शाम से रामवती उदास और गुमसुम बैठी थी, आज अपनी बेबसी पर उसे जोर जोर से रोना आ रहा था लेकिन वह रोये भी तो किसके आगे. पति मनोहर काम कम करता था, झगड़ा ज्यादा, इसलिए उसे कहीं भी टिक कर काम करने को नहीं मिलता था. वह उसके स्वभाव को जानती थी और चाह कर भी बदल नहीं सकती थी. शुरुआत में उसने कोशिश की थी लेकिन बदले में उसे ही अक्सर लात घूंसों का सामना करना पड़ता. बेटा बड़ा था और बाप के ही नक़्शेक़दम पर चल रहा था. १० वीं तक पढ़कर अब दोस्तों के साथ आवारागर्दी करता और देर रात घर आता. बिटिया पढ़ने में अच्छी थी और स्कूल में भी सब मास्टर उसको पसंद करते. अब रामवती की एकलौती इच्छा बिटिया को किसी तरह पढ़ाकर कुछ अच्छा बनाने की रह गयी थी.
आज जब बिटिया स्कूल से लौटी, उसने बताया कि स्कूल का साइंस का प्रोजेक्ट है जिसे करने के लिए सामान खरीदना है. अब सामान खरीदने के लिए पैसे कहाँ से आएंगे, उसे समझ नहीं आ रहा था. इसके पहले भी वह कुछेक बार कुछ पैसा अपने छोटे से किराने की दुकान से बचाने का प्रयास कर चुकी थी लेकिन बचता नहीं था. बस घर किसी तरह चल रहा था और रात को खाने के लिए रोटी मिल जाती थी. उसने उन तमाम लोगों के बारे में सोचना शुरू किया जो उसकी दुकान से सौदा लेते थे. लेकिन उन सबकी हालत एक सी ही थी, किसी से मदद मिलने की उम्मीद नहीं थी.
आज जब बिटिया स्कूल से लौटी, उसने बताया कि स्कूल का साइंस का प्रोजेक्ट है जिसे करने के लिए सामान खरीदना है. अब सामान खरीदने के लिए पैसे कहाँ से आएंगे, उसे समझ नहीं आ रहा था. इसके पहले भी वह कुछेक बार कुछ पैसा अपने छोटे से किराने की दुकान से बचाने का प्रयास कर चुकी थी लेकिन बचता नहीं था. बस घर किसी तरह चल रहा था और रात को खाने के लिए रोटी मिल जाती थी. उसने उन तमाम लोगों के बारे में सोचना शुरू किया जो उसकी दुकान से सौदा लेते थे. लेकिन उन सबकी हालत एक सी ही थी, किसी से मदद मिलने की उम्मीद नहीं थी.
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