फिर एक लड़की के सवालिया निगाहों ने उसे बेध दिया। ये तो अक्सर होता ही रहता है, पहली बार जब भी कोई पेशेंट उसके यहाँ आता है तो एकबारगी तो चौंक ही जाता है। और अगर पेशेंट लड़की या महिला हो तो फिर उसका चौंकना स्वाभाविक ही होता है। बहुत सी महिलाओं ने भी पहले पूछा था और आज इस लड़की ने भी पूछ ही लिया "डॉक्टर, आप सबकी सर्जरी करती हैं, ख़ुद अपनी सर्जरी क्यों नहीं करतीं?। उसने लड़की की तरफ़ एक बार देखा और फिर मुस्कुराकर अपने काम में लग गई। लड़की भी समझ गई कि डॉक्टर अभी इस विषय में बात नहीं करना चाहती है तो फिर नहीं पूछा उसने।
अगले आधे घंटे वह लड़की उसके साथ थी, उसकी सर्जरी की ज़रूरत और उसमें आने वाले ख़र्च के बारे में उसने बताया और लड़की संतुष्ट होकर निकल गई। उस लड़की के जाने के बाद वह उठकर वाशरूम गई और अपने चेहरे पर पानी की छीटें डालने लगी। वैसे तो अब उसे अपने चेहरे में कोई दिक़्क़त नहीं नज़र आती थी लेकिन जब भी अपना चेहरा देखती, उसकी नफ़रत फिर से हरी हो जाती। उसने वापस आकर कुर्सी पर सर टिकाया और आँख मूँद ली, थोड़ी देर में ही मन विचारों के समंदर में गोते लगाने लगा।
अपने शहर की एक बेहद सफल प्लास्टिक सर्जन होते हुए भी उसका चेहरा बेहद भद्दा था। आज भले उसे ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ता था लेकिन बचपन में वह अपना चेहरा जब भी आईने में देखती, बहुत रोती थी। लेकिन उस स्थिति में जब भी पिता के पास जाती, वह ख़ुद अपना मुँह फेर कर उसे भगा देते। थोड़ी बड़ी होने पर एक दिन माँ ने सुबकते हुए उसे बता ही दिया कि वह पैदा न होने पाए, इसके लिए पिता ने धोखे से उसे कुछ खिला दिया था। वह तो बच गई लेकिन असर चेहरे और शरीर पर आ गया।
जैसे-जैसे वह आगे बढ़ती गई, पिता के प्रति उसकी नफ़रत भी बढ़ती गई। मेडिकल में दाख़िला लेना भी शायद इसी नफ़रत का हिस्सा था और उसने पढ़ाई में जमकर मेहनत की। जिस दिन उसे डॉक्टर की डिग्री मिलनी थी, उसने माँ को पिता के साथ आने के लिए कहा था। और उस दिन उसने जानबूझ कर अपना चेहरा बिना मेकअप के रखा था ताकि पिता उस भीड़-भाड़ में उसे देखकर ख़ूब झेंपे। फिर आगे चलकर उसने प्लास्टिक सर्जरी में ही स्पेशलाइजेशन किया और अपने-आप से एक क़सम भी ली कि अपना चेहरा वह कभी भी नहीं सुधारेगी। उसे लगता था कि पिता को दंड देने का इससे बेहतर तरीक़ा और कोई नहीं हो सकता।
समय बीतने के साथ पिता अपने को कुछ-कुछ अपराधी महसूस करने लगे थे, हालाँकि उसने कभी भी सीधे उनसे इस विषय में बात नहीं की थी। वह माँ को कहते कि बेटी को समझाओ कि अपना चेहरा भी सुधार ले, अच्छा नहीं लगता। माँ ने भी कई बार कहा कि क्यों नहीं ख़ुद का चेहरा भी ठीक कर लेती, पूरी दुनिया का तो करती है। लेकिन जब भी पिता उसको देखते, उनकी आँखों में देखकर उसे बहुत सुकून मिलता था। पिता की नज़रों में आए परिवर्तन को देखकर उसे लगता जैसे एक काम पूरा हो गया है।
