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Tuesday, April 27, 2021

असली परिवर्तन- कहानी

 कैशियर प्रवीण ने मोटरसाइकिल पहाड़ी के इस तरफ़ ही खड़ी कर दी, बमुश्किल एक कच्चा रास्ता वहाँ तक गया था जिसपर बहुत सँभालकर ही दो पहिया वाहन चल सकते थे। मुख्य क़स्बे से काफ़ी दूर यह आदिवासी गाँव कुछ इस तरह स्थित था कि सामान्यतया कोई अधिकारी वहाँ जा ही नहीं पाता था। सबसे बड़ी दिक़्क़त थी वहाँ पहुँचना, न तो मोटरसाइकिल वहाँ जाती थी और न ही कोई अन्य वाहन। बस पैदल ही जाना एक तरीक़ा था और यही वजह थी कि कोई-न-कोई बहाना बनाकर लोग वहाँ जाने से कतराते थे। एक बार सरकारी नौकरी मिल गई तो फिर पैदल कौन चलना चाहता है, दो साल की नौकरी होते होते तो क्लर्क भी कार ख़रीदने के लिए सोचने लगता है, अफ़सर की तो बात ही दीगर है।

अगस्त महीने में बरसात लगभग समाप्त हो चुकी थी और चारो तरफ़ हरियाली नज़र आ रही थी। बरसात ख़त्म होने से एक फ़ायदा यह था कि रास्ते में कीचड़ नहीं था वरना वहाँ जाने का इरादा छोड़ना पड़ता। साल के तीन चार महीने तो उन गाँवों में जाने का सोचा भी नहीं जा सकता था। पता नहीं किसी आपदा की स्थिति में ऐसे गाँवों तक मदद कैसे पहुँचती होगी, यह सोचने की बात थी। सोयाबीन की फ़सल खेतों में लग चुकी थी और जगह-जगह आम और जामुन के पेड़ भी अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे थे। कुल मिलाकर मौसम खुशगवार था और ऐसे में उसे किसी पिकनिक स्थल पर जाने जैसी अनुभूति हो रही थी। उसे याद आया अपने कॉलेज के दिन जब उनका ग्रुप दूरदराज़ के गाँवों में पिकनिक मनाने जाता था और हरियाली को देखकर उनकी आँखों को कितना सुकून मिलता था। दरअसल कॉलेज के उसके ग्रुप में शायद ही कोई ऐसा था जो गाँव से था और गाँव की तकलीफ़ का अंदाज़ा भी लगा पाना उनके बस की बात नहीं थी।

जब बैंक में इंटरव्यू देने जाना था तब उसने कभी यह सोचा भी नहीं था कि उसे इतने पिछड़े इलाक़े में काम करने का मौक़ा मिलेगा। वैसे ऐसी बात भी नहीं थी कि उसकी इच्छा ऐसी जगहों पर काम करने की नहीं थी। भले ही वह गाँव में रहा नहीं था लेकिन कहीं-न-कहीं उसकी संवेदना के तार गाँव और ग़रीबों से जुड़े हुए थे। कोर्स की पढ़ाई के अलावा उसकी हिंदी कहानियों तथा उपन्यास पढ़ने में बहुत रुचि थी और ग्रामीण परिवेश पर लिखने वाले लेखक उसे बेहद पसंद थे। शायद वह ख़ुद गाँव में नहीं रहा था इसलिए भी उसे वह परिवेश बहुत आकर्षित करता था। और बेशक इन्हीं सब वजहों से ही वह एक संवेदनशील इनसान भी बन पाया था।

नौकरी के शुरुआती दौर में वह छोटे क़स्बों तथा छोटे शहरों में ही रहा था और इस वर्ष उसे पहली बार रूरल पोस्टिंग मिली थी। दरअसल बैंक के एक नियम के चलते उसको ग्रामीण क्षेत्र में कार्य करना ज़रूरी था वरना उसके अगले पदोन्न्ति में दिक़्क़त आती। बैंक का उज्जैन अंचल ऐसा अंचल था जिसमें अधिकतर शाखाएँ या तो ग्रामीण क्षेत्रों में थी या छोटे जगहों पर थीं। इसलिए यहाँ पर ग्रामीण पदस्थापना पूरा करने में कोई दिक़्क़त नहीं आनी थी। उसे पोस्टिंग मिली रतलाम से लगभग 45 किमी दूर एक ऐसी जगह पर जहाँ सिर्फ़ गाँव थे, हरियाली थी, पहाड़ थे और प्राकृतिक ख़ूबसूरती थी। इसके साथ-साथ एक और बात थी जो दरअसल परेशान करने वाली थी, और वह थी उस इलाक़े की ग़रीबी। लेकिन यहाँ पर आनेवाले अन्य लोग सबसे ज़्यादा परेशान इसलिए रहते थे कि यहाँ बड़ी-बड़ी दुकानें या होटल नहीं थे। जब उसकी पोस्टिंग भी इस शाखा में हुई थी तो कई लोगों ने उसे नेक सलाह देने की कोशिश की "अरे साहब लोगों से बात करके उज्जैन के आसपास की ग्रामीण शाखा में पोस्टिंग करवा लो। रूरल का रूरल भी हो जाएगा और उज्जैन से आना-जाना भी हो जाएगा।” उसे भी पता था कि बहुत से लोग येन-केन-प्रकारेण शहरों के आसपास ही अपनी नौकरी गुज़ार देते हैं। उसने उन प्रलोभनों को दरकिनार करके ख़ुशी-ख़ुशी अपनी नई शाखा में जाना स्वीकार कर लिया तो उन शुभचिंतकों को लगा कि कुछ ही दिन में इसकी अकल ठिकाने लग जाएगी।

"पागल मत बनो, कुछ भी नहीं है वहाँ। न कोई मार्केट, न होटल, पक जाओगे वहाँ।”

ख़ैर उसके लिए ये चीज़ें फ़िलहाल कोई मायने नहीं रखती थीं, वह तो कहीं-न-कहीं यही चाहता था। बल्कि उसे तो यह भी लगा कि इसी बहाने वह प्रकृति से और गाँवों से और क़रीब से जुड़ जाएगा।

"मुझे कोई दिक़्क़त नहीं होगी, आख़िर नौकरी ही तो करनी है", उसने मुस्कुराकर जवाब दिया तो बात ख़त्म हो गई।

उज्जैन से रतलाम और फिर रतलाम से उस गाँव की शाखा में पहुँचते पहुँचते शाम हो गई। जैसे ही वह शाखा में पहुँचा, वहाँ के वर्तमान प्रबंधक की साँस में जैसे साँस आ गई। दरअसल पिछले दो महीने में दो लोग, जिनकी पोस्टिंग उस शाखा में हुई थी, अपना तबादला रद्द करा चुके थे और वह वहाँ तीन साल से ज़्यादा समय से पोस्टेड या यूँ कहें कि फँसा हुआ था।

"आइए शर्माजी, ज़्यादा दिक़्क़त तो नहीं हुई यहाँ आने में?

कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनका उत्तर पूछनेवाले को अमूमन पता होता है और उसने भी वही उत्तर दिया "कोई ख़ास दिक़्क़त नहीं हुई, बस रतलाम से यहाँ आने में समय लग गया।”

"आप तो अपनी मोटरसाइकिल ले ही आएँगे, फिर दिक़्क़त नहीं होगी। वैसे शाखा में भी एक मोटरसाइकिल है और हम लोग रतलाम जाने के लिए उसका इस्तेमाल कर लेते हैं", वर्तमान प्रबंधक ने मुस्कुराते हुए कहा। उनकी मुस्कराहट इसलिए भी ज़्यादा थी कि अब उनको अपनी मनचाही शहरी जगह पर नियुक्ति मिल जाएगी।

अगला दो दिन उसका स्टाफ़ से बात करने में और गाँव के प्रधान और कुछ अन्य लोगों से मेल मुलाक़ात में बीत गया। तीसरे दिन पुराने प्रबंधक जब उस शाखा से अंततः विदा हुए तो उनके चेहरे पर जो राहत नज़र आ रही थी, वह सबको दिखाई पड़ रही थी।

"जैसे ही दो साल हो जाएगा, आप यहाँ से अपना तबादला करवा लीजिएगा। हमारी तरह तीन साल अगर यहाँ फँस गए तो बहुत तकलीफ़ होगी", जाते-जाते पुराने प्रबंधक ने उनको चुपके-से गुरुमंत्र भी दे-दिया।

उसने हामी में सर हिलाया और उनको विदा करके अपनी सीट पर बैठ गया। अब उसने एक पूरी निगाह शाखा के अंदर डाली, फर्नीचर पुराना तो था ही, टूटा हुआ भी था। दीवार पर लगा हुआ पेण्ट शायद दसियों साल पुराना था और बिजली के तार इतने बेतरतीबी से चारो तरफ़ फैले हुए थे कि उसे देखकर उलझन होने लगी। सबसे पहले शाखा का रखरखाव दुरुस्त करना होगा, पिछले कई प्रबंधकों ने उसपर कोई भी ध्यान नहीं दिया था। ग्राहकों के लिए रखी हुई कुर्सियाँ भी जाने किस जमाने की लग रही थी और बाथरूम का तो बेहद बुरा हाल था। बस एक ही चीज़ बेहतर थी कि वहाँ कोई महिला कर्मचारी पदस्थ नहीं थी वरना उसके लिए यहाँ काम करना कितना कठिन होता।

उसने अपने जूनियर अधिकारी को बुलाया और बात करने लगा "आप लोगों को ख़राब नहीं लगता है कि शाखा इस हाल में है। आख़िर इसे साफ़-सुथरा रखने में क्या दिक़्क़त है?

उस अधिकारी ने कोई जवाब नहीं दिया लेकिन उसे समझ में आ गया कि यहाँ किसी को इन चीज़ों में दिलचस्पी नहीं है। कुछ ही देर में उसको पता चल गया कि एक दफ्तरी और कैशियर को छोड़कर बाक़ी सभी स्टाफ़ रतलाम से आते-जाते हैं और उनका रोज़ का दो-तीन घंटा सिर्फ़ इसी में लग जाता है। उसे यह भी पता चल गया कि पिछले तीन प्रबंधक अपनी पोस्टिंग को बस किसी तरह ढो रहे थे, उनको लगता था जैसे उन्हें सजा के तौर पर यह शाखा दी गई है। अब अगर सजा ही मान लिया है तो किसी को इसके विकास या रखरखाव से क्या फ़र्क़ पड़ने वाला था। चूँकि यह शाखा आंचलिक कार्यालय से भी काफ़ी दूर और काफ़ी अंदर थी तो वहाँ से भी साल दो साल में ही कोई आता था और फटाफट भाग लेता था। वैसे भी उनके आने का मुख्य कारण रतलाम आना होता था, रतलाम सोने के लिए बहुत मशहूर था और वहाँ सोना सुद्ध और सस्ता भी मिलता था। विभिन्न प्रदेशों से व्यापारी वहाँ सोना ख़रीदने आते थे और इसी क्रम में अन्य जगहों से भी अधिकारी आया करते थे। मशहूर तो रतलाम का सेव भी था लेकिन सिर्फ़ सेव के लिए शायद ही वहाँ कोई आता।

उसने दफ्तरी को बुलाया और सबसे पहले शाखा के रखरखाव के बारे में बात करने लगा। चूँकि दफ्तरी वहीं रहता था, लोगों में उसकी अच्छी पहचान थी इसलिए उससे बेहतर कोई अन्य स्टाफ़ उसे इस कार्य के लिए नहीं लगा। थोड़ी देर के बातचीत में ही दफ्तरी के जवाब ने उसे सोचने पर मजबूर कर दिया "साहब, किसी भी बड़े साहब ने शाखा के बारे में सोचा ही नहीं, उन्हें तो बस सुबह यहाँ आने और शाम होते ही यहाँ से भागने की जल्दी रहती थी। मैंने ख़ुद आगे बढ़कर उनसे कहा कि अपनी शाखा को ठीक-ठाक करा लिया जाए तो किसी ने भी हाँ नहीं किया।”

उसके दिमाग़ में अपने एक सीनियर अफ़सर, जिनकी वह बहुत इज़्ज़त करता था, की बात कौंध गई "जब किसी को अपनी पोस्टिंग पनिशमेंट पोस्टिंग लगने लगती है तो सबसे ज़्यादा नुक़सान संस्था का ही होता है।” उसे इस शाखा में यह चीज़ स्पष्ट रूप से नज़र आ रही थी। अधिकतर स्टाफ़ आने-जाने में ही लगा रहता था और शाखा का व्यवसाय इतना ज़्यादा भी नहीं था कि उससे बहुत फ़र्क़ पड़े। लेकिन उसे व्यवसाय में वृद्धि नहीं होने की एक साफ़ वजह तो पता चल ही गई थी।

"आप तुरंत किसी कारीगर को बुलवा लीजिए जो यहाँ मरम्मत कर सकता हो और शाखा की पुताई के लिए भी किसी को खोजिये", उसने दफ्तरी से कहा तो उसका चेहरा चमक उठा।

'ठीक है साहब, मैं आज ही बुलवाता हूँ, मेरे पहचान के मिस्त्री हैं इस गाँव में।”

"एक और बात, मेरे रहने के लिए भी कोई ठीकठाक मकान ढूँढ़िए यहाँ, मेरे लिए रोज़ अपडाउन करना ठीक नहीं रहेगा", उसने दफ्तरी को कहा तो उसके आश्चर्य का पारावार ही नहीं रहा।

