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Monday, September 11, 2017

फंदा-- लघुकथा

"मैं उसे मारना नहीं चाहता था सर, बस उसका मुंह दबा कर उसे किडनैप करना चाहता था| मुझसे अनर्थ हो गया, अब जो चाहे सजा दिलवा दीजिये", बोलते बोलते सोनू फूट फूट कर रोने लगा|
"बस किडनैप करने के चक्कर में तूने उस मासूम का खून कर दिया, पैसों के चक्कर में तुम लोग कुछ भी कर सकते हो| तुझ जैसे दरिंदों को तो समाज में जिन्दा रहने का कोई हक़ नहीं है", इन्स्पेक्टर ने शब्दों को चबाते हुए कहा| पुलिस स्टेशन में काफी भीड़ इकठ्ठा हो गयी थी और तब तक बच्चे के पिता डॉ सरकार भी पहुँच गए|
"इसे जिन्दा मत छोड़ना सर, हत्यारा है यह, अरे क्या बिगाड़ा था मेरे बच्चे ने तेरा", कहते हुए डॉ वहीं रखी कुर्सी पर लुढ़क गए| पास खड़े एक व्यक्ति ने उनके चेहरे पर पानी छिड़का और कुछ और लोग उनको सँभालने लगे|
सोनू हाथ जोड़े खड़ा था और पुलिस उसके खिलाफ रिपोर्ट लिख रही थी| तब तक डॉ फिर से बिफर पड़े "अरे तेरे जैसे हत्यारों को तो चौराहे पर फांसी दे देनी चाहिए"|
सोनू ने एक बार डॉ की तरफ देखा और फिर हाथ जोड़े हुए ही उसने कहा "डॉ साहब मेरे बच्चे का क्या कसूर था, क्यों आपने सिर्फ पैसे के लिए उसे अपने यहाँ भर्ती करने से मना कर दिया था?
डॉ सरकार ने उसे गौर से देखा और उनको कुछ दिन पहले का वाकया याद आ गया| इसी का बच्चा था जिसे उन्होंने भर्ती करने से मना कर दिया था और वहीँ बच्चे की मौत हो गयी थी| वह धीरे से कुर्सी से उठे और वापस मुड़ गए, रास्ते में हर चौराहे पर उनको फांसी का फंदा लटकता नज़र आ रहा था|

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