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Saturday, August 18, 2018

नींव में कौन सा ईंट- लघुकथा

"अरे लल्ला, साहब लोगन के लिए दुइ कप चाय तो बनवा दो", रामदीन ने आवाज लगाया.
"रहने दीजिये, अभी तो खाना खाया, चाय की जरुरत नहीं है", उसने रामदीन को मना किया. तब तक बगल में बैठे मलखान ने लल्ला को आवाज़ लगायी "अरे चाय नहीं, काफी बनवाओ, और हाँ कम शक्कर वाली", और उन्होंने मुस्कुराते हुए ऐसे देखा जैसे मन की बात पकड़ ली हो. उसने फिर से मना किया लेकिन तब तक लल्ला अंदर घुस गया.
"साहब आपको १२ बजे आना था, असली मेला तो ओही समय था. कल से अखंड रामायण करवाए थे जो दिन में १२ बजे ख़तम हुआ. फिर कुछ नाहीं तो १००० लोगन को भोजन कराया हमने", रामदीन अपनी रौ में बोले जा रहा था.
"अभी मीटिंग ख़तम हुआ तो निकले, अब आपके यहाँ तो आना ही था. वैसे सुबह तो उम्मीद नहीं थी कि आ पाएंगे", उसने भी अपनी बात रखी.
"हाँ, हम भी समझत हैं, आप लोगन के बहुत मीटिंग होत है. इहाँ हम लोग भी बहुत व्यस्त रहे", रामदीन ने अपनी बात कही.
"घर की औरतें भी तो बहुत थक गयी होंगी, कल से ही लगातार सबको भोजन पानी का इंतज़ाम उन्हीं के जिम्मे रहा होगा", उसको अभी भी काफी के लिए अफ़सोस हो रहा था.
"अरे साहब, अब एक्के तो काम रहत है उनके जिम्मे, अब उसमें काहे का थकान. हम लोगन का देह दरद कर रहा है", रामदीन ने देह तोड़ते हुए कहा.
अचानक उसने रामदीन से पूछा "अच्छा ये बताईये, आपके घर के नींव में कौन सा ईंट लगा था, याद है", और उठ कर आगे चल दिया.
परेशान रामदीन पीछे से आवाज़ लगाता रह गया "साहब काफी आ गया है, पीते जाओ".   

Thursday, August 16, 2018

सहारा- लघुकथा

कितनी ही बार वह प्रयास कर चुका था लेकिन झोला संभालने में वह अपने आप को असमर्थ पा रहा था. अपने आप पर उसे अब क्रोध आने लगा, क्या जरुरत थी पैदल आकर सब्जी खरीदने की. स्कूटर रहता तो कम से कम उसपर इसे रख तो लेता लेकिन अब क्या करे? सब्जियों से ठसाठस भरा झोला उठाने में उसे वैसे ही बहुत कठिनाई हो रही थी और उस पर इसकी पट्टी को आज ही टूटना था. 
अब घर कैसे जाए, झख मारकर उसने घर पर बेटे को फोन लगाया. बेटा भी मैच देखने में मगन था तो उसने भी टालते हुए कहा "अरे एक रिक्शा ले लीजिये और आ जाईये", और फोन रख दिया. बड़ी मुश्किल से झोले को जमीन पर अपने पैरों के पास उसने टिकाया और एक रिक्शे वाले को आवाज दी.
रिक्शे वाले ने झोले को रिक्शे पर रखा और उसको बैठाकर चल पड़ा. वह मन ही मन कुढ़ रहा था कि रिक्शे वाले ने उससे कहा "बिना पट्टी के झोले को भी ढोना कितना मुश्किल है न बाबूजी".
उसको याद आया, कल ही तो बाबूजी कह रहे थे "तुम लोग ही तो हमारा सहारा हो इस उमर में", और फिर उन्होंने अपना सर दूसरी तरफ घुमा लिया था. 
झोले को घर में रखकर वह स्कूटर लेकर तुरंत बाबूजी के पास निकल पड़ा, पीछे से आती पत्नी की आवाज "अरे, अब कहाँ चल दिए" का जवाब देना उसने उचित नहीं समझा. 

