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Monday, June 22, 2020

दर्द का रिश्ता- लघुकथा

बहुत चहल पहल थी आज, अमूमन सप्ताहांत में थोड़ी भीड़ होती है लेकिन ऐसी भीड़ साल में दो ही दिन देखने को मिलती है, एक आज के दिन और एक मदर्स डे पर. शर्माजी एक कुर्सी पर बैठे हुए कुछ हमउम्र बुजुर्गों को देखते हुए सोच रहे थे, कुछ के चेहरे पर ख़ुशी, कुछ पर उम्मीद तो कुछ चेहरे निराश भी थे. कुछ लोग बाहर भी गए थे, उनके बच्चे ले गए थे आज के दिन को यादगार बनाने के लिए. अब बिना सेल्फी या साथ फोटो लिए भला कैसे सोशल मीडिया पर फादर्स डे मनता।
एक कार बाहर रुकी, मल्होत्रा जी उससे बाहर निकले और खड़े हो गए. उन्हें उम्मीद थी कि बच्चे उनको अंदर तक छोड़ने आएंगे लेकिन कार के अंदर से ही बाय करते बच्चे निकल गए. उनके चेहरे पर आयी कुछ सेकेंड पहले की मुस्कान अब उदासी में बदलने लगी.
"आईये मल्होत्रा जी, आज तो खूब मजा आया होगा बच्चों के साथ. ऐसे में यह उदासी अच्छी नहीं लगती", शर्माजी ने आवाज लगायी तो मल्होत्राजी उनकी तरफ आ गए.
"अरे कहाँ उदास हूँ, इतने दिन बाद बच्चों से मिला था तो जाते समय थोड़ा मन खराब हो गया. और आपके बच्चे नहीं आये अभी तक?, मल्होत्राजी ने जबरन मुस्कुराते हुए पूछा।
शर्माजी ने गहरी सांस ली और ऊपर देखने लगे, उनको तो आदत पड़ गयी है बिना बच्चों के इस दिन को बिताने की.
"आप नहीं जानते हैं मल्होत्राजी, हमारे बच्चे तो इस प्रदेश में ही नहीं रहते, कहाँ आएंगे आज के दिन. खैर मैं कुछ सोच रहा था, बताऊँ आपको?
मल्होत्राजी ने शर्माजी को देखा, चेहरे पर सवाल पूछने वाला भाव था.
"मैं सोच रहा था कि मैं भी आज फादर्स डे मनाऊँ, आप मेरे पिता की भूमिका निभाएंगे?, शर्माजी ने पूछा।
मल्होत्राजी एक बार तो चौंके, उसके बाद उठकर शर्माजी की तरफ बढ़े. कुछ देर तक दोनों एक दूसरे से लिपटकर खड़े रहे, दोनों के कंधे आंसुओं से भीग गए थे. बाहर गेट पर एक कार से किसी बुजुर्ग के लिए "हैप्पी फादर्स डे" की आवाज आ रही थी.    

