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Tuesday, December 31, 2019

पहली औलाद-लघुकथा

"हाय डैड, कैसे हैं आप? सब ठीकठाक है ना, मैं कई महीनों से आने की सोच रहा हूँ लेकिन क्या करूँ?, वीडियो काल पर रोहन सुदूर अटलांटा से अपने डैड से बात कर रहा था.
"मैं ठीक हूँ बेटा, तुम लोग कैसे हो. नीनू कैसी है, अगर पास में है तो उससे भी बात करवाना", पिताजी ने अपनी इच्छा प्रकट की.
"नीनू तो अभी नहीं है, वह दीप्ति के साथ सुपरमार्केट गयी है. अच्छा गोपाल कहाँ है, आपकी देखभाल तो ठीक से करता है ना, मैं उसके अकाउंट में बराबर पैसे भेजता रहता हूँ?, रोहन ने पूछा.
पिताजी ने एक लंबी सांस ली और मुस्कुराते हुए बोले "अरे गोपाल तो ग्रेजुएशन कर रहा है, और मेरा खूब ख्याल रखता है. मुझे तो लगता ही नहीं कि वह अपने परिवार का सदस्य नहीं है. अच्छा एक बात कहना चाह रहा था लेकिन समझ नहीं आ रहा था कि कैसे कहूं, कहीं तुम्हें बुरा न लग जाए?
"अरे बोलिये न डैड, वैसे भी सब कुछ तो आपको ही मैनेज करना है".
"मैं सोच रहा था कि गोपाल को अपना नाम दे दूँ. देखो तुम बुरा मत मानना, आखिर सब कुछ तो अब वही संभाल रहा है", पिताजी ने हिचकते हुए कहा.
रोहन ने कुछ पल के चुप्पी साध ली, पिताजी भी थोड़े तनाव में आ गए.
"आपने मेरे मन की बात छीन ली डैड, यह बात मैं चाह कर भी नहीं कह पाता. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप मुझसे बात करना बंद कर देंगे, मैं आपका पहला बेटा ही रहूँगा", रोहन ने एक जोरदार ठहाका लगाया. इधर फोन पकड़े पिताजी के कोर भी भींग गए.

Wednesday, November 13, 2019

जिम्मेदारियाँ--लघुकथा

आज वह सोचकर आया था कि पापा से नई घडी और पैंट शर्ट के लिए कह ही देगा. अब तो स्कूल के बच्चे भी कभी कभी चिढ़ाने लगे थे. लेकिन घर की हालत देखकर उसकी कहने की इच्छा नहीं होती थी. जैसे ही वह पापा के कमरे में पहुंचा, पीछे पीछे उसका चचेरा भाई भी आ गया. अभी वह कुछ कहता तभी उसके चचेरे भाई ने अपनी फरमाईस रख दी "बड़े पापा, मेरी साइकिल बिलकुल खचड़ा हो गयी है, इस महीने नई दिला दीजिये".
पापा ने उसकी तरफ प्यार से देखते हुए कहा "ठीक है, इस बार बोनस मिलना है, जरूर खरीद दूंगा. लेकिन संभाल कर चलाना, गिरना मत".
चचेरा भाई प्रसन्न मन से चला गया, उसको लगा कि पापा से इस समय कहने में कोई दिक्कत नहीं है. उसने पापा की तरफ देखा तभी पापा ने पूछ लिया "सब ठीक है ना रवि, पढ़ाई बढ़िया चल रही है तुम्हारी?
"पढ़ाई बढ़िया चल रही है पापा, बस एक नई घड़ी और पैंट शर्ट चाहिए थी", उसने उत्साहित होकर कहा.
पापा की नजरें जैसे कहीं दूर खो गयीं, फिर वह उसकी तरफ देखते हुए बोले "देखता हूँ, इस बार तो छोटे की साइकिल जरुरी है, तुम्हारे सामने ही तो उसको बोला है. अगर पैसे बचे तो जरूर खरीद दूंगा".
इतना बोलकर पापा बाहर निकल गए, उसके मन में आक्रोश भर गया. वह दौड़ते हुए माँ के पास गया और लगभग चिल्लाते हुए बोला "माँ, पापा छोटे की हर बात मान लेते हैं लेकिन मेरे लिए उनके पास पैसा ही नहीं रहता है. आखिर चाचा छोटे के लिए क्यों नहीं खरीदते हैं".
माँ ने उसको पुचकारते हुए अपने पास बैठाया और समझाने लगी "अरे तेरे चाचा कहाँ कमा पाते हैं, पैसा तो तेरे पापा ही कमाते हैं. लेकिन घर के बड़े होने की जिम्मेदारियां भी बहुत बड़ी होती हैं, तुझे भी बाद में समझ आएगा". 
माँ अपने हिसाब से उसे समझाने की कोशिश कर रही थी लेकिन उसे फिलहाल यह गणित समझ में नहीं आ रहा था.