Thursday, August 9, 2018

देश प्रेम - लघुकथा

आज फिर अब्बू सुबह सुबह शुरू हो गए थे, “तुझे फौजी ही बनना चाहिए, और कुछ नहीं”.
दरअसल आज फिर अखबार के पहले पन्ने पर छपा था कि दहशतगर्दों से लड़ाई में कई फौजी शहीद हो गए और उनकी अन्त्येष्टि पूरे राजकीय सम्मान के साथ की जाएगी.
पिछले कई दिन से वह अपने प्ले के रिहर्सल में लगा हुआ था. वर्तमान राजनीति और धर्म के घालमेल के दुष्परिणाम पर आधारित उसका प्ले, जिसे खुद उसी ने लिखा था. और अपने कुछ रंगकर्मी दोस्तों के साथ आने वाले स्वतन्त्रता दिवस पर लोगों के सामने प्रदर्शित करने की पुरजोर कोशिश में दिन रात लगा हुआ था.
“अब्बू, जरूरी नहीं कि लड़ाई सीमा पर और हथियार से ही लड़ी जाये. जो अपने होकर भी देश को खोखला कर रहे हैं, उनका विरोध भी उतना ही जरूरी है”, उसने अब्बू को समझाने की कोशिश की.
अब्बू कुछ देर तक सोचते रहे, कल सड़क पर की घटना उनकी आँखों में तैर गयी. रास्ते में कुछ शोहदे, जो खड़े होकर ठहाके लगा रहे थे, उनको देखते ही बोले “मियाँ, एक झण्डा लेते जाओ, इस बार अपने घर पर जरूर फहरा देना”.
“जरा अपने प्ले को मुझे देना पढ़ने के लिए, संदेश बिलकुल सही होना चाहिए इसका”, अब्बू की आवाज़ पर वह चौंक गया. अपने प्ले की सफलता के लिए उसके मन में अब कोई संशय नहीं था.

