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Thursday, December 27, 2018

फोन की घंटी बज रही थी, उसने उठाया तो विजय का नंबर दिखा. आज बहुत दिनों बाद उसका फोन आया, सोचते हुए उसने फोन उठाया और बात करने लगा.

दरअसल असली मसला और कुछ है-अधूरी कहानी

दरवाजे की ओट में बैठी लक्ष्मी ने देखा, बछड़ा एक बार फिर गिर गया. कुछ पल वह उठने की कोशिश करता रहा लेकिन फिर बैठ गया. दूर खूंटे पर बंधी उसकी माँ उसे देख रही थी और अपना सर हिला रही थी गोया वह उसे उठने के लिए प्रेरणा दे रही हो. पैदा तो वह तंदरुस्त ही हुआ था लेकिन उसके देखते ही देखते पिछले एक महीने में वह बेहद कमजोर हो गया था. वह उसको लगातार देखती जा रही थी, एक मन करता कि जाकर उसे खड़ा कर दे लेकिन बाहर कैसे निकले, कभी उसने दिन में दालान पार नहीं किया था. फिर मन ही मन वह उसके खड़े हो जाने की प्रार्थना करने लगी. चरनी पर बंधी दो गायें और उनकी बछिया इन सब चीजों से निर्लिप्त नाद में मुंह डाले भूषा खा रही थीं.
अक्सर लक्ष्मी की दोपहर कुछ ऐसी ही बीतती थी, घर में सासू थीं जो सो जाती थीं. पति और जेठ या तो खेत पर होते थे या गांव में कहीं बतकही में शामिल रहते. जेठानी आजकल अपने बच्चों के साथ मायके गयी थीं तो वह अकेली ही अपनी बेटियों के साथ थी. बड़ी बेटी स्कूल चली जाती और छोटी बेटी अभी जुम्मा जुम्मा एक महीने की ही हुई थी. अचानक उसके रोने की आवाज़ आयी तो वह वर्तमान में लौटी और उठकर बेटी के पास चली गयी.
बेटी को स्तनपान कराते समय उसे अपना बचपन याद आ गया. इस गांव से लगभग १५० किमी दूर उसका मायका था जहाँ वह एक किसान परिवार में ही पैदा हुई थी. तीन बहनों में वह सबसे छोटी थी और एक भाई था जो सबसे छोटा था. गनीमत थी कि चौथे नंबर पर भाई पैदा हो गया वर्ना एकाध और बहनें और पैदा हो जातीं. और भाई के पैदा होने के बाद कम से कम तीनों बहनों को कोसने का काम कम हो गया, वर्ना उसकी माँ और उन तीनों को दादी हमेशा खाने वाली नज़रों से ही देखती थीं. पिताजी थोड़े संयत व्यक्ति थे लेकिन दादी के भड़काने पर वह भी माँ को बुरा भला बोल देते, कभी कभी हाथ भी उठा देते. लेकिन अमूमन तीनों बहनों को वह ज्यादा कुछ नहीं कहते थे. समय बीतता गया, हर बहन की शादी उसके परिवार के लिए एक गहरा आघात लाती. जमीन तो वैसे भी बहुत नहीं थी और हर शादी में उसका एक हिस्सा निकल जाता.
तीसरी शादी उसकी थी और तब तक भाई भी इंटर कालेज में पढ़ने चला गया था. माँ उसे अचानक बहुत बूढी लगने लगी थी और पिताजी बिलकुल खामोश. बहरहाल शादी के बाद वह यहाँ आयी और फिर साल दो साल में एक बार ही मायके जाना हो पाता. अब तो भाई की भी शादी हो गयी थी और वह भी दो बच्चों का बाप बन गया. एक दो बार मायके जाने के बाद ही उसे महसूस हो गया था कि उसका आना किसी को भी बहुत अच्छा नहीं लगता था, शायद माँ को भी. 

विरासत - लघुकथा

लगभग सभी रिश्तेदार अब जा चुके थे, चौथी बाहर दालान में बैठे बैठे खलिहान की तरफ देख रहे थे. आज पिताजी को गुजरे १५ दिन बीत गए थे, तेरही ठीक तरह से निपट गयी थी, गांव घर के लोग भी भोज से संतुष्ट थे. बहनें जाते जाते उसको समझा गयी थीं कि अब तुम्हीं घर के बड़े हो और घर की सारी जिम्मेदारी अब तुम्हारी है. माँ बगल की खाट पर लेटी थी, उधर खलिहान में बंधी काली गईया नाद पर चुपचाप खड़ी थी, उसका मुंह नाद में कम ही जा रहा था.
"क्या पिताजी, आप रोज इस काली गईया को क्यों खाते समय सहलाते हैं. अरे आख़िरकार यह गाय ही है कोई आपकी बिटिया नहीं जिसे इतना लाड़ जताते हैं", वह लगभग रोज ही पिताजी को टोकता था जो इतनी उम्र होने पर भी अपनी आदत नहीं बदले थे. माँ उसे समझाती कि पिताजी की आदत है, जाने दे, तुझे क्यों दिक्कत होती है.
"मुझे तो समझ में नहीं आता इनका यह काम, मेरे बस का नहीं है यह सब", वह माँ से कहता और बाहर निकल जाता. पिताजी उम्र काफी हो जाने के चलते अब घर ही रहते थे और खेती बारी की सभी जिम्मेदारियां वह बखूबी निभा रहा था.
अचानक घुंघरू की आवाज से उसका ध्यान भंग हुआ, काली गईया ने पलट कर घर की तरफ देखा था. उसने बगल में बैठी माँ की तरफ देखा और उठ कर खलिहान की तरफ बढ़ गया. कुछ ही देर बाद वह काली गईया की पीठ सहला रहा था और वह मजे में नाद में मुंह डालकर खा रही थी.