Monday, October 7, 2019

उसका हक़- लघुकथा

जैसे ही छोटू के रोने की आवाज मालती के कानों में पड़ी, वह उठकर भागी. दूसरे कमरे के उसके बिस्तर पर लेटे छोटू की नींद खुल गयी थी, शायद उसने नैप्पी भी गीला कर दिया था.
"अले ले, जग गया मेरा राजा बेटा, भुक्खू लगी है क्या?, मालती ने उसे उठाकर प्यार करना शुरू किया और उसे लाड़ करती हुई ड्राइंग रूम में आ गयी.
ड्राइंग रूम में एक कोने में वह बैठा हुआ अखबार पढ़ रहा था, मालती और छोटू के मिले जुले स्वर से उसकी तन्द्रा भंग हुई. उसके चेहरे पर भी उनको देखकर मुस्कराहट आ गयी. वह उठकर छोटू को लेने ही जा रहा था कि उसकी निगाह छोटी सी कुर्सी पर बैठे बड़े बेटे रोहन पर पड़ी. रोहन का चेहरा तना हुआ था और वह चाह कर भी कुछ बोल नहीं पा रहा था. लेकिन उसके हाव भाव सब कुछ बयां कर रहे थे.
बचपन से ही मंद बुद्धि और बोल सकने में असमर्थ रोहन का वह दोनों यथासंभव ख्याल रखते और छोटू के जन्म के पहले तो मालती के लिए वही सब कुछ था. लेकिन जब से छोटू पैदा हुआ था, मालती चाहकर भी उसे वह समय नहीं दे पा रही थी जो उसे पहले मिलता था. उसने पिछले कुछ समय से यह महसूस किया था और एकाध बार मालती से कहा भी लेकिन उसने हंसकर टाल दिया.
"तुम्हें बेकार का वहम हो रहा है, देखते नहीं हो कि रोहन भी छोटू के साथ कितना खेलता है", मालती शायद वह नहीं देख पा रही थी जो उसे दिखाई दे रहा था.
उसने एक बार मालती की तरफ देखा, वह अभी भी छोटू को हवा में उछाल रही थी. दूसरी तरफ रोहन के चेहरे पर तनाव बढ़ता जा रहा था, उसने कुछ सोचा और उसके कदम रोहन की तरफ बढ़ गए. 

