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Thursday, May 1, 2014

फ़र्क़--

" आज कल की लड़कियों को तो सलीका ही नहीं रह गया, कैसे कैसे कपडे पहन लेती हैं, न बदन ढँकता है और न ही चेहरा| शर्म लिहाज तो बची ही नहीं इनके पास", चाचा घर के बरांडे में बैठे बड़बड़ा रहे थे|
" लेकिन चाचा, गर्मी भी तो बहुत पड़ रही है न, पास बैठे व्यक्ति ने कहा| अब ऐसी गर्मी में अगर पूरा शरीर ढँका रहे तो वो गर्मी से बेहाल न हो जाएँ"|
" तुम तो कहोगे ही बरखुरदार, तुम भी तो आखिर इसी पीढ़ी के हो न, अरे थोड़ी गर्मी नहीं बर्दास्त कर सकतीं| हमारे ज़माने में तो मजाल थी कि घर से बाहर निकलें और किसी का चेहरा भी दिख जाये"|
अचानक सामने पोते को देख कर चाचा बोले " अरे बेटा, बनियान निकाल कर हवा में बैठ जाओ, पसीना तो सूख जाने दो"|
खुद सिर्फ लुंगी लपेटे और पसीना पोंछते चाचा पोते को समझा रहे थे और वो गर्मी के फ़र्क़ को समझने की कोशिश कर रहा था|

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