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Friday, October 6, 2017

प्रश्नचिन्ह-- लघुकथा

एक बार फिर उसकी आंख खुल गयी, जून महीने की बेहद जला देने वाली गर्मी की दोपहर में कमरे में लेटे हुए वह तपिश से लड़ने का असफल प्रयास कर रही थी| इसी क्रम में कभी झपकी आ जाती थी और कभी नहीं, तभी यह दूसरी बार हुआ कि बाहर से आते छोटे बच्चे के रोने की आवाज़ सुनकर उसकी आंख खुली| इतनी भयानक गर्मी में कौन बच्चा बाहर रो रहा है देखने के लिए उसने कमरे का दरवाज़ा धीरे से खोला| गर्म हवा के थपेड़े लगता था जैसे उसके इंतज़ार में ही बाहर थे और एकदम से उसे अपना चेहरा जलता महसूस हुआ| एक बार तो उसकी इच्छा हुई कि दरवाज़ा बंद करके वापस कमरे में चली जाये लेकिन तभी बच्चे के रोने की आवाज़ एक बार फिर सुनाई पड़ी|
बरामदे को पार करते हुए उसने मेन गेट खोला और बाहर झाँका, बाहर के एकलौते पेड़ की कमजोर छाया में दो
बच्चियां एक छोटे से लड़के के साथ बैठी थीं| बड़ी बच्ची शायद आठ साल की और उससे छोटी लगभग छह साल की थी और बड़ी के गोद में एक बहुत छोटा बच्चा लेटा हुआ था जो शायद तीन चार महीने का ही था| एक पल को उसके होश उड़ गए, वह कमरे में भी इस गर्मी को झेल पाने में असमर्थ थी और ये बच्चियां इतने छोटे से बच्चे को लेकर इस पेड़ के नीचे बैठी हैं| लपक कर वह उनके पास पहुंची और पूछा "तुम लोग यहाँ क्यों बैठी हो और यह छोटा बच्चा किसका है"|
उसकी आवाज़ सुनकर छोटा बच्चा चुप हो गया और बड़ी लड़की ने कहा "यह हमारा भाई है"|
"लेकिन तुम लोग इसको यहां क्यों लेकर बैठी हो, इतनी गर्मी है और लू भी चल रही है”, उसने फिर पूछा|
"मम्मी हमको यहाँ बैठाकर गयी हैं, आएँगी तो हम लोग चले जायेंगे", बड़ी बच्ची ने बच्चे को झुलाते हुए कहा|
उसे समझ नहीं आया कि क्या करे, फिर उसने उनको कहा "तुम लोग अंदर चलो, छाये में बैठो";, और उनको लेकर वह गेट के अंदर बरामदे में आ गयी| बच्चा उसे भूखा लगा तो अंदर से लाकर आधा ग्लास दूध ले आयी और बड़ी बच्ची को पकड़ा दिया| दूध पीने के बाद उसने दो ग्लास पानी भी दिया और छोटा बच्चा उसे भी गटागट पी गया| फिर वह उन दोनों के लिए भी कुछ खाने का ले आयी और खाना देने के बाद उसने पूछा "तुम्हारी मम्मी क्या करती है?
"कूड़ा बीनती है";, बड़ी बच्ची ने बताया|
"और पापा?
खाना खाते हुए बच्ची बोली "पापा कहीं चले गए हैं, हमको मालूम नहीं है"|
वह इन बच्चो के बारे में सोचते हुए कुछ समय तक वहीँ बैठी रही, इतने में बड़ी बच्ची बोली कि मम्मी आ गयी और गेट खोलकर बाहर निकली| फिर उसके पीछे पीछे उसकी मम्मी भी आयी और सबको चलने के लिए कहने लगी|
उसने उसकी तरफ देखते हुए पूछा "इतनी गर्मी में इस छोटे बच्चे को ऐसे ही बाहर छोड़कर चली गयी थी?
उस औरत ने उसकी तरफ देखते हुए कहा "तो क्या करें, काम तो करना पड़ता है ना नहीं तो इनको रोटी कैसे
खिलाऊंगी"|
उसने सोचा कि इसको थोड़ा समझा दिया जाए तो बोली "इतने बच्चे क्यों पैदा करती हो जब संभाल नहीं सकती इनको?
उस औरत ने उसकी तरफ देखा और कहा "अब इ लड़कियां बड़ी हो गयी हैं, इनको छोड़ देंगे, ये भी कूड़ा बीनेंगी और अपना खाएंगी पियेंगी"|
उसे एकदम से धक्का लगा, इतनी छोटी लड़कियों को छोड़ देगी| "अरे इतनी छोटी लड़कियों को तुम कैसे छोड़ दोगी, उनको कुछ हो गया तो?
उस औरत ने उसकी तरफ देखा और बोली "इतना ही फिकर है तो तुम ही रख लो इनको| हम भी इतने ही बड़े थे जब इस काम में लग गए थे", और फिर उसने छोटा बच्चा अपनी गोद में लिया और गेट के बाहर निकल गयी| उसके पीछे पीछे दोनों लड़कियां भी उसके लिए एक बड़ा सा प्रश्नचिन्ह छोड़ती हुई चली गयी| 

