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Monday, January 4, 2021

यह बस होना था — कहानी

रात के दो बज गए थे, राजीव की आँखों में नींद नहीं थी। बगल में बैठे वैभव की आँखों से भी नींद कोसो दूर थी, बाक़ी सब लोग कई बार कहने के बाद सोने चले गए थे। आज उसे हर हालत में वैभव से बात करनी ही होगी, आख़िर उसके अलावा और कौन यह बात वैभव से कह सकता था। उसने बगल में रखी पानी की बोतल को उठाकर मुँह से लगाया और धीरे-धीरे पानी के घूँट भरने लगा। अस्पताल के उस परेशान कर देने वाले वातावरण में उसके दिमाग़ में बस एक ही बात चल रही थी कि आख़िर इस बात को वह कैसे कहे, कोई साधारण बात तो नहीं ही थी।

वह और वैभव बचपन के दोस्त थे और दोनों ने ही व्यवसाय ही चुना था इसलिए एक ही शहर में अगल-बगल रह गए। बड़े होने पर उनका अपना परिवार भी हुआ और जो रिश्ता उन दोनों में था, वह आगे भी क़ायम रहा। उसका बेटा वैभव के बेटे से बड़ा था और दोनों के एक-एक बेटियाँ भी थीं जो छोटी थीं। दोनों परिवार तो हफ़्ते में एक दिन आपस में मिलते ही थे, वे दोनों तो कमोबेश रोज़ ही मिलते रहते थे। एक बढ़िया सुकून भरा जीवन व्यतीत हो रहा था और उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन ऐसी भी नौबत आ सकती है।

उसके बेटे राहुल ने जब इंटर के बाद बी कॉम करने का फ़ैसला लिया था तो वह सहमत नहीं था। उसने सोचा था कि बेटे को इंजीनियर बनाएगा और अपने व्यवसाय से दूर ही रखेगा। लेकिन उस समय वैभव ने ही उसके बेटे राहुल को समर्थन दिया और उसको बेटे को मना करने से रोका था।

"अब वह समय नहीं है कि बच्चे हमारे हिसाब से चलेंगे, उसको जो मन है वही पढ़ने दो"। और फिर तो राहुल ने आगे अपने कैरियर के लिए जो भी पूछना था, वैभव से ही पूछा। शुरू में तो उसको बुरा लगा था, लेकिन फिर वैभव ने ही समझाया कि अगर राहुल उससे खुल कर बात कर रहा है तो ठीक ही है। उसे भी बात समझ में आ गई और उसने वैभव का हाथ धीरे-से दबा दिया।

"लेकिन ये भी याद रखो वैभव कि कल को तुम्हारा बेटा सचिन भी मुझसे राय लेकर अपना करियर डिसाइड करेगा तो फिर बुरा मत मानना", उसने वैभव को छेड़ते हुए कहा था।

"मुझे तो ख़ुशी ही होगी अगर वह ऐसा करेगा, कम-से-कम तुम्हारा दुख तो कम होगा", वैभव ने भी ठहाका लगाया और बात आई गई हो गई।

और आगे चलकर वास्तव में यही हुआ कि सचिन ने अपना करियर सिविल सर्विसेज में बनाने के लिए ग्रेजुएशन आर्ट्स से करने के लिए कहा। वैभव भी उसके सिविल सर्विसेज के करियर से असहमत नहीं था लेकिन उसने उसको पहले इंजीनियरिंग करके फिर आगे सिविल सर्विसेज के लिए तैयारी करने के लिए कहा। इसके पीछे वैभव की सोच सिर्फ़ इतना थी कि इंजीनियरिंग करने के बाद कम-से-कम उसकी नौकरी की तो गारंटी हो जाएगी। लेकिन तब उसने सचिन का पूरा साथ दिया और आर्ट्स से ग्रेजुएशन करने के बाद उसको बनारस जाने के लिए भी उसने ही कहा था। आख़िर बनारस उस समय इस तैयारी के हिसाब से सबसे नज़दीक और बेहतर जगह थी और उसके कहने के बाद वैभव के कुछ कहने की गुंजाइश ही नहीं बची थी। दिल्ली भेजना तो वैभव को बिल्कुल ही मंज़ूर नहीं था इसलिए उसने दिल्ली की चर्चा ही नहीं छेड़ी।

