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Tuesday, October 26, 2021

सैलाना की यात्रा--यात्रा संस्मरण

 वैसे तो मध्य प्रदेश में बहुत से दर्शनीय स्थल हैं और ऐसे भी हैं जो बहुत प्रसिद्द हैं. उदहारण के तौर पर हम अगर सबसे मशहूर जगह की बात करें जहाँ सबसे ज्यादा विदेशी सैलानी भी आते हैं तो "खजुराहो" इसमें निर्विवाद रूप से सबसे आगे होगा. प्रदेश की राजधानी भोपाल के आस पास भी एक से बढ़कर एक दर्शनीय स्थल हैं जिनमें एक तरफ प्राचीन भोज मंदिर है तो दूसरी तरह "भीम बैठका" है जहाँ महाभारत कालीन गुफाएं हैं और बड़े बड़े पत्थरों पर प्राचीन कालीन भित्तिचित्र बने हुए हैं. खैर इस प्रदेश में जहाँ भी जाईये, कुछ न कुछ दर्शनीय नजर ही आ जाता है लेकिन मशहूर जगहों के साथ एक बड़ी दिक्कत यह भी है कि वहां जाने पर भीड़ भाड़ का सामना करना पड़ जाता है. कोविड के पहले तो भीड़ भाड़ से कोई परेशानी नहीं थी और चाहे कितनी भी भीड़ हो, लोग मजे में घूमते फिरते थे. लेकिन कोविड संकट के बाद सबसे बड़ा दर भीड़ को देखकर ही लगने लगा है और सभी लोग ऐसी जगहों से बचना चाह रहे हैं जहाँ जाने पर ज्यादा भीड़ का सामना करना पड़े.

अब ऐसे में एक चीज लोगों को खूब भा रही है और वह है ऐसी जगहों पर घूमना जहाँ भीड़ भाड़ नहीं हो. कम से कम कोविड की चिंता तो नहीं रहेगी और घूमने फिरने का कोटा भी पूरा हो जाएगा जो पिछले लगभग डेढ़ सालों से बचा हुआ है. ऐसी ही जगह की तलाश में हमें याद आया रतलाम से लगभग 25 किमी दूर एक शांत लेकिन बेहद रमणीय जगह "सैलाना" जहाँ जाना तो हर सैलानी को चाहिए लेकिन बहुत कम लोग ही जाना पसंद करते हैं. दरअसल वहां न तो कोई ऐसा प्रसिद्द मंदिर है जहाँ भक्तों का सैलाब उमड़े और न ही कोई ऐसा हिल स्टेशन या प्राकृतिक पर्यटन स्थल जो बहुत मशहूर हो. इस जगह के बारे में वैसे तो मुझे पिछले दो साल से पता था और मैं पिछले साल एक बार दो तीन घंटे के लिए वहां गया भी था लेकिन इसे पूरी तरह देखने का लोभ मन में बना हुआ था. खैर इस बार दो अक्टूबर को गाँधी और शास्त्री जयंती के कार्यक्रम के बाद रविवार पड़ा और फिर से इस रमणीक लेकिन बहुत कम मशहूर जगह जाने की इच्छा बलवती हो गयी. एक बार वहां मौजूद दोस्त से फोन पर बात हुई और जब उसने बताया कि वह भी सैलाना में ही मौजूद है तो फटाफट वहां जाने का कार्यक्रम बन गया. 

