Translate

Friday, September 20, 2019

व्यस्तता- लघुकथा

"अब गांव चलें बहुत दिन बिता लिए यहाँ", शोभाराम ने जब पत्नी ललिता से कहा तो जैसे उनके मुंह की बात ही छीन ली.
लेकिन बेटे और बहू से क्या कहेंगे, गांव पर तो कोई रहता नहीं था,पट्टीदारों के अलावा. वैसे वहां पर अपने हिसाब से जीने की आज़ादी थी लेकिन यहाँ भी तो है ही, कोई बंधन नहीं है. उनके दिमाग में कई दिनों से यह सब घूम रहा था.
"अच्छा यह बताओ, आखिर क्या कह कर गांव जाओगे. बेटा तो यही कहकर शहर लाया था कि गांव में अकेले रहते हैं, कौन है जो आपका अकेलापन बाँटने के लिए", ललिता के सवाल पर लाजवाब हो गए शोभाराम.
बात भी सही थी, न तो बहू का वर्ताव ऐसा था जिससे कोई शिकायत की जा सके और न बेटे का. बच्चे भी रोज एकाध बार उनके पास आ ही जाते थे, ये अलग बात थी कि वे अपने फोन में ही कुछ दिखाने आते थे. 
आखिर ललिता ने चुप्पी तोड़ी "लेकिन यह कौन सी बात है कि सब अपने फोन में ही लगे रहते हैं, न तो आपस में बात करते हैं और न हमसे. इससे तो अच्छे गांव में ही थे जहाँ पड़ोसी बातचीत तो करते थे".
शोभाराम ने सहमति में गर्दन हिलायी और कुछ बोलते उसके पहले ही बहू आयी "आपकी चाय ठंडी हो रही है पिताजी", और फोन को देखते हुए बाहर निकल गयी.
शोभाराम ने ललिता को देखा और दोनों धीरे धीरे अपने कमरे से बाहर आ गए. सोफे पर बैठे हुए बेटे के हंसने की आवाज आ रही थी, कोई चुटकुला पढ़ लिया था उसने अपने फोन में.  

No comments:

Post a Comment