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Monday, January 30, 2017

उपयोगिता--लघुकथा

दरवाजे पर चहल पहल मची हुई थी, एक किनारे दद्दू खटिया पर लेटे हुए सब कुछ चुपचाप देख रहे थे| बड़के नाती ने एक बार फिर फोन लगाया और पूछा "और कितना टाइम है आने में"| उधर से कुछ आवाज़ आयी और उसने सर हिला दिया| उसकी बेचैनी और उत्साह देखते ही बन रहा था|
दद्दू ने एक बार उठने की कोशिश की, लेकिन एक तो कमर दुहरी हो गयी थी, उसपर से घुटने का दर्द, उठ नहीं पाए| फिर उन्होंने सोचा की नाती को आवाज़ लगाएं, लेकिन वह दरवाजे से खलिहान की तरह चला गया था| दद्दू बेबसी में लेटे लेटे दरवाजे का मुआयना करने लगे| कभी चरनी पर कम से कम दस नाँद और खूंटे हुआ करते थे, कुछ बैलों के, कुछ गायों के और एक भैंस का| दिन भर उनका इनके चक्कर में लगा रहता था, खेत से जैसे ही लौटते थे, सभी जानवर उनको देखकर मुंह उठा कर अपनी तरफ बुलाते थे| दद्दू भी सबके पास जाकर उनके चेहरे पर हाथ फेरते और फिर उनके सानी पानी में लग जाते| लेकिन आज तो सिर्फ दो खूंटे बचे थे जिनपर दो जर्सी गायें बंधी थीं|
इसी सोच में डूबे हुए थे दद्दू कि बड़का नाती दौड़ते हुए खलिहान से आया और दरवाजे की तरफ भागा| दद्दू उचक कर देखने की कोशिश करने लगे तभी दरवाजे पर धड़धड़ाता हुआ ट्रैक्टर आया| ड्राइवर के ब्रेक लगाकर रोकते ही बड़का नाती लपक कर ट्रैक्टर पर चढ़ने लगा|
कोने में बड़ी मुश्किल से टिकाकर रखा हुआ बैलगाड़ी का ढांचा ज़मीन हिलने से लुढ़क गया| पूरे घर की नजर ट्रैक्टर पर थी लेकिन दद्दू की नजर ढांचे पर पड़ी और वह कमर पर हाथ रखकर वापस खटिया पर लेट गए|

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