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Friday, May 21, 2021

हाँ मुझे पता था- कहानी

 ट्रेन ने हल्का सा झटका दिया और स्टेशन पर खड़ी हो गयी. उसने खिड़की का पर्दा हटाया, सामने ही "मंडुआडीह" स्टेशन का पीला और चकता हुआ बोर्ड दिखाई दे रहा था. सामान तो उसने पहले ही समेट लिया था, अपनी सीट से उठकर उसने सामान उठाया और बाहर प्लेटफार्म पर उतर गया. सामने ही कुछ कुली उसकी तरफ आशा भरी निगाह से देख रहे थे लेकिन उसके पास बस एक छोटा सा बैग और पीठपर लगकाने वाला झोला ही था. वैसे भी कुली वातानुकूलित डब्बों के मुसाफिरों से ज्यादा उम्मीद करते हैं कि उनको सामान उठाने के लिए मिल जाएगा. उसने एक अंगड़ाई ली, घड़ी पर नजर डाली और बाहर की तरफ चल पड़ा. ट्रेन बमुश्किल आधा घंटा देर से थी और बाहर खड़े मित्र सुशील से उसकी बात हो चुकी थी जो उसका ही इन्तजार कर रहा था.

मंडुआडीह स्टेशन नया नया बना था और काफी साथ सुथरा था. वह पहली बार ही इस स्टेशन पर उतर रहा था, वैसे तो अधिकतर ट्रेन से वह बनारस कैंट स्टेशन उतरता था और पीछे के रास्ते बाहर निकलकर अर्दली बाजार का ऑटो पकड़ लेता था. ऑटो तो आगे की तरफ से भी मिलते थे लेकिन उनको घूमकर ज्यादा रास्ता चलना पड़ता था इसलिए किराया भी ज्यादा लेते थे. और अधिकांश ट्रेनें प्लेटफार्म 9 पर ही रूकती थीं तो उसके लिए पीछे से बाहर निकलना और आसान हो जाता था. लेकिन कैंट की तुलना में यह स्टेशन बहुत बेहतर लगा उसे, भीड़ भी कम थी और गन्दगी भी नहीं के बराबर. मंडुआडीह से अचानक उसके मन में पुराना समय, जब वह बी एच यू में पढता था, याद आ गया. सन 1986 के आसपास की बात थी, उस समय मंडुआडीह जाने की चर्चा करना भी अपराध माना जाता था. दरअसल उस समय यह इलाका धंधेवाली महिलाओं के चलते बदनाम था और यहाँ पर रहने वाले सामान्य परिवार के लिए भी अपना पता बताना आसान नहीं होता था. बाद में जब उसने बनारस के इतिहास के बारे में थोड़ा पढ़ा और "राम तेरी गंगा मैली" फिल्म देखी तो उसे पता चला कि बनारस के चौक क्षेत्र में स्थित "दालमंडी" को भी इसी वजह से जाना जाता था. अब तो मंडुआडीह और दालमंडी दोनों भिन्न वजहों से जाने जाते हैं और उनमें से कोई भी वजह ख़राब नहीं है.

जैसे ही वह बाहर निकला, उसकी नजर देय खड़े सुशील पर पड़ी. दोनों के चेहरों पर मुस्कराहट आ गयी और उसने सुशील को गले लगा लिया. लगभग दो साल बाद सुशील से उसकी मुलाकात हो रही थी और समय के चिन्ह सुशील के चेहरे पर स्पष्ट नजर आ रहा था. वैसे भी सुशील बचपन से ही दुबला पतला था लेकिन उसके गाल भरे हुए थे, लेकिन आज अधपकी दाढ़ी और पिचका हुआ चेहरा, ऐसा लगा जैसे वह किसी उम्रदराज व्यक्ति से मिल रहा हो.

"बहुत दिन बाद मुलाकात हो रही है राजू", सुशील ने मुस्कुराते हुए कहा.

"हाँ, बहुत दिन हो गया था, लगभग दो साल पहले हम लोग लंका पर मिले थे", उसको पुरानी मुलाकात याद हो आयी.

"हाँ, लंका पर ही मिले थे, मैं बी एच यू गया था और तभी बात हुई थी हमारी", सुशील को सब याद था. दो साल में ही कितना बदल गया था सुशील, अब उसने गौर किया.

"चलो बाहर चाय पीते हैं और वहीं गपशप करेंगे", उसने कहा और दोनों बाहर निकल गए. सड़क के उस पार एक गुमटी थी जहाँ एक बेंच भी पड़ी थी. दोनों वहीं बैठ गए और सुशील ने आवाज लगायी "दू ठो स्पेशल चाय बनावा उस्ताद, चिन्नी कम डाला". चायवाले ने अपना चायपैन उठाया, दो कप दूध डाला और चाय चढ़ा दिया.

"बहुत दुबले लग रहे हो यार, तबियत तो ठीक थी ना", उसने सुशील को देखते हुए पूछा. वैसे तो फोन दोनों के ही पास था और फोनपर बात भी होती रहती थी लेकिन एक चीज हमेशा होती कि फोन अक्सर सुशील ही करता. और हर बार बात होने के बाद वह सोचता कि अगली बार वह खुद सुशील को फोन करेगा लेकिन अपनी व्यस्तताओं के चलते या प्राथमिकताओं के चलते वह फोन नहीं कर पाता. लेकिन कभी भी उसे सुशील के लहजे से यह नहीं महसूस हुआ कि उसे इस बात का कोई मलाल है, बल्कि हर बार वह उसके स्वास्थ्य के लिए ही पहला सवाल करता.

"हाँ, इधर थोड़ी तबियत ख़राब थी, पेट गड़बड़ हो गया था. पत्नी भी आजकल बीमार रहती है तो खाना भी अक्सर खुद ही बनाना पड़ता है. लेकिन अब ठीक है, वैसे तुम्हारा स्वास्थ्य तो बिलकुल ठीक लग रहा है, बढ़िया है", सुशील ने उसका कन्धा थपथपाया.

"इस बार कितने दिन रहना है, एक बार लोहता भी आना", सुशील ने पूछा.

तब तक कुल्हड़ में चाय आ गयी थी, कुल्हड़ में चाय पीने का आनंद उसे बस बनारस में ही मिलता था. किसी और शहर में वह बात नहीं थी और बनारस का सुबह का नाश्ता "कचौड़ी और जलेबी" भी उसे और कहीं नहीं मिला. सुबह के समय गंगा किनारे या लंका या गोदौलिया, कहीं भी चले जाओ, नाश्ता तो यही मिलता है और इतना स्वादिष्ट कि मन कभी नहीं भरता.

"एक हफ्ते की छुट्टी मिली है इसबार, अगले तीन दिन में शादी निपट जाए, फिर मिलते हैं".

सुशील ने चाय का एक घूंट भरा और मुस्कुरा उठा. "इस बार बी एच यू भी साथ साथ घूमेंगे और बी जी तिलक छात्रावास भी जाएंगे, ठीक है ना". 

वह भी मुस्कुरा उठा, आखिर बी एच यू और बी जी तिलक छात्रावास से उसका पुराना और लम्बा सम्बन्ध रहा है और सुशील भी उसे भूल नहीं पाता है. चाय पीकर दोनों उठे तो उसने कहा "अब चलता हूँ अर्दली बाजार, तुम कैसे आये हो".

सुशील ने जेब से एक चाभी निकाली और उसे दिखाते हुए बोला "हमारी साइकिल तो स्टैंड पर खड़ी है, हम लेकर घर निकल जाएंगे. तुम सामने वाला ऑटो पकड़ लो, वह कैंट उतार देगा और वहां से अर्दली बाजार निकल जाना. शादी से फुर्सत पाकर फोन करना, फिर लंका पर मिलते हैं".

उसने सुशील को बाय कहा और ऑटो के पास चला गया. ऑटो में अभी सिर्फ एक सवारी ही थी इसलिए थोड़ा इंतजार करना था. ऑटो वाला पूरी ताक़त से आवाज लगा रहा था "कैंट, कैंट". उसने अपना बैग सीट पर रखा और सुशील को स्टैंड से साइकिल लेकर जाते देखने लगा. साइकिल भी लगभग 5-6 साल पुरानी थी और सुशील उसे चलाते हुए अजीब सा लगा उसको. लेकिन वह कर भी क्या सकता था, सबकी अपनी अपनी परिस्थिति है और उसी के अनुसार उसका रहन सहन.

