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Tuesday, July 30, 2019

अपनी पहचान- लघुकथा

बादल तो कई घंटों से छाये हुए थे लेकिन बूंदें बरसने का नाम ही नहीं ले रही थीं. पूरा महीना बीतने को आया, इस बार धान का बेहन तक नहीं पड़ पाया है, राजन खेत के मेड़ पर बैठा यही सब सोच रहा था. घर में जाने पर घरवाली का चिंतित चेहरा देखकर उसको सहन नहीं होता था. दरअसल वह कुछ कहती नहीं थी, बस ख़ामोशी से उसका मुंह देखती. और उसका कुछ नहीं बोलना ही उसे अंदर तक सालता था. पिछले साल तो फिर भी जुलाई के आखिर में बारिश हो गयी थी और उसने धान का बेहन डाल दिया था.
"तुम भी आ जाओ शहर, गांव में कुछ नहीं रक्खा है. कम से कम यहाँ दिन भर की मेहनत के बाद रोटी तो नसीब हो जाती है, रहने के लिए भले नर्क जैसी जगह है", पिछले हफ्ते भी उसके दोस्त हरी ने फोन पर कहा था. उसने मना कर दिया था, यहाँ उसकी पहचान तो है, वहां कौन पहचानेगा. घरवाली से भी जब उसने बात की तो उसने भी हामी नहीं भरी. वह भी एक किसान की बेटी थी और अब तक के जीवन में उसने खेती बाड़ी के अलावा कुछ नहीं देखा था.
"थोड़ी दिक्कत तो है लेकिन चला लेंगे गृहस्ती किसी तरह. मेरे मामा भी शहर रहते हैं, मैं एक बार कुछ दिनों के लिए वहां गयी थी लेकिन उस बदबू और घुटन में मैं जी नहीं पाउंगी", घरवाली ने धीरे से कहा था.
एक ही तो गाय है घर में और दो लोग, चला लेंगे किसी तरह से, सोचते हुए वह उठा. कुछ कदम ही चला होगा कि बरसात शुरू हो गयी और घर तक पहुँचते पहुँचते जम के बारिश हो रही थी. दरवाजे पर एक तरह उसकी गाय तो दूसरी तरफ घरवाली बरसात में भींग रहे थे, मानो पिछले कई महीने के सूखे को शरीर से निकाल फेंकना चाहते हों. उसने धीरे से घरवाली का हाथ पकड़ा और दोनों देर तक उस बरसात में भीगते रहे.

Wednesday, July 17, 2019

बाढ़ का पानी- लघुकथा

सुबह से हो रही मूसलाधार बरसात रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी, अब तो दोपहर होने वाली थी. पिछले कई दिनों से बादल छाते तो थे लेकिन बरसने में कंजूसी कर देते थे, मानो इसरार की कामना रखते हों. मौसम पिछले कुछ दिनों की तुलना में काफी अच्छा हो गया था, उमस ख़त्म हो गयी. उसके इलाके में पानी भरने लगा था और आज वह काम पर भी नहीं जा पाया. दुकान में उसका एक दोस्त भी काम करता था, जिसने उसकी नौकरी लगवाई थी, ने मालिक को उसके न आ पाने का बता दिया था.
कल रात की उमस में जब वह खाना खाकर पड़ोस के रहमान भाई के यहाँ टी वी देखने गया तो उसके जिले से आने वाली खबरों ने उसे दहला दिया था. रात में ही उसने फोन किया, उसका गाँव अभी तक तो बाढ़ के प्रकोप से बचा था. लेकिन बाढ़ का पानी कभी भी उसके गाँव में घुस सकता था. बाबूजी ने उसे आस्वस्त कर दिया कि पूरा गाँव तैयार है और जैसे ही पानी नजदीक पंहुचेगा, वह लोग निकल जाएंगे.
वह भीगता हुआ फिर से रहमान भाई के घर पंहुचा, उसकी थोड़ी देर पहले ही गाँव पर बात हुई थी, लोग गाँव छोड़कर जा रहे थे. पानी अब धीरे धीरे रहमान भाई के घर के पास बहने लगा था और उनके बच्चे उस पानी में उछल कूद मचा रहे थे. उसको देखते ही वह चिल्लाये "अंकल, देखिये बाढ़ का पानी इधर भी आ गया. खूब मजा आ रहा है".
उसके अंदर एक झुरझुरी सी उठी, उसे तीन साल पहले का मंजर याद आ गया. बाढ़ ने उसका घर तो ढहा ही दिया था, घर की इकलौती गाय भी बाढ़ की भेंट चढ़ गयी थी. और फिर उसे अपना गाँव और परिवार छोड़कर महानगर के इस बजबजाते जगह पर रहना पड़ रहा था. पिछले दो साल की कमाई से उसका गाँव का घर किसी तरह बस रहने लायक ही बन पाया था. दरवाजे के सामने ही खड़ा वह बच्चों को खेलते देख रहा था, तभी उसके मुंह से अस्फुट स्वर में आवाज आयी "बाढ़ के पानी में मजा नहीं आता, बिलकुल नहीं आता".