Wednesday, August 8, 2018

रुके हुए शब्द- कहानी

ट्रेन स्टेशन छोड़ चुकी थी, रिज़र्वेशन वाले डब्बे में भी साधारण डब्बे जैसी भीड़ थी. अपना बैग कंधे पर टाँगे और छोटा ब्रीफकेस खींचते हुए शंभू डब्बे में अंदर बढ़े. लगभग हर सीट पर कई लोग बैठे हुए थे और शंभू को कहीं जगह नजर नहीं आ रही थी. जहां भी वह बैठने का प्रयत्न करते, लोग उन्हे झिड़क देते. अचानक साइड वाली एक सीट पर उनकी नजर पड़ी जहां सिर्फ एक ही व्यक्ति बैठा हुआ था. शंभू लपक कर सीट पर एक तरफ बैठ गये और अपना ब्रीफकेस उन्होने सीट के नीचे घुसा दिया. अक्सर सफर करनेवाले शंभू को इन परिस्थितियों से भी अक्सर दो चार होना पड़ता था.
कंधे पर टंगा बैग उन्होने बगल में रखा और पहली बार साथ बैठे यात्री पर उसकी नजर पड़ी. उस अधेड़ व्यक्ति की तरफ देखकर वह हौले से मुस्कुराये और लंबी सांस लेकर बोले “बाप रे, कितनी भीड़ है आज और ऊपर से रिजर्वेसन भी कनफर्म नहीं हुआ”.
वह अधेड़ व्यक्ति भी मुस्कुराया और उसने यूँ ही पूछ लिया “कहाँ तक जाना है?
“जाना तो भोपाल तक है लेकिन देखते हैं कि कहाँ तक बर्थ मिल पाती है. आपकी तो सीट कनफर्म है ना, अच्छा है. आपके साथ कुछ देर तक ऐसे ही बैठ कर चला जाऊंगा”, शंभू ने बड़े प्यार से बताया.  
“कोई बात नहीं, चल चलिये साथ. मुझे भी इटारसी तक जाना है, बेटे के पास”, अधेड़ ने आश्वस्त करने वाले शब्दों में कहा तो शंभू के दिल को राहत मिली और उन्होने उसे बड़ा सा धन्यवाद दिया.
“लगता है आपका बेटा आपको बहुत प्यार करता है, वरना आजकल कहाँ बेटे पिता को अपने पास बुलाना चाहते हैं”, शंभू ने अपनी तरफ से खूब मिठास घोलते हुए कहा. उनको पक्का यकीन था कि इस तरह से बात कहने से आगे के सफर में कोई परेशानी नहीं आएगी.
अधेड़ ने शंभू को देखा और मुसकुराते हुए बोले “सही कह रहे हैं आप, इस जमाने की परछाईं भी नहीं पड़ी है उसपर. और ऊपर से बहू भी बहुत सुशील और प्यारी है, बहुत ख्याल रखती है मेरा”. अब तो शंभू ने लगभग सीट पर अपना कब्जा जमा लिया था और मजे में बैठकर अधेड़ की बात सुन रहे थे.
काफी देर तक दोनों की बातचीत चलती रही, इस बीच एक चायवाला भी गुजरा और शंभू ने जबरन चाय अधेड़ को भी पिला दी. ट्रेन चले एकाध घंटा हो गया था और अभी तक टी टी नहीं आया था. रात भी हो चली थी और खाने का समय भी तो शंभू ने अपना टिफ़िन खोला और सामने वाले अधेड़ से बड़े इसरार से पूछा“मुझे तो भूख लग रही है, चलिये खाना खा लेते हैं, आप भी खाइये ना”.
“नहीं, नहीं, आप खाइये, मैं भी कुछ खाने के लिए ले लाया हूँ”, अधेड़ ने कहते हुए अपना झोला उतारा. शंभू अब कहाँ मानने वाले थे, उन्होने अपना टिफ़िन खोला और ढक्कन में दो पूरी और सब्जी अधेड़ की तरफ बढ़ा दी. अधेड़ ने भी अपना पुराना झोला उतारा और अपना डिब्बा निकाला, फिर उन्होने संकोच के साथ पूछा “अगर आपको ऐतराज न हो तो एक रोटी हमारी भी खाइये”. अब शंभू को इसमें क्या ऐतराज हो सकता था और वह रोटी लेकर खाने लगे. खाना खतम होते होते टी टी आ गया और उसने सबसे टिकट पूछना शुरू कर दिया.
“इसपर होरी राम कौन है?, टी टी की आवाज पर अधेड़ ने कहा “मैं हूँ साहब” और अपना टिकट निकाल कर दिखा दिया.
“और आपका टिकट, कौन सी बर्थ है आपकी?, टी टी ने पूछा तो शंभू दीन हीन चेहरा बनाकर खड़े हुए और बोले “हमारा वेटिंग ही रह गया, संभव हो तो कोई सीट दे दीजिये सर”.
