इतिहास को अगर हम समग्रता में देखें तो हर दिन का अपना विशेष महत्त्व होता है. इसी तरह से आज १० जनवरी का भी इतिहास में एक विशिष्ट स्थान है, तमाम सारी घटनाएं इस दिन घटी हैं जिन्हें हम गाहे बगाहे याद करते रहते हैं. अगर हम अखबार की बात करें तो आज के ही दिन इटली के वेनिस नगर में गाज़ेट नामक विश्व का पहला समाचार पत्र 1623 में प्रकाशित हुआ था. आज के ही दिन हमारी चाय १८३९ में इंग्लैंड पहुंची थी. आज के ही दिन पार्श्व गायक और शास्त्रीय संगीतकार के. जे. येसुदास का जन्म हुआ था. आज के ही दिन कार निर्माण की अग्रणी आटोमोबाइल कंपनी ‘टाटा मोटर्स’ ने एक लाख रुपये वाली कार ‘नैनो’ को 2008 में पेश किया था और आखिर में असली मुद्दे पर आते हैं. आज के ही दिन प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने 2006 से 10 जनवरी को प्रति वर्ष विश्व हिन्दी दिवस के रूप मनाये जाने की घोषणा की थी.
दरअसल अपने देश में रहते समय इस आयोजन के बारे में मुझे शायद ही कभी पता चला था लेकिन जब मैं दक्षिण अफ्रीका गया तो मुझे इस बात का पता चला कि १० जनवरी को विश्व हिंदी दिवस का आयोजन किया जाता है. उससे पहले अधिकांश भारतियों की तरह ही मुझे भी यही पता था कि हिंदी दिवस मतलब १४ सितम्बर. सितम्बर महीने में एक हफ्ते या १५ दिन तक हम लोग हिंदी माह या पखवारा मानते थे और फिर अगले साल अगस्त तक यह भूल जाते थे कि हिंदी के लिए भी हमें कुछ करना है.
एक सवाल यह भी उठना स्वाभाविक है कि अगर हम हिन्दुस्तान में रह रहे हैं तो आखिर हिंदी दिवस या विश्व हिंदी दिवस मनाने का औचित्य क्या है. कोई भी दिवस अमूमन उस दिन किसी ख़ास वजह से ही मनाया जाता है और हमने कभी भी उर्दू दिवस, बांग्ला दिवस या तेलुगु दिवस मनाये जाने के बारे में कभी भी नहीं सुना था. अब ऐसे में हिंदी दिवस ही क्यों मनाया जाता है, यह किसी भी हिन्दुस्तानी के लिए, जो कि हिंदी पट्टी का हो, एक अजीब ही बात होनी चाहिए. लेकिन यह दिवस मनाया जाता है और हर साल खानापूर्ति करके, हिंदी में कुछ बोल के और कुछ अतिथियों को बुलाकर (जिनको साल के बाकी ३६४ दिनों तक हम मिलना भी नहीं चाहते, सम्मानित करना तो दूर की बात है) और उनको सम्मानित करके इस कार्यक्रम को संपन्न कर देते हैं. हाँ इस कार्यक्रम की फोटो जरूर सोशल मीडिया, समाचार पत्र और अपने घर परिवार वालों को दिखाते हैं.
किसी भी देश में उसकी भाषा उसकी प्राणवायु होती है और अमूमन उस देश का हर नागरिक उससे बेइंतहा प्यार करता है. ऐसे में अपने देश में अंग्रेजी की गुलामी वाली मानसिकता वाले लोगों को देखकर बेहद अफ़सोस होता है. ज्यादा दूर नहीं, अपने पड़ोसी देश चीन को ही देख लें, शायद ही कोई चीनी व्यक्ति अपनी भाषा के अलावा अन्य भाषा में बात करता हो. इसकी एक वजह तो समझी जा सकती है कि वह देश किसी एक देश का सैकड़ो साल गुलाम नहीं रहा और उसकी अपनी संस्कृति से बहुत छेड़छाड़ नहीं हुई. लेकिन इन सब वजहों के बावजूद हमारे देश में हिंदी भाषा को ही दिवस के रूप में याद रखा जाय, यह बहुत सालने वाली बात लगती है.