"आवा भैया, सवारी मिल गईल", ऑटो वाले की आवाज पर वह पलटा और ऑटो में बैठ गया. तीन लोग पीछे और दो लोग ड्राइवर के दोनों तरफ बैठे थे. कहने को तो ट्रैफिक के नियम के हिसाब से उसे सिर्फ तीन सवारी ही बैठानी थी लेकिन उससे न तो उसका पेट भरता और न ऑटो की किश्त भरती. उसे याद ही नहीं है कि बनारस में पिछले पचीस सालों में उसने कभी भी ट्रैफिक नियम का पालन होते देखा हो. हाँ अब तमाम चैराहों पर ट्रैफिक लाइट जरूर लग गयी हैं लेकिन अगर ट्रैफिक पुलिस का जवान वहां खड़ा न हो तो कोई भी लाइट के हिसाब से नहीं चलेगा. और रास्ते में जगह जगह खड़े भोलेनाथ की सवारी सांड, उनका अलग ही जलवा रहता है इस शहर में.

ऑटो आगे बढ़ा तो उसका दिमाग तीस साल पहले चला गया. बनारस में उसका गांव था और गंगापुर इंटर कॉलेज में उसका एडमिशन कक्षा 11 में हो गया था. उसके गांव से लगभग 10 किमी दूर इस कॉलेज में पढ़ने के लिए आने वाले क्षेत्रों की संख्या उँगलियों पर गिनने योग्य ही थी. अधिकतर लड़के सिर्फ इंटर पास करके आगे बी ए में नाम लिखवाने के उद्देश्य से ही वहां आते थे. शादी ब्याह के लिए उस समय लड़के का कम से कम बी ए करना या उसमें पढ़ते होना एक जरुरी शर्त होने लगी थी और दहेज़ भी उसके चलते बढ़ जाता था. खैर रोज साइकिल से 10 किमी जाना और फिर वापस आना, उसके बाद समय मिला तो गांव में क्रिकेट भी खेलना. इसके बाद बचे समय में पढ़ाई. छुट्टी के दिन खेत में भी काम करना और घर के जानवरों की देखभाल भी साथ साथ चलता था. गंगापुर कॉलेज में ही उसके मुलाकात हुई थी सुशील से, दोनों की रुचियाँ समान थीं. पढ़ने में दोनों बराबर की दिलचस्पी रखते थे और अपने कोर्स की पढ़ाई के लिए टीचर्स को बुलाकर क्लास लाना भी दोनों साथ साथ करते थे. उस कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ने वाले गिने चुने थे और इसीलिए अंग्रेजी के शिक्षक राम सिंह जिन्हें बच्चे उनकी डील डौल के चलते "शेरू" कहते थे, अपने से क्लास लेने के लिए बहुत उत्सुक नहीं रहते थे. लेकिन सुशील की इच्छा अंग्रेजी पढ़ने में बहुत ज्यादा थी और उसे भी अच्छा लगता था इसलिए दोनों ने अपनी तरफ से ट्रांसलेशन वगैरह करके टीचर को दिखाना शुरू किया. अब शेरू की भी इच्छा उनको पढ़ाने की होने लगी और फिर भले ही सिर्फ वही दोनों क्लास में आएं, उनको पढ़ाते जरूर थे.

सुशील की आर्थिक स्थिति उसके मुकाबले कमजोर थी लेकिन इसके चलते उनके सम्बन्ध में कोई फ़र्क़ नहीं था. दोनों एक दूसरे के गाँव आते जाते, खासकर अगर घर पर कोई कार्यक्रम हो तो अवश्य जाते. उनके घरवाले भी उनकी दोस्ती पर खुश थे, आखिर दोनों में पढ़ने की लगन जो थी. इसी तरह इंटर की परीक्षा ख़त्म हुई और दोनों उसके बाद कहाँ जाना है, इसके लिए सोचने लगे. सुशील के घर पर कोई इस मामले में गाइड करने वाला नहीं था इसलिए उसने हरिश्चन्द्र कॉलेज में बी एस सी में एडमिशन ले लिया. राजू ने बी एच यू का एग्जाम दिया और वह वहां से कृषि विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई करने लगा.

आगे चलकर उसे महसूस हुआ कि सुशील ने हरिश्चन्द्र कॉलेज में एडमिशन लेकर गलती कर दी. दरअसल बी एस सी की पढ़ाई कृषि विज्ञानं की पढ़ाई से बहुत कठिन थी और वहां नंबर भी काफी कम मिलते थे. जितनी मेहनत में सुशील के बमुश्किल 55 प्रतिशत आते, उससे कम मेहनत में वह 90 प्रतिशत से ज्यादा ले आता था. इसके चलते अब सुशील तनाव में रहने लगा, पढ़ाई का बोझ बहुत बढ़ गया था इसलिए अब मुलाकात भी कम हो गयी. वह अब छात्रावास में रहने लगा और एकाध महीने में सुशील उसके कमरे पर आ जाता.

"यार तुमने गलत जगह एडमिशन ले लिया, इतना आसान नहीं है हरिश्चन्द्र कॉलेज से पास होना. और बी एस सी के बाद क्या करोगे, कुछ सोचा है?, उसने एक दिन सुशील से पूछा.

सुशील परेशान तो था ही लेकिन अब उसे पढ़ाई तो करनी ही थी. उसने लम्बी सांस लेते हुए कहा "मैं मेहनत करूँगा तो हो जाएगा, इसके बाद एम एस सी और फिर रिसर्च करके लेक्चरर बन जाऊंगा".

"अच्छा, आगे चलकर तुम भी शेरू मास्टर बनोगे", उसने कहा तो दोनों हंस पड़े. उस दिन गंगापुर और शेरू मास्टर साहब की खूब बातें हुई उनके बीच. 

धीरे धीरे वह अपनी पढ़ाई और हॉस्टल की जिंदगी में रम गया, सुशील से मुलाक़ात कम होने लगी. बीच बीच में उसे पता चलता कि सुशील अब काफी परेशान रहने लगा है तो वह सोचता कि उससे मिलेगा. लेकिन बात आयी गयी हो जाती और समय गुजरता गया. तीन साल बाद जब उसने अपना स्नातक पूर्ण किया तो उसे राहत मिली. काफी अच्छे नंबर आये थे उसके लेकिन सुशील किसी तरह से द्वितीय श्रेणी में बी एस सी पास कर पाया था. उसका एडमिशन फिर से बी एच यू में ही पोस्ट ग्रेजुएशन में हुआ और सुशील ने भी हरिश्चंद्र कॉलेज से एम एस सी करना शुरू किया.

इस बीच एकाध बार उसे लगा जैसे सुशील बातचीत में संतुलन नहीं बना पाता है. उसने पूछा तो सुशील टाल गया लेकिन उसे एहसास हो गया कि पढ़ाई अब सुशील पर भारी पड़ रही है. कुछ महीने बाद ही सुशील ने बताया कि उसकी शादी तंय हो गयी है तो उसे ख़ुशी भी हुई और थोड़ी चिंता भी. आखिर अभी तक तो सुशील किसी तरह अपनी पढ़ाई खींच रहा था लेकिन शादी के बाद जब पत्नी आ जाएगी तो उसका खर्च कैसे चलेगा. घर भी बहुत संपन्न नहीं था और न ही सुशील के पास किसी नौकरी में जाने का अवसर नजर आ रहा था. उसने इन सब बातों का जिक्र किया तो सुशील अनमना हो गया.

"अरे हम भी मना किये लेकिन कोई सुने तब ना. अब अम्मा की तबियत बहुत ख़राब रहती है और छोटे भाई बहन को देखने वाला कोई नहीं है. इसलिए मुझे शादी करनी पड़ रही है", सुशील ने बताया.