सुबह साढ़े आठ बजे उज्जैन से निकलने का कार्यक्रम बनाया गया था जो लगभग नियत समय पर ही प्रारम्भ हो गया. पहले तो यात्रा में हम तीन ही हुआ करते थे लेकिन पिछले आठ महीने से हमारा कुत्ता 'सोबो" भी हर सफर का हिस्सा बन गया है. दो घंटे के सफर के पश्चात हम जब रतलाम पहुँचने ही वाले थे तो इच्छा हुई कि चाय पीकर फिर आगे बढ़ा जाए. अब एक बार चाय की तालाब लग गयी तो फिर बिना उसे पिए आगे बढ़ना थोड़ा मुश्किल हो जाता है. रास्ते में एक अच्छा सा होटल दिखा जहाँ रुक कर हमने पूछा कि क्या चाय मिलेगी तो रिसेप्शन पर बैठे कर्मचारी ने हाँ में सर हिलाया और रेस्टॉरेंट में न जाकर वहीं चाय पीने के लिए कहने लगा. हमारे लिए तो ठीक ही था, वहीं पर रखे बढ़िया सोफे पर बैठकर हम चाय का इन्तजार करते हुए आगे की यात्रा के बारे में बात करने लगे. थोड़ी देर में चाय आ गयी और चाय के साथ चीनी का पाउच भी प्लेट में रखा था. अब अगर अलग से चीनी का पाउच रखा हो तो हम यही सोचते हैं कि चाय बिना शक्कर की होगी. इस लिहाज से हमने एक पाउच फाड़ा और उसे चाय के कप में डाल दिया. इसी दरम्यान बेटी ने चाय का घूंट बिना शक्कर डाले लिया तो उसे चाय काफी मीठी लगी. उसने तुरंत मुझे टोका लेकिन तब तक मैं शक्कर चाय में डाल चुका था. अब मैंने भी चाय का घूंट लिया तो काफी मीठी चाय थी, बस गनीमत यही थी कि जो शक्कर मैंने डाली थी उसे कप में मिलाया नहीं था. अब मुझसे रहा नहीं गया और मैंने रिसेप्शन वाले से पूछ ही लिया कि अगर चाय पहले से ही मीठी थी तो अलग से पाउच क्यों दिया. और अगर अलग से दे भी दिया तो कम से कम बताना तो था कि चाय मीठी है, आप की इच्छा हो तो आप और शक्कर डाल सकते हैं. अब वह बेचारा क्या कहता, उसने रेस्टॉरेंट में फोन करके पूछा और बाद में झेंपते हुए बोला कि मैं आपके लिए दूसरी चाय बनवा देता हूँ. हमने भी हँसते हुए कहा कि कोई जरुरत नहीं है, चलो इसी बहाने कम से कम बढ़िया मीठी चाय तो पीने को मिली. 

इसके बाद हम लोग अगले 45 मिनट में सैलाना पहुँच गए और फिर एक जगह नाश्ता करने के बाद हमारा सैलाना भ्रमण प्रारम्भ हो गया. दरअसल सैलाना शहरी भीड़भाड़ से दूर एक आदिवासी क्षेत्र है जहाँ प्रकृति अपने बेहद खूबसूरत और सौम्य रूप से मौजूद है. चारो तरफ न तो कोई शोरगुल और न ही कोई प्रदूषण, बस हरियाली, पहाड़, झरने, मंदिर और छोटी छोटी नदियां जो बरसात के मौसम में कलकल करती बहती रहती हैं और बाकी मौसम में सूख जाती हैं. सबसे पहले सैलाना के मशहूर "कैक्टस गार्डन" में जाना था लेकिन रास्ते में ही बाजार के मध्य में हमें रुकना पड़ गया. उस समय एक जुलूस निकल रहा था जो आसाराम बापू के लिए था. बाद में मुझे पता चला कि यहाँ पर आसाराम के बहुत से शिष्य हैं और उनके आश्रम में सैकड़ों बीघा जमीं इत्यादि भी है. खैर लोग आज भी आसाराम को गुनहगार मानने के लिए तैयार नहीं हैं, यह भी एक आश्चर्य का विषय है. 

