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Wednesday, April 22, 2020

भय- लघुकथा

दरवाजे पर दस्तक हुई और आवाज आयी 'दीदी, मैं आयी हूँ".
उसने आवाज पहचान लिया और दरवाजा खोल दिया. बाई अंदर आयी और नमस्ते करके खड़ी हो गयी.
"कैसी हो बाई, घर में सब ठीक है ना?, उसने पूछ तो लिया लेकिन उसे अपनी आवाज ही खोखली लग रही थी.
"सब ठीक ही है दीदी, क्या कहें?, बाई ने कुछ नहीं कहते हुए भी सब कुछ कह दिया.
"अच्छा ये लो पैसा, थोड़े ज्यादा पैसे भी दे दिया हैं. अपना ख्याल रखना", उसने बाई के हाथ में पैसे रख दिए.
बाई ने पैसे वैसे ही अपने छोटे से पर्स में रख लिए. वह पलट कर जाने लगी तभी बाई ने पूछा "जब यह बंदी ख़तम होगी तब मैं काम पर आ जाऊँ न दीदी?
उसने गहरी सांस ली और कहा "अभी काम पर मत आना, मैं बताउंगी तब आना. लेकिन तुमको पैसा मिलता रहेगा, चिंता मत करना".
बाई ने अपने हाथ जोड़ दिए, उसकी आँखों में कृतग्यता जैसे टपक रही थी.
उसने बाई को जाने का इशारा किया, बाई पलटते पलटते रुकी और उसने कातर आवाज में कहा "काम पर जब भी बुलाना हो दीदी, मुझे ही बुलाना".
बाई जा चुकी थी, वह सन्न खड़ी सोच रही थी.

नारियल- लघुकथा

"आज तो मैं जा के ही रहूंगी, चाहे पुलिस का डंडा ही क्यों न खाना पड़े", उसने एक नजर बिस्तर पर बीमार पड़े पति और भूख से बेचैन दोनों बच्चों को देखते हुए कहा.
बड़े बेटे ने साथ में सुर मिलाया "मैं भी चलूँगा अम्मा, वो तीसरे माले वाली ऑन्टी मुझे कितना मानती हैं".
उसने दृढ़ता से मना कर दिया "मुझे तो शायद छोड़ देंगे लेकिन तुझे नहीं छोड़ेंगे. तू यही छोटे का ख्याल रख, मैं कुछ लेकर आती हूँ".
बाहर निकलकर जैसे ही वह सड़क पर पहुंची, एक पुलिसवाला डंडा फटकारते हुए आया "कहाँ जा रही है, पता नहीं है कि निकलने पर पाबन्दी है?
वह पलटकर खड़ी हो गयी और इन्तजार करने लगी. पुलिसवाले ने आश्चर्य से पूछा "अब ऐसे क्या खड़ी हो गयी, वापस जा".
उसने खड़े खड़े ही जवाब दिया "पेट पर तो लात पड़ ही गयी है, आप पीठ पर भी डंडा लगा दो. लेकिन भूखे बच्चों के लिए कुछ ले आने दो साहब".
पुलिस वाला कुछ देर खड़ा रहा, फिर धीरे से बोला "यहीं रुक, मैं आता हूँ"
कुछ देर बाद वह अपने कोठरी में खाने के दो पैकेट लेकर पहुँच गयी, उधर पुलिस वाले ने अपने साथी को फोन लगाया "भाई शाम को आना तो कुछ खाने के लिए लेते आना".

Saturday, February 29, 2020

रौशनी कायम है- लघुकथा

एक हफ्ते गुजर चुके थे उस तोड़ फोड़ और मार काट के बाद, एक तंग सी गली के एक थोड़े जले मकान में बैठे दो पुराने दोस्त गंभीर लेकिन चिंतित मुद्रा में बैठे थे.
"साठ साल तो हो ही गए हमारी दोस्ती को, लेकिन आज तक यह नौबत नहीं आयी थी नजीब. अब तो तुमसे भी ऑंखें मिलाने का साहस नहीं होता मुझमें, तुम्हारे घर को आग के हवाले कर दिया था इन कमजर्फों ने", रघुनन्दन ने अपना कांपता हाथ उठाया और नजीब के हाथ पर रख दिया.
नजीब ने एक गहरी सांस ली और रघुनन्दन के हाथ को कस कर पकड़ लिया "दोष इनका नहीं है रघु, ये बड़ी आसानी से बहकावे में आ जाते हैं. गरम खून सही गलत नहीं सोच पाता, बस आवेश में बह जाता है". 
कुछ देर सन्नाटा छाया रहा, चाय के कप रखने की आवाज ने सन्नाटा तोड़ा.
"ये आखिर कहाँ आ गए हम, यहाँ आने के लिए तो हमने आगे बढ़ना नहीं शुरू किया था", रघु ने चाय का कप उठाया और धीरे से सुड़पने लगे.
नजीब भी चाय पीने लगे और अखबार को उठाकर रघुनन्दन के सामने रख दिया. पहले पन्ने पर ही जलते मकानों के चित्र के बीच में एक खबर थी "हिन्दू मोहल्ले में स्थित मस्जिद को वहां के हिन्दुओं ने बचाया और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा भी की".
"हमारा सफर यहीं के लिए जारी है रघु, इंशा अल्लाह ये मंजिल भी जल्द प्राप्त हो जायेगी", कहते हुए उन्होंने चाय का कप खाली कर दिया. रघुनन्दन के चेहरे पर अखबार की खबर पढ़कर संतुष्टि का भाव आ रहा था, नजीब के हाथ दुआ में ऊपर उठ गए.