शादी के बाद सुशील के कुछ महीने अच्छे गुजरे और उसे भी कभी कभी सुशील के घर जाने और भाभी के हाथ का भोजन करने का मौका मिला. लेकिन ये ख़ुशी ज्यादा दिन नहीं टिकी, अब पत्नी के लिए कुछ लेना हो तो सुशील किसके सामने हाथ फैलाये. वह तो खुद ही अपनी पढ़ाई का खर्च घर से लेता था. सुशील का तनाव बढ़ने लगा और उसके सेहत पर इसका फ़र्क़ अगली मुलाकात में राजू को दिखा.

"क्या बात है यार, बहुत परेशान लग रहे हो. भाभी की तबियत ठीक तो है, कोई और दिक्कत?, उसने एक सांस में सब पूछ लिया.

सुशील कुछ देर उसको देखता रहा फिर उदास होकर बोला "यार दिक्कत तो भाभी की ही है, उसके लिए कुछ लाना मुश्किल हो जाता है, कहाँ से पैसे लाऊँ?

उसने सुशील को तसल्ली दिया कि सब ठीक हो जाएगा और फिर वह अपनी पढ़ाई में लग गया. एक दिन वह लंका से रात में लौटा तो बगल के कमरे वाले ने बताया कि तुम्हारा दोस्त सुशील आया था लेकिन उसकी दिमागी हालत ठीक नहीं लगती थी. कुछ बात है क्या, पहले तो ठीक ही लगता था.

उसे झटका सा लगा, आखिर वही हुआ जिसका उसे डर था. अगले दिन वह अपने एक और दोस्त के साथ सुशील के घर गया, वहां पर स्थिति ठीक नहीं थी. सुशील के पिताजी और माँ बहुत दुखी थे और उसकी पत्नी से तो बात करने की हिम्मत भी वह नहीं जुटा पाया. सुशील के पिताजी ने बताया कि एक बार पहले भी उसे यह दिक्कत हुई थी तो इलाज कराया गया था. अब वापस उसी डॉक्टर का इलाज चल रहा है, उम्मीद है जल्दी ही ठीक हो जाएगा.

वह हॉस्टल वापस लौट आया, सुशील की परेशानी की असली वजह तो कोई समझने के लिए तैयार ही नहीं था. एक तरफ बेहद कठिन पढ़ाई और दूसरी तरफ पत्नी के सामने खली हाथ जाना, उसे मानसिक रूप से काफी तकलीफ हो रही थी. कुछ हफ्ते बीते और एक दिन सुशील शाम को उसके कमरे पर हाजिर था.

"बहुत दिन हो गया था तुमसे मिले राजू, सब ठीक है ना?

उसने सुशील को गौर से देखा, काफी दुबला हो गया था लेकिन मानसिक रूप से अब वह स्वस्थ नजर आ रहा था. उसने राहत की सांस ली और अगले दो तीन घंटे दोनों बात करते रहे. लेकिन उसने एक बार भी यह नहीं जाहिर होने दिया कि वह सुशील के घर गया था और उसे सब पता है.

अगले छह महीने ठीक गुजरे, सुशील कभी कभी आता और फिर दोनों देर तक भविष्य की बातें करते. वह अब प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के बारे में सोच रहा था और सुशील अपने रिसर्च के बारे में. इसी बीच सुशील की पत्नी ने एक सुपुत्र को जन्म दिया और वह काफी खुश रहने लगा था.

"बस एक बार रिसर्च में एडमिशन मिल जाए, फिर सब ठीक हो जाएगा", अगली बार जब सुशील मिला तो वह प्रसन्न था. उसे भी अच्छा लगा और उसने बताया कि वह बैंक और पी सी एस इत्यादि की तैयारी कर रहा है. सुशील ने उसका हौसला बढ़ाया और बोला "तुमको तो नौकरी आसानी से मिल जायेगी राजू, बस हम एक बार पी एच डी कर लें तो सब ठीक हो जाएगा".

अगले कुछ महीने इसी सब में बीत गए, सुशील अलबत्ता वापस परेशान रहने लगा. उसका एम एस सी पूरा नहीं हो रहा था और वह अब पारिवारिक मोर्चे पर भी उलझन में रहता. दोनों तनाव के चलते एक बार फिर उसका मानसिक संतुलन गड़बड़ाया और वह एक शाम उसके हॉस्टल पहुंचा. उसके हाव भाव ने स्पष्ट कर दिया कि वह ठीक नहीं है और राजू और उसके एक और दोस्त ने मिलकर उसे किसी तरह से रात भर अपने कमरे पर रखा. सुबह होते ही सुशील थोड़ा बेहतर महसूस कर रहा था और उनके मना करने के बावजूद भी वह अपने घर निकल गया.

इस बीच उसका सेलेक्शन इनकम टैक्स में हो गया और वह अन्य परीक्षाएं भी दे रहा था. सुशील ने अब रिसर्च करने का ख्वाब छोड़ दिया और एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने लगा. तनख्वाह बहुत कम थी लेकिन उसके पास और कोई चारा भी नहीं था. सुशील के छोटे भाई बहन भी पढ़ रहे थे और खेती के साथ अपनी नौकरी से वह उनका खर्च पूरा करने की कोशिश कर रहा था.

उसकी पोस्टिंग महाराष्ट्र में हो गयी और वह अपनी नौकरी में उलझने लगा. बीच बीच में पोस्टकार्ड के माध्यम से एक दूसरे का हाल उनको मिलता रहता था और अगले साल उसकी भी शादी हो गयी. शादी में सबके साथ सुशील भी आया था और काफी खुश था.

"तुम्हारी जिंदगी तो सेट हो गयी दोस्त, मुझे अभी बहुत लड़ाई लड़नी है', सुशील ने उसको बधाई देते हुए कहा तो वह मुस्कुरा उठा.

समय बीतता गया, वह साल दो साल में बनारस आता, कभी सुशील से मुलाकात होती कभी नहीं. अब सबके पास फोन आ गया तो बात करना आसान हो गया. एक दो महीने में सुशील उसको फोन करता, सबका हाल चाल पूछता और फिर आने पर मिलने के लिए जरूर बोलता. उसके सभी भाई बहन अपनी अपनी दुनिया में व्यवस्थित हो गए थे और अब सुशील के बच्चे भी पढ़ने के लिए स्कूल जाने लगे. सुशील भी कुछ ट्यूशन पढ़ाने लगा और किसी तरह से अपने बच्चों को पढ़ा रहा था.

दो साल पहले वह जब बनारस आया था तो सुशील बहुत खुश था. उसके बड़े बेटे ने पोस्ट ग्रेजुएशन करके रिसर्च में एडमिशन पा लिया था. छोटा बेटा भी ग्रेजुएशन में था और वह दोनों की पढ़ाई से बहुत संतुष्ट था.

"बड़े बेटे को यू जी सी की स्कॉलरशिप मिल रही है राजू, वह बहुत जल्दी ही डॉक्टर बन जाएगा".

"ये तो बहुत ख़ुशी की बात है दोस्त, आखिरकार बेटा सही जगह पहुँच ही गया. तुम्हारी मेहनत सफल हो गयी, बस बेटे की शादी जल्दी मत करना", उसने सुशील की पीठ थपथपाते हुए कहा.

"बिलकुल नहीं, जब तक वह किसी कॉलेज में लेक्चरर नहीं बन जाता, उसकी शादी का हम सोचेंगे भी नहीं. आखिर मैंने जो भोगा है, उसे बच्चे क्यों भोगें", सुशील की आँखों में चमक थी. उस समय भी वह अपनी साइकिल से ही आया था. कुछ देर तक दोनों लंका पर एक दुकान पर चाय पी और गप शप किया. फिर आदतन दोनों हॉस्टल की तरफ निकल गए.

हॉस्टल पहुंचकर दोनों अंदर का एक चक्कर लगाते और फिर बाहर निकलकर मंदिर के अहाते में बैठ जाते. उसके समय का कोई भी व्यक्ति हॉस्टल में नहीं मिला था लेकिन फिर भी एक सुखद एहसास जरूर होता था. कभी कभी दोनों उसके पुराने कमरे पर भी जाते और जो लड़का वहां रह रहा होता उससे पुराने समय की बात करते. एक बात और थी जो उसको हमेशा महसूस होती कि सुशील हॉस्टल आकर थोड़े देर के लिए खो जाता था, कभी कभी उसे लगता जैसे वह उससे कुछ कहना चाहता हो लेकिन कह नहीं पा रहा हो. लेकिन उसने इस विषय में न तो कभी पूछा और न कभी सुशील ने कुछ बताया.