Friday, June 19, 2020

जुनैद—कहानी


पिछले घंटे में तीन मिस्सड काल थीं, उसने एक बार तो फोन बजते देखा भी था लेकिन जानबूझकर उठाया नहीं। लगातार एक हफ़्ते से जुनैद उसे फोन कर रहा था लेकिन उसने एकाध बार यह कहकर कि अभी व्यस्त हूँ, बाद में फोन करता हूँ, टाल दिया। इस नंबर से उसे अब चिढ़ सी हो रही थी लेकिन चाहकर भी वह इसे डिलीट नहीं कर पाया। तभी उसके फोन में मैसेज आने की टोन सुनाई दी और उसने देखा, जुनैद का ही मेसेज था “सर प्लीज़ फोन उठाईए, आपसे बात करना है।”
भोपाल शहर आने पर उसे बहुत रोमांच हो रहा था, एक तो बहुत से परिचित और रिश्तेदार थे और यहाँ के माहौल, जिसमें साहित्य और कल्चर का अद्भुत संगम था, उसे बहुत अपील करता था। झीलों के शहर में वह हर बात थी जो उसके मिज़ाज के अनुरूप थी। एक तरफ़ विश्व प्रसिद्ध भारत भवन तो दूसरी तरफ़ मानव संग्रहालय, रवींद्र भवन और शहीद भवन। उसके मानसिक ख़ुराक के लिए हर वह चीज़ प्रचुरता से मौजूद थी, जिसकी वह कल्पना कर सकता था। नाटक देखने का उसका अपना दबा हुआ शौक़ यहाँ भरपूर पूरा हो रहा था और बीच-बीच में संगीत और नृत्य की हो रही प्रस्तुतियाँ तो जैसे सोने पर सुहागा थीं।
भोपाल आने के शुरुआती हफ़्ते में ही जब वह भारत भवन जा रहा था तब टैक्सी ड्राइवर से बात-बात में उसने पूछा था कि यहाँ और क्या-क्या देखने लायक़ है। ऐसा नहीं था कि उसे इस शहर के बारे में पता नहीं था लेकिन फिर भी लोगों से बात करने में उसे अच्छा लगता था और इस तरह कुछ नई कम मशहूर जगहों के बारे में भी पता चल जाता था। टैक्सी ड्राइवर ने, जो कि दरम्याने क़द का अधेढ़ मुस्लिम युवक था, उसे आसपास के तमाम जगहों के बारे में बताया और जब उसने ज़ोर देकर कहा कि यहाँ का भोज मंदिर ज़रूर देखिएगा सर, आज भी अधूरा है लेकिन बहुत मान्यता है उसकी, तो उसे थोड़ा आश्चर्य हुआ। यह वही भोपाल है जो सन् 1992 में दंगों में कई दिन तक जलता रहा था और जहाँ कर्फ़्यू माता मंदिर जैसा मंदिर भी है जो कर्फ़्यू में ही बना था। उस समय उसे अपनी गंगा-जमुनी तहज़ीब पर यकबयक गर्व हो आया। आज भी आम हिंदुस्तानी दो रोटी को कमाने के चक्कर में इन चीज़ों से दूर ही रहता है, बशर्ते ये धर्म और लाश के ऊपर अपनी रोटियाँ सेकने वाले उनको इसमें लपेट न लें।
रोज़ सुबह अख़बार पढ़ते समय उसका ध्यान ख़बरों से ज़्यादा इस तरफ़ रहता कि आज कहाँ-कहाँ पर कौन-कौन से आयोजन होने वाले हैं। शाम को ऑफ़िस से फ़्री होने के बाद किसी अच्छे कार्यक्रम को देखने का मौक़ा मिल जाए तो लगता था कि दिन बन गया। उस दिन उसकी नज़र पड़ी शनिवार और रविवार को होने वाले “जश्न ए उर्दू” कार्यक्रम पर। रवींद्र भवन अभी तक जाने का मौक़ा नहीं मिला था तो उसे लगा कि अब इससे बेहतर मौक़ा और क्या होगा। आने वाले कलाकारों और फ़नकारों के नाम पढ़कर उसे और रोमांच हो आया, जनाब वसीम बरेलवी साहब, मुजफ्फर अली साहब और उनके साहिबज़ादे जो थियेटर के साथ-साथ फ़िल्में भी करते हैं,जैसे लोगों को देखने, सुनने और मिलने का मौक़ा कैसे छोड़ा जा सकता था। उमराव जान उसकी पसंदीदा फ़िल्मों से एक रही थी और आज उसके निर्देशक से मिलने का मौक़ा भी मिले, सोचकर उसे काफ़ी अच्छा लगा। पता नहीं कितने लोगों से कही हुई अपनी यह बात कि “ज़िंदगी में एक ही फ़िल्म ऐसी है जिसे मैंने एक ही दिन में दो बार पिक्चर हाल में देखी है और वह उमराव जान है”, आज उसी फ़िल्म के निर्देशक मुजफ्फर अली साहब से भी कहने का मौक़ा मिलने वाला था।इसके चलते भी वह आज बहुत रोमांचित महसूस कर रहा था।
उर्दू ज़बान के इश्क़ में एक बार जो गिरफ़्तार हो गया, उसके लिए फिर उससे बाहर निकालना लगभग नामुमकिन सा हो जाता है। हर पढ़ने लिखने वाले की तरह यही हाल कुछ उसका भी था, जबसे उसने गज़लों को सुनना शुरू किया था। जगजीत सिंह, ग़ुलाम अली साहब और अहमद हुसैन मोहम्मद हुसैन को तो न जाने कितनी बार सुना था और ग़ज़ल सुनना उसे दिल को राहत देने जैसा लगता था। कॉलेज के दिनों में तो अक्सर गज़लें सुनकर उसे लगता कि यह ग़ज़ल तो जैसे उसी के लिए लिखी गई थीं। फिर कुछ सालों बाद उनको पढ़ने का चस्का लगा तो एक और दुनिया से उसका परिचय हुआ। ग़ालिब साहब को पढ़ना और उनकी ग़ज़लों को सुनना उसके पसंदीदा शौक़ में शुमार हो गया। और जब ग़ज़ल लेखन की एक मशहूर हस्ती जनाब वसीम बरेलवी साहब को रू-ब-रू देखने और सुनने का मौक़ा मिल रहा हो तो उसे जाने देना एक अपराध जैसा होता।
दिन शुरू हुआ और जल्दी-जल्दी कार्यक्रम में पहुँचने की बेकरारी में उसका खाना-पीना भी जल्दबाज़ी में ही हुआ। गाड़ी पार्क करके जब उसने रवींद्र भवन के परिसर में प्रवेश किया तो वहाँ की हवा में एक अलग ही ख़ुशबू तैरती दिखाई पड़ी। पूरे मैदान में कई पंडाल बने हुए थे और किसी में गुफ़्तगू चल रही थी तो किसी में गीत और ग़ज़ल पर बातचीत। एक तरफ़ के पंडाल में जनाब वसीम साहब का कार्यक्रम शुरू होने वाला था और वह फटाफट जाकर आगे की एक कुर्सी पर बैठ गया। एक बार उसने आसपास नज़र घुमाई, अधिकतर लोग उम्र के दूसरे पायदान वाले थे। बहुसंख्य आबादी मुस्लिम बुज़ुर्गों की ही नज़र आ रही थी, हालाँकि इक्का-दुक्का नौजवान पुरुष और युवतियाँ भी अपनी नुमाइंदगी दर्शा रही थीं। जल्द ही कार्यक्रम शुरू हुआ और फिर अगले कुछ घंटे जैसे झरनों का संगीत सुनते बीत गए। उर्दू ज़बान, ग़ज़ल और हिंदुस्तानी परिवेश में उसके इस्तेमाल के बारे में सुनते हुए उसे लगा जैसे बस सुनते ही रहा जाए।
कार्यक्रम की समाप्ति पर जब वसीम साहब का यह कहमा कि सिर्फ़ उम्रदराज़ लोगों को ही नहीं बल्कि आज की युवा पीढ़ी को भी उर्दू के लिए आगे आना होगा सुनकर उसे लगा जैसे यह उसके लिए ही कहा जा रहा है। इसी सोच में मुसकुराते हुए उसने दूसरे पंडाल की तरफ़ रुख़ किया जहाँ गज़लगायकी हो रही रही थीं। “सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब, आहिस्ता-आहिस्ता” के असर में कुछ देर डूबे रहने के बाद उसे लगा कि अब मुज़फ्फ़र साहब का कार्यक्रम शुरू हुआ है तो वह उठकर दूसरे मंच की तरफ़ बढ़ गया। कुछ ही देर में उसके अगल-बगल की सारी कुर्सियाँ भर गई थीं और उसके बगल में एक दुबला पतला नौजवान आकर बैठ गया। उसने एक उचटती सी नज़र उस नौजवान पर डाली और कार्यक्रम में खो गया। तक़रीबन 10 मिनट बीता होगा जब उसे बगल वाले नौजवान की वाह-वाह सुनाई दी और फिर उसने उसे ग़ौर से देखा। चेहरे पर मूँछ और अलहदा किस्म की दाढ़ी उसके दूसरे मज़हब का होने का सबूत दे रही थी और चेहरा भी अपने क्षेत्र का नहीं लग रहा था। उसने ऐसे ही पूछ लिया “कहाँ से हो आप?
