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Thursday, September 27, 2018

काश - लघुकथा

"इस बार सारे हाव भाव बता रहे हैं कि बेटा ही होगा, मैं तो नेग में हीरे की अंगूठी लूँगी भाभी", मानसी ने चुहल करते हुए कहा.
वह बिस्तर पर लेटे लेटे मुस्कुरायी लेकिन उस मुस्कराहट के पीछे छिपे दर्द को मानसी ने पकड़ लिया.
"क्या बात है, इतनी ख़ुशी की बात पर भी तुम खुश नहीं हो भाभी, क्या दुबारा बेटी ही चाहिए?, मानसी ने थोड़े अचरज से पूछा.
वह सोचने लगी, स्कूल, कालेज और फिर शुरूआती नौकरी के दौरान होने वाले सभी पीड़ादायक अनुभव एक एक करके उसके जेहन में ताज़ा हो गए. हर कदम पर उसे लड़कों के छेड़ छाड़ को झेलना पड़ा था, खासकर उनकी चुभती निगाहें जो उसके चेहरे से नीचे टिकी रहती थीं. भाई उससे बड़ा था इसलिए वह उसे डांट नहीं सकती थी लेकिन माँ से उसने कई बार उसकी शिकायत की थी "माँ, भैया को मैंने कालेज के सामने कई बार देखा है लड़कियों को घूरते हुए, आप उसको डांट दीजिये". लेकिन माँ हमेशा उसे ही समझा देती "अरे लड़का है, थोड़ी मस्ती करता होगा, जाने दे. ठीक है मैं बात करती हूँ उससे", लेकिन माँ ने कभी भैया से बात नहीं की.
'अच्छा एक बात कहूँ मानसी, मेरी भी एक इच्छा है".
"क्या भाभी, अगर छोटा गिफ्ट देना चाहती हो तो भी चलेगा", मानसी ने माहौल हल्का करने की कोशिश की.
थोड़ी देर सोचने के बाद वह बोली "अगर लड़का ही पैदा हो तो काश उसकी ऑंखें नहीं हों".

Tuesday, September 25, 2018

परवाह- लघुकथा

पूरा ऑफिस इकट्ठा हो गया था, बॉस जूते निकालकर मंदिर में घुसा और गणपति आरती शुरू हो गयी. उसे यह सब ठीक नहीं लग रहा था लेकिन सब आये थे तो उसे भी आना पड़ा. एक किनारे खड़ा वह सोच रहा था कि अगर यहीं किसी और धर्म का व्यक्ति अपनी इबादत शुरू करना चाहे तो क्या ये लोग उसे भी इसी तरह करने देंगे.
चंद मिनटों बाद उसकी नज़र सफाई कर्मचारी हमीदन बी पर पड़ी, वह भी एक तरफ चुपचाप खड़ी थी. उसे बेहद आश्चर्य हुआ, यह उसकी धारणा के उलट था. खैर पूजा संपन्न हुई और प्रसाद देने वाले ने हमीदन बी को भी एक लड्डू और मोदक दिया जिसे उसने बड़े प्यार से अपने खोंचे में बाँध लिया. अब उससे रहा नहीं गया और उसने पूछ ही लिया "अरे हमीदन, तू कबसे पूजा पाठ में आने लगी?".
हमीदन ने साडी का पल्लू संभाला और बोली "साहब, मुझे तो कोई दिक्कत नहीं होती, जैसे हमारा मज़हब वैसे आपका. बस इसी बहाने हम भी उपरवाले को याद कर लेते हैं".
"लेकिन तुम्हारे यहाँ किसी को पता चलेगा तो क्या वह बुरा नहीं मानेगा. मतलब कोई मौलाना ऐतराज़ तो कर सकता है ना", उसने अपनी शंका प्रकट की.
"जब हमारे मरद ने हमको बिना तलाक़ दिए नया घर बसा लिया और किसी ने ऐतराज़ नहीं किया साहब, तो इसमें क्या करेगा", हमीदन ने जाते जाते कहा.
अब उसे अपने पूजा में आने का अफ़सोस हो रहा था. 

