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Thursday, February 21, 2019

पुतलों का दर्द- कहानी

हमेशा तेज़ क़दमों से चलकर दुकान पहुँचने वाला अंकुर आज धीमी चाल से चल रहा था, लेकिन इसको महसूस करने वाला एक उसके सिवा और कोई नहीं था. दरअसल अंकुर जिस दुकान में काम करता था वह एक कपड़े की दुकान थी, या और साफ़ शब्दों में कहें तो रेडीमेड कपड़ों की दुकान. और आजकल की दुकानों की तरह उसमें न सिर्फ़ कुछ लोग, जिसमें आदमी और औरत दोनों थे, काम करते थे, बल्कि कुछ बेजान चीज़ें भी साथ-साथ थे. बेजान से आप समझ ही गए होंगे कि मैं पुतलों की बात कर रहा हूँ. वही पुतले जिन्हें नए और अच्छे डिज़ाइन के कपड़े पहनकर दुकान के बाहर और अंदर दोनों जगह खड़ा कर दिया जाता है. बड़ी ख़ामोशी-से ये पुतले दुकान में आने-जाने वालों को और इसमें काम करने वालों को देखते रहते हैं. पता नहीं आपके दिमाग़ में कभी आया होगा या नहीं लेकिन अंकुर के दिमाग़ में हमेशा यह आता है कि ये पुतले भी सब कुछ समझते हैं. बस बोलते कुछ नहीं, शायद इनसानों को बिना रुके लगातार बोलते (अधिकतर झूठ) देखकर ही ये इतने थक जाते हैं कि ख़ामोश ही रहते हैं.
हाँ तो अंकुर आज धीमी चाल से दुकान की तरफ़ जा रहा था और यह एक बार पहले भी हुआ था. वैसे तो उसे दुकान पर सबसे पहले पहुँचकर पूरी दुकान को ठीक-ठाक करने में बहुत संतुष्टि मिलती थी. बचपन से ही अक्सर वह अपने कपड़े भी साफ़-सुथरा करके तहाकर रख देता था और यह उसके परिवार में अचम्भे जैसी बात थी. घर का लड़के से चीज़ों को बिगाड़ने या ख़राब करने की तो उम्मीद रहती है लेकिन अगर कोई लड़का सँभाल करे तो अजीब-सा लगता है. साधारण-सा परिवार था और पिताजी भी किसी दुकान में ही काम करते थे. उनका सपना था कि अंकुर आगे चलकर एक छोटी-सी दुकान खोले जिसका मालिक वह ख़ुद हो. लेकिन यह सपना वह अपने दिल में ही लिए भगवान को प्यारे हो गए और सपना हक़ीक़त में आज तक बदल नहीं पाया.
आज जब अंकुर दुकान पर पहुँचा तो दुकान खुल चुकी थी और कुछ पुतले खड़े भी हो गए थे. दुकान मालिक को अंकुर का देर से आना खटका, अमूमन उसने कभी देर नहीं किया था. अगर तबीयत वग़ैरा ख़राब होने के चलते देर होने वाली होती तो अंकुर पहले ही बता देता था. लेकिन आज उसका फोन भी नहीं आया और वह देर से भी पहुँचा. ख़ैर दुकान मालिक ने बस यूँ ही पूछ लिया "आज क्या हो गया अंकुर, तू देर से आने वाला था तो फोन क्यों नहीं किया?. अंकुर ने बस सर हिला दिया और पुतलों को कपड़े पहनाने के काम में लग गया. पुतलों में जीवन भले न हो लेकिन वे भी इनसानों कि तरह पुरुष, स्त्री और बच्चों में बटें होते हैं और अंकुर रोज़ उनको यथोचित सम्मान देते हुए कपड़े पहनाता. पुरुषों और बच्चों के पुतले तो ठीक थे, उनको कपड़े पहनाकर उनकी जगह खड़े करने में उसे न तो कोई ख़ास दिक़्क़त होती और न कोई अतिरिक्त उत्साह उसके चेहरे पर दिखाई पड़ता. लेकिन जब महिला के पुतले को कपड़े पहनाना हो या उसका शृंगार करना हो तो अंकुर के चेहरे में एक अलग तरह का उत्साह और प्यार नज़र आता था. दुकान में काम करने वाली महिला कर्मचारी कभी-कभी उसे छेड़ती भी थीं लेकिन बस ऊपर ऊपर से ही, असल में उनके मन में भी अंकुर के लिए बहुत इज़्ज़त थी.
