थोड़ी दिक़्क़त है और इसका इलाज लंबा चलेगा. उम्मीद है कि वह पूरी तरह ठीक हो जाएगी लेकिन हिम्मत से काम लेना पड़ेगा".
अंकुर बुरी तरह घबरा गया, उसने अटकते हुए पूछा "कौन सी बीमारी है डॉक्टर साहब, यह ठीक तो हो जाएगी न?
डॉक्टर ने उसे ढाढस बँधाया और बोली "इसके स्तन में गाँठ है और अभी कैंसर की शुरुवाती स्टेज है. उम्मीद है कि यह पूरी तरह से ठीक हो जाएगी, बस समय लगेगा और हिम्मत से काम लेना पड़ेगा. तुम दवाइयाँ ले लेना और हर हफ़्ते एक बार यहाँ ले आना, कुछ इलाज चलेगा".
अंकुर के दिल में आया कि वह वहीं पर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे, लेकिन सरोज के उतरे चेहरे को देखकर उसे हिम्मत जुटानी पड़ी. मुन्नी अलग परेशान थी, अब वह कॉलेज जाने लगी थी और उसे भी कैंसर के बारे में पता था. लेकिन उसने भी अंकुर और सरोज के चलते अपने आपको सामान्य रखने की पूरी कोशिश की और तीनों उदास चेहरा लिए घर पहुँचे. धीरे-धीरे इलाज शुरू हुआ और अंकुर अपने आपको संयत करके दुकान का काम भी उसी तरह करता रहा. दुकान पर उसने सरोज के कैंसर की बात किसी से नहीं बताई थी, बस इतना बताया था कि सरोज की तबीयत आजकल ख़राब रहती है और उसका इलाज़ चल रहा है.
दुकान में औरतों के पुतलों को कपड़े पहनाते समय वह हमेशा इस बात का ख़याल रखता कि पुतले उसके सामने नंगे न हों. कभी-कभी इसके लिए उसका मज़ाक भी उड़ाया जाता, ख़ासकर पुरुष कर्मचारियों के द्वारा लेकिन उसने कभी भी किसी पुतले को निर्वस्त्र नहीं देखा. हाँ उनको कपड़े पहनाते समय अगर उसका हाथ कभी उनके स्तन को छू जाता था तो उस समय उसे अपने-आप पर ग़ुस्सा और शर्म दोनों आती. यहाँ तक कि उसने सरोज के स्तन को भी शायद ही कभी उजाले में देखा हो, उसे हमेशा से यही लगता कि यह बच्चों के लिए ही हैं. इधर कुछ दिनों से सामने से दुपट्टा या कोई और कपड़ा पहनाते समय उसका ध्यान पुतलों के सामने के उभार की तरफ़ जाता तो उसे सरोज की याद आ जाती. उस समय वह पुतले के हाथ को कसकर दबाता और इस तरह से मानो सरोज को भी तसल्ली देने की कोशिश करता.
समय बीतता गया, सरोज का इलाज चलते लगभग एक साल होने को आया. वह यथासंभव सरोज को ख़ुश रखने की कोशिश करता, मुन्नी भी उसके साथ-साथ मम्मी को दिलाशा देती. लेकिन धीरे-धीरे उन तीनों को यह आभास हो गया कि यह रोग अब ठीक होने की स्थिति में नहीं है. क़स्बे की डॉक्टर के कहने पर वह एक बार शहर में भी सरोज को दिखा चुका था लेकिन वहाँ से भी कुछ ज़्यादा उम्मीद की किरण नहीं दिखाई दी. पिछले महीने जब वह सरोज को लेकर डॉक्टर के पास गया तो डॉक्टर काफ़ी गंभीर थी.
"अंकुर, अब और कोई रास्ता नहीं दिखता, सरोज को बचाने के लिए सर्जरी करनी पड़ेगी", डॉक्टर ने लंबी साँस छोड़ते हुए कहा.
अंकुर भी परिस्थिति को समझ रहा था, उसकी रुचि सिर्फ़ सरोज को किसी भी तरह से बचाने की थी.
"अब आप जैसा ठीक समझें डॉक्टर साहब, ऑपरेशन के बाद सरोज ठीक तो हो जाएगी न", अंकुर ने माथे पर चू आए पसीने को पोंछते हुए कहा.
"अरे बिल्कुल चिंता मत करो, सरोज ठीक हो जाएगी. बस उसका एक स्तन निकालना पड़ेगा नहीं तो कैंसर शरीर के बाक़ी हिस्सों में भी फ़ैल जाएगा. तुम अब ऑपरेशन की तयारी करो अंकुर और जल्द-से-जल्द सरोज को यहीं भर्ती करा दो, मैं शहर के सबसे अच्छे डॉक्टर से ऑपरेशन करवा दूँगी", डॉक्टर ने अंकुर को आश्वस्त करते हुए कहा.
अंकुर को काटो तो ख़ून नहीं, लेकिन डॉक्टर पर उसे पूरा भरोसा था. दरअसल उस क़स्बे में शायद ही कोई ऐसा था जो उस दुकान पर नहीं जाता था जहाँ अंकुर काम करता था. और इसी वजह से हर कोई अंकुर के अच्छे व्यवहार से परिचित था. आज तक इलाज के नाम पर डॉक्टर ने हमेशा उससे कम-से-कम पैसा ही लिया था और यह बात अंकुर भली-भाँति जानता था.