अब नौजवान ने भी उसको देखा और मुसकुराते हुए बोला “जी, मैं कश्मीर से हूँ।” कश्मीर का नाम सुनते ही उसने बड़े उत्साह से उस लड़के को देखा। दरअसल उसे कश्मीर जाने का कभी मौक़ा नहीं मिला था लेकिन हमेशा से उसके ज़हन में एक विशिष्ट स्थान रखता था। और ये पहला मौक़ा था जब किसी कश्मीरी लड़के को इतने क़रीब से देखने और बात करने का मौक़ा मिल रहा था। अब धीरे-धीरे बातचीत का सिलसिला चल निकला और जब भी कार्यक्रम में कुछ गैप होता, दोनों बातचीत करने लगे।
“मैं यहाँ अपनी पढ़ाई के सिलसिले में आया हूँ और रिसर्च कर रहा हूँ”,कहते हुए उसने पूछ लिया “और जनाब आप क्या करते हैं?
“मैं नौकरी कर रहा हूँ और पिछले कुछ महीनों से ही यहाँ हूँ। गज़लों में बहुत दिलचस्पी है इसलिए आज यहाँ आ गया था, शायद आप भी इसी सिलसिले में यहाँ तशरीफ़ लाए हैं”, उसने मुसकुराते हुए कहा।
“जी, गज़लों में मेरी भी बहुत दिलचस्पी है और मैं लिखता भी हूँ”, उस नौजवान ने बताया।
“मैं ऋषभ हूँ और आपका नाम जान सकता हूँ”, उसने पूछा तो नौजवान ने तुरंत अपना नाम जुनैद बताया। फिर तो अगले एक घंटे एक-दूसरे के बारे में कुछ बातचीत हुई और दोनों ने एक-दूसरे का नंबर भी ले-लिया।
“अब मुझे चलना चाहिए” कहते हुए वह उठा तो जुनैद ने बड़े अपनेपन से हाथ मिलाया और बोला “इंसा अल्लाह, जल्द ही आपसे एक बार फिर मुलाक़ात होगी।” “आमीन” बोलकर वह निकल गया। अगले दो-चार दिन काम की व्यस्तताओं में निकल गए और उसे जुनैद का ख़याल ही नहीं आया। और फिर एक शाम उसका फोन बजा तो उसने देखा जुनैद का काल था।
“कैसे हो जुनैद, सब ठीक-ठाक है!।
“जी सर, सब ख़ैरियत है, एक ग़ज़ल लिखी थी, आपको सुनाना था, कब आ जाऊँ”, एक साँस में जुनैद ने पूछ लिया।
“आज ही शाम को आ जाओ, सुनते हैं”, कहकर उसने फोन रख दिया। शाम होते होते काम की व्यस्तताओं में उलझ कर वह भूल ही गया था कि बाहर से किसी ने आवाज़ लगाई “मैं अंदर आ सकता हूँ सर।”
उसने सर उठाकर देखा और सोचने लगा कि कौन है। फिर अचानक याद आया कि यह तो जुनैद है। उस दिन अँधेरे में देखी जुनैद की उसे शक्ल धुँधली सी याद थी लेकिन उसकी मुस्कराहट से उसने एकदम से पहचान लिया।
“अंदर आ जाओ जुनैद, बैठो”, उसने कहा तो वह मुसकुराता हुआ सामने बैठ गया। आज उसने ग़ौर से देखा जुनैद की शक्ल को, दुबला पतला लेकिन शर्मीला लड़का, आँखें गहरी लेकिन धँसी हुई,चेहरे पर मूँछ और दाढ़ी,पहनावे से विपन्न और चेहरे पर मुस्कराहट।
“और सर आप कैसे हैं, काफ़ी अच्छा दफ़्तर है आपका”, उसकी सोच को जुनैदकी आवाज़ ने तोड़ा।
“सब बढ़िया है जुनैद, चाय तो पिओगे न”, और उसके जवाब का इंतज़ार किया बिना उसने चाय के लिए बोल दिया। जुनैद उसके केबिन और दफ़्तर को देख रहा था और उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि उसे यह काफ़ी भव्य लग रहा था।
“जी जनाब, चाय तो पिएँगे ही और आपको अपनी ग़ज़ल भी सुनाएँगे, कल ही लिखी है इसे”,जुनैद ने मुसकुराते हुए जवाब दिया। उसके मन में चल रहे भाव को उसने भाँप लिया था और उसको सहज करने के इरादे से उसने पूछ लिया “परिवार में कौन-कौन है तुम्हारे?
“जी पिताजी हैं, अम्मी हैं और दो बहने हैं। एक दसवीं में है और दूसरी बारहवीं में, मैं इकलौता लड़का हूँ।” परिवार के बारे में बोलते हुए जुनैद के चेहरे पर थोड़ी उदासी छा गई, शायद उनसे दूर रहने का ग़म था या उनकी याद।
“पिताजी क्या करते हैं तुम्हारे?, अब वह आप से तुम पर आ गया,संबोधन भी शायद सामने वाले की हैसियत के हिसाब से ही होता है।
“जी मेरे पिताजी मज़दूर हैं और छोटा-मोटा काम करके परिवार चलाते हैं”,जुनैद के चेहरे पर थोड़ी-सी परेशानी का भाव आया लेकिन उसने बोलना जारी रखा “मैं उन लोगों में से नहीं हूँ सर जो अपने वालिद के बारे में झूठमूठ का बड़ा बोलें। हम ग़रीब परिवार से हैं और इसे बताने में मुझे कोई शर्म नहीं है।”
“अरे अपने वालिदैन के बारे में बताने में कैसी शर्म, मैं भी एक छोटे परिवार से ही हूँ”, उसने जुनैद को दिलासा देते हुए कहा। उसे थोड़ा अफ़सोस भी हुआ कि नहीं पूछता तो बेहतर रहता, अब जुनैद शायद उससे खुल कर बात नहीं कर पाए।
“ख़ैर, बताओ कौन सी ग़ज़ल लिखी है तुमने”, उसने बात को मोड़ने की गरज से कहा। तब तक चाय भी आ गई और एक प्लेट में कुछ बिस्किट भी। उसने जुनैद को चाय पीने का इशारा किया और ख़ुद भी चाय की चुस्कियाँ लेने लगा।
चाय पीकर जुनैद ने अपनी शर्ट की जेब से एक मुड़ा तुड़ा काग़ज़ निकाला और बोला “मैंने अपनी यहाँ वाली अम्मी के लिए लिखी है यह ग़ज़ल, शायद आपको पसंद आए।” उसको अजीब लगा कि यहाँ वाली अम्मी कौन है और वह पूछता इसके पहले ही जुनैद ने उसका चेहरा भाँप लिया और बताने लगा “यहाँ हम जिस घर में रहते हैं उसकी मालकिन को अपनी अम्मी के समान ही समझते हैं। आप तो शायद जानते ही होंगे कि कश्मीरी होने के चलते बहुत से लोग अपना मकान किराए पर नहीं देते हमको, लेकिन इन्होने बिना ख़ास किसी दिक़्क़त के दे-दिया। हम चार कश्मीरी लड़के उनके मकान में रहते हैं और वह हम लोगों का बहुत ख़याल रखती हैं।”
एक बार उसके दिमाग़ में आया कि पूछे, फिर उसने टाल दिया। लेकिन जुनैद ने ख़ुद ही बता दिया “मुझे यक़ीन है कि आप इन चीज़ों के बारे में अलग सोच रखते होंगे, लेकिन आम लोग तो ऐसा ही सोचते हैं। किसी हिंदू मोहल्ले में तो हम लोग मकान मिलने का सोच भी नहीं सकते और बहुत से मुस्लिम परिवार भी हमें अपना मकान किराए से नहीं देते”, कहते हुए जुनैद के चेहरे पर दर्द उभर आया।
जैसे-जैसे समय बीत रहा था, उसे नई नई बातें पता चल रही थीं। एक आम कश्मीरी को होने वाली दिक़्क़त का अहसास तो था उसको लेकिन जुनैद की बात सुनकर उसे तकलीफ़ होने लगी। आख़िर क्यों नहीं देते लोग कश्मीरियों को किराए पर मकान, फिर ऐसे में वह अपने आपको देश के बाक़ी हिस्सों से कैसे जोड़ पाएँगे, उसके दिमाग़ में यह चीज़ें घूमने लगीं।
“सर, ग़ज़ल सुनिए और अपनी राय भी दीजिएगा”, कहते हुए जुनैद ने ग़ज़ल की पंक्तियाँ पढ़नी शुरू कीं-
“जब भी किसी परेशानी में घिर जाता हूँ
तेरा साया मैं अपने सर पे पाता हूँ
ख़यालों में गूँजती हैं सदाएं तेरी
उन्हें सोच सोचकर मुसकुराता हूँ”
जुनैद ग़ज़ल पढ़ता जा रहा था और वह उसके चेहरे पर आ जा रहे भावों को ग़ौर से देख रहा था। ग़ज़ल ख़त्म करके जुनैद ने उसकी तरफ़ देखा और जब तक कुछ कहे, उसने ग़ज़ल की तारीफ़ करनी शुरू कर दी।
“बहुत बढ़िया लिखते हो जुनैद, बहुत अच्छे भाव हैं इसके। वैसे कबसे लिखना शुरू किया था तुमने।”