सैलाना पैलेस का कैक्टस गार्डन, जो न सिर्फ मध्य प्रदेश का सबसे बेहतरीन गार्डन है (एक समय में यह एशिया का सबसे अच्छा कैक्टस गार्डन माना जाता था), बल्कि हिन्दुस्तान का सबसे पुराना भी है  यह सैलाना महल के पीछे के हिस्से में मौजूद है जिसकी एक बार फिर से देखभाल की जा रही है ताकि ज्यादा से ज्यादा संख्या में लोग यहाँ देखने के लिए आएं. वैसे महल का एक हिस्सा भी अब होटल के रूप में तब्दील किया जा रहा है जिससे कि रतलाम में रुकने वाले लोग भी सैलाना के महल में ही रुकें और पुराने वैभव को महसूस कर सकें. गार्डन में लगभग 45 मिनट बिताने के बाद हम लोग वहां से निकले और सबसे पहले "अडवानीय केदारेश्वर" मंदिर गए जो जमीं से लगभग 100 मीटर अंदर स्थित है. मंदिर के पास जाते समय ही एक झरने की आवाज आने लगी और जैसे ही हम नीचे पहुंचे, एक खूबसूरत झरना मंदिर के सामने स्थित तालाब में गिर रहा था. मौसम भी अब काफी सुहावना हो गया था और बादलों के चलते धूप का नामोनिशान नहीं था. मंदिर पर लगभग 25 लोग ही मौजूद थे और इस लिहाज से उसे भीड़ नहीं कहा जा सकता था. बस माहौल ऐसा था कि वहां से हिलने का मन नहीं कर रहा था, झरना, पहाड़, मंदिर के घंटे की आवाज और आँखों को सुकून देती हरियाली. लेकिन अभी सैलाना को पूरा देखना था और लगभग 12 बज रहे थे तो वहां से मन मारकर निकलना ही पड़ा. इसबीच वहां खूब सारे फोटो खींचे गए और वहां की यादों को मन में सजोंकर हम आगे बढ़े. अब आगे सैलाना के आस पास के पहाड़, जंगल और हरियाली को देखना था और किसी रमणीक स्थल पर भोजन करने का लुत्फ़ भी उठाना था. हम लोग केदारेश्वर से भेरूघाटा की तरफ बढ़े जहाँ एक घाटी जैसी जगह से नीचे का पूरा क्षेत्र एक हरे भरे कैनवास की तरह दिखाई पड़ रहा था. चारो तरफ हरियाली, पहाड़, बीच में पानी से लबालब एक डैम ऐसे दिख रहा था जैसे किसी चित्रकार ने अपनी कूंची से एक बेहतरीन चित्र बनाया हो. हम लोग काफी देर ताका वहां खड़े होकर इस बेहतरीन और बिलकुल शांत खूबसूरती को निहारते रहे. लगभग आधे घंटे खड़े रहने के दरम्यान न तो कोई गाड़ी वहां से गुजरी और न ही कोई शोर शराबा, अगर कुछ था तो हवा की सरसराहट, पक्षियों की आवाज और वहीं पास के एक आदिवासी के झोपड़े के पास खेलते हुए कुछ बच्चों की कुतूहल भरी आवाज. बच्चे भी कौतुहल से हमें देख रहे थे और शायद आपस में एक दूसरे से पूछ भी रहे थे कि यहाँ हमारी शांति को भांग करने ये कौन से लोग आ गए हैं. बहरहाल हम लोग वहां से आगे बढ़े और थोड़ी दूर जाने पर एक और आदिवासी गांव पड़ा. लगभग सभी घर कच्चे थे, बीच बीच में कुछ ईंट के बिना पलस्तर के मकान भी बने दिखाई दिए और पूछने पर पता चला कि ये मकान राज्य सरकार के द्वारा चलाये गए एक योजना के तहत बैंकों से ऋण देकर बनवाये गए हैं. उन मकानों को देखकर सहज ही अंदाजा लग जाता है कि किसी भी राज्य सरकार या केंद्र सरकार की योजना का क्या हश्र होता है. भ्रष्टाचारी बाबुओं के चलते शायद ही कोई योजना उस तरह से लागू हो पाती है जिसकी कल्पना उसकी योजना बनाते समय की जाती है. यकबयक ही अपने भूतपूर्ण प्रधानमंत्री स्व श्री राजीव गाँधी का एक बहुचर्चित कथन याद आ गया जो इसी सिलसिले में कहा गया था. उसी समय एक टेम्पो ने ध्यान भंग