प्लेटफार्म पर बैठे बैठे पुराना समय चलचित्र की तरह घूम रहा था मनोज के दिमाग में | काश पिता की बात मानी होती तो शायद ये दिन नहीं देखना पड़ता पर नौजवानी में दिल कहाँ दिमाग की सुनता है | उस समय तो जूनून सवार था फिल्मों में हीरो बनने का |
अच्छी शक्लसूरत तो थी ही , साथ में दोस्त भी ऐसे मिले जिन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी उसे चढ़ाने में | " तुम तो पक्का हीरो बनोगे , क्या टैलेंट है तुम्हारे अंदर " और भी जाने क्या क्या | फिर क्या था , माता पिता की बात अनसुनी करते हुए करते हुए एक दिन निकल गया मुंबई के लिए |
लगातार कई महीने धक्के खाए , पास की एक एक पाई जब ख़त्म हो गयी और भूख से पेट की अतड़ियां ऐठने लगीं तो घर वापस जाने के लिए स्टेशन पर आ गया | फिर पिता के कहे शब्द याद आये " कुछ ही दिन में वापस यहीं नज़र आओगे तुम" और उसने प्लेटफार्म पर खड़े यात्री से पूछा " साहब , सामान रखवा दूँ डिब्बे में "|
अच्छी शक्लसूरत तो थी ही , साथ में दोस्त भी ऐसे मिले जिन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी उसे चढ़ाने में | " तुम तो पक्का हीरो बनोगे , क्या टैलेंट है तुम्हारे अंदर " और भी जाने क्या क्या | फिर क्या था , माता पिता की बात अनसुनी करते हुए करते हुए एक दिन निकल गया मुंबई के लिए |
लगातार कई महीने धक्के खाए , पास की एक एक पाई जब ख़त्म हो गयी और भूख से पेट की अतड़ियां ऐठने लगीं तो घर वापस जाने के लिए स्टेशन पर आ गया | फिर पिता के कहे शब्द याद आये " कुछ ही दिन में वापस यहीं नज़र आओगे तुम" और उसने प्लेटफार्म पर खड़े यात्री से पूछा " साहब , सामान रखवा दूँ डिब्बे में "|