Wednesday, September 19, 2018

ईमान- लघुकथा

"मेरे पास अभी कुछ भी नहीं है जमा करने के लिए सर, आप बताईये क्या करूँ", सामने बैठी लड़की ने बड़ी मायूसी से कहा और एक प्रार्थना पत्र मेज पर रख दिया. उसने प्रार्थना पत्र उठाया और पढ़ने लगा, नीचे लिखे नाम पर उसकी नजर अटक गयी "नाज़िया खान". अरे यह तो वही लड़की है जिसकी सब बहुत तारीफ़ करते थे कि इतनी गरीब होने के बाद भी हमेशा शिक्षा ऋण की किश्त जमा करती है.
"क्या हो गया नाज़िया, तुम तो हमेशा समय पर पैसे जमा करती थी. और तुम्हारा ऋण खाता भी तो रेगुलर है?, उसके मन में कारण जानने की जिज्ञासा होने लगी. 
"सर पिछले महीने तक तो किसी तरह पैसे जमा किये, लेकिन अब नौकरी छोड़ दी, तीन महीने से तनख्वाह ही नहीं दे रहा था. पिताजी भी दो महीने से बिस्तर पकड़ लिए हैं तो उनका अंडे का ठेला भी बंद है. बस मैं ही हूँ जो कमाती हूँ और बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर घर खर्च चला रही हूँ", उसकी जबान और नज़रों में लाचारी टपक रही थी.
अब ऐसे लोगों के लिए उसके पास भी कोई रास्ता नहीं था, ऋण खाता रेगुलर है तो कोई रियायत भी नहीं दे सकता. कितनी विडंबना है कि रियायत भी बेईमानो को ही मिलती है, ईमानदारों के लिए कोई प्रावधान नहीं है, उसका मन खिन्न हो गया.
"देखो, तुम दूसरी नौकरी की तलाश करो और जब मिल जाए तो पैसे जमा करा देना. और अगर किसी व्यवसाय की योजना मन में हो तो बताना, हम मदद करेंगे. मैं नहीं चाहता कि तुम्हारा नाम बेईमानो में लिखा जाए, मैं भी देखता हूँ, कहीं कोई वैकेंसी होगी तो बताऊँगा".
नाज़िया ने सर हिलाया और उठकर जाने लगी. अब उसके चेहरे पर थोड़ी आस्वस्ति के भाव थे.
"अच्छा यह बताओ कि तुम चाहती तो पैसे नहीं भी जमा कर सकती थी, तुम्हारी कोई संपत्ति भी बंधक नहीं है हमारे पास. फिर तुम क्यूँ आयी बैंक में यह सब बताने", उसने अपना सवाल पूछ ही लिया जो उसे परेशान कर रहा था.
नाज़िया रुकी और उसने गंभीरता से जवाब दिया "सर, मेरे पिताजी बिलकुल पढ़े लिखे नहीं हैं और काफी धार्मिक भी हैं. वह हमें यही बताते हैं कि किसी का क़र्ज़ अपने ऊपर रहे, यह हराम है. मैं दूसरी नौकरी की तलाश करती हूँ सर, आपके सुझाव के लिए शुक्रिया".
नाज़िया चली गयी, उसने अपने ऋण प्रबंधक को बुलाया और तल्ख़ शब्दों में बोला "जितने बड़े डिफाल्टर हैं उन सबकी सम्पत्तियाँ तुरंत बेचने के लिए लगा दो, कोई रियायत नहीं देंगे इन कमीनों को". 

