ट्रेन ने हल्का सा झटका दिया और स्टेशन पर खड़ी हो गयी. उसने खिड़की का पर्दा हटाया, सामने ही "मंडुआडीह" स्टेशन का पीला और चकता हुआ बोर्ड दिखाई दे रहा था. सामान तो उसने पहले ही समेट लिया था, अपनी सीट से उठकर उसने सामान उठाया और बाहर प्लेटफार्म पर उतर गया. सामने ही कुछ कुली उसकी तरफ आशा भरी निगाह से देख रहे थे लेकिन उसके पास बस एक छोटा सा बैग और पीठपर लगकाने वाला झोला ही था. वैसे भी कुली वातानुकूलित डब्बों के मुसाफिरों से ज्यादा उम्मीद करते हैं कि उनको सामान उठाने के लिए मिल जाएगा. उसने एक अंगड़ाई ली, घड़ी पर नजर डाली और बाहर की तरफ चल पड़ा. ट्रेन बमुश्किल आधा घंटा देर से थी और बाहर खड़े मित्र सुशील से उसकी बात हो चुकी थी जो उसका ही इन्तजार कर रहा था.
मंडुआडीह
स्टेशन नया नया बना था और काफी साथ सुथरा था. वह पहली बार ही इस स्टेशन पर उतर रहा
था, वैसे तो अधिकतर ट्रेन से वह बनारस कैंट स्टेशन
उतरता था और पीछे के रास्ते बाहर निकलकर अर्दली बाजार का ऑटो पकड़ लेता था. ऑटो तो
आगे की तरफ से भी मिलते थे लेकिन उनको घूमकर ज्यादा रास्ता चलना पड़ता था इसलिए
किराया भी ज्यादा लेते थे. और अधिकांश ट्रेनें प्लेटफार्म 9 पर ही रूकती थीं तो
उसके लिए पीछे से बाहर निकलना और आसान हो जाता था. लेकिन कैंट की तुलना में यह
स्टेशन बहुत बेहतर लगा उसे,
भीड़ भी कम थी और गन्दगी भी नहीं के बराबर.
मंडुआडीह से अचानक उसके मन में पुराना समय, जब
वह बी एच यू में पढता था,
याद आ गया. सन 1986 के आसपास की बात थी, उस समय मंडुआडीह जाने की चर्चा करना भी अपराध
माना जाता था. दरअसल उस समय यह इलाका धंधेवाली महिलाओं के चलते बदनाम था और यहाँ
पर रहने वाले सामान्य परिवार के लिए भी अपना पता बताना आसान नहीं होता था. बाद में
जब उसने बनारस के इतिहास के बारे में थोड़ा पढ़ा और "राम तेरी गंगा मैली"
फिल्म देखी तो उसे पता चला कि बनारस के चौक क्षेत्र में स्थित "दालमंडी"
को भी इसी वजह से जाना जाता था. अब तो मंडुआडीह और दालमंडी दोनों भिन्न वजहों से
जाने जाते हैं और उनमें से कोई भी वजह ख़राब नहीं है.
जैसे
ही वह बाहर निकला, उसकी नजर देय खड़े सुशील पर पड़ी. दोनों के
चेहरों पर मुस्कराहट आ गयी और उसने सुशील को गले लगा लिया. लगभग दो साल बाद सुशील
से उसकी मुलाकात हो रही थी और समय के चिन्ह सुशील के चेहरे पर स्पष्ट नजर आ रहा
था. वैसे भी सुशील बचपन से ही दुबला पतला था लेकिन उसके गाल भरे हुए थे, लेकिन आज अधपकी दाढ़ी और पिचका हुआ चेहरा, ऐसा लगा जैसे वह किसी उम्रदराज व्यक्ति से मिल
रहा हो.
"बहुत
दिन बाद मुलाकात हो रही है राजू", सुशील
ने मुस्कुराते हुए कहा.
