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Wednesday, October 4, 2023

असर- लघुकथा

 आज बहुत दिनों बाद कमल को दिन भर बढ़िया सवारी मिली थी, उसे याद ही नहीं था कि पिछली बार कब उसे इतना पैसा मिला था. हाथ में आये पैसे को उसने तीन बार गिना तब जाकर उसे यक़ीन हुआ कि सचमुच उसके हाथ में इतना पैसा है. वैसे जबसे बैटरी वाला ऑटो आया है, लोग उसी से ज्यादा सफर करते हैं, सस्ता जो पड़ता है. आज तो अपनी महीनो पुरानी हसरत को वह पूरी करेगा, अंग्रेजी वाली पियेगा, कितने दिनों से बस देसी का पौआ ही ले पा रहा था. एक बार घर के लिए भी कुछ लेने का ख्याल दिल में आया लेकिन उसने झटक दिया कि कल देखेंगे. उसने ऑटो को मालिक के यहाँ खड़ा किया और बाहर निकला. 

बाजार में आते ही एक टी वी के दुकान के सामने भीड़ दिखी तो उसे लगा कि वही क्रिकेट आ रहा होगा. वैसे भी उसकी जिंदगी में इन चीजों के लिए कोई जगह नहीं थी. बस कभी कभी बीवी और तीन बच्चों को लेकर बाजार आ जाता था ताकि उनको कुछ दिला सके, लेकिन अक्सर खाली हाथ ही लौटना पड़ता था. वह एक बार दुकान के सामने रुका और उसने पूछ लिया "क्या हो गया, क्रिकेट आ रहा है का".

एक आदमी ने जवाब दिया "तुमको पता नहीं है, आज हमारा चंद्रयान चन्द्रमा पर पहुँच गया है".

उसने थोड़े गौर से टी वी को देखा, लोग खूब खुश होकर कुछ बात कर रहे थे. फिर एक तस्वीर दिखी जिसमें बहुत सी महिलाएं थीं. वहीं खड़े लोग बता रहे थे कि ये महिलायें वैज्ञानिक है जिन्होंने चंद्रयान के लिए काम किया है. उसे अपने स्कूल की याद आयी जहाँ उसने सूर्य, चन्द्रमा और ग्रहों के बारे में सुना था.

वह वहां से आगे बढ़ा, अंग्रेजी वाली दुकान थोड़ी दूर पर थी और वह उधर ही जा रहा था. अचानक उसकी नजर एक किताब कॉपी की दुकान पर पड़ी जहाँ उसके बेटी की उम्र की कुछ लड़कियाँ कुछ खरीद रही थीं. उसे याद आया कि पत्नी सुबह बेटी के लिए किताब लेने के लिए कह रही थी. थोड़ी देर वह वहीं खड़ा रहा, एक बार उसने अंग्रेजी वाली दुकान की तरफ देखा, फिर उसके कदम किताब की दुकान की तरफ बढ़ गए. 

Friday, July 28, 2023

कहानी--

"खर्र खर्र" की आवाज ने आज फिर शनिचरी देवी को जगा दिया, बाहर नजर डाला तो वही औरत बड़ी तल्लीनता से झाड़ू लगा रही थी. वैसे तो वह बहुत जल्दी ही उठ जाती हैं लेकिन कभी कभी आँख लग जाती है और आज भी लग गयी थी. फरवरी महीने के आखिरी हफ्ते में सुबह सुबह कुहासा देखकर उनको आश्चर्य होता है, कैसा तो मौसम हो गया है, गर्मी शुरू होने के समय भी ठण्ड पड़ रही है. खैर हलकी ठण्ड उनको अच्छी ही लगती है, वैसे भी पहले उनको कहाँ फ़र्क़ पड़ता था ठंडी और गर्मी से. साल के एक दो महीने छोड़कर उनको अलसुबह उठने की आदत थी, उनको ही क्या, उनके पूरे गांव को इसकी आदत थी. पर्दा लगाकर सोना उनके लिए जैसे क़ैद में सोने के बराबर था लेकिन इस शहर के उसूल कुछ अलग थे, वह भूल भी जाएँ तो घर का कोई न कोई सदस्य आकर पर्दा खींच ही देता था. और जिस दिन छोटी नातिन "कुहू" रात में पर्दा लगाने आ गयी, उस दिन तो मानों वह उनकी ही दादी बन जाती थी. कितनी सलाहें अपनी छोटी उम्र के लिहाज से वह दे जाती थी और उनको भी लगता था मानों वह भूल कर रही हों, भला सोने से पहले पर्दा गिराना कोई कैसे भूल सकता है.