इन्हीं सोचों में गुम वह अर्दली बाजार पहुँच गया, गाँव में चचेरे भाई की शादी थी तो सब गाँव जाने की तैयारी कर रहे थे. उसके लिए खाना रखा हुआ था, उसने पहले स्नान किया और फिर भोजन. फिर सभी लोग गाँव निकल गए.

अगले तीन दिन शादी की धूमधाम चलती रही और चौथे दिन कुछ लोग अर्दली बाजार आ गए. वह भी शिवपुर आया और फिर उसने सुशील को फोन किया "आज शाम को लंका पर मिलते हैं सुशील, ठीक है ना".

सुशील तो मानो उसके फोन का इन्तजार ही कर रहा था, उसने 5 बजे लंका पर मिलने की बात कही. अर्दली बाजार से लंका दिन में जाना कुछ ऐसा था मानो बनारस से जौनपुर जाना, दोनों में एक घंटा लग जाता था. खैर उसके पास तो स्कूटी थी इसलिए वह आराम से लंका पहुँच गया लेकिन सुशील तो अपनी साइकिल से ही आया.

लंका पहुंचकर उसने फोन लगाया 'कहाँ तक पहुंचे सुशील?

"बस 15 मिनट और, पहुँच रहे हैं", सुशील का जवाब आया.

उसने एक नजर लंका के मार्किट पर डाली, कितना कुछ बदल गया है पिछले सालों में. एक समय था जब गर्मी में हर रात वह मैंगो शेक पीने आता था. और अगर मेस बंद होती तो पहलवान का लवंगलता और एक पुरवा गरम दूध पीकर काम चल जाता था. उस समय पहलवान की बस एक दुकान थी, अब तो सड़क के दोनों तरफ मिलकर 4 तो पहलवान की ही दुकान थी, उसके अलावा भी कुछ अन्य दुकानें. रविदास गेट भी अपनी पूरी भव्यता से बन गया था और शिवम सिनेमाहॉल, जहाँ पढ़ाई के समय फ़िल्में देखा करते थे, एक बहुत बड़ी मल्टी स्टोरी कॉलोनी में तब्दील हो गया था.

"राजू, का हाल हौ, खूब मजा भयल शादी में", आज सुशील पूरी तरह पुराने अंदाज में था. अब उससे भी खड़ी हिंदी में बात करते नहीं बना "आवा, चाय पियल जाय. अब शादी बियाह में ओतना मजा नाहीं आवेला, जितना पहिले आवत रहल".

चाय पीकर दोनों बी एच यू के अंदर चल पड़े, सुशील ने अपनी साइकिल मुख्य द्वार पर खड़ी कर दी और दोनों स्कूटी से हॉस्टल की तरफ बढ़ चले. हॉस्टल के सामने पहुंचकर एक बार फिर दोनों पुराने दिनों में खो गए.

"क्या समय था सुशील, कितना सुकून था और जीवन में बस आनंद ही आनंद था उस समय", उसने सुशील से कहा.

सुशील मुस्कुरा उठा और थोड़ी देर बाद दोनों विश्वनाथ मंदिर के प्रांगड़ में बैठ गए. शाम अब लगभग ढल चुकी थी और अँधेरा होने लगा था. मंदिर के अंदर और बाहर की बत्तियां जल गयी थीं और रह रह कर अंदर से बजते घंटे की आवाज बहुत सुखद लग रही थीं.

"आज हम कुछ कहने वाले हैं राजू, हर बार सोचते थे कि कहें लेकिन कह नहीं पाते थे", सुशील की बात पर वह चौंका. उसे लगा कि शायद कोई घरेलू समस्या होगी जिसके लिए वह सलाह लेना चाहता है.

"हाँ, हाँ, बोलो दोस्त, क्या बात है?

सुशील ने गहरी सांस ली और उसकी तरफ देखते हुए बोला "मुझे यह मालूम है कि बीच बीच में मेरी मानसिक स्थिति खराब हो जाती थी और मैं हॉस्टल के तुम्हारे कमरे पर भी आ जाता था. तुम्हे उस समय कितनी दिक्कत होती थी, मैं समझ सकता हूँ दोस्त. लेकिन तुमने जिस तरह से मुझे संभाला और मुझे आज तक इसका एहसास भी नहीं होने दिया उसके लिए मैं हमेशा तुम्हारा आभारी रहूँगा".

वह भौचक्का रह गया, उसने कभी सोचा भी नहीं था कि सुशील को इसका एहसास भी है. वह कुछ कहता उसके पहले सुशील ने आगे कहा "तुम्हारी जगह कोई और होता तो शायद मुझे दोस्त नहीं रहने देता, मुझसे दूर चला जाता. लेकिन तुमने सच्चे अर्थों में दोस्ती निभायी, शुक्रिया".

वह कुछ कहता लेकिन सुशील ने उसके हाथ को कस कर अपने हाथ में ले लिया. मंदिर में घंटा और शंख बजने की आवाज आयी और वह ख़ामोशी से मंदिर से निकलते प्रकाश को देखने लगा. उसने आज फिर सुशील को ये एहसास नहीं होने दिया कि उसे सब मालूम था, कुछ राज जाहिर न हों तो ही बेहतर होता है.

"चला बाहर चाय पीयल जाय", उसने सुशील को पकड़कर उठाया और दोनों मंदिर के बाहर चाय की दुकान की तरफ निकल गए.

Tuesday, April 27, 2021

असली परिवर्तन- कहानी

 कैशियर प्रवीण ने मोटरसाइकिल पहाड़ी के इस तरफ़ ही खड़ी कर दी, बमुश्किल एक कच्चा रास्ता वहाँ तक गया था जिसपर बहुत सँभालकर ही दो पहिया वाहन चल सकते थे। मुख्य क़स्बे से काफ़ी दूर यह आदिवासी गाँव कुछ इस तरह स्थित था कि सामान्यतया कोई अधिकारी वहाँ जा ही नहीं पाता था। सबसे बड़ी दिक़्क़त थी वहाँ पहुँचना, न तो मोटरसाइकिल वहाँ जाती थी और न ही कोई अन्य वाहन। बस पैदल ही जाना एक तरीक़ा था और यही वजह थी कि कोई-न-कोई बहाना बनाकर लोग वहाँ जाने से कतराते थे। एक बार सरकारी नौकरी मिल गई तो फिर पैदल कौन चलना चाहता है, दो साल की नौकरी होते होते तो क्लर्क भी कार ख़रीदने के लिए सोचने लगता है, अफ़सर की तो बात ही दीगर है।

अगस्त महीने में बरसात लगभग समाप्त हो चुकी थी और चारो तरफ़ हरियाली नज़र आ रही थी। बरसात ख़त्म होने से एक फ़ायदा यह था कि रास्ते में कीचड़ नहीं था वरना वहाँ जाने का इरादा छोड़ना पड़ता। साल के तीन चार महीने तो उन गाँवों में जाने का सोचा भी नहीं जा सकता था। पता नहीं किसी आपदा की स्थिति में ऐसे गाँवों तक मदद कैसे पहुँचती होगी, यह सोचने की बात थी। सोयाबीन की फ़सल खेतों में लग चुकी थी और जगह-जगह आम और जामुन के पेड़ भी अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे थे। कुल मिलाकर मौसम खुशगवार था और ऐसे में उसे किसी पिकनिक स्थल पर जाने जैसी अनुभूति हो रही थी। उसे याद आया अपने कॉलेज के दिन जब उनका ग्रुप दूरदराज़ के गाँवों में पिकनिक मनाने जाता था और हरियाली को देखकर उनकी आँखों को कितना सुकून मिलता था। दरअसल कॉलेज के उसके ग्रुप में शायद ही कोई ऐसा था जो गाँव से था और गाँव की तकलीफ़ का अंदाज़ा भी लगा पाना उनके बस की बात नहीं थी।