"हाँ, बहुत दिन हो गया था, लगभग दो साल पहले हम लोग लंका पर मिले थे", उसको पुरानी मुलाकात याद हो आयी.
"हाँ, लंका पर ही मिले थे, मैं बी एच यू गया था और तभी बात हुई थी
हमारी", सुशील को सब याद था. दो साल में ही कितना बदल
गया था सुशील, अब उसने गौर किया.
"चलो
बाहर चाय पीते हैं और वहीं गपशप करेंगे", उसने
कहा और दोनों बाहर निकल गए. सड़क के उस पार एक गुमटी थी जहाँ एक बेंच भी पड़ी थी.
दोनों वहीं बैठ गए और सुशील ने आवाज लगायी "दू ठो स्पेशल चाय बनावा उस्ताद, चिन्नी कम डाला". चायवाले ने अपना चायपैन
उठाया, दो कप दूध डाला और चाय चढ़ा दिया.
"बहुत
दुबले लग रहे हो यार, तबियत तो ठीक थी ना", उसने सुशील को देखते हुए पूछा. वैसे तो फोन
दोनों के ही पास था और फोनपर बात भी होती रहती थी लेकिन एक चीज हमेशा होती कि फोन
अक्सर सुशील ही करता. और हर बार बात होने के बाद वह सोचता कि अगली बार वह खुद
सुशील को फोन करेगा लेकिन अपनी व्यस्तताओं के चलते या प्राथमिकताओं के चलते वह फोन
नहीं कर पाता. लेकिन कभी भी उसे सुशील के लहजे से यह नहीं महसूस हुआ कि उसे इस बात
का कोई मलाल है, बल्कि हर बार वह उसके स्वास्थ्य के लिए ही पहला
सवाल करता.
"हाँ, इधर थोड़ी तबियत ख़राब थी, पेट गड़बड़ हो गया था. पत्नी भी आजकल बीमार रहती
है तो खाना भी अक्सर खुद ही बनाना पड़ता है. लेकिन अब ठीक है, वैसे तुम्हारा स्वास्थ्य तो बिलकुल ठीक लग रहा
है, बढ़िया है", सुशील ने उसका कन्धा थपथपाया.
"इस
बार कितने दिन रहना है, एक बार लोहता भी आना", सुशील ने पूछा.
तब
तक कुल्हड़ में चाय आ गयी थी, कुल्हड़
में चाय पीने का आनंद उसे बस बनारस में ही मिलता था. किसी और शहर में वह बात नहीं
थी और बनारस का सुबह का नाश्ता "कचौड़ी और जलेबी" भी उसे और कहीं नहीं
मिला. सुबह के समय गंगा किनारे या लंका या गोदौलिया, कहीं भी चले जाओ, नाश्ता
तो यही मिलता है और इतना स्वादिष्ट कि मन कभी नहीं भरता.
"एक
हफ्ते की छुट्टी मिली है इसबार, अगले
तीन दिन में शादी निपट जाए,
फिर मिलते हैं".
सुशील
ने चाय का एक घूंट भरा और मुस्कुरा उठा. "इस बार बी एच यू भी साथ साथ घूमेंगे
और बी जी तिलक छात्रावास भी जाएंगे, ठीक
है ना".
वह
भी मुस्कुरा उठा, आखिर बी एच यू और बी जी तिलक छात्रावास से उसका
पुराना और लम्बा सम्बन्ध रहा है और सुशील भी उसे भूल नहीं पाता है. चाय पीकर दोनों
उठे तो उसने कहा "अब चलता हूँ अर्दली बाजार, तुम कैसे आये हो".
सुशील
ने जेब से एक चाभी निकाली और उसे दिखाते हुए बोला "हमारी साइकिल तो स्टैंड पर
खड़ी है, हम लेकर घर निकल जाएंगे. तुम सामने वाला ऑटो
पकड़ लो, वह कैंट उतार देगा और वहां से अर्दली बाजार
निकल जाना. शादी से फुर्सत पाकर फोन करना, फिर
लंका पर मिलते हैं".