इस बीच उसके बेटे राहुल ने बी कॉम के बाद एम बी।ए। किया और एक कंपनी में नौकरी में लग गया। बेटी भी दसवीं के बाद इंजीनियरिंग के हिसाब से सोचने लगी थी तो उसे अच्छा लगा। कम-से-कम बेटी ने ही सही, उसकी ख़्वाहिश का तो ध्यान रखा। वैसे अब उसे अपने बेटे से भी कोई शिकायत नहीं थी, आख़िर बढ़िया नौकरी में आ गया था और महीने में एक-दो बार घर भी आ जाता था। लेकिन घर आने के बाद भी उसकी ज़्यादा बातचीत वैभव से ही होती थी।

सचिन ने बनारस जाने के बाद एक बढ़िया कोचिंग में ऐडमिशन लिया और अपनी तैयारी में लग गया। कोचिंग दुर्गा कुंड में थी और उसको रहने के लिए कमरा डी एल डब्ल्यू के पास मिला था। रहने की जगह कोचिंग से काफ़ी दूर थी और जाने आने में उसका बहुत समय जाया होता था तो सचिन ने सबसे पहले उससे ही बात की।

"अंकल, मैं सोच रहा हूँ कि एक बाइक ले लूँ, आने-जाने में बहुत समय वेस्ट होता है। अब इसके लिए आपको ही पापा को कहना पड़ेगा, मेरी बात तो वह सुनेंगे नहीं"।

दरअसल वैभव थोड़ा घबराता था कि बच्चों को बाइक दे दी तो कहीं ऐक्सिडेंट वग़ैरा न कर दें। वैसे भी रोज़ ही किसी न किसी बच्चे के दुर्घटना की ख़बर छपती ही रहती थी और उसका कमज़ोर मन सिहर जाता था।

"यार राजीव, आख़िर लोग बच्चों को बाइक देते ही क्यों हैं, देखो रोज़ ही दुर्घटना की ख़बरें आती रहती हैं"। ऐसे में वह अक्सर राजीव की बातों से सहमति व्यक्त करता था, उसे भी लगता था कि बच्चों के हाथ में बाइक देना उचित नहीं है, और अगर देना ही है तो बहुत सँभल कर। लेकिन सचिन ने जब यह बात उससे कही तो उसके दिमाग़ में सिर्फ़ यही आया कि उसका पढ़ाई के लिए समय बचाना बहुत ज़रूरी है।

"मैं बात कर लूँगा और अगर वह आनाकानी करेगा तो मैं ख़रीद दूँगा, तुम चिंता मत करो। लेकिन थोड़ा सँभल कर बाइक चलाना, रोज़ दुर्घटना की ख़बर आती रहती है, दिल बैठ जाता है पढ़कर"।

"अरे अंकल, मुझे कोई रेस थोड़ी न करनी है, बस कोचिंग से घर और घर से कोचिंग। समय का बहुत महत्त्व है इस समय मेरे लिए, आप तो समझते ही हैं"।

और उसी रात उसने वैभव से बात की और उम्मीद के अनुरूप ही उसने मना कर दिया।

"यार तुम तो जानते ही हो, मेरे लिए यह मानना संभव नहीं है। उसको बोलो कोई नज़दीक कमरा ढूँढ़े और वहाँ रहे। या फिर कोचिंग ही बदल ले, बहुत सी कोचिंग हैं बनारस में"।

उस समय उसने ज़्यादा बहस करना ठीक नहीं समझा, थोड़ा समय वैभव को भी देना ज़रूरी लगा उसे। रात में उसने सचिन को मेसेज कर दिया था कि वह चिंता नहीं करे, एक-दो दिन में वह बाइक की व्यवस्था करवा देगा।

अगले दिन फिर उसकी बात वैभव से हुई, आज वह उतना उद्विग्न नहीं दिख रहा था। हाँ उसका विरोध अब भी था लेकिन अब समझाने पर उसके मान सकने की संभावना उसे नज़र आने लगी थी।

"तुम उसकी ज़रूरत को समझो, कोचिंग बदलना तो संभव नहीं है और जगह भी आजकल बच्चों को हर कोई कहाँ देता है। कुछ ही जगहों पर बच्चों को रहने के लिए जगह मिलती है और उसके लिए इस समय जगह ढूँढ़ना संभव है क्या? उसका ध्यान पढ़ाई में लगा रहे, बस इसी की चिंता करने की ज़रूरत है हमको"।

उसके समझाने पर अनमने ढंग से ही सही, वैभव राज़ी हो गया था लेकिन फिर भी उसने स्कूटी पर ही सहमति जताई। और फिर वह ही बनारस गया था सचिन के लिए स्कूटी ख़रीदने। टी।वी एस की सबसे साधारण स्कूटी उसने ख़रीदी और तमाम नसीहतें देते हुए उसके कमरे पर आया।

