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Wednesday, November 16, 2022

कुत्ता/गुबार--लघुकथा

 रोज शाम को अपने बच्चे के साथ मोहल्ले में टहलना उसकी आदत में शुमार था. या यूँ कहें कि घर आते ही बच्चा घूमने के लिए मचलने लगता था और जब तक वह बच्चे को घुमा नहीं लेता था तब तक न तो बच्चे को और न उसे ही चैन मिलता था. आज भी जब वह बच्चे के साथ बाहर निकला तो अचानक उसकी नजर अपने एक कलीग पर पड़ी जिसे उसके ऑफिस के अधिकांश लोग नापसंद करते थे. इसकी वजह थी उसकी बॉस को खुश रखने के लिए कुछ भी करने की आदत जिसे बाकी लोग नहीं कर पाते थे.

तक़रीबन उसी समय पड़ोसी का बहुत प्यारा सा पपी भी बाहर निकला जिसे देखते ही उसका बच्चा बेहद खुश हो जाता था. आज भी जैसे ही बच्चे ने पपी को देखा, उसने आदतन कहा "पापा, पापा, देखो तो क्या है?

वह सोच ही रहा था कि रोज की ही तरह कहे कि 'पपी" लेकिन लेकिन उसकी नजर कलीग की तरफ पड़ गयी और उसके मुंह से बेसाख्ता निकल गया "कुत्ता".  

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