उसने
सुशील को बाय कहा और ऑटो के पास चला गया. ऑटो में अभी सिर्फ एक सवारी ही थी इसलिए
थोड़ा इंतजार करना था. ऑटो वाला पूरी ताक़त से आवाज लगा रहा था "कैंट, कैंट". उसने अपना बैग सीट पर रखा और सुशील
को स्टैंड से साइकिल लेकर जाते देखने लगा. साइकिल भी लगभग 5-6 साल पुरानी थी और
सुशील उसे चलाते हुए अजीब सा लगा उसको. लेकिन वह कर भी क्या सकता था, सबकी अपनी अपनी परिस्थिति है और उसी के अनुसार
उसका रहन सहन.
"आवा
भैया, सवारी मिल गईल", ऑटो वाले की आवाज पर वह पलटा और ऑटो में बैठ
गया. तीन लोग पीछे और दो लोग ड्राइवर के दोनों तरफ बैठे थे. कहने को तो ट्रैफिक के
नियम के हिसाब से उसे सिर्फ तीन सवारी ही बैठानी थी लेकिन उससे न तो उसका पेट भरता
और न ऑटो की किश्त भरती. उसे याद ही नहीं है कि बनारस में पिछले पचीस सालों में
उसने कभी भी ट्रैफिक नियम का पालन होते देखा हो. हाँ अब तमाम चैराहों पर ट्रैफिक
लाइट जरूर लग गयी हैं लेकिन अगर ट्रैफिक पुलिस का जवान वहां खड़ा न हो तो कोई भी
लाइट के हिसाब से नहीं चलेगा. और रास्ते में जगह जगह खड़े भोलेनाथ की सवारी सांड, उनका अलग ही जलवा रहता है इस शहर में.
ऑटो
आगे बढ़ा तो उसका दिमाग तीस साल पहले चला गया. बनारस में उसका गांव था और गंगापुर
इंटर कॉलेज में उसका एडमिशन कक्षा 11 में हो गया था. उसके गांव से लगभग 10 किमी
दूर इस कॉलेज में पढ़ने के लिए आने वाले क्षेत्रों की संख्या उँगलियों पर गिनने
योग्य ही थी. अधिकतर लड़के सिर्फ इंटर पास करके आगे बी ए में नाम लिखवाने के
उद्देश्य से ही वहां आते थे. शादी ब्याह के लिए उस समय लड़के का कम से कम बी ए करना
या उसमें पढ़ते होना एक जरुरी शर्त होने लगी थी और दहेज़ भी उसके चलते बढ़ जाता था.
खैर रोज साइकिल से 10 किमी जाना और फिर वापस आना, उसके बाद समय मिला तो गांव में क्रिकेट भी खेलना. इसके बाद बचे समय
में पढ़ाई. छुट्टी के दिन खेत में भी काम करना और घर के जानवरों की देखभाल भी साथ
साथ चलता था. गंगापुर कॉलेज में ही उसके मुलाकात हुई थी सुशील से, दोनों की रुचियाँ समान थीं. पढ़ने में दोनों
बराबर की दिलचस्पी रखते थे और अपने कोर्स की पढ़ाई के लिए टीचर्स को बुलाकर क्लास
लाना भी दोनों साथ साथ करते थे. उस कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ने वाले गिने चुने थे और
इसीलिए अंग्रेजी के शिक्षक राम सिंह जिन्हें बच्चे उनकी डील डौल के चलते
"शेरू" कहते थे,
अपने से क्लास लेने के लिए बहुत उत्सुक नहीं
रहते थे. लेकिन सुशील की इच्छा अंग्रेजी पढ़ने में बहुत ज्यादा थी और उसे भी अच्छा
लगता था इसलिए दोनों ने अपनी तरफ से ट्रांसलेशन वगैरह करके टीचर को दिखाना शुरू
किया. अब शेरू की भी इच्छा उनको पढ़ाने की होने लगी और फिर भले ही सिर्फ वही दोनों
क्लास में आएं, उनको पढ़ाते जरूर थे.