"देखो बेटा, ये समझ लो कि बहुत मेहनत से तैयार किया है तुम्हारे बाप को, इसलिए बहुत सँभल कर स्कूटी चलाना। अब तुम अपना ध्यान सिर्फ़ पढ़ाई और तैयारी पर दो और किसी भी चीज़ की ज़रूरत होने पर मुझे बेहिचक फोन करना"।

"बिल्कुल अंकल, आप निश्चिन्त रहिए और पापा को भी समझा दीजिए"।

उसके लौटकर आने के बाद कई दिन तक वह रोज़ वैभव से इस बारे में बात करता रहता और उसे समझाता था कि वह चिंता नहीं करे, कोई दिक़्क़त नहीं है।

समय अपनी गति से चलता रहा, वैभव कभी-कभी ही बनारस जाता था, अक्सर वही चला जाता। बनारस जाकर उसके पास ख़ूब समय होता और वह अक्सर शाम को गंगा के घाट पर निकल जाता और चुपचाप उसे बहते देखता रहता। उसकी और सचिन की अक्सर समाज और प्रशासन के बारे में बात होती और दोनों वर्तमान स्थिति से अक्सर असंतुष्ट ही रहते।

"अंकल, आख़िर इस भ्रष्टाचार का कोई अंत होगा या नहीं, आख़िर कब तक हम सब दूसरों को लूटते रहेंगे? सचिन के अक्सर किए जाने वाले इस सवाल पर उसकी निगाहें चमक जातीं।

"बेटे, ज़िंदगी के एक उसूल को हमेशा याद रखना, जो चीज़ ख़ुद को बुरी लगे, वह दूसरों के साथ कभी मत करना। फिर देखना तुम्हारे इस सवाल का भी जवाब तुम्हें दिखाई देगा"।

कभी-कभी वह सचिन के साथ रात को गंगा में नाव से घूमने निकल जाता। अस्सी उन दोनों के लिए सबसे नज़दीक था और हमेशा बहुत सी नौकाएँ घाट से लगी रहतीं। उनको देखते ही मल्लाह दौड़कर उनके पास पहुँचते और आपस में होड़ करने लगते। नाव जब लहरों से छेड़खानी करती हुई बीच गंगा में पहुँचती, सचिन उसे थोड़ी देर तक रुकवा देता। कुछ देर तक नाव वहीं खड़ी झूलती रहती और सचिन उससे कहता “अंकल, इन लहरों के संगीत को सुनकर कितनी शांति मिलती है, आपको भी ऐसा लगता है?

वह ग़ौर से लहरों की आवाज़ सुनने की कोशिश करता लेकिन उसे कुछ समझ नहीं आता। उसका चेहरा देखकर सचिन समझ जाता और कहता “अंकल शायद मुझे इसमें जीवन संगीत सुनाई देता है इसीलिए। ख़ैर यह बताइए कि आपको तैरना आता है या नहीं?

उसे तैरना तो आता था लेकिन अपने गाँव के पोखर में ही, ऐसी नदी में तो डूब ही जाएगा। “मैंने सिर्फ़ अपने गाँव में ही पोखर इत्यादि में तैराकी की है, इस तरह की नदी में तो कभी नहीं उतरा मैं”, उसने मुसकुराते हुए बताया।

सचिन हँसने लगता “बताइए अब अगर अचानक लहरें अपनी मनमानी पर उतर जाएँ तो क्या होगा। आपके साथ मैं भी डूब जाऊँगा, मुझे भी तो तैरना नहीं आता।”

फिर सचिन गंगा का पानी अपने हाथ में लेकर अपने सर पर लगाता और उसी समय वह माँ गंगा से सचिन की कामयाबी और लंबी उम्र की दुआ चुपके-से माँग लेता।

कभी-कभी वह दोनों गंगा के उस पार जाकर रेत में काफ़ी देर तक बैठे रहते। सचिन उससे अपने भविष्य को लेकर ख़ूब बात करता और फिर दोनों अपनी बातों से संतुष्ट वापस लौट आते। ऐसे ही बहुत सी बातें होती थीं उसके और सचिन के बीच में और वह कहीं-न-कहीं सचिन की संवेदनशीलता से संतुष्ट भी रहता।

