थोड़ी उत्सुकता तो उसको भी थी क्योंकि वहां का लगभग हर कर्मचारी उसके बारे में बता चुका था, सिर्फ वही नहीं आ रहा था. दो दिन पहले ही उसका तबादला यहाँ हुआ था, नया शहर और एकदम नए लोग. अब कोई भी नयी जगह हो तो शुरुआत में मुश्किल तो होती ही है, अपनी पुरानी जगह भी बहुत शिद्दत से याद आती है. अच्छे लोग, साथी कर्मचारी और पुराना वातावरण तो याद आता ही है, कुछ ऐसे लोग भी, जिन्हें आप सख्त नापसंद करते हों, वह भी ऐसे में यादों के कोने में अपनी उपस्थिति दर्ज करा देते हैं.
लेकिन उसे, मतलब मनोहर लाल वर्मा को नयी जगहों पर जाना और नए लोगों से मिलना बहुत पसंद है. उसकी पत्नी तो कहती भी है "तुम्हें तो टूरिज्म डिपार्टमेंट में होना चाहिए था, कहाँ से इस गलत डिपार्टमेंट में आ गए. जब भी मौका मिले, फटाक से तबादला करा लेना उस विभाग में". अलबत्ता ये बात दोनों ही जानते थे कि उसे इसी विभाग से सेवानिवृत्त होना है. खैर पत्नी की तो अब आदत पड़ गयी है लेकिन उसके तबादले से बच्चे अभी भी चिढ़ जाते हैं. अब ये भी बात नहीं है कि वह तबादला जानबूझ कर करवाता है, लेकिन उसकी कार्यप्रणाली ही ऐसी है कि लोग उसे ज्यादा दिन झेल नहीं पाते. वैसे भी आजकल ईमानदार अधिकारी कौन बर्दास्त कर पाता है, सबको तो ऐसा अधिकारी चाहिए जो खुद भी प्रसन्न रहे और अपने मातहतों को भी प्रसन्न रखे.
इस कार्यालय का पहला दिन तो बस लोगों से मिलते जुलते ही बीत गया. वैसे भी व्यक्ति के ख्याति की गति किसी भी वाहन से तेज होती है, क्योंकि उसकी ख्याति उसके पहुँचने से पहले ही पहुँच जाती है. उसके पोस्टिंग के चलते वहां के कर्मचारियों ने तो अपना सर पीट ही लिया था, लेकिन सबको यह सुकून भी था कि वह किसी भी जगह ज्यादा दिन नहीं टिकता है. मतलब बला चाहे जैसी भी हो, जल्द ही कट जायेगी. वैसे भी दुःख चाहे जितना भी बड़ा हो, अगर यह पता चल जाए कि वह कुछ दिन का ही मेहमान है, तो उसे बर्दास्त करना बहुत आसान हो जाता है. मानव स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि उसे दुःख तो ऐसा चाहिए जिसकी मियाद कम हो और सुख के मामले में वह मियाद को बीच में लाना ही नहीं चाहता, मतलब बेमियादी सुख.
रात में पत्नी ने फोन किया "कैसा लग रहा है, ऑफिस तो ठीक ही होगा, बस लोग दुखी होंगे, है ना?
उसकी हंसी फूट गयी, उसको तो उसकी पत्नी उससे ज्यादा समझती है. उसने इकरार में सर हिलाया तो अगला सवाल आया "हम लोगों को कब तक निकलना है, बच्चों के स्कूल में टी सी के लिए अप्लाई कर दिया है. सामान समेटने तो आओगे या पिछली बार की तरह मुझे ही सब करना पड़ेगा".
कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनके जवाब वक़्त ही देता है. अब पिछली बार उसे कहाँ पता था कि वह सामान बंधवाने भी नहीं जा पायेगा, बमुश्किल दो दिन कि छुट्टी मिली थी और जाकर सामान सहित वापस आ गया था. खैर उसने दिलासा दिया "तुम तैयारी रखो, मैंने पैकर वाले को बोल दिया है. जैसे ही छुट्टी मिलती है, आ जाऊँगा. वैसे यह जगह बहुत दिलचस्प है, इसे आगरा के समकक्ष रख सकती हो".
आखिरी वाक्य पर पत्नी चौंकी "आगरा के समकक्ष, अरे वह तो औरंगाबाद है जहाँ बीबी का मकबरा है, बिलकुल ताजमहल की रेप्लिका. बुरहानपुर में ऐसा क्या है?
"तुम आना तो खुद ही देख लेना, वैसे जानकारी के लिए बता दूँ कि मुमताज बेगम की मौत यहीं पर हुई थी और उनको यहाँ पर लगभग छह माह तक दफनाया भी गया था. खैर जैसे ही छुट्टी मिलती है, बताता हूँ", और उसने फोन काट दिया.