कुछ अलग सी वजह- लघुकथा

आज उसके छह महीने पूरे हो रहे थे, कल से वह वापस अपनी खूबसूरत और आरामदायक दुनिया में जा सकता था. उसे याद आया, जब से सरकार ने नियम बनाया था कि हर डॉक्टर को छह महीने गांव में प्रैक्टिस करनी पड़ेगी, उसके लिए यह करना सबसे कठिन था. पिताजी की अच्छी खासी दुनिया थी उस महानगर में, बड़ी हवेली, भरा पूरा परिवार और हर तरह की सुख सुविधा. एम बी बी एस करने के बाद सबने यही कहा था कि छह महीने तो फटाफट गुजर जायेंगे और उसके बाद पिताजी महानगर में ही सब इंतज़ाम करा देंगे.
गांव में जिसके घर वह रह रहा था, उनकी उम्र काफी थी और वह काफी बीमार भी रहते थे. शुरू शुरू में अनिक्षा के बावजूद वह उनका इलाज करता, लेकिन धीरे धीरे उनको ठीक रखने में उसे अपनी पढ़ाई की सार्थकता दिखाई पड़ने लगी. उनकी पत्नी, जिसे वह दादी कहता था, के हाथ का बना खाना एक अलग ही प्रकार का स्वाद देता, जो उसे कभी भी अपने घर के खाने में नहीं मिला था. शहर में रहने के दरम्यान उसे कभी ऐसे अनुभव नहीं हुए थे जब किसी गरीब व्यक्ति से उसे लगाव महसूस हुआ हो.
कल जब उसने दादी से बताया कि उसका समय अब पूरा हो गया और वह वापस अपने शहर चला जायेगा तो दादी का चेहरा फक़्क़ पड़ गया. पिछले छह महीनों में वह उनके घर का हिस्सा बन गया था और बीच बीच में जब वह अपने घर जाता तो लौट कर आने पर उसको देखते ही दादी का चेहरा खिल जाता था. आस पास के गांव के काफी मरीज भी उसके यहाँ आते और इलाज़ कराकर जाते समय पैसे तो नहीं लेकिन ढेरों दुआएं जरूर देकर जाते थे. उसके जेहन में तमाम चेहरे घूमने लगे जो फटे पुराने कपड़े पहने, अधिकांश पैदल आते, कुछ साइकिल से भी आते. लेकिन उन चेहरों में जो भाव दिखाई देता, वह उसने पहले कभी नहीं देखा था. वह इस गांव या अगल बगल के जिस भी गांव में जाता, लोग इतनी इज़्ज़त देते कि वह अभिभूत हो जाता. वहीँ शहर में उसे घर के बाहर निकलने पर शायद ही कोई पहचानता था, इज़्ज़त देना तो बहुत दूर की बात थी.
"आओ बचवा, खाना खा लो, तुम्हारे पसंद की दाल बनाई है और साथ में सरसो का साग भी, कल तो तुम चले ही जाओगे", दादी की आवाज़ ने उसे वर्तमान में ला पटका. वह भरे मन से खाना खाने उठा और खाने के दौरान उसका ध्यान खाने पर कम, विचारों में ज्यादा लगा था.
खाना खाने के बाद वह बाहर अपने कमरे में आया, खिड़की से उसे बच्चे धूल मिटटी में खेलते दिखे. उसकी भी इच्छा हुई कि वह जाकर बाहर बच्चों के साथ उसी धूल मिटटी में खेले जिसके लिए वह बचपन में तरसता था. कुछ देर यूँ ही देखते रहने के बाद उसने फोन उठाया और पापा को मेसेज किया "अभी कुछ महीने और मैं यहाँ बिताऊंगा, फिर शहर का सोचूंगा. एक बार आपलोग भी यहाँ आईये, शायद मेरे फैसले की वजह समझ में आ जाएगी". और कुछ ही देर बाद वह बच्चों के साथ खेल रहा था.