सुशील
की आर्थिक स्थिति उसके मुकाबले कमजोर थी लेकिन इसके चलते उनके सम्बन्ध में कोई
फ़र्क़ नहीं था. दोनों एक दूसरे के गाँव आते जाते, खासकर अगर घर पर कोई कार्यक्रम हो तो अवश्य जाते. उनके घरवाले भी
उनकी दोस्ती पर खुश थे, आखिर दोनों में पढ़ने की लगन जो थी. इसी तरह
इंटर की परीक्षा ख़त्म हुई और दोनों उसके बाद कहाँ जाना है, इसके लिए सोचने लगे. सुशील के घर पर कोई इस
मामले में गाइड करने वाला नहीं था इसलिए उसने हरिश्चन्द्र कॉलेज में बी एस सी में
एडमिशन ले लिया. राजू ने बी एच यू का एग्जाम दिया और वह वहां से कृषि विज्ञान में
स्नातक की पढ़ाई करने लगा.
आगे
चलकर उसे महसूस हुआ कि सुशील ने हरिश्चन्द्र कॉलेज में एडमिशन लेकर गलती कर दी.
दरअसल बी एस सी की पढ़ाई कृषि विज्ञानं की पढ़ाई से बहुत कठिन थी और वहां नंबर भी
काफी कम मिलते थे. जितनी मेहनत में सुशील के बमुश्किल 55 प्रतिशत आते, उससे कम मेहनत में वह 90 प्रतिशत से ज्यादा ले
आता था. इसके चलते अब सुशील तनाव में रहने लगा, पढ़ाई
का बोझ बहुत बढ़ गया था इसलिए अब मुलाकात भी कम हो गयी. वह अब छात्रावास में रहने
लगा और एकाध महीने में सुशील उसके कमरे पर आ जाता.
"यार
तुमने गलत जगह एडमिशन ले लिया, इतना
आसान नहीं है हरिश्चन्द्र कॉलेज से पास होना. और बी एस सी के बाद क्या करोगे, कुछ सोचा है?, उसने एक दिन सुशील से पूछा.
सुशील
परेशान तो था ही लेकिन अब उसे पढ़ाई तो करनी ही थी. उसने लम्बी सांस लेते हुए कहा
"मैं मेहनत करूँगा तो हो जाएगा, इसके
बाद एम एस सी और फिर रिसर्च करके लेक्चरर बन जाऊंगा".
"अच्छा, आगे चलकर तुम भी शेरू मास्टर बनोगे", उसने कहा तो दोनों हंस पड़े. उस दिन गंगापुर और
शेरू मास्टर साहब की खूब बातें हुई उनके बीच.
धीरे
धीरे वह अपनी पढ़ाई और हॉस्टल की जिंदगी में रम गया, सुशील से मुलाक़ात कम होने लगी. बीच बीच में उसे पता चलता कि सुशील अब
काफी परेशान रहने लगा है तो वह सोचता कि उससे मिलेगा. लेकिन बात आयी गयी हो जाती
और समय गुजरता गया. तीन साल बाद जब उसने अपना स्नातक पूर्ण किया तो उसे राहत मिली.
काफी अच्छे नंबर आये थे उसके लेकिन सुशील किसी तरह से द्वितीय श्रेणी में बी एस सी
पास कर पाया था. उसका एडमिशन फिर से बी एच यू में ही पोस्ट ग्रेजुएशन में हुआ और
सुशील ने भी हरिश्चंद्र कॉलेज से एम एस सी करना शुरू किया.