कुहू का ख्याल आते ही उनके चेहरे पर मुस्कान तैर गयी, कितनी प्यारी बच्ची है बिलकुल छुईमुई जैसी. वह बार बार उनको टोकती है "दादी आप हमेशा साड़ी ही क्यों पहनती हो, मम्मी की तरह सूट क्यों नहीं पहनती आप? वह हंस कर टाल देती हैं, क्या बताएं उस बच्ची को. उनका सच कुहू स्वीकार ही नहीं करती है कि उनको साड़ी के सिवा कुछ भी पहनने नहीं आता, अपनी जिंदगी में कभी पहना हो तब तो. बहुत छोटी थीं तब फ्रॉक पहनती थीं, उसके बाद तो बस साड़ी ही पहना उन्होंने. बस साड़ी की क्वालिटी बदलती गयी समय के साथ, अब बढ़िया वाली पहनती हैं लेकिन ये बढ़िया साड़ी थोड़ी खटकती है उनको. जैसी जिंदगी उन्होंने देखी थी, कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उनका भी ऐसा समय आएगा. 

कई बार उनके मन में आता कि उस झाड़ू लगाने वाली को बुलाकर उससे बात करें, उससे कुछ पूछें. लेकिन जिस परिवेश में वह आजकल रह रही थीं, उसमें उनको यह संभव नहीं लग रहा था. ऐसा नहीं था कि उनको कोई कष्ट था, बेटा बड़ा अफसर था, सरकारी गाड़ी मिली हुई थी और बड़ा सा घर था. जितनी सुविधाओं के बारे में वह सोच सकती थीं, वह तो उनके नौकर को ही मिली हुई थी. उनकी अपनी सुविधाएँ तो कल्पनातीत थीं, सचमुच अकल्पनीय. उनकी नजर फिर से बाहर चली गयी, वह औरत अब सारा कचरा एक जगह इकठ्ठा कर रही थी जिसे बाद में एक गाड़ी आकर ले जायेगी. उनके देखते ही देखते उस औरत ने कचरा इकठ्ठा किया, फिर अपने कपडे झाड़कर आगे बढ़ गयी. वह उसे दूर तक देखती रहीं जब तक वह आँख से ओझल नहीं हो गयी.

उसके जाते ही वह वापस आकर बिस्तर पर लेट गयीं, अभी घर के सभी लोगों को जगने में घंटों बाकी था. उनको यह बिलकुल समझ में नहीं आता था कि आखिर सोने के समय जागकर और जागने के समय सोकर इन लोगों को क्या मिलता है. गांव में तो सब मुंह अँधेरे ही जग जाते थे और सूरज जरा सा चढ़ा नहीं कि लोग घर वापस भी आने लगते थे. वैसे भी उनको याद है कि कैसे घर के बूढ़े बुजुर्ग कहता थे कि देर तक सोने से घर में दलिद्दर (गरीबी) का वास होता है. अब ये बात दीगर है कि उनकी कई पुश्तें सुबह जल्दी उठती रहीं लेकिन दरिद्दर ने उनका साथ कभी नहीं छोड़ा. खैर इस बारे में सोचते सोचते उनका दिमाग गाँव पहुँच गया, वह पुराने दिनों में खो गईं. उनका गाँव उस समय विकास की रौशनी से कोसों दूर था, न बिजली बत्ती, न सड़क और न ही पास में कोई स्कूल. छप्पर के घर, मिटटी से लिपी दीवारें और बाहर कीचड़ और गन्दगी. जब वह पैदा हुईं थीं तो घर में कोई भी शिक्षित नहीं था, दरअसल किसी ने स्कूल का मुँह ही नहीं देखा था. उनके गाँव में उस समय भी स्कूल जाने पर लोगों में दहशत थी जो कई सालों पहले उनके वर्ग में से किसी के बच्चे के स्कूल जाने पर हुई बेरहम पिटाई की देन थी. आज उनको लगता है कि शायद उनके समय में भी उनकी बिरादरी के लोग अगर स्कूल का मुंह देखे होते तो यह दलिद्दर बहुत पहले ही उनका पिंड छोड़ चुका होता. 