Wednesday, January 29, 2020

परिवर्तन- लघुकथा

राजा बहुत बेचैन था, उसे उम्मीद नहीं थी कि मामला इस तरह का मोड़ ले लेगा. दरअसल उसे अपनी आवाम पर जरुरत से ज्यादा भरोसा था, उसे लगता था कि उसके पुराने पैतरे काम आ जाएंगे. मुआमला हाथ से निकलता देख उसने अपने चाणक्य को बुलाया और कोई रास्ता निकालने के बारे में चर्चा करने लगा.
"ये इतने पढ़े लिखे और समझदार कहाँ से पैदा हो गए, अपनी शिक्षा व्यवस्था में किये गए परिवर्तन से ज्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ा है क्या ?
चाणक्य ने थोड़ी देर अपना सर खुजाया और परेशानी भरे स्वर में बोला "मुझे भी समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर फ़र्क़ क्यों नहीं पड़ा. मैंने जब भी अपने शिक्षा मंत्री से पूछा, उसने मुझे यही बताया कि लोग अब राष्ट्रवाद के अलावा कुछ नहीं सोचते".
राजा ने चुरुट सुलगायी और एक लम्बा कश लेकर बोला "आपने सही आकलन नहीं किया महाराज, जनता उतनी भोली नहीं है जितना हम सोचते हैं. फिलहाल हम ऐसा करते हैं कि अपने इस कानून को वापस ले लेते हैं, आगे चलकर फिर देखा जाएगा".
चाणक्य सोच में पड़ गए, उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि राजा उनसे इस तरह की बात भी कर सकते हैं. उन्होंने राजा की तरफ गौर से देखा, उसके चेहरे पर दृढ़ निश्चय के भाव थे.
"ठीक है राजा साहब, लेकिन इसकी घोषणा आप ही कीजियेगा, आखिर हमारी भी प्रतिष्ठा का सवाल है".
राजा ने चैन की सांस ली, चाणक्य ने हल्का सा सर झुकाया और बाहर की तरफ निकल गए.
   

Tuesday, December 31, 2019

पहली औलाद-लघुकथा

"हाय डैड, कैसे हैं आप? सब ठीकठाक है ना, मैं कई महीनों से आने की सोच रहा हूँ लेकिन क्या करूँ?, वीडियो काल पर रोहन सुदूर अटलांटा से अपने डैड से बात कर रहा था.
"मैं ठीक हूँ बेटा, तुम लोग कैसे हो. नीनू कैसी है, अगर पास में है तो उससे भी बात करवाना", पिताजी ने अपनी इच्छा प्रकट की.
"नीनू तो अभी नहीं है, वह दीप्ति के साथ सुपरमार्केट गयी है. अच्छा गोपाल कहाँ है, आपकी देखभाल तो ठीक से करता है ना, मैं उसके अकाउंट में बराबर पैसे भेजता रहता हूँ?, रोहन ने पूछा.
पिताजी ने एक लंबी सांस ली और मुस्कुराते हुए बोले "अरे गोपाल तो ग्रेजुएशन कर रहा है, और मेरा खूब ख्याल रखता है. मुझे तो लगता ही नहीं कि वह अपने परिवार का सदस्य नहीं है. अच्छा एक बात कहना चाह रहा था लेकिन समझ नहीं आ रहा था कि कैसे कहूं, कहीं तुम्हें बुरा न लग जाए?
"अरे बोलिये न डैड, वैसे भी सब कुछ तो आपको ही मैनेज करना है".
"मैं सोच रहा था कि गोपाल को अपना नाम दे दूँ. देखो तुम बुरा मत मानना, आखिर सब कुछ तो अब वही संभाल रहा है", पिताजी ने हिचकते हुए कहा.
रोहन ने कुछ पल के चुप्पी साध ली, पिताजी भी थोड़े तनाव में आ गए.
"आपने मेरे मन की बात छीन ली डैड, यह बात मैं चाह कर भी नहीं कह पाता. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप मुझसे बात करना बंद कर देंगे, मैं आपका पहला बेटा ही रहूँगा", रोहन ने एक जोरदार ठहाका लगाया. इधर फोन पकड़े पिताजी के कोर भी भींग गए.