जब बैंक में इंटरव्यू देने जाना था तब उसने कभी यह सोचा भी नहीं था कि उसे इतने पिछड़े इलाक़े में काम करने का मौक़ा मिलेगा। वैसे ऐसी बात भी नहीं थी कि उसकी इच्छा ऐसी जगहों पर काम करने की नहीं थी। भले ही वह गाँव में रहा नहीं था लेकिन कहीं-न-कहीं उसकी संवेदना के तार गाँव और ग़रीबों से जुड़े हुए थे। कोर्स की पढ़ाई के अलावा उसकी हिंदी कहानियों तथा उपन्यास पढ़ने में बहुत रुचि थी और ग्रामीण परिवेश पर लिखने वाले लेखक उसे बेहद पसंद थे। शायद वह ख़ुद गाँव में नहीं रहा था इसलिए भी उसे वह परिवेश बहुत आकर्षित करता था। और बेशक इन्हीं सब वजहों से ही वह एक संवेदनशील इनसान भी बन पाया था।

नौकरी के शुरुआती दौर में वह छोटे क़स्बों तथा छोटे शहरों में ही रहा था और इस वर्ष उसे पहली बार रूरल पोस्टिंग मिली थी। दरअसल बैंक के एक नियम के चलते उसको ग्रामीण क्षेत्र में कार्य करना ज़रूरी था वरना उसके अगले पदोन्न्ति में दिक़्क़त आती। बैंक का उज्जैन अंचल ऐसा अंचल था जिसमें अधिकतर शाखाएँ या तो ग्रामीण क्षेत्रों में थी या छोटे जगहों पर थीं। इसलिए यहाँ पर ग्रामीण पदस्थापना पूरा करने में कोई दिक़्क़त नहीं आनी थी। उसे पोस्टिंग मिली रतलाम से लगभग 45 किमी दूर एक ऐसी जगह पर जहाँ सिर्फ़ गाँव थे, हरियाली थी, पहाड़ थे और प्राकृतिक ख़ूबसूरती थी। इसके साथ-साथ एक और बात थी जो दरअसल परेशान करने वाली थी, और वह थी उस इलाक़े की ग़रीबी। लेकिन यहाँ पर आनेवाले अन्य लोग सबसे ज़्यादा परेशान इसलिए रहते थे कि यहाँ बड़ी-बड़ी दुकानें या होटल नहीं थे। जब उसकी पोस्टिंग भी इस शाखा में हुई थी तो कई लोगों ने उसे नेक सलाह देने की कोशिश की "अरे साहब लोगों से बात करके उज्जैन के आसपास की ग्रामीण शाखा में पोस्टिंग करवा लो। रूरल का रूरल भी हो जाएगा और उज्जैन से आना-जाना भी हो जाएगा।” उसे भी पता था कि बहुत से लोग येन-केन-प्रकारेण शहरों के आसपास ही अपनी नौकरी गुज़ार देते हैं। उसने उन प्रलोभनों को दरकिनार करके ख़ुशी-ख़ुशी अपनी नई शाखा में जाना स्वीकार कर लिया तो उन शुभचिंतकों को लगा कि कुछ ही दिन में इसकी अकल ठिकाने लग जाएगी।

"पागल मत बनो, कुछ भी नहीं है वहाँ। न कोई मार्केट, न होटल, पक जाओगे वहाँ।”

ख़ैर उसके लिए ये चीज़ें फ़िलहाल कोई मायने नहीं रखती थीं, वह तो कहीं-न-कहीं यही चाहता था। बल्कि उसे तो यह भी लगा कि इसी बहाने वह प्रकृति से और गाँवों से और क़रीब से जुड़ जाएगा।

"मुझे कोई दिक़्क़त नहीं होगी, आख़िर नौकरी ही तो करनी है", उसने मुस्कुराकर जवाब दिया तो बात ख़त्म हो गई।

उज्जैन से रतलाम और फिर रतलाम से उस गाँव की शाखा में पहुँचते पहुँचते शाम हो गई। जैसे ही वह शाखा में पहुँचा, वहाँ के वर्तमान प्रबंधक की साँस में जैसे साँस आ गई। दरअसल पिछले दो महीने में दो लोग, जिनकी पोस्टिंग उस शाखा में हुई थी, अपना तबादला रद्द करा चुके थे और वह वहाँ तीन साल से ज़्यादा समय से पोस्टेड या यूँ कहें कि फँसा हुआ था।

"आइए शर्माजी, ज़्यादा दिक़्क़त तो नहीं हुई यहाँ आने में?

कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनका उत्तर पूछनेवाले को अमूमन पता होता है और उसने भी वही उत्तर दिया "कोई ख़ास दिक़्क़त नहीं हुई, बस रतलाम से यहाँ आने में समय लग गया।”

"आप तो अपनी मोटरसाइकिल ले ही आएँगे, फिर दिक़्क़त नहीं होगी। वैसे शाखा में भी एक मोटरसाइकिल है और हम लोग रतलाम जाने के लिए उसका इस्तेमाल कर लेते हैं", वर्तमान प्रबंधक ने मुस्कुराते हुए कहा। उनकी मुस्कराहट इसलिए भी ज़्यादा थी कि अब उनको अपनी मनचाही शहरी जगह पर नियुक्ति मिल जाएगी।

अगला दो दिन उसका स्टाफ़ से बात करने में और गाँव के प्रधान और कुछ अन्य लोगों से मेल मुलाक़ात में बीत गया। तीसरे दिन पुराने प्रबंधक जब उस शाखा से अंततः विदा हुए तो उनके चेहरे पर जो राहत नज़र आ रही थी, वह सबको दिखाई पड़ रही थी।

"जैसे ही दो साल हो जाएगा, आप यहाँ से अपना तबादला करवा लीजिएगा। हमारी तरह तीन साल अगर यहाँ फँस गए तो बहुत तकलीफ़ होगी", जाते-जाते पुराने प्रबंधक ने उनको चुपके-से गुरुमंत्र भी दे-दिया।

उसने हामी में सर हिलाया और उनको विदा करके अपनी सीट पर बैठ गया। अब उसने एक पूरी निगाह शाखा के अंदर डाली, फर्नीचर पुराना तो था ही, टूटा हुआ भी था। दीवार पर लगा हुआ पेण्ट शायद दसियों साल पुराना था और बिजली के तार इतने बेतरतीबी से चारो तरफ़ फैले हुए थे कि उसे देखकर उलझन होने लगी। सबसे पहले शाखा का रखरखाव दुरुस्त करना होगा, पिछले कई प्रबंधकों ने उसपर कोई भी ध्यान नहीं दिया था। ग्राहकों के लिए रखी हुई कुर्सियाँ भी जाने किस जमाने की लग रही थी और बाथरूम का तो बेहद बुरा हाल था। बस एक ही चीज़ बेहतर थी कि वहाँ कोई महिला कर्मचारी पदस्थ नहीं थी वरना उसके लिए यहाँ काम करना कितना कठिन होता।

उसने अपने जूनियर अधिकारी को बुलाया और बात करने लगा "आप लोगों को ख़राब नहीं लगता है कि शाखा इस हाल में है। आख़िर इसे साफ़-सुथरा रखने में क्या दिक़्क़त है?