Monday, July 1, 2019

एक पत्र परमात्मा के नाम

डिअर भगवान, अल्लाह या जीसस
आज बहुत सोचने विचारने के बाद मैं यह पत्र आप सब को लिख रहा हूँ. दरअसल मैं बहुत उलझन में पड़ गया हूँ कि आखिरकार आप सब एक हैं या अलग अलग हैं. क्यूंकि एक धर्म का कोई भी इंसान दूसरे धर्म के परमात्मा को मानने को तैयार ही नहीं होता, सब यही कहते हैं कि उनका वाला ही सही है. अब ऐसे में मेरा बचपन में पढ़ा हुआ वह पाठ कि ऊपर वाला सिर्फ एक ही है, गड़बड़ा जाता है. खैर इसके बावजूद मैं फिलहाल अपने धर्म के परमपिता को ही मान कर आगे बढ़ता हूँ.
अब आप सोच रहे होंगे कि मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ और एक चिट्ठी में भला क्यूँ लिख रहा हूँ. दरअसल मैंने जब भी इस सन्दर्भ में किसी से बात करने की कोशिश की तो उसने इसका संतोषजनक जवाब नहीं दिया. सब लोग बस एक ही बात कहकर निकल जाते हैं कि उनका वाला परमपिता ही इस दुनिया का भला करता है और बाकी सब धर्मों में बस यूँ ही लिखा गया है. खैर मुझे इससे भी बहुत दिक्कत नहीं होती लेकिन जब दुनिया में चारो तरफ तकलीफ और परेशानियों में जूझते लोगों को देखता हूँ तो मेरा मन होता है कि मैं आपसे मिलकर पूछूं कि आखिरकार ऐसा क्यूँ है.
इस पत्र लिखने के पीछे एक और वजह है, और वह है मेरा एक दोस्त जो इन सब चीजों, मतलब भगवान, अल्लाह या जीसस की उपस्थिति को ही बेबुनियाद मानता है. वह इन सब चीजों को पाखंड मानता है और कहता है अगर तुम्हारे भगवान या अल्लाह या जीसस हैं और यह सब घटित होते हुए देख रहे हैं तो फिर उनके रहने या न रहने से क्या फ़र्क़ पड़ता है. अब कुछ दिन ही पहले मुजफ्फरपुर में घटित हुए घटना, जिसमें २०० से ज्यादा बच्चे कालकलवित हो गए, के बारे में उसने मुझसे पूछा कि क्या यह तुम्हारे परमात्मा के रहते उचित था. साथ ही साथ जब उसने मुझसे पूछा कि क्या इसमें से एक भी बच्चा किसी धनी, समर्थ या ताक़तवर परिवार का था तो मुझे कुछ जवाब देते नहीं सूझा. उसने कहा कि अगर कोई तुम्हारा परमपिता है तो वह सिर्फ समर्थ या ताक़तवर (जिन्हें मैं चोर, भ्रष्ट या लुटेरा कहता हूँ), के लिए ही है.
उसने मुझसे पूछा कि बचपन से हम तुम पढ़ते आये हैं कि बुरे काम का अंजाम बुरा होता है, गलत तरीके से कमाया गया धन काम नहीं आता या हमेशा सच्चाई की राह पर चलना चाहिए. लेकिन आज तुम यह बताओ कि क्या वास्तव में बुरे काम का अंजाम बुरा होता है. देश के जितने भी नेता या ब्यूरोक्रेट हैं, उनमें से लगभग ९५ प्रतिशत चोर, भ्रष्ट और पैसे के लिए किसी