"अच्छा हरिलाल, कितना कमीशन मिलता है तुमको इस दुकान से", दुकान से निकलकर उसके ऑटो पर बैठते हुए उसने पूछा. आगरा में घूमने के लिए उसने जिस ऑटोवाले को लिया था उसने न सिर्फ पूरा आगरा घुमाया, बल्कि उसके जरा से इशारे पर इस दुकान पर भी लाया था. पेठा ही लेना था उसको सभी दोस्तों के लिए लेकिन हरिलाल के कहने पर वह बगल की जूते की दुकान पर भी चला गया और बढ़िया क्वालिटी के जूते भी काफी कम कीमत पर ले लिए.
"कमीशन तो कुछ नहीं मिलता है साहब, बस दिवाली पर ५०० रुपये दे देते हैं रफ़ीक बाबू", हरिलाल ने ऑटो को आगे बढ़ाते हुए कहा. अब उसने एक बार फिर गौर से हरिलाल को देखा, उम्र तो लगभग उसके बराबर ही होगी लेकिन काफी बुजुर्ग लग रहा था. उसके आश्चर्य का पारावार नहीं रहा, अब उसे दो बातें परेशान करने लगीं. एक तो हरिलाल उसे लेकर रफ़ीक की दुकान पर गया और दूसरे वह कमीशन भी नहीं देता.
"तो फिर इसकी दुकान पर ही क्यों लाये, कहीं और जाते तो शायद कमीशन भी मिल जाता!", उसने अपनी जिज्ञासा को दूर करने के लिए फिर से पूछा.
"साहब, रफ़ीक बाबू बहुत भले आदमी हैं, हमें जब भी कुछ रुपयों की जरुरत होती है तो बेहिचक दे देते हैं और हम अपनी सुविधा से लौटा देते है. कोई ब्याज नहीं लेते हमसे, नहीं तो कहीं और से लेने जाएँ तो ब्याज में ही सब ख़त्म हो जायेगा", हरिलाल ने बड़े आराम से कहा.
अभी वह सोच ही रहा था कि क्या कहे तब तक हरिलाल ने फिर कहा "और जानते हैं साहब, यह ऑटो खरीदने के लिए भी पैसे रफ़ीक बाबू ने ही दिया है, हम हर महीने ५ हजार करके चुका रहे हैं. पहले हमारे पास रिक्शा था लेकिन उम्र के साथ मुश्किल हो रहा था तो इन्होने ही कहा कि इसे खरीद लो", हरिलाल की आवाज़ में अब उसे भी संतुष्टि साफ़ साफ़ सुनाई दे रही थी.
उसका दिमाग उलझ गया, आज के माहौल में जब हर जगह डर पैदा किया जा रहा है और बाँटने की कोशिश चल रही है, वहीँ हरिलाल और रफ़ीक जैसे लोग भी हैं. जोड़ने घटाने पर उसे लग रहा था कि इस वाकये में फायदे में तो दोनों ही हैं लेकिन सबसे ज्यादा फायदा अगर किसी को हो रहा है तो वह अपनी गंगा जमुनी तहजीब को. आगरा शहर अब उसे और खूबसूरत लगने लगा था.
"कमीशन तो कुछ नहीं मिलता है साहब, बस दिवाली पर ५०० रुपये दे देते हैं रफ़ीक बाबू", हरिलाल ने ऑटो को आगे बढ़ाते हुए कहा. अब उसने एक बार फिर गौर से हरिलाल को देखा, उम्र तो लगभग उसके बराबर ही होगी लेकिन काफी बुजुर्ग लग रहा था. उसके आश्चर्य का पारावार नहीं रहा, अब उसे दो बातें परेशान करने लगीं. एक तो हरिलाल उसे लेकर रफ़ीक की दुकान पर गया और दूसरे वह कमीशन भी नहीं देता.
"तो फिर इसकी दुकान पर ही क्यों लाये, कहीं और जाते तो शायद कमीशन भी मिल जाता!", उसने अपनी जिज्ञासा को दूर करने के लिए फिर से पूछा.
"साहब, रफ़ीक बाबू बहुत भले आदमी हैं, हमें जब भी कुछ रुपयों की जरुरत होती है तो बेहिचक दे देते हैं और हम अपनी सुविधा से लौटा देते है. कोई ब्याज नहीं लेते हमसे, नहीं तो कहीं और से लेने जाएँ तो ब्याज में ही सब ख़त्म हो जायेगा", हरिलाल ने बड़े आराम से कहा.
अभी वह सोच ही रहा था कि क्या कहे तब तक हरिलाल ने फिर कहा "और जानते हैं साहब, यह ऑटो खरीदने के लिए भी पैसे रफ़ीक बाबू ने ही दिया है, हम हर महीने ५ हजार करके चुका रहे हैं. पहले हमारे पास रिक्शा था लेकिन उम्र के साथ मुश्किल हो रहा था तो इन्होने ही कहा कि इसे खरीद लो", हरिलाल की आवाज़ में अब उसे भी संतुष्टि साफ़ साफ़ सुनाई दे रही थी.
उसका दिमाग उलझ गया, आज के माहौल में जब हर जगह डर पैदा किया जा रहा है और बाँटने की कोशिश चल रही है, वहीँ हरिलाल और रफ़ीक जैसे लोग भी हैं. जोड़ने घटाने पर उसे लग रहा था कि इस वाकये में फायदे में तो दोनों ही हैं लेकिन सबसे ज्यादा फायदा अगर किसी को हो रहा है तो वह अपनी गंगा जमुनी तहजीब को. आगरा शहर अब उसे और खूबसूरत लगने लगा था.