Tuesday, September 26, 2017

दर्द का एहसास-- लघुकथा

"मैडम, इस तरह कैसे चलेगा, बिना छुट्टी लिए आप गायब हो जाती हैं| यह ऑफिस है, ध्यान रखिये, पहले भी आप ऐसा कर चुकी हैं", जैसे ही वह ऑफिस में घुसी, बॉस ने बुलाकर उसे झाड़ दिया| उसने एक बार नजर उठाकर बॉस को देखा, उसकी निगाहों में गुस्सा कम, व्यंग ज्यादा नजर आ रहा था| बगल में बैठी बॉस की सेक्रेटरी को देखकर उसको उबकाई सी आ गयी|
लगभग तीन महीने हो रहे थे उसको इस ऑफिस में, पूरी मेहनत से और बिना किसी से लल्लो चप्पो किये वह अपना काम करती थी| ऑफिस में कुछ महिलाएं भी थीं जिनके साथ वह रोज लंच करती थी लेकिन उनके सोच के स्तर को देखकर उसने उनसे ज्यादा बात करना लगभग छोड़ दिया था| इसी बात को लेकर कुछ महिलाओं ने उसे नीचा दिखाने का सोच लिया था| कई बार उनकी बातों का वह मुंहतोड़ जवाब भी दे चुकी थी और इनको नज़रअंदाज करना भी उसने धीरे धीरे सीख लिया था|
पिछले कई सालों से उसे कम से कम महीने में एक दिन बिस्तर पकड़ना ही पड़ता था| इतना भयानक दर्द होता था कि काम करना तो दूर, वह ठीक से चल फिर भी नहीं पाती थी| दवा से बस इतना होता कि आराम से लेट लेती थी लेकिन घर से निकलना तो सोच भी नहीं सकती थी| अगले दिन भी बहुत दिक्कत होती थी लेकिन किसी तरह दिन बीत जाता था| पिछले महीने ही उसने बॉस की सेक्रेटरी और साथ की महिलाओं को बता भी दिया था कि उस एक दिन वह किसी भी हालत में काम पर आने लायक नहीं रहती|
उसने एक बार सोचा कि बात ख़त्म की जाए और वह मुड़कर जाने को हुई| लेकिन तभी बॉस और सेक्रेटरी की हंसी ने उसके मन में आग लगा दी| पलटकर उसने बॉस की आँखों में ऑंखें डालते हुए कहा " शायद आपको इसके बारे में पता हो यही सोचकर तो मैंने आपकी सेक्रेटरी को अपने तकलीफ के बारे में बता दिया था| मैंने सोचा था कि वह आपको बता देगी और आप समझ जाएंगे| आपकी पत्नी तो शायद इस दर्द के बारे में आपसे बात नहीं करती होगी लेकिन मैं अब आपको हर महीने बता दिया करुँगी और उस एक दिन नहीं आ पाऊँगी"|
वह बॉस के केबिन से बाहर निकल गयी और पीछे बंद हुए दरवाजे की आवाज पूरे ऑफिस को सुनाई पड़ रही थी|  

