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Monday, April 29, 2019

स्पष्ट समाधान-लघुकथा

घबराई हुई सी वह जल्दी जल्दी घर के अंदर घुसी और सोफे पर पसर गयी. बाहर तापमान जैसे सारे कीर्तिमान तोड़ डालना चाह रहा था, लू की लपटें सबको जला रही थीं. लेकिन उसकी समस्या लू नहीं थी बल्कि रोज कॉलेज जाना और आना थी. नुक्कड़ के कोने वाली दूकान पर बैठे रहने वाले मनचले उसकी हिम्मत पस्त कर देते थे लेकिन पढ़ाई करने के लिए रोज जाना भी जरुरी था.
कुछ देर बाद उसने उठ कर पानी का गिलास लिया और गट गट करके पूरा पानी पी गयी. मम्मी या पापा से कहते उसे डर लगता था, वह लोग पहले भी उसे कॉलेज जाने के लिए मना कर चुके थे. अगर इस बात की भनक भी उनको लग गयी तो कल से ही उसका बाहर निकलना बंद हो जायेगा.
दरवाजे की घंटी बजी, उसने उठकर खोला तो सामने मुन्नी खड़ी थी. लगभग उसी की हमउम्र मुन्नी उसके यहाँ घर के काम करने आती थी और उससे पढ़ाई लिखाई के बारे में भी अक्सर बात करती रहती थी. मुन्नी ने उसे बताया था कि अगर उसे भी मौका मिला होता तो वह भी जरूर पढ़ने जाती.
"क्या दीदी, आज बहुत उदास दिख रही हो", मुन्नी ने उसको देखते ही पूछा.
उसने कोई जवाब नहीं दिया और सोफे पर अधलेटी पड़ गयी, दिमाग में उन्हीं मनचलों की सूरत घूम रही थी. मुन्नी ने पहले झाड़ू लगाया और फिर पोछा लगाने लगी, वह उसको देख रही थी. अचानक उसके दिमाग में आया कि मुन्नी भी तो उसी रास्ते से आती है, वह मनचले तो उसे भी छेड़ते होंगे. लेकिन कभी उसने उसे परेशान नहीं देखा.
"अच्छा मुन्नी एक बात बता, तुझे वह नुक्कड़ पर के मनचले छेड़ते नहीं हैं क्या?, उसने मुन्नी से पूछा.
मुन्नी के हाथ पोछा लगाते लगाते रुक गए, उसने उसको गौर से देखा हुए बोली "अब समझी, इसीलिए इतना उदास हो दीदी. देखो वह तो कमीने लोग हैं, मुझे भी छेड़ने का प्रयास किया था उन्होंने. लेकिन मैंने अपना चप्पल निकाला और उनको दिखाकर समझा दिया, अब कभी दिक्कत नहीं होती है. आप भी यही करो दीदी, आप डरोगे तो लोग जीने नहीं देंगे".
मुन्नी वापस अपने काम में लग गयी, उसे एक रास्ता स्पष्ट नजर आ रहा था. 

Thursday, April 25, 2019

पुरानी पहचान-लघुकथा

"अरे, उस भलेमानस के पास जाना है, चलिए मैं ले चलता हूँ", सामने वाले व्यक्ति ने जब उससे यह कहा तो उसे एकबारगी भरोसा ही नहीं हुआ. अव्वल तो लोग आजकल किसी का पता जानते ही नहीं, अगर जानते भी हैं तो एहसान की तरह बताते हैं. और राकेश के बारे में उसकी राय तो भलेमानस की बिलकुल ही नहीं थी.
चंद साल ही तो हुए हैं जब राकेश उसकी टोली का सबसे खतरनाक सदस्य हुआ करता था. किसी को भी मारना पीटना हो, धमकाना हो या वसूली करनी हो तो राकेश सबसे आगे रहता था. और इसी वजह से उसे एक प्राइवेट फाइनेंस कंपनी में नौकरी भी मिल गई थी, वसूली करने की. उसी नौकरी के सिलसिले में उसे दूसरे शहर जाना पड़ गया और फिर पिछले दो सालों से तो वह राकेश से मिला भी नहीं था. हाँ फोन पर बात जरूर होती थी लेकिन काफी कम और बातचीत में उसे वह मस्ती नजर नहीं आती थी जो पहले थी.
इन्हीं विचारों में गुम वह उस सज्जन के साथ चलता हुआ राकेश के घर पहुंचा. घंटी बजाने पर गोद में बच्चा लिए एक महिला बाहर आयी और उसे प्रश्नवाचक निगाह से देखने लगी.
"राकेशजी कहाँ हैं, यह उनसे मिलने आये हैं", वह अभी कुछ कहे तभी साथ आये सज्जन ने पूछा. महिला उनको पहचानती थी, दोनों को अंदर ले आयी. इतने में राकेश कमरे में आया और उसे देखकर लपककर गले लग गया.
"अरे बताया भी नहीं कि तुम आ रहे हो, नहीं तो मैं खुद स्टेशन लेने आ जाता. अच्छा समझा, तुम मुझे सरप्राइज देना चाहते थे", राकेश भावुक हो चला था, साथ आये सज्जन बाहर निकल गए.
वह क्या बताता, सरप्राइज तो उसे मिला था. वह अभी कुछ पूछता उसके पहले ही राकेश ने कहा "छमा करना दोस्त, शादी में नहीं बुला सका. इनके मंगेतर ने हमारी कंपनी से लोन लिया था और वसूली के लिए हमारे एक साथी ने इतना धमका दिया कि उन्होंने आत्महत्या कर ली. इनके बच्चे को नाम देने और अपने पुराने पापों का प्रायश्चित करने के लिए शादी कर ली और पुराने सभी काम बंद कर दिए".
उसने राकेश का हाथ पकड़ लिया, अब उसकी पुरानी पहचान ख़तम होने लगी थी. 