“अभी तो नहीं है, लेकिन एक बार चेक कर लेने दीजिये, शायद कोई मिल जाये”, टी टी ने बिना उनके चेहरे की तरफ देखे कहा और आगे बढ़ गया. उसके जाने के बाद शंभू ने तुरंत गौर से अधेड़ की तरफ देखा, अधपकी दाढ़ी, मुड़ा चुड़ा कुर्ता और वैसा ही पाजामा. झोला तो पहले ही देख चुके थे शंभू और फिर नाम सुनकर पूरा विश्वास हो गया कि यह शख्स अपनी ऊँची जात का नहीं है.   
अब शंभू थोड़ा किनारे की तरफ दब गए और मन ही मन उनको बहुत कोफ्त होने लगी कि इसका खाना क्यूँ खा लिया. और फिर होरी राम को भी उन्होने खाना खिला दिया. अगर शुरू में ही ध्यान दे दिये होते तो शायद आभास तो हो ही जाता और उसका खाना खाने से बच जाते. और अब अगर सीट नहीं मिली तो पूरा रास्ता इसी के साथ काटना पड़ेगा, शंभू को बेचैनी सी होने लगी.  
“अरे आप आराम से बैठ जाओ, मुझे कोई दिक्कत नहीं है”, होरी राम ने कहा तो इस बार शंभू को मुसकुराते नहीं बना. वह एक बार उसकी तरफ देख कर थोड़ा हिले गोया फैल रहे हों लेकिन वैसे ही बैठे रहे. अब उसको कुछ कह तो नहीं सकते थे क्योंकी सीट उनकी तो थी नहीं लेकिन वह शुरुआती दौर की खुशी अब उनके चेहरे से गायब थी. बार बार उनकी निगाह डब्बे के दूसरे छोर की तरफ जाती जिधर टी टी गया था. कुछ देर में रहा नहीं गया तो उठकर उसी तरफ बढ़ गए, आखिरी बर्थ पर टी टी बैठा हुआ था.  
“सर, एक सीट मिल जाती तो मेहरबानी होती”, यथासंभव अपनी मुस्कुराहट बिखेरते हुए उन्होने टी टी से कहा.
पहली बार तो टी टी ने ध्यान ही नहीं दिया, वह अपने चार्ट में जुटा हुआ था. फिर दुबारा कहने पर टी टी ने एक नजर उनको देखा और फिर इंकार में सर हिला दिया “अभी कोई नहीं है, दो तीन स्टॉप बाद देखेंगे”. मायूसी में गर्दन लटकाए और भुनभुनाते हुए शंभू वापस लौटे.
इधर अपनी सीट पर वह अधेड़ अब पसर गए थे और अब वहाँ बैठना शंभू को बड़ा अजीब सा लगा. आखिर किसी छोटी जात वाले के पैताने कैसे बैठ जाएँ, और जमीन पर बैठने में भी उतनी ही हिचक हो रही थी. इसी उधेड़बुन में वह खड़े थे कि उनको छींक आ गयी और होरी राम ने उनको पलट कर देखा.
“अरे बैठिए आप भी, मैं तो बस यूँ ही पैर सीधा कर रहा था”, कहते हुए होरी राम उठ कर बैठ गए. शंभू भी एक किनारे फीकी मुस्कान फेंकते बैठ गए. इस बार धन्यवाद का शब्द उनके गले में ही अटक गया और वह मन ही मन टी टी को कोसने लगे.   
“कितनी बार मना किया था बेटे को लेकिन माना ही नहीं और टिकट कटा दिया. अब इस उम्र में यात्रा करने में दिक्कत होती है लेकिन उसकी बात भी तो माननी पड़ती है”, होरी राम शंभू की तरफ देखकर बताने लगा. शंभू सुन कर भी जैसे कुछ नहीं सुन रहे थे और होरी राम को बीच बीच में देख लेते थे.
“अच्छा आपका घर है भोपाल या किसी काम से जा रहे हैं वहाँ”, प्रश्न सुनकर शंभू ने होरी राम की तरफ देखा और अनिच्छा से जवाब दिया “किसी काम से जा रहा हूँ, अक्सर इसी तरह भागदौड़ करनी पड़ती है”.  
“और घर में कौन कौन है, कितने बच्चे हैं? अब होरी राम शंभू से बातचीत करने के मूड में आ गए थे. शायद खाना खाने के बाद उनको लगा कि उन्होने सामने वाले से तो कुछ पूछा ही नहीं. शंभू ने फिर से होरी राम की तरफ देखा और बहुत बोझिल स्वर में बोले “दो बेटे हैं और दोनों पढ़ रहे हैं”. इससे ज्यादा वह कुछ बताने के मूड में नहीं थे और आसन्न प्रश्न के चलते उन्होने उठ कर बाथरूम की तरफ जाना ही मुनासिब समझा.   
