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Tuesday, January 29, 2019

ममता-लघुकथा

पूरा घर दरवाजे पर ही था, राजू, उसकी मेहरारू रानी, बेटी और राजू की माँ. बस इंतज़ार हो रहा था कि सामने चरनी पर खड़ी लक्ष्मी गाय कब बच्चा दे. उसका समय हो गया था और वह दर्द से इधर उधर घूम रही थी. राजू ने अपने सर पर बंधी गमछी को एक बार और कस के लपेटा और सामने के हैंडपंप पर पानी लेने चला गया.
"ए बार त बछिया ही होगी, तीन दिन से हम सपना में देखत हैं कि लक्ष्मी को बछिया हुआ है", राजू की माँ ने गहरी सांस ली. रानी ने एक बार माँ की तरफ देखा लेकिन कुछ नहीं बोली.
"दू बार से बछवा जन्मत है इस लक्ष्मिया, अब ए बार त बछिया ही चाही", माँ ने फिर से रानी की तरफ देखते हुए कहा.
राजू भी पानी रखते हुए माँ की हाँ में हाँ मिलाया "हाँ माई, ए बार त पक्का बछिया होगा, सरकारी हस्पताल लेजाके सीमेन चढ़वाये थे हम".
बेटी इन सब बातों से बेखबर खटिया पर लेटी थी, उसे भी कौतुहल था कि इस बार लक्ष्मी क्या बियाती है. अचानक लक्ष्मी ने जोर से चक्कर लगाया और कुछ ही देर में उसके पेट से बच्चा बाहर आ गया. राजू दौड़ कर उसके पास गया और जैसे ही उसने बच्चे को नजदीक से देखा, उसका चेहरा उतर गया.
"धत्त तेरी की, ए बार फिर से बछवा हुआ है, किस्मत ही खराब है हमरा", उसने अफ़सोस करते हुए कहा. माँ का चेहरा भी उतर गया, वह भी बुझे मन से चरनी की तरफ जाते हुए बोली "जहाँ चाही उहाँ लक्षमी नाहीं होगी और अपने घर में आ गयी".
बेटी ने उठकर चरनी पर जाना चाहा लेकिन रानी ने उसे कस कर भींच लिया, उधर गाय भी अपने बछड़े को ममता से चाट रही थी. 

Monday, January 14, 2019

अपनों का दर्द- लघुकथा

दो तीन बार सोमारू आवाज़ लगा चुका था, हर बार वह उसकी तरफ उचटती नजर से देखता और खाट पर लेटे लेटे सोचता रहा. अंदर से तो उसे भी लग रहा था कि उसको जाना चाहिए लेकिन फिर उसका मन उसे रोक देता. वैसे तो बात बहुत बड़ी भी नहीं थी, इस तरह की घटनाओं से उसको अक्सर दो चार होना ही पड़ता था. लेकिन अगर कोई बड़ी जात वाला यह सब कहता तो उसे तकलीफ नहीं होती थी.
"दद्दा, जल्दी चलो, सब लोग तुम्हरी राह देखत हैं", सोमारू ने इस बार थोड़ी तेज आवाज में कहा.
वह खटिया से उठा और बाहर निकलकर लोटे से मुंह धोने लगा. गमछी से मुंह पोंछते हुए उसने सोमारू से कहा "अच्छा इ बताओ, उहाँ सरवन भी है का?
सोमारू ने हामी में सर हिलाते हुए कहा "सब लोग जुटल हैं उहाँ, आज रस्ता का फैसला हो जाई".
सरवन भी वहीँ है, उसको देखते ही उसके तन बदन में आग लग जायेगी. अब का करे, जाना भी जरुरी है और सरवन न भेंटाये, यह भी मन में है.
"अच्छा सोमारू, एक काम करना हमरे लिए, सरवन को हमसे दूर ही रखना", वह चलते चलते बोला.
सोमारू ने सर हिलाया और थोड़े अचरज से बोला "का हुआ भईया, ऊ सरवन से कउनो बात हो गईल का".
उसने सोमारू के सर पर एक थप्पी मारी "ऊ दिन तुम भी तो थे जब सरवन हमको ऊ सब बात बोला था. बताओ उहो कउनो बर्दास्त करने की बात थी".
सोमारू ने पलटकर उसको देखा "सरपंच तो तुमको रोज दस बार बोलत है तब कउनो दिक्कत नाहीं होत है. फिर सरवन तो अपना भाई बिरादर है, तुमको मलेक्ष बोल दिया तो ओसे कौन दिक्कत?" 
वह चुपचाप चलता रहा, अब सोमारू को कैसे समझाए कि ऊंच जात वाला बोले, तब तो ठीक है लेकिन उसका अपनी जात वाला ही यह सब बोले तो तकलीफ तो होगी ही ना.