की जान भी ले लेने वाले हैं. लेकिन तकलीफ में कौन है, कौन दवा की कमी से मरता है, कौन इनका विरोध करके बच पाता है, कौन है जो सही तरीके से पैसे कमाकर इतना बड़ा इंसान बनता है कि वह अपनी आने वाली कई पुश्तों के लिए भी धन संपत्ति बना जाए. वह मुझसे पूछता है कि किन्हीं दस नेताओं के नाम गिना दो जो सत्ता सुख लिए हुए हैं और कम उम्र में मौत के मुंह में चले जाते हैं. देश का शायद ही कोई नेता या अफसर ८० साल की उम्र जीने से पहले मरता है. और इसी देश में मजदूर और गरीब हैं जो अपनी युवावस्था में ही बुजुर्ग दिखते हैं और रिटायरमेंट की उम्र के बहुत पहले ही किसी न किसी रोग या महामारी के चपेट में आकर गुजर जाते हैं. किसी भी सरकारी या अर्धसरकारी विभाग में बड़े अफसरों की माली हालत देख लो, उनके बच्चों को देख लो, सब एकदम व्यवस्थित जिंदगी जी रहे हैं. अगर बुरे तरीके से कमाए हुए पैसों से बरक्कत नहीं होती या इनके बच्चे खराब निकलते तो शायद उन कहावतों में कोई अर्थ होता. अक्सर आई ए एस अफसर का लड़का आई ए एस ही बनता है और पिता ने जो लूट की होती हैं उससे वह कई गुना लूट मचाता है. कहीं कोई दिक्कत नहीं, सब मजे में जीवन गुजारते हैं और एक दिन बेहद धूम धड़ाके के साथ दुनिया को अलविदा कह जाते हैं. इक्का दुक्का लोग भ्रष्टाचार में पकडे जाते हैं और उनमें से भी अधिकांश बरी हो जाते हैं. एकाधा नेता या अफसर जेल की सलाखों के पीछे जाता है लेकिन एकाधा तो अपवाद होते हैं, नियम तो अधिकांश लोगों से होता है.
वह फिर कहता है कि अब मुझे तो इस जन्म में किसी बुरे को उसके कर्म का फल खाते नहीं देखा. जो जितना बुरा होता है वह उतनी ही बढ़िया जिंदगी बसर करता है. इनके गलत काम का विरोध करने वाले अलबत्ता बेमौत मारे जाते हैं. हाँ यह जरूर है कि जो व्यक्ति ईमानदारी की राह पर चलता है उसे वह सारी तकलीफें झेलनी पड़ती हैं, जो शायद बुरे या भ्रष्ट इंसान को झेलने चाहिए (यही तो हमने पढ़ा है और कितना गलत पढ़ा है). परमपिता को गरीबों, असहायों की रक्षा करनी चाहिए लेकिन वह इसके उलट ही कर रहा है और कमोबेश सारे पापी, भ्रष्ट और कुकर्मी सुरक्षित रहते हैं (कुछेक अपवाद हैं लेकिन वह अपवाद ही हैं).
खैर मेरे दोस्त की कुछ बातों को मैं आप तक पहुँचाने का प्रयत्न कर रहा हूँ, सवाल तो उसके बहुत सारे हैं लेकिन न तो इतना समय है कि पूछ सकूँ और न इसका कोई मतलब है. अगर संभव हो तो इन्हीं बातों का जवाब एक खत द्वारा भिजवा देना, शायद उसके साथ साथ मैं भी कुछ समझ सकूँ.
इसी धरती का एक इंसान