"जिस लक्ष्य को लेकर तुम चल रहे हो, उसकी तैयारी में तो मुझे कोई संशय नहीं दिखता है लेकिन एक चीज़ मैं ज़रूर कहना चाहूँगा। अपनी इस संवेदनशीलता को कभी तिरोहित मत होने देना, इसकी आगे चलकर बहुत ज़रूरत पड़ने वाली है"।

"अंकल, इसी वजह से तो मैं इस सेवा में जाना चाहता हूँ। और आप इतना भरोसा तो रख ही सकते हैं कि मैं जिस वजह से उस क्षेत्र में जा रहा हूँ, उसे ख़त्म नहीं होने दूँगा", सचिन ने आस्वस्त करती निगाहों से कहा।

अगले कुछ महीनों में वह बनारस जाता रहा, अब सचिन की व्यस्तता पढ़ाई में बढ़ गई थी तो वह अक्सर अकेले ही घाटों के किनारे घूमने निकाल जाता। लेकिन वापसी में वह लंका से लवंगलता लाना नहीं भूलता था जो सचिन को बहुत पसंद था। लवंगलता को देखकर सचिन के चेहरे पर जो ख़ुशी आती थी उसे देखकर उसे सचिन का बचपन याद आ जाता था। बचपन में सचिन लेमनचूस की गोलियों को पाकर ऐसे ही ख़ुश हो जाता था।

दशहरा तो सचिन का बनारस में ही बीत गया, शहर में हर तरफ़ झाँकियाँ सजी हुई थीं और मेले का ज़ोर भी चारो ओर था। गोदौलिया, लहूराबीर, चेतगंज, जहाँ देखा वहीं दुर्गा पुजा की धूम। जगह-जगह रामलीला का मंचन भी हो रहा था जिसे देखने का मौक़ा उसको पता नहीं कितने साल बाद मिला था। और फिर डी एल डब्ल्यू का रावण दहन तो इतना मशहूर था कि उसे देखने आसपास के तमाम जिलों से भी लोग आते थे। सचिन ने पहली बार देखी इतनी भीड़, हर तरफ़ सिर्फ़ सर ही सर, धक्कामुक्की और शोर-शराबा। एक ग्राउंड में रावण, कुंभकर्ण, मेघनाथ इत्यादि के आदमक़द पुतले रखे हुए थे और उसके सामने रामलीला का मंचन चल रहा था। जैसे ही रात होने लगी, राम धनुष बाण लेकर आए और रावण के पुतले की तरफ़ तीर चलाया। अगले कुछ मिनटों में सभी पुतलों में आग लग गई और सब धू-धू करके जलने लगे।

दीपावली के समय सचिन का भी मन था कि वह घर आए और घर पर भी सबकी यही इच्छा थी। आख़िर पहली बार सचिन इस त्योहार पर बाहर था तो वैभव ने उसको बोला कि जाकर सचिन को ले आए। उसकी भी इच्छा हो रही थी एक बार इसी बहाने बनारस जाने की तो वह फटाफट बनारस निकल गया। दीपावली के एक दिन पहले ही वह बनारस सचिन के कमरे पर पहुँचा और तुरंत घर चलने के लिए तैयारी करने लगा। सचिन तो पहले से ही बैग तैयार किए था, दोनों घर के लिए निकल गए।

रास्ते भर सचिन उसे बनारस की रामलीला और दुर्गा पूजा के बारे में बताता रहा और वह ख़ूब मज़े से सुनता रहा। उसने तो अपने समय में कई बार बनारस का दशहरा देखा था और तभी उसे याद आया “सचिन तुमने चेतगंज की नककटैया देखी कि नहीं, बहुत मशहूर है।”

“इस बार तो नहीं देखी अंकल, पढ़ाई भी तो करनी होती है। फिर कभी मौक़ा मिलेगा तो ज़रूर देखूँगा”, सचिन ने जवाब दिया।

“ठीक है, अगर मौक़ा मिलेगा तो रामनगर की रामलीला भी ज़रूर देखना, बहुत बढ़िया होती है”, और वह ख़ुद उसकी याद में खो गए।

तीन दिन कैसे बीत गए, सचिन को पता ही नहीं चला और उसके वापस बनारस जाने का समय हो गया। इसी बीच वैभव ने कई बार उससे पढ़ाई के बारे में पूछा और साथ ही साथ सँभल कर स्कूटर चलाने की हिदायत भी दे डाली। माँ ने तो जैसे क्या कुछ नहीं बनाया उसको ले जाने के लिए, मठरी, गुझिया, आलू के पराठे, खोवे की बर्फी और भी बहुत कुछ। एक बार फिर उसी को सचिन को बनारस छोड़ने जाना पड़ा।