Wednesday, November 13, 2019

जिम्मेदारियाँ--लघुकथा

आज वह सोचकर आया था कि पापा से नई घडी और पैंट शर्ट के लिए कह ही देगा. अब तो स्कूल के बच्चे भी कभी कभी चिढ़ाने लगे थे. लेकिन घर की हालत देखकर उसकी कहने की इच्छा नहीं होती थी. जैसे ही वह पापा के कमरे में पहुंचा, पीछे पीछे उसका चचेरा भाई भी आ गया. अभी वह कुछ कहता तभी उसके चचेरे भाई ने अपनी फरमाईस रख दी "बड़े पापा, मेरी साइकिल बिलकुल खचड़ा हो गयी है, इस महीने नई दिला दीजिये".
पापा ने उसकी तरफ प्यार से देखते हुए कहा "ठीक है, इस बार बोनस मिलना है, जरूर खरीद दूंगा. लेकिन संभाल कर चलाना, गिरना मत".
चचेरा भाई प्रसन्न मन से चला गया, उसको लगा कि पापा से इस समय कहने में कोई दिक्कत नहीं है. उसने पापा की तरफ देखा तभी पापा ने पूछ लिया "सब ठीक है ना रवि, पढ़ाई बढ़िया चल रही है तुम्हारी?
"पढ़ाई बढ़िया चल रही है पापा, बस एक नई घड़ी और पैंट शर्ट चाहिए थी", उसने उत्साहित होकर कहा.
पापा की नजरें जैसे कहीं दूर खो गयीं, फिर वह उसकी तरफ देखते हुए बोले "देखता हूँ, इस बार तो छोटे की साइकिल जरुरी है, तुम्हारे सामने ही तो उसको बोला है. अगर पैसे बचे तो जरूर खरीद दूंगा".
इतना बोलकर पापा बाहर निकल गए, उसके मन में आक्रोश भर गया. वह दौड़ते हुए माँ के पास गया और लगभग चिल्लाते हुए बोला "माँ, पापा छोटे की हर बात मान लेते हैं लेकिन मेरे लिए उनके पास पैसा ही नहीं रहता है. आखिर चाचा छोटे के लिए क्यों नहीं खरीदते हैं".
माँ ने उसको पुचकारते हुए अपने पास बैठाया और समझाने लगी "अरे तेरे चाचा कहाँ कमा पाते हैं, पैसा तो तेरे पापा ही कमाते हैं. लेकिन घर के बड़े होने की जिम्मेदारियां भी बहुत बड़ी होती हैं, तुझे भी बाद में समझ आएगा". 
माँ अपने हिसाब से उसे समझाने की कोशिश कर रही थी लेकिन उसे फिलहाल यह गणित समझ में नहीं आ रहा था.

Monday, October 7, 2019

उसका हक़- लघुकथा

जैसे ही छोटू के रोने की आवाज मालती के कानों में पड़ी, वह उठकर भागी. दूसरे कमरे के उसके बिस्तर पर लेटे छोटू की नींद खुल गयी थी, शायद उसने नैप्पी भी गीला कर दिया था.
"अले ले, जग गया मेरा राजा बेटा, भुक्खू लगी है क्या?, मालती ने उसे उठाकर प्यार करना शुरू किया और उसे लाड़ करती हुई ड्राइंग रूम में आ गयी.
ड्राइंग रूम में एक कोने में वह बैठा हुआ अखबार पढ़ रहा था, मालती और छोटू के मिले जुले स्वर से उसकी तन्द्रा भंग हुई. उसके चेहरे पर भी उनको देखकर मुस्कराहट आ गयी. वह उठकर छोटू को लेने ही जा रहा था कि उसकी निगाह छोटी सी कुर्सी पर बैठे बड़े बेटे रोहन पर पड़ी. रोहन का चेहरा तना हुआ था और वह चाह कर भी कुछ बोल नहीं पा रहा था. लेकिन उसके हाव भाव सब कुछ बयां कर रहे थे.
बचपन से ही मंद बुद्धि और बोल सकने में असमर्थ रोहन का वह दोनों यथासंभव ख्याल रखते और छोटू के जन्म के पहले तो मालती के लिए वही सब कुछ था. लेकिन जब से छोटू पैदा हुआ था, मालती चाहकर भी उसे वह समय नहीं दे पा रही थी जो उसे पहले मिलता था. उसने पिछले कुछ समय से यह महसूस किया था और एकाध बार मालती से कहा भी लेकिन उसने हंसकर टाल दिया.
"तुम्हें बेकार का वहम हो रहा है, देखते नहीं हो कि रोहन भी छोटू के साथ कितना खेलता है", मालती शायद वह नहीं देख पा रही थी जो उसे दिखाई दे रहा था.
उसने एक बार मालती की तरफ देखा, वह अभी भी छोटू को हवा में उछाल रही थी. दूसरी तरफ रोहन के चेहरे पर तनाव बढ़ता जा रहा था, उसने कुछ सोचा और उसके कदम रोहन की तरफ बढ़ गए.