इस
बीच एकाध बार उसे लगा जैसे सुशील बातचीत में संतुलन नहीं बना पाता है. उसने पूछा
तो सुशील टाल गया लेकिन उसे एहसास हो गया कि पढ़ाई अब सुशील पर भारी पड़ रही है. कुछ
महीने बाद ही सुशील ने बताया कि उसकी शादी तंय हो गयी है तो उसे ख़ुशी भी हुई और
थोड़ी चिंता भी. आखिर अभी तक तो सुशील किसी तरह अपनी पढ़ाई खींच रहा था लेकिन शादी
के बाद जब पत्नी आ जाएगी तो उसका खर्च कैसे चलेगा. घर भी बहुत संपन्न नहीं था और न
ही सुशील के पास किसी नौकरी में जाने का अवसर नजर आ रहा था. उसने इन सब बातों का
जिक्र किया तो सुशील अनमना हो गया.
"अरे
हम भी मना किये लेकिन कोई सुने तब ना. अब अम्मा की तबियत बहुत ख़राब रहती है और
छोटे भाई बहन को देखने वाला कोई नहीं है. इसलिए मुझे शादी करनी पड़ रही है", सुशील ने बताया.
शादी
के बाद सुशील के कुछ महीने अच्छे गुजरे और उसे भी कभी कभी सुशील के घर जाने और
भाभी के हाथ का भोजन करने का मौका मिला. लेकिन ये ख़ुशी ज्यादा दिन नहीं टिकी, अब पत्नी के लिए कुछ लेना हो तो सुशील किसके
सामने हाथ फैलाये. वह तो खुद ही अपनी पढ़ाई का खर्च घर से लेता था. सुशील का तनाव
बढ़ने लगा और उसके सेहत पर इसका फ़र्क़ अगली मुलाकात में राजू को दिखा.
"क्या
बात है यार, बहुत परेशान लग रहे हो. भाभी की तबियत ठीक तो
है, कोई और दिक्कत?, उसने एक सांस में सब पूछ लिया.
सुशील
कुछ देर उसको देखता रहा फिर उदास होकर बोला "यार दिक्कत तो भाभी की ही है, उसके लिए कुछ लाना मुश्किल हो जाता है, कहाँ से पैसे लाऊँ?
उसने
सुशील को तसल्ली दिया कि सब ठीक हो जाएगा और फिर वह अपनी पढ़ाई में लग गया. एक दिन
वह लंका से रात में लौटा तो बगल के कमरे वाले ने बताया कि तुम्हारा दोस्त सुशील
आया था लेकिन उसकी दिमागी हालत ठीक नहीं लगती थी. कुछ बात है क्या, पहले तो ठीक ही लगता था.
उसे
झटका सा लगा, आखिर वही हुआ जिसका उसे डर था. अगले दिन वह
अपने एक और दोस्त के साथ सुशील के घर गया, वहां
पर स्थिति ठीक नहीं थी. सुशील के पिताजी और माँ बहुत दुखी थे और उसकी पत्नी से तो
बात करने की हिम्मत भी वह नहीं जुटा पाया. सुशील के पिताजी ने बताया कि एक बार
पहले भी उसे यह दिक्कत हुई थी तो इलाज कराया गया था. अब वापस उसी डॉक्टर का इलाज
चल रहा है, उम्मीद है जल्दी ही ठीक हो जाएगा.
वह
हॉस्टल वापस लौट आया, सुशील की परेशानी की असली वजह तो कोई समझने के
लिए तैयार ही नहीं था. एक तरफ बेहद कठिन पढ़ाई और दूसरी तरफ पत्नी के सामने खली हाथ
जाना, उसे मानसिक रूप से काफी तकलीफ हो रही थी. कुछ
हफ्ते बीते और एक दिन सुशील शाम को उसके कमरे पर हाजिर था.
"बहुत
दिन हो गया था तुमसे मिले राजू, सब
ठीक है ना?