वक़्त के साथ-साथ अब कभी-कभी शादी की बात भी घर पर चलती। ऐसे समय वह कस के ठहाका लगाती और माँ को देखते हुए कहती "इतनी सुंदर बेटी को जन्म देते समय सोचा नहीं था कि इसके लायक़ राजकुमार कहाँ मिलेगा"। माँ की आँखों में आँसू आ जाते तो वह तुरंत उनकी गोद में लेटकर कहती "अरे कौन करेगा शादी मुझसे और क्या ज़रूरी है शादी करना! मान लो अगर मेरी कोख में भी बेटी आ जाए और मुझे भी वह धोखे से कुछ खिला दे तो? ऐसे में माँ उसे समझाने का भी प्रयास करती कि अब उसके पिता अपने किए पर शर्मिंदा हैं और यह वह कई बार कह भी चुके हैं। लेकिन उसके तर्क के आगे अक्सर माँ ख़ामोश हो उसको देखती रह जाती।
एक बार पिता ने भी हिम्मत जुटाकर उससे कहा था कि अपने पसंद के ही किसी लड़के से शादी क्यों नहीं कर लेती। दरअसल परिचित लोगों और रिश्तेदारों ने अब उनसे पूछना शुरू कर दिया था कि बेटी की शादी कब करोगे और उनके पास कोई जवाब नहीं होता था। उसने एक भरपूर नज़र पिता पर डाली और व्यंग्य से कहा "बड़ी चिंता हो रही है मेरी आजकल, अगर माँ का चेहरा भी मेरी तरह होता तो आप करते उससे शादी? मैं जैसे भी हूँ, ख़ुश हूँ, फिर कभी मुझसे इस बारे में बात मत कीजिएगा"।
पिता का चेहरा फक्क पड़ गया, माँ भी थोड़ी दूर पर बैठी थी लेकिन एकदम ख़ामोश रही।
तभी एक आहट से उसने आँख खोली, सामने उसकी असिस्टेंट खड़ी थी। उसने एक नज़र उसपर डाली और फिर घड़ी पर नज़र डाली, रात के ८ बज गए थे।
"अरे तूने मुझे बताया क्यों नहीं कि समय हो गया है, तू भी बहुत संकोची है। चलो क्लीनिक बंद करते हैं और मैं तुमको घर छोड़ते हुए निकल जाऊँगी", उसने कुर्सी से उठते हुए कहा।
"अरे नहीं मैडम, मैं चली जाऊँगी, आप परेशान मत होइए", असिस्टेंट ने हिचकते हुए कहा।
“किसी दिन तेरी शक्ल भी मेरी तरह हो जाएगी, आजकल अख़बार नहीं पढ़ती है क्या? चल मैं तुझे छोड़ दूँगी”, उसने बैग उठाते हुए कहा और क्लीनिक से निकल गई।
आज मन थोड़ा भारी-सा लग रहा था तो उसने रास्ते वाले पार्क के सामने स्कूटी रोकी और जाकर एक बेंच पर बैठ गई। पार्क काफ़ी हद तक खाली हो गया था, अलबत्ता इक्का-दुक्का बुज़ुर्ग और कुछ बच्चे अभी भी खेल रहे थे। कोने की बेंच पर ज़रूर कुछ नवयुवक और नवयुवतियाँ बैठे थे, उनके हिस्से का एकांत उनको शायद यहीं पर मिलता था। उसने कुछ देर तक उन जोड़ों की तरफ़ देखा और एक गहरी साँस ली। एक लड़का उसी समय उसके सामने से गुज़रा और जैसे ही लड़के की नज़र उसपर पड़ी, वह झटके से आगे बढ़ गया। उस लड़के की तेज़ चाल देखकर उसके चेहरे पर मुस्कराहट फैल गई। कम-से-कम ऐसे लड़कों की चुभती और खा जाने वाली नज़रों से तो उसका चेहरा उसे बचा लेता है, सोचकर उसे थोड़ा अच्छा लगा।
“आज बहुत देर हो गई बेटी”, माँ के चेहरे पर चिंता थी।
उसने माँ की तरफ़ ग़ौर से देखा, अचानक उसे पार्क वाली घटना याद आ गई और वह हँसने लगी। माँ अब थोड़ी आश्चर्य में पड़ गई कि इसको क्या हो गया।
“माँ तू मेरी चिंता बिल्कुल मत किया कर, कम-से-कम मुझे कोई लड़का छेड़ने तो नहीं ही आएगा। आज पार्क में एक लड़के ने मुझे देखा और ऐसे भागा जैसे मैं उसको शादी के लिए ही बोल दूँगी”, उसने हँसते हुए माँ को बताया।
माँ का चेहरा एकदम फक्क पड़ गया, उससे कुछ कहते नहीं बना। बेटी की मानसिक स्थिति से वह बख़ूबी वाकिफ़ थी लेकिन उसे कैसे समझाए, यह उनको ख़ुद समझ में नहीं आता था।
“अच्छा सुन, आज डॉ वर्मा आए थे, काफ़ी देर तक बैठे भी थे। मैंने कहा भी कि तुमको फोन कर दूँ तो मना कर दिया”, माँ ने बात बदली।