घर में माँ, बापू, तीन बहनें और दो भाई थे, वह सबसे छोटी थीं इसलिए उनके समय तक स्थितियों में थोड़ा बहुत परिवर्तन आने लगा था. बापू प्रधान के यहाँ जानवरों की देखभाल करते थे, उनके लिए चारा काटना, उनको नांद पर बांधना, पानी देना, गोबर उठाना और फिर बचे हुए समय में खेत पर जाकर काम करना. बापू को बस उपले पाथने का काम नहीं करना होता था क्योंकि वह माँ के जिम्मे था. अपने खेत के नाम पर लगभग दो तीन बिस्वा खेत था जो गाँव के दूसरी तरफ था, कुछ सब्जी भाजी उसमें उग जाती थी. दो तीन बकरियाँ, कुछ मुर्गी मुर्गे और एक झबरा कुत्ता जो हर समय अपने शरीर को खुजलाया करता था. अगल बगल के घर भी कमोबेश ऐसे ही थे और सबकी माली हालत एक सी ही थी. सड़क के उस पार ऊँची जातियों के घर थे जहाँ जीवन काफी बेहतर था और वो भी अक्सर प्रधान के घर अपनी माँ के साथ चली जाती थीं. भेदभाव हर जगह था, घरों में, जीवन में, रहन सहन में और यहाँ तक कि उन बेजान सडकों में भी जो उनकी तरफ बहुत खराब थीं और दूसरी तरफ बढियाँ. 

गाँव के अन्य पुरुषों की ही तरह शनिचरी के बापू भी देसी शराब के गुलाम थे, अक्सर रात में नशे में धुत्त होकर आना और फिर हो हंगामा करके सो जाना. सुबह फिर तड़के उठकर प्रधान के घर निकल जाना, शायद ही कभी दिन में बापू घर पर नजर आते हों. समय गुजरता गया और वह जब थोड़ी बड़ी हुई तो बाकी बहनों की ही तरह उनकी शादी के लिए भी लड़का देखा गया. कुछ महीने बाद वह अपने ससुराल चली गयी जो संयोग से उनके गाँव से काफी दूर था, नहीं तो बाकी बहनों की शादी आस पास के गाँव में ही हो गयी थी. उनकी ससुराल शहर से नजदीक था इसलिए वहां उतनी ख़राब स्थिति नहीं थी. लगभग हर घर में बिजली का एक बल्ब जलता था और किसी किसी घर में एक टेबल फैन भी था. उनको ऐसा लगा जैसे वह अँधेरे देश से निकल कर उजालों के देश में आ गयी. बस एक चीज दोनों जगह ही थी, गरीबी और ज़हालत. उसके पति भी खेतों पर काम करते थे लेकिन उस गाँव के कुछ बच्चे स्कूल भी जाते थे. लिहाजा जब उनके घर रग्घू पैदा हुआ तो उसे तमाम मुश्किलों के बावजूद भी स्कूल भेजने में उन्होंने कोई कोताही नहीं की. वैसे तो रग्घू के बाद तीन और बच्चे पैदा हुए थे लेकिन बचा सिर्फ दीनदयाल ही, बाकी दोनों लड़कियाँ छुटपन में ही परलोक सिधार गयीं. वैसे तो कहा जाता है कि लड़कियाँ लड़कों से ज्यादा जिन्दा रहती हैं लेकिन उनके यहाँ ऐसा नहीं हुआ. 