उस अधिकारी ने कोई जवाब नहीं दिया लेकिन उसे समझ में आ गया कि यहाँ किसी को इन चीज़ों में दिलचस्पी नहीं है। कुछ ही देर में उसको पता चल गया कि एक दफ्तरी और कैशियर को छोड़कर बाक़ी सभी स्टाफ़ रतलाम से आते-जाते हैं और उनका रोज़ का दो-तीन घंटा सिर्फ़ इसी में लग जाता है। उसे यह भी पता चल गया कि पिछले तीन प्रबंधक अपनी पोस्टिंग को बस किसी तरह ढो रहे थे, उनको लगता था जैसे उन्हें सजा के तौर पर यह शाखा दी गई है। अब अगर सजा ही मान लिया है तो किसी को इसके विकास या रखरखाव से क्या फ़र्क़ पड़ने वाला था। चूँकि यह शाखा आंचलिक कार्यालय से भी काफ़ी दूर और काफ़ी अंदर थी तो वहाँ से भी साल दो साल में ही कोई आता था और फटाफट भाग लेता था। वैसे भी उनके आने का मुख्य कारण रतलाम आना होता था, रतलाम सोने के लिए बहुत मशहूर था और वहाँ सोना सुद्ध और सस्ता भी मिलता था। विभिन्न प्रदेशों से व्यापारी वहाँ सोना ख़रीदने आते थे और इसी क्रम में अन्य जगहों से भी अधिकारी आया करते थे। मशहूर तो रतलाम का सेव भी था लेकिन सिर्फ़ सेव के लिए शायद ही वहाँ कोई आता।

उसने दफ्तरी को बुलाया और सबसे पहले शाखा के रखरखाव के बारे में बात करने लगा। चूँकि दफ्तरी वहीं रहता था, लोगों में उसकी अच्छी पहचान थी इसलिए उससे बेहतर कोई अन्य स्टाफ़ उसे इस कार्य के लिए नहीं लगा। थोड़ी देर के बातचीत में ही दफ्तरी के जवाब ने उसे सोचने पर मजबूर कर दिया "साहब, किसी भी बड़े साहब ने शाखा के बारे में सोचा ही नहीं, उन्हें तो बस सुबह यहाँ आने और शाम होते ही यहाँ से भागने की जल्दी रहती थी। मैंने ख़ुद आगे बढ़कर उनसे कहा कि अपनी शाखा को ठीक-ठाक करा लिया जाए तो किसी ने भी हाँ नहीं किया।”

उसके दिमाग़ में अपने एक सीनियर अफ़सर, जिनकी वह बहुत इज़्ज़त करता था, की बात कौंध गई "जब किसी को अपनी पोस्टिंग पनिशमेंट पोस्टिंग लगने लगती है तो सबसे ज़्यादा नुक़सान संस्था का ही होता है।” उसे इस शाखा में यह चीज़ स्पष्ट रूप से नज़र आ रही थी। अधिकतर स्टाफ़ आने-जाने में ही लगा रहता था और शाखा का व्यवसाय इतना ज़्यादा भी नहीं था कि उससे बहुत फ़र्क़ पड़े। लेकिन उसे व्यवसाय में वृद्धि नहीं होने की एक साफ़ वजह तो पता चल ही गई थी।

"आप तुरंत किसी कारीगर को बुलवा लीजिए जो यहाँ मरम्मत कर सकता हो और शाखा की पुताई के लिए भी किसी को खोजिये", उसने दफ्तरी से कहा तो उसका चेहरा चमक उठा।

'ठीक है साहब, मैं आज ही बुलवाता हूँ, मेरे पहचान के मिस्त्री हैं इस गाँव में।”

"एक और बात, मेरे रहने के लिए भी कोई ठीकठाक मकान ढूँढ़िए यहाँ, मेरे लिए रोज़ अपडाउन करना ठीक नहीं रहेगा", उसने दफ्तरी को कहा तो उसके आश्चर्य का पारावार ही नहीं रहा।

अगले दो हफ़्ते शाखा की मरम्मत, रँगाई पुताई और अपना घर खोजकर उसमें रहने की व्यवस्था में लग गया। इस बीच शाखा के बाक़ी स्टाफ़ को यह महसूस हो गया कि अब तो भागने से नहीं चलेगा, आख़िर ख़ुद मैनेजर गाँव में रहने लगा है। इसका नतीजा यह निकला कि जो शाखा ५ बजे के बाद बंद होने लगती थी, अब ६ बजे के बाद भी खुली रहने लगी। गाँव के लोगों में भी एक उत्साह जगा कि अब उनको बैंक से बेहतर सेवा मिलेगी और वे भी शाखा में ज़्यादा संख्या में आने लगे। लगभग १५ दिन बाद ही शाखा का कायाकल्प हो चुका था और जो शाखा किसी सरकारी दफ़्तर जैसी नज़र आती थी वह अब एक बेहतर जगह नज़र आने लगी। इसी बीच आंचलिक कार्यालय से बात करके उसने नया बोर्ड लगवा दिया और एकाध नया कंप्यूटर भी लग गया।

उस गाँव और आसपास के ३० किमी में वह एकलौती बैंक शाखा थी और जितनी भी सरकारी योजनाएँ थीं, वह सब उसी के माध्यम से लागू होती थी। हजारो की संख्या में पेंशन खाते, शून्य राशि के जनधन खाते, मनरेगा के मज़दूरों के खाते, बच्चों की छात्रवृत्ति के खाते और तमाम किसानों के कृषि तथा अन्य छोटे मोटे ऋण के खाते। मतलब खुदरा काम इतना रहता था कि दिन कैसे ग्राहकों के साथ बात करते और उनकी समस्या हल करते बीत जाता, पता ही नहीं चलता था। साथ ही साथ चूँकि गाँव में इंटरनेट बहुत धीमा चलता था इसलिए अक्सर काम भी सुस्त चाल से ही होता था। महीना बीतते बीतते शाखा के व्यवसाय में भी वृद्धि नज़र आने लगी और अब उसने अपना ध्यान शाखा के बजट को पूरा करने के लिए लगाया। पिछले कई सालों में न तो किसी मैनेजर ने व्यवसाय वृद्धि के लिए कोई ख़ास प्रयास किया था और न ही आंचलिक कार्यालय ने इसके बारे में ज़्यादा पूछताछ की थी। इसलिए उसे लग गया था कि वह बड़े आराम से अपने शाखा को काफ़ी आगे ले जा सकता है।

जैसे-जैसे आसपास के गाँव के लोग उस शाखा से जुड़ते गए, व्यवसाय बढ़ता गया। सरकार द्वारा लाई गई हर योजना चूँकि बैंक के माध्यम से ही लागू होनी थी इसलिए काम करने का और लोगों की मदद करने का बहुत अच्छा मौक़ा मिला था उसको। एक मैनेजर को एक साथ कितने मोर्चों पर जूझना पड़ता है, अब उसे महसूस हो रहा था। पहले तो सिर्फ़ अपना विभाग ही देखना पड़ता था, चाहे वह डिपाजिट हो या अग्रिम। अब तो डिपाजिट भी बढ़ाना था, ऋण भी बढ़ाना था, वसूली भी करनी थी तथा अन्य तमाम छोटी-छोटी चीज़ें भी उसी को देखनी थी। स्टाफ़ को अबतक उसके कार्यप्रणाली के बारे में पता चल गया था इसलिए अधिकांश लोग उसका साथ देने के लिए तैयार हो गए। दरअसल एक बात हर संस्थान में लागू होती है कि जैसा संस्थान का मुखिया होता है, अधिकांश लोग उसी तरह से बन जाते हैं। और एकाध अपवाद तो अपने ख़ुद के भी परिवार में रहता है तो संस्थान उससे अछूता कैसे रह सकता है।

उसने शाखा को लेकर सबकी सहमति से कुछ नियम बनाए। हर हफ़्ते सभी लोग आधे घंटे के लिए साथ बैठेंगे और शाखा के लिए क्या ज़रूरी है या किस चीज़ में और बेहतर करने की ज़रूरत है, इसपर खुली चर्चा होगी। हर स्टाफ़ को अपना मत रखने का पूरा अधिकार होगा और किसी का भी सुझाव, चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो, उसपर भी राय मशविरा किया जाएगा। पहले तो लोगों को लगा कि ये नियम सिर्फ़ काग़ज़ पर ही रहेंगे और एकाध महीने में इसे सबसे पहले बनाने वाला ही भूल जाएगा। उनका यह अनुभव पिछले कई सालों का था, जब भी कोई नया प्रबंधक आता, शुरूआत में इसतरह की बातें करता और कुछ दिन बाद सब भूल जाता। लेकिन दूसरा महीना बीतते बीतते स्टाफ़ को अहसास हो गया कि इस बार बात अलग है तो हर स्टाफ़ अपनी तरफ़ से एक से बढ़कर एक सलाह रखने लगा। समय पर शाखा को खोलना भी इन्हीं में से एक नियम था और वह ख़ुद रोज़ समय से पहले शाखा में मौजूद रहता था। अब रतलाम से आने वाले स्टाफ़ भी घर से थोड़ा पहले निकलने लगे ताकि वह समय पर बैंक पहुँच सकें। उसने कभी भी किसी को देर से आने के लिए कुछ कहा नहीं लेकिन उसका तरीक़ा ऐसा था कि लोग अपने-आप ही इसका पालन करने लगे। एक बार उसने जो भी स्टाफ़ देर से आया, उसको अपनी तरफ़ से चॉकलेट दिया और दूसरी बार जो समय से आए थे उनको चॉकलेट। तीसरी बार उसे कुछ कहने या करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी और स्टाफ़ के लोग उसके सामने कटोरी में पड़ी चॉकलेट यूँ ही लेकर खाने लगे।