उसने हूँ करके सर हिलाया और बैग रखने कमरे में चली गई। कपड़े बदलकर उसने मुँह हाथ धोया और खाने की मेज़ पर आकर बैठ गई। माँ ने उसकी पसंदीदा आलू मटर की सब्ज़ी बनाई थी और साथ में पराठे भी।
“माँ, तू इतना बढ़िया खाना खिलाती है इसीलिए कहीं बाहर खाने की इच्छा नहीं होती मेरी”, उसकी बात पर माँ भी मुस्कुराने लगी और प्यार से उसे थोड़ा और खाने के लिए इसरार करने लगी।
आजकल डॉ वर्मा काफ़ी आने लगे हैं, बिस्तर पर गिरते ही उसके मन में आया। इसी मोहल्ले में रहते हैं, कभी-कभी मुलाक़ात भी होती रहती है लेकिन बातचीत बहुत कम हो पाती है। बाक़ी तो कुछ ख़ास नहीं लगता उसे लेकिन एक फ़र्क़ साफ़ नज़र आ ही जाता है। डॉ वर्मा के चेहरे पर उसे देखकर,बाक़ी लोगों की तरह वह अजीब-सा और ख़राब भाव नहीं आता है। और भी डॉ हैं जिन्हें वह जानती है लेकिन बाक़ी सब उसे देखकर एक ऐसा भाव चेहरे पर लाते हैं गोया फिर कभी मिलने की इच्छा ही नहीं हो। माँ ने भी कई बार बताया है डॉ वर्मा के बारे में और उस समय माँ के चेहरे पर जो अलग सा भाव रहता है, वह उससे अछूता नहीं रहता। लेकिन न तो माँ कभी खुल कर कुछ कहती है और न ही वह कुछ कह पाती है। लेकिन इस तरह उनका आना उसे पता नहीं क्यों ठीक नहीं लगा, शायद किसी पुरुष को एक सीमा से ज़्यादा छूट देने की उसकी आदत नहीं थी।
सुबह चाय पीते समय उसने माँ से पूछा “माँ, ये डॉ वर्मा किसलिए आते हैं, पिताजी से तो मिलने आते नहीं हैं और तुमसे भी क्यों मिलने आएँगे।” माँ के आगे वह इतना ख़याल रखती है कि पिता को ज़्यादातर पिताजी कहकर बुलाती है।
माँ इस सीधे सवाल से अचकचा गई, उसे उम्मीद नहीं थी कि सुबह-सुबह वह ऐसा सवाल करेगी। फिर अपने आपको सँभालते हुए वह बोली “अब सारे आदमी एक जैसे तो नहीं होते बेटी, कुछ भले लोग भी तो होते हैं। डॉ वर्मा बहुत नेक इनसान हैं और वह तुमसे घुलना मिलना चाहते हैं तो इसमें बुराई क्या है?
उसके चेहरे पर मुस्कराहट तैर गई, वही मुस्कराहट जिसे देखकर माँ बहुत परेशान हो जाती है। उसने चाय का एक घूँट लिया और माँ को देखते हुए बोली “मैंने कब कहा कि डॉ वर्मा नेक इनसान नहीं हैं लेकिन मुझसे घुलने मिलने से क्या होने वाला है। तुम तो अच्छे से जानती हो कि मेरा इस जीवन में किसी भी पुरुष से कोई प्यार मोहब्बत वाला रिश्ता नहीं हो सकता तो फिर क्यों किसी को अँधेरे में रखा जाए। वैसे भी इस बदसूरती पर कोई प्यार का भाव तो नहीं रखेगा, हाँ तरस ज़रूर खा सकता है। इसलिए अगली बार जब वह आएँ तो उनको साफ़ साफ़ बता देना। वैसे तो मैं भी कह सकती हूँ लेकिन अगर अगर मैं कहूँगी तो उनको बुरा लग जाएगा, हैं तो वह भी पुरुष ही।”
पिता भी अंदर कमरे में थे लेकिन अब उसके सामने पड़ने से कतराते हैं इसलिए बाहर नहीं आए। क्लीनिक जाते समय उसने टिफ़िन उठाया तो माँ का रूआँसा चेहरा देखकर उसको थोड़ा बुरा लगा। वह और चाहे जिसे भी दुख पहुँचाने के बारे में सोचे लेकिन माँ के बारे में कभी नहीं सोच सकती। धीरे-से आगे बढ़कर उसने माँ को अपनी बाँह में भर लिया और पुचकारते हुए बोली “ तू मुझे समझती है इसीलिए तुझसे खुलकर बात कर लेती हूँ। मेरी परिस्थिति में कोई भी रहता तो ऐसा ही सोचता। चलो मैं चलती हूँ, शाम को जल्दी आऊँगी।”