हर आम घर की तरह ही अंकुर का भी घर था. घर इसलिए क्योंकि वहाँ एक परिवार रहता था, अभावों से जूझता हुआ लेकिन साथ-साथ. घर में अंकुर को सबसे ज़्यादा उसकी माँ ही अच्छी लगती थी, पिताजी से वह हमेशा ही ख़ौफ़ खाता था. तमाम कम कमाने वाले और ज़्यादा ज़िम्मेदारी वाले पुरुषों की तरह उसके पिताजी भी थे. और अगर घर की आवश्यकता पूरी न हो पा रही हो तो अमूमन पुरुष नशे के आग़ोश में चला जाता है और उसके पिताजी भी इसके अपवाद नहीं थे. माँ हमेशा ख़ामोश रहकर, पिता की गाली-गलौज सहकर भी उसकी और उसकी दो बहनों की परवरिश ठीक-ठाक करती रहती और शायद ही कभी उसके मुँह से अंकुर ने अपशब्द सुना हो. बहनें भी माँ की ही तरह थीं, अंकुर से बड़ी और उसपर प्यार लुटाने वाली. इस तरह धीरे-धीरे अंकुर के मन में औरतों के प्रति एक कोमल भाव उत्पन्न हो गया और समय के साथ-साथ वह बढ़ता रहा. यही वजह थी कि माँ और बहनों के मना करने के बाद भी वह घर के अपने सारे काम ख़ुद ही करता और हर काम में माँ जैसी सुघड़ता लाने की कोशिश भी करता. नशे ने असमय ही पिता को काल कलवित कर दिया और अंकुर अपनी पढ़ाई छोड़कर दुकान में लग गया. लेकिन उसने पिताजी वाली दुकान जल्द ही छोड़ दी क्योंकि वहाँ पिता की कड़वी विरासत रोज़ उसका पीछा करती और उसे बढ़िया काम करने के बाद भी पिता के अतीत की वजह से वह सम्मान या जगह नहीं मिल पाती थी जिसकी वह उम्मीद करता था. सचमुच लोग तो चले जाते हैं लेकिन उनकी यादें, उनके कर्म काफ़ी समय तक पीछे रह जाते हैं, और कुछ मामलों में ख़ुशियाँ तो कुछ मामलों में तकलीफ़ देते रहते हैं.
बहनों की शादी किसी तरह से माँ ने निपटा दी और अब घर में बस अंकुर और उसकी माँ रह गई थीं. माँ की उम्र होने लगी और फिर बहनों और रिश्तेदारों के दबाव में उसकी शादी की बात भी चलने लगी. बहनों ने उसको लड़की देखने को कहा, उनके हिसाब से तो यही सही था. लेकिन अंकुर तो किसी और ही मिट्टी का बना था, उसने घर में दो-टूक बता दिया कि लड़की माँ ही देखेगी और वह माँ की ही तरह की होनी चाहिए. अब आजकल के समय में भी अगर लड़का ऐसी बात कहे तो उसकी माँ के लिए इससे बेहतर बात और क्या हो सकती थी. माँ ने बिल्कुल अपनी ही तरह की बहू ढूँढ़ी और अंकुर की शादी सरोज से हो गई. सरोज का मायका अंकुर से भी ग़रीब था और यही वजह थी कि उसे यहाँ आकर हमेशा अच्छा ही लगा. सरोज बेहद सरल स्वभाव की घरेलू महिला थी और वह अपनी सास का बेहद ख़याल रखती थी. अब घर में दो महिलाएँ हो गई थीं और दोनों के मुँह में ज़ुबान नहीं थी. अंकुर को इससे ज़्यादा और कुछ नहीं चाहिए था और वह शादी के बाद और मन लगाकर काम करने लगा. दुकान मालिक उसपर आँख मूँदकर भरोसा करता और अंकुर की मेहनत की बदौलत दुकान बहुत अच्छी चलने लगी.
आज अंकुर को पुतलों को कपड़े पहनाने में वह उत्साह या प्यार नहीं महसूस हो रहा था जो अमूमन उसे होता था. ऐसा इसके पहले एक बार तब हुआ था जब उसकी माँ का देहांत हुआ था. माँ की मौत का सदमा उसे बहुत दिनों तक सालता रहा और दुकान मालिक ने उस दरम्यान अंकुर को कुछ नहीं बोला था. दुकान मालिक ही क्या, वहाँ काम करने वाले सभी कर्मचारी अंकुर के स्वभाव से भली-भाँति परिचित थे और सब यह जानते थे कि अंकुर अपने माँ से कितना लगाव रखता है. समय ही हर रोग के लिए मलहम का काम करता है, बहरहाल धीरे-धीरे अंकुर भी उस सदमें से उबरा और उसका जीवन और दुकान का काम, दोनों पटरी पर आ गए.
