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Sunday, March 8, 2015

हिसाब--

" बहुत थक गयी आज तो , तीन तीन सभाओं में वक्तव्य देना , महिला दिवस ने तो दम ही निकाल दिया | अरे लता जरा एक प्याली चाय तो पिला "| निढाल हो गयीं सोफे पर और दिन के कार्यक्रम के बारे में सोचने लगीं |
" आज लता नहीं आई मम्मी " बेटे ने अपने कमरे से बताया |
" आज ही इसे भी गायब होना था , कल हिसाब करती हूँ इसका "|

Friday, March 6, 2015

होलिका दहन--

अँधेरा डरावना क्यों होता है , अब उसे पता चल गया था | दिन के उजाले में शरीफ दिखने वाला इंसान , अँधेरे में एक घिनौने शख़्श में तब्दील हो जाता था | कई महीने हो गए थे बर्दाश्त करते हुए | पति से बताने की कोशिश भी की थी लेकिन वो तो अपने बड़े भाई के खिलाफ सुनने को भी तैयार नहीं था | कई बार उसने सोचा कि सासू से बता दे लेकिन उसे पता था कि उसकी बात कोई नहीं सुनेगा |
चार साल पहले आई थी वो शादी करके इस घर में | जेठानी बहुत सीधी और समझदार थी पर घर में सिर्फ जेठ का ही हुक्म चलता था | उनके हर निर्णय में पति भी बस हाँ में हाँ मिलाता था ,बैठना तो उनकी दुकान में ही था | फिर साल भर पहले एक बीमारी में जिठानी चल बसी और ६ महीने बीतते बीतते ही घर का माहौल बदल गया |
फिर अँधेरा छाने लगा था , होलिका जलाने की तैयारी हो रही थी | ढोल बजने लगा और बाहर से फगुआ गाने की आवाज़ आने लगी | पति कुछ सामान लाने दुकान गया हुआ था | इतने में पीछे से एक हाँथ उसकी पीठ पर रेंगने लगा | वो जल्दी से किचन की तरफ भागी , पीछे पीछे वो हाँथ भी आ गया | उसने तुरंत एक निर्णय लिया और किचन का दरवाजा झटके से बंद कर दिया | जब तक जेठ कुछ समझे , केरोसिन का गैलन खाली हो गया | जेठ लपटों में बुरी तरह घिर गया लेकिन आग से वो भी नहीं बच पायी |
बेहोशी अब उसे अपने आगोश में लेने लगी , फगुए का स्वर जोर पकड़ चुका था और जेठ की चीखें उसमे दब के रह गयी | इस सबसे अलग बाहर एक बार फिर होलिका दहन की तैयारी पूरी हो चुकी थी |

सपना--

एक बार फिर शर्माजी ने जेब में हाँथ डाल कर चेक किया , गुलाल की पुड़िया पड़ी हुई थी | चटख लाल रंग का गुलाल ख़रीदा था उन्होंने ऑफिस आते हुए और सोच रखा था कि आज तो लगा के ही रहेंगे | उम्र तो खैर उनकी ५५ पार कर चुकी थी लेकिन पता नहीं क्यों इस बार होली खेलने की इच्छा प्रबल हो गयी थी उनकी |
५ महीना पहले ही ट्रांसफर होकर आये थे इस ऑफिस में | आते ही देखा कई नयी उम्र की लड़कियां थीं यहाँ | कहाँ पिछला ऑफिस , जहाँ सिर्फ पुरुष ही थे और वो भी काफी खडूस किस्म के | लेकिन यहाँ , एक तो उनके विभाग में भी थी | धीरे धीरे सबसे घुल मिल गए और वक़्त बेवक़्त हंसी मज़ाक भी करने लगे थे , खास कर उस लड़की के साथ | पत्नी को आश्चर्य होता था कभी कभी , जब वो प्रसन्नचित्त घर लौटते थे क्यूंकि पिछले कई सालों से हमेशा मुह लटकाये ही आते देखा था उनको | कभी पूछ भी बैठती थी कि क्या बात है तो कोई न कोई बहाना बना देते |
खैर , आज होली के पहले आखिरी दिन था जब ऑफिस खुला था और आज तो सब लोग होली खेलने के मूड में थे | खुदा खुदा करते शाम हुई , लोगों ने एक दूसरे को अबीर गुलाल लगाना आरम्भ कर दिया | वो भी अपनी सीट से उठे , मुस्कुरा कर उसकी तरफ देखा और जेब से गुलाल निकाल कर उसके गालोँ पर मल दिया | अभी हैप्पी होली कहने ही वाले थे कि वो पलटी और मग्गे से रंग उनके ऊपर फेंक दिया | रंग से बचने के लिए भागे ही थे कि आँख खुल गयी , बिस्तर से गिर पड़े थे और पत्नी रसोई का गन्दा पानी उनके ऊपर फेंक कर चिल्ला रही थी " किसको सपने में उछल उछल कर हैप्पी होली कह रहे थे , हमें तो पिछले कई सालों में नहीं कहा " |