"लड़कियाँ तो कठकरेजी होती हैं, हर हाल में जी लेती हैं", ऐसा उन्होंने कई बार सुना था, खैर अब तो उनकी शक्ल भी याद नहीं है उनको. अब दुःख तो उनको बहुत हुआ था लड़कियों के इस तरह असमय गुजर जाने का लेकिन उस समाज में शायद ही कोई लड़कियों की मृत्यु पर शोक मनाता था. दोनों लड़के पढ़ने में ठीक थे इसलिए उनको पढ़ाने में शनिचरी देवी को कोई दिक्कत नहीं हुई. समय पर स्कूल भेजना, उनके लिए चाहे टिफ़िन में रोटी और अचार ही देना हो लेकिन देती जरूर थीं. उस समय स्कूल में कोई ड्रेस का चलन नहीं था इसलिए उस समस्या से बच गयीं थीं वरना आजकल तो ड्रेस के मद में ही रग्घू अच्छा ख़ासा खर्च कर देता है. फीस भी नहीं लगती थी इसलिए स्कूल नहीं भेजने का कोई भी कारण उनके घरवालों के पास नहीं था, ये अलग बात थी कि कई बार उन्होंने घरवालों को कहते सुना था कि पढ़ लिखकर अफसर थोड़े ना बनेंगे ये बच्चे. शायद यही कारण था कि उनके मन में बच्चों को अफसर बनाने की सोच प्रगाढ़ हो गयी और फिर उन्होंने तब तक दम नहीं लिया, जब तक उन्होंने बच्चों को अपने पैरों पर खड़ा नहीं कर दिया.

"गुड मॉर्निंग दादी", कुहू की आवाज उनको वर्तमान में ले आयी, वह मुस्कुरा उठीं. अब कुहू को उसकी भाषा में ही जवाब देतीं तो वह एकदम से खिल उठती. लेकिन शहर में आने के बाद खड़ी हिंदी तो फिर भी उन्होंने सीख लिया था लेकिन वह चाह कर भी अंग्रेजी के कुछ शब्द भी नहीं बोल पाई. कभी कभार यूँ ही कुहू की नक़ल करते हुए "गुद मारनी" बोल देती जिसे सुनकर कुहू हंसकर लोटपोट हो जाती. उन्होंने उठकर कुहू को अपनी गोद में ले लिया और प्यार से उसको एक स्नेहिल चुम्बन दे दिया. 

"स्कूल की तैयारी हो गयी बच्ची", कुहू को वह प्यार से बच्ची ही बुलाती थीं. 

कुहू कस कर हंसी "क्या दादी, आज तो संडे है, आज कौन सा स्कूल चलता है".

ओह, आज रविवार है, उनको ध्यान ही नहीं था. मतलब आज रग्घू और बहू देर तक सोयेंगे इसलिए चाय बना लेनी चाहिए. 

"मैं तो भूल ही गयी थी बच्ची कि आज रविवार है. फिर तो आज खूब मजा आएगा", उनको भी छुट्टी का दिन कुहू के चलते ही ज्यादा अच्छा लगता था, दिन भर वह उनके आसपास ही घूमती रहती थी. 