अगले दो हफ़्ते शाखा की मरम्मत, रँगाई पुताई और अपना घर खोजकर उसमें रहने की व्यवस्था में लग गया। इस बीच शाखा के बाक़ी स्टाफ़ को यह महसूस हो गया कि अब तो भागने से नहीं चलेगा, आख़िर ख़ुद मैनेजर गाँव में रहने लगा है। इसका नतीजा यह निकला कि जो शाखा ५ बजे के बाद बंद होने लगती थी, अब ६ बजे के बाद भी खुली रहने लगी। गाँव के लोगों में भी एक उत्साह जगा कि अब उनको बैंक से बेहतर सेवा मिलेगी और वे भी शाखा में ज़्यादा संख्या में आने लगे। लगभग १५ दिन बाद ही शाखा का कायाकल्प हो चुका था और जो शाखा किसी सरकारी दफ़्तर जैसी नज़र आती थी वह अब एक बेहतर जगह नज़र आने लगी। इसी बीच आंचलिक कार्यालय से बात करके उसने नया बोर्ड लगवा दिया और एकाध नया कंप्यूटर भी लग गया।

उस गाँव और आसपास के ३० किमी में वह एकलौती बैंक शाखा थी और जितनी भी सरकारी योजनाएँ थीं, वह सब उसी के माध्यम से लागू होती थी। हजारो की संख्या में पेंशन खाते, शून्य राशि के जनधन खाते, मनरेगा के मज़दूरों के खाते, बच्चों की छात्रवृत्ति के खाते और तमाम किसानों के कृषि तथा अन्य छोटे मोटे ऋण के खाते। मतलब खुदरा काम इतना रहता था कि दिन कैसे ग्राहकों के साथ बात करते और उनकी समस्या हल करते बीत जाता, पता ही नहीं चलता था। साथ ही साथ चूँकि गाँव में इंटरनेट बहुत धीमा चलता था इसलिए अक्सर काम भी सुस्त चाल से ही होता था। महीना बीतते बीतते शाखा के व्यवसाय में भी वृद्धि नज़र आने लगी और अब उसने अपना ध्यान शाखा के बजट को पूरा करने के लिए लगाया। पिछले कई सालों में न तो किसी मैनेजर ने व्यवसाय वृद्धि के लिए कोई ख़ास प्रयास किया था और न ही आंचलिक कार्यालय ने इसके बारे में ज़्यादा पूछताछ की थी। इसलिए उसे लग गया था कि वह बड़े आराम से अपने शाखा को काफ़ी आगे ले जा सकता है।

जैसे-जैसे आसपास के गाँव के लोग उस शाखा से जुड़ते गए, व्यवसाय बढ़ता गया। सरकार द्वारा लाई गई हर योजना चूँकि बैंक के माध्यम से ही लागू होनी थी इसलिए काम करने का और लोगों की मदद करने का बहुत अच्छा मौक़ा मिला था उसको। एक मैनेजर को एक साथ कितने मोर्चों पर जूझना पड़ता है, अब उसे महसूस हो रहा था। पहले तो सिर्फ़ अपना विभाग ही देखना पड़ता था, चाहे वह डिपाजिट हो या अग्रिम। अब तो डिपाजिट भी बढ़ाना था, ऋण भी बढ़ाना था, वसूली भी करनी थी तथा अन्य तमाम छोटी-छोटी चीज़ें भी उसी को देखनी थी। स्टाफ़ को अबतक उसके कार्यप्रणाली के बारे में पता चल गया था इसलिए अधिकांश लोग उसका साथ देने के लिए तैयार हो गए। दरअसल एक बात हर संस्थान में लागू होती है कि जैसा संस्थान का मुखिया होता है, अधिकांश लोग उसी तरह से बन जाते हैं। और एकाध अपवाद तो अपने ख़ुद के भी परिवार में रहता है तो संस्थान उससे अछूता कैसे रह सकता है।

उसने शाखा को लेकर सबकी सहमति से कुछ नियम बनाए। हर हफ़्ते सभी लोग आधे घंटे के लिए साथ बैठेंगे और शाखा के लिए क्या ज़रूरी है या किस चीज़ में और बेहतर करने की ज़रूरत है, इसपर खुली चर्चा होगी। हर स्टाफ़ को अपना मत रखने का पूरा अधिकार होगा और किसी का भी सुझाव, चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो, उसपर भी राय मशविरा किया जाएगा। पहले तो लोगों को लगा कि ये नियम सिर्फ़ काग़ज़ पर ही रहेंगे और एकाध महीने में इसे सबसे पहले बनाने वाला ही भूल जाएगा। उनका यह अनुभव पिछले कई सालों का था, जब भी कोई नया प्रबंधक आता, शुरूआत में इसतरह की बातें करता और कुछ दिन बाद सब भूल जाता। लेकिन दूसरा महीना बीतते बीतते स्टाफ़ को अहसास हो गया कि इस बार बात अलग है तो हर स्टाफ़ अपनी तरफ़ से एक से बढ़कर एक सलाह रखने लगा। समय पर शाखा को खोलना भी इन्हीं में से एक नियम था और वह ख़ुद रोज़ समय से पहले शाखा में मौजूद रहता था। अब रतलाम से आने वाले स्टाफ़ भी घर से थोड़ा पहले निकलने लगे ताकि वह समय पर बैंक पहुँच सकें। उसने कभी भी किसी को देर से आने के लिए कुछ कहा नहीं लेकिन उसका तरीक़ा ऐसा था कि लोग अपने-आप ही इसका पालन करने लगे। एक बार उसने जो भी स्टाफ़ देर से आया, उसको अपनी तरफ़ से चॉकलेट दिया और दूसरी बार जो समय से आए थे उनको चॉकलेट। तीसरी बार उसे कुछ कहने या करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी और स्टाफ़ के लोग उसके सामने कटोरी में पड़ी चॉकलेट यूँ ही लेकर खाने लगे।

उस शाखा से लगभग 30 गाँव जुड़े हुए थे और आज तक कोई भी प्रबंधक उन सभी गाँवों में नहीं गया था। वैसे तो स्टाफ़ भी शायद ही सभी गाँवों में गया था लेकिन काग़ज़ पर तो हर गाँव में निरिक्षण दर्ज था। उसने अपने ऋण के अधिकारी बंसल को एक दिन बुलाया और उससे इसपर चर्चा करने लगा।

"आप तो पिछले दो साल से यहाँ हैं, आप सभी गाँवों में गए हैं।”

थोड़ा सोचकर बंसल बोला "सर सभी गाँवों में तो नहीं गया हूँ लेकिन अधिकांश गाँवों में गया हूँ। कुछ गाँव ऐसे आदिवासी इलाक़ों में हैं कि वहाँ जाने का कोई साधन ही नहीं मिलता है, अपनी मोटरसाइकिल भी नहीं जाती है।”

"तो फिर उन गाँवों के लोगों को कैसे ऋण दिया जाता है, एक बार तो देखना ही पड़ता होगा?, उसने सवाल पूछा।