उस शाखा से लगभग 30 गाँव जुड़े हुए थे और आज तक कोई भी प्रबंधक उन सभी गाँवों में नहीं गया था। वैसे तो स्टाफ़ भी शायद ही सभी गाँवों में गया था लेकिन काग़ज़ पर तो हर गाँव में निरिक्षण दर्ज था। उसने अपने ऋण के अधिकारी बंसल को एक दिन बुलाया और उससे इसपर चर्चा करने लगा।

"आप तो पिछले दो साल से यहाँ हैं, आप सभी गाँवों में गए हैं।”

थोड़ा सोचकर बंसल बोला "सर सभी गाँवों में तो नहीं गया हूँ लेकिन अधिकांश गाँवों में गया हूँ। कुछ गाँव ऐसे आदिवासी इलाक़ों में हैं कि वहाँ जाने का कोई साधन ही नहीं मिलता है, अपनी मोटरसाइकिल भी नहीं जाती है।”

"तो फिर उन गाँवों के लोगों को कैसे ऋण दिया जाता है, एक बार तो देखना ही पड़ता होगा?, उसने सवाल पूछा।

'सर वहाँ का बैंक मित्र हमको रिपोर्ट दे देता है और हम लोग उसी को मानकर ऋण दे देते हैं। वैसे जो कैशियर प्रवीण हैं, उनको सब पता है", बंसल ने अपना पक्ष रखा।

'ठीक है, आप ऐसे गाँवों की सूची मुझे दीजिए जहाँ आप नहीं गए हैं, मैं देखता हूँ", उसने मुस्कुराकर कहा।

अब उसकी पहली प्राथमिकता ऐसे गाँव ही थे जहाँ कोई जाता नहीं था। अब वहाँ किसी ज़रूरतमंद को, जिसे वास्तव में ऋण की ज़रूरत है, मदद मिली है या नहीं, यह देखना भी उसके लिए उतना ही ज़रूरी हो गया था। शाम होते होते उसे ऐसे पाँच गाँवों की सूची मिल गई जहाँ कोई जाता नहीं था। उसने कैशियर प्रवीण को अपने केबिन में बुलाया।

"अच्छा प्रवीण, ये पाँच गाँव हैं जहाँ आपके सिवा कोई नहीं जाता है। ये गाँव सचमुच ऐसी जगह हैं जहाँ जाना संभव नहीं है या कोई और वजह है", उसने सूची प्रवीण के सामने रखते हुए कहा।

प्रवीण ने सूची उठाई और देखते हुए बोला "साहब, इन गाँवों में सड़क नहीं जाती है, ये पहाड़ी के दूसरी तरफ़ के आदिवासी गाँव हैं और बहुत ग़रीब हैं। इसीलिए मेरे अलावा कोई यहाँ नहीं जाता। अगर यहाँ जाना है तो बता दीजिए, मैं चला जाऊँगा।”

"मैं भी चलना चाहता हूँ प्रवीण, तुम क्रायक्रम बना लो फिर निकल चलेंगे। एक दिन में एक गाँव तो जा ही सकते हैं हम लोग, है कि नहीं?

"हाँ साहब , दो दिन में तीनों गाँव चल सकते हैं। लेकिन पैदल ख़ूब चलना पड़ेगा और पहाड़ी भी चढ़ना पड़ेगा, आप चल लेंगें न!

उसने ठहाका लगाया "अरे मैं कोई बूढ़ा हूँ या मुझे कोई बीमारी है जो चल नहीं सकता। अगले हफ़्ते चलेंगे हम लोग, ठीक है।”

उन गाँवों में जाने से पहले वहाँ पर बैंक की किस योजना में कितने लोगों की मदद की गई है और वर्तमान में उन लोगों और उनके ऋण ख़तों की क्या स्थिति है, इसका आकलन करना उसे उचित लगा। उसने बंसल से उन गाँवों के लोगों के ऋण ख़तों का ब्यौरा मँगवाया। छोटे-छोटे किसान क्रेडिट कार्ड, मुद्रा योजना के ऋण और सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्र में घर बनाने के लिए भी ऋण दिए गए थे। बहुत से शून्य बैलेंस वाले खाते भी खुले हुए थे और उन गाँवों के दो-चार स्वयं सहायता समूह के खाते भी थे।

उसने गिनती की तो उन पाँच गाँवों में घर बनाने के लिए लगभग 50 लोगों को ऋण दिया गया था और लगभग सभी खातों की स्थिति ख़राब थी। अन्य कृषि ऋण तथा मुद्रा ऋण में भी कमोबेश यही स्थिति थी। उसने बंसल को बुलाकर पूछा "इन गाँवों के अधिकांश ऋण खाते ठीक नहीं हैं, आपने कभी कारण जानने की कोशिश की?

बंसल इस सवाल के लिए तैयार नहीं था, दरअसल ऋण विभाग में बैठने वाला हर अधिकारी सिर्फ़ बड़े ऋण खातों के बारे में ही जानकारी रखता था। उसके पीछे दो वजहें थीं, एक तो यह कि हर शाखा में इतने ज्यादे ऋण खाते थे कि सभी खातों के बारे में जानकारी रखना मुश्किल था। दूसरी वजह यह थी कि ऐसे छोटे ऋण खाते किसी भी शाखा के व्यवसाय पर बहुत असर नहीं डालते थे।

"सर, इतना समय कहाँ होता है कि इन छोटे-छोटे ऋण खातों के बारे में सोचें। वैसे भी स्थानीय नेता इन लोगों को बता देते हैं कि ये पैसा सरकार दे रही है और इसे लौटाने की ज़रूरत नहीं होती", बंसल के जवाब में थोड़ी सच्चाई थी।

"लेकिन अगर नेता इनको बरगलाते हैं तो हमारी भी तो ज़िम्मेदारी है कि उनको समझाए। ख़ैर आगे से यह बात हम लोग सबको समझाएँगे कि यह पैसा लोगों का पैसा है जिसे वापस लौटाना ज़रूरी है", उसने बंसल को समझाया।

"अच्छा एक बात बताओ, ये जो घर बनाने के लिए लोगों को ऋण दिए गए हैं, लोगों ने अपना घर बनवाया है या नहीं? दरअसल इसके पहले वह जिस प्रदेश में था, वहाँ ऐसी कोई योजना नहीं थी।

बंसल ने लंबी साँस ली और बताने लगा "सर, अगर सच कहूँ तो बहुत कम लोगों ने अपने घर बनाए हैं। आपको भी पता ही है कि सरकारी विभाग में कितना भ्रष्टाचार होता है, एक चौथाई पैसा तो विभाग और प्रधान मिलकर खा जाते हैं। उसके बाद जो मिलता है उसमें उनकी दीवार भी खड़ी नहीं हो पाती है, मकान बनाना तो दूर की बात है।

उसका दिमाग़ भी परेशान हो गया, योजनाएँ तो कमोबेश ठीक ही बनती हैं लेकिन उनका कृयान्वयन ठीक नहीं होता है। सरकार की ग़रीबी हटाओ योजना में काग़ज़ पर तो हर जगह ग़रीबों की मदद की गई है लेकिन वास्तविकता में सिर्फ़ सरकारी कर्मचारी और राजनेता ही अमीर हुए हैं, ग़रीबी तो कम नहीं हुई है। ख़ैर उसे अपने तरफ़ से हर संभव कोशिश करनी है कि ज़रूरतमंद को मदद मिले और उसका जीवनस्तर ऊपर उठ सके।

