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Saturday, August 17, 2024

पिछले लगभग दो घंटे से

 पिछले लगभग दो घंटे से वह ट्रेन के दरवाजे पर ही खड़ा था, इतनी उत्तेजना उसे किसी यात्रा में आजतक नहीं हुई थी. कई बार उसने सोचा जाकर सीट पर बैठ जाए लेकिन उसे अपना शहर बनारस बेतरह याद आ रहा था. दरअसल नौकरी में आने के बाद तक़रीबन चार महीने बाद वह पहली बार घर आ रहा था. पहली पोस्टिंग इंदौर में मिली थी तो वहां से बनारस जाना आसान नहीं था, एक तो दूरी काफी थी और दूसरे पहली नौकरी में छुट्टी मिलना थोड़ा मुश्किल था. बहरहाल बनारस ट्रेन दोपहर के आस पास पहुँचने वाली थी और वह ट्रेन में सुबह से ही बेचैन हो गया था. मोबाइल फोन का जमाना नहीं था इसलिए किसी से रास्ते में संपर्क नहीं हो सकता था लेकिन बनारस में और गांव पर लोगों को पता था कि वह आ रहा है. भदोही बीतने के बाद अब उसे सभी स्टेशन जबानी याद थे, सुरियांवां, सेवापुरी, जंसा, लोहता और फिर बनारस कैंट. एक समय था जब उसके गांव के पास भी एक स्टेशन हुआ करता था, जहाँ कोई स्टेशन का भवन नहीं था, बस कुछ पैसेंजर गाड़ियां रूकती थीं और लोग चढ़ते उतरते थे. एक आदमी झोले में कुछ टिकट लेकर वहीँ आस पास घूमता था और जिसे भी टिकट लेना होता, उससे ले लेता. ये अलग बात थी कि अधिकांश लोग वहां से बनारस जाने का टिकट नहीं लेते थे, फ्री में घूमने की आदत से मजबूर.

ट्रेन जैसे ही जंसा से आगे बढ़ी, वह बाहर फुटरेस्ट पर खड़ा हो गया, थोड़ी देर में ही उसके गांव का स्टेशन आने वाला था. एक बार दिल में आया कि काश ट्रेन किसी वजह से वहां रुक जाए तो वह उतारकर पैदल ही गांव चला जाएगा. बस दो किमी ही दूर था उसका गांव, बमुश्किल पैदल उसे एक घंटा लगता. लेकिन उसे यह भी पता था कि कोई न कोई उसे अपने गांव तक की लिफ्ट भी दे देगा. लेकिन उसकी आँखों के सामने से सब गुजरता गया और ट्रेन सीधे कैंट ही जाकर रुकी. उसने अपना बैग उठाया और लपकते हुए बाहर आ गया, स्टेशन के सामने से उसके गांव की बस चलती थी जो दिन में तीन चार बार जाती थी. वैसे तो कैंट से उसके गांव की दूरी बस ग्यारह किमी ही थी लेकिन बस पूरा घूमकर जाती थी और लगभग डेढ़ घंटा लग जाता था. बस भी बस ठीक ठाक थी, सीट पर रैक्सीन का पतला कवर और खिड़कियों पर शीशे मौजूद थे. लेकिन एक अजीब बात थी, बस तो अक्सर खड़ी मिल जाती थी लेकिन चलने में इतना समय लगाती थी कि आदमी का धैर्य जवाब दे जाए. अगर सवारियां भरी हुई हैं तो जल्द चल देती लेकिन अगर सवारियां कम हैं तो जब तक पूरी बस भर न जाए, चलती ही नहीं थी. खैर एकाध घंटे में बस चल पड़ी और रास्ते में तक़रीबन हर 100 मीटर पर रुकती चलती बस गांव पहुँच ही गयी. सात दिन की छुट्टी मिली थी और उसे आस पास की रिश्तेदारियों में भी जाना था इसलिए आने वाले दिन काफी व्यस्त रहने वाले थे.
गांव के सामने उतरते ही पहला सामना जोगेन्दर से हुआ, उम्र में बड़ा था लेकिन बातचीत होती रहती थी. "का हो रमेश, नौकरी से छुट्टी मिल गईल. सब ठीक थक हौ ना".
"नमस्ते जोगिन्दर, उहाँ सब ठीक ठाक बा, यहां सब बढ़िया हौ ना?, उसने भी हालचाल पूछ लिया.
गांव में उसके घर के रास्ते में कई घर थे और हर घर के सामने कोई न कोई बैठा मिल गया. सबसे हालचाल करते वह घर पहुंचा जहाँ माँ उसका बेसब्री से इन्तजार कर रही थी. उसने लपककर माँ का पैर छुआ और खटिया पर बैठ गया.
"बहुत दुबरा गए हो इतने ही दिन में, खाने पीने का इंतजाम ठीक नहीं है का?, माँ ने उसके पूरे शरीर का मुआयना कर डाला.
"कहाँ दुबले हुए हैं माँ, ठीक तो हूँ. वैसे खाने पीने की दिक्कत तो है ही, अपने हाथ से बस जो बनता है खा लेता हूँ, तुम्हारे हाथ जैसा स्वाद और कहाँ मिलेगा दुनिया में",उसकी बात सुनकर माँ की आँखें भर आयीं.
"चल जल्दी से मुंह हाथ धो ले, गरमा गरम खाना लाती हूँ तेरे लिए", माँ रसोई में चली गयी.
उसने बाहर जाकर स्नान किया और तब तक पिताजी भी खेत से आ गए. खाना खाकर उसने बैग खोला और कुछ कपड़े तथा अन्य सामान, जो उसने उनके लिए लाया था, निकाला.
"अब मुझे जैसा समझ में आया, मैंने खरीद लिया. 