परसों रविवार है और उस दिन मुमताज बेगम की पुरानी कब्र को देखने वह जरूर जाएगा. भोपाल से बुरहानपुर की दूरी तो बहुत ज्यादा नहीं थी लेकिन सड़क मार्ग थोड़ा गड़बड़ था. वैसे ट्रेनों की संख्या ठीकठाक थी और उससे पहुँचने में समय भी काफी कम लगता था. इसलिए उसने भोपाल से जाते समय ट्रेन ही पसंद किया था. बस एक फ़र्क़ था भोपाल और बुरहानपुर में, जहाँ भोपाल में पेड़ पौधे, हरियाली और अच्छी सड़कें थीं, वहीँ बुरहानपुर में काफी गर्मी थी और इसकी एक वजह जो उसे महसूस हो रही थी, वह थी पेड़ों की कमी. कसबे की सड़कें शाम होते होते पिघल सी जाती थीं और कई बार उसे लगा जैसे उसके जूते सड़क से चिपक कर रह जाएंगे। कूलर की हवा दिन में ऑफिस में तो राहत देती लेकिन शाम को ऑफिस से निकलते ही लू के थपेड़े हालत खराब कर देते थे.
अगले दिन सुबह रोज से कुछ मिनट पहले ही मनोहर अपने कार्यालय में था. कुछ ही देर में लोगों का आना प्रारम्भ हो गया और एक नया चेहरा उसकी नजर में आया. यक़ीनन यह वही होगा, उसने सोचा और अपनी कुर्सी पर बैठे बैठे उसका इंतजार करने लगा.
"मैं अंदर आ जाऊँ सर", उसकी आवाज ने उसे सोच की दुनिया से बाहर निकाल लिया।
"आईये, कैसे हैं आप? उसने मुस्कुराते हुए कहा तो वह भी मुस्कुरा पड़ा.
"मैं शिवचरन, यहाँ पर अकाउंटेंट हूँ. आपके बारे में बहुत सुना है सर", गंभीर आवाज में शिवचरन ने कहा.
"अरे बैठिये शिवचरन जी, मैंने भी आपके बारे में बहुत सुना है. उम्मीद है कि हम दोनों की अच्छी निभेगी, आपके और मेरे विचारों में बहुत साम्य है".
शिवचरन मुस्कुरा दिए, बहुत कम अफसर ऐसे मिले थे जिन्होंने उसे पसंद किया था. दरअसल गलत कार्यों से दूर रहने की प्रवृत्ति के चलते उनको विभाग में अक्सर किनारे कर दिया जाता था. और उनको कुछ लोग तो दबी जबान में बेवकूफ भी कहते थे जो बहती गंगा में हाथ नहीं धोता है. अब ऐसे में अगर अफसर बोले कि हमारी अच्छी निभेगी तो शिवचरण का खुश होना स्वाभाविक था.
लेकिन उसे, मतलब मनोहर लाल वर्मा को नयी जगहों पर जाना और नए लोगों से मिलना बहुत पसंद है. उसकी पत्नी तो कहती भी है "तुम्हें तो टूरिज्म डिपार्टमेंट में होना चाहिए था, कहाँ से इस गलत डिपार्टमेंट में आ गए. जब भी मौका मिले, फटाक से तबादला करा लेना उस विभाग में". अलबत्ता ये बात दोनों ही जानते थे कि उसे इसी विभाग से सेवानिवृत्त होना है. खैर पत्नी की तो अब आदत पड़ गयी है लेकिन उसके तबादले से बच्चे अभी भी चिढ़ जाते हैं. अब ये भी बात नहीं है कि वह तबादला जानबूझ कर करवाता है, लेकिन उसकी कार्यप्रणाली ही ऐसी है कि लोग उसे ज्यादा दिन झेल नहीं पाते. वैसे भी आजकल ईमानदार अधिकारी कौन बर्दास्त कर पाता है, सबको तो ऐसा अधिकारी चाहिए जो खुद भी प्रसन्न रहे और अपने मातहतों को भी प्रसन्न रखे.
इस कार्यालय का पहला दिन तो बस लोगों से मिलते जुलते ही बीत गया. वैसे भी व्यक्ति के ख्याति की गति किसी भी वाहन से तेज होती है, क्योंकि उसकी ख्याति उसके पहुँचने से पहले ही पहुँच जाती है. उसके पोस्टिंग के चलते वहां के कर्मचारियों ने तो अपना सर पीट ही लिया था, लेकिन सबको यह सुकून भी था कि वह किसी भी जगह ज्यादा दिन नहीं टिकता है. मतलब बला चाहे जैसी भी हो, जल्द ही कट जायेगी. वैसे भी दुःख चाहे जितना भी बड़ा हो, अगर यह पता चल जाए कि वह कुछ दिन का ही मेहमान है, तो उसे बर्दास्त करना बहुत आसान हो जाता है. मानव स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि उसे दुःख तो ऐसा चाहिए जिसकी मियाद कम हो और सुख के मामले में वह मियाद को बीच में लाना ही नहीं चाहता, मतलब बेमियादी सुख.