किया और जब साथ वाले व्यक्ति ने उस पर बैठे लोगों की संख्या की तरफ ध्यान दिलाया तो ऑंखें खुली की खुली रह गयी. जितने लोग टेम्पो के अंदर बैठे थे, उससे ज्यादा टेम्पो के ऊपर बैठे थे और मैंने आजतक एक टेम्पो में इतने ज्यादा व्यक्ति बैठे हो सकने की कल्पना भी नहीं की थी, देखना तो दूर की बात है. अंदाजन लगभग 30 लोग तो रहे ही होंगे उस टेम्पो में और जितने भी बैठे थे, सब ख़ुशी ख़ुशी जा रहे थे, किसी को भी इस तरह से सफर करने का कोई अफ़सोस नहीं था. साथ चल रहे मित्र ने बताया कि यह क्षेत्र राजस्थान का बॉर्डर है और यहाँ पर चाहे टेम्पो हो या जीप हो, सभी पर ऐसे ही लोग सफर करते हैं. बाद में हमें ऐसी तमाम जीपें जाती दिखाई पड़ीं जिसमें जितने लोग नीचे बैठे थे, कमोबेश उतने ही लोग ऊपर भी बैठे थे. एक दो किस्से भी याद आ गए, पहला किस्सा तो बिहार का था जहाँ हमने बस पर सबसे पहले लोगों को ऊपर ही बैठते देखा था. मतलब जैसे ही वहां बस रूकती थी, लोग सबसे पहले ऊपर छत पर जाकर बैठते थे, बाद वाले बस के अंदर बैठते थे. वह दृश्य भी हमारे लिए बिलकुल गुरुत्वाकर्षण बल के विपरीत जैसा ही था क्योंकि मैं जहाँ से हूँ, वहां लोग अव्वल तो बस के छत पर यात्रा करते ही नहीं हैं और अगर करते भी हैं तो पहले लोग बस के अंदर घुसते हैं और जगह नहीं होने की स्थिति में ही बस की छत का रुख करते हैं. दूसरा किस्सा हमारे नौकरी के दरम्यान का ही याद आया जब बनारस में हमारे एस्टीम कार में लगभग 12 बच्चे बैठकर एक हॉस्टल गए थे और जब वहां एक एक करके बच्चे बाहर निकलने लगे तो लोगों का हँसते हँसते बुरा हाल हो गया था. इस हैरतअंगेज नज़ारे को देखकर हम लोग उसी सड़क पर आगे बढ़े और हमारी मंजिल पर बोरखेड़ा तथा सकरवाड़ा था. बोरखेड़ा से आगे बढ़ते ही सड़क के दोनों तरफ ऊँचे ऊँचे पहाड़ नजर आये जिसपर मंदिर बने हुए थे. अब सोचा गया कि इन्हीं पहाड़ों में से किसी एक पर चढ़ा जाए और जाने के रास्ते की जानकारी के लिए वहीं सड़क के किनारे स्थित एक किसान के घर के सामने हम लोग रुके. पुरानी किताबों में वर्णित किसी भी आम किसान का घर जैसा होता है बिलकुल वैसा ही घर था उस किसान का. घर के सामने कुछ मुर्गे मुर्गियां टहल रही थी, एक तरफ कुछ बकरियां भी घास चार रही थीं और दो भैंस तथा कुछ गायें भी घर के सामने बंधी हुई थीं. चारो तरफ खेत और हरियाली तथा उसके बीच अपने घर में सर पर पगड़ी बांधे मौजूद वह किसान. उसने बड़े प्यार से एक पहाड़ी पर जाने का रास्ता समझाया और इसी बीच मैंने उससे उसके बैंकिंग के बारे में भी पूछ लिया. खैर इस बातचीत में जो बात मुझे पता चली उसने मन को गुस्से और दर्द से भर दिया जो बहुत देर तक मुझे सालता रहा. दरअसल उसने बताया कि उसका ऋण खाता सैलाना में ही स्थित किसी और बैंक में है और जिस एजेंट ने उसे ऋण दिलवाया था, उसने एक बड़ी रकम रिश्वत के तौर पर हड़प ली थी. उस किसान की स्थिति को देखने के बाद मुझे लगा कि जिसने भी ऐसे व्यक्ति से रिश्वत लिया होगा, वह निश्चित रूप से इंसान तो नहीं ही होगा, अलबता उसे भेड़िया जरूर कहा जा सकता है. खैर मैंने अपने मित्र को कहा कि वह उसकी बैंकिंग सम्बन्धी जो भी मदद हो सकती है, वह जरूर करे और हम मन में एक तीस लेकर आगे बढ़ गए.