समय बीतता गया, शादी के दो साल बाद अंकुर एक बेटी का बाप बना, शायद प्रकृति उसके ऊपर मेहरबान थी. पहले माँ, दो बहने, पत्नी और अब एक प्यारी-सी बेटी. जीवन में उसे और क्या चाहिए था. अब वह और सरोज रोज़ रात में अपनी बेटी के भविष्य के बारे में देर तक बात करते. बड़े प्यार से उन्होंने बेटी का नाम मुन्नी रखा था और जैसे-जैसे मुन्नी बड़ी होने लगी, घर में बस मुन्नी का ही नाम गूंजता रहता. अब वह दुकान में औरतों के पुतलों को इस तरह सजाता, मानो वे पुतले न होकर उसकी मुन्नी ही हों. दिनभर में कई कई बार वह उन पुतलों के पास जाता, उनके कपड़े ठीक करता और फिर उनके सर पर प्यार से हाथ फेर देता. दुकान की महिला कर्मचारियों के लिए हमेशा से यह एक अजूबा ही था कि कोई पुरुष महिलाओं के पुतले को भी इतने प्यार से रखता है और उनकी सँभाल करता है.
एक रात वह दुकान से जब घर पहुँचा तो सरोज बिस्तर पर लेटी हुई थी. वैसे तो पिछले कई दिन से उसे बुख़ार था और वह उसके लिए दवा भी ले गया था लेकिन उस दिन सरोज की हालत ज़्यादा ख़राब लग रही थी. मुन्नी ने भी घर पहुँचते ही अंकुर से सरोज को किसी अच्छे डॉक्टर से दिखाने के लिए कहा तो वह और भी चिंतित हो गया. अगली सुबह क़स्बे की सबसे अच्छी डॉक्टर के पास वह सरोज को लेकर गया, डॉक्टर ने दवा दी और कुछ टेस्ट कराने को कहा. टेस्ट का नतीजा अगले दिन आया तो वह उसे लेकर डॉक्टर के पास गया और डॉक्टर ने उन्हें देखते समय अपना चेहरा गंभीर बना लिया.
"देखो अंकुर, तुम्हारी बीबी को थोड़ी दिक़्क़त है और इसका इलाज लंबा चलेगा. उम्मीद है कि वह पूरी तरह ठीक हो जाएगी लेकिन हिम्मत से काम लेना पड़ेगा".
अंकुर बुरी तरह घबरा गया, उसने अटकते हुए पूछा "कौन सी बीमारी है डॉक्टर साहब, यह ठीक तो हो जाएगी न?
डॉक्टर ने उसे ढाढस बँधाया और बोली "इसके स्तन में गाँठ है और अभी कैंसर की शुरुवाती स्टेज है. उम्मीद है कि यह पूरी तरह से ठीक हो जाएगी, बस समय लगेगा और हिम्मत से काम लेना पड़ेगा. तुम दवाइयाँ ले लेना और हर हफ़्ते एक बार यहाँ ले आना, कुछ इलाज चलेगा".
अंकुर के दिल में आया कि वह वहीं पर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे, लेकिन सरोज के उतरे चेहरे को देखकर उसे हिम्मत जुटानी पड़ी. मुन्नी अलग परेशान थी, अब वह कॉलेज जाने लगी थी और उसे भी कैंसर के बारे में पता था. लेकिन उसने भी अंकुर और सरोज के चलते अपने आपको सामान्य रखने की पूरी कोशिश की और तीनों उदास चेहरा लिए घर पहुँचे. धीरे-धीरे इलाज शुरू हुआ और अंकुर अपने आपको संयत करके दुकान का काम भी उसी तरह करता रहा. दुकान पर उसने सरोज के कैंसर की बात किसी से नहीं बताई थी, बस इतना बताया था कि सरोज की तबीयत आजकल ख़राब रहती है और उसका इलाज़ चल रहा है.