“सर, सचमुच पसंद आई आपको, मैंने अम्मी को भी सुनाया था, बहुत ख़ुश हुई थीं सुनकर”,जुनैद का चेहरा खिल गया।
“सचमुच अच्छा लिखा है और सबसे बड़ी बात है कि दिल से लिखा है। इसलिए पसंद तो आनी ही थी”, उसने मुस्कुराते हुए कहा।
अब जुनैद काफ़ी इतमीनान से बैठ गया था और अपने बारे में खुल कर बात करने लगा। उसने भी अपनी जिज्ञासा व्यक्त करनी शुरू कर दी “अच्छा जुनैद, आख़िर काश्मीर में इतनी दिक़्क़त क्यों है आजकल? आख़िर वहाँ के लोग आम हिंदुस्तानी को पसंद क्यों नहीं करते हैं।”
जुनैद ने एक नज़र छत की तरफ़ डाली और फिर उसने गहरी साँस ली। “सर, मुझे ख़ुद समझ नहीं आता कि आख़िर यह मसला क्यों इतना बढ़ गया है, हम लोग तो आज भी शांति से जीना चाहते हैं, लेकिन ये राजनीति करने वाले ही सबसे बड़े दुश्मन हैं अमन चैन के।”
“अच्छा तुमको भी तो दिक़्क़त होती है यहाँ, बुरा तो तुमको भी लगता होगा कि आम कश्मीरी के बारे में ऐसा क्यों सोचते हैं लोग”, उसने जुनैद की आँखों में आँखें डालते हुए पूछा।
जुनैद थोड़ी देर सोचता रहा, फिर उसने गंभीर आवाज़ में कहा “सर बुरा तो लगता है लेकिन कहीं-न-कहीं इसके लिए परिस्थितियाँ भी उतनी ही ज़िम्मेदार हैं। सियासत ने जो नफ़रत की दीवार दोनों क़ौमों के बीच खड़ी कर दी है, उससे पार पाना आसान नहीं है। पर जब यहाँ अम्मी को देखता हूँ और उनसे बात करता हूँ तो यह सब भूल जाता हूँ, आख़िर वह भी तो यहीं की हैं।”
जुनैद की बात में दम था, आख़िर अच्छे लोग तो हर जगह ही हैं तभी तो कुछ उम्मीद आज भी बची हुई है। अभी थोड़ी फ़ुर्सत भी थी और जुनैद से काफ़ी कुछ पूछने की इच्छा हो रही थी, लेकिन उसे लगा कि कहीं जुनैद की दुखती रग पर हाथ न पड़ जाए, इसलिए उसने बात को अगली बार के लिए मुल्तवी करना उचित समझा। फिर उसने बात बदलने के गर्ज़ से अपना फोन उठाया और उसमें ख़ुद की लिखी एक ग़ज़ल जो हिंदी में थी,जुनैद को पढ़ने के लिए दिया।
“माफ़ कीजिएगा सर, हिंदी बोल तो लेता हूँ लेकिन पढ़ नहीं पाता। इसीलिए मैं ख़ुद अँग्रेज़ी में लिखता हूँ ताकि लोगों को भी पढ़ा सकूँ। अगर आप बुरा न माने तो पढ़कर सुना दीजिए।” एक नई बात लगी उसे, इसे हिंदी पढ़ने नहीं आती, ऐसा तो वह सोच भी नहीं सकता था।
उसने मुसकुराते हुए अपनी ग़ज़ल सुनाई तो जुनैद बहुत ख़ुश हुआ। “सर, माशा अल्लाह आप कमाल का लिखते हैं, लिखते रहिए। मैं आपकी मुलाक़ात यहाँ के एक बड़े शायर से करवाऊँगा जिनको मैं अपनी ग़ज़ल सुनाता रहता हूँ और उनसे सलाह मशविरा भी करता हूँ।”
उसने हामी में सर हिलाया और अपना फोन रख दिया। इस दरम्यान काफ़ी समय बीत गया था और अब ऑफ़िस से निकलने का भी समय हो रहा था। उसने उठने का उपक्रम किया तो जुनैद को समझ में आ गया।
“सर आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा, आगे भी मिलता रहूँगा आपसे। आप इतनी बड़ी पोस्ट पर होकर भी इतने सरल होंगे, मुझे उम्मीद नहीं थी”, कहकर जुनैद खड़ा हो गया।
उसने अपना बैग उठाया और बाहर निकलते हुए जुनैद से बोला “कितना दूर है तुम्हारा कमरा यहाँ से, चलो तुमको छोड़ देता हूँ।”
जुनैद को तो जैसे भरोसा ही नहीं हुआ, उसने हिचकिचाते हुए कहा “मैं चला जाऊँगा सर, कोई 5 या 6 किलोमीटर होगा मेरा कमरा, ऑटो मिल जाता है।”
“मुझे कोई परेशानी नहीं है, कहो तो छोड़ दूँ”, उसने एक बार और कहा लेकिन जुनैद ने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया। थोड़ी देर बाद वह अपने घर पर था और उसके ज़हन में जुनैद की ग़ज़ल लगातार चल रही थी। आगे भी कई दिन उसके पास जुनैद के फोन आते रहे और कभी-कभी वह भी फोन कर लेता। जुनैद ने कई बार कहा कि आपको एक बार उस शायर से मिलवाता हूँ लेकिन काम की व्यस्तताओं के चलते वह निकल नहीं पाया।
इत्तफ़ाकन एक दिन वह पुराने भोपाल की तरफ़ से गुज़र रहा था तो अचानक उसे याद आया कि जुनैद भी यहीं रहता है। थोड़ा समय भी था तो उसने फोन कर लिया “कहाँ हो जुनैद, मैं तुम्हारे तरफ़ ही आया था तो सोचा मिलते चलें?
“सर, मैं घर पर ही हूँ, आप किसके साथ हैं। अगर वह यहाँ का है तो मैं उसे पता बता देता हूँ, आपको आसानी होगी।” ड्राइवर ने उसके कमरे की लोकेशन ली और कुछ ही देर में वह उसके कमरे के पास था। जुनैद सड़क पर ही उसका इंतज़ार कर रहा था और उसको देखकर उसका चेहरा खिल गया।
“सर, मुझे बोहोत ख़ुशी मिल रही है आपको यहाँ देखकर, आप मेरे कमरे पर आएँगे, मैंने सोचा भी नहीं था। चलिए मैं आपको ले चलता हूँ।” जुनैद के पीछे-पीछे वह दूसरी मंज़िल पर उसके कमरे में गया, एक साथ तीन कमरे थे और एक कामन किचन और स्नानगृह। ज़मीन पर बिछे मटमैले से गद्दे और चद्दर कमोबेश हर कमरे में थे और किताब कापियाँ बिखरी पड़ी थीं। उसकी नज़र के पीछे-पीछे जुनैद की नज़र भी सब तरफ़ जा रही थी और उसने झेंपते हुए कहा “हम लोग ऐसे ही रहते हैं सर, परिवार तो है नहीं कि सलीक़े से रहें।”
“अरे ठीक है, हम भी जब पढ़ते थे तो ऐसे ही रहते थे। ख़ैर तुम्हारी अम्मी से नहीं मिलवाओगे”, उसने सर हिलाते हुए पूछा। अब तक जुनैद के बाक़ी कश्मीरी दोस्त भी उसके सामने आ गए थे और सबसे नाम वग़ैरा पूछकर वह वापस जुनैद की ओर मुड़ा।
“अम्मी तो आज घर पे नहीं हैं, किसी रिश्तेदार के यहाँ गई हैं। उनको भी जब पता चलेगा कि आप आए थे तो अफ़सोस होगा। अगली बार बताकर आईएगा तो उनसे ज़रूर मुलाक़ात करवाऊँगासर।”
इसी दौरान उसकी नज़र एक सिगरेट के डिब्बे पर पड़ी जो जुनैद के बिस्तर के नीचे से झाँक रहा था। उसे थोड़ा खटका, वह ख़ुद सिगरेट वग़ैरा नहीं पीता था तो ऐसे लोगों के बारे में उसकी धारणा थोड़ी अलग थी। और इतने दिनों से जुनैद को उसने जितना जाना था, उसके हिसाब से यह कुछ अजीब-सा लगा। एक बार तो उसकी इच्छा हुई कि वह पूछ ले, लेकिन फिर उसने नजरंदाज़ करना ही बेहतर समझा। कभी-कभी बातचीत से किसी के बारे में जो धारणा बन जाती है,अगर कुछ भी उसके विपरीत दिखता है तो दिल गवारा नहीं करता। जुनैद ने चाय पीकर जाने की बात कही लेकिन उसे ठीक नहीं लगी।
“अगली बार आऊँगा तो तुम्हारी अम्मी से भी मिलूँगा और चाय भी पीऊँगा, अभी चलता हूँ जुनैद”, बोलकर वह बाहर निकाल गया। जुनैद के कश्मीरी दोस्त आपस में काशुर (कश्मीरी) भाषा में बात कर रहे थे जो उसके पल्ले नहीं पड़ रही थी। उनको भी उसने बाय किया और जुनैद से हाथ मिलाकर गाड़ी में बैठ गया।
“सर, ये एक छोटा-सा तोहफ़ा हमारी तरफ़ से, वैसे तो मैं आपको कुछ देने लायक़ नहीं हूँ”, गाड़ी में बैठते समय जुनैद ने एक थैला पकड़ाया।
“इसमें क्या है जुनैद?”
“सर कुछ अखरोट हैं, लेंगें तो हमें अच्छा लगेगा”,जुनैद ने कहा।
