धीरे धीरे सभी जुटने लगे थे, नजदीक के रिश्तेदार भी लगभग आ गए थे| उनके मोबाइल पर लगातार बेटे का फोन आ रहा था कि बस पहुँच रहे हैं माँ के अंतिम दर्शन करने के लिए| आंगन में विभा का शरीर सफ़ेद कपड़े में लपेट कर रखा हुआ था और ऐसा लग रहा था जैसे वह हमेशा से ऐसी ही शांति में जी रही थी| उन्होंने एक बार फिर समय देखा और पड़ोसियों और रिश्तेदारों के साथ चुपचाप बैठ गए|
बाहर गाड़ियों की आवाज़ आयी और फिर थोड़ी देर में रोने धोने की आवाज़ भी आने लगी| बेटा परिवार सहित अंदर आया और फिर उनका विलाप शुरू हो गया| उनको यह सब अस्वाभाविक लग रहा था और वह उठ कर बाहर आ गए| थोड़ी देर में ही बेटा बाहर आया और बोला "माँ का क्रियाकर्म अच्छे से करेंगे हम लोग, आप चिंता मत कीजियेगा" और वापस अंदर चला गया|
उनको याद आया, कभी विभा को डॉक्टर के पास ले जाने के लिए बेटे के पास समय नहीं था| लेकिन आज सब कुछ अच्छे से करेंगे की बात ने जैसे उनके ज़ख्म कुरेद दिए| लोगों के कहने पर वह उठे और अंदर आखिरी विदाई की तैयारी में लग गए| उनका दिल बहुत भरा हुआ था और मन में बहुत कुछ उमड़ घुमड़ रहा था| बेटे की अभी की तत्परता देखकर उनके मन में क्रोध आता जा रहा था तभी पोते ने आकर कहा "दादाजी, दादी क्या अब कभी नहीं आएँगी, पापा कितने उदास हैं उनके लिए"|
उन्होंने एक बार बेटे की तरफ देखा और फिर पोते को| कुछ देर पहले का क्रोध जैसे अब हवा हो गया और उसका चेहरा सहलाते हुए बोले "आखिर दादी तुम्हारे पापा की माँ थीं"| फिर मन ही मन बुदबुदाते हुए कि "तुम भी तो यह नहीं चाहती कि मैं पोते के भरोसे को तोडूं", वह चुपचाप खड़े होकर बेटे को सब कुछ करता देखने लगे|
बाहर गाड़ियों की आवाज़ आयी और फिर थोड़ी देर में रोने धोने की आवाज़ भी आने लगी| बेटा परिवार सहित अंदर आया और फिर उनका विलाप शुरू हो गया| उनको यह सब अस्वाभाविक लग रहा था और वह उठ कर बाहर आ गए| थोड़ी देर में ही बेटा बाहर आया और बोला "माँ का क्रियाकर्म अच्छे से करेंगे हम लोग, आप चिंता मत कीजियेगा" और वापस अंदर चला गया|
उनको याद आया, कभी विभा को डॉक्टर के पास ले जाने के लिए बेटे के पास समय नहीं था| लेकिन आज सब कुछ अच्छे से करेंगे की बात ने जैसे उनके ज़ख्म कुरेद दिए| लोगों के कहने पर वह उठे और अंदर आखिरी विदाई की तैयारी में लग गए| उनका दिल बहुत भरा हुआ था और मन में बहुत कुछ उमड़ घुमड़ रहा था| बेटे की अभी की तत्परता देखकर उनके मन में क्रोध आता जा रहा था तभी पोते ने आकर कहा "दादाजी, दादी क्या अब कभी नहीं आएँगी, पापा कितने उदास हैं उनके लिए"|
उन्होंने एक बार बेटे की तरफ देखा और फिर पोते को| कुछ देर पहले का क्रोध जैसे अब हवा हो गया और उसका चेहरा सहलाते हुए बोले "आखिर दादी तुम्हारे पापा की माँ थीं"| फिर मन ही मन बुदबुदाते हुए कि "तुम भी तो यह नहीं चाहती कि मैं पोते के भरोसे को तोडूं", वह चुपचाप खड़े होकर बेटे को सब कुछ करता देखने लगे|
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