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Sunday, June 4, 2017

आज का समय-- लघुकथा

"क्या क्या सहूलियत नहीं दी थी पढ़ने के लिए और नतीजा सिफर", एकदम आपा खो बैठी थी वह बेटे का रिजल्ट देखकर|
"पर माँ नंबर तो ठीक ही आये हैं और पास भी हो गया हूँ", बेटे ने प्रतिकार करना चाहा|
"क्या खाक नंबर आये हैं, जिसको देखो व्ही अपने बच्चे का १० सीजीपिए बता रहा है| आजकल किसी अच्छे कालेज में मिलता है दाखिला इन नंबर से", वह अभी भी उतने ही गुस्से में थी|
"मैंने तो पहले ही कहा था कि मेरा मन पढ़ने में बहुत नहीं लगता, फिर भी मैंने अपनी तरफ से पूरी मेहनत कि थी", बेटे ने एक बार और अपनी बात रखनी चाही|
"अब लोग पूछेंगे तो क्या बताउंगी इसके बारे में" कहते हुए वह सोफे पर धंस गयी|
"लोगों ने कभी मेरे बारे में पूछा है तुमसे, मैं तो हमेशा द्वितीय श्रेणी में ही पास हुआ| और ऐसे वक़्त में तो हमारे सहारे कि जरुरत है उसको, न कि इस तरह से हतोत्साहित करने की", उसने पत्नी के कंधे पर हाथ रखा|
"वो समय और था, आज कितना कम्पटीसन है आपको तो पता ही है", पत्नी का स्वर अब थोड़ा मद्धिम था|
"यह जीवन का अंत नहीं है, बस एक पड़ाव है, उसे अपने हिसाब से आगे बढ़ने दो| और तुम सच कह रही हो, अब समय बदल गया है, आज के बच्चे अपना भविष्य खुद सोच सकते हैं", कहते हुए उसने बेटे को अपने आगोश में भर लिया|
उसने भी बेटे को अपनी बाँहों में भींच लिया और उसके ललाट पर चुम्बन जड़ दिया| 

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