Thursday, January 10, 2019

आज हिंदी को वास्तव में विश्व की सबसे अग्रणी भाषा बनाने की जरुरत है

इतिहास को अगर हम समग्रता में देखें तो हर दिन का अपना विशेष महत्त्व होता है. इसी तरह से आज १० जनवरी का भी इतिहास में एक विशिष्ट स्थान है, तमाम सारी घटनाएं इस दिन घटी हैं जिन्हें हम गाहे बगाहे याद करते रहते हैं. अगर हम अखबार की बात करें तो आज के ही दिन इटली के वेनिस नगर में गाज़ेट नामक विश्व का पहला समाचार पत्र 1623 में प्रकाशित हुआ था. आज के ही दिन हमारी चाय १८३९ में इंग्लैंड पहुंची थी. आज के ही दिन पार्श्व गायक और शास्त्रीय संगीतकार के. जे. येसुदास का जन्म हुआ था. आज के ही दिन कार निर्माण की अग्रणी आटोमोबाइल कंपनी ‘टाटा मोटर्स’ ने एक लाख रुपये वाली कार ‘नैनो’ को 2008 में पेश किया था और आखिर में असली मुद्दे पर आते हैं. आज के ही दिन प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने 2006 से 10 जनवरी को प्रति वर्ष विश्व हिन्दी दिवस के रूप मनाये जाने की घोषणा की थी.
दरअसल अपने देश में रहते समय इस आयोजन के बारे में मुझे शायद ही कभी पता चला था लेकिन जब मैं दक्षिण अफ्रीका गया तो मुझे इस बात का पता चला कि १० जनवरी को विश्व हिंदी दिवस का आयोजन किया जाता है. उससे पहले अधिकांश भारतियों की तरह ही मुझे भी यही पता था कि हिंदी दिवस मतलब १४ सितम्बर. सितम्बर महीने में एक हफ्ते या १५ दिन तक हम लोग हिंदी माह या पखवारा मानते थे और फिर अगले साल अगस्त तक यह भूल जाते थे कि हिंदी के लिए भी हमें कुछ करना है.
एक सवाल यह भी उठना स्वाभाविक है कि अगर हम हिन्दुस्तान में रह रहे हैं तो आखिर हिंदी दिवस या विश्व हिंदी दिवस मनाने का औचित्य क्या है. कोई भी दिवस अमूमन उस दिन किसी ख़ास वजह से ही मनाया जाता है और हमने कभी भी उर्दू दिवस, बांग्ला दिवस या तेलुगु दिवस मनाये जाने के बारे में कभी भी नहीं सुना था. अब ऐसे में हिंदी दिवस ही क्यों मनाया जाता है, यह किसी भी हिन्दुस्तानी के लिए, जो कि हिंदी पट्टी का हो, एक अजीब ही बात होनी चाहिए. लेकिन यह दिवस मनाया जाता है और हर साल खानापूर्ति करके, हिंदी में कुछ बोल के और कुछ अतिथियों को बुलाकर (जिनको साल के बाकी ३६४ दिनों तक हम मिलना भी नहीं चाहते, सम्मानित करना तो दूर की बात है) और उनको सम्मानित करके इस कार्यक्रम को संपन्न कर देते हैं. हाँ इस कार्यक्रम की फोटो जरूर सोशल मीडिया, समाचार पत्र और अपने घर परिवार वालों को दिखाते हैं.
किसी भी देश में उसकी भाषा उसकी प्राणवायु होती है और अमूमन उस देश का हर नागरिक उससे बेइंतहा प्यार करता है. ऐसे में अपने देश में अंग्रेजी की गुलामी वाली मानसिकता वाले लोगों को देखकर बेहद अफ़सोस होता है. ज्यादा दूर नहीं, अपने पड़ोसी देश चीन को ही देख लें, शायद ही कोई चीनी व्यक्ति अपनी भाषा के अलावा अन्य भाषा में बात करता हो. इसकी एक वजह तो समझी जा सकती है कि वह देश किसी एक देश का सैकड़ो साल गुलाम नहीं रहा और उसकी अपनी संस्कृति से बहुत छेड़छाड़ नहीं हुई. लेकिन इन सब वजहों के बावजूद हमारे देश में हिंदी भाषा को ही दिवस के रूप में याद रखा जाय, यह बहुत सालने वाली बात लगती है.
अब समय आ गया है कि हम हिंदी दिवस मनाने की मानसिकता से बाहर निकालें और अपनी भाषा को वह सम्मान दें जिसकी वह हक़दार है. लेकिन इसके साथ साथ विश्व हिंदी दिवस भी जरूर मनाएं जिससे कि पुरे विश्व मवन हिंदी का प्रचार पसार हो और वह उस गौरव को प्राप्त करे जिसकी वह अधिकारी है. इसलिए जो शुरुआत 10 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन से हुई थी और सन २००६ से आधिकारिक तौर पर उसी तारीख पर विश्व हिंदी दिवस के रूप में मनाने की घोषणा हुई, उसे उत्तरोत्तर आगे बढ़ाते हुए हिंदी को विश्व पटल पर चमकाएं. और यह और कोई नहीं, हम हिन्दुस्तान के लोग ही करेंगे, पिछले कुछ साल में इस दिशा में हुई प्रगति इसी बात के लिए आश्वस्त करती है.  