अब समय आ गया है कि हम हिंदी दिवस मनाने की मानसिकता से बाहर निकालें और अपनी भाषा को वह सम्मान दें जिसकी वह हक़दार है. लेकिन इसके साथ साथ विश्व हिंदी दिवस भी जरूर मनाएं जिससे कि पुरे विश्व मवन हिंदी का प्रचार पसार हो और वह उस गौरव को प्राप्त करे जिसकी वह अधिकारी है. इसलिए जो शुरुआत 10 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन से हुई थी और सन २००६ से आधिकारिक तौर पर उसी तारीख पर विश्व हिंदी दिवस के रूप में मनाने की घोषणा हुई, उसे उत्तरोत्तर आगे बढ़ाते हुए हिंदी को विश्व पटल पर चमकाएं. और यह और कोई नहीं, हम हिन्दुस्तान के लोग ही करेंगे, पिछले कुछ साल में इस दिशा में हुई प्रगति इसी बात के लिए आश्वस्त करती है.
दरअसल अपने देश में रहते समय इस आयोजन के बारे में मुझे शायद ही कभी पता चला था लेकिन जब मैं दक्षिण अफ्रीका गया तो मुझे इस बात का पता चला कि १० जनवरी को विश्व हिंदी दिवस का आयोजन किया जाता है. उससे पहले अधिकांश भारतियों की तरह ही मुझे भी यही पता था कि हिंदी दिवस मतलब १४ सितम्बर. सितम्बर महीने में एक हफ्ते या १५ दिन तक हम लोग हिंदी माह या पखवारा मानते थे और फिर अगले साल अगस्त तक यह भूल जाते थे कि हिंदी के लिए भी हमें कुछ करना है.
एक सवाल यह भी उठना स्वाभाविक है कि अगर हम हिन्दुस्तान में रह रहे हैं तो आखिर हिंदी दिवस या विश्व हिंदी दिवस मनाने का औचित्य क्या है. कोई भी दिवस अमूमन उस दिन किसी ख़ास वजह से ही मनाया जाता है और हमने कभी भी उर्दू दिवस, बांग्ला दिवस या तेलुगु दिवस मनाये जाने के बारे में कभी भी नहीं सुना था. अब ऐसे में हिंदी दिवस ही क्यों मनाया जाता है, यह किसी भी हिन्दुस्तानी के लिए, जो कि हिंदी पट्टी का हो, एक अजीब ही बात होनी चाहिए. लेकिन यह दिवस मनाया जाता है और हर साल खानापूर्ति करके, हिंदी में कुछ बोल के और कुछ अतिथियों को बुलाकर (जिनको साल के बाकी ३६४ दिनों तक हम मिलना भी नहीं चाहते, सम्मानित करना तो दूर की बात है) और उनको सम्मानित करके इस कार्यक्रम को संपन्न कर देते हैं. हाँ इस कार्यक्रम की फोटो जरूर सोशल मीडिया, समाचार पत्र और अपने घर परिवार वालों को दिखाते हैं.
किसी भी देश में उसकी भाषा उसकी प्राणवायु होती है और अमूमन उस देश का हर नागरिक उससे बेइंतहा प्यार करता है. ऐसे में अपने देश में अंग्रेजी की गुलामी वाली मानसिकता वाले लोगों को देखकर बेहद अफ़सोस होता है. ज्यादा दूर नहीं, अपने पड़ोसी देश चीन को ही देख लें, शायद ही कोई चीनी व्यक्ति अपनी भाषा के अलावा अन्य भाषा में बात करता हो. इसकी एक वजह तो समझी जा सकती है कि वह देश किसी एक देश का सैकड़ो साल गुलाम नहीं रहा और उसकी अपनी संस्कृति से बहुत छेड़छाड़ नहीं हुई. लेकिन इन सब वजहों के बावजूद हमारे देश में हिंदी भाषा को ही दिवस के रूप में याद रखा जाय, यह बहुत सालने वाली बात लगती है.
अब समय आ गया है कि हम हिंदी दिवस मनाने की मानसिकता से बाहर निकालें और अपनी भाषा को वह सम्मान दें जिसकी वह हक़दार है. लेकिन इसके साथ साथ विश्व हिंदी दिवस भी जरूर मनाएं जिससे कि पुरे विश्व मवन हिंदी का प्रचार पसार हो और वह उस गौरव को प्राप्त करे जिसकी वह अधिकारी है. इसलिए जो शुरुआत 10 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन से हुई थी और सन २००६ से आधिकारिक तौर पर उसी तारीख पर विश्व हिंदी दिवस के रूप में मनाने की घोषणा हुई, उसे उत्तरोत्तर आगे बढ़ाते हुए हिंदी को विश्व पटल पर चमकाएं. और यह और कोई नहीं, हम हिन्दुस्तान के लोग ही करेंगे, पिछले कुछ साल में इस दिशा में हुई प्रगति इसी बात के लिए आश्वस्त करती है.
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