वैसे तो उसकी कुछ लेने की इच्छा नहीं थी लेकिन जुनैद का चेहरा देखकर उसने थैले से दो अखरोट निकाले और बाक़ी उसे लौटा दिया। गाड़ी आगे बढ़ गई और उसने पलटकर देखा,जुनैद खड़ा होकर हाथ हिला रहा था। अब रास्ते में उसने फिर से जुनैद के बारे में नए सिरे से सोचना शुरू कर दिया, लड़का तो ठीक है, सिगरेट पीता है तो क्या हुआ। वैसे भी उसके हॉस्टल के अधिकांश दोस्त सिगरेट पीते ही थे और ये सब भी तो यहाँ पढ़ाई ही कर रहे हैं। इन्हीं सब को सोचते हुए उसके गाड़ी ऑफ़िस पहुँच गई और कुछ ही देर में काम ने उसके विचारों को नेपथ्य में धकेल दिया।
अगले कुछ दिन काम की व्यस्तता में बीते और जुनैद का भी एक बार फोन आया कि उसके इम्तहान हैं अगले हफ़्ते से तो वह उसके बाद मिलेगा। उसको थोड़ी राहत-सी मिली कि कुछ दिन बाद शायद जुनैद के बारे में उसका मन फिर से बेहतर स्थिति में हो। इस बीच लगातार भारत भवन और शहीद भवन में हो रहे नाटक इत्यादि में वह नियमित रूप से शिरकत करता रहा।
लगभग 15 दिन बाद एक बार फिर जुनैद का फोन आया, वह ख़ुश था कि उसके इम्तहान अच्छे से निपट गए थे और वह मिलना चाह रहा था। उसने भी अगले दिन आने को बोल दिया और फोन रख दिया। रात में क़रीब 11 बजे उसके फोन पर जुनैद का मैसेज आया “सर मैं बड़ी दिक़्क़त में हूँ, आपसे कुछ मदद चाहिए।” मैसेज पढ़कर उसे अजीब-सा लगा, दिन में तो इसने फोन किया था लेकिन कुछ कहा नहीं और रात में ऐसा मैसेज। एक बार तो उसने सोचा कि वह जुनैद को फोन करे लेकिन फिर उसने नहीं करना ही ठीक समझा।
अगले दिन जुनैद के आने पर उसे उतनी ख़ुशी नहीं हुई जैसा पहले होती थी। पता नहीं क्या माँग ले, उसकी माली हालत तो वह देख ही चुका था। एक बार तो उसको अपने ऊपर कोफ्त ही हुई, क्या ज़रूरत थी ऐसी पहचान करने की, अब मना भी कैसे करेगा। ख़ैर जुनैद आकर बैठा और चाय भी आ गई, उससे इधर-उधर की बात हो ही रही थी कि कुछ लोग किसी ज़रूरी काम से मिलने आ गए। अब तक उसने जुनैद से उसकी मदद के बारे में कोई बात नहीं की थी और अचानक उन लोगों के मिलने आने से इसकी संभावना भी ख़त्म हो गई।
“ठीक है जुनैद, फिर कभी बात करते हैं”, कहकर उसने आए हुए लोगों से हाथ मिलाना शुरू किया और जुनैद एक पल के लिए ठिठका, फिर चुपचाप निकल गया। कुछ देर बाद वह लोग भी निकल गए और उसको राहत ही महसूस हुई।
दोपहर बाद फिर से जुनैद का फोन आया “सर, आपसे जो बात कहने आया था वह तो कह ही नहीं पाया। मुझे कुछ पैसों की सख़्त ज़रूरत है, अब्बू ने इस बार पैसे नहीं भेजे हैं।” जुनैद और भी कुछ कह रहा था तब तक उसने टोका और बोला “आज तो पैसे नहीं हैं, दो-तीन दिन बाद फोन करना, देखता हूँ।”
फोन कट गया, उसने फौरी तौर पर राहत की साँस ली, लेकिन कब तक, यह उसके दिमाग़ में घूमने लगा। इनसान की शायद यह फ़ितरत होती है कि वह अपने से तो जो चाहे दे दे, लेकिन अगर कोई माँग ले तो उसे ठीक नहीं लगता। कितने ही लोग गुप्त दान या डोनेसन इत्यादि देते रहते हैं लेकिन शायद ही सड़क पर खड़े किसी माँगने वाले को कुछ देते हों। कभी-कभी उसका दिल कहता कि जुनैद से पूछ ले कि कितने पैसे चाहिए और दे दे। लेकिन फिर लगता कि पता नहीं कितने माँग ले और वापस मिलने का तो सवाल ही नहीं था तो ख़ैरात में ही जाएँगे सब। अगले दो दिन इन्हीं कश्मकश में बीते और जुनैद का वापस फोन आ गया, इस बार उसने फोन नहीं उठाया। अगले एक घंटे में दो-तीन बार और फोन आया लेकिन उसने नहीं उठाया। शायद जुनैद इशारा समझ जाए और फोन करना बंद कर दे, यही सोच काम कर रही थी उस समय। लेकिन यह तो समस्या का एक तात्कालिक हल था,जुनैद का फोन उसे यही अहसास दिलाता रहता था। रात में जुनैद का मैसेज आया, “सर आप मीटिंग में थे शायद, मैंने फोन किया था।” उसने मैसेज का जवाब देना ज़रूरी नहीं समझा और कुछ पढ़ते हुए सो गया।
अगले पाँच दिन तक लगभग रोज़ जुनैद का फोन आता और वह अधिकतर उठाता ही नहीं था। कभी-कभी “अभी मीटिंग में हूँ, बाद में करता हूँ”, कहकर टाल देता था। एकाध बार उसे अपने-आप पर ग़ुस्सा भी आया कि आख़िर वह पूछ क्यों नहीं लेता कि जुनैद को कितने की ज़रूरत है, लेकिन फिर अंदर से आवाज़ आती कि छोड़ो इसे। ऐसा नहीं था कि उसके पास पैसे नहीं थे लेकिन शायद वह ख़ुद ही बिना माँगे देता तो इतना बुरा नहीं लगता।
उस दिन शुक्रवार था और सुबह ऑफ़िस पहुँचते ही जुनैद का मैसेज आ गया “सर, मुझे कुछ फ़ार्म भरने हैं, प्लीज़ मदद कर दीजिए। मैं आपके ऑफ़िस के पास ही हूँ, अगर आप कहें तो आ जाऊँ।” उसने मैसेज पढ़ा और जैसे उसे अपने ऊपर ग्लानि हो गई, एक छात्र को फ़ार्म भरने के लिए मदद नहीं कर सकता। अपना समय उसे याद आ गया, किससे किससे मदद नहीं लेनी पड़ती थी पढ़ाई के दिनों में। कितनी बार तो दोस्तों ने ही फ़ार्म ख़रीदकर दिया था, उसके पास पैसे जो नहीं होते थे। और नौकरी में आने के बाद भी कितने साल उसने अनाथ बच्चों के पढ़ाई के लिए पैसे दिए थे, फिर आज जुनैद के लिए ही ऐसी बात क्यों उसके दिमाग़ में आई।
उसे एकदम से अच्छा महसूस होने लगा और उसने फोन जुनैद को लगाया “कहाँ हो तुम, आ जाओ”, और फोन रख दिया। थोड़ी देर बाद ही जुनैद उसके सामने खड़ा था, शायद वह उसके ऑफ़िस के बाहर ही था और उसके फोन का इंतज़ार कर रहा था। “बैठो, चाय तो पिओगे न”, अपने स्वर को भरसक संयत करते हुए उसने चाय के लिए बोल दिया। जुनैद ने उसको देखा और बहुत शर्मिंदगी से बोला “सर मैं आपसे पैसों के लिए नहीं कहना चाहता था, मैंने कभी नहीं सोचा था इसके बारे में। लेकिन अभी बहुत मजबूर हूँ। थोड़े-से पैसों की मदद कर दीजिए, मैं जल्दी ही चुका दूँगा।”
“अच्छा कितने की ज़रूरत है अभी”, उसने पूछा।
“हज़ार दो हज़ार जीतने भी हो सकें सर, मैं लौटा दूँगा”,जुनैद ने बेचारगी से भरे शब्दों में कहा।
“ठीक है, बस एक चीज़ का वादा करो, आगे से सिगरेट नहीं पिओगे तुम” और उसने जेब से दो हज़ार निकाले और जुनैद को पकड़ा दिए।
लेकिन पैसे देते समय उसने जुनैद की नज़रों में नहीं देखा, कहीं पढ़ी हुई पंक्तियाँ “किसी की मदद करते समय उसकी निगाहों में नहीं देखना चाहिए” उसे याद आ गईं। जुनैद ने पैसे लिए,उसका हाथ अपने हाथों में लेकर कस के दबाया और फिर हाथ जोड़ते हुए बाहर निकाल गया। उसने थोड़ी देर बाद सामने देखा,जुनैद नहीं था। आगे से जुनैद को फोन वह ख़ुद ही करता रहेगा और पैसे वापस देने के लिए उसे प्यार से मना कर देगा, सोचकर उसे काफ़ी थोड़ा हल्का महसूस हो रहा था। उसने मुसकुराते हुए सामने रखी चाय की प्याली को उठाकर मुँह से लगा लिया, चाय ठंडी थी लेकिन उसे गर्माहट का अहसास करा रही थी।