Tuesday, September 18, 2018

असली विसर्जन- लघुकथा

उसको आये लगभग आधा घंटा हो चुके थे, रोज की तरह आज भी आने में देर हो गयी थी. दिन पर दिन काम का बढ़ता बोझ और ऊपर से नया बद्तमीज बॉस, रात होते होते ही वह छूट पाता था. हमेशा गुस्से में रहने वाला उसका दिमाग अब तो और भी गरम रहता, शाम को आने के बाद कोई उसके पास भी नहीं फटकता था. अकेले टी वी के सामने बैठकर चाय पीना और घटिया सीरियल देखकर समय काटना उसकी दिनचर्या बन गयी थी. लेकिन आज गणपति विसर्जन और उससे जुड़े कार्यक्रम उसको काफी सुकून दे रहे थे.
दूसरे कमरे में रिंकी अपनी माँ के पास खड़ी थी, दोनों की हालत खराब थी कि जैसे ही पापा लैपटॉप मांगेंगे, क्या जवाब देंगी. आज दोपहर में लैपटॉप गिरकर टूट गया था और उसको बनने में काफी पैसा और समय लगने वाला था. माँ रिंकी को झूठी दिलासा दे रही थी कि चिंता मत कर, मैं संभाल लूंगी.
"रिंकी, जरा लैपटॉप तो लाना", आवाज़ सुनते ही पहले उसकी पत्नी कमरे में आयी. उसने एक नजर उसकी तरफ देखा और फिर चिल्लाया "रिंकी, सुनाई नहीं दिया क्या?"
"दरअसल आज लैपटॉप खराब हो गया है, मुझसे ही गिर गया", पत्नी ने अटकते हुए कहा.
जब उसको समझ में आया तो उसका खून बुरी तरह खौल गया. इतना महंगा लैपटॉप, अभी कुछ ही महीने पहले लिया था. एकदम से वह गुस्से में कांपते हुए खड़ा हुआ और उसके मुंह से बहुत खराब गाली निकलने वाली थी कि वह ठिठक गया. अभी टी वी में कोई व्यक्ति बता रहा था कि अपनी गलत आदतों का विसर्जन भी उतना ही जरुरी है जितना गणपति का.
कुछ मिनट वह वैसे ही खड़ा रहकर वापस सोफे पर बैठ गया. पत्नी घबराई हुई उसे देख रही थी तभी उसने बहुत शांत लहजे में कहा "पिंकी बेटी, उसको बनने के लिए दिया कि नहीं. टूट गया तो क्या, बन जायेगा".
पत्नी को कुछ समझ में नहीं आया, पिंकी भी कमरे से निकलकर उसके सामने आ खड़ी हुई. उसने उठकर पिंकी का सर सहलाया और मुस्कुराते हुए पत्नी का हाथ अपने हाथ में लेकर दबा दिया.

Wednesday, September 5, 2018

नजरिया--लघुकथा

बगल में आ बैठे मौलाना को देखकर उसका मन तल्ख़ हो गया. वैसे उन्होंने कुछ किया नहीं था, बस सर पर एक जालीदार टोपी लगा रखी थी. और मूंछ नहीं रख के एक लम्बी सफ़ेद दाढ़ी रखी हुई थी. उसने अपने आप को उस भीड़ में भी यथासंभव उनसे दूर रखने की कोशिश की.
जैसे ही उसका स्टॉप आया, वह मौलाना पर एक वक्र दृष्टि डाल कर उतर गया. "जाहिलपना तो इनके रग रग में भरा रहता है, जहाँ देखो वहीँ यह टोपी और दाढ़ी", वापस जाते समय उसके दिमाग में यही चल रहा था. उसके मोहल्ले के मंदिर में पूजा हो रही थी तो वह जूते उतारकर अंदर घुस गया. पूरी श्रद्धा से उसने प्रभु के सामने शीश नवाया और बगल में बैठे पुजारी को भी प्रणाम किया. भगवा वस्त्र पहने पुजारी के माथे पर चंदन का टीका लगा था और शुभ्र धवल लम्बी दाढ़ी और मूंछ से उनका चेहरा उसे तेजमय लग रहा था. चलते समय पुजारी से प्रसाद लेकर उसने माथे पर लगाया और घर की तरफ निकल गया.