Thursday, September 26, 2019

समीकरण- लघुकथा

अचानक उसे लगा कि पीछे से किसी ने नाम लेकर पुकारा, उसने साइकिल रोकी और पलट कर देखा. थोड़ा पीछे ही उसके परिचित वकील साहब खड़े थे और उसकी तरफ इशारा कर रहे थे. वह साइकिल धीरे धीरे चलाते हुए वकील साहब के पास पहुंचा और उनको नमस्ते किया.
"क्या बात है मैनेजर साहब, आज साइकिल चला रहे हैं. गाड़ी पंचर हो गयी है या खराब है", वकील साहब ने मुस्कुराते हुए पूछा.
उसे हंसी आ गयी, वह क्या साइकिल सिर्फ तभी चला सकता है जब उसकी गाड़ी खराब हो. फिर उसने हँसते हुए ही कहा "अरे नहीं वकील साहब, गाड़ी ठीक है. बस यूँ ही साइकिल चला रहा था, सेहत के लिए ठीक रहता है".
वकील साहब ने अपना सर हिलाया और कुछ बुदबुदाए जो उसे सुनाई नहीं पड़ा.
"आप भी साइकिल चलाया कीजिये, अब आपकी भी उम्र हो चली है, थोड़ी एक्सरसाइज हो जायेगी", उसने वकील साहब को लक्ष्य करते हुए कहा.
वकील साहब ने इंकार में सर हिलाया, उसे लगा शायद उम्र के चलते वह मना कर रहे हों.
"अरे आपकी इतनी भी उम्र नहीं हुई है कि आप साइकिल नहीं चला सकें, चलाया कीजिये", उसने फिर कहा.
"आप नहीं समझेंगे मैनेजर साहब, मेरे लिए साइकिल चलना संभव नहीं है", वकील साहब ने थोड़ा उदास होते हुए कहा.
उसे लगा कि शायद वकील साहब शर्म के मारे साइकिल नहीं चलाते होंगे, तो उसने फिर पूछ लिया "अरे इसे चलाने में कैसी शर्म, देखिये मैं तो बड़े मजे में चला रहा हूँ". 
वकील साहब ने एक लम्बी सांस ली और कहा 'आप नहीं समझेंगे मैनेजर साहब, मैं चाह कर भी साइकिल नहीं चला सकता. आपकी अपनी एक हैसियत है समाज में, आप साइकिल से घूमेंगे तो लोग आपकी तारीफ़ करेंगे कि देखो इतना बड़ा अधिकारी होकर भी साइकिल से घूम रहा है"
वकील साहब थोड़ी देर के लिए रुके और फिर बोले "लेकिन मेरा पेशा ऐसा है कि अगर मैं साइकिल से घूमने लगा तो लोग कहना शुरू कर देंगे कि देखो इस वकील को, एकदम फटीचर हो गया है, लगता है इसकी प्रैक्टिस बिलकुल नहीं चलती. और इसके चलते शायद मेरे यहाँ आने वाले कुछ क्लाइंट भी कम हो जाएं".
इतना कहकर वकील साहब ने नमस्कार किया और आगे बढ़ गए, वह साइकिल पकड़े समाज के इस समीकरण को सोचता रह गया.

Friday, September 20, 2019

व्यस्तता- लघुकथा

"अब गांव चलें बहुत दिन बिता लिए यहाँ", शोभाराम ने जब पत्नी ललिता से कहा तो जैसे उनके मुंह की बात ही छीन ली.
लेकिन बेटे और बहू से क्या कहेंगे, गांव पर तो कोई रहता नहीं था,पट्टीदारों के अलावा. वैसे वहां पर अपने हिसाब से जीने की आज़ादी थी लेकिन यहाँ भी तो है ही, कोई बंधन नहीं है. उनके दिमाग में कई दिनों से यह सब घूम रहा था.
"अच्छा यह बताओ, आखिर क्या कह कर गांव जाओगे. बेटा तो यही कहकर शहर लाया था कि गांव में अकेले रहते हैं, कौन है जो आपका अकेलापन बाँटने के लिए", ललिता के सवाल पर लाजवाब हो गए शोभाराम.
बात भी सही थी, न तो बहू का वर्ताव ऐसा था जिससे कोई शिकायत की जा सके और न बेटे का. बच्चे भी रोज एकाध बार उनके पास आ ही जाते थे, ये अलग बात थी कि वे अपने फोन में ही कुछ दिखाने आते थे. 
आखिर ललिता ने चुप्पी तोड़ी "लेकिन यह कौन सी बात है कि सब अपने फोन में ही लगे रहते हैं, न तो आपस में बात करते हैं और न हमसे. इससे तो अच्छे गांव में ही थे जहाँ पड़ोसी बातचीत तो करते थे".
शोभाराम ने सहमति में गर्दन हिलायी और कुछ बोलते उसके पहले ही बहू आयी "आपकी चाय ठंडी हो रही है पिताजी", और फोन को देखते हुए बाहर निकल गयी.
शोभाराम ने ललिता को देखा और दोनों धीरे धीरे अपने कमरे से बाहर आ गए. सोफे पर बैठे हुए बेटे के हंसने की आवाज आ रही थी, कोई चुटकुला पढ़ लिया था उसने अपने फोन में.  