बाथरूम से लौटते समय फिर उनको टी टी दिख गया और एक बार फिर उन्होने अपने आप को पूरी तरह विनम्र बनाते हुए पूछा “कोई बर्थ है क्या सर, रात बिताना बहुत मुश्किल लग रहा है?
टी टी के नकारात्मक जवाब ने उनको निराश कर दिया लेकिन उनके मन में अभी भी उम्मीद बाकी थी कि शायद आगे चलकर बर्थ मिल ही जाये. ऐसा पहले भी हुआ ही था जब कई स्टेशन बाद उनको बर्थ मिल गयी थी. हर तरफ लोग डब्बे के फर्श पर बिछा कर सोने का उपक्रम करने लगे थे और एक बार उन्होने भी सोचा कि रात में नीचे भी सो गए तो क्या फर्क पड़ेगा. खैर निराश कदमों से वह वापस आए और खामोशी से बर्थ पर एक किनारे बैठ गए. 
समय बीत रहा था, ट्रेन अपनी रफ्तार से चल रही थी. अब शंभू को निराशा घेरने लगी. एक तो नींद अब हावी हो रही थी और दूसरे कोई सीट मिलने की संभावना धीरे धीरे क्षीण होती जा रही थी. और साथ ही साथ दिल और दिमाग की जंग भी चल रही थी. दिल वहाँ बैठने के खिलाफ था तो वहीं दिमाग कह रहा था कि सफर में तो यह सब होता ही है. अब अगर उस अधेड़ का नाम नहीं सुने होते तब तो कोई दिक्कत थी ही नहीं लेकिन जान बूझकर कैसे उसके पैताने बैठें. एक बार उन्होने होरी राम पर नजर डाली, वह अब फिर से अधलेटा होकर खर्राटे बजाने लगा था. अपने आप को यथासंभव बचाते हुए शंभू ने भी पैर को सीट के ऊपर रखा और सोने की कोशिश करने लगे.   
एक स्टेशन पर ट्रेन रुकी, बाहर के शोर से शंभू और होरी राम की आँख भी खुल गयी. शंभू ने पीठ सीधी करते हुए समय देखा, रात के बारह बजने वाले थे. होरी राम उठकर बाथरूम की तरफ निकाल गए और शंभू ने तुरंत अपना गमछा निकालकर आधे में बिछा लिया. अब उनको उम्मीद थी कि होरी राम उनके गमछे वाले क्षेत्र में शायद अतिक्रमण नहीं करें. अब वह पालथी मार कर बैठ गए और सर को सीट के पिछवाड़े टिका दिया. होरी राम ने आने के बाद शंभू को सोते देखा तो वह भी बैठ गए और एक बार फिर से उन्होने शंभू से इसरार किया “आप पूरा पैर फैलाकर सो जाइए, हम अभी बैठते हैं. हमारा स्टेशन सुबह जल्दी आ जाएगा, आपको तो आगे भी जाना है”.
शंभू ने बस सर हिलाकर हूँ कहा और इस तरह दर्शाया जैसे वह अब गहरी नींद में सो रहे हों. होरी राम चुपचाप बैठ गए और खिड़की से बाहर देखने लगे. ट्रेन चल दी और उसी समय एक दूसरे टी टी ने डब्बे में प्रवेश किया. जैसे ही उसने होरी राम का टिकट देखा, शंभू लपक कर खड़े हो गए और एक बार फिर से उन्होने अपनी व्यथा टी टी के सामने रखी. टी टी ने चार्ट देखा और उनको आगे की एक सीट की तरफ इशारा करते हुए कहा “उस सीट पर चले जाइए, अगले स्टेशन पर खाली हो जाएगी”.
टी टी आगे बढ़ा, शंभू ने तुरंत गमछा सीट से उठाया और उसे कस कर झाड़ा. अपना बैग कंधे पर टाँगते हुए वह सीट के नीचे से अपना ब्रीफकेस निकालने लगे. होरी राम ने थोड़ा रुकने के लिए कहा लेकिन शंभू ने उसे अनसुना कर दिया. तुरंत अपना ब्रीफकेस खींचते हुए शंभू आगे बढ़ गए, होरी राम अपनी सीट पर अब पूरी तरह पसर गए. जाते समय भी धन्यवाद का शब्द शंभू के गले में ही फंस कर रह गया, ट्रेन अपनी स्पीड में अपने गंतव्य की तरफ जा रही थी.    

