नजरे झुकाये बैठे हैं-
आप महफिल में आये बैठे हैं
फिर भी नजरें झुकाये बैठे हैं
मसअला ये कि मेरी बात से वो
अब तलक़ खार खाये बैठे हैं
मुझको तो याद भी नहीं और वो
बात दिल से लगाए बैठे हैं
हम तो करते नहीं कभी पर्दा
वो ही चिलमन गिराए बैठे हैं
हमने हर चीज याद रक्खी है
जाने वो क्यूँ भुलाए बैठे हैं
हर तरफ दौर है ठहाकों का
और वो मुंह फुलाए बैठे हैं'
बात दर अस्ल थी बहुत छोटी
वो बड़ी सी बनाए बैठे हैं !!
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जिस्म से रूह से भी यारी है
इश्क़ में इक सदी गुजारी है
उनसे मिलके भी दिल नहीं भरता
बढ़ रही फिर से बेकरारी है
उनकी बातें हैं जाम की बातें
फिर से चढ़ने लगी खुमारी है
सारी खुशियाँ उन्हें मुअस्सर हैं
सिर्फ अपनी ही गम से यारी है
उनके लब पे भी नाम हो अपना
ये कवायद हमेशा जारी है
एक दिन वो मिलेंगे हमको ही
इश्क़ से क़ायनात हारी है
मैं भी मिल पाऊँगा यक़ीन हुआ
उनके अपनों की आज बारी है !!
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आप महफिल में आये बैठे हैं
फिर भी नजरें झुकाये बैठे हैं
मसअला ये कि मेरी बात से वो
अब तलक़ खार खाये बैठे हैं
मुझको तो याद भी नहीं और वो
बात दिल से लगाए बैठे हैं
हम तो करते नहीं कभी पर्दा
वो ही चिलमन गिराए बैठे हैं
हमने हर चीज याद रक्खी है
जाने वो क्यूँ भुलाए बैठे हैं
हर तरफ दौर है ठहाकों का
और वो मुंह फुलाए बैठे हैं'
बात दर अस्ल थी बहुत छोटी
वो बड़ी सी बनाए बैठे हैं !!
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जिस्म से रूह से भी यारी है
इश्क़ में इक सदी गुजारी है
उनसे मिलके भी दिल नहीं भरता
बढ़ रही फिर से बेकरारी है
उनकी बातें हैं जाम की बातें
फिर से चढ़ने लगी खुमारी है
सारी खुशियाँ उन्हें मुअस्सर हैं
सिर्फ अपनी ही गम से यारी है
उनके लब पे भी नाम हो अपना
ये कवायद हमेशा जारी है
एक दिन वो मिलेंगे हमको ही
इश्क़ से क़ायनात हारी है
मैं भी मिल पाऊँगा यक़ीन हुआ
उनके अपनों की आज बारी है !!
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दिल आज भी ढूंढे है , वो फ़ुरसत कहाँ कहाँ
जीने को जो थी मांगी वो मोहलत कहाँ कहाँ
बेदाग निकल आए हैं हर मुआमले से वो
बेवजह लगाई थी जो तोहमत कहाँ कहाँ
लेंगे ये किसी और समय वक़्त से हिसाब
ये ग़म कहाँ कहाँ, ये मसर्रत कहाँ कहाँ
है कौन जो बताएगा, इस दौर में हमें
खुशियाँ कहाँ कहाँ औ ये दहशत कहाँ कहाँ
क्या फ़र्क़ है अब याद क्यूँ रखा करेंगे वो
क्यूँ करने चले थे वो मोहब्बत कहाँ कहाँ
हर बार सोचते हैं, कि मिल जाएगी मंजिल
दे जाती है दगा भी ये किस्मत कहाँ कहाँ
बदनाम भी हुए तो फर्क क्या पड़ा उन्हें
मिल रही इस बहाने ही शोहरत कहाँ कहाँ
अब कौन रखेगा इस ज़माने में ये ख़याल
बेवज़ह लुटाई थी, वो दौलत कहाँ कहाँ !!
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जब तेरी किस्मत पे मालिक मेहरबाँ हो जाएँगे
फिर यक़ीनन कीमती चारो जहाँ हो जाएँगे
आसमाँ पाने की ख्वाहिश इस जहाँ में तू न कर
दूर तुझ से ये ज़मीन-ओ-आसमाँ हो जाएँगे
शक जो अपनों पर किया तो हाल होगा बस यही
फासले फिर खुद ब खुद ही दरमियाँ हो जाएँगे
दोस्तों को आजमाना ठीक है पर हद में ही
वर्ना फिर सब इक अधूरी दास्ताँ हो जाएँगे
इस जमाने का अज़ब दस्तूर देखा है विनय
कितनी भी कोशिश करोगे बदगुमाँ हो जाएँगे !!