रात में पत्नी ने फोन किया "कैसा लग रहा है, ऑफिस तो ठीक ही होगा, बस लोग दुखी होंगे, है ना?
उसकी हंसी फूट गयी, उसको तो उसकी पत्नी उससे ज्यादा समझती है. उसने इकरार में सर हिलाया तो अगला सवाल आया "हम लोगों को कब तक निकलना है, बच्चों के स्कूल में टी सी के लिए अप्लाई कर दिया है. सामान समेटने तो आओगे या पिछली बार की तरह मुझे ही सब करना पड़ेगा".
कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनके जवाब वक़्त ही देता है. अब पिछली बार उसे कहाँ पता था कि वह सामान बंधवाने भी नहीं जा पायेगा, बमुश्किल दो दिन कि छुट्टी मिली थी और जाकर सामान सहित वापस आ गया था. खैर उसने दिलासा दिया "तुम तैयारी रखो, मैंने पैकर वाले को बोल दिया है. जैसे ही छुट्टी मिलती है, आ जाऊँगा. वैसे यह जगह बहुत दिलचस्प है, इसे आगरा के समकक्ष रख सकती हो".
आखिरी वाक्य पर पत्नी चौंकी "आगरा के समकक्ष, अरे वह तो औरंगाबाद है जहाँ बीबी का मकबरा है, बिलकुल ताजमहल की रेप्लिका. बुरहानपुर में ऐसा क्या है?
"तुम आना तो खुद ही देख लेना, वैसे जानकारी के लिए बता दूँ कि मुमताज बेगम की मौत यहीं पर हुई थी और उनको यहाँ पर लगभग छह माह तक दफनाया भी गया था. खैर जैसे ही छुट्टी मिलती है, बताता हूँ", और उसने फोन काट दिया.
परसों रविवार है और उस दिन मुमताज बेगम की पुरानी कब्र को देखने वह जरूर जाएगा. भोपाल से बुरहानपुर की दूरी तो बहुत ज्यादा नहीं थी लेकिन सड़क मार्ग थोड़ा गड़बड़ था. वैसे ट्रेनों की संख्या ठीकठाक थी और उससे पहुँचने में समय भी काफी कम लगता था. इसलिए उसने भोपाल से जाते समय ट्रेन ही पसंद किया था. बस एक फ़र्क़ था भोपाल और बुरहानपुर में, जहाँ भोपाल में पेड़ पौधे, हरियाली और अच्छी सड़कें थीं, वहीँ बुरहानपुर में काफी गर्मी थी और इसकी एक वजह जो उसे महसूस हो रही थी, वह थी पेड़ों की कमी. कसबे की सड़कें शाम होते होते पिघल सी जाती थीं और कई बार उसे लगा जैसे उसके जूते सड़क से चिपक कर रह जाएंगे। कूलर की हवा दिन में ऑफिस में तो राहत देती लेकिन शाम को ऑफिस से निकलते ही लू के थपेड़े हालत खराब कर देते थे.
अगले दिन सुबह रोज से कुछ मिनट पहले ही मनोहर अपने कार्यालय में था. कुछ ही देर में लोगों का आना प्रारम्भ हो गया और एक नया चेहरा उसकी नजर में आया. यक़ीनन यह वही होगा, उसने सोचा और अपनी कुर्सी पर बैठे बैठे उसका इंतजार करने लगा.
"मैं अंदर आ जाऊँ सर", उसकी आवाज ने उसे सोच की दुनिया से बाहर निकाल लिया।
"आईये, कैसे हैं आप? उसने मुस्कुराते हुए कहा तो वह भी मुस्कुरा पड़ा.
"मैं शिवचरन, यहाँ पर अकाउंटेंट हूँ. आपके बारे में बहुत सुना है सर", गंभीर आवाज में शिवचरन ने कहा.
"अरे बैठिये शिवचरन जी, मैंने भी आपके बारे में बहुत सुना है. उम्मीद है कि हम दोनों की अच्छी निभेगी, आपके और मेरे विचारों में बहुत साम्य है".
शिवचरन मुस्कुरा दिए, बहुत कम अफसर ऐसे मिले थे जिन्होंने उसे पसंद किया था. दरअसल गलत कार्यों से दूर रहने की प्रवृत्ति के चलते उनको विभाग में अक्सर किनारे कर दिया जाता था. और उनको कुछ लोग तो दबी जबान में बेवकूफ भी कहते थे जो बहती गंगा में हाथ नहीं धोता है. अब ऐसे में अगर अफसर बोले कि हमारी अच्छी निभेगी तो शिवचरण का खुश होना स्वाभाविक था.
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