अब सचिन का घर आना लगभग बंद ही हो गया, पढ़ाई जम के होने लगी। वह भी अब बनारस कम ही जाता, उसको लगता कि उसके जाने से सचिन की पढ़ाई में व्यवधान ही पड़ेगा। हाँ फोन तो लगभग रोज़ ही वह करता था और फिर वैभव को भी सब बताता रहता। जनवरी के महीने में अक्सर बनारस में शीतलहर चलती थी और इस साल भी कुछ ज़्यादा ही ठंड पड़ रही थी। कुछ ही दिन पहले वह बनारस जाकर सचिन के लिए ख़ूब मोटी रजाई और ऊनी कपड़े ख़रीद आया था। सर पर लगाने के लिए जब उसने मंकी कैप ख़रीदा तो सचिन ने मना कर दिया “क्या अंकल, यह बुड्ढों वाला कैप कौन लगाता है आजकल, आप ही पहनो इसे। मेरे लिए मफ़लर ख़रीद दो, वही ठीक रहेगा।”

आख़िरकार उस मंकी कैप को उसे अपने पास ही रखना पड़ा। घर आकर उसने वह मंकी कैप वैभव को पकड़ा दिया और हँसते हुए बोला “सचिन ने यह कैप तुम्हारे लिए ख़रीदा है, कह रहा था कि पापा को बहुत ठंड लगती है, उनको दे दीजिएगा।” वैभव ने मुसकुराते हुए मंकी कैप लेकर सर पर लगा लिया।

उधर सचिन को शाम को कोचिंग जाते समय तो ज़्यादा दिक़्क़त नहीं होती लेकिन वापसी के समय तक तो कुहरे के चलते सड़क पर कुछ नहीं दिखता था। जिस चार-पाँच किलोमीटर को अक्सर वह 10 से 15 मिनट में पूरा कर लेता था, उसे पूरा करने में अब कभी-कभी 1 घंटा भी लगने लगा। इस 1 घंटे में वह बहुत झल्ला जाता था, उसे लगता कि जिस वजह से उसने ज़िद करके स्कूटी ख़रीदी, वही बेकार हो रहा है। एक दिन उसने राजीव को फोन पर कहा भी कि “अंकल आजकल आने में बहुत देर हो जाती है, टाइम मैनेजमेंट गड़बड़ हो जाता है”, तो उसने समझाया कि कुछ ही दिन में कोहरा ख़त्म हो जाएगा।

उस दिन भी सचिन कोचिंग से रात में लौट रहा था, सड़क जैसे कोहरे की चादर में लिपटी हुई थी। बहुत प्रयास के बाद भी सचिन को सामने कुछ नहीं दिख रहा था लेकिन रास्ता तो रोज़ का ही था इसलिए उसे सड़क का अंदाज़ा था। ठंड उसके बदन को कंपा दे रही थी और यही सोचकर उसने स्कूटी की स्पीड बढ़ा दी। लेकिन जैसे ही उसने बी। एच। यू। पार किया, सामने से आ रही ट्रक से उसकी स्कूटी की टक्कर हो गई। ट्रक वाला तो टक्कर मारकर भाग गया लेकिन सचिन काफ़ी देर तक उसी ठंड में बुरी तरह ज़ख़्मी हालत में पड़ा रहा।

रात के लगभग ग्यारह बजे उसका फोन बजा, इस भयानक ठंड में कौन हो सकता है सोचते हुए उसने फोन उठाया तो सचिन का नाम दिखा। उसने फोन उठाया और कुछ कहता उसके पहले ही सामने वाले के स्वर ने उसे सिहरा दिया “मैं बी। एच। यू। के इमरजेंसी से बोल रहा हूँ, इस फोन पर आख़िरी काल आपका ही था इसीलिए आपको फोन लगाया। इस लड़के का एक्सिडेंट हो गया है और गंभीर हालत में इसे यहाँ भर्ती किया गया है। आप जितनी जल्दी हो, पैसे का इंतज़ाम करके आ जाइए।”

उसके जिस्म में जैसे ख़ून ही नहीं रह गया, हाथ काँपने लगा और शरीर उस ठंड में भी पसीने से लथपथ हो गया। “सचिन ठीक तो है न, हम लोग तुरंत आ रहे हैं। आप जवाब क्यों नहीं देते, हॅलो, हॅलो”, उधर से फोन कट गया और वह रजाई फेककर बाहर भागा। हड़बड़ी में स्टूल पर रखा लोटा गिरा और उसकी आवाज़ से पत्नी जग गई।