रविवार कैसे बीत गया, उनको पता ही नहीं चला. अच्छे दिन शायद दुगुनी रफ़्तार से बीतते हैं, और उनके तो सबसे अच्छे दिन चल रहे थे. रात में सोते समय पता नहीं क्यूँ उनकी आँखों के सामने फिर से उसी औरत का चेहरा तैर गया जिसे वह झाड़ू लगाते देख चुकी थीं. शायद अपने आप को उससे जुड़ा हुआ महसूस कर रही थीं या उससे थोड़ी सहानुभूति हो गयी थी, लेकिन जो भी हो अब उससे बात करने की इच्छा उनके मन में प्रबल होती जा रही थी. घर में काम करने वाले किसी भी नौकर से उसकी जाति के बारे में पूछना उनको उचित नहीं लगता था क्योंकि रग्घू या बहू कभी भी इस तरह की कोई बात घर में नहीं करते थे. लेकिन दोनों सभी नौकरों से एक निश्चित दूरी जरूर रखते थे और उसके चलते उनको भी कभी नौकरों से खुलकर बात करने का मौका नहीं मिलता था. लेकिन झाड़ू लगाने वाली औरत के बारे में वह मन ही मन निश्चिन्त थीं कि वह तो उनकी ही बिरादरी की होगी.

जब मन में कोई उधेड़बुन चल रही हो तो नींद भी उतनी अच्छी नहीं आती है और यही उनके साथ भी हुआ. अगले दिन अलसुबह ही उनकी नींद खुल गयी और उन्होंने पर्दा हटाकर बाहर देखा. अभी भी हल्का कुहासा फैला हुआ था और झाड़ू लगाने वाली औरत नहीं आयी थी. लेकिन घड़ी की सुईयों से उनको समय का अंदाजा हो गया और उस औरत के आने का समय भी. उन्होंने हाथ मुंह धोया और दरवाजा खोलकर बाहर निकलीं, अंदर सभी लोग गहरी नींद में सो रहे थे. थोड़ी देर तब वह सामने के चबूतरे पर बैठी रहीं, दिमाग में बहुत कुछ चल रहा था. उस औरत से बात करना उनको तो अच्छा लगेगा लेकिन क्या रग्घू और बहू को ठीक लगेगा. रग्घू के बारे में तो फिर भी उनको थोड़ा भरोसा था कि उनके इस बात का वह बहुत बुरा नहीं मानेगा, और अगर उसे बुरा भी लगेगा तो वह माँ को प्यार से समझा देगा. लेकिन बहू के बारे में सोचकर वह परेशान हो गयीं, बहू जिस घर से आयी थी, वह घर शुरू से ही संपन्न था और उसके माता पिता की हैसियत उन लोगों से बहुत ज्यादा बेहतर थी. वो तो रग्घू की नौकरी थी जिसके चलते वो लोग खुद ही उनके पास रिश्ता लेकर आये थे वर्ना उनको बहू के घर जाने की हिम्मत ही नहीं पड़ती. घर में कभी भी अपने समाज के बारे में कोई भी चर्चा बेटा बहू नहीं करते थे और अगर कभी गलती से उनके मुंह से कुछ ऐसा निकल भी जाता था तो दोनों चुप्पी लगा जाते थे. 

सामने से जब वही औरत हाथ में लम्बा झाड़ू लेकर आती दिखाई दी तो उनकी तन्द्रा टूटी. उसने एक तरफ से झाड़ू लगाना शुरू किया और सड़क पर बेतरतीब फैले कचरे को एक तरफ धकेलते हुए उनके पास आ गयी. उन्होंने साड़ी के पल्लू से अपनी नाक ढक ली नहीं तो धूल से उनको छींक आनी शुरू हो जाती. उस औरत ने एक बार उनकी तरफ देखा फिर अपने काम में लगी रही, उसे इस बात में कोई दिलचस्पी नहीं थी कि आखिर शनिचरी देवी यहाँ किस लिए बैठी हैं. अव्वल तो उसने कभी देखा भी नहीं था इसलिए जानने का सवाल ही नहीं था और अगर देखा भी होता तो भला कैसे पूछती. 

उन्होंने ही बात करने की गरज से कहा "अरे माई, तुम्हारा नाम क्या है". 