Tuesday, April 9, 2019

संस्कार- लघुकथा

"हम तो आज भी पल्लू सरक जाए तो तुरंत ठीक कर लेते हैं. लेकिन ये आजकल की बहुरिया, मजाल है कि पल्लू सर पर टिके", रुक्मणि को नई बहू का कपड़ा पहनना बिलकुल नहीं भा रहा था और वह रवि के सामने भी कहने से नहीं चूकीं.
रवि ने पलटकर उनकी तरफ देखा और मुस्कुरा दिए. वह भी नई बहू को पिछले दो दिन से बमुश्किल साड़ी सँभालते देख रहे थे.
"अब हर आदमी तुम्हारी तरह तो नहीं बन सकता ना राजेश की अम्मा, तुमको पता तो है कि बहू शहर में नौकरी करती है और इसके नीचे कई लोग काम भी करते हैं", रवि ने बात सँभालने की कोशिश की.
"तो, इसका मतलब यह तो नहीं है कि वह हमारी इज्जत भी नहीं करेगी", रुक्मणि आज चुप नहीं होने वाली थी.
"दो दिन से वह हम लोगों का ख्याल रखने की पूरी कोशिश कर रही है. राजेश भी नहीं है वर्ना उसकी थोड़ी मदद कर देता. और जहाँ तक सवाल है इज्जत का, वह उसकी निगाहों में देखने की कोशिश करो".
"आप ही देखो उसकी निगाहें, मैं तो गंवार ठहरी, मुझे क्या पता ये सब", रुक्मणि उठकर जाने लगी.
"मुझे पता है कि असली वजह राजेश का प्रेम विवाह है और तुम्हें दहेज़ नहीं मिलने का गुस्सा है. लेकिन इसमें इस बेचारी लड़की का क्या कसूर", रवि ने रुक्मणि का हाथ पकड़कर बैठा लिया. उनको एहसास हो गया था कि बहू के कानों में ये बात चली गयी है.
अभी रुक्मणि फिर कुछ कहती कि बहू ट्रे में चाय लेकर आ गयी. चाय रखने में पल्लू सर से वापस सरक गया और रुक्मणि की भौहें फिर तन गयीं.
"मांजी, मुझे आज आपसे पल्लू ठीक रखना सीखना है. मेरी माँ रही होती तो उसने मुझे जरूर सिखाया होता. अब तो आप ही हमारी माँ हैं, मुझे बताईये प्लीज", बहू वहीँ सामने बैठ गयी.
रुक्मणि तो जैसे स्तब्ध रह गयी, ये क्या सुन रही है वह. रवि भी बहू की इस बात से एकदम खिल उठे.
"तू तो ऐसे ही इतनी अच्छी लगती है, अरे माँ के सामने बेटी कहीं पल्लू लेती है", कहकर रुक्मणि ने बहू को गले से लगा लिया. मन में बसा सारा गुबार आंसुओं के रास्ते बह निकला. ट्रे में रखी रुक्मणि की चाय उसी तरह पड़ी थी लेकिन रवि के प्याले की चाय कुछ नमकीन हो गयी.

Tuesday, April 2, 2019

वह निगाहें- लघुकथा

"अरे पागल हो गए हो क्या, उस ऑटो को क्यों जाने दिया. इतना टेंशन हैं चारोतरफ और हम लोग यहाँ फंसे हुए हैं जहाँ तीन दिन पहले ही दंगे हुए थे", राजेश एकदम बौखला गया.
"चिंता मत करो, अब स्थिति कुछ ठीक हैं, दूसरा आ जायेगा", उसने इत्मीनान से कहा और सामने सड़क पर देखने लगा.
तभी एक दूसरा ऑटो आता दिखाई पड़ा, ऑटो ड्राइवर को देखकर ही राजेश को समझ आ गया कि यह गैर मज़हबी है और वह थोड़ा पीछे हो गया.
"आ जाओ, चलना नहीं हैं क्या", कहते हुए वह राजेश का हाथ खींचते हुए ऑटो में बैठ गया.
कुछ समय बाद दोनों मुख्य सड़क पर थे जहाँ स्थिति कमोबेश सामान्य थी. एक आती हुई बस में सवार होने के बाद राजेश ने उससे पूछा "तुम्हें हो क्या गया था, एक तो जगह गड़बड़ थी और दूसरे अपने वाले ऑटो को छोड़कर उस ऑटो में बैठ गए. आगे से ऐसा रिस्क लेना हो तो मुझे मत लपेटना, जान सूख गयी थी मेरी".
उसने राजेश के कंधे को सहलाया और बोला "मुझे आज भी २५ साल पहले के एक ऑटो ड्राइवर का चेहरा नहीं भूलता जिसके ऑटो में मैंने बैठने से मना कर दिया था. उस समय इंदिरा गाँधी की हत्या हुई थी और वह ऑटो ड्राइवर एक बूढ़ा सरदार था. मुझे आज भी उसकी निगाहें उसके मजहब के ऊपर किये गए शक के लिए अंदर से कचोटती हैं".
बस में लग रहे शुरूआती झटके अब शांत हो गए थे, वह आँख मूँद कर चुपचाप सीट पर सर टिकाकर लेट गया. 

