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Thursday, May 21, 2020

गुरूर- लघुकथा

लगभग दो महीने होने को आये थे इस भयानक त्रासदी को और राकेश इस पूरे समय में लोगों की मदद के लिए हर समय तैयार था. दिन हो या रात, सुबह हो या शाम, बस किसी भूखे या परेशान के बारे में पता चलते ही वह अपनी टीम या कभी कभी अकेले ही निकल पड़ता था.
"भाई, तुम तो हर तरफ छा गए हो, समाचार पात्र हो या लोकल टी वी, जिसे देखो वही तुम्हारी बात कर रहा है", दोस्त का फोन आया तो वह मुस्कुरा पड़ा.
"देखो यार, ऐसा मौका जीवन में जब भी आये, अपनी तरफ से सब कुछ झोंक देना चाहिए। आखिर हम कुछ लोगों की तो मदद करने में सक्षम हैं ही ", उसने शालीनता से जवाब दिया।
"मदद तो बहुत से लोग कर रहे हैं लेकिन राकेश तुमने तो अपने पास की सारी बचत ही लगा दी इसमें, इतना करने की हिम्मत सबमे नहीं होती", दोस्त ने जब यह कहा तो उसे सचमुच अच्छा लगा.
"जो भी हो, लोगों की मदद कर पा रहा हूँ, बस इसी की संतुष्टि है. अच्छा अब निकलना है, एक बस्ती से फोन आया था, वहां खाना पहुंचाने जा रहा हूँ, फिर बात करेंगे", उसने फोन रखा और खाने के पैकेट को बैग में रखने लगा.
स्कूटर पर चलते समय उसके दिमाग में पिछले कुछ हफ़्तों की बातें और दोस्त से अभी हुई बात घूम रही थी. थोड़ा आगे जाने पर एक सूनी गली में उसे एक फटा कपड़े पहने व्यक्ति दिखा तो उसने अपनी स्कूटर रोक दी. वह डिक्की में से खाने का एक पैकेट निकाल कर उसकी तरफ बढ़ रहा था तभी उसने देखा कि उस व्यक्ति ने अपने झोले से एक डब्बा निकाला। उस डब्बे में से उस व्यक्ति ने रोटी निकाली और खाने ही जा रहा था कि सामने एक कुत्ता आकर बैठ गया और उसने वह रोटी उस कुत्ते को बढ़ा दी. राकेश के कदम कुछ पल के लिए ठिठक गए, फिर उसने खाने का पैकेट उस फटेहाल व्यक्ति को इज्जत से पकड़ा दिया।
बस्ती की तरफ जाते समय उसके दिमाग में छन्न से कुछ टूटा और एक पर्त धीरे धीरे पिघल रही थी जो पिछले कुछ समय से समाचार पत्रों ने और लोगों की तारीफ़ ने चढ़ा दी थी.

Tuesday, May 19, 2020

अब नहीं- लघुकथा

"पापा, अब तो आप नहीं जाओगे ना?, बेटा पिता को पकड़े हुए कह रहा था, साल भर बाद उसने पिता को देखा था.
उसके सामने पिछले सात दिन का खौफनाक मंजर छा गया, कभी पैदल, कभी ट्रक में, कभी किसी टेम्पो में चलते हुए बस वह आ गया था. उसके एक दो साथी तो रास्ते में ही चल बसे थे.
उसने पत्नी की तरफ देखा, जिसकी आँखें मानो कह रही थीं "तुम बस सलामत रहो, दो वक़्त की रोटी तो हम खा ही लेंगे".
उसने अपने भविष्य की चिंता को झटकते हुए कहा "अब मैं कहीं नहीं जाऊँगा बेटा, यहीं रहूँगा, तुम्हारे पास".
बेटा खुश होकर उससे चिपट गया, उसने पत्नी को भी हाथ बढ़ाकर अपने पास खींच लिया. 
बेदर्द शहर ने एक और कर्मवीर खो दिया.