'सर वहाँ का बैंक मित्र हमको रिपोर्ट दे देता है और हम लोग उसी को मानकर ऋण दे देते हैं। वैसे जो कैशियर प्रवीण हैं, उनको सब पता है", बंसल ने अपना पक्ष रखा।

'ठीक है, आप ऐसे गाँवों की सूची मुझे दीजिए जहाँ आप नहीं गए हैं, मैं देखता हूँ", उसने मुस्कुराकर कहा।

अब उसकी पहली प्राथमिकता ऐसे गाँव ही थे जहाँ कोई जाता नहीं था। अब वहाँ किसी ज़रूरतमंद को, जिसे वास्तव में ऋण की ज़रूरत है, मदद मिली है या नहीं, यह देखना भी उसके लिए उतना ही ज़रूरी हो गया था। शाम होते होते उसे ऐसे पाँच गाँवों की सूची मिल गई जहाँ कोई जाता नहीं था। उसने कैशियर प्रवीण को अपने केबिन में बुलाया।

"अच्छा प्रवीण, ये पाँच गाँव हैं जहाँ आपके सिवा कोई नहीं जाता है। ये गाँव सचमुच ऐसी जगह हैं जहाँ जाना संभव नहीं है या कोई और वजह है", उसने सूची प्रवीण के सामने रखते हुए कहा।

प्रवीण ने सूची उठाई और देखते हुए बोला "साहब, इन गाँवों में सड़क नहीं जाती है, ये पहाड़ी के दूसरी तरफ़ के आदिवासी गाँव हैं और बहुत ग़रीब हैं। इसीलिए मेरे अलावा कोई यहाँ नहीं जाता। अगर यहाँ जाना है तो बता दीजिए, मैं चला जाऊँगा।”

"मैं भी चलना चाहता हूँ प्रवीण, तुम क्रायक्रम बना लो फिर निकल चलेंगे। एक दिन में एक गाँव तो जा ही सकते हैं हम लोग, है कि नहीं?

"हाँ साहब , दो दिन में तीनों गाँव चल सकते हैं। लेकिन पैदल ख़ूब चलना पड़ेगा और पहाड़ी भी चढ़ना पड़ेगा, आप चल लेंगें न!

उसने ठहाका लगाया "अरे मैं कोई बूढ़ा हूँ या मुझे कोई बीमारी है जो चल नहीं सकता। अगले हफ़्ते चलेंगे हम लोग, ठीक है।”

उन गाँवों में जाने से पहले वहाँ पर बैंक की किस योजना में कितने लोगों की मदद की गई है और वर्तमान में उन लोगों और उनके ऋण ख़तों की क्या स्थिति है, इसका आकलन करना उसे उचित लगा। उसने बंसल से उन गाँवों के लोगों के ऋण ख़तों का ब्यौरा मँगवाया। छोटे-छोटे किसान क्रेडिट कार्ड, मुद्रा योजना के ऋण और सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्र में घर बनाने के लिए भी ऋण दिए गए थे। बहुत से शून्य बैलेंस वाले खाते भी खुले हुए थे और उन गाँवों के दो-चार स्वयं सहायता समूह के खाते भी थे।

उसने गिनती की तो उन पाँच गाँवों में घर बनाने के लिए लगभग 50 लोगों को ऋण दिया गया था और लगभग सभी खातों की स्थिति ख़राब थी। अन्य कृषि ऋण तथा मुद्रा ऋण में भी कमोबेश यही स्थिति थी। उसने बंसल को बुलाकर पूछा "इन गाँवों के अधिकांश ऋण खाते ठीक नहीं हैं, आपने कभी कारण जानने की कोशिश की?

बंसल इस सवाल के लिए तैयार नहीं था, दरअसल ऋण विभाग में बैठने वाला हर अधिकारी सिर्फ़ बड़े ऋण खातों के बारे में ही जानकारी रखता था। उसके पीछे दो वजहें थीं, एक तो यह कि हर शाखा में इतने ज्यादे ऋण खाते थे कि सभी खातों के बारे में जानकारी रखना मुश्किल था। दूसरी वजह यह थी कि ऐसे छोटे ऋण खाते किसी भी शाखा के व्यवसाय पर बहुत असर नहीं डालते थे।

"सर, इतना समय कहाँ होता है कि इन छोटे-छोटे ऋण खातों के बारे में सोचें। वैसे भी स्थानीय नेता इन लोगों को बता देते हैं कि ये पैसा सरकार दे रही है और इसे लौटाने की ज़रूरत नहीं होती", बंसल के जवाब में थोड़ी सच्चाई थी।

"लेकिन अगर नेता इनको बरगलाते हैं तो हमारी भी तो ज़िम्मेदारी है कि उनको समझाए। ख़ैर आगे से यह बात हम लोग सबको समझाएँगे कि यह पैसा लोगों का पैसा है जिसे वापस लौटाना ज़रूरी है", उसने बंसल को समझाया।

"अच्छा एक बात बताओ, ये जो घर बनाने के लिए लोगों को ऋण दिए गए हैं, लोगों ने अपना घर बनवाया है या नहीं? दरअसल इसके पहले वह जिस प्रदेश में था, वहाँ ऐसी कोई योजना नहीं थी।

बंसल ने लंबी साँस ली और बताने लगा "सर, अगर सच कहूँ तो बहुत कम लोगों ने अपने घर बनाए हैं। आपको भी पता ही है कि सरकारी विभाग में कितना भ्रष्टाचार होता है, एक चौथाई पैसा तो विभाग और प्रधान मिलकर खा जाते हैं। उसके बाद जो मिलता है उसमें उनकी दीवार भी खड़ी नहीं हो पाती है, मकान बनाना तो दूर की बात है।

उसका दिमाग़ भी परेशान हो गया, योजनाएँ तो कमोबेश ठीक ही बनती हैं लेकिन उनका कृयान्वयन ठीक नहीं होता है। सरकार की ग़रीबी हटाओ योजना में काग़ज़ पर तो हर जगह ग़रीबों की मदद की गई है लेकिन वास्तविकता में सिर्फ़ सरकारी कर्मचारी और राजनेता ही अमीर हुए हैं, ग़रीबी तो कम नहीं हुई है। ख़ैर उसे अपने तरफ़ से हर संभव कोशिश करनी है कि ज़रूरतमंद को मदद मिले और उसका जीवनस्तर ऊपर उठ सके।

अगले तीन चार दिन में उसने उन गाँवों की पूरी जानकारी इकट्ठा कर ली। वहाँ किस चीज़ की खेती होती है, वहाँ और क्या-क्या व्यवसाय होता है, आदिवासी समाज का रहन-सहन कैसा है। इसके पहले वह किसी आदिवासी गाँव में नहीं गया था इसलिए वह थोड़ा उत्साहित भी था वहाँ जाने के लिए। नौकरी में आने के पहले तक तो उसे यही लगता था कि आदिवासी समाज आज भी अलग-थलग रहता है और उनके यहाँ विकास लगभग न के बराबर है। लेकिन नौकरी में आने के बाद उसकी धरना बदल गई थी और अब वह इसे साक्षात देखने भी जा रहा था।