Saturday, September 1, 2018

मंजिल की पहली सीढ़ी-- लघुकथा

एक बार फिर वह बुझे मन से उस अर्धनिर्मित क्लास रूम की तरफ निकाल पड़ी जहाँ पिछले दो महीने से वह बच्चों को पढ़ा रही थी. बच्चों को पढ़ाना उसका शौक था और इसके पहले भी वह जहाँ भी रही, उसने यह काम हमेशा किया. लेकिन हमेशा बच्चे उसके घर पढ़ने आते थे और ठीक ठाक घरों के होते थे.
उस मलिन बस्ती में, जहाँ बच्चों की कक्षा चलती थी, जाने में शुरुआत में तो उसकी हालत खराब हो गयी थी. चारो तरफ गंदगी, रास्ते के किनारे बहता हुआ खुला नाबदान और खस्ताहाल दो कमरे, जिसमें बच्चे चटाई पर बैठकर पढ़ते थे. हालाँकि धीरे धीरे बच्चों में सफाई और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता आ रही थी लेकिन उसकी उम्मीद से बहुत धीरे. लेकिन सबसे ज्यादा जो चीज उसे साल रही थी, वह थी बच्चों और उनके माता पिता का सिर्फ नाम के लिए वहाँ आना. अक्सर कुछ लोग वहाँ बच्चों के लिए बैग, किताबें इत्यादि बांटने आते थे और काफी बच्चे सिर्फ उसी के लिए वहाँ आते थे.
“बहुत मुश्किल लग रहा है यहाँ बच्चों को पढ़ा पाना, एक तो जगह इतनी खराब और दूसरे पढ़ने वाले बच्चे ही नहीं हैं”, उसने शिकायती लहजे में एक दिन कहा.
“थोड़ा इंतज़ार करना पड़ेगा, किसी समाज में घुसकर उनका विश्वास जीतना आसान नहीं होता. जल्द ही परिणाम दिखाई देगा, मुझे तुम पर पूरा भरोसा है”, पति ने दिलासा दिया.
यही सब सोचती आज फिर वह बस्ती में पहुंची और थोड़ी देर में ही काफी बच्चे आ गए. उसने पूरी तल्लीनता से उन्हें पढ़ाना शुरू किया और तभी एक आवाज़ उसके कान में पड़ी “मैम, मुझे मैथ अलग से पढ़ा दीजिएगा, स्कूल में ठीक से नहीं समझाते हैं”.
उसने उस बच्ची की तरफ देखा और मुस्कुराकर उसका सर सहला दिया. अपनी मंजिल की पहली सीढ़ी उसे दिखाई देने लगी, अब बच्चों का शोर उसे परेशान नहीं कर रहा था.   

Saturday, August 18, 2018

नींव में कौन सा ईंट- लघुकथा

"अरे लल्ला, साहब लोगन के लिए दुइ कप चाय तो बनवा दो", रामदीन ने आवाज लगाया.
"रहने दीजिये, अभी तो खाना खाया, चाय की जरुरत नहीं है", उसने रामदीन को मना किया. तब तक बगल में बैठे मलखान ने लल्ला को आवाज़ लगायी "अरे चाय नहीं, काफी बनवाओ, और हाँ कम शक्कर वाली", और उन्होंने मुस्कुराते हुए ऐसे देखा जैसे मन की बात पकड़ ली हो. उसने फिर से मना किया लेकिन तब तक लल्ला अंदर घुस गया.
"साहब आपको १२ बजे आना था, असली मेला तो ओही समय था. कल से अखंड रामायण करवाए थे जो दिन में १२ बजे ख़तम हुआ. फिर कुछ नाहीं तो १००० लोगन को भोजन कराया हमने", रामदीन अपनी रौ में बोले जा रहा था.
"अभी मीटिंग ख़तम हुआ तो निकले, अब आपके यहाँ तो आना ही था. वैसे सुबह तो उम्मीद नहीं थी कि आ पाएंगे", उसने भी अपनी बात रखी.
"हाँ, हम भी समझत हैं, आप लोगन के बहुत मीटिंग होत है. इहाँ हम लोग भी बहुत व्यस्त रहे", रामदीन ने अपनी बात कही.
"घर की औरतें भी तो बहुत थक गयी होंगी, कल से ही लगातार सबको भोजन पानी का इंतज़ाम उन्हीं के जिम्मे रहा होगा", उसको अभी भी काफी के लिए अफ़सोस हो रहा था.
"अरे साहब, अब एक्के तो काम रहत है उनके जिम्मे, अब उसमें काहे का थकान. हम लोगन का देह दरद कर रहा है", रामदीन ने देह तोड़ते हुए कहा.
अचानक उसने रामदीन से पूछा "अच्छा ये बताईये, आपके घर के नींव में कौन सा ईंट लगा था, याद है", और उठ कर आगे चल दिया.
परेशान रामदीन पीछे से आवाज़ लगाता रह गया "साहब काफी आ गया है, पीते जाओ".