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Friday, May 31, 2019

अनाम रिश्ता- लघुकथा

भयानक गर्मी लगता था सब कुछ जला डालेगी और ऊपर से लू, दिन में बाहर निकलना लगभग असंभव सा हो गया था. हरी बाबू अपने कमरे में बैठे कूलर की हवा खा रहे थे और बीच बीच में खिड़की के परदे को हटाकर बाहर भी झांक ले रहे थे. पिछले महीने ही रिटायर हुए थे और पहले जहाँ बाबू थे वहां दिन भर लोगों से घिरे रहते थे. इसलिए उनका इस तरह खाली बैठना बेहद कष्टप्रद था, लेकिन कोई उपाय भी नहीं था. बेटे ने सख्त ताकीद कर रखी थी कि दोपहर में बाहर नहीं निकलना है, सुबह शाम चाहे जहाँ भी जाएँ. अब इसके पीछे बेटे की मंशा चाहे जो भी हो लेकिन उनको उसका मना करना अच्छा ही लगता था.
अंदर के कमरे में बहू आराम कर रही थी, अब धीरे धीरे उनकी आदत पड़ गयी थी कि दोपहर में बहू से वह कोई फरमाईश नहीं करें. अव्वल तो वह उठती नहीं थी और अगर उठ भी गयी तो जिस तरह से उनकी फरमाईश किसी न किसी बहाने से टाल देती थी कि उनको समझ में आ गया था. प्यास महसूस हुई तो वह उठे और ख़ामोशी से किचन में जाकर पानी ले आये. पानी टेबल पर रखकर उन्होंने एक बार फिर पर्दा हटाकर बाहर देखा, सड़क पर कर्फ्यू जैसा हाल था. हरी बाबू पर्दा वापस खींचते तभी उनको एक अधेड़ साइकिल से उनके घर की तरफ ही आता दिखाई दिया. उस पूरे इलाके में एक उनके घर के सामने ही मरियल सा गुलमोहर का पेड़ था. गाहे बगाहे कोई धूप का मारा उसके छाँव तले थोड़ा सुस्ताता और फिर आगे बढ़ जाता. छाँव बस इतनी ही होती थी कि कुछ पल के लिए राहत मिले, फिर लू के थपेड़े जता देते थे कि आगे बढ़ना चाहिए.
उस अधेड़ ने साइकिल खड़ी की और अपना गमछा उतार कर उससे चेहरे के बहते पसीने को पोंछने लगा. हरी बाबू की अनुभवी निगाहों ने उसकी वेश भूषा और मूछ दाढ़ी से अंदाजा लगा लिया कि वह एक मुस्लिम है. उनको अचानक याद आया कि रमजान चल रहा है और शायद यह व्यक्ति रोजे से होगा. अपनी नौकरी के दौरान अक्सर वह रमजान के महीने में अपने मुस्लिम साथियों का ध्यान रखते थे और यथासंभव उनके सामने भोजन या जल नहीं ग्रहण करते थे. उस अधेड़ ने गमछे से चेहरा पोंछने के बाद चारो तरफ निगाह दौड़ाई, शायद वह कोई बेहतर जगह तलाश रहा था.
हरी बाबू सोच में पड़ गए, एक तरफ तो उनका मन कहता कि वह उस व्यक्ति को कम से कम एक ग्लास पानी पिला दें. फिर रोजे का ख्याल आता तो मन मना करने लगता. वैसे उनके कुछ साथी रोजा नहीं भी रखते थे इसलिए उनकी इच्छा हुई कि वह आगे बढ़कर उस अधेड़ से पूछ ही लें. उन्होंने दरवाजा खोला, लपट पूरी भयावहता से उनके चेहरे और शरीर के खुले हिस्से से टकराई और वह लड़खड़ा गए. फिर हिम्मत करके वह आगे बढ़े और उस अधेड़ की तरफ मुखातिब हुए "इतनी गर्मी में कहाँ निकल पड़े, लू लग गयी तो लेने के देने पड़ जाएंगे. अगर ऐतराज न हो तो थोड़ा पानी पी लो".
अधेड़ ने उनकी तरफ देखा और पपड़ियाये होठों पर हाथ फेरा "रोजे से हूँ भाईजान, कुछ जरुरी काम से जाना था इसलिए निकल पड़ा. अब इतने दिन निकल गए तो कुछ दिनों के लिए रोजा क्यूँ तोडूं".
हरी बाबू ने उसका चेहरा देखा, दया सी आ गयी उनको. "अच्छा ठीक है पानी मत पीना लेकिन थोड़ी देर आराम कर लो. फिर निकल जाना, अंदर आ जाओ".
अधेड़ ने एक बार फिर उनको देखा, उन्होंने नज़रों से आश्वस्त किया तो अधेड़ उनके पीछे पीछे कमरे में आ गया. कमरे में कूलर की हवा के चलते बहुत राहत थी, उन्होंने अधेड़ को सोफे पर बैठाया और धीरे से पानी का भरा ग्लास उठाकर किचन में ले जाकर रख दिया. ग्लास रखते समय उनको प्यास की पुनः अनुभूति हुई लेकिन उन्होंने पानी नहीं पीना ही उचित समझा.  