इंतज़ार- कहानी


फिर एक लड़की के सवालिया निगाहों ने उसे बेध दिया। ये तो अक्सर होता ही रहता है, पहली बार जब भी कोई पेशेंट उसके यहाँ आता है तो एकबारगी तो चौंक ही जाता है। और अगर पेशेंट लड़की या महिला हो तो फिर उसका चौंकना स्वाभाविक ही होता है। बहुत सी महिलाओं ने भी पहले पूछा था और आज इस लड़की ने भी पूछ ही लिया "डॉक्टर, आप सबकी सर्जरी करती हैं, ख़ुद अपनी सर्जरी क्यों नहीं करतीं?। उसने लड़की की तरफ़ एक बार देखा और फिर मुस्कुराकर अपने काम में लग गई। लड़की भी समझ गई कि डॉक्टर अभी इस विषय में बात नहीं करना चाहती है तो फिर नहीं पूछा उसने।

अगले आधे घंटे वह लड़की उसके साथ थी, उसकी सर्जरी की ज़रूरत और उसमें आने वाले ख़र्च के बारे में उसने बताया और लड़की संतुष्ट होकर निकल गई। उस लड़की के जाने के बाद वह उठकर वाशरूम गई और अपने चेहरे पर पानी की छीटें डालने लगी। वैसे तो अब उसे अपने चेहरे में कोई दिक़्क़त नहीं नज़र आती थी लेकिन जब भी अपना चेहरा देखती, उसकी नफ़रत फिर से हरी हो जाती। उसने वापस आकर कुर्सी पर सर टिकाया और आँख मूँद ली, थोड़ी देर में ही मन विचारों के समंदर में गोते लगाने लगा।

अपने शहर की एक बेहद सफल प्लास्टिक सर्जन होते हुए भी उसका चेहरा बेहद भद्दा था। आज भले उसे ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ता था लेकिन बचपन में वह अपना चेहरा जब भी आईने में देखती, बहुत रोती थी। लेकिन उस स्थिति में जब भी पिता के पास जाती, वह ख़ुद अपना मुँह फेर कर उसे भगा देते। थोड़ी बड़ी होने पर एक दिन माँ ने सुबकते हुए उसे बता ही दिया कि वह पैदा न होने पाए, इसके लिए पिता ने धोखे से उसे कुछ खिला दिया था। वह तो बच गई लेकिन असर चेहरे और शरीर पर आ गया।

जैसे-जैसे वह आगे बढ़ती गई, पिता के प्रति उसकी नफ़रत भी बढ़ती गई। मेडिकल में दाख़िला लेना भी शायद इसी नफ़रत का हिस्सा था और उसने पढ़ाई में जमकर मेहनत की। जिस दिन उसे डॉक्टर की डिग्री मिलनी थी, उसने माँ को पिता के साथ आने के लिए कहा था। और उस दिन उसने जानबूझ कर अपना चेहरा बिना मेकअप के रखा था ताकि पिता उस भीड़-भाड़ में उसे देखकर ख़ूब झेंपे। फिर आगे चलकर उसने प्लास्टिक सर्जरी में ही स्पेशलाइजेशन किया और अपने-आप से एक क़सम भी ली कि अपना चेहरा वह कभी भी नहीं सुधारेगी। उसे लगता था कि पिता को दंड देने का इससे बेहतर तरीक़ा और कोई नहीं हो सकता।

समय बीतने के साथ पिता अपने को कुछ-कुछ अपराधी महसूस करने लगे थे, हालाँकि उसने कभी भी सीधे उनसे इस विषय में बात नहीं की थी। वह माँ को कहते कि बेटी को समझाओ कि अपना चेहरा भी सुधार ले, अच्छा नहीं लगता। माँ ने भी कई बार कहा कि क्यों नहीं ख़ुद का चेहरा भी ठीक कर लेती, पूरी दुनिया का तो करती है। लेकिन जब भी पिता उसको देखते, उनकी आँखों में देखकर उसे बहुत सुकून मिलता था। पिता की नज़रों में आए परिवर्तन को देखकर उसे लगता जैसे एक काम पूरा हो गया है।

वक़्त के साथ-साथ अब कभी-कभी शादी की बात भी घर पर चलती। ऐसे समय वह कस के ठहाका लगाती और माँ को देखते हुए कहती "इतनी सुंदर बेटी को जन्म देते समय सोचा नहीं था कि इसके लायक़ राजकुमार कहाँ मिलेगा"। माँ की आँखों में आँसू आ जाते तो वह तुरंत उनकी गोद में लेटकर कहती "अरे कौन करेगा शादी मुझसे और क्या ज़रूरी है शादी करना! मान लो अगर मेरी कोख में भी बेटी आ जाए और मुझे भी वह धोखे से कुछ खिला दे तो? ऐसे में माँ उसे समझाने का भी प्रयास करती कि अब उसके पिता अपने किए पर शर्मिंदा हैं और यह वह कई बार कह भी चुके हैं। लेकिन उसके तर्क के आगे अक्सर माँ ख़ामोश हो उसको देखती रह जाती।

एक बार पिता ने भी हिम्मत जुटाकर उससे कहा था कि अपने पसंद के ही किसी लड़के से शादी क्यों नहीं कर लेती। दरअसल परिचित लोगों और रिश्तेदारों ने अब उनसे पूछना शुरू कर दिया था कि बेटी की शादी कब करोगे और उनके पास कोई जवाब नहीं होता था। उसने एक भरपूर नज़र पिता पर डाली और व्यंग्य से कहा "बड़ी चिंता हो रही है मेरी आजकल, अगर माँ का चेहरा भी मेरी तरह होता तो आप करते उससे शादी? मैं जैसे भी हूँ, ख़ुश हूँ, फिर कभी मुझसे इस बारे में बात मत कीजिएगा"।

पिता का चेहरा फक्क पड़ गया, माँ भी थोड़ी दूर पर बैठी थी लेकिन एकदम ख़ामोश रही।

तभी एक आहट से उसने आँख खोली, सामने उसकी असिस्टेंट खड़ी थी। उसने एक नज़र उसपर डाली और फिर घड़ी पर नज़र डाली, रात के ८ बज गए थे।

"अरे तूने मुझे बताया क्यों नहीं कि समय हो गया है, तू भी बहुत संकोची है। चलो क्लीनिक बंद करते हैं और मैं तुमको घर छोड़ते हुए निकल जाऊँगी", उसने कुर्सी से उठते हुए कहा।