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वक़्त है तो वक़्त को आखिर बदलना चाहिए
इन पहाड़ों से कोई सागर निकलना चाहिए
कोई तो होगा कहीं जो लड़ेगा हक़ के लिए
कब तलक इस सोच से दिल को बहलना चाहिए
किसी को फुर्सत कहाँ जो हल करेगा मुश्किलें
अपनी ही दिक्कत है हमको खुद संभलना चाहिए
सिर्फ जय जयकार करने से नहीं बचता वतन
देंगे क़ुरबानी ये लौ दिल में भी जलना चाहिए
हमसे ही बनता है भारत हम ही इसकी ढाल हैं
हर किसी के दिल में ऐसा भाव पलना चाहिए
किसमें है हिम्मत जो तिरछी डाल दे हमपे नज़र
ऐसे दुश्मन का कलेजा भी दहलना चाहिए
अपने मसले हैं तो किसको दोष देंगे हम विनय
हल हों ऐसी राह पर हम सब को चलना चाहिए !!
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दिख रहा इंसान है- ग़ज़ल
हर तरफ बस दिख रहा इंसान है
हाँ, मगर अपनों से वो अंजान है
थे कभी रिश्ते भी नाते भी मगर
आजतो यह सिर्फ इक सामान है
जिसको कहते थे कभी काबिल सभी
सबकी नज़रों में वो अब नादान है
जिसको सौंपी थी हिफाज़त बाग़ की
बिक रहा उसका ही अब ईमान है
हर तरफ बैठे शिकारी घात में
चंद लम्हों का वो अब मेहमान है
था कभी गुलज़ार जो शाम-ओ-सहर
अब वही दिखने लगा शमशान है
जिसने देखे अम्न के सपने कभी
अब उसी का टूटता अरमान है
जिसपे थे दंगों के छींटे कल विनय
अब वही तो क़ौम का भगवान है !!
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गम छुपाते हैं सरेआम बताते भी नहीं
मुस्कुराते हैं कभी दर्द दिखाते भी नहीं
हाले दिल उनसे किस तरह से बताया जाए
इश्क़ की राह में जो कदम बढ़ाते भी नहीं
ऐसे अंदाज़ पे क़ुर्बान क्यूँ न हो जाएँ
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं
उनसे मिलने की जुस्तजू मिरे दिल में ही रही
मुझसे मिलने का इरादा वो जताते भी नहीं
हर समय रिश्ते निभाते हैं उफ़ नहीं करते
दिल में इज़्ज़त हो तो किसी से छुपाते भी नहीं
करे रौशन सबको दूर करे अँधियारा
आजकल ऐसी शमा लोग जलाते भी नहीं !!
हर तरफ बस दिख रहा इंसान है
हाँ, मगर अपनों से वो अंजान है
थे कभी रिश्ते भी नाते भी मगर
आजतो यह सिर्फ इक सामान है
जिसको कहते थे कभी काबिल सभी
सबकी नज़रों में वो अब नादान है
जिसको सौंपी थी हिफाज़त बाग़ की
बिक रहा उसका ही अब ईमान है
हर तरफ बैठे शिकारी घात में
चंद लम्हों का वो अब मेहमान है
था कभी गुलज़ार जो शाम-ओ-सहर
अब वही दिखने लगा शमशान है
जिसने देखे अम्न के सपने कभी
अब उसी का टूटता अरमान है
जिसपे थे दंगों के छींटे कल विनय
अब वही तो क़ौम का भगवान है !!
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गम छुपाते हैं सरेआम बताते भी नहीं
मुस्कुराते हैं कभी दर्द दिखाते भी नहीं
हाले दिल उनसे किस तरह से बताया जाए
इश्क़ की राह में जो कदम बढ़ाते भी नहीं
ऐसे अंदाज़ पे क़ुर्बान क्यूँ न हो जाएँ
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं
उनसे मिलने की जुस्तजू मिरे दिल में ही रही
मुझसे मिलने का इरादा वो जताते भी नहीं
हर समय रिश्ते निभाते हैं उफ़ नहीं करते
दिल में इज़्ज़त हो तो किसी से छुपाते भी नहीं
करे रौशन सबको दूर करे अँधियारा
आजकल ऐसी शमा लोग जलाते भी नहीं !!
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