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Monday, July 6, 2015

अंकुरण--

" अरे ,रे , ये क्या कर दिया तूने | काट दिया उस पौधे को भी घाँस के साथ "| शर्माजी एकदम से चिल्ला पड़े उस छोटी लड़की पर जिसने उनसे उनकी लॉन में से घाँस काटने के लिए पूछा था |
पेपर को किनारे रखते हुए वो उठे और लगभग धक्का देते हुए उसे लॉन से बाहर निकाल दिया | " पता नहीं फिर ये अंकुरित होगा या नहीं , कितने प्यार से लगाया था "|
छोटी लड़की उदास बाहर निकल गयी | पेपर उड़ कर घाँस पर आ गिरा , उसमे हेडलाइंस चमक रही थीं " इस साल फिर एक लड़की ने टॉप किया सिविल सर्विसेज में "| 

बेटियाँ ( कविता )

बेटियाँ कभी उदास नहीं होतीं
वो तो हैं सृष्टि की अद्भुत कल्पना
वो तो रहती हैं पिता की दुआओं में
तभी तो खिल जाती है
एक स्नेहिल मुस्कान
देखकर उनको हर मन में
वो तो दूर करती हैं उदासी
दोनों ही घरों की
उनसे ही तो बनते हैं
कितने सारे इन्द्रधनुष
इस धरा पर और उस अम्बर पे
बेटियाँ हर लेती हैं
पीड़ा हमारे मन की
और देती हैं हमें एक
अलौकिक आनंद की अनुभूति
वही तो होतीं हैं
जब माँ नहीं होतीं  
बेटियाँ कभी उदास नहीं होतीं !!

जिंदगी--

जिंदगी , उदास पीले पत्तों सी
बाक़ी है लेकिन थोड़ा हरापन
जरुरत है तो सिर्फ चुनने की
इन सूखते पत्तों से
आशाओं का मुस्कुराता
प्यारा सा जीवन गीत
फिर खिलखिला उठेगी
जिंदगी की अप्रतिम हरीतिमा
हार जायेगा ये उदास पीलापन !!

Sunday, July 5, 2015

अधूरी प्रेम कहानी--

" सॉरी , मैंने देखा नहीं आपको , उठा देता हूँ मैं किताबें ", और वो झुक कर किताबें उठाने लगा ।
" पता नहीं कहाँ से ये अंधे आ जाते हैं , रहने दो । फ़िल्में मैं भी देखती हूँ , बहुत पुरानी चाल है ये "। उसने किताबें उठाई और एक हिक़ारत की नज़र उसपर डालती हुई  चली गयी ।
अचानक उसकी निगाह वहाँ गिरे हुए लाइब्रेरी कार्ड पर पड़ी । एक बार तो उसने सोचा कि जा कर उसे वापस कर दे, फिर उसे फिल्मों का ख्याल आ गया ।
अब वो लाइब्रेरी कार्ड डस्टबिन की शोभा बढ़ा रहा था । एक प्रेम का अँकुर फूटते फूटते रह गया ।

ख़्याल--

जाने किन किन का ख़्याल आता है
बस एक तेरा ही ख़्याल , नहीं आता
कोशिश कभी की थी , ना भूलूँ तुम्हें
पर याद रखूँ अब , सवाल नहीं आता
जिंदगी सुना था , एक अजीब खेल है
अब तक़ चलना , वो चाल नहीं आता
गुनगुना फिर तो लें ,ये जीवन संगीत
कमबख़्त याद अब वो ताल नहीं आता
मिलना ,बिछुड़ना हैं जीवन के हिस्से
लेकिन गुज़रा हुआ , साल नहीं आता !!



Friday, July 3, 2015

स्टोरी--

" सर , मैं हस्पताल पहुँच गया हूँ , कवर करता हूँ एक्सीडेंट की स्टोरी "|
" अच्छा तो आपने देखा उनको , सामने देखकर कैसा लगा ? रिपोर्टर की आवाज़ ने उसके दर्द में इज़ाफ़ा कर दिया |
" अरे इतने बड़े स्टार से मुलाक़ात तो हो गयी , लोग तो तरसते हैं दूर से भी एक झलक पाने के लिए , कुछ बताईये ", और भी कुछ कह रहा था वो लेकिन दर्द और क्रोध के उबाल में उसने पत्रकार का माइक छीन कर फेंक दिया |
" स्टार , स्टार लगा रखा है , मेरी टूटी हड्डियाँ तुम्हे नहीं दिखती , दफा हो यहाँ से "| 

Wednesday, July 1, 2015

अपने अपने दर्द --

" आजकल इंडस्ट्री लगाना और उसे चलाना आसान नहीं रहा " कहते हुए उनके चेहरे का दर्द टपक गया |
" क्यों , क्या हो गया ऐसा ", आश्चर्य से पूछा उसने |
" अरे ये मनरेगा जो आ गया , अब जिसको अपने गाँव , घर में ही काम मिल जा रहा है , वो क्यों आएगा दूर काम करने "|
" और रही सही कसर ये शॉपिंग माल वाले पूरी कर दे रहे हैं | बढ़िया ए सी में काम मिल जा रहा है उनको "|
उसे अपना गाँव याद आ गया जहाँ ग्राम प्रधान और अधिकारी मिल कर मनरेगा का आधा से ज्यादा पैसा फ़र्ज़ी नाम से हड़प जाते हैं |
मज़दूर को भी दर्द होता है , वो सोच में डूब गया |