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Sunday, June 9, 2019

अलग अलग कारण- लघुकथा

सुबह का अखबार जैसे खून से सना हुआ था, इतनी वीभत्स खबर छपी थी जिसकी कल्पना करके ही दिमाग सुन्न हो जा रहा था. सामने चाय की प्याली रखी हुई थी लेकिन उसे पीने की इच्छा मर चुकी थी. उसने अपना सर पकड़ा और बिस्तर पर ही निढाल हो गयी.
"क्या हो गया है इस समाज को, अब और कितना नीचे गिरेंगे हम लोग?, उसके मुंह से बुदबुदाहट की शक्ल में आवाज निकली. 
कुछ देर बाद कामवाली बाई आयी और उसने देखा कि चाय वैसे ही रखी है तो उसने टोका "मैडम, तबियत ठीक नहीं है क्या? मैं दूसरी चाय बना लाती हूँ और कोई दवा भी ला दूँ क्या?
उसने सर से हाथ हटाया और बाई को देखने लगी. कम उम्र की बाई सुबह सबसे पहले उसके घर ही आती थी और लगभग दोपहर में जाती थी. वापस शाम को आकर फिर रात में ही जाती थी, इसलिए वह उसे उसकी मेहनत से ज्यादा ही पैसा दे देती थी. 
"नहीं मैं ठीक हूँ, तू अभी चाय रहने दे, मन नहीं है", उसने उठते हुए कहा.
बाई ने चाय की ट्रे उठायी और जाते जाते बोली "मैडम, आज शाम को नहीं आउंगी, बिटिया का जन्मदिन है".
उसके चेहरे पर मुस्कराहट फ़ैल गयी, बहुत प्यारी बेटी थी बाई की. कभी कभी बाई उसको ले आती थी तो उसके साथ खेलकर उसे काफी अच्छा लगता था. घरपर वह अकेली ही रहती थी, बच्चे विदेश में थे और पति बहुत पहले ही साथ छोड़ गए थे.
"अच्छा यह बता, आज कहाँ लेकर जायेगी उसे", उसने बाई से पूछा.
बाई के चेहरे पर भी मुस्कराहट आ गयी "कहीं नहीं मैडम, उसे पार्क ले जाउंगी और फिर कुछ बाहर ही खिला दूंगी. ज्यादा रात में डर सा लगता है उस तरफ, इसलिए जल्दी ही घर लौट आउंगी".
उसका दिमाग फिर से उस खबर की तरफ चला गया, वह बच्ची भी तो इसकी बेटी की ही उम्र की थी. 
"तू एक काम कर, आज बेटी को लेकर यहीं आ जा, उसका जन्मदिन हम साथ साथ मनाएंगे. वैसे भी तू अकेली है आजकल, यहीं रुक जाना", उसने कहा तो बाई थोड़ा चौंकी, पहले वह कभी मैडम के यहाँ रात में बेटी के साथ नहीं रुकी थी.
"एक और बात, आगे से तू अपनी बेटी को दिन में यहीं छोड़कर जाया कर, मेरे साथ रहेगी तो मेरा भी मन लगा रहेगा", उसने बाई से कहा. बाई अंदर से बहुत खुश हुई और वह भी, बस दोनों के कारण अलग अलग थे.

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