थोड़ी दूर पर ही पहाड़ी थी और उसके बगल से ऊपर जाने के लिए एक कच्चा रास्ता था. उस रास्ते पर जीप ही जा सकती थी और हमारे मित्र की एस यू वी भी बड़े आराम से ऊपर चली गयी. हम लोग तो पैदल ही आनंद लेते हुए ऊपर पहाड़ी पर पहुंचे जहाँ से एक बार फिर चारो तरफ का दृश्य इतना खूबसूरत था मानों हम सब चम्बा में आ गए हों. थोड़ी देर बाद ही नजर पड़ी मंदिर के आसपास बकरी और गाय भैंस चराते बच्चों पर जो मजे में वहां खेल रहे थे और उनके जानवर अपने हिसाब से हरी घांस का सेवन कर रहे थे. पहाड़ी के ऊपर से चारो तरफ घूम घूमकर हमने सैलाना की हरियाली को निहारा और फिर यह निश्चित हुआ कि भोजन भी वहीं उस शानदार वातावरण में किया जाए. ऊपर एक हैंडपम्प भी लगा हुआ था जिसे चलने पर ठंडा जल निकला जो पीने में बहुत बढ़िया था. अभी हम लोग साथ लायी दरी को बिछाने ही जा रहे थे कि मौसम ने एकदम से करवट लिया और बूंदाबांदी होने लगी. दूर दूसरी पहाड़ी के पीछे काले काले बादल दिखाई पड़ रहे थे जिससे यह स्पस्ट था कि उस तरफ बरसात हो रही थी और यहाँ भी किसी भी वक़्त मूसलाधार बरसात हो सकती है. अब हम लोग थोड़ा उदास हो गए कि शायद इस पहाड़ी पर भोजन करने का सूख नहीं मिल पायेगा. लेकिन चंद मिनटों में ही बूंदाबांदी कम हो गयी और वहीं पर मौजूद एक पेड़ के नीचे हम लोगों ने चटाई बिछायी और फटाफट भोजन के लिए बैठ गए. भोजन में ठेठ राजस्थानी स्वाद था, दाल बाफले के साथ कढ़ी थी और प्याज तथा मिर्ची के भजिये थे. अमूमन राजस्थान के नजदीक के इलाके में यह भोजन किया जाता है लेकिन ये लोग मिर्ची और मीठा बहुत ज्यादा इस्तेमाल करते हैं. जैसे ही हमने दाल को चखा, खांसी आने लगी और आंख तथा नाक से पानी गिरने लगा, दाल बहुत ज्यादा तीखी थी और बड़ी मिर्च के भजिये मानों और डरा रहे थे. खैर कढ़ी ने थोड़ी राहत दी और हम लोग बमुश्किल एक बाफले दाल और कढ़ी के साथ खा पाए. बस भजिये खूब सारा खाया गया क्योंकि मिर्च के साथ साथ सादे भजिये भी थे और उनको खाने में बहुत आनंद आया. अक्सर ऐसे समय में जो होता है, वही हुआ और ढेर सारा भोजन बच गया. फिर हम लोगों ने वहां खेल रहे बच्चों को आवाज देकर बुलाया और उनको भोजन दे दिया कि वह जहाँ चाहें इसे खा लें. बच्चों ने भोजन लिया और उसे लेकर दूसरी तरफ निकल गए जहाँ उन्होंने तसल्ली से बैठकर खाया होगा. इस बीच बकरियों को देखकर सोबो भौंक रहा था जिसके चलते कुछ कुत्ते भी वहां पहुँच गए लेकिन किसी ने भी सोबो को डराने का प्रयास नहीं किया. भोजन करने के बाद तथा सारा कूड़ा एक बड़े से बैग में भरकर हमने गाड़ी में डाल लिया और उस पहाड़ी पर कम से कम २०-२५ पेड़ अपनी तरफ से लगाने का प्राण लेकर हम लोग नीचे उतरे. नीचे सड़क के पास एक झोपडी थी जहाँ आते समय कोई मौजूद नहीं था लेकिन इस समय एक बुजुर्ग किसान बढ़िया पगड़ी बांधे बैठा हुआ था और कुछ दूर पर उसकी बकरियां चर रही थीं. मैंने अपनी आदत के मुताबिक उस किसान से बात करने की सोची और मुझे लगा कि इस झोपडी में रहनेवाला और अपनी बकरियां चराने वाला किसान कोई छोटा मोटा किसान होगा. जब मैं उसके पास पहुंचा तब वह जमीन पर बैठकर बीड़ी पी रहा था. मैंने जब उनसे पूछा कि क्या मैं आप से बातचीत कर सकता हूँ तो वह हड़बड़ा कर अपनी बीड़ी फेंकने के लिए उद्यत हुआ. मैंने कहा कि आप तसल्ली से बीड़ी पी लो फिर बात करते हैं तो उसने बीड़ी के दो कस खींचे और बात करने लगा. मैंने उससे उसकी बकरियों के बारे में पूछा तो उसने बताया कि पहले एक बकरी थी और धीरे धीरे काफी हो गयी. फिर उसने बताया कि कई बकरों और बकरियों को वह अच्छे दामों में बेच भी चूका है. मैंने जब पूछा कि बरसात में आपकी झोपड़ी तो टपकती होगी तो उसने हंसकर