Tuesday, January 8, 2019

कसक- लघुकथा

रेशमा की नजर फिर उस लड़की पर पड़ी जो कल ही यहाँ लायी गई थी. बेहद घबराई और लगातार रोती हुई वह लड़की देखने में तो किसी गरीब घर की ही लगती थी लेकिन पढ़ी लिखी भी लगती थी. उससे रहा नहीं गया तो वह उसकी तरफ बढ़ी और पास जाकर उसने पूछा "क्या नाम है रे तेरा और कहाँ से आयी है? यहाँ रोने धोने से कुछ नहीं होता, जितनी जल्दी सब मान लेगी, उतना बढ़िया. वर्ना तेरी दुर्गति ही होनी है यहां पर". 
लड़की ने उसकी तरफ देखा, रेशमा की आँखों का सूनापन देखकर वह सिहर गयी. उसने रेशमा का हाथ पकड़ा और फफक पड़ी "मुझे यहाँ से बचा लो दीदी, मैं अपने घर वापस चली जाउंगी".
रेशमा ने उसकी पीठ सहलाई और समझ गयी कि यह घर से भागकर आयी है. "किसके साथ घर से भागी थी, तुम्हारे गांव का ही है या किसी रिश्तेदारी का", उसने लड़की से पूछा.
लड़की अब थोड़ी संयत हुई, अपने आंसू पोंछते हुए उसने कहा "बगल के गांव का लड़का था, साथ पढ़ाई किये थे तो उसकी बातों में आ गयी. आप मुझे बचा लो प्लीज".
रेशमा को थोड़ा गुस्सा आया, उसने लड़की को हल्का सा धक्का दिया और डपटते हुए बोली "घर से भागते समय नहीं सोचा था कि वह पिल्ला तुम्हारा प्रेमी नहीं दल्ला है. और अगर मैं तुझे निकाल सकती तो क्या खुद इस नर्क में रहती".
लड़की ने निराश नज़रों से रेशमा की तरफ देखा और धीरे से बोली "वह लड़का मेरा प्रेमी नहीं था, उसने मुझे नौकरी दिलाने का वादा किया था. गरीबी में ही मैंने अपना घर छोड़ा लेकिन ऐसे काम के बदले मैं मरना पसंद करुँगी".
रेशमा को झटका सा लगा, उसने लड़की को कसकर भींच लिया. उसकी निगाहों में अपना समय घूमने लगा जब वह भी इसी चक्कर में यहाँ फंसी थी. बेबसी में दो बून्द आंसू उसकी नज़रों से टपके और लड़की के बालों में गुम हो गए.
मौलिक एवम अप्रकाशित