आस्था- लघुकथा

जल्दी जल्दी कदम बढ़ाते हुए वह घर की तरफ जा रही थी और अपने आप को कोस भी रही थी. घर से निकलते समय उसे याद ही नहीं रहा कि आज सोमवार है और रास्ते पर इतने कांवरिया मिल जाएंगे. जिधर देखती, उधर ही कंधे पर काँवर लटकाये कहीं अकेले तो कहीं झुण्ड में लोग चले जा रहे थे. कुछ लोग तो बाकायदा डी जे की धुन पर नाचते गाते हुए भी चले जा रहे थे. बस एक ही चीज सब जगह कॉमन थी, वह थी सिर्फ लड़के या पुरुष ही थे इस यात्रा में.
पिछले दस मिनट में उसे कई जगह फब्ती सुननी पड़ी थी, कहीं कहीं तो इन लोगों ने उसे धक्का देने और रगड़ने का प्रयास भी किया था. एकाध जगह उसने विरोध करने की कोशिश की तो बाकी कांवरिये भी जुटने लगे. फिर उसे लगा कि शायद स्थिति बदतर ही हो जायेगी तो आगे बढ़ गयी. इतने में उसकी नजर सड़क के किनारे खड़ी एक गाय पर पड़ी जिसको गुजरने वाला हर कांवरिया बड़े प्यार से सहलाता और कुछ तो उसे देखकर "गऊ माता की जय" की जैकारा भी लगा रहे थे.
उसने एक नजर गाय पर डाली और फिर उसको प्यार से सहलाते कांवरियों पर. उसको गाय की किस्मत पर रश्क़ होने लगा और वह भाग कर अपने घर वाली गली में घुस गयी. 

Friday, August 3, 2018

ग़ज़ल

नजरे झुकाये बैठे हैं-
आप  महफिल में आये बैठे हैं
फिर भी  नजरें झुकाये बैठे हैं

मसअला ये कि मेरी बात से वो
अब तलक़ खार खाये बैठे हैं

मुझको तो याद भी नहीं और वो
बात दिल  से  लगाए  बैठे हैं

हम तो करते नहीं कभी पर्दा
वो ही चिलमन गिराए बैठे हैं

हमने हर चीज याद रक्खी है
जाने  वो  क्यूँ  भुलाए बैठे हैं

हर तरफ दौर है ठहाकों का
और वो मुंह फुलाए बैठे हैं'

बात दर अस्ल थी बहुत छोटी
वो बड़ी सी बनाए बैठे हैं !!
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जिस्म से रूह से भी यारी है
इश्क़ में इक सदी गुजारी है

उनसे मिलके भी दिल नहीं भरता
बढ़ रही फिर  से बेकरारी है

उनकी बातें हैं जाम की बातें
फिर से चढ़ने लगी खुमारी है

सारी खुशियाँ उन्हें मुअस्सर हैं
सिर्फ अपनी ही गम से यारी है

उनके लब पे भी नाम हो अपना
ये  कवायद  हमेशा  जारी  है

एक दिन वो मिलेंगे हमको ही
इश्क़  से  क़ायनात  हारी  है

मैं भी मिल पाऊँगा यक़ीन हुआ
उनके  अपनों  की आज बारी है !!

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दिल आज भी ढूंढे है , वो फ़ुरसत कहाँ कहाँ 
जीने को जो थी मांगी वो मोहलत कहाँ कहाँ 

बेदाग निकल आए हैं हर मुआमले से वो
बेवजह लगाई थी जो तोहमत कहाँ कहाँ
लेंगे ये किसी और समय वक़्त से हिसाब   
ये ग़म कहाँ कहाँ,  ये मसर्रत  कहाँ कहाँ  

है कौन  जो  बताएगा,  इस  दौर  में हमें 
खुशियाँ कहाँ कहाँ औ ये दहशत कहाँ कहाँ 

क्या फ़र्क़ है अब याद क्यूँ रखा करेंगे वो  
क्यूँ करने चले थे वो मोहब्बत कहाँ कहाँ

हर बार सोचते हैं, कि मिल जाएगी मंजिल 
दे जाती है दगा भी ये किस्मत कहाँ कहाँ 

बदनाम भी हुए तो फर्क क्या पड़ा उन्हें
मिल रही इस बहाने ही शोहरत कहाँ कहाँ

अब कौन रखेगा इस ज़माने में ये ख़याल 
बेवज़ह लुटाई थी,  वो  दौलत  कहाँ  कहाँ !!