Tuesday, March 19, 2019

एक और कसम-व्यंग्य

दोस्त क्यूँ होते हैं, इस सवाल का जवाब जिंदगी के अलग अलग समय में अलग अलग हो सकता है. लेकिन एक जवाब तो कामन है कि जो आपके लिए हमेशा खड़ा रहे, आपकी हर मुसीबत में काम आए, वही असली दोस्त होता है. बहरहाल अधिकांश दोस्त ऐसे होते भी हैं, बस कुछेक अपवाद को छोड़कर.
कुछ लोगों का यह भी मानना है कि अगर सियापा ही न करें तो दोस्त कैसे, ये अलग बात है कि आप माने या न माने. अमूमन ऐसे दोस्त तो जिंदगी के शुरूआती दिनों में ही मिलते हैं जब आपके ऊपर किसी किस्म के सियापे का कोई असर नहीं पड़े. और मुझे तो बिलकुल नहीं लगता था कि ऐसे दोस्त एक समय के बाद मिलते भी हैं, मतलब तब, जब आप जीवन के पचास बसंत पार कर चुके हों. लेकिन अब मानना पड़ रहा है और उसकी वाजिब वजह भी है.
शादी के पच्चीस साल बीतने के बाद अगर घरवाली कुछ दिनों के लिए बाहर गई हो तो यह समय आपके लिए सबसे उम्दा होता है. आप चाहें तो इससे इत्तेफ़ाक़ नहीं भी रख सकते हैं लेकिन आपका जमीर भी यह जानता है कि आप गलत हैं. अब ऐसे में तो यह लाज़मी है कि आप चाहे जितना भी खुश हों, रोज सुबह शाम वीडियो काल पर बात करते समय आपको थोड़ा दुखी दिखने का अभिनय करना ही पड़ता है. बचपन में गलती करने के बाद आपका मासूम दिखने का सफल अभिनय यहाँ खूब काम आता है, जब आपकी माँ को दुनिया के सब लड़के बदमाश दिखते थे, एक आपके सिवा.
यह सब ठीक ठाक ही चल रहा था, रोज हम दिन भर अपने को शाबाशी देते रहते कि कल रात को कितनी बढ़िया एक्टिंग की थी. लेकिन जब आपकी शामत आनी होती है तो आ ही जाती है, या यूँ कह लीजिये कि उपरवाले से भी आपका सुख ज्यादा दिनों तक देखा नहीं जाता. बस हुआ यूँ कि हमारे एक पुराने दोस्त हमसे मिलने आफिस आए और जब हम लोग खुश होकर ठहाके लगा रहे थे तो उन्होंने हमारी हंसती हुई तस्वीर खैंच ली. दरअसल वह अपने पत्नी के साथ थे इसलिए जाहिराना तौर पर वह उतने खुश नहीं थे जितना मैं था. यह सब इतने चुपचाप हुआ कि मुझे भनक तक नहीं लगी कि उन्होंने मेरी हंसती हुई तस्वीर किसी और प्रयोजन के लिए खैंच ली थी. यहाँ तक तो ठीक था लेकिन कुछ ही घंटों में उनके द्वारा निहायत ही बेरहमी से वह तस्वीर इस कैप्सन के साथ कि "कितना खुश है अकेले में" घरवाली को भेज दी गई. तस्वीर भेजने के पहले या बाद में भी उन्होंने मुझे इसके बारे में बताना भी गंवारा नहीं समझा. शाम होते होते हमने अपने अभिनय की तयारी कर ली थी और मैं अभी वीडियो काल करूँ उसके पहले ही उधर से फोन आ गया. अपने बॉस के फोन आने से भी संभवतः इतनी घबराहट नहीं होती है जितनी घरवाली के अचानक आये फोन से. मैंने यथासंभव अपनी घबराहट को दबाते हुए बेहद मुलायम शब्दों में इतना ही कहा था "कैसी हैं बेगम, आपको बहुत मिस कर रहा हूँ", कि उन्होंने वह फोटो भेजी और कहा "अभी एक आपकी दुःख भरी फोटो भेजी है, आपके दोस्त ने आज भेजी थी. अब मैं सोच रही हूँ कि आपको और ज्यादा मिस करने का मौका नहीं दूँ", और फोन काट दिया. मैंने घबराते हुए फोन में फोटो देखा, कम्बख्त वही फोटो थी जिसमें मेरी खुशियां मेरे चेहरे पर समां नहीं रही थी".
अब इस वाकये का परिणाम यह हुआ है कि अब उधर से तत्काल का टिकट लेकर बेगम की तुरंत वापसी की खबर आ गई है. बस आज से एक नयी कसम खायी है कि दोस्त चाहे कितना भी अच्छा हो, उससे संभल कर ही रहना है. 