दुकान में औरतों के पुतलों को कपड़े पहनाते समय वह हमेशा इस बात का ख़याल रखता कि पुतले उसके सामने नंगे न हों. कभी-कभी इसके लिए उसका मज़ाक भी उड़ाया जाता, ख़ासकर पुरुष कर्मचारियों के द्वारा लेकिन उसने कभी भी किसी पुतले को निर्वस्त्र नहीं देखा. हाँ उनको कपड़े पहनाते समय अगर उसका हाथ कभी उनके स्तन को छू जाता था तो उस समय उसे अपने-आप पर ग़ुस्सा और शर्म दोनों आती. यहाँ तक कि उसने सरोज के स्तन को भी शायद ही कभी उजाले में देखा हो, उसे हमेशा से यही लगता कि यह बच्चों के लिए ही हैं. इधर कुछ दिनों से सामने से दुपट्टा या कोई और कपड़ा पहनाते समय उसका ध्यान पुतलों के सामने के उभार की तरफ़ जाता तो उसे सरोज की याद आ जाती. उस समय वह पुतले के हाथ को कसकर दबाता और इस तरह से मानो सरोज को भी तसल्ली देने की कोशिश करता.
समय बीतता गया, सरोज का इलाज चलते लगभग एक साल होने को आया. वह यथासंभव सरोज को ख़ुश रखने की कोशिश करता, मुन्नी भी उसके साथ-साथ मम्मी को दिलाशा देती. लेकिन धीरे-धीरे उन तीनों को यह आभास हो गया कि यह रोग अब ठीक होने की स्थिति में नहीं है. क़स्बे की डॉक्टर के कहने पर वह एक बार शहर में भी सरोज को दिखा चुका था लेकिन वहाँ से भी कुछ ज़्यादा उम्मीद की किरण नहीं दिखाई दी. पिछले महीने जब वह सरोज को लेकर डॉक्टर के पास गया तो डॉक्टर काफ़ी गंभीर थी.
"अंकुर, अब और कोई रास्ता नहीं दिखता, सरोज को बचाने के लिए सर्जरी करनी पड़ेगी", डॉक्टर ने लंबी साँस छोड़ते हुए कहा.
अंकुर भी परिस्थिति को समझ रहा था, उसकी रुचि सिर्फ़ सरोज को किसी भी तरह से बचाने की थी.
"अब आप जैसा ठीक समझें डॉक्टर साहब, ऑपरेशन के बाद सरोज ठीक तो हो जाएगी न", अंकुर ने माथे पर चू आए पसीने को पोंछते हुए कहा.
"अरे बिल्कुल चिंता मत करो, सरोज ठीक हो जाएगी. बस उसका एक स्तन निकालना पड़ेगा नहीं तो कैंसर शरीर के बाक़ी हिस्सों में भी फ़ैल जाएगा. तुम अब ऑपरेशन की तयारी करो अंकुर और जल्द-से-जल्द सरोज को यहीं भर्ती करा दो, मैं शहर के सबसे अच्छे डॉक्टर से ऑपरेशन करवा दूँगी", डॉक्टर ने अंकुर को आश्वस्त करते हुए कहा.
अंकुर को काटो तो ख़ून नहीं, लेकिन डॉक्टर पर उसे पूरा भरोसा था. दरअसल उस क़स्बे में शायद ही कोई ऐसा था जो उस दुकान पर नहीं जाता था जहाँ अंकुर काम करता था. और इसी वजह से हर कोई अंकुर के अच्छे व्यवहार से परिचित था. आज तक इलाज के नाम पर डॉक्टर ने हमेशा उससे कम-से-कम पैसा ही लिया था और यह बात अंकुर भली-भाँति जानता था.
"और ख़र्चे की चिंता बिल्कुल मत करना अंकुर, सब हो जाएगा. बस अब देर मत करना", डॉक्टर ने जाते-जाते कहा तो अंकुर ने पलटकर हाथ जोड़ लिए.
लगभग दस दिन लगे सरोज को सर्जरी के बाद वापस घर आने में. बहुत कमज़ोर हो गई थी सरोज और अंकुर अब उसका ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान रखता था. मुन्नी भी कुछ दिन कॉलेज जाना बंद करके सरोज की देखभाल में ही लग गई. धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य होने लगा, सरोज भी घर के काम में थोड़ा-थोड़ा हाथ बटाने लगी और अंकुर अब सामान्य तरीक़े से दुकान पर जाने लगा. सरोज के मुँह में पहले भी ज़ुबान नहीं थी और अब तो लगभग ख़ामोश ही रहने लगी थी. उसकी मनोदशा मुन्नी तो समझती थी लेकिन अंकुर उसे ठीक होते देखकर वापस पहले की तरह रहने लगा. सरोज अब अपने आपको अधूरा महसूस करती लेकिन वह अंकुर से या मुन्नी से भी कुछ नहीं कहती. उसका अपना स्वभाव भी था और अंकुर की मनोदशा सोचकर भी वह अब सामान्य दिखने का ही प्रयास करती.