माँ उसके जाने के बाद बहुत देर तक सोचती रही, दरअसल बेटी के तर्क उसे सोचने पर मजबूर कर देते थे। लेकिन आख़िरकार थी तो माँ ही, अपनी बेटी के घर को बसते देखने की इच्छा तो हमेशा मन में रहती थी। उसके उम्र की लगभग सभी लड़कियों ने या तो माता-पिता या ख़ुद की मर्ज़ी से विवाह कर लिया था और नाते रिश्ते वाले भी गाहे-बगाहे ज़ख़्म कुरेद ही देते थे।
उसका भी मन आज थोड़ा विचलित था, माँ को कभी-कभी रोते तो वह देखती ही रहती थी लेकिन आज उसे लगा जैसे उनके रोने की ज़िम्मेदार वह ख़ुद है। लेकिन वह कर भी क्या सकती थी, शादी के बारे में तो कभी सोच भी नहीं पाती है और माँ की फ़िलहाल सबसे बड़ी वजह यही थी। इतने में असिस्टेंट ने आकार बताया कि एक पेशेंट है तो उसका ध्यान टूटा।
शाम को जल्दी से क्लीनिक बंद कराके वह निकली तो बदली छाई हुई थी। इस मौसम में माँ को मूँग के पकौड़े बहुत पसंद हैं तो उसने रास्ते के सोहन हलवाई की दुकान से कुछ पकौड़े और गरमागरम जलेबियाँ लीं और जल्दी-जल्दी घर की तरफ़ बढ़ गई। आज रास्ते में भीड़ तो थी लेकिन उसने अपनी स्कूटी किनारे से निकाली और घर में घुसते ही माँ को आवाज़ लगाई “माँ, कहाँ हो, देखो आज मैं क्या लाई हूँ?।”
वह पैकेट मेज़ पर रखने वाली थी कि उसकी नज़र सोफ़े पर बैठे डॉ वर्मा पर पड़ी, वह उसे देखकर उठने का प्रयास कर रहे थे। उनके हैलो के जवाब में उसने अनमने तरीक़े से हैलो किया और जल्दी से किचन में घुस गई। उसका उत्साह अब कुछ हल्का पड़ गया था लेकिन माँ को पकौड़े और जलेबी का पैकेट पकड़ाते समय उसने ज़ाहिर नहीं होने दिया। माँ चाय छानने जा रही थी, उसने पैकेट खोला और उसके चेहरे पर मुस्कराहट छा गई।
“वाह, आज तो तूने कमाल कर दिया, इस मौसम में यह नास्ता खाने का मन तो मेरा भी कर रहा था। वैसे अगर डॉ वर्मा को भी खिलाऊँ तो तुझे बुरा तो नहीं लगेगा न?
उसे कुछ जवाब देते नहीं बना, एक बार तो इच्छा हुई कि कह दे कि खिला दो, मुझे क्या लेकिन फिर उसने माँ की तरफ़ देखते हुए कहा “अब लाई तो तेरे लिए थी, बाक़ी तेरी मर्ज़ी, मैं कपड़े बदलकर आती हूँ।”
“जल्दी से आजा, चाय तैयार है, सब मिलकर चाय और नास्ता करते हैं”, माँ ने कहा।
किसी और दिन की बात होती तो वह शायद आती भी नहीं, लेकिन आज माँ के चलते उसने जल्दी से कपड़े बदले और ड्राइंगरूम में आ गई। नास्ता रखा हुआ था लेकिन माँ और डॉ वर्मा उसका ही इंतज़ार कर रहे थे। नाश्ते के दौरान कुछ हँसी मज़ाक भी हुआ, कुछ गंभीर बातें भी हुईं लेकिन उसका मन ऊहापोह में ही था। दिल करता था कि यहीं माँ के सामने ही वह अपनी बात कह दे लेकिन फिर लगता कि ऐसे कहना ठीक नहीं है। बीच-बीच में वह माँ और डॉ वर्मा की तरफ़ भी देखती और अक्सर उन दोनों को अपने आपको ही देखता पाती। पता नहीं क्या-क्या माँ ने कहा, कितनी ही बातें डॉ वर्मा ने भी कहीं लेकिन इसी दौरान उसने कुछ सोच लिया।
नास्ता ख़त्म होने के बाद डॉ वर्मा उठकर जाने लगे, वह भी खड़ी हुई और माँ की उम्मीद के विपरीत वह उनको बाहर तक छोड़ने भी गई। माँ जब लौट रही थी तभी उसने कहा कि वह थोड़ी देर डॉ वर्मा के साथ घूमकर आएगी और माँ को एक बार फिर भौचक्का छोड़कर वह डॉ वर्मा के साथ निकल गई। बात करने की शुरूआत उसी ने की “कैसे हैं डॉ आप, आपकी प्रैक्टिस कैसी चल रही है?