Wednesday, February 27, 2019

समाधान-- लघुकथा

"अब जब उस कायर देश ने जंग की शुरुआत कर ही दी है तो हमें भी पीछे नहीं हटना है. हम ईंट का जवाब पत्थर से देंगें", सभागार में माहौल गर्म था, वहां उपस्थित हर आदमी उत्तेजित था.
"जंग अगर अपरिहार्य हो तो होनी ही चाहिए, लेकिन अगर सिर्फ छुद्र तात्कालिक फायदे के लिए जबरदस्ती कराया जा रहा हो तो इसका विरोध किया जाना चाहिए", वहां मौजूद एक वक्ता ने अपनी बात पूरी गंभीरता से रखी.
अभी उस व्यक्ति ने बात ख़त्म भी नहीं की थी कि सभागार में चारो तरफ से शोर उठाने लगा. वहां मौजूद हर शख्स की निगाह में वह व्यक्ति देशद्रोही जैसा लग रहा था. कुछ अति उत्साही लोगों ने उसे गाली देना भी शुरू कर दिया और बाकी लोगों ने उन्हें रोकने की जहमत भी नहीं उठायी.
खैर एक शख्स उस व्यक्ति के समर्थन में आगे आया और उसने लोगों को रोका. चूँकि वह शख्स काफी प्रभावशाली था इसलिए लोग उसकी बात मानने को मजबूर हुए और खामोश हो गए. लेकिन उनकी निगाहें अभी भी उसके लिए नफरत और आग ही बरसा रही थी.
"अच्छा आप अपनी बात को स्पष्ट कीजिये कि आपका मतलब क्या था?, उस शख्स ने पूछा.
उस वक्ता ने आँखों ही आँखों में उस शख्स को धन्यवाद दिया और फिर उसने अपनी बात रखी "मुझे जो लगता है वह मैं कह रहा हूँ. हो सकता है कि आप लोग उससे असहमत हों लेकिन कृपया इसे समझने का प्रयास करें. युद्ध अगर आवश्यक हो तो लड़ना ही है लेकिन अगर युद्ध कराया जा रहा हो तो इसका विरोध किया जाना चाहिए. मुझे नहीं पता कि आप लोगों में से कितनों के घर से लोग फ़ौज में हैं, लेकिन मेरे कुछ रिश्तेदार जरूर हैं. सैनिक लड़ने के लिए ही हैं और वह शहीद भी होंगे, लेकिन उनकी बलि चढ़ाई जाए, यह गलत है. बाकी एक बात और, युद्ध समस्या का समाधान नहीं है, उसके लिए बातचीत ही होनी चाहिए".
अपनी बात रखकर वह व्यक्ति सभागार से निकल गया, पीछे सभागार में मौजूद लोगों का शोर बढ़ता ही जा रहा था.    