इंकार कर दिया. थोड़ी देर की बातचीत के बाद ही मेरा भ्रम चकनाचूर हो गया जब उसने बताया कि उसके पास काफी खेत है और उसकी पिकअप वैन भी चलती है. अब मैंने पूछ ही लिया कि अगर इतना कुछ है तो आप इस टूटी सी झोपडी में क्यों रहते हो तो उसने बताया कि यह झोपडी तो बस यहाँ आकर लेटने के लिए है. उसका घर सड़क के उस पार थोड़ी दूर पर था जो उसने दिखाया. उसके बाद मैंने झोपड़ी के अंदर जाकर देखा, एक खटिया पड़ी हुई थी जो उसके लेटने के लिए थी. आखिर में जब मैंने उससे पूछा कि वह किस बैंक से अपनी बैंकिंग करता है तो उसने हमारे बैंक का ही नाम लिया और हमारे साथ मौजूद एक स्टाफ को पहचान भी लिया. फिर उस स्टाफ ने भी बताया कि यह दादा बैंक आते रहते हैं और इनका हमारे यहाँ ठीकठाक खाता है. उन्होंने फसल ऋण तथा गाड़ी का ऋण भी हमारी बैंक से ही लिया था और यह बात मेरे लिए काफी सुकून पहुंचाने वाली थी. फिर हम लोग वहां से निकले और अपनी अपनी गाडी लेकर मुख्य मार्ग पर आ गए जहाँ से हमारी मंजिल आगे आने वाला गांव था. 

एक बार फिर हम लोग हरे भरे रास्तों और पहाड़ों के बीच से निकलते हुए आगे बढे, थोड़ी दूर आगे जाने पर एक घाटी जैसा नजारा था जहाँ से नीचे एक बड़ा सा तालाब जिसपर बांध बना हुआ था, नजर आया. दूर पहाड़ भी दिखाई दे रहे थे और एक तरफ जंगल भी था. लोगों ने बताया कि एक समय था जब प्रदेश के मुख्यमंत्री इसी जगह पर रात बिताने आते थे और ग्रामीणों से उनके दुःख दर्द भी सुनते थे. अब खैर दुःख दर्द तो क्या ही सुनते रहे होंगे लेकिन इसी बहाने इस जिले के अधिकारियों के लिए एक हफ्ते का हाड़तोड़ परिश्रम जरूर हो जाता रहा होगा. एक बार इच्छा हुई कि किसी तरह वहां से नीचे उतरा जाए और उस डैम को पास से देखा जाए लेकिन फिर लगा कि वहां तक पहुंचना मुश्किल होगा. दरअसल बरसात के चलते रास्ता बहुत अच्छा नहीं रह गया था और कुछ किमी शायद पैदल भी चलना पड़ता. हमारे साथ के एक व्यक्ति ने किसी परिचित को फोन लगाने का प्रयास किया जिससे कि उस डैम तक जाने में मदद मिले लेकिन उनके फोन में नेटवर्क गयाब था. फिर मैंने अपने फोन से काल किया तो फोन लग गया लेकिन फोन उनके बच्चे ने उठाया और बताया कि उसके पिताजी कहीं गए हैं और फोन उसके पास है. खैर इस कोविड काल में पढ़ाई के लिए ये स्मार्ट फोन ही काम आये और बहुत से लोगों ने अपने फोन बच्चों को दे दिए जिससे कि वह पढ़ाई जारी रख सकें. बहरहाल वहां जाने का इरादा त्यागकर हम लोग आगे बढे और आगे जाकर एक जगह हमारी गाड़ी रुक गयी. सामने एक जगह थी जहाँ सड़क के ऊपर से पानी बाह रहा था और वहां कोई छोटी सी पुलिया भी थी. अब हमें तो अंदाजा नहीं लग रहा था कि वास्तव में सड़क पर कितना पानी है और हम सोच ही रहे थे कि इतने में सामने से एक चरवाहा अपने गाय भैंस के साथ उस पानी भरे पुल को पार करते हुए हमारी तरफ आने लगा. इसी बीच में एक मोटरसाइकिल सवार भी उस पानी भरे सड़क से गुजर गया तो हमें तसल्ली हुई कि हम सब भी निकल सकते हैं. आगे कई गांवों से गुजरते हुए हम एक ऐसे इलाके में पहुंचे जहाँ सड़क के किनारे बहती हुई नदी बहुत छिछली थी और वहां आसानी से पानी में उतरा जा सकता था. वहां पर हम लोगों ने अपनी गाड़ियां रोकीं और फिर धीरे धीरे पानी में उतर गए. पानी में जो पत्थर थे उसपर फिसलन काफी थी और हम लोग कई बार फिसलने से बचे भी. लेकिन फिर हमने उसे पार किया और उस तरफ जाकर कुछ समय बिताया. इस बीच वहां कुछ बच्चे भी आ गए थे और वे हमें कुतूहल से देख रहे थे मानों हम किसी और गृह के प्राणी हों. वैसे उनका कौतुहल जायज ही था क्योंकि उनके लिए तो हम लोग सचमुच किसी अन्य लोक के ही निवासी थे जिनके पास सभी भौतिक सुख सुविधाएँ उपलब्ध थीं.