"और ख़र्चे की चिंता बिल्कुल मत करना अंकुर, सब हो जाएगा. बस अब देर मत करना", डॉक्टर ने जाते-जाते कहा तो अंकुर ने पलटकर हाथ जोड़ लिए.
लगभग दस दिन लगे सरोज को सर्जरी के बाद वापस घर आने में. बहुत कमज़ोर हो गई थी सरोज और अंकुर अब उसका ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान रखता था. मुन्नी भी कुछ दिन कॉलेज जाना बंद करके सरोज की देखभाल में ही लग गई. धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य होने लगा, सरोज भी घर के काम में थोड़ा-थोड़ा हाथ बटाने लगी और अंकुर अब सामान्य तरीक़े से दुकान पर जाने लगा. सरोज के मुँह में पहले भी ज़ुबान नहीं थी और अब तो लगभग ख़ामोश ही रहने लगी थी. उसकी मनोदशा मुन्नी तो समझती थी लेकिन अंकुर उसे ठीक होते देखकर वापस पहले की तरह रहने लगा. सरोज अब अपने आपको अधूरा महसूस करती लेकिन वह अंकुर से या मुन्नी से भी कुछ नहीं कहती. उसका अपना स्वभाव भी था और अंकुर की मनोदशा सोचकर भी वह अब सामान्य दिखने का ही प्रयास करती.
कल रात को दुकान बंद करते समय जब अंकुर पुतलों को अंदर कर रहा था तो अचानक एक कील में फँसकर एक पुतले का ब्लाउज़ सरककर नीचे आ गया. उस समय वहाँ कोई नहीं था और चमकती बत्तियों में अंकुर की नज़र पुतले के सामने वाले नग्न उभारों पर पड़ गई. एक बार तो उसे शर्म जैसा महसूस हुआ लेकिन फिर जब उसे दोनों उभार दिखे तो उसे सरोज की याद आ गई. ऑपरेशन के बाद उसने कभी भी सरोज को इस नज़रिए से गंभीरता से नहीं देखा था, बस उसे यह पता था कि सरोज का एक उभार काटकर निकाल दिया गया है. उसने जल्दी से पुतले को ब्लाउज़ पहनाया और लाइट बंद करके बाहर आ गया.
रात को घर आने के बाद उसने ऑपरेशन के बाद पहली बार सरोज को सामने से ग़ौर से देखा. उसे कुछ कमी सी लगी और फिर सरोज के चेहरे पर भी उसे वही कमी नज़र आई. पूरी रात वह बेचैनी से करवट बदलता रहा, उसे नींद नहीं आई. वह सरोज के शरीर और उसके चेहरे पर आए खालीपन को भरने की चिंता में लगा रहा. आज अगर वह सरोज के साथ सो रहा होता तो शायद वह उस खालीपन को अपनी आँखों से देखता. लेकिन सरोज और मुन्नी कमरे में साथ-साथ सोते थे और वह बाहर बरामदे में, इसलिए उसके लिए यह संभव नहीं था. और वह चाहकर भी सरोज से इसके बारे में कुछ पूछ नहीं सकता था. पूरी रात सोचने के बाद उसे यही समझ आया कि शायद सरोज के दर्द को महसूस करने के लिए ही दुकान में पुतले का ब्लाउज़ सरका होगा.
सुबह उठकर जब तक वह मुँह धोकर बाथरूम से निकला, सरोज चाय लेकर आ गई थी. उसने सरोज को साथ ही चाय पीने के लिए बोला तो उसने फीकी मुस्कान से अंकुर को देखा.
"मुन्नी, ज़रा एक कप चाय मम्मी के लिए भी लाना", अंकुर के अंदर पता नहीं कहाँ से यह हिम्मत आ गई. सामान्य स्थिति में उसका सरोज के सामने कुछ देर खड़ा रहना भी मुश्किल था, उसकी परवरिश और उसका संकोच आड़े आ जाता.
मुन्नी ने थोड़े आश्चर्य के साथ चाय का कप लाकर अंकुर के सामने रखा. सरोज ने शरमाते हुए कप उठाया और एक निगाह मुन्नी की तरफ़ डालकर धीरे-धीरे पीने लगी. अंकुर भी मुन्नी की उपस्थिति से बेख़बर एकटक सरोज को चाय पीते देखता जा रहा था. आज उसे अपनी पुरानी सरोज कहीं भी दिखाई नहीं पड़ रही थी, वह अंदर से तड़प उठा.
जब रोज़ का समय बीतने लगा तो सरोज ने ही आकर उसे टोका "अरे दुकान पर नहीं जाना है क्या, जल्दी से तैयार हो जाओ". उसकी इच्छा तो हुई कि वह आज दुकान जाने के लिए मना कर दे लेकिन अगर वह दिनभर घर में रहता तो शायद और उदास हो जाता.
अनमने ढंग से वह दुकान जाने के लिए तैयार हुआ और जाते समय जब उसे सरोज का फीका चेहरा दिखाई दिया तो उसका दिल रो पड़ा. आज वापस लौटते समय वह डॉक्टर के पास जाएगा और उससे बात करेगा, शायद कोई रास्ता निकल जाए. धीमे क़दमों से दुकान जाते समय उसके मन में बस किसी भी तरह सरोज को वापस मुस्कुराता हुआ देखने की तमन्ना थी, किसी भी तरह से.