Friday, September 22, 2017

जरुरत- लघुकथा

"सुबह मैंने शैम्पू लाने के लिए कहा था, फिर भूल गए", जैसे ही वह घर में घुसा, पत्नी बोली|
"एकदम दिमाग में ही नहीं आया, अच्छा कल जरूर लेता आऊंगा| छुटकी जगी नहीं अबतक", कहते हुए वह बैग रखकर कमरे में भागा| जैसे ही उसने जेब से चॉकलेट निकालकर उसके सिरहाने रखा, पत्नी ने नाराजगी दिखाते हुए कहा "बेटी के लिए चॉकलेट लाना नहीं भूले, लेकिन मेरा कहा याद नहीं रहा"|
"चाय पिलाओ ना, थोड़ी थकान लग रही है", उसने छुटकी के पास ही लेटते हुए कहा|
"ठीक है, पहले कपडे तो बदल लो", बोलती हुई पत्नी किचन में चली गयी| चाय पैन गैस पर चढ़ाकर जब पत्ती डालने चली तो याद आया कि चाय की पत्ती तो ख़त्म है|
ओह, सुबह ही सोचा था लेकिन दुकान पर ध्यान नहीं रहा| अब क्या करे सोचते हुए उसने आवाज़ लगायी "जरा चाय की पत्ती तो लेते आओ, ख़त्म हो गयी है"|
"कितनी भुलक्कड़ हो गयी हो आजकल, कुछ याद ही नहीं रहता बेटी के आगे", मुस्कुराते हुए उसने कहा|
"और तुम्हें सब याद रहता है", कहकर दोनों हंस पड़े|
"कुछ देर बाद ले आऊंगा चाय की पत्ती, अब थकान कम लग रही है", उसने बेटी के पास लेटे लेटे ही कहा| पत्नी भी आकर वहीँ बैठ गयी, दोनों की प्यार भरी निगाहें बेटी पर टिकी हुई थीं| 

कुछ खूबसूरत पल-- लघुकथा

अब से मैं पूरा ध्यान रखूंगी मुकुल का, बहुत परेशान हो जाते हैं आजकल, उसके दिमाग में पूरे दिन यही घूम रहा था| जब से बेटी पैदा हुई थी, उसे एकदम व्यस्त रख रही थी, समय तो जैसे पंख लगा कर उड़ जाता था| बेचारे मुकुल खुद ही सब कुछ करते रहते थे, कभी कुछ कहते नहीं थे लेकिन उसे तकलीफ होती थी| आखिर कभी भी मुकुल को कुछ करने जो नहीं दिया था उसने|
"कपडे आयरन नही हैं, ओह फिर याद नहीं रहा", कहते हुए आज सुबह जब मुकुल ने सिकुड़े कपडे पहने तो उसे थोड़ी खीझ हुई| जल्दी से उसने नाश्ता निकालने का सोचा तभी बच्ची रोने लगी|
"नाश्ता किचन से लेकर खा लेना", बोलती हुई वह भागी|
"तुम मेरी चिंता मत करो, बेटी को देखो", और मुकुल ने नाश्ता लिया और आकर उसे देखने लगे| उसे पता ही नहीं चला कि कब वह आया और उसे देखने लगा, वह तो बेटी में ही खोयी थी|
"चलता हूँ, शाम को कुछ लाना तो नहीं है", मुकुल ने पूछा तो उसे उसके आने का एहसास हुआ|
"नहीं ठीक है, मैं दिन में ले आउंगी, तुम जल्दी आने की कोशिश करना", उसने मुस्कुराते हुए कहा| जाते जाते एक बार फिर पलटकर मुकुल ने बेटी को देखा और मुस्कुराते हुए निकल गए|
शाम को किसी तरह उसने नाश्ता बनाया और चायपैन गैस पर रखकर वह अभी बैठी ही थी कि बेटी जग कर रोने लगी| उसे लेने कमरे में गयी थी कि घंटी बजी| गोद में बेटी को लिए हुए उसने दरवाजा खोला और बैग रखकर मुकुल ने बेटी को लेना चाहा| लेकिन बेटी चुप होने का नाम ही नहीं ले रही थी, उधर चाय भी गैस पर चढ़ी हुई थी|
"तुम इसे चुप कराओ, शायद भूखी है, मैं कपडे बदल लेता हूँ तब तक", बोलता हुआ मुकुल कमरे में चला गया|
थोड़ी देर बाद उसे लगा कि कमरे में कोई है तो सामने मुकुल ट्रे में नाश्ता और चाय लेकर खड़ा था| उसे अपने आप पर एक बार फिर झेंप आयी और वह खड़ा होना चाह रही थी कि मुकुल ने उसे रोका और ट्रे रखकर बैठ गया|
"तुम नहीं जानती कि तुम्हें इस तरह देखना कितना सुखकर होता है मेरे लिए", कहकर मुकुल ने उसके बाल सहला दिए और बेटी के गाल पर धीरे धीरे हाथ फेरने लगा| वह धीरे से मुकुल के गोद में सर रखकर लेट गयी, बेटी भी सोते सोते मुस्कुरा रही थी और चाय ट्रे में ठंडी हो रही थी|  