लेकिन जो चीज उनके पास थी, हम उसी की तलाश में उस क्षेत्र में भटक रहे थे और वह चीज थी "सुकून, शांति, प्रकृति का सानिध्य और स्वच्छ हवा". खैर चलते समय हमने उन बच्चों को बिस्किट का पैकेट पकड़ाया जिससे हम यह महसूस कर सकें कि हमने उनको थोड़ा तो दिया. उसी दरम्यान वहां पर एक ग्रामीण कुछ पूजन की सामग्री ले आया था और पूछने पर उसने बताया कि यहीं सड़क पर वह पूर्वजों के लिए पूजा पाठ करेगा. 

वहां से जब हम आगे बढे तो जंगल शुरू हो गया था और साथ चल रहे लोगों ने बताया कि यहाँ पर जानवर भी मिलते हैं. खैर वहां ग्रामीणों के घर पर बहुत से मवेशी थे और कभी कभी एकाध बकरी इत्यादि जानवर उठा ले जाते थे. लेकिन ऐसा बहुत कम ही होता था, दरअसल जानवर भी सबसे ज्यादा हम इंसानों से ही डरते हैं और यथासंभव हमसे दूर ही रहने में अपनी भलाई समझते हैं. इसी बीच हमारे मित्र ने एक दिलचस्प लेकिन खतरनाक किस्सा सुनाया, खतरनाक उनके लिए था लेकिन हमें सुनने में बहुत दिलचस्प लगा. एक बार वह अपने एक साथी के साथ, ऐसे ही किसी गांव में जो जंगल के आसपास था, गया जहाँ पर किसान से मिलने के लिए उसके खेत पर जाना पड़ा. वहां उसने ध्यान दिया कि खेत के बीचोबीच एक गड्ढा जैसा इलाका है जहाँ सोयाबीन नहीं लगी है. उसे कौतुहल हुआ तो उसने उस किसान से पूछ लिया. जवाब में किसान ने जो बताया उसे सुनकर उसके होश उड़ गए "क्या बताएं साहब, यहाँ पर कुछ दिन पहले दो शेर लड़े थे जिसके चलते वहां की फसल नष्ट हो गयी" और उसने उस जगह को वैसे ही खाली छोड़ दिया. अब हमारे मित्र की हालत खराब हो गयी कि कहीं वे शेर दुबारा जोर आजमाईस करने इसी जगह आ गए तो क्या होगा. और उन्होंने किसान को सलाम किया और तुरंत नौ दो ग्यारह हो गए. अब ऐसे में हम भी रहे होते तो उस गांव की तरफ अगले एक साल भी अपना रुख नहीं करते.