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जब तेरी किस्मत पे मालिक मेहरबाँ हो जाएँगे 
फिर  यक़ीनन  कीमती चारो  जहाँ  हो  जाएँगे    



आसमाँ पाने की ख्वाहिश इस जहाँ में तू न कर 

दूर  तुझ  से ये  ज़मीन-ओ-आसमाँ  हो  जाएँगे 


शक जो अपनों पर किया तो हाल होगा बस यही

फासले फिर खुद ब खुद ही  दरमियाँ हो जाएँगे 


दोस्तों  को  आजमाना  ठीक  है  पर हद में ही  

वर्ना फिर  सब  इक  अधूरी  दास्ताँ  हो जाएँगे 



इस जमाने का  अज़ब  दस्तूर  देखा  है विनय 
कितनी भी  कोशिश करोगे बदगुमाँ हो जाएँगे !!

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वक़्त है तो वक़्त को आखिर बदलना चाहिए 
इन  पहाड़ों से  कोई सागर निकलना चाहिए 



कोई तो  होगा कहीं  जो लड़ेगा  हक़ के लिए  

कब तलक इस सोच से दिल को बहलना चाहिए 


किसी को फुर्सत कहाँ जो हल करेगा मुश्किलें 
अपनी ही दिक्कत है हमको खुद संभलना चाहिए 

सिर्फ जय जयकार करने से नहीं बचता वतन
देंगे क़ुरबानी ये लौ दिल में भी जलना चाहिए  

हमसे ही बनता है भारत हम ही इसकी ढाल हैं 
हर किसी के दिल में ऐसा  भाव पलना चाहिए


किसमें है हिम्मत जो तिरछी डाल दे हमपे नज़र
ऐसे  दुश्मन  का  कलेजा  भी  दहलना  चाहिए

अपने मसले हैं तो किसको दोष देंगे हम विनय 
हल हों ऐसी राह पर हम सब को चलना चाहिए !! 



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दिख रहा इंसान है- ग़ज़ल 
हर तरफ बस दिख रहा इंसान है
हाँ, मगर अपनों से वो अंजान है

थे कभी रिश्ते भी नाते भी मगर
आजतो यह सिर्फ इक सामान है

जिसको कहते थे कभी काबिल सभी
सबकी नज़रों में वो अब नादान है 

जिसको सौंपी थी हिफाज़त बाग़ की
बिक रहा उसका ही अब ईमान है 

हर तरफ बैठे शिकारी घात में
चंद लम्हों का वो अब मेहमान है

था कभी गुलज़ार जो शाम-ओ-सहर 
अब वही दिखने लगा शमशान है

जिसने देखे अम्न के सपने कभी
अब उसी का टूटता अरमान है 

जिसपे थे दंगों के छींटे कल विनय
अब वही तो क़ौम का भगवान है !!

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गम छुपाते हैं सरेआम बताते भी नहीं 
मुस्कुराते हैं कभी दर्द दिखाते भी नहीं 

हाले दिल उनसे किस तरह से बताया जाए 
इश्क़ की राह में जो कदम बढ़ाते भी नहीं 

ऐसे  अंदाज़  पे  क़ुर्बान  क्यूँ न  हो जाएँ   
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं

उनसे मिलने की जुस्तजू मिरे दिल में ही रही  
मुझसे मिलने  का  इरादा  वो जताते भी नहीं 

हर  समय  रिश्ते  निभाते  हैं उफ़  नहीं करते 
दिल में इज़्ज़त हो तो किसी से छुपाते भी नहीं 

करे   रौशन  सबको  दूर  करे  अँधियारा 
आजकल ऐसी शमा लोग जलाते भी नहीं !!