उस औरत को शायद सुनाई नहीं दिया या फिर उसने जान बूझकर अनसुना कर दिया. कुछ पल बाद उन्होंने फिर से तेज आवाज में उसकी तरफ देखकर पूछा "अरे तुम्हारा नाम क्या है माई, रोज यहाँ झाड़ू लगाते देखती हूँ".

अब वह औरत रुकी, उसने झाड़ू को कमर से टिकाया और शनिचरी देवी की तरफ मुखातिब हुई "हमारा नाम राजवंती है अम्मा, लेकिन तुमको तो पहले कभी नहीं देखा? 

"लेकिन हम तो तुमको रोज देखते हैं, नियम से यहाँ झाड़ू लगाती हो", शनिचरी देवी ने मुस्कुराते हुए कहा.

"और हम सामने वाले घर में रहते हैं, हमारा बेटा यहाँ का बड़ा अफसर है", ऊँगली से अपने घर की तरफ इशारा करते हुए शनिचरी देवी ने कहा.

वह औरत थोड़ा संकोच में पड़ गयी, उसे पता था कि सामने वाले बंगले में कोई बड़ा अधिकारी रहता है. वैसे तो वह पूरा इलाका ही ऐसे लोगों का निवास था जो सरकारी विभाग में बड़े ओहदे पर थे. लेकिन आखिर ये हमसे बात करने क्यों आयी हैं, उस औरत को समझ नहीं आया. उसने थोड़े अदब से सर झुकाया और शनिचरी देवी की तरफ हाथ जोड़ दिया, मन में संशय भी था कि कहीं सफाई में कोई कमी तो नहीं रह गयी. 

शनिचरी देवी की इच्छा तो हुई कि वह उसका हाथ पकड़ लें और साथ में चबूतरे पर बैठाकर हाल चाल पूछें, लेकिन उन्होंने अपने आप को रोका और आराम से पूछा "तुम्हारे घर में और कौन कौन हैं, हमेशा अकेले ही देखा है तुमको?

वह औरत अब आराम से खड़ी हो गयी, उसे समझ में आ गया कि हर हालत में इनके सवाल का जवाब देना ही होगा.   

"मेम साहब, हमारा पूरा परिवार यहाँ रहता है, आदमी भी साफ़ सफाई का काम करता है और हमारे ससुर भी साथ ही रहते हैं. तीन बच्चे हैं, दो बड़ा वाला लड़का पास के सरकारी स्कूल जाता है, लड़की अभी छोटी है".

उस औरत ने अपने परिवार के बारे में सब बता दिया और उसे लगा कि बात ख़त्म हो गयी तो वापस से झाड़ू को हाथ में लेकर आगे बढ़ने को उद्यत हुई.

"अरे, अपने बच्चों की पढ़ाई लिखाई का पूरा ध्यान देती हो ना, बहुत जरुरी है?, अभी भी सनीचरी देवी उसे जाने देने के मूड में नहीं थीं. पढ़ाई का फायदा उनसे बेहतर कौन समझ सकता था, इसलिए पढ़ाई की बात करना वह नहीं भूलीं. अभी भी सुबह का सूरज दिखाई नहीं पड़ रहा था और उनके पास समय था, पता नहीं बेटा और बहू जग गए तो बात कर पाएं या नहीं.

"हाँ मेम साहब, बच्चों की पढ़ाई तो चल रही है, अब हमको तो ज्यादा पता नहीं है और न हमारे आदमी को. हम लोग पढ़े लिखे होते तो समझ पाते, बाकी किताब कॉपी सब स्कूल से मिल जाता है", राजवंती अब समझ गयी कि इनसे बात करने में कोई दिक्कत नहीं है.

"ठीक है, कोई दिक्कत हो तो बताना, हम कोशिश करेंगे मदद की", शनिचरी देवी उठ खड़ी हुईं और राजवंती को ऐसी नजर से देखा कि उसे उनकी बात पर भरोसा हो जाए. वह अपने घर की तरफ मुड़ी और जब तक अंदर नहीं चली गयीं, राजवंती उनको देखती रही.