Monday, February 18, 2019

जन्नत- लघुकथा

कल से ही खबर आ रही थी कि क्षेत्र में कुछ संदिग्ध लोग देखे गए हैं और रात में चौकसी बढ़ा दी गयी थी. हमेशा की तरह रमेश और रोशन एक साथ ही नाईट ड्यूटी पर थे. जैसे जैसे रात आगे बढ़ रही थी, चारो तरफ अँधेरा कुछ यूँ गहरा रहा था मानो इस रात की सुबह होगी ही नहीं. अचानक एक खटका हुआ और रोशन ने अपनी राइफल आवाज़ की तरफ तान दी. कुछ मिनट तक सन्नाटा रहा और उनको लग गया कि कोई खतरा नहीं है.
"तू तो निरा डरपोक ही है रोशन, जरा सी आहट हुई नहीं कि घबरा जाता है", रमेश ने उसे छेड़ते हुए कहा.
"अच्छा तो पंडित, तू बहुत बहादुर है ना, फिर उस दिन गोली चलने पर घबरा क्यों गया था", रोशन ने जवाबी हमला किया.
फिर दोनों ही हँसते हुए सीधे खड़े हो गए, दोनों ही एक दूसरे को छेड़ते रहते थे. जानते तो दोनों ही थे कि मौत से उनको कतई डर नहीं लगता.
"अच्छा ये बता रोशन, अगर तू यहाँ शहीद हो गया तो तुझे वो जन्नत में हूरें मिलेंगी कि नहीं ? मैंने तो सुना है कि हूरें सिर्फ काफिरों को मारने के बाद ही मिलती हैं, यहाँ तो सामने वाला शायद ही काफिर हो", रमेश ने बात तो मजाक में ही कही थी लेकिन रोशन गंभीर हो गया.
"देख पंडित, ये हूरों वाली बातें सिर्फ बेवकूफ बनाने के लिए और बहकाने के लिए की जाती हैं. असली सुकून और जन्नत तो वतन की सेवा में शहीद होने के बाद ही मिलेगा. लेकिन हमारी कौम की परेशानी तू नहीं समझेगा, हर कदम पर हमको देशभक्ति का इम्तहान देना पड़ता है", रोशन ने राइफल को सहलाते हुए कहा.
"अरे तू तो सचमुच गंभीर हो गया, मैं तो बस तुझे छेड़ रहा था. लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि अगर कोई गोली हमारी तरफ आयी भी तो पहले मुझे लगेगी, उसके बाद ही तुझे छू पाएगी", रमेश ने रोशन का कन्धा थपथपा दिया.
उसी पल सामने से एक साया अँधेरे में कौंधा, रोशन को आभास हो गया कि कोई है. बिना कोई वक़्त गंवाए वह आगे बढ़ा और रमेश के आगे आते हुए उसने राइफल उठायी. सामने से एक गोली निकली और वह रोशन का सीना चीरते हुए निकल गयी. लेकिन गिरते गिरते भी रोशन ने सामने वाले को ढेर कर दिया.
रमेश ने सामने गिरे रोशन को उठाया, उसकी साँसे चल रही थीं. वह अभी कुछ बोलता उससे पहले ही रोशन ने लड़खड़ाते शब्दों में कहा "पंडित, मैं जन्नत में जा रहा हूँ, अब हूरें मिलीं तो गम नहीं होगा". कुछ ही पल में रमेश के सामने दो शरीर पड़े थे, एक जो सचमुच जन्नत जा चुका था और दूसरा जहन्नुम.