Saturday, May 2, 2020

अलग फ़िक्र --लघुकथा

"क्या बहन, कल से बंदी ख़तम हो जायेगी?, एक बाई ने अपने दरवाजे से सामने वाले घर की बाई से पूछा.
"पता नहीं रे, हो सकता हैं ख़तम हो जाए", उसने अपनी अनभिज्ञता जाहिर की.
"अच्छा तो ये बताओ कि क्या बंदी ख़त्म होते ही दारू की दुकान भी खुल जायेगी?, पहली ने फिर पूछा.
दूसरी ने लगभग घबराते हुए कहा "ख़तम नहीं होता तो अच्छा था".

Wednesday, April 22, 2020

भय- लघुकथा

दरवाजे पर दस्तक हुई और आवाज आयी 'दीदी, मैं आयी हूँ".
उसने आवाज पहचान लिया और दरवाजा खोल दिया. बाई अंदर आयी और नमस्ते करके खड़ी हो गयी.
"कैसी हो बाई, घर में सब ठीक है ना?, उसने पूछ तो लिया लेकिन उसे अपनी आवाज ही खोखली लग रही थी.
"सब ठीक ही है दीदी, क्या कहें?, बाई ने कुछ नहीं कहते हुए भी सब कुछ कह दिया.
"अच्छा ये लो पैसा, थोड़े ज्यादा पैसे भी दे दिया हैं. अपना ख्याल रखना", उसने बाई के हाथ में पैसे रख दिए.
बाई ने पैसे वैसे ही अपने छोटे से पर्स में रख लिए. वह पलट कर जाने लगी तभी बाई ने पूछा "जब यह बंदी ख़तम होगी तब मैं काम पर आ जाऊँ न दीदी?
उसने गहरी सांस ली और कहा "अभी काम पर मत आना, मैं बताउंगी तब आना. लेकिन तुमको पैसा मिलता रहेगा, चिंता मत करना".
बाई ने अपने हाथ जोड़ दिए, उसकी आँखों में कृतग्यता जैसे टपक रही थी.
उसने बाई को जाने का इशारा किया, बाई पलटते पलटते रुकी और उसने कातर आवाज में कहा "काम पर जब भी बुलाना हो दीदी, मुझे ही बुलाना".
बाई जा चुकी थी, वह सन्न खड़ी सोच रही थी.

नारियल- लघुकथा

"आज तो मैं जा के ही रहूंगी, चाहे पुलिस का डंडा ही क्यों न खाना पड़े", उसने एक नजर बिस्तर पर बीमार पड़े पति और भूख से बेचैन दोनों बच्चों को देखते हुए कहा.
बड़े बेटे ने साथ में सुर मिलाया "मैं भी चलूँगा अम्मा, वो तीसरे माले वाली ऑन्टी मुझे कितना मानती हैं".
उसने दृढ़ता से मना कर दिया "मुझे तो शायद छोड़ देंगे लेकिन तुझे नहीं छोड़ेंगे. तू यही छोटे का ख्याल रख, मैं कुछ लेकर आती हूँ".
बाहर निकलकर जैसे ही वह सड़क पर पहुंची, एक पुलिसवाला डंडा फटकारते हुए आया "कहाँ जा रही है, पता नहीं है कि निकलने पर पाबन्दी है?
वह पलटकर खड़ी हो गयी और इन्तजार करने लगी. पुलिसवाले ने आश्चर्य से पूछा "अब ऐसे क्या खड़ी हो गयी, वापस जा".
उसने खड़े खड़े ही जवाब दिया "पेट पर तो लात पड़ ही गयी है, आप पीठ पर भी डंडा लगा दो. लेकिन भूखे बच्चों के लिए कुछ ले आने दो साहब".
पुलिस वाला कुछ देर खड़ा रहा, फिर धीरे से बोला "यहीं रुक, मैं आता हूँ"
कुछ देर बाद वह अपने कोठरी में खाने के दो पैकेट लेकर पहुँच गयी, उधर पुलिस वाले ने अपने साथी को फोन लगाया "भाई शाम को आना तो कुछ खाने के लिए लेते आना".