उसने
सुशील को गौर से देखा, काफी दुबला हो गया था लेकिन मानसिक रूप से अब
वह स्वस्थ नजर आ रहा था. उसने राहत की सांस ली और अगले दो तीन घंटे दोनों बात करते
रहे. लेकिन उसने एक बार भी यह नहीं जाहिर होने दिया कि वह सुशील के घर गया था और
उसे सब पता है.
अगले
छह महीने ठीक गुजरे, सुशील कभी कभी आता और फिर दोनों देर तक भविष्य
की बातें करते. वह अब प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के बारे में सोच रहा था और
सुशील अपने रिसर्च के बारे में. इसी बीच सुशील की पत्नी ने एक सुपुत्र को जन्म
दिया और वह काफी खुश रहने लगा था.
"बस
एक बार रिसर्च में एडमिशन मिल जाए, फिर
सब ठीक हो जाएगा", अगली बार जब सुशील मिला तो वह प्रसन्न था. उसे
भी अच्छा लगा और उसने बताया कि वह बैंक और पी सी एस इत्यादि की तैयारी कर रहा है.
सुशील ने उसका हौसला बढ़ाया और बोला "तुमको तो नौकरी आसानी से मिल जायेगी राजू, बस हम एक बार पी एच डी कर लें तो सब ठीक हो
जाएगा".
अगले
कुछ महीने इसी सब में बीत गए, सुशील
अलबत्ता वापस परेशान रहने लगा. उसका एम एस सी पूरा नहीं हो रहा था और वह अब
पारिवारिक मोर्चे पर भी उलझन में रहता. दोनों तनाव के चलते एक बार फिर उसका मानसिक
संतुलन गड़बड़ाया और वह एक शाम उसके हॉस्टल पहुंचा. उसके हाव भाव ने स्पष्ट कर दिया
कि वह ठीक नहीं है और राजू और उसके एक और दोस्त ने मिलकर उसे किसी तरह से रात भर
अपने कमरे पर रखा. सुबह होते ही सुशील थोड़ा बेहतर महसूस कर रहा था और उनके मना
करने के बावजूद भी वह अपने घर निकल गया.
इस
बीच उसका सेलेक्शन इनकम टैक्स में हो गया और वह अन्य परीक्षाएं भी दे रहा था.
सुशील ने अब रिसर्च करने का ख्वाब छोड़ दिया और एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने लगा.
तनख्वाह बहुत कम थी लेकिन उसके पास और कोई चारा भी नहीं था. सुशील के छोटे भाई बहन
भी पढ़ रहे थे और खेती के साथ अपनी नौकरी से वह उनका खर्च पूरा करने की कोशिश कर
रहा था.
उसकी
पोस्टिंग महाराष्ट्र में हो गयी और वह अपनी नौकरी में उलझने लगा. बीच बीच में
पोस्टकार्ड के माध्यम से एक दूसरे का हाल उनको मिलता रहता था और अगले साल उसकी भी
शादी हो गयी. शादी में सबके साथ सुशील भी आया था और काफी खुश था.
"तुम्हारी
जिंदगी तो सेट हो गयी दोस्त, मुझे
अभी बहुत लड़ाई लड़नी है', सुशील ने उसको बधाई देते हुए कहा तो वह
मुस्कुरा उठा.
समय
बीतता गया, वह साल दो साल में बनारस आता, कभी सुशील से मुलाकात होती कभी नहीं. अब सबके
पास फोन आ गया तो बात करना आसान हो गया. एक दो महीने में सुशील उसको फोन करता, सबका हाल चाल पूछता और फिर आने पर मिलने के लिए
जरूर बोलता. उसके सभी भाई बहन अपनी अपनी दुनिया में व्यवस्थित हो गए थे और अब
सुशील के बच्चे भी पढ़ने के लिए स्कूल जाने लगे. सुशील भी कुछ ट्यूशन पढ़ाने लगा और
किसी तरह से अपने बच्चों को पढ़ा रहा था.