Monday, February 4, 2019

इसी वजह से- लघुकथा

आज बचवा चाचा बहुत उदास दरवाजे पर बैठे थे. वैसे तो उदास उनका पूरा गांव ही हो गया था, अधिकांश नौजवान शहरों के बिजबिजाते भीड़ का हिस्सा बनने चले गए थे. कुछ जो बचे थे वह गांव में अक्सर रात को ही आते थे, दिन में तो उनका समय देसी शराब के ठेके या सिनेमा हाल पर ही बीतता था. हर घर में इक्का दुक्का बुजुर्ग ही बचे थे जो दिन को किसी तरह काट रहे थे. जितना होता एक दूसरे से बात करते या अपने अपने रोग को लेकर खटिया पर पड़े रहते.
गांव था तो गांव के अपने सुख दुःख भी थे. सबसे ज्यादा झगड़ा तो खेतों को लेकर ही हुआ करता था, वह खेत जो आजकल ठीक से बुवाई और जुताई को भी तरस रहे थे. अब तो खेती करने के लिए लोग ही नहीं बचे थे, बस अधिया या बटाई से जो मिल जाता, ठीक था. बचवा चाचा का भी खेतों को लेकर कई पट्टीदारों से मुकदमा चलता था और अब तो सिर्फ तारीख ही पता चलती थी, फैसले की आस तो दोनों ही पक्ष छोड़ चुके थे.
पड़ोसी दुक्खू से उनके उसी खेत का मुकदमा था जिसे वह किसी भी हाल में छोड़ना नहीं चाहते थे. केस पहले लोअर कोर्ट में कई साल चला फिर अब वह हाई कोर्ट में चल रहा था. कब फैसला आएगा, दोनों को पता नहीं था लेकिन समय के साथ उनकी दुक्खू से दुश्मनी कुछ कम जरूर हो गयी थी. कल रात दुक्खू बीमारी से चल बसे और अब शायद उसके लड़के मुकदमा नहीं लड़ें तो बचवा चाचा की जीत पक्की ही थी. लेकिन इस बात पर भी बचवा चाचा खुश नहीं थे और जब उनसे उनकी उदासी की वजह पूछी गयी तो उन्होंने गहरी सांस लेते हुए जवाब दिया "दुश्मनी ही सही, एक रिश्ता तो था ही दुक्खू से. कम से कम एक वजह तो थी जिसके चलते उससे बात चीत कभी कभी हो जाती थी, अब तो वह वजह भी ख़त्म हो गयी".  