डॉ वर्मा ने छोटा-सा जवाब “बढ़िया है” दिया और साथ चलते रहे।
“सामने के पार्क में चलकर बैठते हैं थोड़ी देर”, उसने कहा और पार्क के अंदर बढ़ गई। डॉ वर्मा भी पीछे-पीछे आए और बेंच पर बगल में बैठ गए।
“देखिए डॉ, मुझे आप ग़लत मत समझिए, आप सचमुच बहुत अच्छे इनसान हैं लेकिन अगर आपके मन में मेरे बारे में कुछ भी चल रहा है तो उसे भूल जाइए। मेरी मनः स्थिति ऐसी नहीं है कि मैं किसी भी व्यक्ति के बारे में सोच सकूँ कि वह मेरी ज़िंदगी में आ सकता है। और अगर कोई आएगा भी तो वह सहानुभूतिवस ही आएगा। और मैं किसी के सहानुभूति का पात्र बनूँ, यह मुझे मंज़ूर नहीं है”, उसने एक साँस में सब कह डाला।
डॉ वर्मा के चेहरे पर कई भाव आए और गए, शायद वह इसकी उम्मीद भी कर रहे थे। उसकी माँ ने इतना तो बता ही दिया था उसके बारे में, इसलिए उनको बहुत झटका नहीं लगा। उन्होने एक बार उसकी तरफ़ देखा और फिर बहुत मुलायम शब्दों में बोले “मुझे अच्छा लगा कि आपने यह सब कह दिया, अब मेरे मन में भी कोई हिचक नहीं है। आपकी मानसिक स्थिति का अंदाज़ा मेरे से बेहतर और कौन लगा सकता है। शायद मैं भी ऐसी स्थिति में वही सब सोचता और कहता जो आपने कहा है। लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि हर पुरुष एक-सा नहीं होता, वैसे तो हर औरत भी एक-दूसरे से अलग होती है। आपकी हालत में आने के बाद शायद अधिकतर लड़कियां कभी न कभी जान देने की कोशिश करतीं या फिर गहरे अवसाद में डूबकर जी रही होतीं। लेकिन आपने क्या किया, स्थिति से लड़ीं और अपनी ज़िंदगी अपने से बनाया।”
इतना कहकर डॉ वर्मा ने एक गहरी साँस ली और फिर बोलना शुरू किया “और जहाँ तक आपके लिए मेरे मन में कुछ चलने की बात है तो मैं इतना ज़रूर कहना चाहूँगा कि आपके लिए मेरे मन में बहुत इज़्ज़त है और मैं आपका दोस्त बनना चाहता हूँ। आख़िर मुझसे दोस्ती में आपको क्या ऐतराज होना चाहिए, आपके ही प्रोफेशन से हूँ और आपको पसंद करता हूँ। आगे आपकी मर्ज़ी, चाहे तो आप मना कर सकती हैं। लेकिन एक बात और ज़रूर कहूँगा, आपकी माँ को भी मेरा आना बहुत अच्छा लगता है।”
काफ़ी देर तक एक चुप्पी छाई रही दोनों के बीच में, रात गहराने लगी थी और पार्क में से लोग अपने घरों को जाने लगे थे। उसने एक बार डॉ वर्मा की तरफ़ देखा और उठ खड़ी हुई। वापस जाते समय उसने डॉ वर्मा का हाथ धीरे-से दबा दिया और बोली “अभी आपको इंतज़ार करना होगा डॉ, संभव हो तो कीजिए”, और जल्दी-जल्दी पार्क से निकल गई। उसके घर के सामने अक्सर बुझी रहने वाली स्ट्रीट लाइट आज जल रही थी, माँ गेट पर ही उसके इंतज़ार में टहल रही थी।
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