Thursday, September 21, 2017

खबर--कहानी

बीस साल बाद आज जोखन लौटा था गाँव, कितनी बार घरवालों ने बुलाया, कितने प्रयोजन पड़े, लेकिन जोखन ने कभी भी गाँव की तरफ जाने का नाम नहीं लिया था| लोगों ने बहुत बार पूछा, लेकिन कभी उसने वजह नहीं बताया| आज गाँव में आकर उसे सब कुछ बदला बदला लग रहा था, कुछ भी पहचाना नहीं लग रहा था| पिताजी से हाल चाल करके वह गाँव में घूमने निकला और कुछ ही देर में गाँव के बाहर खेतों में खड़ा था| खेत भी अब खेत कम, प्लाट ज्यादा लग रहे थे| खेतों को पार करता हुआ वह बगल के गाँव के रास्ते पर चल पड़ा| कभी पगडण्डी जैसा रास्ता अब कंक्रीट का बन गया था लेकिन उसपर से गुजरने वाले कदम अब कम हो गए थे|
बगल के गाँव में पहुँच कर उसने उस घर की तरफ कदम बढ़ाया जहाँ बीस साल पहले वह आखिरी बार आया था| उस आखिरी बात के बाद कि "हमारा साथ संभव नहीं है, अपनी अलग जिंदगी बसा लो| हाँ मेरी दुआएं हमेशा साथ रहेंगी और तुम जितना आगे बढ़ोगे, मैं भी उतना ही खुश रहूंगी", जोखन ने कभी पलट कर नहीं देखा| इस बात का पता उन दोनों ने आज तक किसी किसी को भी नहीं लगने दिया था|
इस बीच उसे खबर मिलती रही कि रंजू की शादी हो गयी और वह किसी और गाँव में चली गयी| वह भी अपनी जिंदगी में व्यस्त होता गया और अपनी हर तरक्की उसे यह सुकून जरूर देती रही कि रंजू को भी ख़ुशी मिल रही होगी| लेकिन पिछले हफ्ते जो खबर उसे मिली उसने उसके होश उड़ा दिए|
अब तो बस मन में एक इच्छा थी कि एक बार पता चल जाए कि जो खबर उसने सुनी थी वह सच है कि नहीं| बड़ी जद्दोजहद के बाद उसने गाँव आकर एक बार रंजू के घर जाकर पता लगाने का फैसला लिया था| घर में तो वह किसी से पूछ नहीं सकता था इसलिए मन ही मन वह मनाता आया था कि खबर गलत ही हो| आखिर उसकी बात गलत कैसे हो सकती थी, उसकी तरक्की से तो रंजू की खुशियाँ बढ़नी थी| बस दो ही घर बाद उसकी गली आने वाली थी और जोखन का दिल बुरी तरह धड़क रहा था कि किसी आवाज ने उसको रोका "अरे जोखन, कैसे हो और कब आये, बहुत साल हो गया था तुमको देखे"|
उसने पलट कर देखा, रंजू के पिताजी थे| ऐसा लगा जैसे उसने किसी बहुत ही बुजुर्ग व्यक्ति का चेहरा देख लिया हो, उदास ऑंखें, पीला पड़ा चेहरा और उलझे बाल| कहाँ उनका नाम लेकर रंजू उसे चिढ़ाती थी कि काश तुम भी पापा की तरह स्मार्ट होते तो तुमको कोई भी पसंद कर लेता| उनका चेहरा देखते ही उसे सब समझ आ गया, क्या कहे, क्या पूछे, उसके दिमाग ने जैसे काम करना बंद कर दिया| बस किसी तरह इतना कह कर कि "आज ही आया था चाचा, ठीक हूँ", पलट कर अपने गाँव की तरफ चल पड़ा| रंजू को ससुराल वालों ने जला दिया था, इस खबर को अब किसी से भी पूछने की हिम्मत नहीं थी उसमें | पीछे से आती आवाज उसे जैसे सुनाई ही नहीं पड़ रही थी और कुछ भी सोचने की ताक़त जोखन गँवा चुका था| 

