बादल तो कई घंटों से छाये हुए थे लेकिन बूंदें बरसने का नाम ही नहीं ले रही थीं. पूरा महीना बीतने को आया, इस बार धान का बेहन तक नहीं पड़ पाया है, राजन खेत के मेड़ पर बैठा यही सब सोच रहा था. घर में जाने पर घरवाली का चिंतित चेहरा देखकर उसको सहन नहीं होता था. दरअसल वह कुछ कहती नहीं थी, बस ख़ामोशी से उसका मुंह देखती. और उसका कुछ नहीं बोलना ही उसे अंदर तक सालता था. पिछले साल तो फिर भी जुलाई के आखिर में बारिश हो गयी थी और उसने धान का बेहन डाल दिया था.
"तुम भी आ जाओ शहर, गांव में कुछ नहीं रक्खा है. कम से कम यहाँ दिन भर की मेहनत के बाद रोटी तो नसीब हो जाती है, रहने के लिए भले नर्क जैसी जगह है", पिछले हफ्ते भी उसके दोस्त हरी ने फोन पर कहा था. उसने मना कर दिया था, यहाँ उसकी पहचान तो है, वहां कौन पहचानेगा. घरवाली से भी जब उसने बात की तो उसने भी हामी नहीं भरी. वह भी एक किसान की बेटी थी और अब तक के जीवन में उसने खेती बाड़ी के अलावा कुछ नहीं देखा था.
"थोड़ी दिक्कत तो है लेकिन चला लेंगे गृहस्ती किसी तरह. मेरे मामा भी शहर रहते हैं, मैं एक बार कुछ दिनों के लिए वहां गयी थी लेकिन उस बदबू और घुटन में मैं जी नहीं पाउंगी", घरवाली ने धीरे से कहा था.
एक ही तो गाय है घर में और दो लोग, चला लेंगे किसी तरह से, सोचते हुए वह उठा. कुछ कदम ही चला होगा कि बरसात शुरू हो गयी और घर तक पहुँचते पहुँचते जम के बारिश हो रही थी. दरवाजे पर एक तरह उसकी गाय तो दूसरी तरफ घरवाली बरसात में भींग रहे थे, मानो पिछले कई महीने के सूखे को शरीर से निकाल फेंकना चाहते हों. उसने धीरे से घरवाली का हाथ पकड़ा और दोनों देर तक उस बरसात में भीगते रहे.
"तुम भी आ जाओ शहर, गांव में कुछ नहीं रक्खा है. कम से कम यहाँ दिन भर की मेहनत के बाद रोटी तो नसीब हो जाती है, रहने के लिए भले नर्क जैसी जगह है", पिछले हफ्ते भी उसके दोस्त हरी ने फोन पर कहा था. उसने मना कर दिया था, यहाँ उसकी पहचान तो है, वहां कौन पहचानेगा. घरवाली से भी जब उसने बात की तो उसने भी हामी नहीं भरी. वह भी एक किसान की बेटी थी और अब तक के जीवन में उसने खेती बाड़ी के अलावा कुछ नहीं देखा था.
"थोड़ी दिक्कत तो है लेकिन चला लेंगे गृहस्ती किसी तरह. मेरे मामा भी शहर रहते हैं, मैं एक बार कुछ दिनों के लिए वहां गयी थी लेकिन उस बदबू और घुटन में मैं जी नहीं पाउंगी", घरवाली ने धीरे से कहा था.
एक ही तो गाय है घर में और दो लोग, चला लेंगे किसी तरह से, सोचते हुए वह उठा. कुछ कदम ही चला होगा कि बरसात शुरू हो गयी और घर तक पहुँचते पहुँचते जम के बारिश हो रही थी. दरवाजे पर एक तरह उसकी गाय तो दूसरी तरफ घरवाली बरसात में भींग रहे थे, मानो पिछले कई महीने के सूखे को शरीर से निकाल फेंकना चाहते हों. उसने धीरे से घरवाली का हाथ पकड़ा और दोनों देर तक उस बरसात में भीगते रहे.
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