उसने पहला गाँव "सोजेपुर' चुना जो सबसे नज़दीक तो था ही, वहाँ ऋण के सबसे ज़्यादा खाते भी थे। कई खाते घर बनाने के ऋण के भी थे और सबमें पैसा न के बराबर ही आ रहा था। बस सरकार द्वारा दिए जा रहे ब्याज़ के अनुदान से ही थोड़ी-बहुत वसूली हो रही थी। कैशियर प्रवीण से उसने इस गाँव में रविवार के दिन चलने के लिए कहा तो वह सहर्ष तैयार हो गया।

"ठीक ही रहेगा साहब, रविवार को दोपहर में चलते हैं, मैं आपके घर आ जाऊँगा", प्रवीण ने कहा तो उसे राहत मिली। दरअसल छुट्टी के दिन काम करना बहुत से लोगों को पसंद नहीं होता है और उसे पता नहीं था कि प्रवीण भी तौयार होगा। उसके लिए तो यह अच्छा ही था कि रविवार का दिन भी मज़े में बीत जाएगा, अकेले दिन काटना भी मुश्किल ही होता है। अक्सर रविवार को वह या तो शाखा में ही चला जाता था, पेंडिंग काम निपट जाते थे, या कभी-कभी रतलाम निकल जाता था। वहाँ की शाखा के कुछ दोस्तों से इसी बहाने मुलाक़ात हो जाती थी।

रविवार को दोपहर में खाना खाकर वह प्रवीण के साथ सोजेपुर के लिए निकला। प्रवीण ने बता दिया था कि पहाड़ के उस तरफ़ लगभग छह किमी पैदल चलना पड़ेगा, तब वहाँ पहुँच पाएँगे। आख़िरकार पहाड़ी के इस तरफ़ मोटरसाइकिल खड़ा करके जब दोनों पहाड़ी की तरफ़ बढ़े तो उसने पूछ लिया "यहाँ से मोटरसाइकिल चोरी तो नहीं हो जाएगी प्रवीण?

"नहीं साहब, हम लोग यहाँ अक्सर खड़ा करके जाते हैं, कोई नहीं ले जाता। वैसे भी हैंडल लॉक लगा दिया है मैंने।”

अगले पंद्रह मिनट में दोनों पहाड़ी पार कर चुके थे और कुछ किमी दूर गाँव सोजेपुर नज़र आ रहा था। दूर से तो पेड़ों के बीच में सिर्फ़ छप्पर के ही मकान दिखाई दे रहे थे। खेतों की पगडंडी से होते हुए वे जब गाँव पहुँचे तो बाहर एक गुमटी मिली जिसमें गुटका, बीड़ी, कुछ नमकीन के पैकेट और बिस्किट इत्यादि नज़र आ रहे थे। अब इतना तो उसे समझ में आ गया था कि विकास की हवा यहाँ थोड़ा-बहुत तो पहुँच ही गई है।

सामने से एक व्यक्ति आता दिखाई दिया जिसने उनको नमस्कार किया। छोटे गाँवों में यह ख़ासियत होती है कि गाँववाले सरकारी कर्मचारियों को पहचानते हैं। प्रवीण ने नमस्कार का जवाब दिया और दोनों आगे बढ़ गए। कहीं कहीं उसे ईंट की दीवार वाले अर्धनिर्मित मकान दिखाई दे रहे थे और उसने अंदाज़ा लगा लिया कि इन्हीं लोगों ने घर बनाने के लिए ऋण लिए होंगे। इक्का-दुक्का लोग मिलते गए, कुछ घरों के आगे गाय भी बँधी हुई नज़र आई। वैसे अधिकांश घरों के सामने बकरियां ज़रूर नज़र आ रही थी और कहीं कहीं साइकिल भी खड़ी थी। गाँव के लगभग आख़िर में वह घर था जहाँ उनको जाना था, जोखू का घर। जोखू ने भी घर बनवाने के लिए ऋण लिया था और उसकी क़िस्त समय से जमा नहीं कर रहा था।

जोखू के घर के सामने पहुँचते ही उसे छप्पर का घर दिखा और साथ ही दो ईंट की दीवारें भी। घर के सामने चार बकरियां बैठी थीं जो उनको देखते ही उठ खड़ी हो गईं। दो छोटी-छोटी बच्चियाँ भी अधनंगे वहाँ खेल रही थीं और कुछ लकड़ियाँ भी एक किनारे रखी हुई थीं। प्रवीण ने आवाज़ लगाई "जोखू भाई, कहाँ हो? बाहर आओ, साहब मिलने आए हैं।”

दो-तीन आवाज़ लगाने के बाद झोपड़ी से एक महिला बाहर निकली, प्रवीण समझ गया कि वह जोखू की जोरू है। अब उसने भी उस औरत को ध्यान से देखा, बेहद कमउम्र थी उसकी और एक-दो तीन महीने का बच्चा भी गोद में था। एक साड़ी जो बदरंग हो चुकी थी, उसके शरीर को ढकने की कोशिश कर रही थी। इतनी कमउम्र में तीन बच्चे, उसे सदमा सा लगा।

"अरे जोखू भाई कहाँ है, उसे भेजो", प्रवीण ने फिर से कहा।

थोड़ी देर बाद उस महिला ने दर्दभरे स्वर में कहा 'आज तीसरा दिन है, अभी तक लौटा नहीं है। कुछ काम पर जाने के लिए बोलकर गया था।”

ओह, अब क्या किया जाए, उसे समझ में नहीं आया। ख़ैर उसने अपनी तरफ़ से समझाते हुए कहा "अरे जोखू बैंक में पैसा नहीं भर रहा है, उसको पैसा भरने के लिए बोलना।”

आज पहली बार उसे लग रहा था कि उसे पैसे भरने के लिए नहीं कहना चाहिए था। लेकिन नौकरी भी तो करनी है। अगर जोखू आएगा तो उससे बात करके मदद करने का कोई-न-कोई रास्ता वह निकाल ही लेगा।

"घर में खाने के लिए भी कुछ नहीं बचा है साहब।”, जोखू की पत्नी की आवाज़ ने जैसे उसे हिलाकर रख दिया। उसने प्रवीण की तरफ़ देखा, प्रवीण भी ख़ामोश था। आँखों ही आँखों में उसने प्रवीण को वापस चलने के लिए इशारा किया और धीरे-से उसने पैंट की जेब में हाथ डालकर तीन चार सौ रुपये निकाले। पहले तो उसने सोचा कि जोखू की पत्नी को वह सीधे ही रुपया पकड़ा दे लेकिन फिर उसका मन गंवारा नहीं किया। उसने धीरे-से वह पैसे वहाँ गिरा दिए और आगे चल दिया। अब किसी और गाँव वाले के घर उसकी जाने की इच्छा नहीं हुई।