Monday, May 20, 2019

ग़लतफ़हमी-लघुकथा

"याद पिया की आए" ठुमरी लैपटॉप में मद्दम स्वर में बज रही थी, बाहर बरसती हुई बूंदों का शोर मन में हलचल मचाना चाह रही थी. उसने अपनी चाय की प्याली उठायी और होठों से लगा लिया. चाय कुछ ठंडी हो गई थी लेकिन उसे इसका एहसास नहीं था. उसे तो अधखुली आँखों से खिड़की के बाहर टपकती बारिश की बूंदें दिख रही थी और उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली साहब की जादुई आवाज सुनाई दे रही थी.
अक्सर ऐसे मौकों पर, जब वह नितांत अकेले ही रहना चाहता है, फ़ोन को साइलेंट मोड में कर देता है. लेकिन आज न जाने कैसे वह भूल गया था और फोन का रिंग टोन "तेरे आने की जब खबर महके" बजी तो उसे लगा कि काश यह फोन बिलकुल खामोश ही रहता. एक बार पूरी रिंगटोन बज गयी, ठुमरी और ग़ज़ल आपस में मिक्स हो गए. वह चुपचाप अधलेटा ही पड़ा था लेकिन रिंगटोन दुबारा बजने लगी. अब उसे लगा जैसे जगजीत सिंह साहब उससे कह रहे हों कि थोड़ा सा समय हमें भी दे दो. पिछले तीन साल से उसने यह रिंगटोन बदला नहीं था, वजह सिर्फ इतनी थी कि वह जब पहली बार श्वेता से मिलने गया था तो उसके कमरे में यही ग़ज़ल बज रही थी. उसने अपनी तरफ से इस ग़ज़ल और उस वक़्त को मिलाकर बहुत कुछ मतलब निकाला, लेकिन समय के साथ उसे लग गया कि इस ग़ज़ल का उस समय बजना महज एक संयोग था, और कुछ नहीं. एकाध बार उसने कुछ खुलने की कोशिश की तो श्वेता ने ध्यान नहीं देने जैसा वर्ताव किया. कल हिम्मत करके उसने कह दिया था कि हम क्या आगे के बारे में कुछ सोच सकते हैं तो श्वेता ने तुरंत टोक दिया "हम अच्छे दोस्त हैं, उससे ज्यादा कुछ नहीं. कोई ग़लतफ़हमी मत पालना".
उसने उठकर फोन देखा, श्वेता का ही फोन था. अमूमन श्वेता का नाम देखकर उछल पड़ने वाला उसका दिल आज कुछ सामान्य सा था. कुछ पल वह फोन को हाथ में लेकर देखता रहा, फोन बंद हो गया, उसने वापस उसे मेज पर रख दिया. उधर लैपटॉप में "बैरी कोयलिया कुक सुनाए" चल रहा था, बाहर बारिश थोड़ी तेज हो गयी थी. वह वापस सोफे पर अधलेटा सा पड़ गया, फोन में मैसेज का टोन बजा.
ग़लतफ़हमी न हो तो चीजें कितनी अनरोमांटिक हो जाती हैं, उसे महसूस हो गया था. बाद में मैसेज का जवाब दे देगा सोचते हुए उसने आंख मूंद ली, बारिश अब भी उसी रफ़्तार से हो रही थी. 

Saturday, May 4, 2019

जिम्मेदारी-लघुकथा

यह तीसरी बार था जब वह व्यक्ति चिल्ला रहा था और उठ कर भागने का प्रयास कर रहा था "मुझे कुछ नहीं हुआ है, मुझे जाने दो". खून का बहना अभी तक रुका नहीं था और उसके चेहरे से लेकर कपड़ों तक फ़ैल गया था. दो कम्पाउंडरों ने उसे पकड़ कर वापस लिटा दिया और डॉक्टर फिर से उसके सर पर दवा लगाकर पट्टी बांधने की तैयारी कर रहा था.
बमुश्किल आधे घंटे पहले ही उसने सड़क के दूसरी तरफ इस एक्सीडेंट को होते हुए देखा था और रात के सन्नाटे में वह अपनी गाड़ी मोड़कर वापस आया. वहां मौजूद लोगों की मदद से उसने उसे इस हस्पताल में भर्ती कराया और डॉक्टर ने तुरंत प्राथमिक उपचार की तैयारी शुरू कर दी. इस दरम्यान उसकी हरकतों से पता चल गया था कि घायल व्यक्ति काफी नशे में था और इसीलिए दुर्घटना भी हुई थी.
डॉक्टर ने उसके माथे से खून साफकर जैसे ही दवा लगाने की कोशिश की, वह व्यक्ति फिर से उठ बैठा. अब जैसे ही उसने वापस बड़बड़ाना शुरू किया, डॉक्टर बुरी तरह झल्ला गया और उसने गुस्से में बोला "जाने दो इस पियक्कड़ को, इतने नशे में है कि कुछ समझ में ही नहीं आ रहा है इसको".
इतना बोलकर डॉक्टर जैसे ही रुका, उसने धीरे से कहा "लेकिन डॉक्टर, हम तो नशे में नहीं हैं, इसकी जान बचाना जरुरी है".
कुछ पल बाद वह भी दोनों कम्पाउंडरों के साथ घायल को पकड़े हुए था और डॉक्टर ख़ामोशी से पट्टी लगा रहा था.