शायद ये सचमुच कुछ मदद करें, उसने एक बार सोचा लेकिन फिर पहले के कड़वे अनुभव को याद करके उसने सर झटक दिया और वापस झाड़ू लगाने लगी.

कुछ दिन ऐसे ही गुजर गए, शनिचरी देवी उसको देखतीं, लेकिन उस समय तक कोई न कोई जग चुका होता इसलिए वह बाहर नहीं जातीं. कुहू रोज उनके पास सुबह शाम आती और ढेरों बात करती, बेटा बहू भी रोज हालचाल पूछते रहते. लेकिन शनिचरी देवी फिर से बात करने का मौका ढूँढ रही थीं, उनके दिमाग में राजवंती के बच्चों के लिए कुछ करने की इच्छा बलवती हो रही थी. और एक दिन जब कोई जगा नहीं था तो वह फिर से बाहर निकल गयीं और उनको देखते ही राजवंती रुक गयी.

"नमस्ते मेम साहब, तबियत ठीक है ना, कई दिन से दिखाई नहीं पड़ीं आप?

"सब ठीक है राजवंती, अपना बताओ. तुम्हारा आदमी कहाँ काम करता है, यहीं आसपास या दूर".

"मेम साहब, आदमी म्युनिस्पैलिटी में सफाई का काम करता है तो ज्यादा दूर नहीं जाता, लेकिन उसका काम बहुत मुश्किल वाला है, सीवर में भी उतरना पड़ता है उसको", राजवंती ने एक सांस में कह दिया.

शनिचरी देवी के नजर के सामने उनका बचपन का गाँव आ गया, उनकी बिरादरी के लोग मरा जानवर उठाने से लेकर नाली सफाई तक सब काम करते थे. आज उनको सोचकर ही बुरा लग रहा है कि कितना कष्टप्रद होता है ऐसे काम को करना. साथ ही उनको यह भी समझ में आ गया कि इसके बच्चे तो शायद ही ठीक से पढ़ते होंगे. उनके दिमाग में पिछले कुछ दिनों से जो चल रहा था, वह उनके मुंह में आ गया.

"तुम कभी बच्चों के स्कूल गयी हो राजवंती, उनके मास्टर से कुछ बात किया है कभी".

राजवंती ने उनकी तरफ अजीब सी निगाहों से देखा और ना में सर हिला दिया. "हम कैसे जाएंगे उनके स्कूल, अक्षर का भी ज्ञान तो नहीं है हमको".

"अरे तो क्या हुआ, तुम स्कूल जरूर जाना और मास्टर साहब से पूछना कि बच्चे ठीक से पढ़ रहे हैं या नहीं, फिर हमको भी बताना". उन्होंने कहा और घर निकल गयीं.

राजवंती सोच में पड़ गयी, स्कूल जाएँ कि नहीं, उसे समझ नहीं आ रहा था. उधर उसे यह भी लगने लगा था कि शायद यह मेमसाहब उसकी मदद करेंगी वरना क्यों बार बार पूछतीं. फिर उसने सोच लिया कि एक बार बच्चों के स्कूल जाकर देखते हैं. 

शनिचरी देवी अपने कमरे में आयीं और बिस्तर पर लेट गयीं, घर में उनके सिवा कोई और नहीं जगा हुआ था. लेटे लेटे उनके दिमाग में तमाम विचार आते जाते रहे, उनको इसका आभास तो हो ही गया था कि राजवंती भले स्कूल चली जाए, उससे कुछ होना नहीं है. क्या उनको रग्घू से इस विषय में कुछ बात करनी चाहिए, इस बात पर वह पेशोपेश में थीं. फिर उन्होंने सोचा कि एक बार राजवंती स्कूल हो आये तो देखा जाएगा.