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Thursday, February 8, 2018

जरुरत- लघुकथा

आज वह बहुत खुश थी, सारे गुलाब बिक गए थे. रात काफी हो चली थी और एक आखिरी गुलाब को पास रखकर वह पैसे गिनने में तल्लीन थी तभी एक कार उसके पास रुकी.
"वो गुलाब देना", अंदर से एक नवयुवक ने आवाज लगायी. उसने एक उड़ती हुई नजर युवक पर डाली और उसकी बात अनसुना करते हुए वापस पैसे गिनने में लग गयी.
"अरे सुना नहीं क्या, वो गुलाब तो दे, कितने पैसे देने हैं", युवक ने इस बार थोड़ी ऊँची आवाज में कहा, उसके स्वर में झल्लाहट टपक रही थी.
उसने सर उठाकर युवक को देखा और पैसे अपनी थैली में रखते हुए बोली "यह बेचने के लिए नहीं है भैया".
युवक यह सुनकर गाड़ी से नीचे उतर आया और थोड़े खुशामदी स्वर में बोला "क्यों नहीं बेचेगी इसे, अच्छा एक काम कर, दुगुनी कीमत ले ले".
उसने युवक को देखा और मुस्कुराते हुए बोली "यह मैंने अपनी माँ के लिए रखा है, आज के दिन उनको गिफ्ट करना है".
"अच्छा तू सौ रुपये ले ले लेकिन गुलाब दे दे, मुझे गिफ्ट करना ही है आज. समझा कर, माँ को नहीं भी दिया तो क्या फ़र्क़ पड़ेगा", युवक ने लगभग मिन्नत करते हुए कहा. उसने युवक के हाथ में पकडे सौ के नोट को देखा और सोचने लगी. युवक शायद किसी और विकल्प के अभाव में हर कीमत पर गुलाब लेना चाहता था और वह माँ को ही देना चाहती थी.
उसने गुलाब उठाया और अपने सीने से लगा लिया, युवक अब मायूस हो गया और पलट कर जाने लगा. उसने आवाज लगायी "भैया, ले जाओ गुलाब".
युवक ने झपट कर गुलाब लिए और सौ रुपये पकड़ा दिए, उसने नोट को मुट्ठी में कस कर बंद किया और जल्दी जल्दी घर की तरफ चल पड़ी, शौक पर जरुरत भारी पड़ गयी.
मौलिक एवम अप्रकाशित 

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