Thursday, February 21, 2019

पुतलों का दर्द- कहानी

हमेशा तेज़ क़दमों से चलकर दुकान पहुँचने वाला अंकुर आज धीमी चाल से चल रहा था, लेकिन इसको महसूस करने वाला एक उसके सिवा और कोई नहीं था. दरअसल अंकुर जिस दुकान में काम करता था वह एक कपड़े की दुकान थी, या और साफ़ शब्दों में कहें तो रेडीमेड कपड़ों की दुकान. और आजकल की दुकानों की तरह उसमें न सिर्फ़ कुछ लोग, जिसमें आदमी और औरत दोनों थे, काम करते थे, बल्कि कुछ बेजान चीज़ें भी साथ-साथ थे. बेजान से आप समझ ही गए होंगे कि मैं पुतलों की बात कर रहा हूँ. वही पुतले जिन्हें नए और अच्छे डिज़ाइन के कपड़े पहनकर दुकान के बाहर और अंदर दोनों जगह खड़ा कर दिया जाता है. बड़ी ख़ामोशी-से ये पुतले दुकान में आने-जाने वालों को और इसमें काम करने वालों को देखते रहते हैं. पता नहीं आपके दिमाग़ में कभी आया होगा या नहीं लेकिन अंकुर के दिमाग़ में हमेशा यह आता है कि ये पुतले भी सब कुछ समझते हैं. बस बोलते कुछ नहीं, शायद इनसानों को बिना रुके लगातार बोलते (अधिकतर झूठ) देखकर ही ये इतने थक जाते हैं कि ख़ामोश ही रहते हैं.
हाँ तो अंकुर आज धीमी चाल से दुकान की तरफ़ जा रहा था और यह एक बार पहले भी हुआ था. वैसे तो उसे दुकान पर सबसे पहले पहुँचकर पूरी दुकान को ठीक-ठाक करने में बहुत संतुष्टि मिलती थी. बचपन से ही अक्सर वह अपने कपड़े भी साफ़-सुथरा करके तहाकर रख देता था और यह उसके परिवार में अचम्भे जैसी बात थी. घर का लड़के से चीज़ों को बिगाड़ने या ख़राब करने की तो उम्मीद रहती है लेकिन अगर कोई लड़का सँभाल करे तो अजीब-सा लगता है. साधारण-सा परिवार था और पिताजी भी किसी दुकान में ही काम करते थे. उनका सपना था कि अंकुर आगे चलकर एक छोटी-सी दुकान खोले जिसका मालिक वह ख़ुद हो. लेकिन यह सपना वह अपने दिल में ही लिए भगवान को प्यारे हो गए और सपना हक़ीक़त में आज तक बदल नहीं पाया.
आज जब अंकुर दुकान पर पहुँचा तो दुकान खुल चुकी थी और कुछ पुतले खड़े भी हो गए थे. दुकान मालिक को अंकुर का देर से आना खटका, अमूमन उसने कभी देर नहीं किया था. अगर तबीयत वग़ैरा ख़राब होने के चलते देर होने वाली होती तो अंकुर पहले ही बता देता था. लेकिन आज उसका फोन भी नहीं आया और वह देर से भी पहुँचा. ख़ैर दुकान मालिक ने बस यूँ ही पूछ लिया "आज क्या हो गया अंकुर, तू देर से आने वाला था तो फोन क्यों नहीं किया?. अंकुर ने बस सर हिला दिया और पुतलों को कपड़े पहनाने के काम में लग गया. पुतलों में जीवन भले न हो लेकिन वे भी इनसानों कि तरह पुरुष, स्त्री और बच्चों में बटें होते हैं और अंकुर रोज़ उनको यथोचित सम्मान देते हुए कपड़े पहनाता. पुरुषों और बच्चों के पुतले तो ठीक थे, उनको कपड़े पहनाकर उनकी जगह खड़े करने में उसे न तो कोई ख़ास दिक़्क़त होती और न कोई अतिरिक्त उत्साह उसके चेहरे पर दिखाई पड़ता. लेकिन जब महिला के पुतले को कपड़े पहनाना हो या उसका शृंगार करना हो तो अंकुर के चेहरे में एक अलग तरह का उत्साह और प्यार नज़र आता था. दुकान में काम करने वाली महिला कर्मचारी कभी-कभी उसे छेड़ती भी थीं लेकिन बस ऊपर ऊपर से ही, असल में उनके मन में भी अंकुर के लिए बहुत इज़्ज़त थी.
हर आम घर की तरह ही अंकुर का भी घर था. घर इसलिए क्योंकि वहाँ एक परिवार रहता था, अभावों से जूझता हुआ लेकिन साथ-साथ. घर में अंकुर को सबसे ज़्यादा उसकी माँ ही अच्छी लगती थी, पिताजी से वह हमेशा ही ख़ौफ़ खाता था. तमाम कम कमाने वाले और ज़्यादा ज़िम्मेदारी वाले पुरुषों की तरह उसके पिताजी भी थे. और अगर घर की आवश्यकता पूरी न हो पा रही हो तो अमूमन पुरुष नशे के आग़ोश में चला जाता है और उसके पिताजी भी इसके अपवाद नहीं थे. माँ हमेशा ख़ामोश रहकर, पिता की गाली-गलौज सहकर भी उसकी और उसकी दो बहनों की परवरिश ठीक-ठाक करती रहती और शायद ही कभी उसके मुँह से अंकुर ने अपशब्द सुना हो. बहनें भी माँ की ही तरह थीं, अंकुर से बड़ी और उसपर प्यार