“क्या हुआ, देखकर चला कीजिए”, पत्नी की बात का उसने कोई जवाब नहीं दिया और वह भागकर उसके पास पहुँचा “सचिन का एक्सिडेंट हो गया है, बी। एच। यू। में भर्ती किया है उसे, मैं वैभव को लेकर तुरंत बनारस जाता हूँ। तुम यहाँ सबका ध्यान रखना।” उसकी आवाज़ लड्खड़ाने लगी और वह जल्दी-जल्दी स्वेटर पहनकर मफ़लर लपेटने लगा, उस समय मफ़लर को लपेटना भी उसे बहुत कठिन काम लग रहा था। पत्नी को हक्का-बक्का छोड़कर वह बाहर निकला, चारो तरफ़ कुहासे ने एक सफ़ेद चादर बिछा रखी थी, एक हाथ को दूसरा हाथ भी नहीं सूझ रहा था।

वैभव के दरवाज़े तक पहुँचने में वह दो जगह गिरा, लेकिन फिर फुर्ती से उठकर भागा। उसका घर भी सन्नाटे में डूबा था, कहीं से किसी भी तरह की रोशनी नहीं दिखाई दे रही थी। दरवाज़े को बुरी तरह पीटते हुए उसने वैभव को आवाज़ लगाना शुरू किया “वैभव, वैभव, जल्दी दरवाज़ा खोलो।” और वह तब तक दरवाज़ा पीटता रहा जब तक घबराए हुए वैभव ने दरवाज़ा खोल नहीं दिया।

अगले कुछ घंटे क़यामत के थे, वह कैसे वैभव को लेकर बनारस पहुँचा और कैसे बी। एच। यू। के इमरजेंसी वार्ड में गया, उसे कुछ याद नहीं। इमरजेंसी वार्ड में पता चला कि सचिन को ऑपरेशन थियेटर में ले गए हैं, सर पर गंभीर चोट लगी है और ख़ून काफ़ी बह गया है। वैभव तो जैसे संज्ञाशून्य हो गया और उसको वैभव को भी सँभलना पड़ रहा था। अगले दिन दोपहर होते होते घर से और लोग भी आ गए और रिशतेदारों का आना-जाना भी शुरू हो गया।

शाम को जब डॉक्टर ने बताया कि सचिन कोमा में चला गया है, ख़ून की भी ज़रूरत है तो उसके शरीर का ख़ून जैसे सूख गया। उसका बेटा राहुल भी आ गया और उसने ख़ून की व्यवस्था की। डॉक्टर ने बहुत थोड़ी ही उम्मीद जताई लेकिन उसके अंदर एक भरोसा था कि सचिन को कुछ नहीं होगा।

“डॉक्टर साहब, चाहे जो करना पड़े, कीजिए लेकिन सचिन को बचा लीजिए”, जैसे ही डॉक्टर सामने दिखा, वह दोनों हाथ जोड़े उसके सामने खड़ा था।

“हम लोग पूरी कोशिश कर रहे हैं, लेकिन कुछ कह नहीं सकते। एक बार वह कोमा से बाहर निकाल जाएगा, फिर कुछ भी संभव है। आप लोग हिम्मत मत हारिए।”

डॉक्टर ने तो कह दिया लेकिन आज उसे पहली बार अपनी हिम्मत पर डर लग रहा था। पिछले दस बारह घंटों में उसने किस भगवान या देवी देवता को याद नहीं किया। वह वैभव की उपस्थिति को लगभग भूल ही गया था तभी उसकी पत्नी ने उसे समझाया “अगर तुम ही हिम्मत हार जाओगे तो वैभव को कौन सँभालेगा। जाकर उसे सँभालो, मैं यहाँ बैठी हूँ।”

उसके दिमाग़ में उसी समय यह बात आई कि वैभव को सँभलना सबसे ज़रूरी है। एक बार तो उसके दिमाग़ ने उसको ही अपराधी ठहरा दिया कि सचिन को स्कूटी तो उसने ही ख़रीदी थी, वैभव ने तो मना ही किया था। अब ऐसे में उसे तो अपना होशोहवास क़ायम रखना होगा, बस किसी तरह सचिन ठीक हो जाए। वह लपककर बाहर निकला, वैभव बाहर एक कुर्सी पर ढहा हुआ था। उसने जाकर वैभव का हाथ अपने हाथ में लिया और काँपते शब्दों में बोला “सचिन ठीक हो जाएगा वैभव, मुझे अपने भगवान पर पूरा भरोसा है।” उसके शब्द आज उसका ही साथ नहीं दे रहे थे लेकिन उसको हिम्मत रखना ही पड़ेगा, ऐसा सोचते हुए उसने वैभव को कसकर पकड़ लिया।