कल रात को दुकान बंद करते समय जब अंकुर पुतलों को अंदर कर रहा था तो अचानक एक कील में फँसकर एक पुतले का ब्लाउज़ सरककर नीचे आ गया. उस समय वहाँ कोई नहीं था और चमकती बत्तियों में अंकुर की नज़र पुतले के सामने वाले नग्न उभारों पर पड़ गई. एक बार तो उसे शर्म जैसा महसूस हुआ लेकिन फिर जब उसे दोनों उभार दिखे तो उसे सरोज की याद आ गई. ऑपरेशन के बाद उसने कभी भी सरोज को इस नज़रिए से गंभीरता से नहीं देखा था, बस उसे यह पता था कि सरोज का एक उभार काटकर निकाल दिया गया है. उसने जल्दी से पुतले को ब्लाउज़ पहनाया और लाइट बंद करके बाहर आ गया.
रात को घर आने के बाद उसने ऑपरेशन के बाद पहली बार सरोज को सामने से ग़ौर से देखा. उसे कुछ कमी सी लगी और फिर सरोज के चेहरे पर भी उसे वही कमी नज़र आई. पूरी रात वह बेचैनी से करवट बदलता रहा, उसे नींद नहीं आई. वह सरोज के शरीर और उसके चेहरे पर आए खालीपन को भरने की चिंता में लगा रहा. आज अगर वह सरोज के साथ सो रहा होता तो शायद वह उस खालीपन को अपनी आँखों से देखता. लेकिन सरोज और मुन्नी कमरे में साथ-साथ सोते थे और वह बाहर बरामदे में, इसलिए उसके लिए यह संभव नहीं था. और वह चाहकर भी सरोज से इसके बारे में कुछ पूछ नहीं सकता था. पूरी रात सोचने के बाद उसे यही समझ आया कि शायद सरोज के दर्द को महसूस करने के लिए ही दुकान में पुतले का ब्लाउज़ सरका होगा.
सुबह उठकर जब तक वह मुँह धोकर बाथरूम से निकला, सरोज चाय लेकर आ गई थी. उसने सरोज को साथ ही चाय पीने के लिए बोला तो उसने फीकी मुस्कान से अंकुर को देखा.
"मुन्नी, ज़रा एक कप चाय मम्मी के लिए भी लाना", अंकुर के अंदर पता नहीं कहाँ से यह हिम्मत आ गई. सामान्य स्थिति में उसका सरोज के सामने कुछ देर खड़ा रहना भी मुश्किल था, उसकी परवरिश और उसका संकोच आड़े आ जाता.
मुन्नी ने थोड़े आश्चर्य के साथ चाय का कप लाकर अंकुर के सामने रखा. सरोज ने शरमाते हुए कप उठाया और एक निगाह मुन्नी की तरफ़ डालकर धीरे-धीरे पीने लगी. अंकुर भी मुन्नी की उपस्थिति से बेख़बर एकटक सरोज को चाय पीते देखता जा रहा था. आज उसे अपनी पुरानी सरोज कहीं भी दिखाई नहीं पड़ रही थी, वह अंदर से तड़प उठा.
जब रोज़ का समय बीतने लगा तो सरोज ने ही आकर उसे टोका "अरे दुकान पर नहीं जाना है क्या, जल्दी से तैयार हो जाओ". उसकी इच्छा तो हुई कि वह आज दुकान जाने के लिए मना कर दे लेकिन अगर वह दिनभर घर में रहता तो शायद और उदास हो जाता.
अनमने ढंग से वह दुकान जाने के लिए तैयार हुआ और जाते समय जब उसे सरोज का फीका चेहरा दिखाई दिया तो उसका दिल रो पड़ा. आज वापस लौटते समय वह डॉक्टर के पास जाएगा और उससे बात करेगा, शायद कोई रास्ता निकल जाए. धीमे क़दमों से दुकान जाते समय उसके मन में बस किसी भी तरह सरोज को वापस मुस्कुराता हुआ देखने की तमन्ना थी, किसी भी तरह से.

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