लुटाने वाली. इस तरह धीरे-धीरे अंकुर के मन में औरतों के प्रति एक कोमल भाव उत्पन्न हो गया और समय के साथ-साथ वह बढ़ता रहा. यही वजह थी कि माँ और बहनों के मना करने के बाद भी वह घर के अपने सारे काम ख़ुद ही करता और हर काम में माँ जैसी सुघड़ता लाने की कोशिश भी करता. नशे ने असमय ही पिता को काल कलवित कर दिया और अंकुर अपनी पढ़ाई छोड़कर दुकान में लग गया. लेकिन उसने पिताजी वाली दुकान जल्द ही छोड़ दी क्योंकि वहाँ पिता की कड़वी विरासत रोज़ उसका पीछा करती और उसे बढ़िया काम करने के बाद भी पिता के अतीत की वजह से वह सम्मान या जगह नहीं मिल पाती थी जिसकी वह उम्मीद करता था. सचमुच लोग तो चले जाते हैं लेकिन उनकी यादें, उनके कर्म काफ़ी समय तक पीछे रह जाते हैं, और कुछ मामलों में ख़ुशियाँ तो कुछ मामलों में तकलीफ़ देते रहते हैं.
बहनों की शादी किसी तरह से माँ ने निपटा दी और अब घर में बस अंकुर और उसकी माँ रह गई थीं. माँ की उम्र होने लगी और फिर बहनों और रिश्तेदारों के दबाव में उसकी शादी की बात भी चलने लगी. बहनों ने उसको लड़की देखने को कहा, उनके हिसाब से तो यही सही था. लेकिन अंकुर तो किसी और ही मिट्टी का बना था, उसने घर में दो-टूक बता दिया कि लड़की माँ ही देखेगी और वह माँ की ही तरह की होनी चाहिए. अब आजकल के समय में भी अगर लड़का ऐसी बात कहे तो उसकी माँ के लिए इससे बेहतर बात और क्या हो सकती थी. माँ ने बिल्कुल अपनी ही तरह की बहू ढूँढ़ी और अंकुर की शादी सरोज से हो गई. सरोज का मायका अंकुर से भी ग़रीब था और यही वजह थी कि उसे यहाँ आकर हमेशा अच्छा ही लगा. सरोज बेहद सरल स्वभाव की घरेलू महिला थी और वह अपनी सास का बेहद ख़याल रखती थी. अब घर में दो महिलाएँ हो गई थीं और दोनों के मुँह में ज़ुबान नहीं थी. अंकुर को इससे ज़्यादा और कुछ नहीं चाहिए था और वह शादी के बाद और मन लगाकर काम करने लगा. दुकान मालिक उसपर आँख मूँदकर भरोसा करता और अंकुर की मेहनत की बदौलत दुकान बहुत अच्छी चलने लगी.
आज अंकुर को पुतलों को कपड़े पहनाने में वह उत्साह या प्यार नहीं महसूस हो रहा था जो अमूमन उसे होता था. ऐसा इसके पहले एक बार तब हुआ था जब उसकी माँ का देहांत हुआ था. माँ की मौत का सदमा उसे बहुत दिनों तक सालता रहा और दुकान मालिक ने उस दरम्यान अंकुर को कुछ नहीं बोला था. दुकान मालिक ही क्या, वहाँ काम करने वाले सभी कर्मचारी अंकुर के स्वभाव से भली-भाँति परिचित थे और सब यह जानते थे कि अंकुर अपने माँ से कितना लगाव रखता है. समय ही हर रोग के लिए मलहम का काम करता है, बहरहाल धीरे-धीरे अंकुर भी उस सदमें से उबरा और उसका जीवन और दुकान का काम, दोनों पटरी पर आ गए.
समय बीतता गया, शादी के दो साल बाद अंकुर एक बेटी का बाप बना, शायद प्रकृति उसके ऊपर मेहरबान थी. पहले माँ, दो बहने, पत्नी और अब एक प्यारी-सी बेटी. जीवन में उसे और क्या चाहिए था. अब वह और सरोज रोज़ रात में अपनी बेटी के भविष्य के बारे में देर तक बात करते. बड़े प्यार से उन्होंने बेटी का नाम मुन्नी रखा था और जैसे-जैसे मुन्नी बड़ी होने लगी, घर में बस मुन्नी का ही नाम गूंजता रहता. अब वह दुकान में औरतों के पुतलों को इस तरह सजाता, मानो वे पुतले न होकर उसकी मुन्नी ही हों. दिनभर में कई कई बार वह उन पुतलों के पास जाता, उनके कपड़े ठीक करता और फिर उनके सर पर प्यार से हाथ फेर देता. दुकान की महिला कर्मचारियों के लिए हमेशा से यह एक अजूबा ही था कि कोई पुरुष महिलाओं के पुतले को भी इतने प्यार से रखता है और उनकी सँभाल करता है.
एक रात वह दुकान से जब घर पहुँचा तो सरोज बिस्तर पर लेटी हुई थी. वैसे तो पिछले कई दिन से उसे बुख़ार था और वह उसके लिए दवा भी ले गया था लेकिन उस दिन सरोज की हालत ज़्यादा ख़राब लग रही थी. मुन्नी ने भी घर पहुँचते ही अंकुर से सरोज को किसी अच्छे डॉक्टर से दिखाने के लिए कहा तो वह और भी चिंतित हो गया. अगली सुबह क़स्बे की सबसे अच्छी डॉक्टर के पास वह सरोज को लेकर गया, डॉक्टर ने दवा दी और कुछ टेस्ट कराने को कहा. टेस्ट का नतीजा अगले दिन आया तो वह उसे लेकर डॉक्टर के पास गया और डॉक्टर ने उन्हें देखते समय अपना चेहरा गंभीर बना लिया.