धीरे-धीरे पंद्रह बीस दिन बीत गए, शहर के सभी अच्छे डॉक्टर सचिन को देख चुके थे और यहाँ तक कि लखनऊ के भी कुछ डॉक्टर से उसकी बात हुई। सचिन पर किसी भी दवा का सकारात्मक असर नहीं हो रहा था और वह कोमा में ही पड़ा था। दोस्त और रिश्तेदार भी धीरे-धीरे वापस जाने लगे और उसने किसी को भी रुकने के लिए नहीं कहा। अब बस उसके और वैभव के घर के ही लोग लंका पर एक लॉज में रुके हुए थे। उसकी पत्नी सचिन की माँ को सँभाल रही थी और वह वैभव को। समय के साथ-साथ अब सबने इस चीज़ को अंदर ही अंदर स्वीकार करना शुरू कर दिया था कि आगे कुछ भी घट सकता है।

दो दिन पहले डॉक्टर ने उसे बुलाया और एक तरफ़ ले जाकर बोला “आपको पता नहीं अहसास है कि नहीं लेकिन सचिन किसी भी दवा पर रेस्पोंड नहीं कर रहा है। उसका ब्रेन, किडनी काम नहीं कर रहा है लेकिन उसके रिकवर होने के चांसेस अब नहीं हैं। मेरी दिल्ली के डॉक्टर से भी बात हुई है, उसने भी रिपोर्ट देखने के बाद मना कर दिया है। चूँकि आप ही सब कुछ देख रहे हैं इसलिए मैं आपको बता रहा हूँ। अब आपलोग जितने दिन चाहें उसे ऐसे ही रख सकते हैं, लेकिन उससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला है। मुझे यह कहते हुए बहुत कष्ट हो रहा है लेकिन अब कोई और रास्ता नहीं बचा है। मैं जो कहना चाह रहा हूँ, उम्मीद है आप समझ रहे हैं, अब आगे आप लोगों की मर्ज़ी।”

डॉक्टर ने जो नहीं कहा था वह भी उसे समझ में आ गया लेकिन यह बात वह वैभव से कैसे कहे। किसी पिता से यह कहना कि आपका बेटा अब मौत से हार चुका है और उसे शरीर त्यागने की अनुमति दिया जाए, सोचकर ही वह काँप उठता था। लेकिन अब और कोई रास्ता भी तो नहीं था, एक पूरा दिन और रात उनके दिमाग़ में इन्हीं विचारों का मंथन चलता रहा।

कल फिर उन्होने डॉक्टर से पूछा कि क्या कोई और तरीक़ा नहीं है जिससे कुछ उम्मीद बढ़े तो उसने फिर से मना कर दिया। डॉक्टर ने उससे स्पष्ट कह दिया कि सचिन के शरीर से लाइफ़ सपोर्ट हटा दिया जाए और उसकी मौत को स्वीकार कर लिया जाए। अब वह क्या करे, वैभव को कैसे कहे, सचिन की माँ से तो इस विषय में कुछ कहने की हिम्मत उसमें नहीं थी। कल रात में सबके जाने के बाद उसने वैभव से इस विषय पर बात करने के बारे में सोचा था लेकिन काफ़ी देर तक इधर-उधर की बात करने के बाद भी उसका साहस जवाब दे गया। लेकिन इस बीच दो चीज़ें तो उसे स्पष्ट हो गई थीं, एक तो यह कि सचिन को स्कूटी दिलाने के लिए वैभव या उसके घर के किसी भी सदस्य के मन में उसके प्रति कोई ग़लत भावना नहीं थी। सबने इसे नियति समझकर स्वीकार कर लिया था और दूसरी बात यह कि सचिन अब ठीक नहीं हो पाएगा। लेकिन फिर भी किसी से यह कहना कि उसके बेटे को मरने दिया जाए, सोचकर ही उसका दिल काँप जाता था।

आज दिनभर वह अपने आपको मानसिक रूप से तैयार करता रहा और रात को 8 बजते बजते सबको उसने हॉस्पिटल से वापस भेज दिया। आज वैभव भी कुछ ठीक लग रहा था और उससे उसने काफ़ी बातचीत की। बात-बात में उसने वैभव से कहा “वैभव, तुम्हारा बेटा राहुल तो ठीक है, मेरे बेटे सचिन को पता नहीं किसकी नज़र लग गई। अब राहुल को मैं पूरी तरह से तुम्हारे हवाले करता हूँ, मेरी क़िस्मत में जो लिखा होगा, मुझे मंज़ूर है।”