Wednesday, September 11, 2019

उजास- लघुकथा

घर तक पहुँचते पहुँचते वह बिलकुल थक के चूर हो गया था, थकान सिर्फ शारीरिक होती तो और बात थी, वह मानसिक ज्यादा थी. आज भी कुछ लोगों की खुसुर फुसुर उसके कानों में पड़ गयी थी "अरे ये तो सरकारी दामाद हैं, इनको कौन बोल सकता है, जो चाहे करें".  जैसे ही वह सोफे पर बैठा, उसकी नजर सुपुत्र राघव पर पड़ी. उसकी कुहनी पर खून के दाग थे लेकिन वह मजे में खेल रहा था.
"बेटा राघव, यहाँ आओ. यह चोट कैसे लग गयी", उसने जैसे ही कहा, राघव को अपने चोट का ध्यान आया. वह लड़खड़ाते हुए पापा की तरफ आया और उसकी शिकायत शुरू हो गयी "बहुत गन्दा स्कूल है पापा, सब बच्चे मुझे बहुत चिढ़ाते हैं. आज तो मैदान में किसी ने धक्का दे दिया और मैं गिर पड़ा, देखो खून भी निकल आया".
"अच्छा चलो दवा लगा देता हूँ, घाव ठीक हो जायेगा. एक काम करता हूँ, तुम्हारा नाम किसी और स्कूल में लिखवा देता हूँ, ऐसे गंदे बच्चों से तो पीछा छूटेगा", उसने गंभीरता से कहा.
राघव, जो अभी तक शिकायत के ही मूड में था, वह चौंक सा गया. उसने पापा की तरफ गौर से देखा और बोला "नहीं पापा, मुझे स्कूल नहीं बदलना है. मेरे कितने ही दोस्त हैं जो मेरा ध्यान रखते हैं, मैं वहीँ पढूंगा".
वह सोच में पड़ गया, राघव के पैरों में समस्या थी जिसके चलते वह लंगड़ाकर चलता था. इस वजह से बच्चे उसे बहुत चिढ़ाते थे, यह भी उसे मालूम था. लेकिन फिर भी वह अपने कुछ अच्छे दोस्तों के चलते स्कूल छोड़ने के लिए राजी नहीं था. और वह अपने कुछ कलीग्स के मानसिक विकलांगता के चलते इस्तीफा देने तक के बारे में सोच रहा था.
"तो फिर पार्क में चलें, रेस लगाते हैं", उसने राघव को गोद में उठाते हुए कहा. राघव के चेहरे पर खिलखिलाहट फ़ैल गयी, उसने उस खिलखिलाहट को अपने अंदर भी भर लिया.

Monday, September 9, 2019

अब बात कुछ और है- लघुकथा

लगभग १५ मिनट बीत गए थे उस रेस्तरां में बैठे हुए, अभी तक खाना सर्व नहीं हुआ था. कलीग के बच्चे के ट्वेल्थ के रिजल्ट की ख़ुशी में आज दोनों फिर उस रेस्तरां में आये थे. अमूमन इतनी देर में बौखला जाने वाली उसकी कलीग ख़ामोशी से मेनू को उलट पलट कर देख रही थी. उसे थोड़ा अजीब लगा, उसने यूँ ही कहा "कितना समय लेते हैं ये बड़े होटल वाले खाना सर्व करने में, मुझे तो समझ ही नहीं आता. वैसे आज तुम कुछ बोल नहीं रही हो, क्या बात है?
कलीग ने सर उठाकर उसकी तरफ देखा और मुस्कुराते हुए बोली "अरे समय लग जाता है, ये लोग कोई खाना बनाकर नहीं रखते, आर्डर देने पर ही बनाते हैं".
"अच्छा, पहले तो मैं यह दलील देता था तो तुम उखड़ जाती थी कि यह तो इनका काम है तो जल्दी करें, हमारे समय की कीमत नहीं है क्या?
बहरहाल अगले दस मिनट में खाना टेबल पर था और दोनों खाने में लग गए. पनीर कुछ ख़ास नहीं था और दाल तड़का भी जैसे तड़क नहीं था. उसे लगा अब पक्का यह चिल्लायेगी लेकिन वह ख़ामोशी से खाना खाती रही.
उसने फिर कुछ कहना चाहा लेकिन कलीग ने जैसे भांप लिया "अब कोशिश तो कोई भी अच्छा बनाने की ही करता है, वैसे खाना स्वादिष्ट था".
उसे सब कुछ अजीब लग रहा था लेकिन अब चुप रहने में ही उसने भलाई समझी. कलीग ने पैसे देने के लिए अपना बैगनुमा पर्स खोला. उसकी नजर बैग पर पड़ी, अंदर होटल मैनेजमेंट के एक कालेज का ब्रोशर दिखाई दे रहा था.