"प्रवीण, यहाँ सबकी हालत तो ऐसी ही लगती है, ऐसा करते हैं कि अगली बार इनको इकट्ठा करके बात करते हैं और इनकी आमदनी बढ़ाने के लिए कुछ बेहतर काम करते हैं।”, उसने वापस चलते हुए कहा। उसे अब यह महसूस हो रहा था कि उसका असली काम अब शुरू होने वाला है, जब तक ये गाँव सही अर्थों में आगे नहीं बढ़ते, उसके लिए देश के विकास का कोई अर्थ नहीं होगा।


Saturday, March 27, 2021

बेबसी--कहानी

ऑफिस से निकलते समय एक बार फिर रत्ना का फोन आ गया " सब्जी जरूर ले आईयेगा, आप हमेशा भूल जाते हैं. और कम से कम आलू और प्याज़ तो जरूर ही लाना है, कुछ भी नहीं है घर में, मैं तीन दिन से कह रही हूँ ".

मन भी अजीब है, जो याद रखना चाहिए, वह भूल जाता है और जिसे भूलना जरुरी हो, वह हमेशा याद आता रहता है. खैर आज तो सब्जी लेकर ही घर जाना है, उसने भी सोच लिया था. उसने नीचे पार्किंग से कार निकाली और चल पड़ा घर के रास्ते पर. हमेशा की तरह भीड़ ही भीड़ सड़क पर नज़र आ रही थी, कभी कभी तो उसे यह भी लगता कि लोग अगर सड़क पर नहीं निकलते तो घर में रहने की जगह ही कम पड़ जाती. इन्हीं ख्यालों में खोया वीरेश भीड़ में सबसे बचते, बचाते धीरे धीरे कार चलाते हुए जा रहा था.

दूर से ही सब्जी मंडी दिख गयी, ऐसा लगता था कि मंडी में तो साइकिल भी नहीं जा पायेगी, उसकी कार कैसे जाएगी उस रास्ते से. जब भी वो इस मंडी में आता, हर बार उसे ऐसा ही लगता, लेकिन किसी तरह वो कोई जगह ढूँढ कर कार खड़ा करता और सब्जी लेकर निकल जाता. शायद इसी भीड़ की वजह से वो यहाँ आने से कतराता भी था और जब तक बिलकुल ही जरुरी न हो, यहाँ आना नहीं चाहता था. कई बार तो रत्ना ही रिक्शा से चली जाती थी और उसे राहत मिल जाती, लेकिन आज तो आना ही पड़ गया. जैसे जैसे मंडी नज़दीक आ रही थी, उसकी घबराहट बढ़ती जा रही थी. खैर किसी तरह मंडी के अंदर घुस तो गया कार से, लेकिन कहीं भी गाडी खड़ी करने की जगह नहीं दिख रही थी. एक नज़र उसने अपने हमेशा की दुकान पर डाली लेकिन आज उसके सामने तो क्या, कहीं आस पास भी कोई खाली जगह नज़र नहीं आ रही थी. मायूसी में धीरे धीरे कार आगे बढ़ाते हुए वो मंडी के लगभग बाहर आ गया तभी उसे पार्किंग की जगह दिखाई दी.

कार पार्क करते समय उसने अपने दाहिनी तरफ देखा, एक बुजुर्ग व्यक्ति एक ठेले पर आलू, प्याज़ और कुछ सब्ज़ियां भी रखे हुए था. एक बार तो उसने सोचा कि अपनी पुरानी दूकान पर जाए, लेकिन फिर दूरी और भीड़ दोनों को देखते हुए उसने विचार त्याग दिया. वैसे अमूमन अपने सब्जीवाले, दूधवाले या हज्जाम को बदलना बहुत मुश्किल होता है, उनकी एक आदत ही पड़ जाती है. बस किसी ख़राब अनुभव के चलते ही इंसान इनको बदलना चाहता है. चलो आज इसी के यहाँ से ले लेते हैं, सोचते हुए वह दुकान पर जा खड़ा हुआ. आदत के अनुसार अपने आप उसके मुँह से निकल गया "आलू कैसे दिए दादा".

बुजुर्ग ने सर उठाया, सामने एक बढ़िया कपड़े पहने व्यक्ति को देखकर एक बार तो हड़बड़ा गया, शायद आदत नहीं थी ऐसे लोगों को अपने ठेले पर देखने की.

"१२ रुपये किलो दिए हैं, आपको ११ लगा देंगे साहब", कहते हुए उसने अपना गमछा उठाया और सामने रखी सब्जियों को झाड़ने लगा.

"ठीक है, ५ किलो दे दो, और २ किलो प्याज, दो किलो बैगन और एक लौकी भी दे दो", बोलकर वो फोन पर बात करने लगा.

बुजुर्ग ने अपना पुराना तराजू उठाया और उसपर एक एक आलू रखने लगा. फोन पर बात करते हुए उसकी निगाह बुजुर्ग पर पड़ी और वो उसे ध्यान से देखने लगा. जिस तरीके से वो बुजुर्ग सब्जीवाला एक एक आलू देख भाल के तौल रहा था, उसे अपने पिछले सब्जी वाले की याद आ गयी.

एक बार कोई ग्राहक सब्जी अपने हाथ से उठा कर रख रहा था तो वह बिगड़ गया था. "अरे, सोना खरीद रहे हो क्या, सब्जी ही तो है, इतना छाँट रहे हो इसको".

इधर वो इन्हीं ख्यालों में डूबा हुआ था और उधर बुजुर्ग ने आलू तौला और फिर ऊपर से कुछ और आलू डाल दिए थैले में. फिर चुन चुन कर प्याज, बैगन और लौकी भी तौला और ऊपर से एकाध अलग से डाल दिया उसने. सब थैले रख कर थोड़ी धनिया, मिर्ची डाली उसने और पूछा "कुछ और दूँ साहब".

"बस हो गया, रहने दो अब", और उसने जेब से रुपये निकाले और सब्जीवाले की तरफ बढ़ा दिया. बुजुर्ग सब्जीवाला हिसाब जोड़ने में लग गया और जब तक वो जोड़ रहा था, उसने थैला उठाया और कार में रखने लगा.

तभी सब्जीवाले का ध्यान वीरेश पर गया और वो दौड़ कर आया "अरे साहब आपने क्यों उठाया, मैं खुद उठाकर रख देता इसको", उसके चेहरे से परेशानी झलक रही थी.

"कोई बात नहीं दादा, ठीक है. पैसे पूरे हैं ना या और दूँ".

"ये ले लीजिए, इतने बचते हैं साहब", कहते हुए बुजुर्ग ने कुछ रुपये उसको पकड़ाए. वो रुपये उसे बुजुर्ग को वापस देना ठीक नहीं लगा, कहीं दया न समझ ले वो, इसलिए पैसे जेब में डाले और कार में बैठ कर घर निकल गया.