"देखो अंकुर, तुम्हारी बीबी को थोड़ी दिक़्क़त है और इसका इलाज लंबा चलेगा. उम्मीद है कि वह पूरी तरह ठीक हो जाएगी लेकिन हिम्मत से काम लेना पड़ेगा".
अंकुर बुरी तरह घबरा गया, उसने अटकते हुए पूछा "कौन सी बीमारी है डॉक्टर साहब, यह ठीक तो हो जाएगी न?
डॉक्टर ने उसे ढाढस बँधाया और बोली "इसके स्तन में गाँठ है और अभी कैंसर की शुरुवाती स्टेज है. उम्मीद है कि यह पूरी तरह से ठीक हो जाएगी, बस समय लगेगा और हिम्मत से काम लेना पड़ेगा. तुम दवाइयाँ ले लेना और हर हफ़्ते एक बार यहाँ ले आना, कुछ इलाज चलेगा".
अंकुर के दिल में आया कि वह वहीं पर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे, लेकिन सरोज के उतरे चेहरे को देखकर उसे हिम्मत जुटानी पड़ी. मुन्नी अलग परेशान थी, अब वह कॉलेज जाने लगी थी और उसे भी कैंसर के बारे में पता था. लेकिन उसने भी अंकुर और सरोज के चलते अपने आपको सामान्य रखने की पूरी कोशिश की और तीनों उदास चेहरा लिए घर पहुँचे. धीरे-धीरे इलाज शुरू हुआ और अंकुर अपने आपको संयत करके दुकान का काम भी उसी तरह करता रहा. दुकान पर उसने सरोज के कैंसर की बात किसी से नहीं बताई थी, बस इतना बताया था कि सरोज की तबीयत आजकल ख़राब रहती है और उसका इलाज़ चल रहा है.
दुकान में औरतों के पुतलों को कपड़े पहनाते समय वह हमेशा इस बात का ख़याल रखता कि पुतले उसके सामने नंगे न हों. कभी-कभी इसके लिए उसका मज़ाक भी उड़ाया जाता, ख़ासकर पुरुष कर्मचारियों के द्वारा लेकिन उसने कभी भी किसी पुतले को निर्वस्त्र नहीं देखा. हाँ उनको कपड़े पहनाते समय अगर उसका हाथ कभी उनके स्तन को छू जाता था तो उस समय उसे अपने-आप पर ग़ुस्सा और शर्म दोनों आती. यहाँ तक कि उसने सरोज के स्तन को भी शायद ही कभी उजाले में देखा हो, उसे हमेशा से यही लगता कि यह बच्चों के लिए ही हैं. इधर कुछ दिनों से सामने से दुपट्टा या कोई और कपड़ा पहनाते समय उसका ध्यान पुतलों के सामने के उभार की तरफ़ जाता तो उसे सरोज की याद आ जाती. उस समय वह पुतले के हाथ को कसकर दबाता और इस तरह से मानो सरोज को भी तसल्ली देने की कोशिश करता.
समय बीतता गया, सरोज का इलाज चलते लगभग एक साल होने को आया. वह यथासंभव सरोज को ख़ुश रखने की कोशिश करता, मुन्नी भी उसके साथ-साथ मम्मी को दिलाशा देती. लेकिन धीरे-धीरे उन तीनों को यह आभास हो गया कि यह रोग अब ठीक होने की स्थिति में नहीं है. क़स्बे की डॉक्टर के कहने पर वह एक बार शहर में भी सरोज को दिखा चुका था लेकिन वहाँ से भी कुछ ज़्यादा उम्मीद की किरण नहीं दिखाई दी. पिछले महीने जब वह सरोज को लेकर डॉक्टर के पास गया तो डॉक्टर काफ़ी गंभीर थी.
"अंकुर, अब और कोई रास्ता नहीं दिखता, सरोज को बचाने के लिए सर्जरी करनी पड़ेगी", डॉक्टर ने लंबी साँस छोड़ते हुए कहा.
अंकुर भी परिस्थिति को समझ रहा था, उसकी रुचि सिर्फ़ सरोज को किसी भी तरह से बचाने की थी.
"अब आप जैसा ठीक समझें डॉक्टर साहब, ऑपरेशन के बाद सरोज ठीक तो हो जाएगी न", अंकुर ने माथे पर चू आए पसीने को पोंछते हुए कहा.
"अरे बिल्कुल चिंता मत करो, सरोज ठीक हो जाएगी. बस उसका एक स्तन निकालना पड़ेगा नहीं तो कैंसर शरीर के बाक़ी हिस्सों में भी फ़ैल जाएगा. तुम अब ऑपरेशन की तयारी करो अंकुर और जल्द-से-जल्द सरोज को यहीं भर्ती करा दो, मैं शहर के सबसे अच्छे डॉक्टर से ऑपरेशन करवा दूँगी", डॉक्टर ने अंकुर को आश्वस्त करते हुए कहा.
अंकुर को काटो तो ख़ून नहीं, लेकिन डॉक्टर पर उसे पूरा भरोसा था. दरअसल उस क़स्बे में शायद ही कोई ऐसा था जो उस दुकान पर नहीं जाता था जहाँ अंकुर काम करता था. और इसी वजह से हर कोई अंकुर के अच्छे व्यवहार से परिचित था. आज तक इलाज के नाम पर डॉक्टर ने हमेशा उससे कम-से-कम पैसा ही लिया था और यह बात अंकुर भली-भाँति जानता था.