"अरे नहीं मैडम, मैं चली जाऊँगी, आप परेशान मत होइए", असिस्टेंट ने हिचकते हुए कहा।

“किसी दिन तेरी शक्ल भी मेरी तरह हो जाएगी, आजकल अख़बार नहीं पढ़ती है क्या? चल मैं तुझे छोड़ दूँगी”, उसने बैग उठाते हुए कहा और क्लीनिक से निकल गई।

आज मन थोड़ा भारी-सा लग रहा था तो उसने रास्ते वाले पार्क के सामने स्कूटी रोकी और जाकर एक बेंच पर बैठ गई। पार्क काफ़ी हद तक खाली हो गया था, अलबत्ता इक्का-दुक्का बुज़ुर्ग और कुछ बच्चे अभी भी खेल रहे थे। कोने की बेंच पर ज़रूर कुछ नवयुवक और नवयुवतियाँ बैठे थे, उनके हिस्से का एकांत उनको शायद यहीं पर मिलता था। उसने कुछ देर तक उन जोड़ों की तरफ़ देखा और एक गहरी साँस ली। एक लड़का उसी समय उसके सामने से गुज़रा और जैसे ही लड़के की नज़र उसपर पड़ी, वह झटके से आगे बढ़ गया। उस लड़के की तेज़ चाल देखकर उसके चेहरे पर मुस्कराहट फैल गई। कम-से-कम ऐसे लड़कों की चुभती और खा जाने वाली नज़रों से तो उसका चेहरा उसे बचा लेता है, सोचकर उसे थोड़ा अच्छा लगा।

“आज बहुत देर हो गई बेटी”, माँ के चेहरे पर चिंता थी।

उसने माँ की तरफ़ ग़ौर से देखा, अचानक उसे पार्क वाली घटना याद आ गई और वह हँसने लगी। माँ अब थोड़ी आश्चर्य में पड़ गई कि इसको क्या हो गया।

“माँ तू मेरी चिंता बिल्कुल मत किया कर, कम-से-कम मुझे कोई लड़का छेड़ने तो नहीं ही आएगा। आज पार्क में एक लड़के ने मुझे देखा और ऐसे भागा जैसे मैं उसको शादी के लिए ही बोल दूँगी”, उसने हँसते हुए माँ को बताया।

माँ का चेहरा एकदम फक्क पड़ गया, उससे कुछ कहते नहीं बना। बेटी की मानसिक स्थिति से वह बख़ूबी वाकिफ़ थी लेकिन उसे कैसे समझाए, यह उनको ख़ुद समझ में नहीं आता था।

“अच्छा सुन, आज डॉ वर्मा आए थे, काफ़ी देर तक बैठे भी थे। मैंने कहा भी कि तुमको फोन कर दूँ तो मना कर दिया”, माँ ने बात बदली।

उसने हूँ करके सर हिलाया और बैग रखने कमरे में चली गई। कपड़े बदलकर उसने मुँह हाथ धोया और खाने की मेज़ पर आकर बैठ गई। माँ ने उसकी पसंदीदा आलू मटर की सब्ज़ी बनाई थी और साथ में पराठे भी।

“माँ, तू इतना बढ़िया खाना खिलाती है इसीलिए कहीं बाहर खाने की इच्छा नहीं होती मेरी”, उसकी बात पर माँ भी मुस्कुराने लगी और प्यार से उसे थोड़ा और खाने के लिए इसरार करने लगी।

आजकल डॉ वर्मा काफ़ी आने लगे हैं, बिस्तर पर गिरते ही उसके मन में आया। इसी मोहल्ले में रहते हैं, कभी-कभी मुलाक़ात भी होती रहती है लेकिन बातचीत बहुत कम हो पाती है। बाक़ी तो कुछ ख़ास नहीं लगता उसे लेकिन एक फ़र्क़ साफ़ नज़र आ ही जाता है। डॉ वर्मा के चेहरे पर उसे देखकर,बाक़ी लोगों की तरह वह अजीब-सा और ख़राब भाव नहीं आता है। और भी डॉ हैं जिन्हें वह जानती है लेकिन बाक़ी सब उसे देखकर एक ऐसा भाव चेहरे पर लाते हैं गोया फिर कभी मिलने की इच्छा ही नहीं हो। माँ ने भी कई बार बताया है डॉ वर्मा के बारे में और उस समय माँ के चेहरे पर जो अलग सा भाव रहता है, वह उससे अछूता नहीं रहता। लेकिन न तो माँ कभी खुल कर कुछ कहती है और न ही वह कुछ कह पाती है। लेकिन इस तरह उनका आना उसे पता नहीं क्यों ठीक नहीं लगा, शायद किसी पुरुष को एक सीमा से ज़्यादा छूट देने की उसकी आदत नहीं थी।

सुबह चाय पीते समय उसने माँ से पूछा “माँ, ये डॉ वर्मा किसलिए आते हैं, पिताजी से तो मिलने आते नहीं हैं और तुमसे भी क्यों मिलने आएँगे।” माँ के आगे वह इतना ख़याल रखती है कि पिता को ज़्यादातर पिताजी कहकर बुलाती है।

माँ इस सीधे सवाल से अचकचा गई, उसे उम्मीद नहीं थी कि सुबह-सुबह वह ऐसा सवाल करेगी। फिर अपने आपको सँभालते हुए वह बोली “अब सारे आदमी एक जैसे तो नहीं होते बेटी, कुछ भले लोग भी तो होते हैं। डॉ वर्मा बहुत नेक इनसान हैं और वह तुमसे घुलना मिलना चाहते हैं तो इसमें बुराई क्या है?

उसके चेहरे पर मुस्कराहट तैर गई, वही मुस्कराहट जिसे देखकर माँ बहुत परेशान हो जाती है। उसने चाय का एक घूँट लिया और माँ को देखते हुए बोली “मैंने कब कहा कि डॉ वर्मा नेक इनसान नहीं हैं लेकिन मुझसे घुलने मिलने से क्या होने वाला है। तुम तो अच्छे से जानती हो कि मेरा इस जीवन में किसी भी पुरुष से कोई प्यार मोहब्बत वाला रिश्ता नहीं हो सकता तो फिर क्यों किसी को अँधेरे में रखा जाए। वैसे भी इस बदसूरती पर कोई प्यार का भाव तो नहीं रखेगा, हाँ तरस ज़रूर खा सकता है। इसलिए अगली बार जब वह आएँ तो उनको साफ़ साफ़ बता देना। वैसे तो मैं भी कह सकती हूँ लेकिन अगर अगर मैं कहूँगी तो उनको बुरा लग जाएगा, हैं तो वह भी पुरुष ही।”

पिता भी अंदर कमरे में थे लेकिन अब उसके सामने पड़ने से कतराते हैं इसलिए बाहर नहीं आए। क्लीनिक जाते समय उसने टिफ़िन उठाया तो माँ का रूआँसा चेहरा देखकर उसको थोड़ा बुरा लगा। वह और चाहे जिसे भी दुख पहुँचाने के बारे में सोचे लेकिन माँ के बारे में कभी नहीं सोच सकती। धीरे-से आगे बढ़कर उसने माँ को अपनी बाँह में भर लिया और पुचकारते हुए बोली “ तू मुझे समझती है इसीलिए तुझसे खुलकर बात कर लेती हूँ। मेरी परिस्थिति में कोई भी रहता तो ऐसा ही सोचता। चलो मैं चलती हूँ, शाम को जल्दी आऊँगी।”

माँ उसके जाने के बाद बहुत देर तक सोचती रही, दरअसल बेटी के तर्क उसे सोचने पर मजबूर कर देते थे। लेकिन आख़िरकार थी तो माँ ही, अपनी बेटी के घर को बसते देखने की इच्छा तो हमेशा मन में रहती थी। उसके उम्र की लगभग सभी लड़कियों ने या तो माता-पिता या ख़ुद की मर्ज़ी से विवाह कर लिया था और नाते रिश्ते वाले भी गाहे-बगाहे ज़ख़्म कुरेद ही देते थे।