घर पहुँच कर उसने अपना बैग और थैला उठाया और रत्ना को थैला पकड़ाते हुए बोला "आज एक बूढ़े सब्जीवाले से सब्जी ली मैंने, बहुत भला आदमी था".

रत्ना ने एक बार उसका चेहरा देखा और फिर थोड़ा मुस्कुराते हुए बोली "गनीमत है सब्जी ले तो आये. अब देखती हूँ कि क्या कूड़ा करकट उठा लाये हो, आपको तो कोई भी बेवकूफ बना सकता है".

उसने भी अपना बैग रखा और मुस्कुराते हुए कपड़े बदलने चला गया. कपड़े बदल कर और हाथ मुँह धो कर जब वो वापस लौटा तो देखा रत्ना आश्चर्य से सब्जियों को देख रही थी.

"आज तो आपने सचमुच कमाल कर दिया, बहुत अच्छी सब्जी लाये हैं. लगता है कोई आपके ही तरह का था जो इतना बढ़िया सब्जी दे दिया उसने", रत्ना से तारीफ सुन कर अच्छा लग रहा था उसे, मानो उसे समझदारी का सर्टिफिकेट मिल गया हो. अक्सर बात इसके उलट ही होती थी, उसे काफी लानत मलामत सुननी पड़ती थी. उसने तसल्ली से टी वी चालू किया और समाचार देखने लगा.

उधर वो बुजुर्ग सब्जी वाला भी जब घर पहुंचा तो बहुत प्रसन्न था. घर में घुसते ही बूढी ने उसका प्रसन्न चेहरा देखा तो पूछ बैठी "क्या बात है, आज तो बहुत खुश दिखाई दे रहे हो, लगता है आज सारी सब्जियाँ बिक गईं".

बूढ़े ने भी मुस्कुराते हुए कहा "अरे आज तो एक बहुत बड़ा और भला आदमी सब्जी लेने आ गया और उसने बहुत सी सब्जी खरीद ली. मुझे तो लगा कि पैसे देने में किच किच करेगा, लेकिन उसने तो बिना मोल भाव किये पैसे दे दिए और बहुत खुश होकर गया".

बूढी ने एक गहरी सांस ली और बोली "काश रोज रोज ऐसे ग्राहक आते तो अपनी दाल रोटी की चिंता नहीं रहती ". बूढ़ा भी तब तक हाथ मुंह धोकर आ गया था और खटिया पर बैठ गया.

"हाँ, तुम ठीक कह रही हो, काश रोज रोज ऐसे ग्राहक आते तो कितना अच्छा होता. वैसे शायद वह साहब दुबारा जरूर आएगा हमारे दूकान पर", बूढ़े की आँखें चमक उठीं.

उधर वीरेश ने खाना खाते समय रत्ना को बुलाया और कहने लगा "मुझे लगता है कि हमें अब सब्जी उसी बूढ़े के ठेले से लेना चाहिए, सब्जियाँ भी अच्छी थीं और दाम भी ठीक. साथ ही साथ उस बूढ़े की भी मदद हो जाएगी. कल तुमको भी मैं दिखा देता हूँ ताकि तुम भी जब जाओ, वहीं से सब्जी लो".

"बात तो आप बिलकुल ठीक कह रहे हो, हर्ज़ ही क्या है इसमें. अपने साथ साथ उसका भी भला हो जाए तो इसमें बुराई क्या है", रत्ना की निगाहों में उसके लिए आज कुछ अलग सम्मान नजर आया.

धीरे धीरे यह उनका नियम बन गया, हर दूसरे तीसरे दिन उस बुजुर्ग के ठेले से सब्जी लेना. वो भी इन दोनों को पहचान गया था और बहुत प्यार से सभी सब्जियाँ तौलता, फिर उन्हें ठीक से पोछ कर देता. अब धीरे धीरे मोहल्ले के हर घर की औरतों को ये बात पता चल गयी और सारी औरतें अब उसी बूढ़े की दुकान से सब्जी लेने लगीं. फिर बूढी भी आकर दुकान पर बैठने लगी, आखिर वो बूढ़ा अकेले कैसे इतने ग्राहकों को सम्भाल पाता. अब तो दोनों बुजुर्गों की दुनिया गुलज़ार हो चली थी, शाम देर तक दुकान पर बैठना, फिर घर आकर खा पीकर सो जाना. बूढ़ा सुबह जल्दी उठकर मंडी चला जाता था और ताज़ी सब्जियाँ ले आता था. फिर दोपहर में खाना खाने के बाद दोनों जाकर अपने ठेले पर दुकान सजा लेते थे.

इधर मुख्य मंडी के सब्जी की दुकान वालों को भी एहसास होने लगा था कि उनके ग्राहक कुछ कम होने लगे हैं. उनके रोज के ग्राहक जब हफ़्तों नहीं दिखे तो उनकी चिंता स्वाभाविक थी. फिर उनको पता चल गया कि लोग अब उस बूढ़े के ठेले से सब्जियाँ लेने लगे हैं. पहले तो उन्होंने भी अपने ग्राहकों को थोड़ा प्यार से बोलना शुरू किया, और दिखाने के लिए थोड़ी ज्यादा सब्जी भी देने लगे. ये अलग बात थी कि अभी भी वो पूरे वज़न की सब्जियाँ नहीं देते थे. फिर उन्होंने लोगों से कहना भी शुरू कर दिया कि आप लोग भी लोगों को समझाइये कि हमारे पास ज्यादा तरह की सब्जियाँ हैं और दाम भी ठीक है. उनके इस बदले व्यवहार से कुछ तो फ़र्क़ पड़ा लेकिन अभी भी अधिकांश मोहल्ले की औरतें उसी बूढ़े के ठेले से सब्जियाँ लेती थीं.

एक रात दुकान बंद करने के बाद एक बड़े सब्जी वाले ने अपने बगल की दुकान वाले से कहा "अरे भाई कुछ करना पड़ेगा नहीं तो ये बूढ़ा तो हमारा धंधा मंदा करवाकर ही दम लेगा".

"अपना धंधा तो पहले से ही कुछ कम था और आजकल तो और ही मंदा है, तुम तो फिर भी ठीक हो भाई", बगल वाले ने आह भरते हुए कहा.

"वो तो ठीक है लेकिन कुछ तो सोचो, ऐसे तो अपनी कमाई घटती ही जायेगी", बड़ा दूकान वाला सोचते हुए बोला.

"अब कर भी क्या सकते हैं, वो तो अपनी जगह पर ही दुकान लगा रहा है, उसको रोकेंगे भी तो कैसे", दूसरे के पास कोई चारा नहीं था.