Saturday, February 29, 2020

रौशनी कायम है- लघुकथा

एक हफ्ते गुजर चुके थे उस तोड़ फोड़ और मार काट के बाद, एक तंग सी गली के एक थोड़े जले मकान में बैठे दो पुराने दोस्त गंभीर लेकिन चिंतित मुद्रा में बैठे थे.
"साठ साल तो हो ही गए हमारी दोस्ती को, लेकिन आज तक यह नौबत नहीं आयी थी नजीब. अब तो तुमसे भी ऑंखें मिलाने का साहस नहीं होता मुझमें, तुम्हारे घर को आग के हवाले कर दिया था इन कमजर्फों ने", रघुनन्दन ने अपना कांपता हाथ उठाया और नजीब के हाथ पर रख दिया.
नजीब ने एक गहरी सांस ली और रघुनन्दन के हाथ को कस कर पकड़ लिया "दोष इनका नहीं है रघु, ये बड़ी आसानी से बहकावे में आ जाते हैं. गरम खून सही गलत नहीं सोच पाता, बस आवेश में बह जाता है". 
कुछ देर सन्नाटा छाया रहा, चाय के कप रखने की आवाज ने सन्नाटा तोड़ा.
"ये आखिर कहाँ आ गए हम, यहाँ आने के लिए तो हमने आगे बढ़ना नहीं शुरू किया था", रघु ने चाय का कप उठाया और धीरे से सुड़पने लगे.
नजीब भी चाय पीने लगे और अखबार को उठाकर रघुनन्दन के सामने रख दिया. पहले पन्ने पर ही जलते मकानों के चित्र के बीच में एक खबर थी "हिन्दू मोहल्ले में स्थित मस्जिद को वहां के हिन्दुओं ने बचाया और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा भी की".
"हमारा सफर यहीं के लिए जारी है रघु, इंशा अल्लाह ये मंजिल भी जल्द प्राप्त हो जायेगी", कहते हुए उन्होंने चाय का कप खाली कर दिया. रघुनन्दन के चेहरे पर अखबार की खबर पढ़कर संतुष्टि का भाव आ रहा था, नजीब के हाथ दुआ में ऊपर उठ गए.


Wednesday, January 29, 2020

परिवर्तन- लघुकथा

राजा बहुत बेचैन था, उसे उम्मीद नहीं थी कि मामला इस तरह का मोड़ ले लेगा. दरअसल उसे अपनी आवाम पर जरुरत से ज्यादा भरोसा था, उसे लगता था कि उसके पुराने पैतरे काम आ जाएंगे. मुआमला हाथ से निकलता देख उसने अपने चाणक्य को बुलाया और कोई रास्ता निकालने के बारे में चर्चा करने लगा.
"ये इतने पढ़े लिखे और समझदार कहाँ से पैदा हो गए, अपनी शिक्षा व्यवस्था में किये गए परिवर्तन से ज्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ा है क्या ?
चाणक्य ने थोड़ी देर अपना सर खुजाया और परेशानी भरे स्वर में बोला "मुझे भी समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर फ़र्क़ क्यों नहीं पड़ा. मैंने जब भी अपने शिक्षा मंत्री से पूछा, उसने मुझे यही बताया कि लोग अब राष्ट्रवाद के अलावा कुछ नहीं सोचते".
राजा ने चुरुट सुलगायी और एक लम्बा कश लेकर बोला "आपने सही आकलन नहीं किया महाराज, जनता उतनी भोली नहीं है जितना हम सोचते हैं. फिलहाल हम ऐसा करते हैं कि अपने इस कानून को वापस ले लेते हैं, आगे चलकर फिर देखा जाएगा".
चाणक्य सोच में पड़ गए, उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि राजा उनसे इस तरह की बात भी कर सकते हैं. उन्होंने राजा की तरफ गौर से देखा, उसके चेहरे पर दृढ़ निश्चय के भाव थे.
"ठीक है राजा साहब, लेकिन इसकी घोषणा आप ही कीजियेगा, आखिर हमारी भी प्रतिष्ठा का सवाल है".
राजा ने चैन की सांस ली, चाणक्य ने हल्का सा सर झुकाया और बाहर की तरफ निकल गए.