उसका भी मन आज थोड़ा विचलित था, माँ को कभी-कभी रोते तो वह देखती ही रहती थी लेकिन आज उसे लगा जैसे उनके रोने की ज़िम्मेदार वह ख़ुद है। लेकिन वह कर भी क्या सकती थी, शादी के बारे में तो कभी सोच भी नहीं पाती है और माँ की फ़िलहाल सबसे बड़ी वजह यही थी। इतने में असिस्टेंट ने आकार बताया कि एक पेशेंट है तो उसका ध्यान टूटा।

शाम को जल्दी से क्लीनिक बंद कराके वह निकली तो बदली छाई हुई थी। इस मौसम में माँ को मूँग के पकौड़े बहुत पसंद हैं तो उसने रास्ते के सोहन हलवाई की दुकान से कुछ पकौड़े और गरमागरम जलेबियाँ लीं और जल्दी-जल्दी घर की तरफ़ बढ़ गई। आज रास्ते में भीड़ तो थी लेकिन उसने अपनी स्कूटी किनारे से निकाली और घर में घुसते ही माँ को आवाज़ लगाई “माँ, कहाँ हो, देखो आज मैं क्या लाई हूँ?।”

वह पैकेट मेज़ पर रखने वाली थी कि उसकी नज़र सोफ़े पर बैठे डॉ वर्मा पर पड़ी, वह उसे देखकर उठने का प्रयास कर रहे थे। उनके हैलो के जवाब में उसने अनमने तरीक़े से हैलो किया और जल्दी से किचन में घुस गई। उसका उत्साह अब कुछ हल्का पड़ गया था लेकिन माँ को पकौड़े और जलेबी का पैकेट पकड़ाते समय उसने ज़ाहिर नहीं होने दिया। माँ चाय छानने जा रही थी, उसने पैकेट खोला और उसके चेहरे पर मुस्कराहट छा गई।

“वाह, आज तो तूने कमाल कर दिया, इस मौसम में यह नास्ता खाने का मन तो मेरा भी कर रहा था। वैसे अगर डॉ वर्मा को भी खिलाऊँ तो तुझे बुरा तो नहीं लगेगा न?

उसे कुछ जवाब देते नहीं बना, एक बार तो इच्छा हुई कि कह दे कि खिला दो, मुझे क्या लेकिन फिर उसने माँ की तरफ़ देखते हुए कहा “अब लाई तो तेरे लिए थी, बाक़ी तेरी मर्ज़ी, मैं कपड़े बदलकर आती हूँ।”

“जल्दी से आजा, चाय तैयार है, सब मिलकर चाय और नास्ता करते हैं”, माँ ने कहा।

किसी और दिन की बात होती तो वह शायद आती भी नहीं, लेकिन आज माँ के चलते उसने जल्दी से कपड़े बदले और ड्राइंगरूम में आ गई। नास्ता रखा हुआ था लेकिन माँ और डॉ वर्मा उसका ही इंतज़ार कर रहे थे। नाश्ते के दौरान कुछ हँसी मज़ाक भी हुआ, कुछ गंभीर बातें भी हुईं लेकिन उसका मन ऊहापोह में ही था। दिल करता था कि यहीं माँ के सामने ही वह अपनी बात कह दे लेकिन फिर लगता कि ऐसे कहना ठीक नहीं है। बीच-बीच में वह माँ और डॉ वर्मा की तरफ़ भी देखती और अक्सर उन दोनों को अपने आपको ही देखता पाती। पता नहीं क्या-क्या माँ ने कहा, कितनी ही बातें डॉ वर्मा ने भी कहीं लेकिन इसी दौरान उसने कुछ सोच लिया।

नास्ता ख़त्म होने के बाद डॉ वर्मा उठकर जाने लगे, वह भी खड़ी हुई और माँ की उम्मीद के विपरीत वह उनको बाहर तक छोड़ने भी गई। माँ जब लौट रही थी तभी उसने कहा कि वह थोड़ी देर डॉ वर्मा के साथ घूमकर आएगी और माँ को एक बार फिर भौचक्का छोड़कर वह डॉ वर्मा के साथ निकल गई। बात करने की शुरूआत उसी ने की “कैसे हैं डॉ आप, आपकी प्रैक्टिस कैसी चल रही है?

डॉ वर्मा ने छोटा-सा जवाब “बढ़िया है” दिया और साथ चलते रहे।

“सामने के पार्क में चलकर बैठते हैं थोड़ी देर”, उसने कहा और पार्क के अंदर बढ़ गई। डॉ वर्मा भी पीछे-पीछे आए और बेंच पर बगल में बैठ गए।

“देखिए डॉ, मुझे आप ग़लत मत समझिए, आप सचमुच बहुत अच्छे इनसान हैं लेकिन अगर आपके मन में मेरे बारे में कुछ भी चल रहा है तो उसे भूल जाइए। मेरी मनः स्थिति ऐसी नहीं है कि मैं किसी भी व्यक्ति के बारे में सोच सकूँ कि वह मेरी ज़िंदगी में आ सकता है। और अगर कोई आएगा भी तो वह सहानुभूतिवस ही आएगा। और मैं किसी के सहानुभूति का पात्र बनूँ, यह मुझे मंज़ूर नहीं है”, उसने एक साँस में सब कह डाला।

डॉ वर्मा के चेहरे पर कई भाव आए और गए, शायद वह इसकी उम्मीद भी कर रहे थे। उसकी माँ ने इतना तो बता ही दिया था उसके बारे में, इसलिए उनको बहुत झटका नहीं लगा। उन्होने एक बार उसकी तरफ़ देखा और फिर बहुत मुलायम शब्दों में बोले “मुझे अच्छा लगा कि आपने यह सब कह दिया, अब मेरे मन में भी कोई हिचक नहीं है। आपकी मानसिक स्थिति का अंदाज़ा मेरे से बेहतर और कौन लगा सकता है। शायद मैं भी ऐसी स्थिति में वही सब सोचता और कहता जो आपने कहा है। लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि हर पुरुष एक-सा नहीं होता, वैसे तो हर औरत भी एक-दूसरे से अलग होती है। आपकी हालत में आने के बाद शायद अधिकतर लड़कियां कभी न कभी जान देने की कोशिश करतीं या फिर गहरे अवसाद में डूबकर जी रही होतीं। लेकिन आपने क्या किया, स्थिति से लड़ीं और अपनी ज़िंदगी अपने से बनाया।”

इतना कहकर डॉ वर्मा ने एक गहरी साँस ली और फिर बोलना शुरू किया “और जहाँ तक आपके लिए मेरे मन में कुछ चलने की बात है तो मैं इतना ज़रूर कहना चाहूँगा कि आपके लिए मेरे मन में बहुत इज़्ज़त है और मैं आपका दोस्त बनना चाहता हूँ। आख़िर मुझसे दोस्ती में आपको क्या ऐतराज होना चाहिए, आपके ही प्रोफेशन से हूँ और आपको पसंद करता हूँ। आगे आपकी मर्ज़ी, चाहे तो आप मना कर सकती हैं। लेकिन एक बात और ज़रूर कहूँगा, आपकी माँ को भी मेरा आना बहुत अच्छा लगता है।”

काफ़ी देर तक एक चुप्पी छाई रही दोनों के बीच में, रात गहराने लगी थी और पार्क में से लोग अपने घरों को जाने लगे थे। उसने एक बार डॉ वर्मा की तरफ़ देखा और उठ खड़ी हुई। वापस जाते समय उसने डॉ वर्मा का हाथ धीरे-से दबा दिया और बोली “अभी आपको इंतज़ार करना होगा डॉ, संभव हो तो कीजिए”, और जल्दी-जल्दी पार्क से निकल गई। उसके घर के सामने अक्सर बुझी रहने वाली स्ट्रीट लाइट आज जल रही थी, माँ गेट पर ही उसके इंतज़ार में टहल रही थी।