बढ़ता धुआं-- लघुकथा

खाला अपने रसोई में लगी हुई थीं, अब रमजान महीने के बस दो ही दिन तो बचे थे और अलीम बड़के शहर से आज ही आ रहा था. सबेरे सबेरे उन्होंने पड़ोसी मियां की दूकान से एक बार फिर लगभग गिड़गिड़ाते हुए सामान ख़रीदा था. अभी पिछले महीने का भी पूरा पैसा दिया नहीं था उन्होंने तो उम्मीद कम ही थी कि सामान मिल ही जायेगा. लेकिन एक तो उन्होंने बेटे के आने की खबर सुना दी थी और दूसरे आने वाली ईद, मियां ने थोड़े ना नुकुर के बाद सामान दे दिया.
"देखो खाला, इस बार अगला पिछला सब हिसाब चुकता हो जाना चाहिए, मेरे भी बाल बच्चे हैं".
"इस बार अल्लाह की दुआ से सब चुकता कर दूंगी मियां, बेटा आ रहा है ना" कहते कहते उनका चेहरा जैसे रोशन हो उठा.
जल्दी जल्दी पूरे टपरी में उन्होंने झाड़ू लगाया और धूल के चलते उनकी पुरानी खांसी फिर उभर आयी. अब मुआं इस खांसी को भी अभी ही उभरना था, सोचते हुए वह दो मिनट के लिए दम लेने बैठ गयीं.
"अम्मी, इस बार आऊंगा तो तुमको डाक्टर को दिखा दूंगा, तुम्हारी खांसी नहीं जा रही है", एक दिन वह फोन पर कह रहा था. दरअसल जब भी उसका फोन आता, बगल वाली रशीदा अपने टपरी से ही आवाज लगाती कि खाला आओ, तुम्हारे अलीम का फोन है, और वह भागते हुए जातीं. अब इस उम्र में भागने से उनकी सांस फूल जाती और वह खांसने लगतीं.
"अरे मुझे कुछ नहीं हुआ है रे, तू अपना ख्याल रखिओ. खाना पीना तो ठीक से करता है कि नहीं", और अलीम को इससे ज्यादा कुछ पूछने का मौका नहीं देती थीं वह.
जब तक उसके अब्बा जिन्दा थे, ज्यादा कुछ सोचने के लिए नहीं था उनके पास. एक बड़ी बेटी थी जिसका निकाह करवाकर वह बहुत सुकून से थीं. दामाद राजमिस्त्री था और वह बेटी को लेकर बड़े शहर चला गया था . लेकिन अलीम के अब्बा के इंतकाल के बाद तो जैसे एकदम से उनकी समझ बढ़ गयी थी. अलीम भी १० वीं पास कर चुका था और काम के सिलसिले में बड़े शहर निकल गया. पिछले एक साल में एक बार ही आया था और इस ईद पर उसके आने की खबर ने जैसे उनको फुर्तीला बना दिया था.
कड़ाही से निकलती सालन की खशबू ने उनको वर्तमान में ला खड़ा किया. अब तो अलीम के आने का समय भी हो रहा है और इफ्तार का समय भी, उनके हाथ जल्दी जल्दी कड़ाही में चलने लगे. कितना कुछ बनाना है बेटे के लिए, सोचकर उनके चेहरे पर मुस्कराहट फ़ैल गयी.
बाहर गली में हो रहे कुछ शोर सुनकर उनको लगा की अलीम आ गया लगता है. इतने में उनके दरवाजे की कुण्डी जोर जोर से खड़खड़ाने की आवाज आने लगी.
"आती हूँ, क्यों इस कुण्डी की जान ले रहा है तू", कहकर उन्होंने कमर को हाथ लगाया और खड़ी होकर उन्होंने दरवाजा खोला.
"अलीम, कहाँ छुपा है रे, सामने क्यों नहीं आता? सामने पड़ोसियों की भीड़ देखकर उनको लगा कि शैतानी में अलीम इनके बीच छुपा हुआ है. लेकिन भीड़ में से लोगों के उतरे चेहरे को देखकर उनको अजीब सा लगा. अभी वह कुछ और सोच पाती कि रशीदा ने रोते हुए उनको अपने बाँहों में भर लिया.
"क्या हुआ, क्यों रो रहे हो तुम सब, मेरा अलीम कहाँ है?, खाला को यह सब देखकर जैसे लकवा मार गया. वह गिरने को हुईं तभी रशीदा ने उनको पकड़कर फर्श पर बैठा दिया और बोली "अभी फोन आया था खाला, कुछ लोगों ने हाथापाई में अलीम की जान ले ली", और भी बहुत कुछ कहती जा रही थी रशीदा लेकिन खाला को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था.
कड़ाही में पकता सालन जलने लगा था और उससे उठता धुआं टपरी में फैलने लगा था|