वैभव को समझ में आ गया कि वह क्या कह रहा है, उसने एक गहरी साँस ली और ऊपर देखते हुए बोला “भाग्य और ऊपर वाले की मर्ज़ी के आगे किसका बस चला है। देखते हैं हमारे नसीब में क्या लिखा है।”

वैभव के साथ-साथ उसकी आँख से आँसू टपक गए लेकिन उसने ही वैभव को सँभाला। रात में किसी तरह उसने वैभव को खाना खिलाया और अपने भी दो चपातियाँ खाईं। अब उसे इंतज़ार था कि कब वह वैभव से यह बात कहे। इसी उधेड्बुन में रात के दो बज गए, उस समय हॉस्पिटल में अजीब-सा सन्नाटा था मानो पूरे हॉस्पिटल में उन दोनों के सिवा और कोई भी नहीं है। उसने एक बार वैभव के कंधे पर हाथ रखा, वैभव ने उसकी तरफ़ पलटकर देखा। अब अपने मन को कड़ा करते हुए उसने वैभव को बाहर चलने के लिए कहा।

हॉस्पिटल से बाहर निकलकर उसने वैभव का हाथ अपने हाथ में लिया और धीरे-से बोला “मैं जो कहने जा रहा हूँ, उसे कहने में मेरा कलेजा फट रहा है, लेकिन इसे जितनी जल्दी मान लिया जाए, उतना अच्छा। डॉक्टर ने अपनी तरफ़ से हर कोशिश कर ली है और यह तुम भी देख रहे हो। अब सचिन का सिर्फ़ शरीर ही बेड पर पड़ा है, उसे वापस पाना हमारे लिए संभव नहीं है।” इतना कहकर वह रुका और अपने आँख के कोरों पर आए आँसुओं को पोछते हुए वैभव को देखने लगा। वैभव की सूनी आँखें उसके मन का हाल बता रही थीं, उसने बेचारगी और निराशा से उसकी तरफ़ देखा और सुबकने लगा। थोड़ी देर तक वह वैभव की पीठ सहलाता रहा और जब उसकी हिचकियाँ कम हुईं तो वहाँ पर मौजूद एक बेंच पर वैभव को बिठाकर वह सामने खड़ा हो गया।

“अब और कोई रास्ता नहीं बचा है वैभव, डॉक्टर का भी यही कहना है। अब हम सचिन के शरीर को अनावश्यक कष्ट दे रहे हैं, उसकी मृत्यु को आसान बनाने की ज़रूरत है, डॉक्टर की बात मान लेने में कोई बुराई नहीं है।” इतना बोलने के बाद उसने वैभव के कंधे पर सर रखा और कुछ देर यूँ ही बैठा रहा।

पिछले कुछ दिनों में वैभव भी यह समझ गया था, डॉक्टर ने उससे भी इशारे इशारे में ये सब बातें बता दीं थी। अब उसके सामने भी कोई रास्ता बचा नहीं था, उसने भरी आँखों से उसकी तरफ़ देखा और धीरे-से अपना सर हिला दिया। उसने वैभव की तरफ़ हाथ जोड़ा और उसके कंधे को दबाता हुआ उठ खड़ा हुआ।

“अब जो होना था वो तो हो गया लेकिन तुम अपने दिल में सचिन को स्कूटी दिलाने के लिए कोई मलाल मत रखना”, वैभव ने लड़खड़ाते हुए यह कहा तो दोनों दोस्त एक-दूसरे से लिपटकर रोने लगे। काफ़ी देर तक उनकी सिसकियाँ उस सन्नाटे को चीरती रहीं, उसके सीने से एक बोझ उन आँसुओं के साथ बह गया।

"एक बात और कहनी थी वैभव, सचिन के कुछ अंग दान किए जा सकते हैं जो किसी को नया जीवन दे देंगे। डॉक्टर इस बारे में कई बार बता और पूछ चुके हैं, अगर तुम्हें ऐतराज न हो तो यह कर दिया जाए"।

वैभव ने उसकी तरफ़ देखा और अपना सर सहमति में हिला दिया। दोनों दोस्त कुछ पल बाद वहाँ से उठे और अंदर डॉक्टर के पास चल दिए।

                    

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