दो
साल पहले वह जब बनारस आया था तो सुशील बहुत खुश था. उसके बड़े बेटे ने पोस्ट
ग्रेजुएशन करके रिसर्च में एडमिशन पा लिया था. छोटा बेटा भी ग्रेजुएशन में था और
वह दोनों की पढ़ाई से बहुत संतुष्ट था.
"बड़े
बेटे को यू जी सी की स्कॉलरशिप मिल रही है राजू, वह बहुत जल्दी ही डॉक्टर बन जाएगा".
"ये
तो बहुत ख़ुशी की बात है दोस्त, आखिरकार
बेटा सही जगह पहुँच ही गया. तुम्हारी मेहनत सफल हो गयी, बस बेटे की शादी जल्दी मत करना", उसने सुशील की पीठ थपथपाते हुए कहा.
"बिलकुल
नहीं, जब तक वह किसी कॉलेज में लेक्चरर नहीं बन जाता, उसकी शादी का हम सोचेंगे भी नहीं. आखिर मैंने
जो भोगा है, उसे बच्चे क्यों भोगें", सुशील की आँखों में चमक थी. उस समय भी वह अपनी
साइकिल से ही आया था. कुछ देर तक दोनों लंका पर एक दुकान पर चाय पी और गप शप किया.
फिर आदतन दोनों हॉस्टल की तरफ निकल गए.
हॉस्टल
पहुंचकर दोनों अंदर का एक चक्कर लगाते और फिर बाहर निकलकर मंदिर के अहाते में बैठ
जाते. उसके समय का कोई भी व्यक्ति हॉस्टल में नहीं मिला था लेकिन फिर भी एक सुखद
एहसास जरूर होता था. कभी कभी दोनों उसके पुराने कमरे पर भी जाते और जो लड़का वहां
रह रहा होता उससे पुराने समय की बात करते. एक बात और थी जो उसको हमेशा महसूस होती
कि सुशील हॉस्टल आकर थोड़े देर के लिए खो जाता था, कभी कभी उसे लगता जैसे वह उससे कुछ कहना चाहता हो लेकिन कह नहीं पा
रहा हो. लेकिन उसने इस विषय में न तो कभी पूछा और न कभी सुशील ने कुछ बताया.
इन्हीं
सोचों में गुम वह अर्दली बाजार पहुँच गया, गाँव
में चचेरे भाई की शादी थी तो सब गाँव जाने की तैयारी कर रहे थे. उसके लिए खाना रखा
हुआ था, उसने पहले स्नान किया और फिर भोजन. फिर सभी लोग
गाँव निकल गए.
अगले
तीन दिन शादी की धूमधाम चलती रही और चौथे दिन कुछ लोग अर्दली बाजार आ गए. वह भी
शिवपुर आया और फिर उसने सुशील को फोन किया "आज शाम को लंका पर मिलते हैं
सुशील, ठीक है ना".
सुशील
तो मानो उसके फोन का इन्तजार ही कर रहा था, उसने
5 बजे लंका पर मिलने की बात कही. अर्दली बाजार से लंका दिन में जाना कुछ ऐसा था
मानो बनारस से जौनपुर जाना,
दोनों में एक घंटा लग जाता था. खैर उसके पास तो
स्कूटी थी इसलिए वह आराम से लंका पहुँच गया लेकिन सुशील तो अपनी साइकिल से ही आया.
लंका
पहुंचकर उसने फोन लगाया 'कहाँ तक पहुंचे सुशील?
"बस
15 मिनट और, पहुँच रहे हैं", सुशील का जवाब आया.