Friday, February 16, 2024

अपने अपने सपने--

 बनारसी गईया चरा के लौटे और उनको चरनी पर बाँध के पीठ सीधा करने के लिए झोलंगी खटिया पर लेट गए. उस क्षेत्र में जैसे बाकी गाओं थे, वैसे ही उनका गाँव था. अब गाँव का नाम भले ही "सिकंदरपुर" था लेकिंन इतिहास के सिकंदर और पोरस से इसका कोई सम्बन्ध नहीं था. अब गाँव में लोगों के नाम भी तो ऐसे होते हैं जिनका वास्तविकता से दूर दूर तक कोई भी सम्बन्ध नहीं होता. मिसाल के लिए उनके सगे पट्टीदार थे "दरोगा", जिनका कद भी पांच फुट नहीं था और ऊपर से दमा के मरीज, जरा सा तेज चलें तो हांफने लगते थे. आस पास के गाँव भी कुछ ऐसे ही नाम के थे और शायद ही किसी गाँव से जुड़ी कोई कहानी हो. बहरहाल उनकी गाय बिलकुल सीधी थी और उसको चराने में कोई भी मशक्कत नहीं करनी पड़ती थी. सिवान में ले जाकर उसे छोड़ देते थे और कहीं पेड़ के निचे आराम से सुस्ताने लगते थे. कोई गाँव का आदमी उधर से निकल जाए तो फिर बतकही का दौर ऐसा चलता था कि समय का पता ही नहीं चलता था. गाँव में उनके सम्बन्ध ठीक ठाक थे और लोगों को उनकी जाती और सामर्थ्य के हिसाब से बनारसी इज्जत भी देते थे. 

मौसम का कुछ ठिकाना नहीं था, इस बार पानी महीनों से बरस नहीं रहा तो घाँस भी कम हो गयी है सिवान में, चारो ओर टहाटह गर्मी पड़ रही है. खटिया पर लेते लेते गमछी से माथे का पसीना पोंछते हुए बनारसी मेहरारू को आवाज़ दिए "अरे तनी एक लोटा पानी त पिलाओ रघुआ की महतारी, बहुत गरम है आज". फिर वह दरवाज़े पर नज़र दौड़ाये तो साइकिल नहीं दिखी, मतलब रघुआ कहीं निकला है. उनका माथा गरम हो गया, ई लड़का का पेअर तो घर में टिकता ही नहीं है, जब देखो तब हवा पर सवार रहता है.

"कहवां गायब हौ तोहार नवाब, अब ओके खेत बारी से कउनो मतलब नाहीं हौ, कम से कम गईया के ही चरा दिहल करत", पानी लेते हुए बनारसी मेहरारू से बोले. ऐसे समय अक्सर रघुआ की महतारी चुप ही रहती है, पता है कि न तो ई मानेंगे और न रघुआ.

"अरे ऊ बजारे गयल हौ, कुछ किताब ख़रीदे खातिर. अब ओकर मन पढ़ाई में लगल हौ, त पढ़ लेवे द ओकरा के", लोटा लेकर वापस जाते समय उनकी मेहरारू धीरे से बोली.

अब खुद तो पढ़े लिखे नहीं थे तो का ही कहते अपने मेहरारू से. मन एक तरफ शंकित होता तो दूसरी तरफ मान भी लेता कि रघुआ पढ़ने में मन लगाता है. उनके हिसाब से पढ़ने का मतलब था कि रघुआ किताब खोलकर बैठा रहे और कुछ बोल बोलकर पढता रहे. ख़ैर पानी पीकर थोड़ा ताज़ा हुआ मन तो बनारसी ने वहीं रखा चारा काट कर भूषा में मिलाकर नाँद में डाल दिया. फिर सब गायों को नाद पर बाँध कर झउआ उठाया और गोबर फेंकने चल दिए. गाय के चलते देसी खाद और ऊपरी का इंतज़ाम तो हो ही जा रहा है.