Tuesday, January 29, 2019

ममता-लघुकथा

पूरा घर दरवाजे पर ही था, राजू, उसकी मेहरारू रानी, बेटी और राजू की माँ. बस इंतज़ार हो रहा था कि सामने चरनी पर खड़ी लक्ष्मी गाय कब बच्चा दे. उसका समय हो गया था और वह दर्द से इधर उधर घूम रही थी. राजू ने अपने सर पर बंधी गमछी को एक बार और कस के लपेटा और सामने के हैंडपंप पर पानी लेने चला गया.
"ए बार त बछिया ही होगी, तीन दिन से हम सपना में देखत हैं कि लक्ष्मी को बछिया हुआ है", राजू की माँ ने गहरी सांस ली. रानी ने एक बार माँ की तरफ देखा लेकिन कुछ नहीं बोली.
"दू बार से बछवा जन्मत है इस लक्ष्मिया, अब ए बार त बछिया ही चाही", माँ ने फिर से रानी की तरफ देखते हुए कहा.
राजू भी पानी रखते हुए माँ की हाँ में हाँ मिलाया "हाँ माई, ए बार त पक्का बछिया होगा, सरकारी हस्पताल लेजाके सीमेन चढ़वाये थे हम".
बेटी इन सब बातों से बेखबर खटिया पर लेटी थी, उसे भी कौतुहल था कि इस बार लक्ष्मी क्या बियाती है. अचानक लक्ष्मी ने जोर से चक्कर लगाया और कुछ ही देर में उसके पेट से बच्चा बाहर आ गया. राजू दौड़ कर उसके पास गया और जैसे ही उसने बच्चे को नजदीक से देखा, उसका चेहरा उतर गया.
"धत्त तेरी की, ए बार फिर से बछवा हुआ है, किस्मत ही खराब है हमरा", उसने अफ़सोस करते हुए कहा. माँ का चेहरा भी उतर गया, वह भी बुझे मन से चरनी की तरफ जाते हुए बोली "जहाँ चाही उहाँ लक्षमी नाहीं होगी और अपने घर में आ गयी".
बेटी ने उठकर चरनी पर जाना चाहा लेकिन रानी ने उसे कस कर भींच लिया, उधर गाय भी अपने बछड़े को ममता से चाट रही थी. 

Monday, January 14, 2019

अपनों का दर्द- लघुकथा

दो तीन बार सोमारू आवाज़ लगा चुका था, हर बार वह उसकी तरफ उचटती नजर से देखता और खाट पर लेटे लेटे सोचता रहा. अंदर से तो उसे भी लग रहा था कि उसको जाना चाहिए लेकिन फिर उसका मन उसे रोक देता. वैसे तो बात बहुत बड़ी भी नहीं थी, इस तरह की घटनाओं से उसको अक्सर दो चार होना ही पड़ता था. लेकिन अगर कोई बड़ी जात वाला यह सब कहता तो उसे तकलीफ नहीं होती थी.
"दद्दा, जल्दी चलो, सब लोग तुम्हरी राह देखत हैं", सोमारू ने इस बार थोड़ी तेज आवाज में कहा.
वह खटिया से उठा और बाहर निकलकर लोटे से मुंह धोने लगा. गमछी से मुंह पोंछते हुए उसने सोमारू से कहा "अच्छा इ बताओ, उहाँ सरवन भी है का?
सोमारू ने हामी में सर हिलाते हुए कहा "सब लोग जुटल हैं उहाँ, आज रस्ता का फैसला हो जाई".
सरवन भी वहीँ है, उसको देखते ही उसके तन बदन में आग लग जायेगी. अब का करे, जाना भी जरुरी है और सरवन न भेंटाये, यह भी मन में है.
"अच्छा सोमारू, एक काम करना हमरे लिए, सरवन को हमसे दूर ही रखना", वह चलते चलते बोला.
सोमारू ने सर हिलाया और थोड़े अचरज से बोला "का हुआ भईया, ऊ सरवन से कउनो बात हो गईल का".
उसने सोमारू के सर पर एक थप्पी मारी "ऊ दिन तुम भी तो थे जब सरवन हमको ऊ सब बात बोला था. बताओ उहो कउनो बर्दास्त करने की बात थी".
सोमारू ने पलटकर उसको देखा "सरपंच तो तुमको रोज दस बार बोलत है तब कउनो दिक्कत नाहीं होत है. फिर सरवन तो अपना भाई बिरादर है, तुमको मलेक्ष बोल दिया तो ओसे कौन दिक्कत?" 
वह चुपचाप चलता रहा, अब सोमारू को कैसे समझाए कि ऊंच जात वाला बोले, तब तो ठीक है लेकिन उसका अपनी जात वाला ही यह सब बोले तो तकलीफ तो होगी ही ना.