उसने
एक नजर लंका के मार्किट पर डाली, कितना
कुछ बदल गया है पिछले सालों में. एक समय था जब गर्मी में हर रात वह मैंगो शेक पीने
आता था. और अगर मेस बंद होती तो पहलवान का लवंगलता और एक पुरवा गरम दूध पीकर काम
चल जाता था. उस समय पहलवान की बस एक दुकान थी, अब
तो सड़क के दोनों तरफ मिलकर 4 तो पहलवान की ही दुकान थी, उसके अलावा भी कुछ अन्य दुकानें. रविदास गेट भी
अपनी पूरी भव्यता से बन गया था और शिवम सिनेमाहॉल, जहाँ पढ़ाई के समय फ़िल्में देखा करते थे, एक बहुत बड़ी मल्टी स्टोरी कॉलोनी में तब्दील हो
गया था.
"राजू, का हाल हौ, खूब
मजा भयल शादी में", आज सुशील पूरी तरह पुराने अंदाज में था. अब
उससे भी खड़ी हिंदी में बात करते नहीं बना "आवा, चाय पियल जाय. अब शादी बियाह में ओतना मजा नाहीं आवेला, जितना पहिले आवत रहल".
चाय
पीकर दोनों बी एच यू के अंदर चल पड़े, सुशील
ने अपनी साइकिल मुख्य द्वार पर खड़ी कर दी और दोनों स्कूटी से हॉस्टल की तरफ बढ़ चले.
हॉस्टल के सामने पहुंचकर एक बार फिर दोनों पुराने दिनों में खो गए.
"क्या
समय था सुशील, कितना सुकून था और जीवन में बस आनंद ही आनंद था
उस समय", उसने सुशील से कहा.
सुशील
मुस्कुरा उठा और थोड़ी देर बाद दोनों विश्वनाथ मंदिर के प्रांगड़ में बैठ गए. शाम अब
लगभग ढल चुकी थी और अँधेरा होने लगा था. मंदिर के अंदर और बाहर की बत्तियां जल गयी
थीं और रह रह कर अंदर से बजते घंटे की आवाज बहुत सुखद लग रही थीं.
"आज
हम कुछ कहने वाले हैं राजू,
हर बार सोचते थे कि कहें लेकिन कह नहीं पाते
थे", सुशील की बात पर वह चौंका. उसे लगा कि शायद कोई
घरेलू समस्या होगी जिसके लिए वह सलाह लेना चाहता है.
"हाँ, हाँ, बोलो
दोस्त, क्या बात है?
सुशील
ने गहरी सांस ली और उसकी तरफ देखते हुए बोला "मुझे यह मालूम है कि बीच बीच
में मेरी मानसिक स्थिति खराब हो जाती थी और मैं हॉस्टल के तुम्हारे कमरे पर भी आ
जाता था. तुम्हे उस समय कितनी दिक्कत होती थी, मैं
समझ सकता हूँ दोस्त. लेकिन तुमने जिस तरह से मुझे संभाला और मुझे आज तक इसका एहसास
भी नहीं होने दिया उसके लिए मैं हमेशा तुम्हारा आभारी रहूँगा".
वह
भौचक्का रह गया, उसने कभी सोचा भी नहीं था कि सुशील को इसका
एहसास भी है. वह कुछ कहता उसके पहले सुशील ने आगे कहा "तुम्हारी जगह कोई और
होता तो शायद मुझे दोस्त नहीं रहने देता, मुझसे
दूर चला जाता. लेकिन तुमने सच्चे अर्थों में दोस्ती निभायी, शुक्रिया".
वह
कुछ कहता लेकिन सुशील ने उसके हाथ को कस कर अपने हाथ में ले लिया. मंदिर में घंटा
और शंख बजने की आवाज आयी और वह ख़ामोशी से मंदिर से निकलते प्रकाश को देखने लगा.
उसने आज फिर सुशील को ये एहसास नहीं होने दिया कि उसे सब मालूम था, कुछ राज जाहिर न हों तो ही बेहतर होता है.
"चला
बाहर चाय पीयल जाय",
उसने सुशील को पकड़कर उठाया और दोनों मंदिर के
बाहर चाय की दुकान की तरफ निकल गए.
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