अगले तीन चार दिन में उसने उन गाँवों की पूरी जानकारी इकट्ठा कर ली। वहाँ किस चीज़ की खेती होती है, वहाँ और क्या-क्या व्यवसाय होता है, आदिवासी समाज का रहन-सहन कैसा है। इसके पहले वह किसी आदिवासी गाँव में नहीं गया था इसलिए वह थोड़ा उत्साहित भी था वहाँ जाने के लिए। नौकरी में आने के पहले तक तो उसे यही लगता था कि आदिवासी समाज आज भी अलग-थलग रहता है और उनके यहाँ विकास लगभग न के बराबर है। लेकिन नौकरी में आने के बाद उसकी धरना बदल गई थी और अब वह इसे साक्षात देखने भी जा रहा था।

उसने पहला गाँव "सोजेपुर' चुना जो सबसे नज़दीक तो था ही, वहाँ ऋण के सबसे ज़्यादा खाते भी थे। कई खाते घर बनाने के ऋण के भी थे और सबमें पैसा न के बराबर ही आ रहा था। बस सरकार द्वारा दिए जा रहे ब्याज़ के अनुदान से ही थोड़ी-बहुत वसूली हो रही थी। कैशियर प्रवीण से उसने इस गाँव में रविवार के दिन चलने के लिए कहा तो वह सहर्ष तैयार हो गया।

"ठीक ही रहेगा साहब, रविवार को दोपहर में चलते हैं, मैं आपके घर आ जाऊँगा", प्रवीण ने कहा तो उसे राहत मिली। दरअसल छुट्टी के दिन काम करना बहुत से लोगों को पसंद नहीं होता है और उसे पता नहीं था कि प्रवीण भी तौयार होगा। उसके लिए तो यह अच्छा ही था कि रविवार का दिन भी मज़े में बीत जाएगा, अकेले दिन काटना भी मुश्किल ही होता है। अक्सर रविवार को वह या तो शाखा में ही चला जाता था, पेंडिंग काम निपट जाते थे, या कभी-कभी रतलाम निकल जाता था। वहाँ की शाखा के कुछ दोस्तों से इसी बहाने मुलाक़ात हो जाती थी।

रविवार को दोपहर में खाना खाकर वह प्रवीण के साथ सोजेपुर के लिए निकला। प्रवीण ने बता दिया था कि पहाड़ के उस तरफ़ लगभग छह किमी पैदल चलना पड़ेगा, तब वहाँ पहुँच पाएँगे। आख़िरकार पहाड़ी के इस तरफ़ मोटरसाइकिल खड़ा करके जब दोनों पहाड़ी की तरफ़ बढ़े तो उसने पूछ लिया "यहाँ से मोटरसाइकिल चोरी तो नहीं हो जाएगी प्रवीण?

"नहीं साहब, हम लोग यहाँ अक्सर खड़ा करके जाते हैं, कोई नहीं ले जाता। वैसे भी हैंडल लॉक लगा दिया है मैंने।”

अगले पंद्रह मिनट में दोनों पहाड़ी पार कर चुके थे और कुछ किमी दूर गाँव सोजेपुर नज़र आ रहा था। दूर से तो पेड़ों के बीच में सिर्फ़ छप्पर के ही मकान दिखाई दे रहे थे। खेतों की पगडंडी से होते हुए वे जब गाँव पहुँचे तो बाहर एक गुमटी मिली जिसमें गुटका, बीड़ी, कुछ नमकीन के पैकेट और बिस्किट इत्यादि नज़र आ रहे थे। अब इतना तो उसे समझ में आ गया था कि विकास की हवा यहाँ थोड़ा-बहुत तो पहुँच ही गई है।

सामने से एक व्यक्ति आता दिखाई दिया जिसने उनको नमस्कार किया। छोटे गाँवों में यह ख़ासियत होती है कि गाँववाले सरकारी कर्मचारियों को पहचानते हैं। प्रवीण ने नमस्कार का जवाब दिया और दोनों आगे बढ़ गए। कहीं कहीं उसे ईंट की दीवार वाले अर्धनिर्मित मकान दिखाई दे रहे थे और उसने अंदाज़ा लगा लिया कि इन्हीं लोगों ने घर बनाने के लिए ऋण लिए होंगे। इक्का-दुक्का लोग मिलते गए, कुछ घरों के आगे गाय भी बँधी हुई नज़र आई। वैसे अधिकांश घरों के सामने बकरियां ज़रूर नज़र आ रही थी और कहीं कहीं साइकिल भी खड़ी थी। गाँव के लगभग आख़िर में वह घर था जहाँ उनको जाना था, जोखू का घर। जोखू ने भी घर बनवाने के लिए ऋण लिया था और उसकी क़िस्त समय से जमा नहीं कर रहा था।

जोखू के घर के सामने पहुँचते ही उसे छप्पर का घर दिखा और साथ ही दो ईंट की दीवारें भी। घर के सामने चार बकरियां बैठी थीं जो उनको देखते ही उठ खड़ी हो गईं। दो छोटी-छोटी बच्चियाँ भी अधनंगे वहाँ खेल रही थीं और कुछ लकड़ियाँ भी एक किनारे रखी हुई थीं। प्रवीण ने आवाज़ लगाई "जोखू भाई, कहाँ हो? बाहर आओ, साहब मिलने आए हैं।”

दो-तीन आवाज़ लगाने के बाद झोपड़ी से एक महिला बाहर निकली, प्रवीण समझ गया कि वह जोखू की जोरू है। अब उसने भी उस औरत को ध्यान से देखा, बेहद कमउम्र थी उसकी और एक-दो तीन महीने का बच्चा भी गोद में था। एक साड़ी जो बदरंग हो चुकी थी, उसके शरीर को ढकने की कोशिश कर रही थी। इतनी कमउम्र में तीन बच्चे, उसे सदमा सा लगा।

"अरे जोखू भाई कहाँ है, उसे भेजो", प्रवीण ने फिर से कहा।

थोड़ी देर बाद उस महिला ने दर्दभरे स्वर में कहा 'आज तीसरा दिन है, अभी तक लौटा नहीं है। कुछ काम पर जाने के लिए बोलकर गया था।”

ओह, अब क्या किया जाए, उसे समझ में नहीं आया। ख़ैर उसने अपनी तरफ़ से समझाते हुए कहा "अरे जोखू बैंक में पैसा नहीं भर रहा है, उसको पैसा भरने के लिए बोलना।”

आज पहली बार उसे लग रहा था कि उसे पैसे भरने के लिए नहीं कहना चाहिए था। लेकिन नौकरी भी तो करनी है। अगर जोखू आएगा तो उससे बात करके मदद करने का कोई-न-कोई रास्ता वह निकाल ही लेगा।

"घर में खाने के लिए भी कुछ नहीं बचा है साहब।”, जोखू की पत्नी की आवाज़ ने जैसे उसे हिलाकर रख दिया। उसने प्रवीण की तरफ़ देखा, प्रवीण भी ख़ामोश था। आँखों ही आँखों में उसने प्रवीण को वापस चलने के लिए इशारा किया और धीरे-से उसने पैंट की जेब में हाथ डालकर तीन चार सौ रुपये निकाले। पहले तो उसने सोचा कि जोखू की पत्नी को वह सीधे ही रुपया पकड़ा दे लेकिन फिर उसका मन गंवारा नहीं किया। उसने धीरे-से वह पैसे वहाँ गिरा दिए और आगे चल दिया। अब किसी और गाँव वाले के घर उसकी जाने की इच्छा नहीं हुई।

"प्रवीण, यहाँ सबकी हालत तो ऐसी ही लगती है, ऐसा करते हैं कि अगली बार इनको इकट्ठा करके बात करते हैं और इनकी आमदनी बढ़ाने के लिए कुछ बेहतर काम करते हैं।”, उसने वापस चलते हुए कहा। उसे अब यह महसूस हो रहा था कि उसका असली काम अब शुरू होने वाला है, जब तक ये गाँव सही अर्थों में आगे नहीं बढ़ते, उसके लिए देश के विकास का कोई अर्थ नहीं होगा।