पिछले लगभग दो घंटे से वह ट्रेन के दरवाजे पर ही खड़ा था, इतनी उत्तेजना उसे किसी यात्रा में आजतक नहीं हुई थी. कई बार उसने सोचा जाकर सीट पर बैठ जाए लेकिन उसे अपना शहर बनारस बेतरह याद आ रहा था. दरअसल नौकरी में आने के बाद तक़रीबन चार महीने बाद वह पहली बार घर आ रहा था. पहली पोस्टिंग इंदौर में मिली थी तो वहां से बनारस जाना आसान नहीं था, एक तो दूरी काफी थी और दूसरे पहली नौकरी में छुट्टी मिलना थोड़ा मुश्किल था. बहरहाल बनारस ट्रेन दोपहर के आस पास पहुँचने वाली थी और वह ट्रेन में सुबह से ही बेचैन हो गया था. मोबाइल फोन का जमाना नहीं था इसलिए किसी से रास्ते में संपर्क नहीं हो सकता था लेकिन बनारस में और गांव पर लोगों को पता था कि वह आ रहा है. भदोही बीतने के बाद अब उसे सभी स्टेशन जबानी याद थे, सुरियांवां, सेवापुरी, जंसा, लोहता और फिर बनारस कैंट. एक समय था जब उसके गांव के पास भी एक स्टेशन हुआ करता था, जहाँ कोई स्टेशन का भवन नहीं था, बस कुछ पैसेंजर गाड़ियां रूकती थीं और लोग चढ़ते उतरते थे. एक आदमी झोले में कुछ टिकट लेकर वहीँ आस पास घूमता था और जिसे भी टिकट लेना होता, उससे ले लेता. ये अलग बात थी कि अधिकांश लोग वहां से बनारस जाने का टिकट नहीं लेते थे, फ्री में घूमने की आदत से मजबूर.
ट्रेन जैसे ही जंसा से आगे बढ़ी, वह बाहर फुटरेस्ट पर खड़ा हो गया, थोड़ी देर में ही उसके गांव का स्टेशन आने वाला था. एक बार दिल में आया कि काश ट्रेन किसी वजह से वहां रुक जाए तो वह उतारकर पैदल ही गांव चला जाएगा. बस दो किमी ही दूर था उसका गांव, बमुश्किल पैदल उसे एक घंटा लगता. लेकिन उसे यह भी पता था कि कोई न कोई उसे अपने गांव तक की लिफ्ट भी दे देगा. लेकिन उसकी आँखों के सामने से सब गुजरता गया और ट्रेन सीधे कैंट ही जाकर रुकी. उसने अपना बैग उठाया और लपकते हुए बाहर आ गया, स्टेशन के सामने से उसके गांव की बस चलती थी जो दिन में तीन चार बार जाती थी. वैसे तो कैंट से उसके गांव की दूरी बस ग्यारह किमी ही थी लेकिन बस पूरा घूमकर जाती थी और लगभग डेढ़ घंटा लग जाता था. बस भी बस ठीक ठाक थी, सीट पर रैक्सीन का पतला कवर और खिड़कियों पर शीशे मौजूद थे. लेकिन एक अजीब बात थी, बस तो अक्सर खड़ी मिल जाती थी लेकिन चलने में इतना समय लगाती थी कि आदमी का धैर्य जवाब दे जाए. अगर सवारियां भरी हुई हैं तो जल्द चल देती लेकिन अगर सवारियां कम हैं तो जब तक पूरी बस भर न जाए, चलती ही नहीं थी. खैर एकाध घंटे में बस चल पड़ी और रास्ते में तक़रीबन हर 100 मीटर पर रुकती चलती बस गांव पहुँच ही गयी. सात दिन की छुट्टी मिली थी और उसे आस पास की रिश्तेदारियों में भी जाना था इसलिए आने वाले दिन काफी व्यस्त रहने वाले थे.गांव के सामने उतरते ही पहला सामना जोगेन्दर से हुआ, उम्र में बड़ा था लेकिन बातचीत होती रहती थी. "का हो रमेश, नौकरी से छुट्टी मिल गईल. सब ठीक थक हौ ना".
"नमस्ते जोगिन्दर, उहाँ सब ठीक ठाक बा, यहां सब बढ़िया हौ ना?, उसने भी हालचाल पूछ लिया.
गांव में उसके घर के रास्ते में कई घर थे और हर घर के सामने कोई न कोई बैठा मिल गया. सबसे हालचाल करते वह घर पहुंचा जहाँ माँ उसका बेसब्री से इन्तजार कर रही थी. उसने लपककर माँ का पैर छुआ और खटिया पर बैठ गया.
"बहुत दुबरा गए हो इतने ही दिन में, खाने पीने का इंतजाम ठीक नहीं है का?, माँ ने उसके पूरे शरीर का मुआयना कर डाला.
"कहाँ दुबले हुए हैं माँ, ठीक तो हूँ. वैसे खाने पीने की दिक्कत तो है ही, अपने हाथ से बस जो बनता है खा लेता हूँ, तुम्हारे हाथ जैसा स्वाद और कहाँ मिलेगा दुनिया में",उसकी बात सुनकर माँ की आँखें भर आयीं.
"चल जल्दी से मुंह हाथ धो ले, गरमा गरम खाना लाती हूँ तेरे लिए", माँ रसोई में चली गयी.
उसने बाहर जाकर स्नान किया और तब तक पिताजी भी खेत से आ गए. खाना खाकर उसने बैग खोला और कुछ कपड़े तथा अन्य सामान, जो उसने उनके लिए लाया था, निकाला.
"अब मुझे जैसा समझ में आया, मैंने खरीद लिया.