Thursday, May 2, 2019

मृगतृष्णा-लघुकथा

"देखो आज का अखबार, एक लड़के ने जिसे कोई भी सहूलियत हासिल नहीं थी, राज्य सेवा परीक्षा उत्तीर्ण कर ली. जिसे करना होता है ना, वह लैंप पोस्ट की रौशनी में भी पढ़ लेता है", पिताजी आज फिर उबल रहे थे. इस बार भी राकेश असफल हो गया, वह खुद बहुत उदास था.
"लक्ष्य तो निर्धारित करते नहीं ठीक से, बस साधनों का रोना रोते रहोगे. मुझे लगता था कि मेरे रिटायर होने से पहले मैं भी सुनूंगा कि एक बाबू का लड़का बड़ा अधिकारी बन गया. लेकिन जनाब को तो कोई मतलब ही नहीं है इन सब से", अभी तक उनका बड़बड़ाना जारी था.
पहले भी वह कई बार ऐसे भाषणों को सुन चुका था और वह नजरअंदाज करके रह जाता था. लेकिन इस बार तो आखिरी मौका था और उसने अपनी तरफ से काफी प्रयत्न भी किया था.
"पिताजी, आप जो उदाहरण गिनाते हैं, वह अपवाद में आते हैं, हर लड़का वैसा नहीं हो सकता. कोई भी रेस अगर बराबरी से हो तो ही हार जीत के मायने होते हैं. और यह आप भी जानते हो कि उस एक को छोड़कर, जिसका जिक्र अख़बार में हुआ है, बाकी अधिकांश लड़के या तो ऐसी जगहों से हैं जहाँ उनको तैयारी की तमाम अत्याधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं. या फिर वह किसी न किसी कोटे में आते हैं".
उसने एक सांस छोड़ी और पिताजी की तरफ देखा, वह भौचक्के से उसको देखे जा रहे थे. आजतक उसने कभी भी उनको पलटकर जवाब नहीं दिया था.
"पिताजी, जितना दुःख आपको है, उससे रत्ती भर भी कम दुःख मुझे नहीं है. लेकिन यह जो सिस्टम बना है, वह अपने आप में ही ठीक नहीं है. लाखों मेघावी लड़के कुछ सौ सीटों के लिए हर साल जूझते हैं, तो असफलता का प्रतिशत हमेशा बहुत ज्यादा ही होगा ना? मैं अब अपनी वकालत शुरू करूँगा और वहां एक बेहतर वकील बनने की पूरी कोशिश करूँगा", राकेश ने बात ख़त्म की और बाहर निकल गया.
पिताजी को आज यक़ीन होने लगा कि एक बाबू का बेटा भले एक सरकारी अफसर नहीं बन पाए, लेकिन एक संवेदनशील इंसान जरूर बन गया है. 
शाम से रामवती उदास और गुमसुम बैठी थी, आज अपनी बेबसी पर उसे जोर जोर से रोना आ रहा था लेकिन वह रोये भी तो किसके आगे. पति मनोहर काम कम करता था, झगड़ा ज्यादा, इसलिए उसे कहीं भी टिक कर काम करने को नहीं मिलता था. वह उसके स्वभाव को जानती थी और चाह कर भी बदल नहीं सकती थी. शुरुआत में उसने कोशिश की थी लेकिन बदले में उसे ही अक्सर लात घूंसों का सामना करना पड़ता. बेटा बड़ा था और बाप के ही नक़्शेक़दम पर चल रहा था. १० वीं तक पढ़कर अब दोस्तों के साथ आवारागर्दी करता और देर रात घर आता. बिटिया पढ़ने में अच्छी थी और स्कूल में भी सब मास्टर उसको पसंद करते. अब रामवती की एकलौती इच्छा बिटिया को किसी तरह पढ़ाकर कुछ अच्छा बनाने की रह गयी थी.
आज जब बिटिया स्कूल से लौटी, उसने बताया कि स्कूल का साइंस का प्रोजेक्ट है जिसे करने के लिए सामान खरीदना है. अब सामान खरीदने के लिए पैसे कहाँ से आएंगे, उसे समझ नहीं आ रहा था. इसके पहले भी वह कुछेक बार कुछ पैसा अपने छोटे से किराने की दुकान से बचाने का प्रयास कर चुकी थी लेकिन बचता नहीं था. बस घर किसी तरह चल रहा था और रात को खाने के लिए रोटी मिल जाती थी. उसने उन तमाम लोगों के बारे में सोचना शुरू किया जो उसकी दुकान से सौदा लेते थे. लेकिन उन सबकी हालत एक सी ही थी, किसी से मदद मिलने की उम्मीद नहीं थी.