"एक विचार है मेरे दिमाग में, कुछ खर्च लगेगा लेकिन काम हो जाएगा", पहला वाला थोड़ा कुटिलता से मुस्कुराते हुए बोला. फिर सभी करीब आये और उस विचार को सुनकर सबने हामी भर दी.

"लेकिन ये काम तुम्ही को करना होगा, पैसे हम सब दे देंगे", सबने उसकी जिम्मेदारी बड़े दुकान वाले को सौंप दी.

अगले दिन सबेरे सबेरे वह बड़ा सब्जी वाला थाने में पहुंचा. कई पुलिस वाले उसकी दूकान से मुफ्त में सब्जियां ले जाते थे और इसलिए उसे वहां बात करने में कोई दिक्कत नहीं थी.

"दरोगाजी नमस्कार", उसने सामने वाले सब इन्स्पेक्टर को नमस्ते किया तो उसने सर हिलाया. अब मुफ्त की सब्जी का लिहाज तो करना ही था इसलिए उसने पूछ लिया "सबेरे सबेरे आये, कुछ बात है क्या?

"हाँ साहब, आपसे एक मदद चाहिए, बाकी आपका ध्यान रखूँगा', उसने मुस्कुराते हुए कहा.

उसके बाद उसने बैठकर सब इन्स्पेक्टर से सारी बातें तंय कीं और वापस आ गया. दोपहर बाद जैसे ही बूढ़ा ठेला लेकर मंडी के बाहर अपनी जगह पर पहुँचा, दूर खड़ी पुलिस की जीप उसके पास पहुंची.

"किसकी परमिशन से लगा रखा है ये ठेला यहाँ पर", हवलदार ने अपना डंडा उसकी ओर करते हुए पूछा.

"साहब, रोज यहीं पर लगाता हूँ ठेला. आप चाहे तो पूछ सकते हैं बगल की दुकान से", बूढ़ा घबड़ा गया और एकदम से लड़खड़ा गया. बूढी ने उसे सम्भाला और हाथ जोड़कर हवलदार के आगे खड़ी हो गयी.

"अबे, मैं लोगों से पूछूंगा कि ये जगह किसकी है. साले,एक तो जबरदस्ती गलत जगह पर ठेला लगाते हो और दूसरे जबान भी लड़ाते हो. वो तो तेरी उम्र का लिहाज़ करके छोड़ रहा हूँ, नहीं तो दो डंडे मारकर अंदर कर देता. जल्दी से हटाओ ये ठेला यहाँ से और आज के बाद अगर दुबारा दिखाई दिए तो अंदर कर दूंगा", हवलदार ने एक डंडा उसके ठेले पर मारा और खड़ा हो गया.

बूढ़े ने एक बार चारो तरफ देखा, उसे उम्मीद थी कि शायद कोई सब्जीवाला उसके लिए बोलेगा. उसको तो यह आभास भी नहीं था कि उसको वहां से भगाने के लिए ही यह सब किया गया है.

किसी को भी अपने साथ नहीं देखकर उसने अपनी गीली आँखों को पोंछा और बूढी के साथ ठेला लेकर वापस चल दिया. बूढी पलट पलट कर अपनी ठेले वाली जगह को देखती जा रही थी जहाँ एक अंडे वाला अपना ठेला लगा रहा था. दोनों थके क़दमों से अपने झोपड़ी की ओर जा रहे थे, हवलदार ने अंडे वाले से कुछ उबले अंडे और रुपये लिए और आकर जीप में बैठ गया. जीप धुआं उड़ाती मंडी से बाहर चली गयी, बड़ी सब्जी की दुकान वालों ने एक दूसरे को देखकर ठहाका लगाया और मंडी वापस यथावत चलने लगी.

Monday, February 8, 2021

मातृत्व- लघुकथा

 पूरी रात वह सो नहीं पाया था, आँखों आँखों में ही बीती थी पिछली रात. लेकिन कमाल यह था कि न तो कोई थकान थी और न ही कोई झल्लाहट. उसे अच्छी तरह से याद था कि इसके पहले जब भी रात को जागना पड़ जाए या किसी वजह से रात को देर तक नींद नहीं आये तो अगला पूरा दिन उबासी लेते और थकान महसूस करते ही बीतता था. उसे हमेश यही लगता रहा कि कहीं वह छोटा सा बच्चा उससे दब न जाए और उसी चक्कर में वह हर आधे घंटे पर उठ उठकर उसे देखता रहा. और वह बच्चा भी पूरी रात उसके बिस्तर पर घूमता रहा, कभी सिरहाने तो कभी पैरों की तरफ.

इतना आसान नहीं था उस बच्चे को घर ले आना, घर के बाकी बच्चे तो कबसे यही चाहते थे और उससे गुहार भी लगा रहे थे. लेकिन पत्नी के विरोध के चलते वह ला नहीं पा रहा था. इसी बीच पडोसी ने भी एक प्यारा सा पपी लाकर जैसे उनकी पीड़ा को बढ़ा दिया. अब जब भी वह या बच्चे उस प्यारे पपी को देखते, उनकी इच्छा एकदम से अपने यहाँ भी लाने की होती. पिछले कई दिनों से लगभग रोज ही इस विषय पर चर्चा की शुरुआत होती लेकिन पत्नी के विरोध के चलते बात ख़त्म हो जाती. ये अलग बात थी कि वह बच्चों की आँखों में उदासी और बेचारगी नहीं देख पाता था. 

किसी तरह से तमाम मानमनौअल के चलते घर में पपी आया और उस प्यारे बच्चे को लेकर सोने के लिए काफी बहस हुई. आखिरकार फैसला उसके पक्ष में हुआ और वह प्यारा बच्चा उसके साथ ही सोया. पूरे दिन में वह रात के बारे में ही सोचता रहा कि आखिर ऐसा कैसे हुआ कि उसकी नींद रात भर खुलती रही. वर्ना तो वह सोने के लिए पूरे खानदान में बदनाम था, रात में एक बार सो गया तो बम भी फट जाए, उसकी नींद नहीं खुलती थी. फिर उसे याद आया बच्चों के जन्म के बाद पत्नी के रात भर जागने और सोने का. जरा सी आहट पर ही वह जाग जाती थी, कितनी बार वह बच्चों के लिए रात भर जागती रहती थी लेकिन सुबह चेहरे पर शिकन का नामोनिशान नहीं होता था. उसे बहुत आश्चर्य होता था कि आखिर वह ऐसे कैसे रह लेती है, वह पूछता भी था लेकिन पत्नी मुस्कुराकर टाल जाती थी.

इन्हीं विचारों में वह डूब उतरा रहा था कि पत्नी की आवाज ने उसकी तन्द्रा तोड़ी "कहाँ खो गए जनाब, आज तो काफी अच्छा महसूस हो रहा होगा". 

उसने भी मुस्कुराते हुए जवाब दिया "हाँ आज बहुत अच्छा महसूस हो रहा है, आखिर आज मैंने मातृत्व को महसूस किया है".