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Monday, February 26, 2018

जिंदगी का खूबसूरत रंग--लघुकथा

गाड़ी रुकते ही चरो तरफ से बच्चों ने घेर लिया, सभी हाथ फैलाये कुछ पाने की उम्मीद मे लगातार आवाज लगा
रहे थे. उसने दरवाजा खोला और बाहर निकला, अब बच्चे उसके आमने सामने थे. कुछ अधनंगे लड़के, कुछ छोटी लड़कियां हाथ फैलाये सामने खड़ी थीं और कुछ बुजुर्ग पुरुष और महिलाएं भी उसकी तरफ बढ़ रही थीं. मंदिर के सामने हर जगह उसे ऐसी ही भीड़ दिखाई देती थी और वह कुछ न कुछ गाड़ी मे लेकर ही चलता था.
पिछली सीट पर रखे बैग को उसने निकाला और उसमें से एक एक फल वह सभी को पकड़ाने लगा. किसी को केले मिले तो किसी को संतरे, लगभग सभी बच्चों और बुजुर्गों को कुछ न कुछ देकर वह सामने वाली दुकान पर चाय पीने बैठ गया. उसे सभी के, खासकर बच्चों के चेहरे पर आई खुशी देखकर बहुत सुकून मिल रहा था और वह मुसकुराते हुए चाय पीने लगा.
अचानक उसकी नजर एक छोटी सी बच्ची पर पड़ी जो थोड़ी दूर पर बैठी एक अशक्त महिला भिखारी के पास खड़ी थी. उस बच्ची ने अपने केले का आधा हिस्सा तोड़ा और उस महिला को देते हुए बाकी हिस्सा खुद खाने लगी. अब उसके दिमाग में चीजें गड्डमड्ड होने लगींजिंदगी का सबसे खूबसूरत रंग दिख रहा था उसे. वह छोटी बच्ची उसे माँ दिख रही थी और केला खाती हुई वह अशक्त महिला उसकी बेटी.

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