बाप-- लघुकथा

घर के बाहर ही जब उसने अपने चचेरे भाई रग्घू को देखा तो उसका माथा ठनका| आज यह घर क्यों आया था, जरूर कुछ गड़बड़ होगी, वर्ना पिताजी को गुजरे इतने साल हो गए, कभी हाल पूछने भी नहीं आया था| उसकी मुस्कराहट को नजरअंदाज करते हुए वह भागती हुई घर में घुसी|
"माँ, माँ, कहाँ है तू", सामने माँ नजर नहीं आयी तो वह बेचैन हो गयी| जल्दी से उसने पिछले कमरे में प्रवेश किया तो माँ को खाट पर बैठे पाया|
"तू यहाँ बैठी है और जवाब भी नहीं दे रही है, मैं तो घबरा गयी थी| आज रग्घू क्यों आया था घर, तूने तो नहीं बुलाया था ना ?, वह एक ही सांस में सब पूछ बैठी|
"अरे सब ठीक है, बस यूँ ही आया था मिलने", माँ ने उठते हुए कहा|
"यह पैसे कैसे रखे हैं, किसने दिए, रग्घू ने दिए क्या माँ?, एक बार फिर उसका माथा घूम गया|
"कहीं तुमने वह सड़क वाली जमीन का टुकड़ा तो नहीं बेच दिया उसको", अब वह गुस्से से हांफने लगी थी|
"अरे नहीं, मैंने कुछ नहीं बेचा", अभी माँ की बात ख़त्म भी नहीं हुई थी कि वह फिर बोल पड़ी "मैंने कहा था ना कि मुझे अभी नहीं करनी शादी, फिर तूने ऐसा क्यों किया", उसके अंदर से जैसे क्रोध का ज्वालामुखी फूट पड़ा|
"तू बिना मतलब परेशान हो रही है, ऐसा कुछ भी नहीं है", माँ ने उसे समझाना चाहा लेकिन वह फिर बोल पड़ी|
"पिताजी के नहीं रहने पर किस तरह से तूने मुझे पाला पोसा और आज तूने यह कर दिया| और उस रग्घू ने या चाचा ने कभी पलटकर देखा भी नहीं था और अब एक आखिरी जमीन भी हड़पकर बैठ गया"|
"उसने कोई जमीन नहीं हड़पी और न मैंने उसे बेचा", माँ के इतना कहते ही वह बिफर पड़ी "मुझसे झूठ क्यों बोल रही है, बताती क्यों नहीं कि उसने पैसे क्यों दिए तुझे"|
"अब उसकी बेटी भी बड़ी हो गयी है, बाप है ना", कहते हुए माँ ने उसे पुचकारा|
वह वहीँ खाट पर धम्म से बैठ गयी, माँ उसके लिए पानी लेने चली गयी थी|