Thursday, January 10, 2019

आज हिंदी को वास्तव में विश्व की सबसे अग्रणी भाषा बनाने की जरुरत है

इतिहास को अगर हम समग्रता में देखें तो हर दिन का अपना विशेष महत्त्व होता है. इसी तरह से आज १० जनवरी का भी इतिहास में एक विशिष्ट स्थान है, तमाम सारी घटनाएं इस दिन घटी हैं जिन्हें हम गाहे बगाहे याद करते रहते हैं. अगर हम अखबार की बात करें तो आज के ही दिन इटली के वेनिस नगर में गाज़ेट नामक विश्व का पहला समाचार पत्र 1623 में प्रकाशित हुआ था. आज के ही दिन हमारी चाय १८३९ में इंग्लैंड पहुंची थी. आज के ही दिन पार्श्व गायक और शास्त्रीय संगीतकार के. जे. येसुदास का जन्म हुआ था. आज के ही दिन कार निर्माण की अग्रणी आटोमोबाइल कंपनी ‘टाटा मोटर्स’ ने एक लाख रुपये वाली कार ‘नैनो’ को 2008 में पेश किया था और आखिर में असली मुद्दे पर आते हैं. आज के ही दिन प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने 2006 से 10 जनवरी को प्रति वर्ष विश्व हिन्दी दिवस के रूप मनाये जाने की घोषणा की थी.
दरअसल अपने देश में रहते समय इस आयोजन के बारे में मुझे शायद ही कभी पता चला था लेकिन जब मैं दक्षिण अफ्रीका गया तो मुझे इस बात का पता चला कि १० जनवरी को विश्व हिंदी दिवस का आयोजन किया जाता है. उससे पहले अधिकांश भारतियों की तरह ही मुझे भी यही पता था कि हिंदी दिवस मतलब १४ सितम्बर. सितम्बर महीने में एक हफ्ते या १५ दिन तक हम लोग हिंदी माह या पखवारा मानते थे और फिर अगले साल अगस्त तक यह भूल जाते थे कि हिंदी के लिए भी हमें कुछ करना है.
एक सवाल यह भी उठना स्वाभाविक है कि अगर हम हिन्दुस्तान में रह रहे हैं तो आखिर हिंदी दिवस या विश्व हिंदी दिवस मनाने का औचित्य क्या है. कोई भी दिवस अमूमन उस दिन किसी ख़ास वजह से ही मनाया जाता है और हमने कभी भी उर्दू दिवस, बांग्ला दिवस या तेलुगु दिवस मनाये जाने के बारे में कभी भी नहीं सुना था. अब ऐसे में हिंदी दिवस ही क्यों मनाया जाता है, यह किसी भी हिन्दुस्तानी के लिए, जो कि हिंदी पट्टी का हो, एक अजीब ही बात होनी चाहिए. लेकिन यह दिवस मनाया जाता है और हर साल खानापूर्ति करके, हिंदी में कुछ बोल के और कुछ अतिथियों को बुलाकर (जिनको साल के बाकी ३६४ दिनों तक हम मिलना भी नहीं चाहते, सम्मानित करना तो दूर की बात है) और उनको सम्मानित करके इस कार्यक्रम को संपन्न कर देते हैं. हाँ इस कार्यक्रम की फोटो जरूर सोशल मीडिया, समाचार पत्र और अपने घर परिवार वालों को दिखाते हैं.
किसी भी देश में उसकी भाषा उसकी प्राणवायु होती है और अमूमन उस देश का हर नागरिक उससे बेइंतहा प्यार करता है. ऐसे में अपने देश में अंग्रेजी की गुलामी वाली मानसिकता वाले लोगों को देखकर बेहद अफ़सोस होता है. ज्यादा दूर नहीं, अपने पड़ोसी देश चीन को ही देख लें, शायद ही कोई चीनी व्यक्ति अपनी भाषा के अलावा अन्य भाषा में बात करता हो. इसकी एक वजह तो समझी जा सकती है कि वह देश किसी एक देश का सैकड़ो साल गुलाम नहीं रहा और उसकी अपनी संस्कृति से बहुत छेड़छाड़ नहीं हुई. लेकिन इन सब वजहों के बावजूद हमारे देश में हिंदी भाषा को ही दिवस के रूप में याद रखा जाय, यह बहुत सालने वाली बात लगती है.
अब समय आ गया है कि हम हिंदी दिवस मनाने की मानसिकता से बाहर निकालें और अपनी भाषा को वह सम्मान दें जिसकी वह हक़दार है. लेकिन इसके साथ साथ विश्व हिंदी दिवस भी जरूर मनाएं जिससे कि पुरे विश्व मवन हिंदी का प्रचार पसार हो और वह उस गौरव को प्राप्त करे जिसकी वह अधिकारी है. इसलिए जो शुरुआत 10 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन से हुई थी और सन २००६ से आधिकारिक तौर पर उसी तारीख पर विश्व हिंदी दिवस के रूप में मनाने की घोषणा हुई, उसे उत्तरोत्तर आगे बढ़ाते हुए हिंदी को विश्व पटल पर चमकाएं. और यह और कोई नहीं, हम हिन्दुस्तान के लोग ही करेंगे, पिछले कुछ साल में इस दिशा में हुई प्रगति इसी बात के लिए आश्वस्त करती है.  