उधर रघुआ बगल के गाँव के सिवान में एक जगह पेड़ों की ओट में साइकिल खड़ा करके इंतज़ार कर रहा था. कॉलेज में पढ़ने के चलते उसे पता था कि आज वैलेंटाइन डे था और उसको भी कुछ देना था अपनी सरोज को. टी वी और अख़बार में एक हफ्ता पहले से ही इस नवके त्यौहार का खूब धूम धाम था और ऐसा लगता था जैसे यह त्यौहार नहीं होता तो लोग भला प्रेम कैसे करते. अब देने के लिए कुछ समझ में नहीं आया तो एक नए डिज़ाइन का अँगूठी खरीद लिया था उसने. अंगूठी सोने की तो नहीं थी लेकिन किताबों के लिए मिले पैसे होम हो गए उसमे. पेड़ के नीचे खड़े खड़े वह चारो तरफ देख रहा था वो कि कोई और तो नहीं देख रहा है. भले कितना भी बहादुर बने कोई लेकिन प्रेम मोहब्बत में डर तो लगा ही रहता था लोगों का, सबसे ज्यादा अपने परिवार का ही. दूर कुछ आहट हुई और उसने पलट के देखा, सरोज दुपट्टा ओढ़े उसकी तरफ आ रही थी. रघुआ को दिल वाले दुल्हनिया का गाना याद आ गया, लगा जैसे काजोल उसकी तरफ मुस्कुराते हुए आ रही है. जैसे ही वो करीब आई, उसने मुस्कुराते हुए कहा "तुम्हारे लिए कुछ गिफ्ट लाये हैं सरोज, आज के दिन का शगुन है". फिर उसने जेब से अंगूठी निकलकर सरोज को दिया और मुस्कुरा दिया.

"अरे ई का ले आये, लगता है एक तीर से दो निशाना साध रहे हो तुम", और लजाकर अँगूठी सरोज ने अपनी उंगली में डाल लिया. रघुआ तो माने सातवें आसमान पर पहुँच गया, अब तो मामला बिलकुल सेट हो गया है, वह मन ही मन सोचने लगा.

"का सोचने लगे, बहुत सुन्दर अंगूठी है, तुम्हारी पसंद बढ़िया है", एक बार चारो तरफ नज़र दौड़ाया सरोज ने और फिर एक बार हाथ हिलाकर चल पड़ी.

"तुमको ऐसे ही थोड़े न पसंद किया हैं हम", रघु मुस्कुरा कर बोला.

सरोज आगे बढ़ी तो रघु ने धीरे से पूछा "अब कब मिलोगी सरोज".

जवाब में सरोज मुस्कुराकर चली गयी, रघु उसको दूर तक जाते देखता रहा. फिर चारो तरफ देखकर रघु ने साइकिल उठाया और घर चल पड़ा. शाम ढल चुकी थी, अधिकांश लोगों के घर लालटेन और कुछ घरों में बल्ब जल गए थे. गाँव में बिजली आ चुकी थी और सड़क भी ठीक ठाक बन गयी थी. 

सरोज का घर पड़ोस के गाँव कनकनपुर में था, आस पास के गाँव एक जैसे ही थे. दोनों वैसे तो पिछड़े वर्ग से ही थे लेकिन फिर भी जाति का फ़र्क़ था. रघु जात के पावदान में सरोज से ऊपर था और इसीलिए सरोज थोड़ा निश्चिन्त थी कि कम से कम  उसके यहाँ ज्यादा बखेड़ा नहीं होगा. एक ही कॉलेज में पढ़ने के चलते और बस में अक्सर साथ आने जाने के चलते एक दूसरे के करीब आ गए थे. उसके पिताजी भी खेती बाड़ी में ही लगे रहते थे और माँ गाँव के अन्य महिलाओं की तरह चूल्हा चौके में ही अपने आप को खपाये रखती थी. वैसे तो उसके गाँव में इतनी उम्र में लड़कियों का पढ़ना लगभग मुश्किल ही था लेकिन उसके भाग्य से उसके मामा, जो कि पढ़े लिखे थे, ने उसको पढ़ाने के लिए उसके घरवालों को मना लिया था.  

रघु घर पर साइकिल खड़ा करके दलान में घुसा और तभी बनारसी ने टोक दिया "कहाँ इतनी देर तक घूमत रहे, पढ़ाई लिखाई तो मन लगाकर कर करत हो न आजकल". रघु कभी भी बनारसी से खुलकर बात नहीं करता था, बस हाँ हूँ करके निकल जाता था. आदतन आज भी हूँ कहकर वो घर में घुस गया, कपड़े निकाले और मुँह हाथ धोने लगा. मतारी ने खाने का पूछा तो थोड़ी देर बाद खाऊंगा बोलकर वह अपने खटिया पर बैठ गया. 

किताब में रखी सरोज की फोटो देखकर वो उसके सपनों में खो गया था. उसकी मतारी भी चूल्हे के पास से उसे देखते हुए उसके उज्जवल भविष्य के सपने में खोई थी और दुआरे बनारसी अपने झोलंगी खटिया पर लेटे लेटे अपने खेती और गईया के सपनों में खोया था. उधर सरोज भी रघु के सपने में खोयी थी तो उसके माता पिता उसके लिए अच्छे दूल्हे की उम्मीद लगाए हुए थे तथा उसके बेहतर ससुराल, जहाँ उनकी बेटी सुख से रहे, के सपने में खोये हुए थे.