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Tuesday, January 16, 2018

जुनून--लघुकथा

बस आज की रात निकल जाए किसी तरह से, फिर सोचेंगे, यही चल रहा था उसके दिमाग में| दिन तो किसी तरह कट गया लेकिन रात तो जैसे हर अनदेखा और अनसोचा डर सामने लेकर आ खड़ी होती है और आज की रात तो जैसे अपनी पूरी भयावहता के साथ बीत रही थी| डॉक्टर की दी हुई हिदायत कि आज की रात बहुत भारी है, उसे रह रह कर डरा देती थी|
कितनी बार उसने दबे स्वर में मना भी किया था कि जिंदगी के प्रति इतने लापरवाह भी मत रहो| लेकिन राजन ने कभी सुनी थी उसकी, बस एक बड़े ठहाके में उसकी हर बात उड़ा देता| "जिंदगी उनका वरण करती है जो उसे जी सकते हैं, मरने से पहले इसके खौफ में क्यूँ जीना", यह वाक्य कितनी बार ही उसने सुना था|
"लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि सावधानियाँ न बरती जाएँ", उसकी इस बात पर वह खिलखिला देता| राजन की स्पोर्ट्स बाइक उसे कभी कभी यमराज के वाहन जैसी लगती, लेकिन डर के मारे कभी उसने यह बात अपनी जुबान पर नहीं लायी| कल भी राजन यही कह कर निकला था कि एक घंटे में आता हूँ, फिर मेले में चलेंगे और फिर उसके दुर्घटना की खबर आयी|
"जिंदगी में अगर मेरी बाइक नहीं रही तो शायद मैं भी नहीं रहूँगा, यह मेरी जान है", एक दिन राजन ने कहा था तो उसका कलेजा काँप गया| वह जितना ही उसको बाइक से दूर रखने की कोशिश करती, राजन उसे उतना ही चिढ़ाता| और आज राजन अपने बुरी तरह जख्मी शरीर और पैरों में कई फ्रैक्चर के साथ हस्पताल में पड़ा था|
शाम से उसने कई बार प्रार्थना की कि बस एक बार वह ठीक हो जाए, फिर उसे बाइक को हाथ भी नहीं लगाने देगी| जैसे जैसे रात बीतती जा रही थी, वह अपनी प्रार्थना को बढ़ाती जा रही थी| उसी समय राजन के शरीर में हलचल हुई और उसके मुख से अस्फुट सी आवाज़ निकली "मेरी बाइक?
उसने झट से उठकर एक बार हाथ जोड़े और गौर से राजन के चेहरे को देखने लगी| उसकी प्रार्थना अब भी बदस्तूर जारी थी, बस बाइक को राजन से दूर हटाने का विचार उसके जेहन में कमजोर पड़ता जा रहा था|  

Friday, January 12, 2018

मुआफ़ी- लघुकथा

धीरे धीरे सभी जुटने लगे थे, नजदीक के रिश्तेदार भी लगभग आ गए थे| उनके मोबाइल पर लगातार बेटे का फोन आ रहा था कि बस पहुँच रहे हैं माँ के अंतिम दर्शन करने के लिए| आंगन में विभा का शरीर सफ़ेद कपड़े में लपेट कर रखा हुआ था और ऐसा लग रहा था जैसे वह हमेशा से ऐसी ही शांति में जी रही थी| उन्होंने एक बार फिर समय देखा और पड़ोसियों और रिश्तेदारों के साथ चुपचाप बैठ गए|
बाहर गाड़ियों की आवाज़ आयी और फिर थोड़ी देर में रोने धोने की आवाज़ भी आने लगी| बेटा परिवार सहित अंदर आया और फिर उनका विलाप शुरू हो गया| उनको यह सब अस्वाभाविक लग रहा था और वह उठ कर बाहर आ गए| थोड़ी देर में ही बेटा बाहर आया और बोला "माँ का क्रियाकर्म अच्छे से करेंगे हम लोग, आप चिंता मत कीजियेगा" और वापस अंदर चला गया|
उनको याद आया, कभी विभा को डॉक्टर के पास ले जाने के लिए बेटे के पास समय नहीं था| लेकिन आज सब कुछ अच्छे से करेंगे की बात ने जैसे उनके ज़ख्म कुरेद दिए| लोगों के कहने पर वह उठे और अंदर आखिरी विदाई की तैयारी में लग गए| उनका दिल बहुत भरा हुआ था और मन में बहुत कुछ उमड़ घुमड़ रहा था| बेटे की अभी की तत्परता देखकर उनके मन में क्रोध आता जा रहा था तभी पोते ने आकर कहा "दादाजी, दादी क्या अब कभी नहीं आएँगी, पापा कितने उदास हैं उनके लिए"|
उन्होंने एक बार बेटे की तरफ देखा और फिर पोते को| कुछ देर पहले का क्रोध जैसे अब हवा हो गया और उसका चेहरा सहलाते हुए बोले "आखिर दादी तुम्हारे पापा की माँ थीं"| फिर मन ही मन बुदबुदाते हुए कि "तुम भी तो यह नहीं चाहती कि मैं पोते के भरोसे को तोडूं", वह चुपचाप खड़े होकर बेटे को सब कुछ करता देखने लगे|