Tuesday, January 8, 2019

कसक- लघुकथा

रेशमा की नजर फिर उस लड़की पर पड़ी जो कल ही यहाँ लायी गई थी. बेहद घबराई और लगातार रोती हुई वह लड़की देखने में तो किसी गरीब घर की ही लगती थी लेकिन पढ़ी लिखी भी लगती थी. उससे रहा नहीं गया तो वह उसकी तरफ बढ़ी और पास जाकर उसने पूछा "क्या नाम है रे तेरा और कहाँ से आयी है? यहाँ रोने धोने से कुछ नहीं होता, जितनी जल्दी सब मान लेगी, उतना बढ़िया. वर्ना तेरी दुर्गति ही होनी है यहां पर". 
लड़की ने उसकी तरफ देखा, रेशमा की आँखों का सूनापन देखकर वह सिहर गयी. उसने रेशमा का हाथ पकड़ा और फफक पड़ी "मुझे यहाँ से बचा लो दीदी, मैं अपने घर वापस चली जाउंगी".
रेशमा ने उसकी पीठ सहलाई और समझ गयी कि यह घर से भागकर आयी है. "किसके साथ घर से भागी थी, तुम्हारे गांव का ही है या किसी रिश्तेदारी का", उसने लड़की से पूछा.
लड़की अब थोड़ी संयत हुई, अपने आंसू पोंछते हुए उसने कहा "बगल के गांव का लड़का था, साथ पढ़ाई किये थे तो उसकी बातों में आ गयी. आप मुझे बचा लो प्लीज".
रेशमा को थोड़ा गुस्सा आया, उसने लड़की को हल्का सा धक्का दिया और डपटते हुए बोली "घर से भागते समय नहीं सोचा था कि वह पिल्ला तुम्हारा प्रेमी नहीं दल्ला है. और अगर मैं तुझे निकाल सकती तो क्या खुद इस नर्क में रहती".
लड़की ने निराश नज़रों से रेशमा की तरफ देखा और धीरे से बोली "वह लड़का मेरा प्रेमी नहीं था, उसने मुझे नौकरी दिलाने का वादा किया था. गरीबी में ही मैंने अपना घर छोड़ा लेकिन ऐसे काम के बदले मैं मरना पसंद करुँगी".
रेशमा को झटका सा लगा, उसने लड़की को कसकर भींच लिया. उसकी निगाहों में अपना समय घूमने लगा जब वह भी इसी चक्कर में यहाँ फंसी थी. बेबसी में दो बून्द आंसू उसकी नज़रों से टपके और लड़की के बालों में गुम हो गए.
मौलिक एवम अप्रकाशित