पीछे दो घंटे में हम जहाँ भी थे वहां पर फोन का नेटवर्क भी नहीं था इसलिए बाहरी समाज से हमारा संपर्क बंद था. जैसे हम लोग थोड़ा बाहर आये, फोन के मैसेज टन ने बता दिया कि हमारी शांति भंग होने का समय वापस शुरू हो गया है. अब ऐसे इलाकों में जहाँ फोन का नेटवर्क भी नहीं आता हो, वहां बैंकिंग सेवा भी देना एक दुरूह कार्य है. इसलिए इन गांव के लोगों को नदी और पहाड़ पार करके मीलों दूर बैंक या अन्य सरकारी कार्यालय आना पड़ता है. इसका एक दूसरा पहलू भी है कि इन गांवों के ऐसे लोग जिनको सरकार द्वारा छोटी मोटी पेंशन जैसे वृद्धावस्था पेंशन इत्यादि लेने के बहाने ही गांव से निकल कर शहर या कस्बे में आते हैं और वापस जाते समय घर के बच्चों के लिए कुछ मिठाई या खिलौने ले जाते हैं. तभी हमारे एक साथी के फोन पर कोई काल आया और वह एक जगह के बारे में बात करने लगा जहाँ पर उस फोन करने वाले से मुलाकात हो सके. थोड़ी देर में हम कुछ अन्य गांवों को पार करते हुए एक और पुलिया के पास पहुंचे जहाँ एक सज्जन मोटरसाइकिल से हमारा इन्तजार कर रहे थे. उनके पास लौकी जैसी कोई सब्जी थी जिसके बारे में हमें बाद में पता चला कि इसे "बालम खीरा" कहते हैं. कोई भी व्यक्ति उसे पहले नजर में लौकी ही समझेगा क्योंकि वह लौकी जितना बड़ा होता है और उसका रंग भी बिलकुल वैसा ही होता है. इस सीजन में ही यह एक गांव "बालम" में खूब पैदा होता है और वहां से व्यापारी इसे थोक भाव में खरीदकर महानगर भेज देते हैं. वैसे हमारे लिए इस खीरे को देखने का यह पहला ही अवसर था, पढ़ा तो मैंने इसके बारे में पहले भी था. 

अब हम सर्वं गांव से होते हुए अपनी आखिरी जगह की तरफ बढ़ चले जो "कोटड़ा केदारेश्वर" था. शाम होने लगी थी और वापस उज्जैन भी आना था इसलिए हम लोग जल्दी जल्दी वहां पहुंचे. यह भी एक मंदिर है जो पहाड़ी के बीच में जमीं से लगभग 500 मीटर नीचे स्थित है और इस मंदिर के सामने भी एक झरना अपनी पूरी खूबसूरती से गिर रहा था. नीचे एक गुफा थी और उसी में मंदिर था तथा मंदिर के दूसरी तरफ एक और झरना गिर रहा था. मंदिर के अंदर से गिरते हुए झरने के संगीत को महसूस करना बहुत अद्भुत अनुभव था और हम लोग काफी देर तक वहीँ खड़े रहे. इसी बीच ढेर सारी तस्वीरें भी ली गयीं और हम लोगों ने खूब आनंद उठाया. हम लोग जब वापस मंदिर से निकलकर ऊपर आये तो एक साथी ने कहा कि हम लोग दूर बाह रहे उस दूसरे झरने तक जा सकते हैं. अब ऐसा अवसर मिले तो भला हम उसे कैसे जाने देते इसलिए हम लोग तुरंत उस दूसरे झरने को नजदीक से देखने के लिए निकल गए. चारो तरफ पहाड़, बीच में खेत और झरने के जल द्वारा बानी हुई एक संकरी नदी, कुल मिलाकर एक अविष्मरणीय दृश्य था और नखें इसे देखकर भरती नहीं थीं. यही सब निहारते हुए हम लोग उस दूसरे झरने तक पहुंचे और उसके जल में हाथ और पैर धुलने का लोभ संवरण नहीं कर पाए. थोड़ी देर वहां बिताने के बाद यह एहसास हो गया कि अगर हम दिल की बात सुनेंगे तो यहाँ से जाने की इच्छा नहीं होगी. लेकिन दिमाग की बात सुनते हुए हम लोग वहां से वापस आये क्योंकि उज्जैन भी जाना था. वहां से निकलकर हम लोग लगभग दो किमी आये और फिर वहां से हमारे रास्ते अलग हो गए, हम लोग उज्जैन के लिए रावण हो गए और वे लोग सैलाना निकल गए.

वापस आते समय दिल एक तरफ तो बहुत प्रसन्न था कि आज प्रकृति के सचमुच पास वक़्त गुजरने का मौका मिला था लेकिन वह समय इतना कम था कि हमने भविष्य में एक बार और वहां जाने और एक रात उस आदिवासी क्षेत्र में बिताने के बारे में भी सोच लिया. अब देखते हैं कि वह मौका कब आता है लेकिन उम्मीद है कि जरूर आएगा और फिर उस यात्रा संस्मरण को शब्दों में ढालने का प्रयास किया जाएगा. 


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