Tuesday, March 3, 2015

मौसम--

अचानक घिर आये बादलों को देखकर बल्लू घबरा गया , हवाएँ भी तेज हो गयी थीं | मार्च का महीना , गेहूं की फसल अपनी जवानी पर थी , बालियां निकल आई थीं और कुछ दिनों में इनके पकने की शुरुवात होने वाली थी |
कल खेत से लौटते हुए मन कितना हर्षित था उसका , इस बार तो बैंक का क़र्ज़ चुका ही देगा | पिछले हफ्ते ही नोटिस आया था क़िस्त जमा करने के लिए और उसने उसे बेफिक्री से फेंक दिया था | एक गाय भी लेनी थी उसे इस बार , फिर तो दूध से भी थोड़ी आमदनी बढ़ जाएगी | रात में उसने पत्नी को प्यार से बाँहों में भींच लिया , वो भी मुस्कुरा उठी थी |
देखते ही देखते मूसलाधार बारिश शुरू हो गयी , हवाएँ भी रौद्र रूप धारण कर चुकी थीं | बल्लू गिरते पड़ते खेत की ओर भागा, कल तक दूर से नज़र आने वाली हरियाली आज जमींदोज हो गयी थी | उसको देख मुस्कुराने वाली फसल अब उससे मुंह मोड़ कर ज़मीन से इश्क़ फ़रमा रही थी , उसके सपने तेज हवाओं ने अपने साथ उड़ा दिए थे |
पर इस सबसे दूर शहरों में लोगों को मौसम सुहावना लगने लगा था |   

Monday, March 2, 2015

वचन--

बहुत लगाव था अपने ज़मीन के इस टुकड़े से रघू को, ये आखिरी जो था| पत्नी की बीमारी में एक एक करके सभी जमीनें गिरवी रखता गया था, इस उम्मीद में की जब वो ठीक हो जाएगी तो दोनों मियां बीबी मिलकर, पसीना बहाकर, छुड़ा लेंगें उन्हें| लेकिन जैसे जैसे ज़मीन के टुकड़े कम होते गए, पत्नी की सांसें भी कम होती गयीं|
आखिरी वक़्त में पत्नी ने वचन लिया था कि अब वो किसी भी सूरत में ज़मीन के इस आखिरी टुकड़े को नहीं बेचेगा| जिंदगी किसी तरह गुजर रही थी लेकिन उसकी ज़मीन पर एक उद्योगपति की नज़र पड़ गयी| वहाँ फैक्ट्री लगाने के लिए वो अगल बगल ज़मीनें खरीद रहा था| पर उसके लिए तो वो टुकड़ा अमानत थी किसी को दिए हुए वचन की लिहाज़ा उसने स्पष्ट इंकार कर दिया|
थोड़ी देर पहले ही उसने पडोसी चाचा के घर टी वी में देखा कि एक नए कानून की बारे में चर्चा हो रही थी| उसने पूछा " क्या अब हमारी ज़मीनें हमारी मर्ज़ी के बिना भी छीनी जा सकती है चाचा "|
चाचा ने गहरी साँस लेते हुए कहा " हमारी जमीने बचती ही कब हैं रघू, लेकिन इस कानून ने तो बची खुची उम्मीदें भी तोड़ दी| शायद किसान के घर में पैदा होना ही हमारा गुनाह है, हम तो लोगों को अन्न देते हैं और लोग हैं कि अपना ही निवाला छीनने पर लगे हैं "|
रघू ख़ामोशी से उठा और अपने घर आ गया| रात बहुत देर तक वो बेचैनी से करवट बदलता रहा| सुबह लोगों ने देखा, रघू अपने खेत में निर्जीव पड़ा था| 

बजट--

किटी पार्टी अपने शबाब पर थी , इत्तफ़ाक़न कल ही बजट पेश हुआ था और कोई भी कमतर नहीं दिखना चाह रहा था | 
मिसेस शर्मा " इस बार बजट घाटा कम होगा और वेल्थ टैक्स तो हट ही गया "| 
मिसेस वर्मा " लेकिन सर्विस टैक्स तो बढ़ गया , अब खाने पीने में खर्च बढ़ जायेगा "|
मिसेस सिंह " बजट से बहुत उम्मीदें थीं लेकिन टूट गयीं "| वो उम्मीदें क्या थीं , उन्हें खुद पता नहीं थीं | 
पार्टी की होस्ट मिसेस चन्द्रा ने पकोड़ा आगे बढ़ाते हुए लम्बी सांस भरी " महंगाई तो बढ़ेगी और अपना बजट तो बिगड़ ही जायेगा , पेट्रोल के दाम जो बढ़ गए "|
चाय दे रही बाई ने मंहगाई बढ़ने की बात सुनते ही अपनी पगार बढ़ाने की मांग रखने की सोच ली , इतना बजट तो उसे भी समझ आ गया था |

Sunday, March 1, 2015

यकीन--

" कब शादी कर रहे हो मुझसे , मुझे जवाब चाहिए "|
" क्यूँ , मेरे प्यार पर यक़ीन नहीं रहा तुमको "|
" बात सुरक्षा और स्वीकृति की है , यक़ीन की नहीं "|
" एक कागज़ के टुकड़े से सुरक्षा मिल जाएगी तुम्हें "|
" हाँ , बिलकुल "|
" पर तलाक़ में भी तो कागज़ का टुकड़ा ही होता है "|
एक लम्बी ख़ामोशी पसर गयी दोनों के बीच , अब प्यार पर विश्वास हो चला था उसे |