"और ख़र्चे की चिंता बिल्कुल मत करना अंकुर, सब हो जाएगा. बस अब देर मत करना", डॉक्टर ने जाते-जाते कहा तो अंकुर ने पलटकर हाथ जोड़ लिए.
लगभग दस दिन लगे सरोज को सर्जरी के बाद वापस घर आने में. बहुत कमज़ोर हो गई थी सरोज और अंकुर अब उसका ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान रखता था. मुन्नी भी कुछ दिन कॉलेज जाना बंद करके सरोज की देखभाल में ही लग गई. धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य होने लगा, सरोज भी घर के काम में थोड़ा-थोड़ा हाथ बटाने लगी और अंकुर अब सामान्य तरीक़े से दुकान पर जाने लगा. सरोज के मुँह में पहले भी ज़ुबान नहीं थी और अब तो लगभग ख़ामोश ही रहने लगी थी. उसकी मनोदशा मुन्नी तो समझती थी लेकिन अंकुर उसे ठीक होते देखकर वापस पहले की तरह रहने लगा. सरोज अब अपने आपको अधूरा महसूस करती लेकिन वह अंकुर से या मुन्नी से भी कुछ नहीं कहती. उसका अपना स्वभाव भी था और अंकुर की मनोदशा सोचकर भी वह अब सामान्य दिखने का ही प्रयास करती.
कल रात को दुकान बंद करते समय जब अंकुर पुतलों को अंदर कर रहा था तो अचानक एक कील में फँसकर एक पुतले का ब्लाउज़ सरककर नीचे आ गया. उस समय वहाँ कोई नहीं था और चमकती बत्तियों में अंकुर की नज़र पुतले के सामने वाले नग्न उभारों पर पड़ गई. एक बार तो उसे शर्म जैसा महसूस हुआ लेकिन फिर जब उसे दोनों उभार दिखे तो उसे सरोज की याद आ गई. ऑपरेशन के बाद उसने कभी भी सरोज को इस नज़रिए से गंभीरता से नहीं देखा था, बस उसे यह पता था कि सरोज का एक उभार काटकर निकाल दिया गया है. उसने जल्दी से पुतले को ब्लाउज़ पहनाया और लाइट बंद करके बाहर आ गया.
रात को घर आने के बाद उसने ऑपरेशन के बाद पहली बार सरोज को सामने से ग़ौर से देखा. उसे कुछ कमी सी लगी और फिर सरोज के चेहरे पर भी उसे वही कमी नज़र आई. पूरी रात वह बेचैनी से करवट बदलता रहा, उसे नींद नहीं आई. वह सरोज के शरीर और उसके चेहरे पर आए खालीपन को भरने की चिंता में लगा रहा. आज अगर वह सरोज के साथ सो रहा होता तो शायद वह उस खालीपन को अपनी आँखों से देखता. लेकिन सरोज और मुन्नी कमरे में साथ-साथ सोते थे और वह बाहर बरामदे में, इसलिए उसके लिए यह संभव नहीं था. और वह चाहकर भी सरोज से इसके बारे में कुछ पूछ नहीं सकता था. पूरी रात सोचने के बाद उसे यही समझ आया कि शायद सरोज के दर्द को महसूस करने के लिए ही दुकान में पुतले का ब्लाउज़ सरका होगा.
सुबह उठकर जब तक वह मुँह धोकर बाथरूम से निकला, सरोज चाय लेकर आ गई थी. उसने सरोज को साथ ही चाय पीने के लिए बोला तो उसने फीकी मुस्कान से अंकुर को देखा.
"मुन्नी, ज़रा एक कप चाय मम्मी के लिए भी लाना", अंकुर के अंदर पता नहीं कहाँ से यह हिम्मत आ गई. सामान्य स्थिति में उसका सरोज के सामने कुछ देर खड़ा रहना भी मुश्किल था, उसकी परवरिश और उसका संकोच आड़े आ जाता.
मुन्नी ने थोड़े आश्चर्य के साथ चाय का कप लाकर अंकुर के सामने रखा. सरोज ने शरमाते हुए कप उठाया और एक निगाह मुन्नी की तरफ़ डालकर धीरे-धीरे पीने लगी. अंकुर भी मुन्नी की उपस्थिति से बेख़बर एकटक सरोज को चाय पीते देखता जा रहा था. आज उसे अपनी पुरानी सरोज कहीं भी दिखाई नहीं पड़ रही थी, वह अंदर से तड़प उठा.
जब रोज़ का समय बीतने लगा तो सरोज ने ही आकर उसे टोका "अरे दुकान पर नहीं जाना है क्या, जल्दी से तैयार हो जाओ". उसकी इच्छा तो हुई कि वह आज दुकान जाने के लिए मना कर दे लेकिन अगर वह दिनभर घर में रहता तो शायद और उदास हो जाता.
अनमने ढंग से वह दुकान जाने के लिए तैयार हुआ और जाते समय जब उसे सरोज का फीका चेहरा दिखाई दिया तो उसका दिल रो पड़ा. आज वापस लौटते समय वह डॉक्टर के पास जाएगा और उससे बात करेगा, शायद कोई रास्ता निकल जाए. धीमे क़दमों से दुकान जाते समय उसके मन में बस किसी भी तरह सरोज को वापस मुस्कुराता हुआ देखने की तमन्ना थी, किसी भी तरह से.